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बुधवार, 30 नवंबर 2016

धर्म और फिदेल कास्त्रो

फिदेल कास्त्रो के बारे में यह सब जानते हैं कि वे क्रांतिकारी थे,मार्क्सवादी थे,लेकिन यह बहुत कम लोग जानते हैं कि फिदेल बेहतरीन धार्मिक समझ वाले व्यक्ति भी थे।फिदेल ने धर्म को लेकर जिस नजरिए को व्यक्त किया उससे बहुत कुछ सीखने की जरूरत है।यह सच है धर्म का जो रूप हम आज देखते हैं वह बहुत कुछ मूल रूप से भिन्न है।एक बेहतरीन मार्क्सवादी वह है जो धर्म को उसके सही रूप में समझे और धर्म की सही सामाजिक भूमिका पर जोर दे।
          हमारे यहां राजसत्ता और उसके संचालक धर्म के प्रचलित रूपों के सामने समर्पण करके रहते हैं, धर्म की विकृतियों के खिलाफ कभी जनता को सचेत नहीं करते,धर्म की गलत मान्यताओं को कभी चुनौती नहीं देते हैं ,धर्म का अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए दुरूपयोग करते हैं और इसके लिए सर्वधर्म समभाव की संवैधानिक समझ की आड़ लेते हैं।संविधान की आड़ लेकर धर्म की ह्रासशील प्रवृत्तियों को संरक्षण देने के कारण ही आज हमारे समाज में धर्म,संत-महंत,पंडे,पुजारी,तांत्रिक ,ढोंगी आदि का समाज में तेजी से जनाधार बढ़ा है,इन लोगों के पास अकूत संपत्ति जमा हो गई है।इसके कारण समाज में अ-सामाजिकता बढ़ी है, लोकतंत्र विरोधी ताकतें मजबूत हुई हैं।

यह सच है हम पैदा होते हैं धर्मकी छाया में और सारी जिंदगी उसकी छाया में ही पड़े रहते हैं।धर्म की छाया में रहने की बजाय उसके बाहर निकलकर समाज की छाया में रहना ज्यादा सार्थक होता है। धर्म की छाया यानी झूठ की छाया । हम सारी जिंदगी झूठ के साथ शादी करके रहते हैं,झूठ में जीवन जीते हैं,झूठ से इस कदर घिरे रहते हैं कि सत्य की आवाज हमको बहुत मुश्किल से सुनाई देती है।झूठ के साथ रहते-रहते झूठ के अभ्यस्त हो जाते हैं और फिर झूठ को ही सच मानने लगते हैं। इसका परिणाम यह निकलता है कि सत्य से हम कोसों दूर चले जाते हैं।

धर्म पर बातें करते समय उसके मूल स्वरूप पर हमेशा बातें करने की जरूरत है।धर्म को झूठ से मुक्त करने की जरूरत है।धर्म को झूठ से मुक्त करने का अर्थ है धर्म को धार्मिक प्रपंचों से बाहर ले जाकर गरीब के मुक्ति प्रयासों से जोड़ना। इन दिनों धर्म को संतों-पंडितों ने अपहृत कर लिया है।अब हम धर्म के मूल स्वरूप और मूल भूमिका के बारे में एकदम नहीं जानते लेकिन उन तमाम किस्म की भूमिकाओं को जरूर जानते हैं जिनको कालांतर में धर्म के धंधेबाजों ने पैदा किया है। सवाल यह है धर्म यदि गरीब का संबल है तो राजनीति में धर्म को गरीबों की राजनीति से रणनीतिक तौर पर जुड़ना चाहिए।लेकिन होता उलटा है गरीबों की राजनीति करने वालों की बजाय धर्म और धार्मिक संस्थानों का अमीरों की राजनीति करने वालों की राजनीति से गहरा संबंध नजर आता है।

धर्म गरीब के दुखों की अभिव्यक्ति है।मार्क्सवाद भी गरीबों के दुखों की अभिव्यक्ति है।इसलिए धर्म और मार्क्सवाद में गहरा संबंध बनता है।लेकिन धर्म और मार्क्सवाद के मानने वालों में इसे लेकर विभ्रम सहज ही देख सकते हैं। फिदेल कास्त्रो इस प्रसंग में खासतौर पर उल्लेखनीय हैं। वे धर्म की व्याख्या करते हुए गरीब को मूलाधार बनाते हैं और कहते हैं कि ईसाईयत और मार्क्सवाद दोनों के मूल में है गरीब की हिमायत करना,गरीब की रक्षा करना,गरीब को गरीबी से मुक्त करना। इसलिए ईसाईयत और मार्क्सवाद में स्थायी रणनीतिक संबंध है।इसी आधार पर वे पुख्ता नैतिक,राजनैतिकऔर सामाजिक आधार का निर्माण करते हैं।

फिदेल के धर्म संबंधी नजरिए को अभिव्यंजित करने वाली शानदार किताब है ´फिदेल एंड रिलीजन´,यह किताब FREI BETTO ने लिखी है।इसमें फिदेल से उनकी 23घंटे तक चली बातचीत का विस्तृत लेखाजोखा है।यह किताब मूलतःक्यूबा और लैटिन अमेरिका में धर्म और मार्क्सवाद,धर्म और क्रांतिकारियों के अंतस्संबंधों पर विस्तार से रोशनी डालती है।इस बातचीत में फिदेल से 9 घंटे तक सिर्फ धर्म संबंधी सवालों को पूछा गया।धर्म और मार्क्सवाद के अन्तस्संबंध को समझने के लिए यह पुस्तक मददगार साबित हो सकती है।इस किताब को भारत में पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस ने 1987 में अंग्रेजी में छापा था। इस किताब में लिए गए इंटरव्यू कई बैठकों में संपन्न हुए।ये इंटरव्यू 1985 में लिए गए थे।ये किसी समाजवादी राष्ट्र राष्ट्राध्यक्ष के द्वारा धर्म पर दिए गए पहले विस्तृत साक्षात्कार हैं। आमतौर पर मार्क्सवादी शासकों ने धर्म पर इस तरह के इंटरव्यू नहीं दिए हैं।













मंगलवार, 30 अगस्त 2016

पूंजीवादी गुलामी है संतई

      संतों और धर्म की पूंजीपति को जरूरत क्यों पड़ती है ? इस सवाल का सही उत्तर समाजशास्त्री बेबर ने दिया है।उसने लिखा " पूंजीपति को ऊर्जा पैदा करने के लिए धर्म की जरूरत पड़ती है।"

पूंजीवादी विकास के लिए ऊर्जा का होना बेहद जरूरी है। यही वजह है हमारे देश में धर्म का उन्माद पैदा करने लिए पूंजीपति-व्यापारी बड़े पैमाने पर पैसा खर्च करते हैं।पूंजीपति और संतों का गठजोड़ परंपरावाद और पूंजीवादी उपभोग के वैचारिक -सामाजिक तानेबाने को बनाने में लगा रहता है।

जो उपभोगवादी है वह परंपरावादी भी है,यही वह बुनियादी प्रस्थान बिंदु है जहां से नया उपभोक्तावाद और उपभोक्ता बन रहा है।यह एक खुला सच है उपभोक्तावाद के विकास के साथ धर्म का भी तेजी से विकास हुआ है,वे एक-दूसरे के पूरक के तौर पर भूमिका अदा करते हैं।यह कैसे संभव है कि पूंजीवादी उपभोग तो सही है और धर्म गलत है।असल में धर्म और पूंजीवादी उपभोग एक पैकेज है। पुरानी आर्थिक परंपरा से मुक्ति का अर्थ, धर्म से मुक्ति नहीं है।बल्कि उलटा देखा गया है।पुराने आर्थिक संबंधों से मुक्त होते ही धर्म भी बड़े पैमाने पर फलने-फूलने लगता है।यही वजह है हमारे यहां पूंजीपति मात्र पूंजीपति नहीं होता बल्कि वह धर्मप्राण प्राणी भी होता है और वह समाज में प्रचार करता है कि मनुष्य धार्मिक -सामाजिक-प्राणी है।यह भी देखा गया है पूंजीवादी पेशेवर लोगों में धार्मिक भावबोध प्रबल होता है।खासकर हिन्दुओं में।

आधुनिकयुग के संत भगवान के नहीं पूंजीवाद के गुलाम हैं।वे पूंजीवादी बर्बरता ,शोषण और लूट के संरक्षक हैं।पूंजीवादी लूट को वैध बनाने ,स्वीकार्य योग्य बनाने में इन संतों की बड़ी भूमिका है।ये वस्तुतः टैक्सचोरों की बैंक हैं,स्वर्ग हैं।ये टैक्सचोरों के भारतीय स्विस बैंक हैं।

मेरी किसी संत से कोई दुश्मनी नहीं है और न मित्रता है।संतों का काम है संतई करना,लेकिन संत यदि गैर-धार्मिक विषयों पर उपदेश देते हैं तो मुझे शिकायत होती है।

धर्म और संत का गैर-धार्मिक क्षेत्र में प्रवेश वर्जित है।मुझे भगवान की उपासना करते संत पसंद हैं।भगवान के नाम पर,धर्म के दायरे में ईमानदारी -बेईमानी कुछ भी करें,हम हस्तक्षेप नहीं करते।धर्म उनका है वे धर्म के हैं,वे धर्म को बनाएं या बिगाड़ें हमें इससे क्या।

लेकिन धर्म के क्षेत्र से बाहर निकलकर यदि कोई संत अपने पोंगापंथी ज्ञान के आधार पर हस्तक्षेप करता है,सलाह देता है,हरकत करता नजर आता है तो मन में बेचैनी होती है और यही बात उठती है कि संत होकर धर्म के क्षेत्र का अतिक्रमण क्यों कर रहे हो,अतिक्रमण ही करना है तो संतई छोड़ दो,नागरिक बनो और सभी विषयों पर बोलो,उन विषयों का उपभोग करो।विधानसभा,लोकसभा,सांसद,विधायक,मंत्री आदि अच्छे लगते हैं तो संतई छोड़ो नागरिक बनो।संत बनकर नागरिकता का उपभोग नहीं कर सकते।यह संतई का दुरूपयोग है।मैं यदि शिक्षक बनना चाहता हूँ तो पहले मुझे कहीं नौकरी हासिल करके पढाने का अवसर हासिल करना होगा,बिना यह किए मैं शिक्षक नहीं बन सकता।उसी तरह संतई छोड़कर नागरिक बने बिना संत को सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक विषयों पर बोलने का कोई हक नहीं है।संत के रूप में यदि कोई बात कहोगे तो वह स्वीकार्य नहीं है,क्योंकि इन क्षेत्रों के लिए संत अवैध प्राणी है।

आरएसएस के बगलगीर होकर जो धर्म और धार्मिक नेता इन दिनों सुर्खियां बटोर रहे हैं,उनके साथ किस तरह के व्यापारिक समूह सक्रिय हैं उनकी अनैतिकता,मूल्यहीनता और संवेदनहीनता को देखना हो तो सीधे बाजार जाओ और देखो कि जिस व्यापारी से सामान खरीद रहे हो उसकी नैतिकता,ईमानदारी किस तरह की है ?

मैंने आज तक आरएसएस करने वाले किसी भी व्यापारी को ईमानदारी से व्यापार करते नहीं देखा।हमारे यहाँ व्यापारियों की वैचारिक शरणस्थली धर्म है।वे अपना सारा वैचारिक और सामाजिक कारोबार धर्म की आड़ में करते हैं।यही वजह है हमारे मंत्री,मुख्यमंत्री,प्रधानमंत्री आदि आए दिन इन संतों की चरण-रज लेते दिख जाएंगे,दैनंदिन राजनीतिक समस्याओं से लेकर गंभीर नीतिगत समस्याओं पर इन संतों से सलाह लेते दिख जाएंगे।

हरियाणा विधानसभा में एक जैन संत ने जो कुछ कहा उसमें नया कुछ नहीं है,इस तरह की बातें हमारे संतजन आए दिन बोलते रहते हैं।

परंपराओं को बचाने के नाम पर वे पूरा जोर लगाए हुए हैं,परंपरागत जीवन शैली,परंपरागत परिवार,परंपरागत स्त्री-पुरूष संबंध,परंपरागत शासक,परंपरागत शासन व्यवस्था आदि के प्रति इन संतों में जबर्दस्त आकर्षण है। वे परंपराओं को बचाने के नाम पर संविधान से लेकर आधुनिक न्यायपालिका तक सबकी उपेक्षा करते हैं,कभी कभी उनके खिलाफ जहर भी उगलते हैं।उनके मन में परंपरा का आग्रह इस कदर भरा हुआ है उसने समूचे समाज को परंपरा की बेड़ियों में कसकर बांधा हुआ है।

वे परम्परा बचाकर ऊर्जस्वित होते हैं,उनको आनंद मिलता है,लेकिन परंपराएं तो समाज को,युवाओं को,स्त्रियों और पुरूषों को आए दिन बर्बर ढ़ंग से उत्पीड़ित करती हैं,अपमानित करती हैं,इस समूची प्रक्रिया में नागरिक अधिकारों का आए दिन हनन होता है,संविधान प्रदत्त हकों और संवैधानिक माहौल की क्षति होती है। संत संतई करें हमें परेशानी नहीं होगी,लेकिन वे परंपरा बचाने के नाम पर आतंक पैदा करें,जीवनशैली,खान-पान,पहनावे,रीति-रिवाज आदि में हस्तक्षेप करें,हमें स्वीकार्य नहीं है।

संत वह है जो समाज से परे है।लेकिन इन दिनों संत वे हैं जो समाज के वैचारिक नियंता बने हुए हैं।संतों का वैचारिक नियंता बनना असल में फंडामेंटलिज्म है और यह तालिबान का भारतीय संस्करण है।



हिन्दुस्तान के व्यापारियों की वैचारिक और धार्मिक मनोदशा के बीच में वैचारिक साम्य है।उनके व्यापारिक विवेक को धार्मिक विवेक ही निर्धारित करता रहा है।इस नजरिए से व्यापारियों को देखेंगे तो धर्म की तमाम किस्म की सड़ांध आपको व्यापार में भी साफ नजर आएगी।हमलोग धर्म की आलोचना करते हैं लेकिन धर्म और व्यापारियों के मानसिक सहस्संबंध की अनदेखी करते हैं।

किसी भी हमारे देश में पूंजीपतियों के मूल्यों को निर्मित करने में धर्म ही सबसे बड़ी भूमिका निभाता रहा है। पूंजीवाद में उतनी क्षमता नहीं है कि वह नए सकारात्मक मूल्यों को पैदा कर सके।फलतः पूंजीपति पुराने धार्मिक विचारों से बंधा रहता है।पुरानी धार्मिक विचारधाराओं को आधार बनाकर जीने वाले हिन्दुस्तानी व्यापारियों के यहां पूंजीवाद और धर्म की सड़ांध का व्यापक जमावड़ा सहज ही देख सकते हैं।यही वजह है धर्म की हिमायत में,धर्म की परवरिश पर,पुराने सड़े-गले मूल्यों को बचाने के लिए,पुराने बर्बर सामाजिक संबंधों की हिम्यत में भारत के व्यापारी नियमित पूंजी निवेश करते रहते हैं।

RSS की यह राजनीतिक सफलता है वह अपने हिन्दुत्ववादी एजेण्डे के साथ बौद्ध और जैनधर्म के बडे लोगों को जोड़ने में सफल हो गया है जबकि हिन्दुत्व की विचारधारा का इन दोनों धर्मों के साथ तीन-तेरह का संबंध है।

मांसाहार और मुस्लिम विरोध के आधार पर वह इन दोनों धर्मों को करीब लाने में सफल हो गया है और यह बेहद खतरनाक स्थिति है।

जैन व्यवसायीवर्ग के बहुसंख्यक हिस्से का आरएसएस की ओर आर्थिक मदद का हाथ बढ़ा हुआ है।वे भाजपा और संघ के संगठनों के लिए फंड देने वाले सबसे बड़े सहयोगी हैं।यह वह वर्ग है जो कांग्रेस को भी मदद देता रहा है।इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि जैनधर्म के मुनियों को आरएसएस अपने राजनीतिक हितसाधन में इस्तेमाल करने में क्यों सफल रहा है।

अब मांसाहार के खिलाफ हिन्दुत्ववादी सड़कों पर हैं। हिंसा के मूड में हैं।मांसाहार के विरोधी संत, सम्प्रदाय और सामाजिक समूह हिंसकों की सामाजिक शक्ति बनकर सामने खड़े हैं और राजनीतिज्ञों को बंधक बनाने की कोशिश कर रहे हैं।जैन नया दबाव ग्रुप है। यह चिंता की बात है । सहिष्णुता के पक्षधर घटिया राजनीति में कूद पड़े हैं।

एक राजनेता मंदिर जा सकता है,किसी धर्मगुरू या बाबा से मिलने या आशीर्वाद लेने जा सकता है।उसके प्रवचन सुनने जा सकता है,यह सब कानूनन वैध है।लेकिन एक राजनेता किसी संत या बाबा को संसद या विधानसभा में प्रवचन के लिए नहीं बुला सकता,राजनीति के मंंच से धर्म के नाम

पर बाबा के नाम पर वोट नहीं मांग सकता,अपने भाषणों में धर्म और राजनीति में घालमेल नहीं कर सकता।सत्ता के साथ धर्म का घालमेल नहीं कर सकता है।यह कानूनन अवैध है।दिलचस्प बात यह है अधिकतर राजनीतिक दल इस अवैध काम को अवसरवाद के रूप में करते हैं,कई हैं जो आदतन करते हैं।मसलन् साम्प्रदायिक-आतंकी संगठन आदतन धर्म का इस्तेमाल करते हैं।इधर जैन मुनि का हरियाणा विधानसभा में प्रवचन संवैधानिक मान-मर्याओं और परंपराओं का सीधे उल्लंघन है।सवाल यह है धर्मनिरपेक्षता को क्या इस तरह के अवसरवादी दल और नेता बचा पाएंगे।धर्मनिरपेक्षता उन नेताओं के हाथों क्षतिग्रस्त हो रही है जो धर्म का राजनीति में अवैध इस्तेमाल कर रहे हैं।आम आदमी पार्टी ने जैनमुनि के हरियाणा विधानसभा में दिए गए प्रवचन के पक्ष में राय देकर सबसे घटिया क़िस्म की साम्प्रदायिकता का परिचय दिया है।

भाजपा संतों को राजनीति से जोडकर सभी राजनीतिक दलों की राजनीति को साम्प्रदायिकता के बैनर तले गोलबंद करने की मुहिम पर चल निकली है।

जैनमुनि ने क्या कहा वह तो महत्वपूर्ण है , साथ ही महत्वपूर्ण है राजनीति और धर्म के बीच स्थापित किया जा रहा सहसंबंध।

यह बुर्जुआ राजनीति और बुर्जुआ संतई का खुला गठजोड़ है इसका बुनियादी लक्ष्य है राजनीति का अपराधीकरण करना, राजनीति में साम्प्रदायिकता को वैधता प्रदान करना।

सवाल उठा है कि जैनधर्म के नाम पर क्या सब कुछ माफ है ॽ संविधान और नागरिक समाज को जैन धर्माघिकारियों से सीधे सवाल करना चाहिए और मांग करनी चाहिए कि जैनधर्म अपने को राजनीति से दूर रखें।





गुरुवार, 25 अगस्त 2016

कार्ल मार्क्स पखवाडा- धर्म धर्मनिरपेक्षता लोकतंत्र


           बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर का प्रसिद्ध निबंध है ´बुद्ध और कार्ल मार्क्स´,इसमें आम्बेडकर ने बुद्ध के विचारों के बहाने धर्म की 25 सूत्रों में व्याख्या पेश की है। ये सूत्र अब तक विचार विमर्श के केन्द्र में नहीं आए हैं,इन सूत्रों पर वाद-विवाद-संवाद होना चाहिए।

ये 25 सूत्र हैं-´´1. मुक्त समाज के लिए धर्म आवश्यक है।2. प्रत्येक धर्म अंगीकार करने योग्य नहीं होता।3. धर्म का संबंध जीवन के तथ्यों व वास्तविकताओं से होना चाहिए, ईश्वर या परमात्मा या स्वर्ग या पृथ्वी के संबंध में सिद्धांतों तथा अनुमान मात्र निराधार कल्पना से नहीं होना चाहिए।4. ईश्वर को धर्म का केंद्र बनाना अनुचित है।5. आत्मा की मुक्ति या मोक्ष को धर्म का केंद्र बनाना अनुचित है।6. पशुबलि को धर्म का केंद्र बनाना अनुचित है।7. वास्तविक धर्म का वास मनुष्य के हृदय में होता है, शास्त्रों में नहीं।8. धर्म के केंद्र मनुष्य तथा नैतिकता होने चाहिए। यदि नहीं, तो धर्म एक क्रूर अंधविश्वास है।9. नैतिकता के लिए जीवन का आदर्श होना ही पर्याप्त नहीं है। चूंकि ईश्वर नहीं है, अतः इसे जीवन का नियम या कानून होना चाहिए।10. धर्म का कार्य विश्व का पुनर्निर्माण करना तथा उसे प्रसन्न रखना है, उसकी उत्पत्ति या उसके अंत की व्याख्या करना नहीं।11. कि संसार में दुःख स्वार्थों के टकराव के कारण होता है और इसके समाधान का एकमात्र तरीका अष्टांग मार्ग का अनुसरण करना है।12. कि संपत्ति के निजी स्वामित्व से अधिकार व शक्ति एक वर्ग के हाथ में आ जाती है और दूसरे वर्ग को दुःख मिलता है।13. कि समाज के हित के लिए यह आवश्यक है कि इस दुःख का निदान इसके कारण का निरोध करके किया जाए।14. सभी मानव प्राणी समान हैं।15. मनुष्य का मापदंड उसका गुण होता है, जन्म नहीं।16. जो चीज महत्त्वपूर्ण है, वह है उच्च आदर्श, न कि उच्च कुल में जन्म।17. सबके प्रति मैत्री का साहचर्य व भाईचारे का कभी भी परित्याग नहीं करना चाहिए।18. प्रत्येक व्यक्ति को विद्या प्राप्त करने का अधिकार है। मनुष्य को जीवित रहने के लिए ज्ञान विद्या की उतनी ही आवश्यकता है, जितनी भोजन की।19. अच्छा आचारणविहीन ज्ञान खतरनाक होता है।20. कोई भी चीज भ्रमातीत व अचूक नहीं होती। कोई भी चीज सर्वदा बाध्यकारी नहीं होती। प्रत्येक वस्तु छानबीन तथा परीक्षा के अध्यधीन होती है।21. कोई वस्तु सुनिश्चित तथा अंतिम नहीं होती।22. प्रत्येक वस्तु कारण-कार्य संबंध के नियम के अधीन होती है।23. कोई भी वस्तु स्थाई या सनातन नहीं है। प्रत्येक वस्तु परिवर्तनशील होती है। सदैव वस्तुओं में होने का क्रम चलता रहता है।24. युद्ध यदि सत्य तथा न्याय के लिए न हो, तो वह अनुचित है।25. पराजित के प्रति विजेता के कर्तव्य होते हैं।´´

यानी हर धर्म स्वीकार करने योग्य नहीं होता।धर्म को चुनते समय क्या देखें यह आम्बेडकर ने उपरोक्त 25 सूत्रों में रेखांकित किया है।धर्म कोई बनी-बनायी व्यवस्था नहीं है,बल्कि उसे हर बार नए सिरे से अर्जित करना पड़ता है।धर्म को अर्जित करने के लिए धार्मिक होने की जरूरत नहीं है,बल्कि धर्म को देखने का वैज्ञानिक नजरिया अर्जित करने की जरूरत है। आम्बेडकर ने धर्म के जिन 25सूत्रों का जिक्र किया है उनमें धर्म को शाश्वत न मानने वाली बात बेहद रोचक है।धर्म के जितने भी रूप प्रचलन में हैं वे धर्म को शाश्वत मानकर चलते हैं।जबकि धर्म शाश्वत नहीं बल्कि परिवर्तनशील है।धर्म को परिवर्तनशील मानना अपने आपमें भौतिक जगत की सत्ता को महत्व देना है। धर्म का प्रमुख काम है मनुष्य को प्रसन्न रखना और स्वतंत्र रखना।जो धर्म यह काम करे वह स्वीकार्य है जो यह काम न करे वह अस्वीकार्य है। इन दिनों धर्म के नाम पर प्रतिस्पर्धा और घृणा का जमकर प्रचार हो रहा है।आम्बेडकर ने धर्म की इस भूमिका का निषेध किया है और रेखांकित किया है धर्म का मुख्य कार्य है मैत्री स्थापित करना।

धर्म पूजा या उपासना की चीज नहीं है बल्कि आचरण की चीज है।जो लोग धर्म को पूजा-उपासना की चीज मानते हैं उनके जीवन में धर्म की कोई भूमिका नहीं होती,वे धर्म को प्रचार प्रतीक के रूप में इस्तेमाल करते हैं।धर्म , प्रचार की नहीं ,आचरण की चीज है।धर्म आचरण में मिलता है।आचरण में ढालने का अर्थ है कि धर्म का कायाकल्प करना।



यह सवाल भी उठा है धर्म के केन्द्र में कौन है ॽ इन दिनों धर्म के केन्द्र में उपदेश हैं,राजनीति है,हिंसा है,अंधविश्वास हैं, मुनाफेखोरी है,संपत्ति संचय करने की प्रवृत्ति है,इन सभी चीजों का धर्म से कोई संबंध नहीं है। धर्म के केन्द्र में मनुष्य को रहना चाहिए।मनुष्य को केन्द्र में रखे बिना धर्म बेहद खतरनाक भूमिका अदा करता है।धर्म के बर्बर होने के चांस बढ़ जाते हैं।धर्मनिरपेक्षता की भी यही मांग है कि धर्म के केन्द्र में मनुष्य को रखा जाय।धर्म को मानवीय रूप दिया जाय। धर्म का ईश्वर या उपासना से कोई संबंध नहीं है।धर्म का मूलाधार तो मनुष्य है,लेकिन अधिकांश लोग धर्म का आधार ईश्वर को मानते हैं।ईश्वर दासता की मनोदशा में बांधता है, जबकि मनुष्य दासता की मनोदशा से मुक्त करता है।धर्म को मानो लेकिन मनुष्य को उसके केन्द्र में प्रतिष्ठित करो।ईश्वर को केन्द्र से अपदस्थ करो।धर्म के केन्द्र में ईश्वर का होना बंधन है।मानसिक गुलामी है।जबकि मनुष्य को धर्म के केन्द्र में रखेंगे तो धर्म की भूमिका और चरित्र बदल जाएगा,धर्म मुक्ति और स्वतंत्रता का रूप ग्रहण कर लेगा।

शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

कार्ल मार्क्स पखवाडा- धर्म और मार्क्स –


     आधुनिककाल में धर्म का उपभोक्तावाद और पूंजीप्रेम सबसे बड़ा ईंधन है। इन दोनों के बिना धर्म जी नहीं सकता। धर्म वैचारिक और भौतिक दोनों ही स्तरों पर उपभोक्तावाद और पूंजी की मदद करता है यही वजह है धर्म की जड़ें उन वर्गों में ज्यादा गहरी हैं जहां उपभोक्तावाद और पूंजीप्रेम खूब फल-फूल रहा है।जिस तरह धर्म जनता के लिए ´आत्मिक शराब है´ठीक उसी तरह उपभोक्तावाद और पूंजीप्रेम लत है। दोनों में मातहत बनाने की प्रवृत्ति है।
      धर्म कोई विचार मात्र नहीं है,उसकी सामाजिक जड़ें हैं,धर्म की समाजिक जड़ों को सामाजिक संघर्षों में जनता की शिरकत बढ़ाकर ही काट सकते हैं।धर्म के खिलाफ संघर्ष यदि मात्र वैचारिक होगा तो वह भाववादी संघर्ष होगा,धर्म भाववाद नहीं है,वह तो भौतिक शक्ति है।उसे अमूर्त्त विचारधारात्मक उपदेशों के जरिए नष्ट नहीं किया जा सकता। एक मार्क्सवादी को यह पता होना चाहिए कि धर्म का मुकाबला कैसे करें ॽ इस मामले में उनको बुर्जुआ भौतिकवादियों से अलगाना चाहिए।बुर्जुआ भौतिकवादियों के लिए ´धर्म का नाश हो´,´अनीश्वरवाद चिरंजीवी हो´´नास्तिकता अमर रहे´ का नारा प्रमुख है,वे आमतौर पर अनीश्वरवाद का ही जमकर प्रचार करते हैं,इस तरह के नजरिए की लेनिन ने  तीखी आलोचना की है और उसे ´छिछला दृष्टिकोण´ कहा है।
    लेनिन के शब्दों में यह बुर्जुआ जागृति का ´संकीर्ण नजरिया है। इससे धर्म की जड़ों के बारे में पूरी जानकारी नहीं मिलती।इस तरह की धर्म की व्याख्याएं भाववादी हैं,इनका भौतिकवाद से कोई लेना-देना नहीं है।लेनिन ने धर्म के बारे में लिखा है ´आधुनिक पूंजीवादी देशों में इसकी जड़ें मुख्यतःसामाजिक हैं। पूंजी की अंधी ताकत का भय-अंधी इसलिए क्योंकि व्यापक जनसमुदाय इसका पूर्वानुमान नहीं कर सकता-एक ऐसी शक्ति जो सर्वहारा और छोटे मालिकों के जीवन के हर चरण में प्रहार का खतरा पैदा करती तथा ´औचक´,´अनपेक्षित´,´आकस्मिक´,तबाही ,बर्बादी,गरीबी,वेश्यावृत्ति,भुखमरी का हमला करती है.आधुनिक धर्म की जड़ यहां है।इसे भौतिकवादियों को सर्वप्रथम अपने दिमाग में रखना चाहिए.

     जनता के दिमाग से धर्म को मिटाने के लिए जरूरी है उसे जनसंघर्षों के लिए तैयार किया जाए,जनता खुद धर्म की जड़ें खोदना सीखे,संगठित हो,सचेत रूप में पूंजी के शासन के तमाम रूपों से लड़ना सीखे।जबतक वह ऐसा नहीं करती तबतक जनता के मन से धर्म को मिटाना संभव नहीं है।

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

धर्म एक आदत है



धर्म पहले जीवनशैली का अंग था लेकिन मनुष्य के विकास के क्रम में जीवनशैली बदली धर्म की भूमिका बदली,धर्म को जीवनशैली से अलग किया गया,वह विचार बना,दर्शन बना,विचारधारा बना,लेकिन जीवनशैली से धर्म का निकल जाना सबसे बड़ी मानवीय सफलता थी।आज भी धर्म हमारी जीवनशैली के अधिकांश से बाहर धकेला जा चुका है और यह काम मनुष्य ने स्वेच्छा से किया है,अनुभवों के आधार पर किया है।पूंजीवाद के आने के साथ धर्म की समस्त मान्यताओं,पवित्रताओं के रूपों को नष्ट कर दिया है,धर्म को धंधे और मुनाफे में बदल दिया है।अब धर्म तो है लेकिन उसमें पुराने धर्म जैसी कोई चीज नहीं बची है।अब धर्म भी उद्योग है।

मनुष्य का जीवन जितना अनुभव समृद्ध होता जाता है वह धर्म को त्यागता चला जाता है।धर्म इसी क्रम में ईश्वर बना,मूर्ति बना,अंधविश्वास बना,विचारधारा बना और अंत में डिजिटल बना।

डिजिटल युग में धर्म है लेकिन आभासी रूप में।मसलन्,मैं कहने को हिन्दू हूं लेकिन हिन्दुओं के किसी धार्मिक संस्कार का नियमतःपालन नहीं करता,मैं चोटी नहीं रखता,जनेऊ नहीं पहनता ,उसे उतार चुका हूँ,मंदिर में जाता हूँ मूर्तियों को प्रणाम करता हूं,भेंट भी चढ़ाता हूं ,लेकिन ईश्वर की सत्ता को नहीं मानता।मेरे अधिकांश मित्र हिन्दू हैं और भी वे भी यही करते हैं।लोग सवाल कर सकते हैं कि मैं भगवान को नहीं मानता तो मंदिरों में जाता क्यों हूँ,मैंं मंदिर में इसलिए जाता हूँ कि यह सब हमारी पुरानी सभ्यता के अवशेष हैं।धर्म पहले आदत था,आज भी जिनकी आदतें नहीं बदली हैं उनके जीवन में धर्म बचा है,जिनकी आदतें बदल गयी है,धर्म उनके जीवन से निकल गया है।

पर्यटन और धर्म में अंतर करो.गंगा में डुबकीपर्यटन है,मंदिर दर्शन घूमना है, धर्म नहीं है,इसी तरह कथा सुनना टाइम पास है,धर्म नहीं।भारत की अधिकांश मेहनतकश जनता ईश्वर और उसके तंत्र पर विश्वास नहीं करती, संस्कार नहीं मानती,ईश्वर उनके लिए मनोरंजन है।

कौन बच्चा है जिसने अनेक बार भगवान की मूर्ति न तोड़ी हो! बच्चों से बड़ा ईश्वरद्रोही कोई नहीं है,बच्चे तमाम पंडितों और उनके शास्त्र से ज्यादा ताकत रखते हैं। समाज में खेल संस्कृति जितनी मजबूत होगी,ईश्वर उतना ही कमजोर होगा। ईश्वर को हमने जिस क्षण मूर्ति बनाया उसी क्षण उसे खिलौना बना दिया। ईश्वर का खिलौना बनना उसके लोप का आरंभ है।यह काम किसी और ने नहीं बच्चों ने किया,बच्चों ने खेल ही खेल में ईश्वर की जीवन से विदाई की घोषणा कर दी,इस नजरिए से देखें तो बच्चों ने ईश्वर को समाज से सर्जनात्मकता के जरिए विदा किया।आप सर्जक बनते जाइए ईश्वर स्वतः ही चला गया है आपके अंदर से।




नास्तिकता की रचना प्रक्रिया



मनुष्य जब यह महसूस करने लगे या मानने लगे कि वह आत्मनिर्भर है।वह अपने तन-मन-धन का जब मालिक है तो ईश्वर की गिरफ्त से निकल जाता है। यानी जब वह स्वयं को नियंता मानने लगता है तो नास्तिक हो जाता है। अन्य पर निर्भरता का अभाव,अन्य के ऊपर आश्रित न होना,अन्य की कृपा पर आश्रित न होना वस्तुतःनास्तिक हो जाना है। मनुष्य के अस्तित्व का सर्जक और नियंता मनुष्य को मानना वस्तुतः नास्तिक हो जाना है।इस प्रक्रिया में ईश्वर के संदर्भ की कोई जरूरत ही नहीं पड़ती।

नास्तिकता का आमतौर पर एक ही अर्थ जानते हैं। ईश्वर के अस्तित्व का निषेध। लेकिन नास्तिकता का असल अर्थ है स्वयं को जानना।आत्मबोध को प्राप्त करना।मैं कोई रत्न या पत्थर धारण नहीं करता,सोने की अंगूठी भी नहीं है।सारी अंगुलियां बिना रत्नों के हैं। इसके बाबजूद अनेक सुख-दुख आए और गए। कभी पत्थर या रत्न की जरूरत नहीं पड़ी। रत्नधारण करना एक कु-संस्कार है।
उल्लेखनीय है ईश्वर के प्रति अविश्वास का भाव क्रांतिकारी दल में भी नहीं था। काकोरी के प्रसिद्ध सभी चार शहीदों ने अपने अंतिम दिन भजन प्रार्थना में गुजारे थे। रामप्रसाद बिस्मिल एक रूढ़िवादी आर्यसमाजी थे। समाजवाद तथा साम्यवाद में अपने बृहद अध्ययन के बावजूद, राजेंद्र लाहिड़ी उपनिषद् एवं गीता के श्लोकों के उच्चारण की अपनी अभिलाषा को दबा न सके। मैंने उन सबमें सिर्फ एक ही व्य क्ति को देखा जो कभी प्रार्थना नहीं करता था और कहता था, "दर्शनशास्त्र मनुष्य् की दुर्बलता अथवा ज्ञान के सीमित होने के कारण उत्पन्न होता है।" वह भी आजीवन निर्वासन की सजा भोग रहा है। परंतु उसने भी ईश्वर के अस्तित्व को नकारने की कभी हिम्मत नहीं की ।

चार्वाक मानते हैं- "यदि संसार में कोई स्वर्ग आदि के रूप में अलौकिक सुख मान्य नहीं है तो विद्वान लोग पर्याप्त धन एवं प्रयास से साध्य, यज्ञादि कर्मों के अनुष्ठान में सोत्साह प्रवृत्त क्यों होते हैं? लोग अत्यन्त श्रद्धा एवं उत्साह से इन भव्य आयोजनों में तत्पर देखे जाते हैं। फलत: अलौकिक सुख स्वर्ग आदि के रूप में अवश्य मानना चाहिए यह तर्क युक्त नहीं है। इन वैदिक अनुष्ठानों को; झूठा, परस्पर विरोधी एवं पुनरुक्ति दोष से दूषित होने के कारण प्रामाणिक किसी भी प्रकार से नहीं माना जा सकता है। अपने को वैदिक मानने वाले धूर्त्त आपस में ही एक दूसरे को खण्डन करते देखे जा सकते हैं। कर्म काण्ड को प्रमाण मानने वाले विद्वान ज्ञान काण्ड की, तथा ज्ञान काण्ड को प्रमाण स्वीकार करने वाले वैदिक विद्वान कर्मकाण्ड की परस्पर निन्दा करते देखे जाते हैं। इस प्रकार इन वैदिकों के व्यवहार से ही इन दोनों वैदिक मतों की नि:सारता स्वत: सिद्ध हो जाती है।"
चार्वाक यह भी मानते हैं- "संसार में कभी भी यह नहीं देखा गया है कि खेतों में किसान धान के बीज इसलिए नहीं बोता है कि धान को हरिण भविष्य में खाकर नष्ट कर देंगे। देश में भिक्षुक हैं इसलिए भोजन निर्माण के लिए कोई बटलोई चूल्हे पर न रखता हो ऐसा भी कभी नहीं देखा जाता है। इसी प्रकार यदि कोई दु:ख से अत्यन्त डरने वाला व्यक्ति सुख को छोड़ देता है तो वह पशु से भी बड़ा मूर्ख ही माना जायेगा। वास्तव में यह मूर्खता से भरा ही विचार होगा कि सुख दु:ख के साथ उत्पन्न होता है अत: सुख का सर्वथा परित्याग कर देना श्रेयस्कर है। क्या अपना हित चाहने वाला कोई मनुष्य कभी भी सफ़ेद एवं अच्छे धान के दानों को केवल इसलिए छोड़ता है कि वह धान भूसी एवं अनपेक्षित धूल से युक्त है। कभी नहीं। परिणामस्वरूप सुख पुरुषार्थ है यह सिद्ध होता है।"

महात्मा बुद्ध का मानना है मनुष्य जिन दु:खों से पीड़ित है, उनमें बहुत बड़ा हिस्सा ऐसे दु:खों का है, जिन्हें मनुष्य ने अपने अज्ञान, ग़लत ज्ञान या मिथ्या दृष्टियों से पैदा कर लिया हैं उन दु:खों का समापन अपने सही ज्ञान द्वारा ही सम्भव है, किसी के आशीर्वाद या वरदान से उन्हें दूर नहीं किया जा सकता। सत्य या यथार्थता का ज्ञान ही सम्यक ज्ञान है।

बुद्ध यह भी मानते थे कि सत्य की खोज दु:खमोक्ष के लिए परमावश्यक है। खोज अज्ञात सत्य की ही की जा सकती है। यदि सत्य किसी शास्त्र, आगम या उपदेशक द्वारा ज्ञात हो गया है तो उसकी खोज नहीं। अत: बुद्ध ने अपने पूर्ववर्ती लोगों द्वारा या परम्परा द्वारा बताए सत्य को नकार दिया और अपने लिए नए सिरे से उसकी खोज की।

बुद्ध स्वयं कहीं प्रतिबद्ध नहीं हुए और न तो अपने शिष्यों को उन्होंने कहीं बांधा। उन्होंने कहा कि मेरी बात को भी इसलिए चुपचाप न मान लो कि उसे बुद्ध ने कहा है। उस पर भी सन्देह करो और विविध परीक्षाओं द्वारा उसकी परीक्षा करो। जीवन की कसौटी पर उन्हें परखो, अपने अनुभवों से मिलान करो, यदि तुम्हें सही जान पड़े तो स्वीकार करो, अन्यथा छोड़ दो।

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मंगलवार, 10 मई 2016

भारत का मर्म और पंडित नेहरू


      भारत की आत्मा को समझने में पंडित जवाहरलाल नेहरू से बढ़कर और कोई बुद्धिजीवी हमारी मदद नहीं कर सकता।पंडितजी की भारत को लेकर जो समझ रही है ,वह काबिलेगौर है।वे भारतीय समाज,धर्म, संस्कृति,
इतिहास आदि को जिस नजरिए से व्यापक फलक पर रखकर देखते हैं वह विरल चीज है।

       पंडित नेहरू ने लिखा है ''जो आदर्श और मकसद कल थे,वही आज भी हैं,लेकिन उन पर से मानो एक आब जाता रहा है और उनकी तरफ बढ़ते दिखाई देते हुए भी ऐसा जान पड़ता है कि वे अपनी चमकीली सुंदरता खो बैठे हैं,जिससे दिल में गरमी और जिस्म में ताकत पैदा होती थी।बदी की बहुत अकसर हमेशा जीत होती रही है लेकिन इससे भी अफसोस की बात यह है कि जो चीजें पहले इतनी ठीक जान पड़ती थीं,उनमें एक भद्दापन और कुरूपता आ गई है। '' चीजें क्रमशःभद्दी और कुरूप हुई हैं,सवाल यह है कि यह भद्दापन और कुरूपता आई कहां से ॽक्या इससे बचा जा सकता था ॽयदि हां तो उन पहलुओं की ओर पंडितजी ने जब ध्यान खींचा तो सारा देश उस देश में सक्रिय क्यों नहीं हुआ ॽ

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है" हिंदुस्तान में जिंदगी सस्ती है। इसके साथ ही यहां जिंदगी खोखली है,भद्दी है,उसमें पैबंद लगे हुए हैं और गरीबी का दर्दनाक खोल उसके चारों तरफ है।हिंदुस्तान का वातावरण बहुत कमजोर बनानेवाला हो गया है।उसकी वजहें कुछ बाहर से लादी हुई हैं,और कुछ अंदरूनी हैं,लेकिन वे सब बुनियादी तौर पर गरीबी का नतीजा हैं। हमारे यहां के रहन-सहन का दर्जा बहुत नीचा है और हमारे यहां मौत की रफ्तार बहुत तेज है।" पंडितजी और उनकी परंपरा ´मौत की रफ्तार´ को रोकने में सफल क्यों नहीं हो पायी ॽ पंडित जानते थे कि भारत में जहां गरीबी सबसे बड़ी चुनौती है वहीं दूसरी ओर धर्म और धार्मिकचेतना सबसे बड़ी चुनौती है।

पंडित नेहरू ने लिखा है- "अगर यह माना जाये कि ईश्वर है,तो भी यह वांछनीय हो सकता है कि न तो उसकी तरफ ध्यान दिया जाये और न उस पर निर्भर रहा जाये। दैवी शक्तियों में जरूरत से ज्यादा भरोसा करने से अकसर यह हुआ भी है और अब भी हो सकता है कि आदमी का आत्म-विश्वास घट जाए और उसकी सृजनात्मक योग्यता और सामर्थ्य कुचल जाये।"

धर्म के प्रसंग में नेहरूजी ने लिखा- "धर्म का ढ़ंग बिलकुल दूसरा है।प्रत्यक्ष छान-बीन की पहुंच के परे जो प्रदेश है,धर्म का मुख्यतःउसीसे संबंध है और वह भावना और अंतर्दृष्टि का सहारा लेता है। संगठित धर्म धर्म-शास्त्रों से मिलकर ज्यादातर निहित स्वार्थों से संबंधित रहता है और उसे प्रेरक भावना का ध्यान नहीं होता।वह एक ऐसे स्वभाव को बढ़ावा देता है,जो विज्ञान के स्वभाव से उलटा है। उससे संकीर्णता,गैर-रवादारी, भावुकता,अंधविश्वास,सहज-विश्वास और तर्क-हीनता का जन्म होता है। उसमें आदमी के दिमाग को बंद कर देने का सीमित कर देने का,रूझान है।वह ऐसा स्वभाव बनाता है,जो गुलाम आदमी का,दूसरों का सहारा टटोलनेवाले आदमी का, होता है।" आम आदमी के दिमाग को खोलने के लिए कौन सी चीज करने की जरूरत है ॽक्या तकनीकी वस्तुओं की बाढ़ पैदा करके आदमी के दिमाग को खोल सकते हैं या फिर समस्या की जड़ कहीं और है ॽ

पंडित नेहरू का मानना है - "हिन्दुस्तान को बहुत हद तक बीते हुए जमाने से नाता तोड़ना होगा और वर्तमान पर उसका जो आधिपत्य है,उसे रोकना होगा। इस गुजरे जमाने के बेजान बोझ से हमारी जिंदगी दबी हुई है। जो मुर्दा है और जिसने अपना काम पूरा कर लिया है,उसे जाना होता है।लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि गुजरे जमाने की उन चीजों से हम नाता तोड़ दें या उनको भूल जाएं ,जो जिंदगी देनेवाली हैं और जिनकी अहमियत है।" यह भी लिखा, "पिछली बातों के लिए अंधी भक्ति बुरी होती है।साथ ही उनके लिए नफ़रत भी उतनी ही बुरी होती है।उसकी वजह है कि इन दोनों में से किसी पर भविष्य की बुनियाद नहीं रखी जा सकती।"

"गुजरे हुए जमाने का -उसकी अच्छाई और बुराई दोनों का ही-बोझ एक दबा देने वाला और कभी-कभी दम घुटाने वाला बोझ है,खासकर हम लोगों में से उनके लिए ,जो ऐसी पुरानी सभ्यता में पले हैं,जैसी चीन या हिन्दुस्तान की है। जैसाकि नीत्शे ने कहा है- " न केवल सदियों का ज्ञान,बल्कि ,सदियों का पागलपन भी हममें फूट निकलता है।वारिस होना खतरनाक है।"इसमें सबसे महत्वपूर्ण है ´वारिस´वाला पहलू।इस पर हम सब सोचें।हमें वारिस बनने की मनोदशा से बाहर निकलना होगा।

पंडित नेहरू ने लिखा है- "मार्क्स और लेनिन की रचनाओं के अध्ययन का मुझ पर गहरा असर पड़ा और इसने इतिहास और मौजूदा जमाने के मामलों को नई रोशनी में देखने में मदद पहुँचाई। इतिहास और समाज के विकास के लंबे सिलसिले में एक मतलब और आपस का रिश्ता जान पड़ा और भविष्य का धुंधलापन कुछ कम हो गया।" भविष्य का धुंधलापन कम तब होता है जब भविष्य में दिलचस्पी हो,सामाजिक मर्म को पकड़ने, समझने और बदलने की आकांक्षा हो।इसी प्रसंग में पंडित नेहरू ने कहा "असल में मेरी दिलचस्पी इस दुनिया में और इस जिंदगी में है,किसी दूसरी दुनिया या आनेवाली जिंदगी में नहीं।आत्मा जैसी कोई चीज है भी या नहीं मैं नहीं जानता.और अगरचे ये सवाल महत्व के हैं,फिर भी इनकी मुझे कुछ भी चिंता नहीं।"पंडितजी जानते थे भारत में धर्म सबसे बड़ी वैचारिक चुनौती है।सवाल यह है धर्म को कैसे देखें ॽ



पंडितजी का मानना है " 'धर्म' शब्द का व्यापक अर्थ लेते हुए हम देखेंगे कि इसका संबंध मनुष्य के अनुभव के उन प्रदेशों से है,जिनकी ठीक-ठीक मांग नहीं हुई है,यानी जो विज्ञान की निश्चित जानकारी की हद में नहीं आए हैं।" फलश्रुति यह कि जीवन के सभी क्षेत्रों में विज्ञान को पहुँचाएं,विज्ञान को पहुँचाए वगैर धर्म की विदाई संभव नहीं है।









धर्म और कार्ल मार्क्स


                अनेक लोग हैं जो कार्ल मार्क्स के धर्म संबंधी विचारों को विकृत रूप में व्याख्यायित करते हैं। वे मार्क्स की धर्म संबंधी मान्यताओं को गलत देखते हैं फिर सभी मार्क्सवादियों पर हमला आंरंभ कर देते हैं। सवाल यह है क्या मार्क्स की धर्म संबंधी मान्यताओं से धर्म की कोई सही समझ बनती है ?क्या दुनिया में मार्क्सवादी धर्म के बारे में एक ही तरह सोचते हैं ॽ
कार्ल मार्क्स ने अपनी धर्म संबंधी मान्यताओं का विकास हेगेल की न्याय संबंधी मान्यताओं के मूल्यांकन के क्रम में किया था। मार्क्स ने लिखा ,´धार्मिक व्यथा, एक साथ वास्तविक व्यथा की अभिव्यक्ति तथा वास्तविक व्यथा का प्रतिवाद दोनों है। धर्म उत्पीड़ित प्राणी की आह है, एक हृदयहीन संसार का हृदय है, ठीक उसी तरह जैसे वह भावविहीन परिस्थितियों की भावना है। वह जनता के लिए अफीम है। जनता के प्रातिभासिक सुख के रूप में धर्म के उन्मूलन का अर्थ है उसके वास्तविक सुख की माँग करना।मौजूदा हालात के संबंध में भ्रमों का परित्याग करने की माँग उन हालात के परित्याग की माँग करती है जिनके लिए भ्रम जरूरी बन जाते हैं। अतः ,धर्म की आलोचना भ्रूण रूप में आँसुओं की घाटी, धर्म जिसका प्रभामंडल है, की आलोचना है।´ यानी धर्म के अंत की शर्त है वास्तविक सुखों की सृष्टि,जब तक वास्तविक सुख पैदा नहीं कर पाते तब तक धर्म रहेगा,आम लोगों के दुख रहेंगे और आंसू भी रहेंगे।मार्क्स ने धर्म को ´उत्पीड़ित प्राणी की आह’ के रूप में देखा। धर्म के अंत का अर्थ है मनुष्य के दुखों का अंत। इस अर्थ में धर्म और दुख का गहरा संबंध है।

मार्क्स ने धर्म के बारे में लिखा है, "अधार्मिक आलोचना का आधार हैः मनुष्य धर्म की रचना करता है, धर्म मनुष्य की रचना नहीं करता है।धर्म मनुष्य की स्व-चेतनता और स्व-प्रतिष्ठा है,ऐसे मनुष्य की जो अभी तक अपने आपको जान नहीं पाया है, या फिर फिर से भटक गया है।लेकिन मनुष्य जिसने इस संसार से बाहर पड़ाव डाल रखा हो,कोई अमूर्त प्राणी नहीं है। मनुष्य तो मनुष्य का संसार,राज्य और समाज है।"

मार्क्स ने धर्म के बारे में लिखा- ´धर्म, संसार का सामान्य सिद्धान्त है,वह इसका सर्वज्ञान गुटका है,इसकी लोकप्रचलित तर्कपद्धति है,इसका आध्यात्मिक कीर्ति शिखर है,इसकी उमंग है,इसकी नैतिक स्वीकृति है,इसका भव्य अभिनंदन है,यह संतोष और औचित्य स्थापना का सार्वभौमिक स्रोत है।यह मानवीय सारतत्व की विलक्षण अनुभूति है, यद्यपि इसके मानवीय सारतत्व में सच्ची वास्तविकता निहित नहीं है। अतः धर्म के विरूद्ध संघर्ष का मतलब है, उस संसार के विरूद्ध किया जाने वाला परोक्ष संघर्ष,धर्म जिसकी आध्यात्मिक सुरभि है।´ यानी धर्म को समग्रता में देखना चाहिए,उसे अंशों में नहीं देखना चाहिए, इसलिए मार्क्स ने धर्म को ´सर्वज्ञान गुटका ´कहा है।धर्म मात्र पूजा या ईश्वर नहीं है,बल्कि उसका एक तर्कशास्त्र है,संस्कार हैं,´यह मानवीय सारतत्व की विलक्षण अनुभूति है´, धर्म के खिलाफ लड़ने का अर्थ है उसके द्वारा रचे संसार के खिलाफ संघर्ष करना।अनेक धर्म विरोधी लोग अपनी संतई चमकाने के लिए धर्म के अंश विशेष की आलोचना करते हैं,लेकिन धर्मरचित समग्र संसार की आलोचना से कन्नी काटते हैं।इस प्रसंग में प्रेमचन्द उल्लेखनीय हैं,उन्होंने लिखा है,´ इस अनीति भरे संसार में धर्म-अधर्म का विचार गलत है, आत्मघात है और जुआ खेल कर या दूसरों के लोभ और आसक्ति से फायदा उठा कर संपत्ति खड़ी करना उतना ही बुरा या अच्छा है जितना कानूनी दाँव-पेंच से।´ भारत के देवभक्तों को प्रेमचंद के इस कथन पर गौर करना चाहिए। पढ़ें, ´देवता हमेशा रहेंगे और हमेशा रहे हैं। उन्हें अब भी संसार धर्म और नीति पर चलता हुआ नजर आता है। वे अपने जीवन की आहुति दे कर संसार से विदा हो जाते हैं। लेकिन उन्हें देवता क्यों कहो? कायर कहो, स्वार्थी कहो, आत्मसेवी कहो। देवता वह है जो न्याय की रक्षा करे और उसके लिए प्राण दे दे। अगर वह जान कर अनजान बनता है तो धर्म से फिरता है, अगर उसकी आँखों में यह कुव्यवस्था खटकती ही नहीं तो वह अंधा भी है और मूर्ख भी, देवता किसी तरह नहीं। और यहाँ देवता बनने की जरूरत भी नहीं। देवताओं ने ही भाग्य और ईश्वर और भक्ति की मिथ्याएँ फैला कर इस अनीति को अमर बनाया है। मनुष्य ने अब तक इसका अंत कर दिया होता या समाज का ही अंत कर दिया होता जो इस दशा में जिंदा रहने से कहीं अच्छा होता। नहीं, मनुष्यों में मनुष्य बनना पड़ेगा। दरिंदों के बीच में उनसे लड़ने के लिए हथियार बाँधना पड़ेगा। उनके पंजों का शिकार बनना देवतापन नहीं, जड़ता है। आज जो इतने ताल्लुकेदार और राजे हैं वह अपने पूर्वजों की लूट का ही आनंद तो उठा रहे हैं। और क्या उन्होंने वह जायदाद बेच कर पागलपन नहीं किया? पितरों को पिंडा देने के लिए गया जा कर पिंडा देना और यहाँ आ कर हजारों रुपए खर्च करना क्या जरूरी था? और रातों को मित्रों के साथ मुजरे सुनना, और नाटक-मंडली खोल कर हजारों रुपए उसमें डुबाना अनिवार्य था? वह अवश्य पागलपन था। उन्हें क्यों अपने बाल-बच्चों की चिंता नहीं हुई? अगर उन्हें मुफ्त की संपत्ति मिली और उन्होंने उड़ाया तो उनके लड़के क्यों न मुफ्त की संपत्ति भोगें? अगर वह जवानी की उमंगों को नहीं रोक सके तो उनके लड़के क्यों तपस्या करें?"

न्याय-अन्याय के सवाल आज भी प्रासंगिक हैं इस पर प्रेमचंद ने लिखा, ´कहाँ है न्याय? कहाँ है? एक गरीब आदमी किसी खेत से बालें नोच कर खा लेता है, कानून उसे सजा देता है। दूसरा अमीर आदमी दिन-दहाड़े दूसरों को लूटता है और उसे पदवी मिलती है, सम्मान मिलता है। कुछ आदमी तरह-तरह के हथियार बाँध कर आते हैं और निरीह, दुर्बल मजदूरों पर आतंक जमा कर अपना गुलाम बना लेते हैं। लगान और टैक्स और महसूल और कितने ही नामों से उसे लूटना शुरू करते हैं, और आप लंबा-लंबा वेतन उड़ाते हैं, शिकार खेलते हैं, नाचते हैं, रंग-रेलियाँ मनाते हैं। यही है ईश्वर का रचा हुआ संसार? यही न्याय है?"

कथाकार प्रेमचंद ने कुछ सवाल उठाए हैं हम उन भी विचार करें,´संसार की कुव्यवस्था क्यों हैं? कर्म और संस्कार का आश्रय ले कर वह कहीं न पहुँच पाते थे। सर्वात्मवाद से भी उनकी गुत्थी न सुलझती थी। अगर सारा विश्व एकात्म है तो फिर यह भेद क्यों है? क्यों एक आदमी जिंदगी-भर बड़ी-से-बड़ी मेहनत करके भी भूखों मरता है, और दूसरा आदमी हाथ-पाँव न हिलाने पर भी फूलों की सेज पर सोता है। यह सर्वात्म है या घोर अनात्म? बुद्धि जवाब देती – यहाँ सभी स्वाधीन हैं, सभी को अपनी शक्ति और साधना के हिसाब से उन्नति करने का अवसर है मगर शंका पूछती – सबको समान अवसर कहाँ है? बाजार लगा हुआ है। जो चाहे वहाँ से अपनी इच्छा की चीज खरीद सकता है। मगर खरीदेगा तो वही जिसके पास पैसे हैं। और जब सबके पास पैसे नहीं हैं तो सबका बराबर का अधिकार कैसे माना जाए?´

नागरिकों को धर्म मानने और न मानने की आजादी है, ये दोनों संविधान सम्मत हैं। सवाल यह है कि धर्म न मानने वालों से इतनी नाराजगी क्यों ? समाज में ऐसे लोग हमेशा रहे हैं जो धर्म को नहीं मानते,ईश्वर को नहीं मानते और समाज उनको सम्मान की नजर से देखता रहा है। हमारे समाज में धर्मविरोधी को कभी दण्डित नहीं किया गया। दण्ड देने का चलन अंग्रेजों के आने साथ आया है। धर्म का आधुनिकयुग में सबसे बड़ा संरक्षक साम्राज्यवाद है,कारपोरेट घराने हैं। किसान-मजदूर धर्म को नहीं मानते,क्योंकि उनके पास धार्मिक कर्मकांड के लिए समय ही नहीं होता। अधिकांश औरतें भी धर्म के कांडों में शामिल नहीं होतीं। धर्म समाज में प्रतीकात्मक भूमिका निभाता है।धर्म अमीरों का वैचारिक रक्षा कवच है।

मार्क्सवाद को नापसंद करने वालों में एक वर्ग है जो कल्पना और अज्ञानता के आधार पर नापसंद करता है,दूसरे वे हैं जो विचारधारा के आधार पर नापसंद करते हैं, तीसरा वर्ग उन लोगों का है जो व्यक्तिगत कारणों से नापसंद करते हैं।मार्क्सवाद विज्ञान है,विश्वदृष्टिकोण है। यह पसंद-नापसंद से परे मुक्तिमार्ग है।भारत की सामाजिक अवस्था को हम जीतना गहराईसे जानेंगे उतनी ही गहराई में जाकर वाम संगठनों के संघर्षों की प्रासंगिकता,मार्क्सवाद की आवश्यकता को भी महसूस करेंगे।मार्क्सवाद कोई किताबी ज्ञान नहीं है,यह सामाजिक मुक्ति का विज्ञान है।जो लोग कूपमंडूक,अकर्मण्य और संकीर्ण हैं उनमें मार्क्सवाद विरोधी रूझान तेजी से पनपते हैं।विज्ञानसम्मतचेतना का जहां सामान्य वातावरण है वहां मार्क्सवाद विरोधी भावनाएं कम दिखती हैं। यह भी कह सकते हैं नॉनसेंस और मार्क्सवाद विरोध जुड़वां भाई हैं।मध्यवर्ग-निम्नमध्यवर्ग में कूपमंडूकता से लड़ने शक्ति नहीं होती जिसके कारण वह ज्यादा अंधविश्वासी-ईश्वरभक्त होता है। इसके अलावा चाटुकारिता,पुश्तैनी भ्रष्टाचार ,चरित्रहीनता और दीनता भी होती है,जिसके कारण वे सत्ता और शासकवर्गों पर आश्रित होते हैं।सवाल यह है कि मध्यवर्ग की कूपमंडूकता कैसे खत्म हो ?हमारे अनेक फेसबुक दोस्त हैं जो मार्क्सवाद का नाम सुनकर भड़कते हैं। कुछ हैं जिनकी भारतीयता ,हिन्दुत्व आदि जाग पड़ते हैं।कुछ हैं जो बिना सोचे ही लिख देते हैं,इन सभी से एक सवाल है समाज में किसका वर्चस्व हो ? किसान-मजदूर का या पूंजीपतिवर्ग ?अथवा किसी का भी वर्चस्व न हो ? तो कैसे ?

वर्ग और अस्मिता ये दो बड़े आधार हैं सामाजिक गोलबंदी के।अस्मिता का आधार मनुष्य और उसकी मुक्ति को बनाया जाए तो समस्याएं कम हो सकती हैं। सामाजिक मुक्ति के अनेक विकल्प हैं. उनमें एक मार्क्सवाद भी है।लेकिन मुक्ति का एकमात्र विकल्प मार्क्सवाद नहीं है।मात्र वर्गसंघर्ष और वर्ग के आधार पर सामाजिक एकता संभव नहीं है

जिस तरह भक्ति साहित्य को प्रेम के बिना नहीं सकते वैसे ही लोकतंत्र को धर्म को त्यागे बिना नहीं समझ सकते। धर्म तो लोकतंत्र में महाबाधा है। लोकतंत्र का कुर्बानी के बिना विकास नहीं होता और बाबा रामदेव टाइप लोग बगैर कुर्बानी के लोकतंत्र के चैम्पियन बन जाते हैं। यह संभव नहीं है।

भारत में अनेक लोग हैं जो 'भगवान की खोज' और 'भगवान निर्माण' के काम में लगे हैं। लेनिन के शब्दों में यह देवत्व पूजा की शव-कामुकता है।हेगेल ने कहा था, ´जीवन अन्तर्विरोधों से आगे बढ़ता है।जीवन्त अन्तर्विरोध ,जैसाकि प्रथम दृष्टि में दिखाई पड़ते हैं,कहीं अधिक महत्वपूर्ण,विविध एवं गहन होते हैं।´

लेनिन का मानना है ,´काम और संघर्ष किए बगैर पुस्तिकाओं से प्राप्त कम्युनिस्ट ज्ञान बेकार है ,क्योंकि यह सिद्धान्त और व्यवहार के पुराने अलगाव को जारी रखेगा तथा पूंजीवादी समाज का अत्यधिक घातक लक्षण उस दरार को बनाए रखने में मदद देता है।´लेनिन का मानना था- ''आप कम्युनिस्ट तभी हो सकते हैं जब आप मानवजाति द्वारा निर्मित सम्पूर्ण ज्ञान के खजाने से सम्पन्न हों।"मार्क्स-एगेल्स का मानना था- आदर्श की कसौटी आर्थिक वास्तविकता होती है।

मार्क्स-एंगेल्स ने इसी आदर्श को सामने रखकर अपना व्यवहारिक कार्य किया । यही वजह है कि उन्होंने पूंजीपतियों की सेवा करने की बजाय उत्पादक शक्तियों की आत्मचेतना को विकसित करने का काम किया।मार्क्स-एंगेल्स का एक साझा आदर्श था- आवश्यकता को स्वतंत्रता के अधीन बनाने,अंधी आर्थिक शक्तियों को मानव बुद्धि के अधीन बनाने का आदर्श।





शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2014

धर्म आनंद और आराम की जुगलबंदी

         धर्ममंदिरों और संतों के आश्रमों का धार्मिकता से बुनियादी सम्बन्ध खत्म हो गया है। खासकर आजादी के बाद के वर्षों में धर्मकेन्द्र और संतकेन्द्र अब आनंद –आराम केन्द्र बन गए हैं। धर्मकेन्द्र और संतकेन्द्र आजादी के पहले धार्मिकता के प्रचार के केन्द्र हुआ करते थे लेकिन इन दिनों यह फिनोमिना बदल गया है। देशी पूंजीवाद के विकास और पूंजीसुख के बढ़ते संसार ने जीवनशैली को रुपान्तरित किया है,इसका धर्म पर भी असर पड़ा है। धर्म-संत केन्द्रों का सारे देश में नियोजित उद्योग की तरह विकास हुआ है। अब इन केन्द्रों पर आनंद-आराम –जीवनशैली और स्वास्थ्य का खासतौर पर ख्याल रखा जाता है।
     स्वातंत्र्योत्तर दौर में पैदा हुए धर्म-संत समाज ने मासकल्चर के साथ अपना सम्बन्ध विकसित किया है।इनके यहां धर्म के मासकल्चर रुपों पर खासतौर पर जोर है। पहले धर्म को साधना के रुप में देखा जाता था,लेकिन मासकल्चर के साथ सम्बन्ध बनाने के कारण अब यही धर्म-संतकेन्द्र 'उपभोग' पर जोर देते हैं। इस तरह वे पूंजीवादी बाजार का विस्तार और विकास भी करते हैं। पूजा-पाठ-उपासना आदि इनमें गौण है और आनंद-आराम प्रमुख चीज है। स्वामीनारायण मंदिर से लेकर श्रीश्रीरविशंकर तक,रजनीश से लेकर महर्षि महेश योगी तक हजारों संत हैं, और उनके हजारों नेटवर्क हैं, जो आनंद-आराम के नेटवर्क के तौर पर काम कर रहे हैं। इस समूचे जगत को आनंद-आराम उद्योग कहना समीचीन होगा। इन संत-धर्मस्थलों का प्रमुख लक्ष्य है आगंतुकों के खालीसमय को आनंद से भरना और आराम की अनुभूति देना। इनके केन्द्रों में जीवनशैली प्रबन्धन कला भी सिखायी जाती है।

मंगलवार, 17 मई 2011

बुद्ध जयंती पर विशेष- धर्म की नई भूमिका की तलाश


     बौद्ध धर्म के बारे में अनेक मिथ हैं  इनमें एक मिथ है कि यह शांति का धर्म है।गरीबों का धर्म है। इसमें समानता है। सच इन बातों की पुष्टि नहीं करता। आधुनिककाल में श्रीलंका में जातीय हिसा का जिस तरह बर्बर रूप हमें तमिल और सिंहलियों के बीच में देखने को मिला है। चीन, बर्मा,कम्बोडिया आदि देशों में जो हिंसाचार देखने में आया है उससे यह बात पुष्ट नहीं होती कि बौद्ध धर्म शांति का धर्म है। बौद्ध धर्म के प्रति आज (अन्य धर्मों के प्रति भी) सारी दुनिया में इजारेदार पूंजीपतियों और अमीरों में जबरदस्त अपील है। इसका प्रधान कारण है बौद्ध धर्म में आरंभ से ही अमीरों की प्रभावशाली उपस्थिति। एच.ओल्डेनबर्ग ने "बुद्धः हिज लाइफ ,हिज टीचिंग्स,हिज आर्डर" ( 1927) में लिखा है कि बुद्ध को घेरे रखने वाले वास्तविक लोगों और प्रारंभिक धर्माचार्यों में जो लोग थे उन्हें देखने से प्रतीत होता है कि समानता के सिद्धान्त का पालन नहीं होता था।प्राचीन बुद्ध धर्म में कुलीन व्यक्तियों के प्रति विशेष झुकाव बना हुआ प्रतीत होता है जो अतीत की देन था।
धर्म का प्रचार करने वाले विश्व के प्रथम प्रचारक तापस और भल्लिक व्यापारी वर्ग से थे। बनारस में उपदेश देने के बाद बुद्ध में आस्था रखने वालों की संख्या में इजाफा हुआ। बाद में संघ में आने वाला दूसरा व्यक्ति यसं था। जो बनारस के सम्पन्न परिवार का सदस्य था। उसके माता-पिता, बहिन आदि भी बौद्ध धर्म में आ गए। इसी यस के बहुत से मित्र व्यवसायी और परिचित,पड़ोसी आदि भी शामिल हुए।ओल्डनहर्ग ने विस्तार के साथ उन तमाम लोगों की जानकारी दी है जो सम्पन्न परिवारों से आते थे या राजा थे। इनमें मगध नरेश बिंबसार का नाम प्रमुख है।

महात्मा बुद्ध ने धर्म और धार्मिकपंथों में व्याप्त जातिभेद को चुनौती देते हुए अपने पंथ का मार्ग निचली या अन्त्यज जातियों के लिए खोला था। इससे इन जातियों में जबर्दस्त आकर्षण पैदा हुआ। बुद्ध के संघ के महत्वपूर्ण व्यक्तियों में से एक था उपालि जो संघ के नियमों के अनुसार गौतम के पश्चात प्रमुख पद पर आसीन हुए था। वह पहले नाई था। उसके व्यवसाय को घृणित व्यवसायों में गिना जाता था। इसी प्रकार सुनीत भी एक नीची जनजाति 'पुक्कुस' से आया था ,जबकि वह उन बंधुओं की श्रेणी में था ,जिनकी रचना,थेरगाथा में सम्मिलित करने के लिए चुनी गई थीं। जबरदस्त नास्तिकता का प्रचारक सती नामक व्यक्ति धीवर जाति का था। नंद ग्वाला था। दो पंथक, एक कुलीन परिवार की अविवाहित कन्या के किसी दास के साथ यौन संबंधों की देन था। चापा नामक लड़की एक शिकारी की पुत्री थी। पुन्ना और पुन्निका दास पुत्रियां थीं। सुमंगलमाता सनीठे के वनों में काम करने वाले लोगों की पुत्री और पत्नी थी। सुभा एक लौहार की बेटी थी। इस तरह के असंख्य उदाहरण भरे पड़े हैं। यही कारण है महात्मा बुद्ध ने बड़े पैमाने पर अंत्यजों-वंचितों और अछूतों को अपनी ओर खींचा और उन्हें सामाजिक अलगाव और वंचना से मुक्ति दी। हिन्दू धर्म ऐसा करने में असफल रहा। 
   बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर ने ''बुद्ध और उसके धर्म की भवितव्यता" शीर्षक से एक लेख लिखा है । यह लेख महाबोधि संस्था के मासिक में 1950 में प्रकाशित हुआ था। इसमें उन्होंने संक्षेप में अपने नजरिए से बौद्ध धर्म के विचारों को व्यक्त किया है। उन्होंने लिखा- (1) समाज की स्थिरता के लिए कानून या नीति का आधार अवश्यंभावी है। इनमें किसी भी एक के अभाव में समाज निश्चय ही तितर-बितर हो जाएगा। अगर धर्म का अस्तित्व चलते रहना है तो उसका बुद्धि प्रामाण्यवादी होना आवश्यक है। विज्ञान बुद्धि प्रामाण्यवाद का दूसरा नाम है। (3) धर्म के लिए यह काफी नहीं है कि वह केवल नैतिक संहिता बने। धर्म की नैतिक संहिता को स्वतंत्रता ,समता,बंधुता -इन मबलभूत तत्वों को स्वीकृति देनी चाहिए। (4) धर्म के कारण दरिद्रता को पवित्र न मानें और उसे उदात्त रूप भी न दें।  

गुरुवार, 4 नवंबर 2010

सिर फोड़ने का सलीका

      हिन्दुत्व का स्वप्नलोक बदल रहा है। स्वप्नलोक से यहां तात्पर्य है यूटोपिया से। जो लोग भारत को हिन्दूराष्ट्र बनाना चाहते हैं उनके पास हिन्दू राष्ट्र और हिन्दुत्व की समग्र परिकल्पना है,ऐसा उनका दावा है। वे सिर्फ एक मौका चाहते हैं। उनका दावा है कि वे यदि केन्द्र सरकार सिर्फ अपने बलबूते पर बनाने में सफल हो जाते हैं तो वे हिन्दू राष्ट्र के सपने को साकार कर देंगे। सिर्फ एक मौका मिल जाए।
     हिन्दुत्व के यूटोपिया की सबसे बुनियादी समस्या है भारत का संविधान जो धर्मनिरपेक्षता और बहुलतावाद को प्रत्येक स्तर पर सुनिश्चित बनाता है। भारत को यदि वे हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहते हैं तो उन्हें साफ तौर पर जनता के बीच संविधान परिवर्तन के प्रस्तावों को अपने चुनावी मैनिफैस्टो में लेकर जाना होगा। उन्हें बताना होगा कि आखिरकार वे भारत को हिन्दू राष्ट्र में रूपान्तरित करने के लिए किस तरह का संविधान देंगे और मौजूदा संविधान की किन बातों को वे नहीं मानते। लेकिन जहां तक हमारा अनुभव है जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी ने ,जो संघ परिवार से जुड़ा राजनीतिक दल है,उसने संविधान में क्या बदलाव जरूरी हैं इन्हें केन्द्र में रखकर कोई बहस नहीं चलायी है उलटे उसने मौजूदा संविधान के प्रति अपनी आस्थाएं व्यक्त करते हुए भाजपा का चुनाव आयोग में पंजीकरण कराया है।
    जैसाकि सभी लोग जानते हैं कि माओवादियों की भारत के संविधान में कोई आस्था नहीं है। वे संविधान को पूरी तरह अस्वीकार करते हैं,इसी तरह और भी कई पृथकतावादी संगठन हैं उत्तरपूर्वी राज्यों और कश्मीर में जो भारत के संविधान और जम्मू-काश्मीर के कानूनों को एकसिरे से अस्वीकार करते हैं। सवाल उठता है कि संघ परिवार ने जब जनसंघ-भाजपा के जरिए राजनीति आरंभ की तो उसने मौजूदा संविधान के सामने नतमस्तक होकर काम करने की प्रतिज्ञा क्यों की ? वे यदि सचमुच में यह मानते हैं कि संविधान उनके हिन्दूराष्ट्र के यूटोपिया के लक्ष्यों की पूर्ति नहीं करता तो उन्हें यह कहने का हक था कि वे हिन्दू राष्ट्र की अवधारणाओं के अनुरूप नया संविधान बनाने के लिए संघर्ष जारी रखेंगे और चुनाव में भाग नहीं लेंगे। लेकिन उन्होंने यह सब नहीं किया। भाजपा और संघपरिवार ने जिस दिन भारत के संविधान को मान लिया उसी दिन हिन्दू राष्ट्र के सपने का बुनियादी तौर पर अंत हो गया था।
    असल में हिन्दुत्व और हिन्दू राष्ट्र का सपना वोटबैंक राजनीति का प्रौपेगैण्डा अस्त्र है। यह यूटोपिय़ा नहीं है। असल में वे हिन्दुत्व का प्रचार करते हुए बुनियादी सामाजिक परिवर्तन के दायित्वों से भागना चाहते हैं।यहां तक कि हिन्दू समाज को बदलने के दायित्वों से पलायन कर रहे हैं।  वे हिन्दुत्व-हिन्दुत्व की रट लगाकर आम लोगों का ध्यान उनकी सामाजिक जिम्मेदारियों से हटाना चाहते हैं।  वे इसके जरिए पूंजीवादी शोषण से ध्यान हटाना चाहते हैं। इस अर्थ में वे पूंजीवाद के खिलाफ पैदा हो रहे गुस्से को सामाजिक और सामूहिक तौर पर एकत्रित नहीं होने देते।  
 
    बुनियादी सवाल यह है कि हिन्दुत्व का यूटोपिया अपूर्ण क्यों है ? इसने समग्रता में यूटोपिया की शक्ल अख्तियार क्यों नहीं की ? हिन्दुत्ववादी ताकतों ने राजनीतिक अवसरवाद का सहारा क्यों लिया ? क्या वे लोग हिन्दुत्व के सपने को लेकर आश्वस्त नहीं थे ? उन्होंने हिन्दुत्व के एजेण्डे को क्यों त्याग दिया । ऐसा राजनीतिक कार्यक्रम क्यों बनाया जिसमें सत्ता संघ के हाथ में हो,या उसके निर्देश पर राज्य सरकार और केन्द्र सरकार में संघी लोग काम करें और राजनीतिक आधार को विस्तार दें ?
    हिन्दुत्व के यूटोपिया और राजनीतिक कार्यक्रम के बिना हिन्दुत्व और उनके दल रीढ़विहीन हैं। दिशाहीन हैं। वे अपनी राज्य सरकारों के जरिए आज तक कोई भी हिन्दू कार्यक्रम लागू नहीं कर पाए हैं। मसलन गुजरात की सरकार को ही लें,उसके पास जितने भी कार्यक्रम हैं वे सबके सब पूंजीवादी कार्यक्रम हैं,यह पूंजीवाद कम से कम हिन्दुत्व की विचारधारा से पैदा नहीं हुआ है। गुजरात सरकार की अधिकांश योजनाएं केन्द्र सरकार यानी कांग्रेस पार्टी की पहल पर तैयार की गयी योजनाएं हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि हिन्दुत्व अभी तक अपना स्वतंत्र राजनीतिक कार्यक्रम नहीं बना पाया है।   
 हिन्दुत्व के पास आर्थिक कार्यक्रम के अभाव का प्रधान कारण है कि उसने सामाजिक  समस्याओं की कभी गंभीरता के साथ हिन्दूवादी परिप्रेक्ष्य में मीमांसा नहीं की है। उसके पास ऐसे समाजविज्ञानियों का अभाव है जो हिन्दुत्व के नजरिए से सामाजिक मीमांसा तैयार करके दें। फलतः हिन्दुत्व बहुत ही संकीर्ण दायरे में राजनीतिक विचरण करता रहा है।
    हिन्दुत्व की अवधारणा अधूरी है। इसमें सामाजिक शोषण से मुक्ति दिलाने की क्षमता नहीं है। इस अधूरेपन के कुछ आंतरिक कारण हैं और कुछ बाह्य भौतिक कारण हैं। हिन्दुत्व के यूटोपिया न बन पाने का दूसरा बड़ा कारण है हिन्दू समाज और समूचे भारतीय समाज की रूढ़ियों के प्रति उसका मोह और अनालोचनात्मक नजरिया। वे अपने देशप्रेम को अतीत से बांधकर रखते हैं। वे इस बात को कभी पसंद नहीं करते कि वे जिस अतीत को स्वर्णकाल मानते हैं,गौरवपूर्ण मानते हैं अथवा जिस अतीत को बुरा मानते हैं उसके बारे में कोई सवाल खड़े किए जाएं। वे अतीत के हिन्दूसमाज और उसकी विचारधारा और नैतिकता-अनैतिकता,श्लील-अश्लील की कल्पित तस्वीर बनाते हैं और उसमें मगन रहते हैं और यही प्रचार करते हैं उन्होंने जो तस्वीर बनायी है वह सही है उसे कोई बदल नहीं सकता,उस तस्वीर को कोई भी उलट-पलटकर देख नहीं सकता।
    हिन्दुत्व को रूढ़िवाद बेहद प्रिय है। वे जानते हैं कि हिन्दुत्व और हिन्दू राष्ट्र की स्थापना संभव नहीं है। जानते हैं कि उनके पास कारपोरेट जगत की सेवा करने के अलावा और कोई काम नहीं है। उनका कार्यक्रम हिन्दू अर्थशास्त्र पर आधारित नहीं है बल्कि कारपोरेट पूंजीवादी अर्थशास्त्र पर आधारित है।
   हिन्दुत्ववादी मूलतःयथास्थितिवादी हैं। उनके सोचने का ढ़ंग बड़ा विलक्षण है। उनकी आलोचना की पद्धति विलक्षण है। वे किसी भी बात का खंडन कर देते हैं बगैर प्रमाण दिए। वे अपनी स्थापनाओं को बगैर किसी प्रमाण के पेश करते हैं।
       हम हिन्दुत्वपंथी ,इस्लामिक,ईसाईयत वाले तत्ववादी ज्ञानियों से सवाल करना चाहते हैं क्या इंसान को धर्म में लपेटकर पढ़ा जाना सही है? क्या मज़हब का ढ़ोल बजाकर इस दुनिया को समझा जा सकता है ? यदि हां,तो एक सवाल का जबाब दो इंसान को भूख पहले भी लगती थी,अब भी लगती है। ताकत का नशा उसे पहले भी था आज भी है,शेरो-शराब का शौकीन पहले भी था आज भी है। आज ऐसा क्या परिवर्तन आय़ा है जिसके कारण इंसान को हम बदला हुआ पाते हैं ? यहां पर मुझे सआदत हसन मंटो के शब्द याद आ रहे हैं।
    मंटो ने लिखा था, ’’ यह नया जमाना  नए दर्दों और नई टीसों का जमाना है। एक नया दौर पुराने दौर का पेट चीरकर पैदा किया जा रहा है। पुराना दौर मौत के सदमे से रो रहा है,नया दौर ज़िंदगी की खुशी से चिल्ला रहा है।दोनों के गले रूँधे पड़े हैं,दोनों की आँखें नमनाक हैं-इस नमी में अपने कलम डुबोकर लिखने वाले लिख रहे हैं। नया अदब ? ज़वान वही है,सिर्फ लहजा बदल गया है। दरअसल इसी बदले हुए लहजे का नाम नया अदव, तरक्कीपसंद अदव,फहशअदव या मजदूरपरस्त अदव है।’’
मंटो ने सवाल उठाया है ‘‘ दुनिया बहुत वसी है। कोई च्यूँटी मारना बहुत बड़ा पाप समझता है, कोई लाखों इंसान हलाक कर देता है और अपने इस फ़अल को बहादुरी और शुजाअत (वीरता) से तावीर करता है।कोई मज़हब को लानत समझता है,कोई इसी को सबसे बड़ी नैमत-इंसान को किस कसौटी पर परखा जाए ? यूँ तो हर मज़हब के पास एक बटिया मौजूद है जिस पर इंसान कसकर परखे जाते हैं मगर वह बटिया कहाँ है ? सब कौमों ,सब मज़हबों,सब इंसानों की वाहिद कसौटी जिस पर आप मुझे और मैं आपको परख सकता हूँ,वह धर्मकाँटा कहाँ है,जिसके पलड़ों में हिन्दू और मुसलमान,ईसाई और यहूदी,काले और गोरे तुल सकते हैं?’’
   ‘‘ यह कसौटी,यह धर्मकाँटा जहाँ कहीं भी है, नया है न पुराना है।तरक्कीपसंद है न तनज्ज़ुलपसंद । उरियाँ है न मस्तूर (गुप्त) ,फ़हश है न मुतहर् (श्लील)- इंसान और इंसान के सारे फ़अल इसी तराजू में तोले जा सकते हैं। मेरे नजदीक किसी और तराजू का तसव्वुर करना बहुत ही बड़ी हिमाकत है।’’
    मंटो ने यह भी लिखा ‘‘ हर इंसान दूसरे इंसान के पत्थर मारना चाहता है,हर इंसान दूसरे इंसान के अफ़आल (करतूतों) परखने की कोशिश करता है। यह उसकी फि़तरत है जिसे कोई भी हादिसा तब्दील नहीं कर सकता। मैं कहता हूँ अगर आप मेरे पत्थर मारना ही चाहते हैं तो खुदारा ज़रा सलीके से मारिए। मैं उस आदमी से हरगिज-हरगिज अपना सिर फुड़वाने के लिए तैयार नहीं जिसे सिर फोड़ने का सलीका नहीं आता। अगर आपको यह सलीका नहीं आता तो सीखिए-दुनिया में रहकर जहाँ आप नमाज़ें पढ़ना,रोज़े रखना और महफ़िलों में जाना सीखते हैं,वहाँ पत्थर मारने का ढ़ंग भी आपको सीखना चाहिए।’’
 ‘‘ आप खुदा को खुश करने के लिए सौ हीले करते हैं। मैं आपके इस क़दर नज़दीक हूँ ,मुझे करना भी आपका फ़र्ज़ है। मैंने आपसे कुछ ज्यादा तलब तो नहीं किया ? मुझे बड़े शौक़ से गालियाँ दीजिए ।मैं गाली को बुरा नहीं समझता ,इसलिए कि यह कोई ग़ैर फितरी चीज़ नहीं,लेकिन ज़रा सलीके से दीजिए। न आपका मुँह बदमज़ा हो और न मेरे ज़ौक़ को सदमा पहुँचे।’’
    अंत में ,फंडामेंटलिस्ट दोस्तों से कहना चाहते हैं कि वे धार्मिक तत्ववाद का मार्ग त्यागकर साहित्य के मार्ग पर चलें। मंटो के ही शब्दों में ‘‘ अदब दर्जाए हरारत है अपने मुल्क का,अपनी कौम का-अदब अपने मुल्क,अपनी कौम,उसकी सेहत और अलालत की खबर देता रहता है-पुरानी अल्मारी के किसी ख़ाने से हाथ बढ़ाकर कोई गर्द आलूद किताब उठाइए,बीते हुए ज़माने की नब्ज़ आपकी उँगलियों के नीचे धड़कने लगेगी।’’

















शनिवार, 11 सितंबर 2010

मीडिया का फास्टफूड है धर्म का ‘स्टिंग ऑपरेशन’

      ‘आजतक’  टीवी चैनल ने ‘हे राम’ के नाम से कई संतों की पोल खोलने वाला ‘स्टिंग ऑपरेशन’ पर आधारित एक कार्यक्रम कल यानी 10 सितम्बर 2010 को प्राइम टाइम में प्रसारित किया। संतों को नंगा करने वाले ऐसे ही अनेक कार्यक्रम यह चैनल सास-समय पर दिखाता रहता है। इसबार के कार्यक्रम में चार संत मुरारी बापू,सुधांशु महाराज,दाती महाराज (शनि ग्रह वाले) और स्वामी सुमनानंद जी थे।
      इन चारों संतों के बारे में बताया गया कि ये संतई के अलावा विभिन्न किस्म के गैर धार्मिक धंधे करते हैं। भारत का प्रत्येक नागरिक और इनके भक्त यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि सामयिक बड़े संतों में अधिकांश गैर संतई का धंधा करते हैं। मजेदार बात यह है जिन लोगों को इस कार्यक्रम में समर्थन में बोलने के लिए बुलाया गया उनमें बाबा रामदेव और धर्मेन्द्र जी के बारे में तो मैं कह सकता हूँ इनके पास गैर संतई का बड़ा कारोबार है। धर्मेन्द्रजी राममंदिर आंदोलन के गैर संतई के कारपोरेट प्रकल्प का हिस्सा रहे हैं और बाबा रामदेव का जड़ी-बूटी आदि का बडा व्यापारतंत्र और योग के मीडिया प्रोडक्ट का बड़ा धंधा है। सवाल यह है कि क्या गैर संतई के काम करने वाले इन संतों को ‘आजतक’ के संत फार्मूले के आधार पर संत माना जा सकता है ?  
       यह कॉमनसेंस की बात है कि संतों के गैर संतई के धंधों को सब जानते हैं। जिस संत ने संपत्ति जुगाड़ करने ,व्यापार करने,कैसेट बेचने,वीडियो बेचने, आशीर्वाद से काम कराने, इशारे से काम कराने  आदि के कामों में अपने को लगा लिया है उसने संत के प्रचलित मार्ग का त्याग कर दिया है।
      ‘आजतक’ वालों ने जो बातें बतायी हैं वे कॉमनसेंस की बातें हैं इनसे संतों के प्रति घृणा पैदा नहीं होती। ‘आजतक’ वाले भूल गए कि संतों को उनके भक्त बहुत अच्छी तरह जानते हैं। वे जितना जानते हैं उसका चैनलों में एक प्रतिशत भी नहीं दिखाया जाता। संतों के भक्तों का संत के प्रति ज्ञान आज सत्य होते हुए भी निष्क्रिय है ।क्योंकि संतों ने आम जीवन के उपयोगितावाद से अपने को जोड़ लिया है। कारपोरेट ढ़ंग से काम कराने की कला में महारत हासिल कर ली है। यह आदर्श स्थिति है कि संत सिर्फ भक्ति करें,उपासना करें और गैर धार्मिक कार्यों में भाग न लें।
     चैनल वाले भूल गए यह कारपोरेट संस्कृति का जमाना है और धर्म को यदि जिंदा रहना है.संतों को यदि शोहरत हासिल करनी है तो कारपोरेट पद्धति अपनानी होगी और भारत के संतों ने इस बात को पकड़ लिया है। अब पुराने जमाने का धर्म कहीं पर भी नहीं बचा अब पुराने जमाने के संत भी नहीं बचे। पुराने जमाने में न्यूनतम से संत का जीवन चल जाता था आज नहीं चलता।
    पूंजीवाद ने संतों को भी जीने का रास्ता दिखाया है। पहले संतों को जीने मात्र के लिए न्यूनतम पूंजी की जरूरत होती थी और वे प्रचार पर ध्यान नहीं देते थे। क्योंकि उनके पास स्थानीय और परंपरागत संचारतंत्र था। लेकिन नए संत वैसे नहीं हैं। ‘आजतक’ चैनल की मुश्किल यहीं पर है वह आज के जमाने में पुराने संत ,संत की नैतिकता और धर्म को खोज रहा है।  
     मीडिया या टीवी चैनलों में इस तरह के कार्यक्रम मासकल्चर का फास्टफूड हैं। इनसे चैनल के दर्शकों को न सूचना मिलती है और नहीं ज्ञान मिलता है।सिर्फ समययापन में मदद जरूर मिलती है। इस तरह के कार्यक्रम संत-पंडित-पुजारी या धर्म का कुछ भी नुकसान नहीं करते। उनकी प्रतिष्ठा में इससे कोई कमी नहीं आती। उनके भक्तों की संख्या में गिरावट नहीं आती।
  टीवी चैनल वाले यह सोचते हों कि उन्होंने किसी संत या धार्मिक संस्थान को नंगा करके तीर मार लिया या किसी महान यथार्थ का उद्घाटन कर दिया तो वे विभ्रम के शिकार हैं। संत या धर्म को आप मीडिया कवरेज से पछाड़ नहीं सकते। खासकर ‘स्टिंग ऑपरेशन’ से तो एकदम नहीं। ‘स्टिंग ऑपरेशन’ काल्पनिक सत्य पर आधारित होता है। काल्पनिक सत्य को राज्य,कानून,सरकार,न्यायालय और जनता कहीं पर भी जनसमर्थन नहीं मिलता। वह काल्पनिक है और काल्पनिक से सत्य पैदा नहीं होता। काल्पनिक सत्य के लिए अवैध है।
  उल्लेखनीय है मीडिया की साख बनी थी ‘खोजी पत्रकारिता’ से। इसके लिए उसने वास्तव को आधार बनाया और पवित्र तरीके अपनाए। इस तरह की पत्रकारिता के जरिए जो भी सत्य सामने आया उस पर समाज,न्यायालय,सरकार और जनता सभी विश्वास करते हैं। नए जमाने के भारतीय टीवी पत्रकार अब सत्य की खोज में ‘खोजी पत्रकारिता’ नहीं कर रहे हैं। बल्कि असत्य और काल्पनिक के आधार पर ‘स्टिंग ऑपरेशन’ कर रहे हैं। वे कीचड़ से कीचड़ धोना चाहते हैं। ध्यान रहे कीचड़ साफ करने के लिए स्वच्छ पानी चाहिए।  
     हम याद करें बोफोर्स कांड की ‘खोजी पत्रकारिता को और उसकी राजनीतिक परिणतियों को, बोफोर्स की दलाली का सत्य सरकार गिरा चुका है। कहने का अर्थ यह है सत्य का असर होता है काल्पनिक का चाहे वह कितना ही प्रामाणिक हो कोई असर नहीं होता। अथवा बहुत ही सीमित और तात्कालिक असर होता है।
    यह भी ध्यान रहे पाखंड को टीवी कार्यक्रमों या मीडिया कवरेज से पछाड़ा नहीं जा सकता। क्योंकि मीडिया के ढ़ोंग और धर्म के ढ़ोंग में बिरादराना संबंध हैं। जिस तरह मीडिया में चीजें ‘फ्लो’ में पढ़ी जाती हैं और ‘फ्लो’ के अनुसार प्रभाव छोड़ती हैं वैसे ही धर्म की भी गति है। धर्म का भी ‘फ्लो’ है। ‘फ्लो’ को ‘फ्लो’ के जरिए नहीं पछाड़ सकते। तुलनात्मक तौर पर धर्म का ‘फ्लो’ ज्यादा है और वह प्रभावशाली भी है क्योंकि धर्म के ‘फ्लो’ को ग्रहण करके लागू करने वाली सक्रिय संरचनाए हैं। मीडिया के संतों को नंगा करने वाले ‘फ्लो’ का अनुकरण करने वाली सामाजिक संरचनाएं नहीं है। यही वजह है इस तरह के कार्यक्रम कोई सामाजिक असर नहीं छोड़ते।   









सोमवार, 9 अगस्त 2010

सांस्कृतिक जाम और उपभोग का संसार



     '' सांस्कृतिक जाम'' का परिणाम है कि सारी दुनिया के बाजार अमेरिकी सांस्कृतिक मालों से पटे पड़े हैं। यही हाल मीडिया उत्पादों का भी है। टीवी कार्यक्रमों का भी है। एकतरफा ढ़ंग से अमेरिका के सांस्कृतिक माल, मीडिया उत्पादों का निर्यात किया जा रहा है। स्थानीय सांस्कृतिक मालों अथवा गैर पश्चिमी जगत के सांस्कृतिक मालों का उतनी मात्रा में पश्चिमी देशों के लिए निर्यात नहीं हो रहा है जिस अनुपात में पश्चिमी देशों के सांस्कृतिक मालों का गैर पश्चिमी देशों की ओर निर्यात हो रहा है। सांस्कृतिक मालों के विनिमय के क्षेत्र में इस तरह की असमाता का प्रधान कारण है ''सांस्कृतिक जाम।' इसे कुछ लोग ''इलैक्ट्रोनिक नव्य उपनिवेशवाद'' भी कहते हैं। किसी के लिए ''सांस्कृतिक साम्राज्यवाद'' है। ''सांस्कृतिक जाम'' का प्रधान लक्ष्य है अमेरिकी मूल्यों ,विश्वासों,जीवन शैली आदि का प्रचार करना। इस कार्य में सबसे प्रभावी मीडियम के रूप में टीवी उभरकर सामने आया है। 

             ''सांस्कृतिक जाम'' का सबसे पहला मंत्र है स्थानीय संस्कृति को अपदस्थ करो। स्थानीय आख्यान को अपदस्थ करो, उसकी जगह पश्चिमी आख्यान को पेश करो। स्थानीय आधुनिकता को अपदस्थ करो ,उसके बदले पश्चिमी आधुनिकता को स्थापित करो। '' सांस्कृतिक जाम'' का अर्थ '' उपभोग के स्वर्ग'' का प्रचार करना। ''उपभोग के स्वर्ग '' में वही दाखिल हो सकता है जो पश्चिमी संस्कृति में रचा-बसा है। ''सांस्कृतिक जाम'' जब चीजों को माल बनाता है तो हम सिर्फ माल ही नहीं खाते, बल्कि समूची प्रकृति, जमीन, संस्कृति, दृश्य प्रस्तुतियां, यहां तक कि मानवीय शरीर का भी उपभोग करते हैं। यह एक तरह का प्रतीकात्मक उपभोग भी है। जब हम सांस्कृतिक उपभोग कर रहे होते हैं तो आत्मसात कर रहे होते हैं, सांस्कृतिक हमला कर रहे होते हैं, सांस्कृतिक उत्पीडन कर रहे होते हैं। सांस्कृतिक कुर्बानी कर रहे होते हैं। इसी क्रम में सांस्कृतिक अधिकार खो रहे होते हैं। 

''सांस्कृतिक जाम'' हमें ''उपभोग के स्वर्ग'' की यात्रा कराता हुआ एक ऐसी दुनिया में ले जाता है जहां से हम निकल नहीं पाते, अपनी संस्कृति को खो देते हैं, अपने सांस्कृतिक अधिकारों को खो देते हैं। ''सांस्कृतिक जाम'' जब ''अपदस्थ'' करता है तो पश्चिमी आधिुनिकता को विसंदर्भीकृत करते हुए पेश करता है। जिसके बाद उसका नया संदर्भ बनाता है। यह नया संदर्भ अन्य या 'अदर' के साथ बनाया जाता है। जब हम ''सांस्कृतिक जाम'' में फंस जाते हैं तो हमें यह सवाल करना चाहिए कि कौन किसको हजम कर रहा है ? हमारे मीडिया के पर्दे पर पर्यटन के जितने भी विज्ञापन आ रहे हैं अथवा पर्यटन संबंधी कार्यक्रम आ रहे हैं अथवा धार्मिक प्रसारण आ रहे हैं , इनमें जो पाठ रचा जा रहा है, उपभोग के स्वर्ग का जो नया आख्यान रचा जा रहा है उसकी धुरी है ''पश्चिम का पाठ और संस्कृति।'' 

'' सांस्कृतिक जाम'' का सबसे आदर्श उदाहरण है थ्योरी का ग्लोबल स्तर पर वितरण। पश्चिमी सैध्दान्तिकियों का जिस तरह प्रसार और इस्तेमाल हो रहा है उसने देशज सैध्दान्तिकी के विकास की ओर से हमारा ध्यान ही हटा दिया है। खासकर ग्लोबल कल्चर के बारे में हम जितना पढ़ ,सुन या देख रहे हैं। यह सब पश्चिमी सैध्दान्तिकी की चोरी की हुई सामग्री है। 
       भारत में पर्यटन, धर्म और स्थानीय संस्कृतियों को नवीकृत किया जा रहा है और विसंदर्भीकृत रूप में पश्चिमी संस्कृति को हमारे गले में उतारा जा रहा है और पश्चिमी उपभोग के स्वर्ग को हमारे पर्यटन,धर्म और देशज संस्कृति से जोड़ा जा रहा है उसने गंभीर सांस्कृतिक संकट पैदा कर दिया है। अब पर्यटन में घूमना प्रमुख है,जानना और जुड़ना प्रमुख नहीं है। 

धर्म हमारे जीवन में उपभोग की सामग्री कभी नहीं रहा। धर्म की शरण में व्यक्ति जाता था उपभोग से बचने के लिए। किंतु नया धर्म उपभोग का महिमामंडन करता है। आज वह प्रदर्शनप्रियता,उत्सवधर्मिता और उपभोक्तावाद का हिस्सा बन गया है। यही हाल प्रकृति का है, प्रकृति को भी हमने उपभोग के हवाले कर दिया है, प्रकृति का संरक्षण और पल्लवन हमारा लक्ष्य था, प्रकृति का उपभोग हम वहीं तक करते थे जहां तक प्रकृति का क्षय न हो, किंतु प्रकृति के प्रति नया नजरिया उपभोग को महत्व देता है। 
       उपभोग से न तो धर्म बचता है, न पर्यटन या तीथार्टन और न प्रकृति। उपभोग का रास्ता अंतत: पश्चिमी मार्ग है, सांस्कृतिक जाम का मार्ग है। यह सांस्कृतिक क्षय का मार्ग है। हमें इस सवाल पर भी सोचना चाहिए कि क्या उपभोग का कोई देशी रास्ता हो सकता है ? संस्कृति,पर्यटन,धर्म मीडिया के क्षेत्र में '' सांस्कृतिक जाम'' इस बिंदु से प्रारंभ होता है कि आखिरकार आने वाले की इच्छाएं क्या हैं ?उन इच्छाओं की संतुष्टि को प्रमुख स्थान दिया गया है। 
      '' सांस्कृतिक जाम'' का एक अन्य फिनोमिना है जिसे '' नैतिक भय'' कहते हैं। ''सांस्कृतिक जाम'' सबसे ज्यादा '' नैतिक भय'' के सवाल उठाता है, ये सवाल जितने जल्दी उठते हैं उतनी ही जल्दी गायब भी हो जाते हैं। ''नैतिक भय'' उस समय ज्यादा सताता है जब लोग नयी तकनीक के संपर्क में आते हैं। नयी तकनीक के संपर्क में आते ही पहला परिणाम यह निकलता है कि लोगों का स्थापित संस्थानों के प्रति विश्वास डगमगाता है। ऐसे में '' नैतिक भय'' के सवाल अतिरंजित रूप में मीडया के पर्दे को घेर लेते हैं। ''नैतिक भय'' के सवालों को हाल के वर्षों में जिस तरह कवरेज मिला है उससे हमने कुछ भी सीखा नहीं है। 
    '' नैतिक भय'' के प्रश्नों में इंटरनेट पोर्नोग्राफी, बच्चों का खासकर पोर्नोग्राफी में शोषण, मोबाइल फोन के जरिए एमएमएस के सवाल, क्लोनिंग के सवाल ज्यादा उछाले गए हैं, इसके अलावा नैतिक-अनैतिक, श्लील-अश्लील के सवाल भी केन्द्र में आ गए हैं। इस संदर्भ में अचानक नैतिकता के स्वयंभू संरक्षक मैदान में आ डटे हैं। इनमें ज्यादातर वे लोग हैं जो न तो नैतिकता के बारे में जानते हैं और न जिनका कानून के बारे में ज्ञान है और न जो अधिकारी विद्वान् ही हैं। इस प्रसंग में हम बुनियादी बात भूल ही गए कि तकनीक समाज के प्रति तटस्थ नहीं होती है। 












रविवार, 9 मई 2010

कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर की 150वीं जयन्ती पर विशेष- दीन-हीन मनुष्य का सम्मान पद है धर्म -2-

     हिंदी के लेखकों और आलोचकों की मुश्‍कि‍ल यह है कि‍ वे धर्म और साहि‍त्‍य को अलग -अलग खांचों में रखकर देखते हैं। वे धर्म,मनुष्‍य और साहि‍त्‍य के बीच के अन्‍तस्‍संबंध को अभी तक देख ही नहीं पाए हैं। आदि‍कवि‍ से लेकर भक्‍ति‍ आंदोलन के कवि‍यों तक यह अन्‍तस्‍संबंध साफ दि‍खाई देता है। यहां तक कि‍ भारतेन्‍दु के यहां भी इसकी छाप नजर आती है। उसके बाद पता नहीं कबसे यह संबंध टूट गया। धर्म,मनुष्‍य और साहि‍त्‍य को अलग कर दि‍या गया। हम साहि‍त्‍य से प्‍यार करने लगे और धर्म से नफरत।
      इस प्रक्रि‍या में पहले हाथ से धर्म गया अब साहि‍त्‍य भी जा रहा है। रह गयी हैं कुछ कि‍ताबें ,संपादक,अध्‍यापक,आलोचक और साहि‍त्‍य गायब है। साहि‍त्‍य का वि‍मर्श गायब है। धर्म हाथ से जाएगा तो कलाएं भी जाएंगी। हिंदी में कलावंतों और कलाबोध की क्‍या दशा है यह हम सब अच्‍छी तरह जानते हैं। हिंदीभाषी शहरों में कला के ट्यूटर तक नहीं मि‍लते। आस्‍वाद करने वाले तो दूर-दूर तक नजर नहीं आते और कला दीर्घाएं हजारों कि‍लोमीटर दूर जा चुकी हैं। साहि‍त्‍य की अवस्‍था इससे बेहतर नहीं है। इस समूची प्रक्रि‍या का दयानंद सरस्‍वती के सुधार आंदोलन और उपयोगि‍तावाद के साथ गहरा संबंध है।
         धर्म को हमने पहले त्‍यागा। धर्म को त्‍यागने का अर्थ है मनुष्‍यता को त्‍यागना। धर्म को त्‍यागकर कोई लेखक मनुष्‍यत्‍व के मर्म को नहीं पकड सकता। धर्म बैर की नहीं प्‍यार की चीज है, घृणा की नहीं मोहब्‍बत की चीज। धर्म की सतही और पोंगापंथी बातें धर्म का सही रूप नहीं हैं। प्रत्‍येक समझदार व्‍यक्‍ति‍ ने धर्म के दुरूपयोग, पाखंड, कर्मकांड आदि‍ का वि‍रोध कि‍या है। धर्म का अर्थ बाह्याचार नहीं है।धर्म अंदर की चीज है।धर्म हमारे अन्‍त:करण में होता है। धर्म हमारी प्राणवायु है।
साहि‍त्‍य हमारे हृदय से नि‍कलता है और मनुष्‍य के हृदय को ही सम्‍बोधि‍त करता है। लेखक हृदय के आदेश पर ही लि‍खता है। पार्टी,वि‍चारधारा,राष्‍ट्र आदि‍ के आदेश पर नहीं लि‍खता। धर्म का बाह्याडंबर अन्‍त:करण को सम्‍बोधि‍त नहीं करता फलत: अन्‍त:करण को बदलने की उसमें क्षमता नहीं है।
      धर्म स्‍वभावत: प्रगति‍शील है, मानवीय है। हमें सोचना चाहि‍ए धर्म से कटने के कारण कहीं समाज और सभ्‍यता से हमारा संबंध वि‍च्‍छेद तो नहीं हो गया ? सभ्‍यता वि‍मर्श धर्म में मि‍लता है,सृजन का वि‍मर्श भी धर्म की गोद में बैठकर ही आया है। जि‍तने भी क्‍लासि‍क हैं वे धर्मवि‍मुख होकर नहीं लि‍खे गए, हमारे पास जि‍तने भी बेहतरीन लेखक, महापुरूष, दार्शनि‍क आदि‍ हैं वे सभी धर्मप्राण थे।
उदयप्रकाश ने सही लि‍खा है ,‘धर्म’ के अंतर्विरोधों के बीच से ही उसकी सामाजिक जड़ता और उसके अमानवीकरण तथा सांस्थानीकरण के विरुद्ध विद्रोह फूटते रहे हैं। हमारे देश के अपने इतिहास में भी अंधविश्वासों और कर्मकांडों के विरुद्ध, ब्राह्मणवाद और पुरोहितवाद के विरुद्ध अथवा जड़ और प्रतिगामी सामाजिक रीति-रिवाजों, परंपराओं के विरुद्ध धर्म की किसी प्रशाखा ने ही सबसे सक्षम विद्रोह किया था।'
     मैं यहां सि‍र्फ अपने ज्‍योति‍षशास्‍त्र के तजुर्बे से बता सकता हूं कि‍ फलि‍त ज्‍योति‍ष के पाखंड के खि‍लाफ जि‍तना वि‍स्‍तार के साथ प्राचीन और मध्‍यकाल में सि‍द्धान्‍त ज्‍योति‍ष के वि‍द्वानों ने आम जनता को शिक्षि‍त कि‍या था उतना कि‍सी और ने नहीं कि‍या। स्‍वयं आर्यभट को वि‍ज्ञानसम्‍मत वि‍चार व्‍यक्‍त करने के कारण प्रसि‍द्ध राजज्‍योति‍षी वराहमि‍हि‍र ने कहीं नौकरी नहीं लेने दी।आर्यभट को दर दर की ठोकरें खानी पड़ीं लेकि‍न उन्‍होंने ज्‍योति‍ष संबंधी अपने वैज्ञानि‍क वि‍चारों को ति‍लांजलि‍ नहीं दी।
    उदयप्रकाश ने लि‍खा है '' यहां यह समझा पाना लगभग असंभव है भगत सिंह का लेख ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ या राहुल जी का ‘तुम्हारी क्षय हो’ का उपयोग सांप्रदायिक राजनीति, समाज सुधार, कर्मकांड और ब्राह्मणवाद के विरुद्ध तो हो सकता है, लेकिन सृजन और कला, साहित्य,संगीत, वास्तु और शिल्प आदि के क्षेत्रों में अगर उसे यथावत् किसी सौंदर्यशास्त्र के वैकल्पिक स्वरूप के बतौर लागू करने का प्रयत्न किया गया तो परिणाम घातक होंगे।''
     उदयप्रकाश की इस धारणा से पूरी तरह सहमत होना संभव नहीं है। इसका प्रधान कारण है कि‍ भगतसिंह और राहुल साकृत्‍यायन दोनों ही धर्म की सकारात्‍मक भूमि‍का देखने में असमर्थ रहे हैं। उनके यहां धर्म के प्रति‍ इकहरा नजरि‍या व्‍यक्‍त हुआ है, इससे साम्‍प्रदायि‍कता आदि‍ को परास्‍त करना संभव नहीं है।
इस प्रसंग में रवीन्‍द्रनाथ टैगोर के 29 अगस्‍त 1921 को पढे गए नि‍बंध 'सत्‍य का आह्वान‘ का हवाला देना चाहूंगा। तमाम कि‍स्‍म के क्रांति‍कारी असहयोग आंदोलन की आलोचना कर रहे थे, और अलग से क्रांति‍ का बि‍गुल बजाए हुए थे,बंग भंग का राजनीति‍क वातावरण था।
       इस प्रसंग में टैगोर ने लि‍खा '' जब तक राष्‍ट्र तैयार नहीं है तब तक क्रान्‍ति‍ का प्रयत्‍न करना गलत मार्ग पर चलना है। यह मार्ग उचि‍त मार्ग की तुलना में छोटा है,लेकि‍न उस पर चलकर हम लक्ष्‍य तक नहीं पहुँचते ,रास्‍ते में दोनों पाँव कांटों से जख्‍मी हो जाते हैं।प्रत्‍येक वस्‍तु का पूरा दाम देना होता है -यदि‍ आधा ही दाम दि‍या गया तो रूपया भी जाता है और वस्‍तु भी नहीं मि‍लती। वे दु:साहसी युवक समझते थे कि‍ सारे देश के लि‍ए यदि‍ कुछ लोग आत्‍मोत्‍सर्ग करें तो क्रांति‍ सफल होगी।उनके लि‍ए यह सर्वनाशा था,देश के लि‍ए एक सस्‍ती बात।देश का उद्धार समस्‍त देश के अन्‍त:करण से होना चाहि‍ए,उसके एक अंश से नहीं।''
        एक अन्‍य चीज जि‍से ध्‍यान में रखना चाहि‍ए। टैगोर के ही शब्‍दों में '' मनुष्‍य मधुमक्‍खी की तरह नहीं है जो एक ही तरह का छत्‍ता बनाती है, न वह मकड़ी की तरह है जो एक ही 'पैटर्न' का जाल बुनती है।उसकी सबसे बड़ी शक्‍ति‍ है उसका अन्‍त:करण। मनुष्‍य का पूरा दायि‍त्‍व अन्‍त:करण के सामने है। अभ्‍यासपरता के सामने नहीं।''            
     धर्म डरने, दुत्‍कारने अथवा बहि‍ष्‍कार करने की चीज नहीं है। हजारों वर्षों से धर्म का दुरूपयोग,बहि‍ष्‍कार,दुत्‍कार आदि‍ सब कुछ चल रहा है, इसके बावजूद धर्म का प्रवाह अव्‍याहत बना हुआ है। इसका अर्थ है कि‍ कहीं कोई ऐसी शक्‍ति‍ जरूर होगी जो धर्म को आगे ले जा रही है। इस पहलू का रवीन्‍द्रनाथ ने बड़ा ही सुंदर वि‍वेचन कि‍या है।
लि‍खा है, '' मनुष्‍य की शक्‍ति‍ के दो पक्ष हैं : एक पक्ष का नाम है 'कर सकता है' और दूसरे पक्ष का नाम है 'करेगा'। पहला पक्ष उसके लि‍ए सहज है,लेकि‍न उसकी तपस्‍या दूसरे पक्ष की ओर है। धर्म मनुष्‍य के 'करेगा' पक्ष के सर्वोच्‍च शि‍खर पर खड़ा होकर उसके समस्‍त 'कर सकता है' को पुकारता है ; उसे वि‍श्राम नहीं करने देता ; उसे कि‍सी सामान्‍य लाभ से ही सन्‍तुष्‍ट नहीं होने देता। जहॉं मनुष्‍य का 'कर सकता है' इसी 'करेगा' के नि‍र्देशन में आगे बढ़ता जाता है वहीं मनुष्‍यता की वीरता है-वहीं उसका सत्‍य -रूप से आत्‍मलाभ है।''
     धर्म की मूल क्षमता यह है कि‍ वह मनुष्‍य को असाध्‍य कार्य करने में सक्षम बनाता है। मनुष्‍य की अक्षमता,मूर्खता,दुष्‍टता,शैतानि‍यों आदि‍ को अस्‍वीकार करता है और सि‍र्फ मनुष्‍यता पर बल देता है। धर्म बंदी नहीं बनाता,धर्म वि‍चारों की गुलामी भी नहीं थोपता। धर्म कहीं से भी अंधवि‍श्‍वास,पुनर्जन्‍म आदि‍ की हि‍मायत नहीं हैं। अंधवि‍श्‍वास, पुनर्जन्‍म आदि‍ की बातें उन लोगों ने की हैं जो धर्म को अन्‍त:करण से काटकर बाह्याचारों के रूप में देखते हैं।
एक मायने में धर्म और कला सृजन एक ही लक्ष्‍य की पूर्त्‍ति करते हैं । दोनों मनुष्‍यत्‍व का संदेश देते हैं। दोनों हृदय के साथ संवाद करते हैं,अन्‍त:करण की अभि‍व्‍यक्‍ति‍ करते हैं। दोनों से पुण्‍य मि‍लता है। हृदय को शांति‍ मि‍लती है। तनाव दूर होता है। दोनों सर्जनात्‍मक हैं, ऊर्जा से भरे हैं। दोनों मनुष्‍य को और भी बेहतर मनुष्‍य बनाते हैं। दोनों के बि‍ना मनुष्‍य अधूरा है। इनमें से कि‍सी भी एक त्‍यागा नहीं जा सकता।
       धर्म का स्‍तर उठाने के लि‍ए हमें वहां से आगे सोचना चाहि‍ए जहां पर हमारे पूर्वज धर्म के वि‍मर्श को छोड़ गए थे। हमने इस वि‍मर्श को आगे नहीं बढाया है बल्‍कि‍ और भी पीछे की ओर ,सतही चीजों की ओर ले गए हैं। इससे हमारा धर्मबोध वि‍कृत हुआ है। धर्म और कलाओं के प्रति‍ हमें पुराने नुस्‍खे को अपनाना होगा,पुराना नुस्‍खा था '' अभी और'',हम जहां थे उससे आगे के बारे में सोचें। कला और धर्म जहां है उससे आगे के बारे में सोचें। इस प्रक्रि‍या को जि‍तनी दूर तक ले जा सकें,ले जाएं। इससे मानवीय चेतना के नए दि‍गंत खुलेंगे।
     हमें धर्म के बारे में सहजबुद्धि‍ के धरातल पर खड़े होकर नहीं सोचना चाहि‍ए। हमें धर्म को वि‍श्‍वास के आधार से भी नहीं देखना चाहि‍ए। धर्म अंदर की चीज है, मनुष्‍यत्‍व का मर्म है। उसे सहज,सस्‍ता,चमकीला बनाने से वह सामाजि‍क तकलीफ देता है।जो लोग ऐसा करते हैं वे धर्म नहीं 'ठगी धर्म' करते हैं।
      रवीन्‍द्रनाथ टैगोर ने लि‍खा है '' धर्म मनुष्‍य की पूर्ण शक्‍ति‍ की अकुण्‍ठि‍त वाणी है। उसमें कोई द्वि‍धा नहीं है। वह मनुष्‍य को मूर्ख कहकर स्‍वीकार नहीं करता,और न दुर्बल कहकर अवज्ञा करता है। वह मनुष्‍य को पुकारकर कहता है- ' तुम अजेय हो,अभय हो,अमर हो।' धर्म की शक्‍ति‍ से ही मनुष्‍य असंभव लगने वाले कामों में जुट जाता है, और ऐसे स्‍तर पर पर पहुँच जाता है जि‍सकी वह स्‍वप्‍न में भी कल्‍पना नहीं कर सकता। इसी धर्म के मुख से कहलाएं : 'तुम मूढ़ हो , समझ न सकोगे' तो फि‍र मनुष्‍य की मूढ़ता कौन दूर करेगा ?यदि‍ धर्म से ही हम कहलाएं: 'तुम अक्षम हो,कुछ न कर सकोगे', तो मनुष्‍य को शक्‍ति‍ कौन देगा ?'' '' वास्‍तव में हीन-से -हीन मनुष्‍य के लि‍ए सम्‍मान का एकमात्र स्‍थान धर्म ही है।''

कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर की 150वीं जयन्ती पर विशेष- दीन-हीन मनुष्य का सम्मान पद है धर्म -1-

(महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर)
  (हम रवीन्द्रनाथ टैगोर की 150वीं जयन्ती को नया जमाना पर पूरे साल मनाएंगे। इस साल हिन्दी के भी कई महान लेखकों के जन्म शताब्दी समारोह पूरे साल चलेंगे। हम लगातार साहित्य की महान विभूतियों को स्मरण करते हुए अपने सामयिक युग , उनके साहित्य और विचारों का नया मूल्यांकन करने की कोशिश करेंगे। आज यहां इस लेख में रवीन्द्रनाथ टैगोर के विचारों की रोशनी में धर्म का मूल्यांकन कर रहे हैं। 
    एक अन्य लेख सरला माहेश्वरी का दे रहे हैं जिसमें रवीन्द्रनाथ टैगोर को समग्र परिप्रेक्ष्य में विश्लेषित किया गया है। तीसरा लेख अरुण माहेश्वरी ने लिखा है जिसमें सिलसिलेबार ढ़ंग से रवीन्द्रनाथ टैगोर के व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रियाओं का विस्तार से सामयिक समस्याओं के संदर्भ में विश्लेषण किया गया है। )
       हिंदी के बुद्धि‍जीवि‍यों में धर्म 'इस्‍तेमाल करो और फेंको' से ज्‍यादा महत्‍व नहीं रखता। अधि‍क से अधि‍क वे इसके साथ उपयोगि‍तावादी संबंध बनाते हैं। धर्म इस्‍तेमाल की चीज नहीं है। धर्म मनुष्‍यत्‍व की आत्‍मा है। मानवता का चरम है। जि‍स तरह मनुष्‍य के अधि‍कार हैं ,लेखक के भी अधि‍कार हैं,वैसे ही धर्म के भी अधि‍कार हैं।धर्म और कलाएं मनुष्‍य के लि‍ए हैं। मनुष्‍य के बाहर इनका कोई अस्‍ति‍त्‍व नहीं है।
      एक जगह कथाकार उदयप्रकाश ने सही रेखांकि‍त कि‍या है कि‍ हमने धर्म की इकहरी और उपयोगितावादी भूमि‍का पर ही ज्‍यादातर समय ध्‍यान केन्‍द्रि‍त कि‍या है। धर्म के मर्म को कभी समझने का प्रयास ही नहीं कि‍या। धर्म का उपयोगि‍तावाद कब से जीवन में आया यह ठीक ठीक बताना संभव नहीं है। धर्म का स्‍थान उपयोगि‍ता में नहीं मनुष्‍यत्‍व में है।‍
     उदयप्रकाश ने लि‍खा है '' सचमुच ‘धर्म’ कहते ही हम स्वयं को उस प्रदूषित अवधारणा के बीचों-बीच पाते हैं, जिसे हमारे समय और निकट अतीत की राजनीति, सत्ता, पूंजी और मीडिया ने चौतरफा पैदा किया है।''         
      धर्म पर कोई भी बहस उपयोगि‍तावादी फ्रेमवर्क में नहीं की जा सकती। यह बहस का सीमि‍त दायरा है। धर्म को जब तक मनुष्‍य के अन्‍मर्ग्रथि‍त हि‍स्‍से के रूप में नहीं देखेंगे, मनुष्‍यत्‍व के नि‍र्माण के प्रकल्‍प के रूप में नहीं देखेंगे, धर्मवि‍ज्ञान के नजरि‍ए से नहीं देखेंगे,एक सर्जक के हृदय की नजर से जब तक नहीं देखेंगे तब तक धर्म के मर्म को पकडना संभव नहीं है।
      रवीन्‍द्रनाथ टैगोर आधुनि‍क धर्मनि‍रपेक्ष लेखक थे। अनेक मामलों में उनकी समझ अपने युग के सभी वि‍चारकों ,आलोचकों ,रचनाकारों और कला मनीषि‍यों के वि‍चारों की सीमाओं को भेदती हुई मनुष्‍यत्‍व के मर्म तक गयी है। रवीन्‍द्रनाथ टैगोर का जि‍क्र इसलि‍ए भी जरूरी है कि‍ उन्‍होंने एक परंपरा भी बनायी थी,जि‍से हिंदी वाले दूसरी परंपरा कहते हैं।
       इस परंपरा में धर्म के बारे में रवीन्‍द्रनाथ के जो वि‍चार हैं,वे हम सभी लेखकों, बुद्धि‍जीवि‍यों,राजनीति‍ज्ञों आदि‍ के लि‍ए जानना बेहद जरूरी हैं। मैं अभी तक समझ नहीं पाया कि‍ रवीन्‍द्रनाथ के धर्म संबंधी वि‍चारों का हिंदी लेखकों पर प्रभाव क्‍यों नहीं पड़ा,जो रवीन्‍द्र परंपरा के हिंदी में उत्‍तराधि‍कारी हैं ,उन पर इस परंपरा का हजारीप्रसाद द्वि‍वेदी के बाद असर क्‍यों नहीं पड़ा ?
     रवीन्‍द्रनाथ टैगोर ने एक व्‍याख्‍यान ब्रह्मसमाज में 26 जनवरी 1912 को दि‍या था,इस व्‍याख्‍यान का शीर्षक था 'धर्म का अधि‍कार' प्रत्‍येक भारतीय को यह लेख पढना चाहि‍ए। धर्मनि‍रपेक्ष हिंदी लेखकों खासकर प्रगति‍शीलों को तो जरूर पढना चाहि‍ए।
     रवीन्‍द्रनाथ टैगोर ने लि‍खा है '' जि‍न महापुरूषों की वाणी आज तक पृथ्‍वी पर अमर है उन्‍होंने कभी दूसरों के मन को खुश करते हुए अपनी बात कहना नहीं चाहा।वे जानते थे कि‍ मनुष्‍य अपने मन से कहीं बड़ा है- मनुष्‍य अपने को जो समझता है वहीं उसकी समाप्‍ति‍ नहीं है। इसीलि‍ए महापुरूषों ने अपना दूत सीधे मनुष्‍यत्‍व के राज-दरबार में भेजा; बाहरी दरवाजे के चौकीदार को मीठी बातों से प्रसन्‍न करके अपने काम का मूल्‍य नष्‍ट नहीं कि‍या।''
       धर्म के खि‍लाफ बोलना बहुत आसान है। धर्म के उपयोगी रूपों की हि‍मायत में पोंगापंथि‍यों,पंडि‍तों,महंतों आदि‍ की तरह बोलना और भी आसान है। लेकि‍न धर्म को मनुष्‍यत्‍व के नि‍र्माण के उपकरण के रूप में व्‍याख्‍यायि‍त करना बेहद मुश्‍कि‍ल काम है।
     जि‍न लोगों ने धर्म की आलोचना की ,धर्म का शोषण कि‍या उन सभी के वि‍चारों का समाज में आज क्‍या स्‍थान है ? इस तरह के लोग सैंकडों सालों से धर्म के बारे में लि‍ख रहे हैं। उनके वि‍चार आज कहीं पर भी प्रभाव छोडते नजर नहीं आते।
      जि‍नके लि‍ए धर्म मर चुका था, धर्म पोंगापंथ था,जनता के लि‍ए अफीम था। वे भी गुमनामी में जा चुके हैं। धर्म अभी भी सीना ताने खड़ा है। राज्‍य का धर्मनि‍र्मूल करने के लि‍ए जि‍न्‍होंने इस्‍तेमाल कि‍या आज वे कहां हैं ? धर्म कहां है ? इसे सहज ही अपनी आंखों से देख सकते हैं। धर्म के उपदेश असाध्‍य प्रतीत होते हैं। लेकि‍न सच्‍चा मनुष्‍य वही है जो असाध्‍य की साधना करता है। रवीन्‍द्रनाथ टैगोर लि‍खा है '' स्‍वल्‍पमप्‍यस्‍य धर्मस्‍य त्रायते महतो भयात्'' अर्थात् अल्‍प-मात्र धर्म महाभय से रक्षा कर सकता है।
       हिंदी में लेखकों के लीक से भि‍न्‍न वि‍चारों को, महान वि‍चारों को हमने कभी सम्‍मान की नजर से नहीं देखा। हिंदी लेखक बनि‍ए की गणि‍त लगाकर लि‍खता है,वह सच बोलते हुए हि‍चकता है । उसने लंबे समय से सच बोलना बंद कर दि‍या है। हिंदी लेखक ने सच बोलना जब से बंद कि‍या है । तब से हिंदी में वि‍चारों की कंगाली आ गयी है।
       हिंदी लेखक लि‍खता खूब है कि‍ लेकि‍न मायावी संसार पर लि‍खता है। सत्‍य पर नहीं लि‍खता। यही वजह है कि‍ वह अंत में 'तू-तू मैं -मैं' करने लगता है। दुश्‍मनी ठान लेता है। इस प्रक्रि‍या में वह सोचता है महान हो गया ,लेकि‍न होता एकदम उल्‍टा है हिंदी लेखक महान होने की बजाय ओछा होता चला गया है। एक दूसरे को नीचा दि‍खाना, नुकसान पहुंचाना, फतवे जारी करना,सृजन नहीं है। यह तो वि‍ध्‍वंस है। मनुष्‍यत्‍व से पतन है।
     भारतीय मार्क्‍सवादी जानते हैं मार्क्‍सवाद के वि‍कास के लि‍ए जि‍स एकांत साधना और ज्ञान के उच्‍चधरातल की जरूरत है वह उनके पास नहीं है। मार्क्‍सवाद सेमीनार और संगठनों की शाखाओ में पैदा नहीं हुआ था। महापुरूषों के वि‍चार अन्‍तरसाधना से पैदा होते हैं बाह्य साधना से पैदा नहीं होते।
     जब भी कोई वि‍चार,शास्‍त्र,दर्शन,राजनीति‍क दर्शन,राजनीति‍क एक्‍शन ,साहि‍त्‍य आदि‍ में भेद का शास्‍त्र बन जाता है तो वह अपने को बौना बना लेता है। मार्क्‍सवाद को हमने एक-दूसरे को बौना दि‍खाने के अस्‍त्र के रूप में इस्‍तेमाल कि‍या और स्‍वयं बौने बनते चले गए।
    भारत में धर्म के वि‍चारकों ने भेद के सभी कि‍स्‍म के रूपों की मुखालफत की है। उन्‍होंने सत्‍य को छोटा करके नहीं देखा है। सत्‍य को दैनंन्‍दि‍न प्रयोजनों से दूर रखकर चर्चा की है। सत्‍य को हमारे हिंदी आलोचकों और अध्‍यापकों ने प्रयोजन के खूंटे से बांध दि‍या है। सत्‍य को हमने समझा नहीं है सत्‍य के साथ हमने समझौते कि‍ए हैं। सत्‍य के साथ समझौतों का ही दुष्‍परि‍णाम है कि‍ आज हम डरपोक और आत्‍मवि‍श्‍वासवि‍हीन हो गए हैं। हमारी आत्‍मा को कोई लल्‍लू-पंजू वि‍चारक,आलोचक, लेखक, राजनेता अपहृत कर लेता है।
     धर्म के बारे में हमारी कभी भी सही समझ नहीं रही है। हमने पूजा-पाठ को ही धर्म मान लि‍या है। धर्म के आलोचकों ने इसी को धर्म मानकर इस पर वैचारि‍क हमला बोला है। भारत के धर्मनि‍रपेक्ष और मार्क्‍सवादी वि‍मर्श की यह सीमा है। धर्म पर मार्क्‍सवादि‍यों ने प्रयोजन के दायरे के परे जाकर कभी वि‍चार ही नहीं कि‍या। रवीन्‍द्रनाथ टैगोर ने लि‍खा है '' जो मनुष्‍य ब्रह्म को न जानकर केवल जप-तप में समय काटता है, 'अन्‍तवदेवास्‍य तद्भवति '- उसका सारा जप-तप नष्‍ट हो जाता है।''
    रवीन्द्रनाथ टैगोर पर महात्मा बुद्ध का गहरा असर था।  गौतम बुद्ध की समस्‍त साधना का मूलाधार है सत्‍य की खोज। सत्‍य को पाने की आकांक्षा का ही सुपरि‍णाम है कि‍ आज मानव सभ्‍यता इतने ऊंचे धरातल तक अपने को वि‍कसि‍त कर पायी है। सत्‍य की खोज ही वह बिंदु है जहां पर लेखक भी मनुष्‍यत्‍व के वि‍कास में अपना महत्‍वपूर्ण योगदान करता है। लेखक के पास सत्‍य न हो तो लेखक नहीं बन सकता। मनुष्‍यता की कुंजी सत्‍य के पास है अन्‍य कि‍सी के पास नहीं है।
     रवीन्‍द्रनाथ टैगोर ने लि‍खा है '' धर्म में ही मनुष्‍य का श्रेष्‍ठ परि‍चय मि‍लता है। धर्म का मनुष्‍य पर जि‍स मात्रा में अधि‍कार होता है उसी के अनुसार मनुष्‍य अपने आपको पहचानता है। सम्‍भव है कोई व्‍यक्‍ति‍ राजपुत्र होने पर भी अपने आपको भूल जाय। लेकि‍न देश के लोगों की ओर से बार-बार ताकीद की जानी चाहि‍ए। उसके पैतृक गौरव की याद दि‍लाना आवश्‍यक है ; उसे लज्‍जि‍त करना,यहां तक कि उसे दण्‍ड देना भी आवश्‍यक हो सकता है।लेकि‍न उसे मूर्ख कहकर समस्‍या को आसान करने की कोशि‍श वृथा है। यदि‍ वह मूर्ख की तरह व्‍यवहार करे तो भी सत्‍य को उसके सामने स्‍थि‍र करके रखना है। इसी तरह धर्म मनुष्‍य से कहता है: 'तुम अमृत के पुत्र हो,यही सत्‍य है'।‍ धर्म मनुष्‍य को कि‍सी तरह राह भूलने नहीं देता कि‍ 'मनुष्‍य' शब्‍द से कि‍तनी बड़ी -बड़ी बातों का बोध होता है। यही धर्म का प्रधान कार्य है।''
     रवीन्‍द्रनाथ टैगोर ने यह भी लि‍खा , '' शरीर के लि‍ए जैसे मस्‍ति‍ष्‍क है वैसे ही मानव समाज के लि‍ए धर्म है।धर्म का आदर्श ही मानव-प्रकृति‍ को अन्‍दर -अन्‍दर से सारी वि‍कृति‍यों के वि‍रूद्ध लडाई करने के लि‍ए प्रवृत्‍त करता रहता है।''
   जो लोग आए दि‍न धर्म की आलोचना करते हैं,उन्‍हें ध्‍यान में रखकर रवीन्‍द्रनाथ ने लि‍खा था '' हि‍साब-कि‍ताब करके धर्म को छोटा नहीं बनाया जा सकता , कोई उसे कि‍सी परि‍माण में माने या न माने, उसी को एकमात्र 'मानवीय' बताकर पूर्ण रूप से सामने रखना होगा।''

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