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सोमवार, 8 अगस्त 2016

शिक्षा और अंधविश्वास

       हमारे नेता आए दिन कहते हैं देश का विकास करना है तो देश को शिक्षित करना होगा।हमारा मन इस बात को ग्रहण करने में हिचकता है। शिक्षितों में बहुत बड़ी संख्या उन लोगों की है जो अंधविश्वास में आकंठ डूबे हुए हैं,स्वतंत्र बुद्धि और विज्ञान से जिनको नफरत है।शिक्षा से यदि इस तरह के मनुष्यों का निर्माण होता है तो भगवान बचाए ऐसी शिक्षा और शिक्षितों से।देश के विकास का यह सबसे घटिया समाधान है इसे हम मानने को तैयार नहीं हैं। यह विकास के नाम पर अंधकार जगत में ले जाने की कोशिश है।

हमारे समाज के अधिसंख्य लोगों ने प्रचलित विश्वासों और चिरागत प्रथाओं के सामने पूरी तरह आत्म- समर्पण कर दिया है।इन दिनों शिक्षित और अशिक्षित के बीच में प्रचलित अंधविश्वास में कितना अंतर रह गया है,इस पर रवीन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा, " हममें और अशिक्षित लोगों में केवल इतना ही प्रभेद रह जाता है कि वे अपने अन्धविश्वास के कारण बेखटके सोए रहते हैं,और हम आत्म-विस्मृत होकर अफ़ीम की नींद में पड़े रहते हैं,हम कुतर्क द्वारा अपनी लज्जा बचाना चाहते हैं,जो काम जड़ता या कायरता के कारण करते हैं उसके लिए सुनिपुण या अनिपुण व्याख्या तैयार करते हैं और यह दिखाते हैं कि वह काम वास्तव में गर्व का विषय है।लेकिन वकालत के जोर से दुर्गति को छिपाया नहीं जा सकता।"

रवीन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा जिस देश के लोग शीतला-माता को चेचक का कारण समझकर निष्क्रिय बैठे रहते हैं,उस देश में शीतला देवी का आसन भी जम जाता है और चेचक जाने का नाम नहीं लेती।वहाँ शीतला माता मानसिक परवशता का प्रतीक है,बुद्धि के स्वातन्त्र्य-नाश का कुत्सित लक्षण है।



सोमवार, 11 जुलाई 2016

मध्यवर्गीय सामाजिक संकीर्णतावाद और उग्रवाद

         भारतीय मध्यवर्ग में सामाजिक संकीर्णतावाद इन दिनों चरम पर है। हर रंगत,जातीयता और धर्म के लोगों में इसे सहज ही देख सकते हैं। मध्यवर्ग में यह संकीर्णतावाद सबसे पहले सामाजिक आचार-व्यवहार में दाखिल हुआ,बाद में उसने राजनीति में अपने को अभिव्यक्त किया।मध्यवर्ग के जो लोग सामाजिक संकीर्णतावाद को पालते-पोसते रहे हैं,वे ही राजनीति में साम्प्रदायिक-उग्रवादी-आतंकी-पृथकतावादी भावों –विचारों की ओर मुखातिब हुए। यही वह मध्यवर्ग है जिसने बडे पैमाने पर विभिन्न रंगत के उग्रवादी राजनीतिक रूझानों को सामाजिक आधार प्रदान किया। जो लोग यह सवाल कर रहे हैं कि शिक्षित परिवारों के बच्चे आईएस में कैसे जा रहे हैं ॽ वे जरा गौर करें सभी किस्म के उग्रवादी राजनीतिक विचारों को इसी वर्ग के युवाओं ने अपनाया।उग्रवादी विचारों की ओर मध्यवर्ग के युवाओं का रूझान सामाजिक संकीर्णतावाद की स्वाभाविक राजनीतिक प्रतिक्रिया है।इसी वर्ग के युवाओं को हमने देश के विभिन्न पृथकतावादी ,साम्प्रदायिक और आतंकी संगठनों में बड़ी संख्या में उत्तर- पूर्व के राज्यों से लेकर पंजाब तक,कश्मीर से लेकर तमिलनाडु तक देखा है।मिलिटेंसी वस्तुतःमध्यवर्गीय सामाजिक संकीर्णतावाद की राजनीतिक अभिव्यक्ति है।आज वही सबसे बड़ा हिन्दुत्ववादी है जो सामाजिक संकीर्णतावादी है।

आजाद भारत में मध्यवर्ग में सामाजिक संकीर्णतावाद सबसे पहले बंगाली जाति में दाखिल हुआ और यही वजह है कि सबसे पहले नक्सलवाडी आंदोलन में उसने अपने को अभिव्यक्त किया,बंगाली जाति विचारों और सामाजिक संस्कारों में उदार थी,इस उदारता को सबसे गहरी चुनौती नक्सलवाड़ी ने दी,बंगाल के नवोदित आजाद मध्यवर्ग के युवाओं के एक बड़े वर्ग ने सभी किस्म के उदारतावादी विचारों और राजनीति को ठुकराते हुए नक्सलवाड़ी का रास्ता चुना इसके कारण बड़े पैमाने पर बंगाली युवा तबाह हुआ,सैंकड़ों युवाओं को एनकाउंटर और राजनीतिक मुठभेड़ों के जरिए मौत के घाट उतार दिया गया।अफसोस की बात है कि हमने मध्यवर्ग के अंदर पनप रहे सामाजिक संकीर्णतावाद को कभी प्रमुख मुद्दा ही नहीं बनाया।

      आज स्थिति यह है कि बंगाली मध्यवर्ग पूरी तरह क्षत-विक्षत अवस्था में है।उसने अपराधीदलों के सामने पूरी तरह समर्पण कर दिया है।जिन इलाकों में क्रांति थी वहां माफिया वर्चस्व है।नक्सलवाडी तस्करी का केन्द्र है। तमाम किस्म के दो नम्बरी कामों में मध्यवर्ग का बहुत बड़ा हिस्सा फंसा पड़ा है। चिटफंड का धंधा,जबरिया पैसा वसूली, राजनीतिक आतंक, बाल विवाह,स्त्री शिक्षा का अभाव,औरतों की बिक्री, मध्यवर्ग का पलायन,सलासी खाप पंचायतों के उत्पीडन, नवोदित मध्यवर्गीय नेपाली जाति में उग्रवादी रूझान,तमाम किस्म अंधविश्वासों और संतों की बाढ़ आदि इसके व्यापक फलक को समेटे हैं। इन सबका ग्राफ क्रमशःबढ़ा है।बंगाली जाति की समूची भद्र अस्मिता का अब लंपट –उग्रवादी अस्मिता में रूपान्तरण हो चुका है।अफसोस की बात है बंगाल में इस सबको कभी चुनौती नहीं दी गयी।इसका दुष्परिणाम यह निकला है कि बंगाली जाति को आज कोई पहचान ही नहीं सकता।उसकी अस्मिता को संकीर्णतावाद के दुर्गुणों ने हजम कर लिया है। इन दुर्गुणों को बंगाली मध्यवर्ग के बुद्धिजीवियों ने कभी चुनौती नहीं दी,यहां तक कि अखबारों में कभी इन समस्याओं पर गंभीरता से लेख तक नहीं लिखे गए।

सोमवार, 31 अगस्त 2015

अपराध और अपराधी मध्यवर्ग-


      अपराध और अपराधी का कोई वर्ग नहीं होता,इसके बावजूद यह जानना समीचीन होगा कि आखिरकार इस दौर में अपराधी किस वर्ग में सबसे ज्यादा पैदा हो रहे हैं और कानून का वे किस तरह दुरुपयोग कर रहे हैं। नए आंकड़ों और मीडियायथार्थ की रोशनी में हमें अपराधी के वर्गचरित्र को भी चिह्नित करना चाहिए। मसलन्,मध्यवर्ग में सबसे ज्यादा टैक्सचोर हैं,मध्यवर्ग  में सबसे ज्यादा ह्वाइटकॉलर अपराधी हैं,दहेज उत्पीड़न,स्त्री-उत्पीड़न और साइबर अपराधी सबसे ज्यादा मध्यवर्ग में है,स्थिति यह है कि आईपीएल से लेकर बीपीएलकार्ड स्कैंडल तक,मनरेगा से लेकर खनन माफिया तक, ड्रग माफिया से लेकर बर्बर क्राइम के क्षेत्रों तक मध्यवर्ग का जाल फैला हुआ है।आतंकवाद-साम्प्रदायिकता और पृथकतावादी हिंसाचार में भी मध्यवर्गीय युवाओं का एक बड़ा अंश लिप्त है।  मध्यवर्ग के इस व्यापक बर्बर-अपराधी चरित्र की अनदेखी करके भारत के बुर्जुआजी और उसके द्वारा निर्मित शिक्षा व्यवस्था की भूमिका को सही परिप्रेक्ष्य में समझना मुश्किल है।
     मध्यवर्ग के आपराधिक चरित्र का चरमोत्कर्ष है यूपीएससी निर्मित अफसरों की एक अच्छी-खासी तादाद का विभिन्न किस्म के क्राइम में लिप्त पाया जाना। उनके किस्से आए दिन मीडिया में हमारे सामने आते रहते हैं।इसके अलावा नए व्यापारियों के रुप में उभरते मध्यवर्ग में भी क्राइम दर तेजी से बढ़ी है। इस सबने मध्यवर्ग के आपराधिक चरित्र को पुख्ता किया है। आज स्थिति यह है कि अपराध का कोई क्षेत्र नहीं है जहां शिक्षित मध्यवर्ग का वर्चस्व न हो।
    अपराधी मध्यवर्ग तो मीडिया का सबसे बड़ा खाद्य है।  मीडिया में जब भी अपराधी मध्यवर्ग के किसी व्यक्ति का कवरेज आता है वह सबसे ज्यादा दर्शक खींचता है। यही वजह है अपराध कार्यक्रम सबसे अच्छी रेटिंग में चल रहे हैं। यही वह परिप्रेक्ष्य है जिसमें हमें शीना बोरा हत्याकांड के कवरेज को देखना चाहिए। अब तक का कवरेज हत्या किस तरह की गयी,कैसे की गयी इसके विवरण और ब्यौरों से भरा पड़ा है। मीडिया की दिलचस्पी हत्या की प्रक्रिया को बताने में है ,वह अन्य पहलुओं को उजागर करने में कोई रुचि नहीं दिखा रहा। हत्या के तरीकों का बार-बार रुयायन अंततः अपराध के प्रति सहिष्णुभाव पैदाकरता है,अपराध को नॉर्मल, सहज,सहनीय बनाता है। कायदे से न्याय और दण्ड पर जोर होना चाहिए लेकिन न्याय और दण्ड में किसी भी टीवी चैनल की दिलचस्पी नहीं है।     
     दिलचस्प बात यह है कि इस हत्या को किसी ने खोजा नहीं है,हत्या क्यों हुई और कैसे हुए,इसके बारे में ड्राइवर ने 3साल बाद थाने में जाकर बताया है। मीडिया से लेकर पुलिस तक सभी हत्या के पीछे निहित मंशा को खोज रहे हैं। उसके प्रमाण खोज रहे हैं। इस हत्या ने एकबार फिर से परिवार नामक संस्था को कलंकित किया है। इस घटना ने यह संदेश दिया है कि हमारा समाज और परिवार किस तरह बर्बर और मूल्यहीन हो गया है।  इस हत्या ने यह तथ्य भी उजागर किया है कि हमारा मध्यवर्ग किस तरह झूठ-फरेब और अपराधीकरण में मशगूल है और समाज में उसे सम्मान भी मिल रहा है। यह वह वर्ग है जो अपराध करने बावजूद अपराधी नहीं है,सम्मानित है,वह समाजीकरण की प्रक्रिया के जरिए समाज में सम्मान पा रहा है।हमारे अंदर इस वर्ग के प्रति,इसके सड़े हुए मूल्यों के प्रति घृणा पैदा नहीं हो री बल्कि किसी न किसी रुप में सम्मान का भाव है। इस तरहके अपराध की रिपोर्टिंग घृणा का संचार नहीं करती बल्कि जिज्ञासा का संचार करती है। फलतःवह वैधता प्राप्त कर लेती है।      
       शीना बोरा की मौत सामान्य नहीं है,बल्कि असामान्य है। कम से कम यह बात तो हम कह ही सकते हैं कि समाज में इस तरह का माहौल बन गया है लड़की अपने घरवालों के बीच में भी सुरक्षित नहीं है। सामान्यतौर पर घर को लड़की के लिए सबसे सुरक्षित स्थान माना जाता था लेकिन शीना की हत्या ने एकबार यह तथ्य पुष्ट किया है कि हमारे घर और परिवारीजन हत्यारे गिरोह बनकर रह गए हैं। इन हत्यारे गिरोहों को हम बार –बार अपराध करते देखते हैं और इसके बावजूद हमारे मन में परिवार जैसी संस्था को लेकर  सवाल पैदा नहीं हो रहे,परिवार हमारे लिए अभी भी परम-पवित्र संस्था बनी हुई है। परिवारीजन पुण्यात्मा बने हुए हैं। शीना की हत्या को हम यदि व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखकर देखें तो चीजें शायद बेहतर ढ़ंग से नजर आएं।

        परिवारीजननों के द्वारा लड़कियों की विभिन्न बहाने से हत्याएं,बलात्कार,शारीरिक उत्पीड़न और गुलामों जैसी अवस्था को देखकर भी हमें कभी भी गुस्सा नहीं आता,हम कामना नहीं करते कि यह परिवार और उसका क्रिमिनल ढ़ाँचा नष्ट हो। हम बार –बार इस क्रिमनल पारिवारिक ढ़ाँचे और क्रिमिनल पारिवारिक संबंधों को किसी न किसी बहाने बनाए और बचाए रखना चाहते हैं । यही वह बिन्दु है जहां पर सबसे ज्यादा प्रतिवाद करने की जरुरत है। 

मंगलवार, 6 जनवरी 2015

आरएसएस का मिथकीय माया संसार

        आरएसएस की सबसे बड़ी वैचारिक मुश्किल यह है कि वह मिथकों को ही जीवन का सर्वस्व मानता है। समस्त सांस्कृतिक-राजनीतिक-आर्थिक समस्याओं के समाधान मिथकों में ही खोजता है। संघियों का दिमाग या तो विकसित नहीं है या फिर धूर्त है ! सामाजिक विकास के वास्तविक कारकों को ये लोग देखने की कोशिश ही नहीं करते। इनकी समग्र गतिविधियां देखते हुए लगता है ये धूर्त हैं और आम जनता की पिछड़ीचेतना का शोषण करने के लिए मिथकों के तर्कजाल को फेंकते रहते हैं। आरएसएस के मोहपाश में फंसे शिक्षित मध्यवर्ग में बड़ा हिस्सा उन लोगों का है जो शिक्षित तो है लेकिन शिक्षित होने का अर्थ तक नहीं जानता। शिक्षित वह होता है जिसमें य़थार्थ देखने की चेतना हो, यथार्थ के कारक तत्वों को खोजने की जिसमें जिज्ञासा हो और निजीचेतना और सामाजिकचेतना को युगानुरुप बदलने की जिसमें दिलचस्पी हो। संयोग की बात है संघीचेतना से बंधा मध्यवर्ग सामाजिक और निजी परिवर्तन की प्रक्रिया से अनभिज्ञ है या फिर उसमें चेतना परिवर्तन की आकांक्षा और क्षमता का अभाव है। संघ से बंधे मध्यवर्ग में एक तबका अवसरवादी भी है जो जानता है कि संघ झूठ बोल रहा है लेकिन राजनीतिक-आर्थिक स्वार्थ के कारण वे उससे जुड़े हुए हैं। इससे सामाजिक परिवर्तन बाधित हुआ है, संघ का वैचारिक रुपान्तरण बाधित हुआ है।फलतः संघ में किसी भी किस्म की मौलिक परिवर्तनेच्छा पैदा ही नहीं हुई। संघ की समूची कार्यप्रणाली, नीतियां और आचरण देखकर यही लगता है कि उन्होंने मिथकों में जीने का मार्ग सचेत रुप से चुना है। संघ के लिए मिथक ही विज्ञान है, राजनीति ,नीति ,समाजनीति , जीवनमूल्य,जीवनशैली आदि है। उनके जितने भी तर्क हैं वे सब मिथककेन्द्रित हैं। संघ के मिथककेन्द्रित चिन्तन का सबसे घातक परिणाम है यथार्थ से अलगाव। यथार्थ से अलगाव के कारण वे न तो प्राचीन भारत को ठीक से देख पाते हैं और नहीं मध्यकालीन भारत को देख पाते हैं। आधुनिक भारत का प्रत्येक आधुनिक विचार उनको नापसंद है। 



संघ की विचारधारा यथार्थ से अलगाव को बढ़ावा देती है। वे जिस समाज में रहते हैं उसके विकास की प्रक्रियाओं और सामाजिक नियमों,नीतियों आदि पर बातें नहीं करते,वे हमेशा अतीतजीवी की तरह अतीत में भ्रमण करते हैं। अतीत को भी वे पुराणकथाओं और अविवेकवाद के आलोक में देखते हैं। फलतः वे न तो सही ढ़ंग से अतीत को देख पाते हैं और न वर्तमान की समस्याओं को ही देख पाते हैं। यह काम वे शातिर ढ़ंग से करते हैं। जिससे वे आम जनता को अपने मिथककेन्द्रकित मायासंसार में बांधे रखें। मिथककेन्द्रित माया संसार शासकवर्गों का और खासकर लुटेरेवर्गों का सबसे बड़ा रक्षा कवच होता है। यही वजह है कि सारी दुनिया में तकनीकी और विज्ञान का महाबिगुल बजाकर अंधाधुंध लूट मचाने वाली कंपनियां आरएसएस को खुलकर चंदा देती हैं और कारपोरेट मीडिया उसे जमकर कवरेज देता है। कारपोरेट घराने जानते हैं कि आरएसएस के नेता मूर्खतापूर्ण बातें कर रहे हैं ,वे जानते हैं कि सामाजिक अनुभव,विज्ञान और अन्य वैज्ञानिक प्रक्रियाएं उनके तर्कों के खिलाफ हैं, इसके बावजूद वे संघ को चंदा देते हैं, संघ के बंदे को पीएम बनाने में खुलकर मदद करते हैं, क्योंकि संघ एक बड़ा काम करता है ,वह आम जनता की चेतना में यथार्थ के प्रति अलगाववादीचेतना पैदा करता है। आम जनता यदि यथार्थ को अलगाववादी नजरिए से देखेगी तो उसे चीजें साफ और सीधी नजर नहीं आएंगी। यही वजह है प्रत्येक संघी नेता के बयान और राजनीतिक यथार्थ में कभी भी कहीं पर भी सामंजस्य नजर नहीं आता । यथार्थ और राजनीति,यथार्थ और समाज,यथार्थ और संस्कृति,यथार्थ और विज्ञान आदि सवालों पर संघ के समस्त मुहावरे,नारे,भाषण ,आचरण आदि यथार्थ से अलगाव और मिथककेन्द्रित नजरिए पर टिके हैं। हमें यह बात समझनी होगी,मिथक तो यथार्थ नहीं है। मिथक तो मिथक है। हमारा समाज ,यथार्थ में जीता है, मिथक में नहीं जीता। यहां तक कि संघी नेताओं का जीवन भी यथार्थ में चल रहा है। ऐसी स्थिति में आमलोगों में बार-बार मिथकों का संघ के द्वारा प्रचार-प्रसार वस्तुतः समाज को पीछे धकेलने की सचेत साजिश है और इसमें एक हद तक उनको सफलता भी मिली है, क्योंकि हमारे शिक्षित मध्यवर्ग में संघ या ऐसे ही किसी संगठन के खिलाफ खड़े होने की सामाजिकचेतना अभी तक पैदा ही नहीं हुई है। मध्यवर्ग निडर होकर मिथकों के आर-पार जिंदगी देखने की समग्रदृष्टि अभी तक विकसित नहीं कर पाया है। संघ चालाकी के साथ मध्यवर्ग की इस कमजोरी का खुलकर फायदा उठा रहा है। जरुरत है इस मध्यवर्ग को मिथकों के बाहर आकर सोचने,यथार्थकेन्द्रित होकर सोचने की शक्ति प्रदान की जाय।

शनिवार, 3 जनवरी 2015

नायक का मोहपाश !

      
          पिछले दिनों मध्यवर्ग के जितने भी पढ़े-लिखे-ज्ञानी-गुणी लोगों से मिला हूँ,सब एक ही बात कहते मिले मोदीजी आए हैं तो सब अच्छा होगा! जल्दी विकास होगा! मोदीजी यह कर देंगे!वह भी कर देंगे! मैंने यह भी पाया कि मध्यवर्ग के लोग मोदी भक्ति का बखान करते –करते कुछ ही देऱ में भाव-विभोर और तर्कहीन हो जाते हैं ! मैं अमूमन भक्तों की प्रशंसाएं आनंद के साथ सुनता हूँ ! उनसे जब भी यह पूछता हूँ मोदीजी यह सब कैसे कर देंगे ? किन नीतियों के आधार पर कर देंगे तो कुछ ही क्षण बात प्रशंसक निरुत्तर हो जाते हैं! मोदी प्रशंसक मोदी से बहुत आशाएं लगाए बैठे हैं, लेकिन वे यथार्थ को देखना नहीं चाहते।मैंने कहा कि मोदी को तो यथार्थ देखकर काम करना पड़ेगा और यथार्थ तो वह सब नहीं कहता जो आप कह रहे हैं ,यह सुनकर प्रशंसक नाराज हो जाते हैं ! कहने लगते हैं आप तो हमेशा मोदी की खामियां बताते हैं, मैंने साफ कहा कि मैं खामियों की बात नहीं कर रहा , यथार्थ की बात कर रहा हूँ, प्रशंसक बोले मोदीजी में यह ताकत है कि वे यथार्थ को बदल देंगे !

जैसाकि अपना भी स्वभाव है अपन को प्रशंसकों में मजा आता है,वे चाहे मोदी के हों या मनमोहन सिंह-सोनिया के हों या कम्युनिस्ट हों ! प्रशंसकों से मिलने से अविवेकवाद की परतें और दायरे समझने में मदद मिलती है यही वजह है मैं प्रशंसकों से मिलना पसंद करता हूँ। प्रशंसकों से मिलकर मुझे ईश्वर भक्ति के दायरों का प्रसार भी नजर आता है ! मुझे वे क्षेत्र भी नजर आते हैं जहां पर नायकों की सृष्टि और मृत्यु होती रही है!

भारत की मध्यवर्गीय जनता में नायकों की खोज करने की अद्भुत क्षमता है, यह ऐसा मध्यवर्ग है जिसका अपनी क्षमता से ज्यादा नायक की क्षमता पर भरोसा है! अपने विवेक से ज्यादा नायक के विवेक पर विश्वास है! इसके लिए नायक महज नायक नहीं बल्कि सब चीजों की रामबाण दवा है ! यह इसी अर्थ में परनिर्भर और पराश्रित वर्ग है। इस वर्ग के जरिए मोदीजी हों या कोई और जी हों शक्तिशाली भारत का निर्माण नहीं कर सकते ! परनिर्भर-पराश्रित मध्यवर्ग कभी ताकतवर देश नहीं बना सकता।

जिस देश का शिक्षित मध्यवर्ग आज भी नायक खोजता हो!संत खोजता हो! भगवान खोजता हो! कंठी-ताबीज खोजता हो ।वह वर्ग देश को ताकतवर नहीं बना सकता ! जिस वर्ग को मोदी और पीके में समाधान दिखते हों उस वर्ग की रक्षा कोई नहीं कर सकता,वह वर्ग तो अभिशप्त है नायकों के मोहपाश में बंधे रहने के लिए !

सवाल यह है भारत का मध्यवर्ग नायक क्यों खोजता है ? यथार्थ में प्रवेश करना क्यों नहीं चाहता ? मध्यवर्ग के यथार्थ से अलगाव का मोदी की प्रचार मशीनरी ने जमकर दोहन किया है। मध्यवर्ग की विशेषता है कि वह समस्याओं के जटिल समाधान या जटिल विश्लेषणों में जाना नहीं चाहता, समस्या आई तो मंदिर की ओर भागता है,नेता के पास भागता है,दलाल की तलाश करता है,जिससे वह जल्दी टेंशन फ्री हो जाय। बहुत देर तक टेंशन में रहने की मध्यवर्ग को आदत नहीं है, यदि टेंशन जल्दी खत्म नहीं होती तो कोई नशा कर लेता है और टेंशन से मुक्त कर लेता है। वह किसी भी सामाजिक-सांस्कृतिक समस्या से उलझना नहीं चाहता,हर चीज का रेडीमेड समाधान चाहता है,समस्या का समाधान यदि मोदी दे रहे हैं तो वे नायक हैं,अन्ना हजारे दे रहे हैं तो वे नायक हैं,केजरीवाल दे रहे हैं तो वे नायक हैं! वह ठहरकर सोचना नहीं चाहता कि जिसको वह नायक मान रहा है क्या उसके पास समाधान है ? वह किसी भी नायक से नीति की बातें नहीं करता, हाल के वर्षों में हमने देखा कि मध्यवर्ग के लोग पागलपन की हद तक अन्ना-केजरीवाल-मोदी आदि के दीवाने थे, वे तर्क नहीं समाधान देख रहे थे, वे नीति पर नहीं मीडिया के शानदार कवरेज पर बातें कर रहे थे, वे अधीर हैं और जल्दी में हैं,उनके पास सोचने-समझने का समय नहीं है ,वे तुरंत रिजल्ट चाहते हैं! वे ऐसे नायक में अगाध विश्वास करते हैं जिसके पास तुरंत रिजल्ट देने की जादुई क्षमता हो ! काश, नायक रेडीमेड समाधान दे पाते !







रविवार, 5 अक्टूबर 2014

आधुनिक गुलाम की हरकतें

      कलात्मक मीडिया पर्सुएशन कला आधुनिक दास समाज की कुंजी है। पहले गुलाम बनाए जाते थे अब गुलाम बने-बनाए मिलते हैं। पहले गुलामों पर मालिक का शारीरिक नियंत्रण होता था,इन दिनों गुलामों पर मालिक शारीरिक और मानसिक नियंत्रण रखते हैं। गुलाम भाव सबसे प्रियभाव है। यह ऐसा भाव है जिसका सामाजिक स्तर पर व्यापक उत्पादन और पुनर्रुत्पादन हो रहा है। नव्य- पूंजीवाद के मौजूदा दौर में मालिक का नौकर के शरीर और मन पर पूरा नियंत्रण रहता है। काम के घंटे अब आठ नहीं होते बल्कि 10,12,या 16 घंटे तक कर्मचारी से काम लिया जाता है। इस कर्मचारीवर्ग में एक बड़ा समूह ऐसे कर्मचारियों का है जिसकी नौकरी अस्थायी है ,जो ठेके पर काम करता है।जो चंचल मजदूर है। लेकिन गुलाम भाव में जीने वाले कर्मचारियों में एक बड़ा समूह उन लोगों का भी है जो पक्की नौकरी करते हैं , मोटी पगार पाते हैं। येन-केन प्रकारेण सत्ताधारी वर्ग से चिपके रहना इनके स्वभाव का अंग है। इस समूचे समुदाय में तानाशाही के प्रति स्वाभाविक रुझान है। यही वह वर्ग है जो जीवन में पोंगापंथ,अंधविश्वास और उपभोक्तावाद का सबसे बड़ा उपभोक्ता भी है। इस वर्ग में परजीविता कूट-कूटकर भरी हुई है। खोखली बातें,खोखले जीवन मूल्य,खोखली राजनीति,खोखला कम्युनिकेशन इस वर्ग के मुख्य आदतें हैं।

इस वर्ग में गुलाम भाव के प्रति जबर्दस्त अपील है।यह बिना किसी दबाव के हमेशा सत्ताधारी वर्गों के दबाव और अनुकरण में रहता है। यह वर्ग विवेक से कम और मीडिया पर्सुएशन से ज्यादा प्रभावित होता है। मीडिया इस वर्ग का उस्ताद है और पर्सुएशनकला इसकी कमजोरी है। पर्सुएशन कला की महत्ता तब और नजर आती है जब किसी नए माल की बाजार में बिक्री सुनिश्चित करनी हो या किसी राजनीतिक प्रचार अभियान को सफल बनाना हो। इस पद्धति का प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रभावशाली ढ़ंग से इस्तेमाल किया है। 'स्वच्छ भारत अभियान' इसका आदर्श नमूना है। मसलन् एक शिक्षक-कर्मचारी की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह नियत काम को नियत समय पर पूरा करे, लेकिन एक बड़ा अंश है जो परजीवी है और नियत समय पर काम न करने की मानसिकता में रहता है।यही निकम्मावर्ग है जिसको हांकने में नरेन्द्र मोदी को द्रविड़-प्राणायाम करना पड़ रहा है।यही वह वर्ग है जो समय पर दफ्तर नहीं जाता,समय पर कक्षाएं नहीं लेता,समय पर बाकी अकादमिक और गैर अकादमिक काम नहीं करता। यही वह वर्ग भी है जो मोदीभक्त भी है।इसमें ही बड़ी संख्या में मोदी के कर्मचारी मतदाता भी हैं,ये ही वे लोग हैं जिनको मोदी अपने मीडिया रुतबे से प्रभावित और सक्रिय कर रहे हैं।

आधुनिक गुलामभावबोध का दिलचस्प आलम यह है कि जो कर्मचारी कभी समय पर नहीं आता,अथवा जो विश्वविद्यालय शिक्षक कभी विभाग की मीटिंग में बार-बार बुलाने पर भी नहीं आता, समय पर कक्षाएं लेने नहीं आता, वह 'स्वच्छ भारत' अभियान के दिन नियत समय से काफी पहले विश्वविद्यालय प्रांगण में पहुँच गया और सफाई के फोटोशूट में शामिल होने के लिए बेताब नजर आ रहा था। इस पूरी समस्या के अनेक आयाम हैं लेकिन इसमें प्रमुख है परजीविता और गुलाम भावबोध। ये ही आधुनिक गुलाम की जीवनशैली की धुरी हैं। हम सोचें कि क्या शक्तिशाली देश का निर्माण गुलाम भावबोध से संभव है ? कोई भी देश अपने विवेक की शक्ति से महान बना है।गुलामी मानसिकता से महान नहीं बना है।

रविवार, 29 जून 2014

कोलकाताचेतना नया फिनोमिना


       मैंने 1989 में कलकत्ता विश्वविद्यालय में नौकरी ली और वहां पढ़ाने गया तो दो-तीन दिन बाद स्टाफरुम में जेएनयू के दो पुराने मित्रों से मुलाकात हुई,एक राजनीतिविज्ञान में प्रवक्ता थे और दूसरे विज्ञान में। वे दोनों मिलकर बड़े खुश हुए ,लेकिन तत्काल बोले तुम दिल्ली छोड़कर यहां क्यों आए नौकरी करने ? कोलकाता कोई अच्छी जगह नहीं है। मेरे लिए उनका कथन चौंकाने वाला था।

दूसरी घटना यह घटी कि कोलकाता के दो स्वनाम धन्य हिन्दी शिक्षकों ने मेरे खिलाफ परिचय हुए बिना मोर्चा खोल दिया और रोज अखबारों में मेरे खिलाफ लिखाना आरंभ कर दिया । मेरे खिलाफ रोज एक नयी गॉसिप वे तैयार करके सप्लाई करते। उनके गॉसिप अभियान ने रंग दिखाया और आनंद बाजार पत्रिका से लेकर संडे मेल तक,यहां तक कि स्थानीय हिन्दी अखबारों में भी मेरा इन दो स्वनाम धन्य हिन्दी शिक्षकों ने यश फैला दिया। मजेदार बात थी कि ये दोनों शिक्षक मुझसे नियमित मिलते भी थे और सामने प्रशंसा करते पीछे से चुगली और निंदा करते। इस समूचे प्रकरण ने मुझे पश्चिम बंगाल के हिन्दीभाषी और बंगलाभाषी बुद्धिजीवियों को समझने के अनेक सूत्र दिए।

इस राज्य में हिन्दीभाषीचेतना मूलतः व्यक्तित्वहीनचेतना है। जिसकी अभिव्यंजना उन दो शिक्षकों में मिलती है जिनका मैंने जिक्र किया। विलक्षण बात है हिन्दीभाषी यहां व्यक्तित्व निर्माण नहीं कर पाए, अपनी अस्मिता का निर्माण नहीं कर पाए। बंगाली जाति अपनी अस्मिता बचाने के लिए जंग कर रही थी। अस्मिता के ह्रास और अभाव को इस तरह हिन्दीभाषी और बंगाली एक-दूसरे के पूरक की तरह झेल रहे थे।

जिन दो बंगाली शिक्षकों ने मेरे कोलकाता आने पर आश्चर्य व्यक्त किया था वे यह मान चुके थे कि कोलकाता एक चुका हुआ शहर है। इसमें विकास की संभावनाएं खत्म हो चुकी हैं। मैं उस समय वामचिंतन के असर में था लेकिन शहर और विश्वविद्यालय की दशा के साथ माकपा के नेताओं और खासकर शिक्षक नेताओं के रवैय्ये को देखकर अपने नजरिए को बदलने को मजबूर हुआ।

मैं जब कोलकाता आया था तो इस शहर का ह्रासकाल आरंभ हो गया था। शहर के ह्रासकाल में बुद्धिजीवियों .या फिर कहें मध्यवर्ग के लोगों में सबसे पहले भगदड़ मचती है ,वे नए शहरों की ओर भागते हैं। ह्रास के इस दौर में पहले मध्यवर्ग ने भागना आरंभ किया फिर गांवों से पलायन आरंभ हुआ।

वामशासन की विचारधारा आम जनता में स्थानीय मोह पैदा करने की बजाय स्थानीय अलगाव पैदा करने में सफल रही। वाम विचारधारा से स्थानीय अलगाव पैदा होता है यह बात मैंने यहीं पर आकर सीखी। मजेदार बात है कि जो वाम के साथ है वो ही बाहर जाने की कोशिश कर रहा है। जो वाम राजनीति कर रहा है वही कह रहा है चीजें बदल रही हैं,अपना राज्य अच्छा नहीं लग रहा। यहीं पर आकर मैंने कोलकाताचेतना के दर्शन किए इसे मैं पश्चिम बंगाल के लिए सबसे खतरनाक चेतना मानता हूँ।

कोलकाताचेतना के कारण ही जो बंगाली जाति एक जमाने में इस राज्य पर गर्व करती थी वही अब गर्व नहीं करती। वामशासन के बाद पश्चिम बंगाल के स्वाभिमान और आत्मनिर्भर भावबोध का क्षय हुआ और एक विलोम तैयार हुआ वह है कोलकाताचेतना। इस चेतना के लोग अब बाहर जाने के बाद कोलकाता लौटना नहीं चाहते। जो व्यक्ति एकबार यहां से निकल गया वह लौटकर वापस यहां आना नहीं चाहता। अपनी जमीन, अपने शहर, अपने परिवेश,अपनी भाषा,अपनी संस्कृति आदि से अलगाव कोलकाताचेतना की विशेषता है। बंगाली जाति को इस चेतना ने सामाजिक की बजाय व्यक्तिकेन्द्रित बना दिया। अब बंगाली जाति सामूहिक भावबोध की बजाय व्यक्तिगत भावबोध में डूब गयी। उनके लिए पश्चिम बंगाल रहने की नहीं कभी-कभार पर्यटन की जगह होकर रह गया। वामशासन के बाद कोलकाता में ही नहीं समूचे बंगाल में बुनियादी बदलाव आया उसने समूचे राज्य को देश के अन्यान्य क्षेत्रों में जाने के लिए मजबूर कर दिया। विकास की संभावनाएं खत्म होती चली गयीं उसके कारण मध्यवर्ग की आशाएं भी स्थानान्तरित होती चली गयीं।



पश्चिम बंगाल में वामशासन 1977 में आया उसके बाद चीजें तेजी से बदलीं इनमें सबसे बड़ी चीज बदली वह थी पश्चिम बंगाल की आत्मनिर्भरभावना। वाम के पहले यह राज्य आत्मनिर्भर राज्य था,वामशासन में आत्मनिर्भर भावबोध का चौतरफा ह्रास हुआ। आत्मनिर्भरता के अवसर इस शहर में कम होते गए। बाहर से आने वाले लोगों की संख्या कम होती गयी और बाहर जाने वाले लोगों की संख्या बढ़ती गयी।जो यहां रह गए उनमें सकारात्मक भावबोध की बजाय कुंठा-हताशा का विस्तार होता गया,उसका ही दुष्परिणाम है कि आज पश्चिम बंगाल सबसे ज्यादा निराशा में डूबा हुआ राज्य है। वाम आंदोलन,आक्रामक मार्क्सवाद,संगठनबद्ध समाज ने एक खास किस्म की घेरेबंदी आरंभ की जिसके कारण जो घेरे में है वह जीवित है जो घेरे के बाहर है वह परेशान है और भागने की तैयारी में है।

शनिवार, 20 जुलाई 2013

भारतीय मध्यवर्ग के वहशी रूप

              
भारत में मध्यवर्ग का तेजगति से पतन हो रहा है ।इतनी तेजगति से अन्य किसी वर्ग का पतन नहीं हुआ है। मध्यवर्ग के आदर्शनायक आईएएस -आईपीएस अफसरों में बहुत बड़ा समुदाय तैयार हुआ है जो आकंठ भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है। ये वे लोग हैं जिनके पास सब कुछ है।सबकुछ होते हुए भी ये क्यों भ्रष्ट हो रहे हैं ?
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भारत के मध्यवर्ग ने सामाजिक-आर्थिक शक्ति अर्जित करते ही सामाजिक-राजनीतिक दायित्वों और लोकतांत्रिक लक्ष्यों से अपने को सचेत रूप से अलग किया है।
अधिकतर मध्यवर्गीय शिक्षितलोग राजनीति को बुरा मानते हैं या भ्रष्ट राजनीति की हिमायत करते हैं या अधिनायकवादी या फासिस्ट राजनीति की हिमायत करते हैं।मध्यवर्ग का इस तरह का चरित्र बताता है कि भारत में संपन्नता जिन वर्गों में पहुंची है उनमें लोकतांत्रिक मूल्य अभी तक नहीं पहुंचे हैं।
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भारत में मध्यवर्ग में सांस्कृतिक परवर्जन तेजी से बढ़ा है। दुनिया के अनेक देशों में आधुनिककाल में वैज्ञानिकचेतना और स्वस्थ लोकतांत्रिक मूल्यों का मध्यवर्ग में विकास हुआ है ,लेकिन भारत में उलटी गंगा बह रही है। 
भारत के मध्यवर्ग में इन दिनों प्रतिगामिता की आंधी चल रही है। सेक्स से लेकर धर्म तक इसे सहज ही देखा जा सकता है। मध्यवर्ग में प्रतिगामिता के कारण इस वर्ग के बहशीयाना चरित्र की आए दिन परतें खुल रही हैं। 
आश्चर्य की बात है इस वर्ग के पतनशील मूल्यों पर हम सबने हमले करने बंद कर दिए हैं। प्रतिगामिता के साथ हमसब सामंजस्य बिठाकर जीने लगे हैं। मध्यवर्गीय प्रतिगामिता अब हमारे अंदर गुस्सा पैदा नहीं करती। यह स्थिति बदलनी चाहिए।
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मध्यवर्ग की पतनशीलता के तीन बड़े क्षेत्र हैं ,एक है स्त्री उत्पीड़न-शोषण , दूसरा है खुला भ्रष्टाचार और तीसरा है तिकड़मबाजी।

मध्यवर्ग के लोगों में शिक्षितों में आज स्त्री उत्पीड़न ,हिंसाचार,यौनशोषण आदि जिस तरह सतह पर आ गया है,उसने हमें सारी दुनिया में सभ्य कहलाने लायक नहीं छोड़ा। यही हाल भ्रष्टाचार का है। तिकड़मबाजी में तो मध्यवर्ग के नायक सबसे आगे हैं। इन तीनों प्रवृत्तियों को देखकर यही लगता है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था का मध्यवर्गीय मूल्य-संरचना पर सकारात्मक असर बहुत कम पड़ा है।

रविवार, 1 अगस्त 2010

मनमोहन के डिजिटल विभ्रम में चमकती गरीबी

       मनमोहन सिंह का दावा है कि वह विकास पुरूष हैं। विकासपुरूष का उनका विभ्रम सबको आकर्षित कर रहा है। विकास के नाम पर उन्होंने भौतिक आकांक्षाओं का विभ्रम पैदा किया है। कारपोरेट मीडिया को विकास के विभ्रम में कहीं कोई खोट नजर नहीं आ रहा। यदि कोई खोट दिखाने की कोशिश करता है तो उसे कारपोरेट मीडिया हूट करता है, हास्य-व्यंग्य का पात्र बना देता है। विकासविरोधी कहता है। विकास के विभ्रम का ऐसा विराट वायवीय तानाबाना तैयार किया गया है कि उसके अलावा कुछ भी सोचना संभव नहीं है।
     मनमोहन  कोड ने विकास के विभ्रम को मूलगामी परिवर्तन के साथ गड्डमड्ड कर दिया है। वह ऐसा विभम पैदा कर रहे हैं जो अनुभूतियां विकास की पैदा कर रहा है किंतु वास्तविकता सामाजिक पिछड़ेपन की निर्मित कर रहा है। मसलन ग्लोबलाइजेशन की आत्मगत अनुभूतियों ने ठोस वास्तविकता के साथ व्यापक अलगाव पैदा कर दिया है। इस क्रम में विभ्रम चमक रहा है और यथार्थ धुंधला पड़ गया है अथवा आम बातचीत से गायब हो गया है।
    मनमोहन कोड ने कु-यथार्थ की सृष्टि की है। कु-यथार्थ को ही हम यथार्थ समझने की भूल कर रहे हैं। यथार्थ को कु-यथार्थ में उलझा देना, विभ्रमों में व्यस्त रखना,विभ्रम को वास्तव के रूप में प्रचारित करना,एक ऐसी सच्चाई है जिसे हम डिजिटल परिप्रेक्ष्य के बिना समझ नहीं सकते।
    विकास विभ्रम को वास्तविकता नहीं बनाया जा सकता । विभ्रम कभी यथार्थ में तब्दील नहीं होता। वह विभ्रम ही रहता है। विभ्रम आत्मगत होता है और आत्मगत ही रहता है। लेकिन अब मनमोहन कोड के बहाने उलटा शास्त्र पढ़ाया जा रहा है आत्मगत को वस्तुगत बताया जा रहा है। लेकिन आत्मगत को वस्तुगत नहीं बनाया नहीं जा सकता। आत्मगत विभ्रम को वस्तुगत विभ्रम में रूपान्तरित नहीं किया जा सकता।
     वस्तुगत विभ्रम की कायिक उपस्थिति होती है। लेकिन मौजूदा डिजिटल जगत में किसी भी चीज की कायिक उपस्थिति नहीं होती। यहां कोई भी चीज मसलन औरत, सेक्स. कुर्सी,मेज कोई भी चीज कायिक तौर पर मौजूद नहीं रहती, ऐसे में विकास को हम कैसे कायिक तौर पर देख सकते हैं। अब कोई भी चीज वास्तव शक्ल में नहीं नजर आती। चीजें हमसे दूर रहती हैं। वे साथ ही साथ पास हैं,रीयलटाइम में हैं और साथ ही अति दूर भी हैं।
   विभ्रम के आंकड़ों का खेल देखिए टाहम्स ऑफ इण्डिया ( 1.8.10) में एक रिपोर्ट छपी है जिसमें नेशनल कौंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनोमिक रिसर्च की एक रिपोर्ट के हवाले से कहा गया है कि भारत में पहलीबार समृद्धों की संख्या गरीबों की संख्या से ज्यादा हो गयी है। रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2010 तक उच्च आयवर्ग के परिवारों की संख्या 46.7 मिलियन हो जाएगी। जबकि कम आय वाले परिवारों की संख्या 41 मिलियन आंकी गयी है। सन् 2001-02 में उच्च आयवर्ग के लोगों की आय सालाना 1.8 लाख रूपये थी। उस समय 65.2 मिलियन परिवार कम आयवर्ग की केटेगरी में आते थे। यानी उनकी सालाना आमदनी 45,000 रूपये प्रतिवर्ष थी। जबकि मध्यवर्ती आयवर्ग (45,000 हजार से 1.8लाख रूपये के बीच में ) में आने वाले परिवारों की संख्या एक दशक में 109.2 मिलियन से बढ़कर 140.7 मिलियन हो गई है। इसके विपरीत आर्थिक मंदी के कारण मध्य वर्ग के परिवारों की संख्या में गिरावट दर्ज की गई है।
     सन् 2007-08 में मध्यवर्ग की संख्या मध्यवर्गीय परिवारों की संख्या 135.9मिलियन थी जो सन् 2009-10 में बढ़कर 140.7 मिलियन हो गई। लेकिन समग्रता में मध्यवर्ग की संख्या में गिरावट दर्ज की गई है। इसी अवधि में मध्यवर्ग की संख्या 62 प्रतिशत से घटकर 61.6 प्रतिशत हो गई है। सर्वे बताता है कि निम्न और उच्च आयवर्ग के लोगों की आय पर मंदी का कोई असर नहीं हुआ है। इसका सबसे ज्यादा असर उच्च आयवर्ग के लोगों पर हुआ है, उनकी संख्या 16.8 प्रतिशत से बढ़कर 20.5 प्रतिशत हो गई। कम आय वाले परिवारों की संख्या में तेजी से गिरावट आई है।
    मंदी के विगत तीन सालों में कम आय वाले परिवारों की संख्या 21.1 प्रतिशत से घटकर 17.9प्रतिशत हो गई है। विश्व बैंक के अनुसार 2से10 लाख रूपये की आय वाले को मध्यवर्ग में रखा जा सकता है। ऐसे मध्यवर्ग की तादाद सन् 2009-10 में 28.4 मिलियन थी। जबकि 1995-96 में इस कोटि में 4.5 मिलियन लोग आते थे। सन् 2001-02 में यह संख्या बढ़कर 10.7 मिलियन हो गयी। भारत का दो-तिहाई  मध्यवर्ग शहरों में रहता है। भारत को दुनिया में सबसे ज्यादा बचत करने वाले देश के रूप में जाना जाता है। भारत का सकल घरेलू उत्पाद का 36 प्रतिशत बचत खाते में जाता है।
   इस आंकड़े की बाजीगरी से असली भारत नजर नहीं आएगा। सवाल यह है कि एक लाख अस्सी हजार सालाना कमाने वाला परिवार कहां रहता है ? क्या खाता है ? किस तरह के कपड़े पहनता है ? किस तरह की चीजें खरीदता है ? क्या उसके पास स्वाश्थ्य और शिक्षा पर खर्चा करने लायक कुछ बचता है ? क्या वह अपने लिए कभी भी कोई छोटा सा घर खरीद सकता है ? आदि सवाल हैं जिनके उत्तर खोजते ही भयावह यथार्थ सामने आएगा। वास्तविकता यह है कि ये वे लोग हैं जो ज्यादातर कच्ची गंदी बस्तियों या भाड़े के घरों में रहते हैं। इनमें से ज्यादातर की क्रय-शक्ति में लगातार गिरावट आई है। आय बढ़ी है यह बात मान भी लें तो यह बात विचार करनी चाहिए कि क्या उनकी क्रय-शक्ति बढ़ी है ? सच यह है कि मंहगाई और अन्य कारणों से उच्च और निम्न आयवर्ग के लोगों की क्रय-शक्ति घटी है। उनमें दरिद्रता बढ़ी है। इनमें से अधिकांश के पास पीने के साफ पानी और शौचालय की भी व्यवस्था नहीं है। ये लोग अपने बच्चों को पढ़ा नहीं पाते हैं। समुचित इलाज नहीं करा पाते हैं। ऐसे में यह दावा करना कि भारत में उच्च-आयवर्ग के लोगों की संख्या बढ़ी है,आमदनी बढ़ी है का दावा खोखला है। आमदनी बढ़ी है तो देखना होगा कि क्या क्रय क्षमता भी बढ़ी है या नहीं वरना तो यह आमदनी के बढ़ने का विभ्रम है। सच क्या है यह अपने आसपास के परिवेश को देखकर सहज ही समझ में आ सकता है।      
   






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