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शुक्रवार, 14 अगस्त 2009

स्‍वाइन फ्लू पर दहशतजनक टीवी प्रचार बेअसर

स्‍वाइन फ्लू को लेकर अभी टीवी चैनलों का हंगामा, बहुराष्‍ट्रीय दवा कंपनि‍यों के हि‍तों से परि‍चालि‍त प्रचार अभि‍यान थमा भी नहीं था कि‍ कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी आ गयी और उसने मीडि‍या,खासकर बहुराट्रीय नि‍जी समाचार चैनलों की साख को मि‍ट्टी में मि‍ला दि‍या। कहने को महाराष्‍ट्र प्रशासन ने सात दि‍नों के लि‍ए मुंबई में स्‍कूल,कॉलेजों को बंद करने की घोषणा कर दी थी,मल्‍टीप्लेक्‍स आदि‍ बंद करने के आदेश दि‍ए। ये सारे कदम स्‍वाइन फ्लू से जनता को बचाने के नाम पर उठाए गए। जबकि‍ डाक्‍टर बार-बार यही कह रहे हैं कि‍ इससे घबड़ाने की जरूरत नहीं है,इसके बावजूद महाराष्‍ट्र सरकार ने लगातार गलत और अवैज्ञानि‍क कदम उठाए हैं और यह सारा फैसला चैनलों के प्रचार से परि‍चालि‍त होकर कि‍या गया है। स्‍वाइन फ्लू को लेकर जनता में कि‍स तरह का मीडि‍या असर है और जनता कि‍तनी वि‍वेकवान है यह बात आज मुंबई के 'गोवि‍न्‍दा आला' सांस्‍कृति‍क कार्यक्रम में जगह-जगह हजारों लोगों की भागीदारी को देखकर लगा सकते हैं। टेलीवि‍जन की मूर्खताएं जगजाहि‍र हैं इसके बावजूद टीवी वाले अपनी आदतों से बाज नहीं आते और स्‍वाइन फ्लू के नाम पर जो गैर जि‍म्‍मेदाराना रि‍पोर्टिंग की गयी है उसे लेकर आम जनता को शि‍क्षि‍त करने की जरूरत है,चैनलों ने स्‍वाइन फ्लू के नाम पर भय और दहशत का माहौल बनाने की पूरी कोशि‍श की है ,राज्‍य और केन्‍द्र सरकार उनके दबाव में रही हैं, लेकि‍न जनता ने मीडि‍या के स्‍वाइन फ्लू प्रचार से अप्रभावि‍त रहकर एक ऐसी मि‍साल कायम की है जि‍सकी सराहना की जानी चाहि‍ए। मुंबई में खासकर कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी के महोत्‍सव ने स्‍वाइन फ्लू के टीवी प्रचार को एकसि‍रे से अर्थहीन बना दि‍या है। इससे यह भी पता चलता है कि‍ लोग ज्‍यादा वि‍वेकवान और समझदार हैं टीवी अभी इडि‍यट बाक्‍स की कोटि‍ के बाहर नहीं आ पाया है।

गुरुवार, 13 अगस्त 2009

स्‍वाइन फ्लू: बहुराष्‍ट्रीय दवा कंपनि‍यों और मीडि‍या की बल्‍ले-बल्‍ले

स्‍वाइन फ्लू के मीडि‍या हंगामे के कारण ऐसा लगेगा कि‍ यह ऐसी बीमारी है कि‍ आते ही दबोच लेगी,इससे होने वाली मौत की खबरों को कुछ इस तरह प्रस्‍तुत कि‍या जा रहा है कि‍ आम लोगों में दहशत पैदा हो, दहशत पैदा करने और जागरूकता पैदा करने में अंतर होता है। खासकर टेलीवि‍जन चैनलों का अब तक का रवैयया बेहद गैर जि‍म्‍मेदार है। मीडि‍या दहशत का ही परि‍णाम है कि‍ मुंबई के स्‍कूल और कॉलेज सात दि‍न के लि‍ए बंद कर दि‍ए गए हैं। स्‍वाइन फ्लू की कहानी क्‍या है,यह अभी भी कल्‍पना का हि‍स्‍सा है। सवाल यह है कि‍ स्‍वाइन फ्लू जैसा वायरस कहां से आया अथवा इस तरह के ग्‍लोबल वायरस कहां से आते हैं ? क्‍या अमेरि‍का के पास जैवि‍क खजाना है उसके साथ इस तरह के वायरस के ग्‍लोबल हमले का कोई संबंध है ? आखि‍रकार ये वायरस आते कहां से हैं और इनके बारे में बहुराष्‍ट्रीय दवा कंपनि‍यों को पहले से ही कैसे पता होता है ?

अमेरि‍की प्रशासन ने स्‍वाइन फ्लू की दवा के साइड इफेक्‍ट के खि‍लाफ कि‍सी भी कि‍स्‍म के अदालती पचड़ों से दवा बनाने वाली कंपनि‍यों को मुक्‍त कर दि‍या है। जबकि‍ यह तथ्‍य सामने आ रहे कि‍ स्‍वाइन फ्लू की जो दवा लोग ले रहे हैं उसके साइड इफेक्‍ट हैं और इसके दुष्‍परि‍णाम भी आने शुरू हो चुके हैं, जैसे स्‍वाइन फ्लू की दवा लेने के बाद संभव है दमा की शि‍कायत हो जाए,ब्‍लडप्रेशर बढ जाए,अपंग हो जाएं अथवा मौत भी हो सकती है।

स्‍वाइन लू की दवा के इस तरह के साइड इफेक्‍ट के खि‍लाफ अमेरि‍का में जबर्दस्‍त आक्रोश पैदा हुआ है और वहां पर दवा कंपनि‍यों को उपभोक्‍ताओं के मुकदमों से बचाने के लि‍ए ओबामा प्रशासन ने दवा कंपनि‍यों को मुकदमेबाजी के दायरे के बाहर कर दि‍या है, और यह सीधे दवा कंपनि‍यों को सामाजि‍क और चि‍कि‍त्‍सकीय जि‍म्‍मेदारी से मुक्‍त करने वाली बात है।

रोचक तथ्‍य यह है कि‍ स्‍वाइन फ्लू आने के एक साल पहले से ही एक दवा कंपनी ने अमेरि‍का में स्‍वाइन फ्लू के लि‍ए दवा का पेटेंट करा लि‍या था, इस कंपनी का नाम है Baxter International इस कंपनी को यह कैसे मालूम था कि‍ भवि‍ष्‍य में स्‍वाइन फ्लू आने वाला है ? इस कंपनी ने जि‍न बीमारि‍यों को पेटेंट कराने का एक साल पहले आवेदन कि‍या था वे हैं H1N1, H2N2, H3N2, H5N1, H7N7, H1N2, H9N2, H7N2, H7N3, H10N7 , pig flu H1N1, H1N2, H3N1 and H3N2 subtypes, of the dog or horse flu H7N7, H3N8 subtypes or of the avian H5N1, H7N2, H1N7, H7N3, H13N6, H5N9, H11N6, H3N8, H9N2, H5N2, H4N8, H10N7, H2N2, H8N4, H14N5, H6N5, H12N5 ।

स्‍वाइन फ्लू की बीमारी की दवा की सारी दुनि‍या में इस कदर मांग पैदा हुई है कि‍ इस कंपनी के पास सारी दुनि‍या से धड़ाधड़ दवा के आर्डर आ रहे हैं और कंपनी का मुनाफा अचानक बढ़ गया है। कंपनी के सन् 2009 की दूसरी ति‍माही के मुनाफे में 7.9 प्रति‍शत का इजाफा हुआ है। जबकि‍ तीसरी ति‍माही में इसमें और भी बढोतरी की संभावनाएं व्‍यक्‍त की जा रही हैं। यही वह कंपनी है जि‍सने मैक्‍सि‍को के लि‍ए जीवंत स्‍वाइन फ्लू वायरस की सप्‍लाई की थी कि‍ जि‍ससे वहां स्‍वाइन फ्लू को रोका जा सके। मजेदार बात यह है कि‍ मैक्‍सि‍को में स्‍वाइन फ्लू खत्‍म नहीं हुआ बल्‍कि‍ दुनि‍या में फैल गया और यह सारा खेल वि‍श्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन के सहयोग और आदेश पर कि‍या गया। इस दवा कंपनी ने ये सारी चीजें स्‍वीकार भी की हैं और इस पर दुनि‍या के ज्ञानी ध्‍यानी लोग नजर भी रखे हुए है किंतु इसी बीच में स्‍वाइन फ्लू को सारी दुनि‍या में संक्रामक बीमारी के रूप में थोप दि‍या गया है और उपरोक्‍त कंपनी को बेशुमार मुनाफा कमाने का वि‍श्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन के सदस्‍यों ने मौका दे दि‍या है।

स्‍वाइन फ्लू के मामले में रोचक अन्‍तस्‍संबंध भी सामने आए हैं जैसे स्‍वाइन फ्लू की दवा कंपनी अमेरि‍की है और मैक्‍सि‍को के जि‍स पशुशाला से यह वायरस फैला है वह अमेरि‍का की बहुराष्‍ट्रीय पशु मांस सप्‍लायर वि‍श्‍व कंपनी है, उसका नाम है स्‍मि‍थ फील्‍ड। इसी कंपनी के मैक्‍सि‍को मांस कारखाने से यह वायरस आया है। यह कंपनी सुअर और दूसरे पशुओं का मांस बड़ी मात्रा में बेचती है और इसका मांस खाने के बाद से ही मैक्‍सि‍को में 60 प्रति‍शत से ज्‍यादा लोगों में फ्लू , दमा,नि‍मोनि‍या आदि‍ के लक्षण पाए गए।

आरंभ में आम लोगों और मैक्‍सि‍को प्रशासन ने इसे गंभीरता से नहीं लि‍या और अप्रैल 2009 से यह संक्रामक बीमारी चल रही है और इसका वायरस उपरोक्‍त दवा कंपनी द्वारा मैक्‍सि‍को फरवरी 2009 में भेजा गया था। आज यह वायरस सारी दुनि‍या को बेहाल और बेचैन कि‍ए हुए है। वैज्ञानि‍कों ने छह साल पहले इस तरह के वायरस के होने की संभावना पर रोशनी डालनी शुरू की थी। साथ ही यह भी अनुमान व्‍यक्‍त कि‍या गया था कि‍ उत्‍तरी अमेरि‍का में ही यह वायरस तेजी से फैल सकता है और यह सारा कार्य बड़े ही सुनि‍योजि‍त ढ़ंग से बहुराष्‍ट्रीय दवा कंपनि‍यां करती रही हैं और आज उनके पौ बारह हो गए हैं।

अमेरि‍का का सबसे ज्‍यादा मुनाफाखोर उद्याेग है दवा उद्योग। इस उद्योग के पास अमेरि‍की सरकार के पास जो जैवि‍क अस्‍त्रों का जो जखीरा है उसके इस्‍तेमाल के अनेक स्रोत भी हैं। अमेरि‍का से सारी दुनि‍या लंबे समय से मांग करती रही है कि‍ वह अपने जैवि‍क अस्‍त्रों को नष्‍ट कर दे। किंतु वह कि‍सी की भी सुनने को तैयार नहीं है और इसी जैवि‍क खजाने का जनता पर हमले और मुनाफाखोरी के लि‍ए बार-बार दुरूपयोग कि‍या जा रहा है। स्‍वाइन फ्लू के खि‍लाफ जंग को यदि‍ तात्‍कालि‍क बीमारी के खि‍लाफ जंग के रूप में लड़ा जाएगा तो इसके कोई बड़े परि‍णाम नहीं आएंगे। हम कुछ दि‍न स्‍वाइन फ्लू को भोगेंगे ,दवा खाएंगे और स्‍थि‍र हो जाएंगे, बाद में कोई और वायरस आएगा और हमें खाना शुरू कर देगा, बेहतर होगा कि‍ वि‍भि‍न्‍न राजनीति‍क दल और संगठन मि‍लकर जैवि‍क अस्‍त्रों के वि‍श्‍वव्‍यापी जखीरे को नष्‍ट करने और बहुराष्‍ट्रीय दवा कंपनि‍यों के गैर जि‍म्‍मेदाराना रवैयये के खि‍लाफ आम जनता को गोलबंद करें। दूसरा यह काम करें कि‍ सारी दुनि‍या में मांस के नि‍र्माण के जो बहुराष्‍ट्रीय कंपनि‍यों के जो कारखाने हैं ,उनसे हमारी दुकानों पर जो मांस दुनि‍या के एक कोने से दूसरे कोने में सप्‍लाई कि‍या जा रहा है उस पर पाबंदी लगायी जानी चाहि‍ए। मांस सप्‍लाई करने वाली बहुराष्‍ट्रीय कंपनि‍यां आज संक्रामक बीमारि‍यों का सबसे बड़ा स्रोत हैं इनके खि‍लाफ आम लोगों को जागरूक करने की जरूरत है। इन कंपनि‍यों का मैकडोनोल्‍ड जैसी फास्‍ट फूड कंपनि‍यों के साथ समझौता है जि‍नके जरि‍ए यह मांस और संक्रामक तत्‍व आसानी से हम तक पहुंच रहे हैं।

मंगलवार, 4 अगस्त 2009

स्‍वाइन फ्लू : बहुराष्‍ट्रीय दवा कंपनि‍यों का लालची खेल और मीडि‍या

पूना में 14 साल की एक लड़की की स्‍वाइन फ्लू के कारण मौत हुई है। इस लड़की की असामयि‍क मौत नि‍श्‍चि‍त रूप से दुखद घटना है। जब से स्‍वाइन फ्लू आया है तब से इसका व्‍यापक प्रचार हो रहा है। कि‍सी और बीमारी को इतना व्‍यापक कवरेज नहीं मि‍ल रहा। इसके पहले सि‍र्फ एडस को व्‍यापक कवरेज मि‍ला था। स्‍वाइन फ्लू को मि‍लने वाले व्‍यापक कवरेज का रहस्‍य क्‍या है ,क्‍या सचमुच में मीडि‍या का रूझान वि‍कासमूलक हो गया है अथवा इसका रहस्‍य कुछ और है।

स्‍वाइन फ्लू के नाम पर मीडि‍या लोगों को सचेत कम और भयभीत ज्‍यादा कर रहा है। सारी दुनि‍या में स्‍वाइन फ्लू के मात्र 1,34,503 मरीज पाए गए हैं।इससे मरने वालों की संख्‍या 816 है। भारत में मात्र 558 केस पाए गए हैं। इनमें 470 मरीज अस्‍पताल से स्‍वस्‍थ होकर घर वापस जा चुके हैं। इतनी कम मात्रा में मरीज होने के बावजूद मीडि‍या ने जि‍स तरह का हल्‍ला मचाया हुआ है,वह चि‍न्‍ता की चीज है।

स्‍वाइन फ्लू के बारे में जि‍स तरह का हंगामा मीडि‍या ने मचाया है वैसा हंगामा वह अन्‍य कि‍सी बीमारी को लेकर नहीं करता। दूसरी बात यह कि‍ आमतौर पर प्रति‍दि‍न हजारों लोगों को फ्लू होता रहता है। मीडि‍या के पास स्‍वाइन फ्लू के बारे में अभी तक प्रमाण नहीं हैं। जैसा साधारण तौर पर डाक्‍टर कहते हैं,वैसा ही मीडि‍या रि‍पोर्ट कर देता है। अगर यह स्‍वाइन फ्लू है तो इसे संक्रामक तौर पर फैलने में ज्‍यादा समय नहीं लगेगा। यदि‍ यह संक्रामक शक्‍ल नहीं लेता और इसे समय रहते नि‍यंत्रि‍त कर लि‍या जाता है तो सारी स्‍थि‍ति‍यां सही हो जाएंगी। स्‍वाइन फ्लू के बारे में वि‍श्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन ने जि‍स तरह का गैर जि‍म्‍मेदाराना और कारपोरेट परस्‍त रवैयया अपनाया है वह चि‍न्‍ता की बात है।

वि‍श्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन के साथ फार्मास्‍युटि‍कल कंपनि‍यों का गहरा रि‍श्‍ता है। ये कंपि‍नयों अपने तारनहार के रूप में वि‍श्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन को देख रही हैं। स्‍वाइन फ्लू के बारे में यूरोप और तमाम पश्‍चि‍मी देशों के संदर्भ में सभी भवि‍‍ष्‍यवाणि‍यां गलत साबि‍त हुई हैं। उल्‍लेखनीय है कि‍ मैक्‍सि‍को को भूमंडलीकरण की प्रयोगशाला माना जाता है और स्‍वाइन फ्लू भी वहीं से सारी दुनि‍या में फैला है। यानी जि‍स तरह भूमंडलीकरण का मैक्‍सि‍को को परमतीर्थ माना जाता है वैसे ही स्‍वाइन फ्लू का भी यह परम तीर्थ है।

स्‍वाइन फ्लू का जब से आगमन हुआ है,बहुराष्‍ट्रीय दवा कंनि‍यों के पौ- बारह हो गए हैं। मसलन् ब्रि‍टि‍श दवा कंपनी ग्‍लैक्‍सो स्‍मि‍थ क्‍लीनी को 16 देशों में 195 मि‍लि‍यन खुराक की दवा सप्‍लाई के ऑर्उर मि‍ल चुके हैं, बाकी पचास देशों के साथ बात चीत चल रही है। इस कंपनी ने इनफ्लुएंजा की दवा उत्‍पादन क्षमता कई गुना बढ़ाने का फैसला भी कि‍या है। इसके अलावा अन्‍य कई दवा कंपनि‍यां हैं जो स्‍वाइन फ्लू की दवा बनाकर बाजार में लाने जा रही हैं। जब भी कभी कि‍सी बीमारी के बारे में मीडि‍या हल्‍ला मचाना शुरू करता है तो हमें यह देखना चाहि‍ए कि‍ आखि‍रकार इस बीमारी से कौन लाभान्‍वि‍त होने वाला है। मीडि‍या के द्वारा कि‍सी बीमारी के बारे में तेज प्रचार अभि‍यान महज खबर देने के मकसद से नहीं कि‍या जाता बल्‍कि‍ प्रचार अभि‍यान का मकसद होता है कि‍सी कंपनी वि‍शेष को लाभान्‍वि‍त करना। ये दवा कंपनि‍यां अपने छद्म लेखकों और चाकर वैज्ञानि‍कों के जरि‍ए पत्र पत्रि‍काओं में इस कदर हंगामा खडा करती हैं कि‍ आम आदमी भयाक्रांत हो जाता है। सरकारें डरने लगती हैं।

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