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गुरुवार, 12 मई 2016

गालिब के रंग-

             
ग़ालिब सदा किराये के मकानों में रहे, अपना मकान न बनवा सके। ऐसा मकान ज़्यादा पसंद करते थे, जिसमें बैठकख़ाना और अन्त:पुर अलग-अलग हों और उनके दरवाज़े भी अलग हों, जिससे यार-दोस्त बेझिझक आ-जा सकें।
5 अक्टूबर को (18 सितम्बर को दिल्ली पर अंग्रेज़ों का दुबारा से अधिकार हो गया था) कुछ गोरे, सिपाहियों के मना करने पर भी, दीवार फाँदकर मिर्ज़ा के मुहल्ले में आ गए और मिर्ज़ा के घर में घुसे। उन्होंने माल-असबाब को हाथ नहीं लगाया, पर मिर्ज़ा, आरिफ़ के दो बच्चों और चन्द लोगों को पकड़कर ले गए और कुतुबउद्दीन सौदागर की हवेली में कर्नल ब्राउन के सामने पेश किया। उनकी हास्यप्रियता और एक मित्र की सिफ़ारिश ने रक्षा की। बात यह हुई जब गोरे मिर्ज़ा को गिरफ़्तार करके ले गए, तो अंग्रेज़ सार्जेण्ट ने इनकी अनोखी सज-धज देखकर पूछा-‘क्या तुम मुसलमान हो?’ मिर्ज़ा ने हँसकर जवाब दिया कि, ‘मुसलमान तो हूँ पर आधा।’ वह इनके जवाब से चकित हुआ। पूछा-‘आधा मुसलमान हो, कैसे?’ मिर्ज़ा बोले, ‘साहब, शरीब पीता हूँ; हेम (सूअर) नहीं खाता।’



जब कर्नल के सामने पेश किए गए, तो इन्होंने महारानी विक्टोरिया से अपने पत्र-व्यवहार की बात बताई और अपनी वफ़ादारी का विश्वास दिलाया। कर्नल ने पूछा, ‘तुम दिल्ली की लड़ाई के समय पहाड़ी पर क्यों नहीं आये, जहाँ अंग्रेज़ी फ़ौज़ें और उनके मददगार जमा हो रहे थे?’ मिर्ज़ा ने कहा, ‘तिलंगे दरवाज़े से बाहर आदमी को निकलने नहीं देते थे। मैं क्यों कर आता? अगर कोई फ़रेब करके, कोई बात करके निकल जाता, जब पहाड़ी के क़रीब गोली की रेंज में पहुँचता तो पहरे वाला गोली मार देता। यह भी माना की तिलंगे बाहर जाने देते, गोरा पहरेदार भी गोली न मारता पर मेरी सूरत देखिए और मेरा हाल मालूम कीजिए। बूढ़ा हूँ, पाँव से अपाहिज, कानों से बहरा, न लड़ाई के लायक़, न मश्विरत के क़ाबिल। हाँ, दुआ करता हूँ सो वहाँ भी दुआ करता रहा।’ कर्नल साहब हँसे और मिर्ज़ा को उनके नौकरों और घरवालों के साथ घर जाने की इजाज़त दे दी।

1857 के ग़दर के अनेक चित्र मिर्ज़ा 'ग़ालिब' के पत्रों में तथा इनकी पुस्तक ‘दस्तंबू’ में मिलते हैं। इस समय इनकी मनोवृत्ति अस्थिर थी। वह निर्णय नहीं कर पाते थे कि किस पक्ष में रहें। सोचते थे कि पता नहीं ऊँट किस करवट बैठे? इसीलिए क़िले से भी थोड़ा सम्बन्ध बनाये रखते थे। ‘दस्तंबू’ में उन घटनाओं का ज़िक्र है जो ग़दर के समय इनके आगे गुज़री थीं। उधर फ़साद शुरू होते ही मिर्ज़ा की बीबी ने उनसे बिना पूछे अपने सारे ज़ेवर और क़ीमती कपड़े मियाँ काले साहब के मकान पर भेज दिए ताकि वहाँ सुरक्षित रहेंगे। पर बात उलटी हुई। काले साहब का मकान भी लुटा और उसके साथ ही ग़ालिब का सामान भी लुट गया। चूँकि इस समय राज मुसलमानों का था, इसीलिए अंग्रेज़ों ने दिल्ली विजय के बाद उन पर विशेष ध्यान दिया और उनको ख़ूब सताया। बहुत से लोग प्राण-भय से भाग गए। इनमें मिर्ज़ा के भी अनेक मित्र थे। इसीलिए ग़दर के दिनों में उनकी हालत बहुत ख़राब हो गई। घर से बाहर बहुत कम निकलते थे। खाने-पीने की भी मुश्किल थी। ऐसे वक़्त उनके कई हिन्दू मित्रों ने उनकी मदद की। मुंशी हरगोपाल ‘तुफ़्ता’ मेरठ से बराबर रुपये भेजते रहे, लाला महेशदास इनकी मदिरा का प्रबन्ध करते रहे। मुंशी हीरा सिंह दर्द, पं. शिवराम एवं उनके पुत्र बालमुकुन्द ने भी इनकी मदद की। मिर्ज़ा ने अपने पत्रों में इनके प्रति कृतज्ञता प्रकट की है।

जब असदउल्ला ख़ाँ 'ग़ालिब' सिर्फ़ 13 वर्ष के थे, इनका विवाह लोहारू के नवाब 'अहमदबख़्श ख़ाँ' (जिनकी बहन से इनके चचा का ब्याह हुआ था) के छोटे भाई 'मिर्ज़ा इलाहीबख़्श ख़ाँ ‘मारूफ़’ की बेटी 'उमराव बेगम' के साथ 9 अगस्त, 1810 ई. को सम्पन्न हुआ था। उमराव बेगम 11 वर्ष की थीं। इस तरह लोहारू राजवंश से इनका सम्बन्ध और दृढ़ हो गया। पहले भी वह बीच-बीच में दिल्ली जाते रहते थे, पर शादी के 2-3 वर्ष बाद तो दिल्ली के ही हो गए। वह स्वयं ‘उर्दू-ए-मोअल्ला’ (इनका एक ख़त) में इस घटना का ज़िक्र करते हुए लिखते हैं कि-

"7 रज्जब 1225 हिजरी को मेरे वास्ते हुक्म दवा में हब्स[ सादिर[ हुआ। एक बेड़ी (यानी बीवी) मेरे पाँव में डाल दी और दिल्ली शहर को ज़िन्दान मुक़र्रर किया और मुझे इस ज़िन्दाँ में डाल दिया।"

मुल्ला अब्दुस्समद 1810-1811 ई. में अकबराबाद आए थे और दो वर्ष के शिक्षण के बाद असदउल्ला ख़ाँ (ग़ालिब) उन्हीं के साथ आगरा से दिल्ली गए। दिल्ली में यद्यपि वह अलग घर लेकर रहे, पर इतना तो निश्चित है कि ससुराल की तुलना में इनकी अपनी सामाजिक स्थिति बहुत हलकी थी। इनके ससुर इलाहीबख़्श ख़ाँ को राजकुमारों का ऐश्वर्य प्राप्त था। यौवन काल में इलाहीबख़्श की जीवन विधि को देखकर लोग उन्हें ‘शहज़ाद-ए-गुलफ़ाम’ कहा करते थे। इससे अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि, उनकी बेटी का पालन-पोषण किस लाड़-प्यार के साथ हुआ होगा। असदउल्ला ख़ाँ (ग़ालिब) शक्ल और सूरत से बड़ा आकर्षक व्यक्तित्व रखते थे। उनके पिता-दादा फ़ौज में उच्चाधिकारी रह चुके थे। इसीलिए ससुर को आशा रही होगी कि, असदउल्ला ख़ाँ भी आला रुतबे तक पहुँचेंगे एवं बेटी ससुराल में सुखी रहेगी, पर ऐसा हो न सका। आख़िर तक यह शेरो-शायरी में ही पड़े रहे और उमराव बेगम, पिता के घर बाहुल्य के बीच पली लड़की को ससुराल में सब सुख सपने जैसे हो गए।

ग़ालिब अथवा मिर्ज़ा असदउल्ला बेग़ ख़ान (अंग्रेज़ी:Ghalib अथवा Mirza Asadullah Baig Khan, उर्दू: غالب अथवा مرزا اسدللا بےغ خان) (जन्म- 27 दिसम्बर, 1797 ई. आगरा - 15 फ़रवरी, 1869 ई. दिल्ली) जिन्हें सारी दुनिया 'मिर्ज़ा ग़ालिब' के नाम से जानती है, उर्दू-फ़ारसी के प्रख्यात कवि रहे हैं। इनके दादा 'मिर्ज़ा क़ौक़न बेग ख़ाँ' समरकन्द से भारत आए थे। बाद में वे लाहौर में 'मुइनउल मुल्क' के यहाँ नौकर के रूप में कार्य करने लगे। मिर्ज़ा क़ौक़न बेग ख़ाँ के बड़े बेटे 'अब्दुल्ला बेग ख़ाँ से मिर्ज़ा ग़ालिब हुए। अब्दुल्ला बेग ख़ाँ, नवाब आसफ़उद्दौला की फ़ौज में शामिल हुए और फिर हैदराबाद से होते हुए अलवर के राजा 'बख़्तावर सिंह' के यहाँ लग गए। लेकिन जब मिर्ज़ा ग़ालिब महज 5 वर्ष के थे, तब एक लड़ाई में उनके पिता शहीद हो गए। मिर्ज़ा ग़ालिब को तब उनके चचा जान 'नसरुउल्ला बेग ख़ान' ने संभाला। पर ग़ालिब के बचपन में अभी और दुःख व तकलीफें शामिल होनी बाकी थीं। जब वे 9 साल के थे, तब चचा जान भी चल बसे। मिर्ज़ा ग़ालिब का सम्पूर्ण जीवन ही दु:खों से भरा हुआ था। आर्थिक तंगी ने कभी भी इनका पीछा नहीं छोड़ा था। क़र्ज़ में हमेशा घिरे रहे, लेकिन अपनी शानो-शौक़त में कभी कमी नहीं आने देते थे। इनके सात बच्चों में से एक भी जीवित नहीं रहा। जिस पेंशन के सहारे इन्हें व इनके घर को एक सहारा प्राप्त था, वह भी बन्द कर दी गई थी।





मंगलवार, 9 जून 2015

ग़ज़ल के रुपान्तरण की प्रक्रिया


आधुनिककाल आने के बाद ग़ज़ल का रुप वही नहीं रह गया जो उसके पहले था। खासतौर पर उपन्यास विधा और अखबारों के उदय और प्रसार  ने ग़ज़ल के विधागत चरित्र को सीधे प्रभावित किया। प्रेस और उपन्यास ने आधुनिककाल में यथार्थवादी नजरिए ,विस्तीर्ण भाव से लिखने और समसामयिकता को साहित्य-सृजन का अनिवार्य अंग बनाया। इससे लेखक,लेखन और समाज के बीच में नए किस्म के रिश्ते, नए किस्म के लेखकीय संस्कारों की शुरुआत हुई। यही वजह थी कि गालिब को यह कहना पड़ा 'कुछ और चाहिए वुसअत मेरे बयाँ के लिए' ।
      गालिब पहले बड़े शायर हैं जिन्होंने ग़ज़ल को नई जिन्दगी दी,नए विषयों और नए नजरिए की ओर मोड़ा।ग़ज़ल को दैनन्दिन जीवन की घटनाओं और सामयिक राजनीतिक घटनाओं से जोड़ा। पहलीबार ग़ज़ल को आंदोलन और राजनीति से सीधे जोड़ने की परंपरा आरंभ हुई। गालिब ने जो सिलसिला आरंभ किया उसे पं.वृजनारायण चकबस्त ने नई बुलंदियों पर पहुँचाया। देशभक्ति और राजनीतिक आंदोलनों से ग़ज़ल को सीधे जोड़ा।
     उल्लेखनीय है ग़ज़ल लिखने वाले शायरों में कई विचारधाराओं के मानने वाले लोग थे।ग़ज़ल एक ही विचारधारा के दायरे में नहीं रही है। इसमें दलीय पक्षधरता भी रही है। नये और पुराने के बीच में वैचारिक और सर्जनात्मक जंग भी रही है।  लोग कहते हैं ग़ज़ल सूत्र है,नज्म भाष्य है।ग़ज़ल संकेत है,नज्म स्वीकृति।नज्म काव्य है,ग़ज़ल सूक्ति है। नज़्मों में समसामयिक घटनाओं और रीतिरिवाजों के बारे में जमकर लिखा गया। इससे नज़्म और राजनीति, नज़्म और आंदोलन,नज़्म और समसामयिकता का नया अंतस्संबंध सामने आया। खासकर राजनीतिक विषयों पर लिखी नज़्में  खूब जनप्रिय हुईं। इस तरह की रचनाओं का तात्कालिक असर खूब होता था,लेकिन तात्कालिक जरुरत खत्म होते ही ये बेकार हो जाती हैं, यह सिलसिला आज भी बरकरार है।
      नज़्म से विचारधारात्मक प्रौपेगैण्डा में बहुत मदद मिली।  आशय यह कि प्रचार खत्म तो नज़्म भी खत्म। इसके विपरीत ग़ज़ल में विधा के तौर पर दीर्घजीवी भाव रहा है। मजेदार बात है उर्दू के तमाम बड़े शायरों ने नज़्म और ग़ज़ल दोनों लिखी हैं। वे इन दोनों ही रुपों का समय देखकर इस्तेमाल करते थे। तमाम प्रगतिशील शायरों की जनप्रियता में नज़्म की भी  भूमिका रही है।
    ग़ज़ल में अप्रत्यक्ष और संकेतात्मक शैली प्रमुख रही है। एक शायर ने लिखा भी है कि ग़ज़लका वार पत्थरकी तरह सीधे न होकर दुशालेमें लिपटा हुआ होता है। ग़ज़ल में कहना है तो उसकी सीमाओं में रहकर ही कह सकते हैं । मसलन्, दानीसे शायर 'अदम' कह रहा है-
' शिकन न डाल जबींपर शराब देते हुए।
यह मुसकराती हुई चीज़ मुसकराके पिला।।'
अब यदि कोई कमअक्ल इसे मयखाने के लिए लिखी शायरी समझे तो हम क्या करें! इसीलिए कहा गया है  ग़ज़ल को जानने के लिए गहरे साहित्यबोध की जरुरत होती है। उसे साहित्यिक कॉमनसेंस या यांत्रिक ढ़ंग से नहीं समझा जा सकता।
मसलन्, व्यवस्था परिवर्तन के सवाल पर आनंदनारायण मुल्ला का यह शेर देखें-
'' निजामे-मैकदा साक़ी! बदलनेकी जरुरत है।
 हजारों हैं सफें जिनमें , न मैं आई, न जाम आया।। ''
ढोंगी और नेताओं पर 'मीर' ने लिखा-
    '' मसजिदमें इमाम आज हुआ,आके वहाँसे।
     कल तक तो यही 'मीर' ख़राबत नशीं था।।'
चेतावनी के प्रसंग में 'मीर' का शानदार शेर पढ़ें-
  '' ऐ वोह कोई जो आज पिये है शराबे-ऐश।
   ख़ातिरमें रखियो कलके भी रंजो-ख़ुमारको।।''

कहने का आशय यह कि ग़ज़लगो शायर हर बात इशारेमें और परदेमें बयान करता है। यही वजह है कि कभी वह विश्ववेदनाको अपनी वेदना बनाकर ग़मे-जानाँके परदे में पेश करता है। मसलन्, '' जो ग़म हुआ,उसे ग़मे –जानाँ बना लिया।।''      

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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...