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November, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

गुमशुदा 39 के कवरेज से उठे सवाल

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एबीपी न्यूज ने इराक में आईएसआई के द्वारा अपहृत किए गए 40भारतीय मजदूरों पर कल (28जून 2014) एक बेहतरीन तथ्यपरक कार्यक्रम पेश किया। साथ में अपने चैनल की राय भी दी कि कार्यक्रम में प्रस्तुत तथ्यों की खासकर 39मजदूरों की हत्या की वह पुष्टि नहीं कर सकता। इसके बावजूद हमें इस कार्यक्रम से उठे सवालों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। यह सच है कि आम आदमी पार्टी के सांसद ने लोकसभा के पिछले सत्र में यह मसला सबसे उठाया था, उस समय किसी ने इस मसले की ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया,यहां तक कि विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ने भी आश्वासन देकर सारे मसले को ठंडे बस्ते के हवाले कर दिया। लेकिन कल के टीवी कवरेज ने इस मसले को जिंदा कर दिया है। इस मसले पर विदेशमंत्रालय अभी तक बयान नहीं दे पाया है।       स्थिति की भयावहता का अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि इन मजदूरों के अपहरण के प्रसंग का सरकार और उसका तंत्र निगरानी  कर रहा था, आतंकियों के चंगुल से भागे एक मजदूर से भी इराक स्थित दूतावास ने संपर्क किया, लेकिन इस समय वह मजदूर कहां है,कोई नहीं जानता ,साथ ही 39मजदूर किस अवस्था में हैं कोई नहीं जानता।  सरकार ने …

पाक अछूत नहीं है मोदीजी

सार्क देशों के नेपाल सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हाल ही में जो भाषण दिया उसमें उन्होंने एकबार भी पाकिस्तान का जिक्र नहीं किया। उन्हें श्रीलंका याद आया,नेपाल याद आया,बंगलादेश और मालदीव को उल्लेख योग्य समझा लेकिन पाकिस्तान का उन्होंने जिक्र तक नहीं किया। यहां तक कि 26/11की घटना का जिक्र किया, लेकिन न तो आतंकी संगठनों का कोई जिक्र किया और न पाकिस्तान का जिक्र किया। मोदी ने कहा ''आज जब हम 2008 में मुंबई में उस खौफनाक आतंकी घटना को याद करते हैं तो हमें अपने लोगों को खोने का कभी न खत्‍म होने वाला दर्द महसूस होता है। आतंकवाद और अंतर्राष्‍ट्रीय अपराधों से लड़ने के लिए हमने जो प्रतिज्ञा की है उसे पूरा करने के लिए हमें साथ मिलकर काम करना होगा।'' इन पंक्तियों के अलावा पूरे भाषण में आतंकवाद का कहीं कोई जिक्र नहीं है। 
मोदी जानते हैं कि दक्षिण एशिया के देशों में सबसे तनावपूर्ण संबंध भारत-पाक के बीच में हैं। इन तनावपूर्ण संबंधों को 'हठी राजनीति' के आधार पर सामान्य नहीं बनाया जा सकता। खासकर विदेशनीति के मामले में हठ नहीं चल सकता। विदेशनीति के तमाम चैनल औ…

फेसबुकिए मोदीभक्तों का कष्ट

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मोदी पर मेरे निरंतर लेखन से मोदीभक्त कष्ट में हैं,कुछ गैर मित्र भी परेशान हैं कि मैं मोदी पर इतना क्यों लिख रहा हूं,लोकतंत्र का तकाज़ा है कि नेताओं का और खासकर नीति निर्माता नेताओं की गतिविधियों और बयानों का रीयल टाइम में मूल्यांकन किया जाय| मीडिया पर मोदी के अनुकूल वातावरण बनाए रखने का अमीरों का भयानक दबाव है, इस दबाव का प्रत्युत्तर एक नागरिक के नाते ठोस राजनीतिक आलोचना-प्रत्यालोचना के जरिए ही दिया जा सकता है,इससे लोकतंत्र मजबूत होगा|  लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरुरी है कि संघ-भाजपा के नीतिगत प्रयासों को सीधे आलोचना के केन्द्र में लाएं, फेसबुक सशक्त माध्यम है और इस पर चलने वाली बहसों की नीति निर्माता अवहेलना नहीं कर सकते,फेसबुक में चलने वाली बहसें अनेक मसलों पर समाचार टीवी और अन्य माध्यमों को भी प्रभावित करती हैं,फेसबुक लेखन भडुआ लेखन न बने,फेसबुक मीडिया भडुआ मीडिया न बने इसके लिए जरुरी है कि इस पर जमकर देश-विदेश की राजनीति और संस्कृति पर बातें हों|
फेसबुक पर एकवर्ग ऐसे लोगों का है जिनके पास भडुआ मनोदशा है,वे इस माध्यम को भडुआ मीजिसम बनाने में लगे हैं,कुछ के लिए मात्र फोटो स्ट…

मिथ्या के संसार का मनुष्य

राजनीति से लेकर निजी जीवन के हर पहलु में अधिकतर लोग मिथ्या का इस्तेमाल करते हैं,मिथ्या असल में प्रौपेगैंडा है,वह बबंडर है,मिथ्या इस युग का सबसे गतिशील तत्व है| मिथ्या में मिथ बनाने और मिथों के दुरुपयोग की अपार शक्ति है,मिथ्या न हो तो जीवन नीरस हो जाता है| मिथ्या के आधार पर ही कल्पना और वायदे के पहाड़ खड़े किए जाते हैं|
लोकतंत्र ,बाजार और मीडिया तो मिथ्या के बिना चल ही नहीं सकता,परिणामत: मिथ्या में रमण करते हुए मनुष्य सत्य से विमुख हुआ है ,अनेक मामलों में सत्य से नफरत करने लगा है| समाज में एकवर्ग है जो मिथ्या को स्वाभाविक मानता है| सामान्यत: मिथ्या को जीवनशैली के रुप में इस्तेमाल करता है| इसके कारण ये लोग मेनीपुलेशन के कौशल में भी माहिर हो गए हैं| यही वजह है कि हर स्तर पर मेनीपुलेशन को जायज मानने लगे हैं|इसके परिणामस्वरुप राजनीति में मिथ्या को सच और सच को मिथ्या मानने लगे हैं| सरकारी संसाधनों के शोषण और लूट को विकास कहने लगे हैं| लोकतंत्र में शोषण और असमानता है लेकिन प्रचार का असर है कि हमें चीजों को उलटा देखते हैं|
झूठ बोलने और झूठा जीवन जीने की कला में हमारा मध्यवर्ग तो गुरु है| अध्य…

नरेन्द्र मोदी का झूठ और कंगारू छलांगें

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पारदर्शित में मजे ही मजे हैं। पारदर्शिता में आनंद की भरमार का प्रधान कारण है उनका सामंती मिज़ाज़ । सामंत या राजा जब भी कहीं जाते थे तो अपने मोरंजन के साधन भी साथ ले जाते थे ,अथवा उनके लिए स्थानीय स्तर पर मनोरंजन मुहैय्या कराया जाता था। आजाद भारत के इतिहास में किसी भी प्रधानमंत्री के साथ मनोरंजन करनेवाले दल नहीं गए और नहीं विदेशों में कूटनीतिक कामों के बाद भारत और भारतीयों की ओर से कोई मनोरंजन का कार्यक्रम ही रखा गया। मोदी इस अर्थ में पक्के सामंत हैं कि उन्होंने अपने हिन्दू राष्ट्रवादी होने का बार-बार विदेश के मंचों पर प्रदर्शन किया है, हिन्दू पंडे-पुजारियों-संतों आदि से किसी न किसी बहाने मिलने या आशीर्वाद लेने का मौका दिया , यह उनके हिन्दू-राष्ट्रवादी प्रकल्प का अंग है,वे संविधान के अनुसार धर्मनिरपेक्ष आचरण न करके विदेश में धर्म-सापेक्ष आचरण कर रहे हैं,यह हम सबके लिए चिन्ता की बात है। प्रधानमंत्री के नाते उनका धर्मविशेष के प्रति आग्रह खतरनाक है। वे निजी तौर पर किसी भी धर्म का पालन करने के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन प्रधानमंत्री के रुप में उनको धर्म के …

स्वाधीनता सेनानी कमला नेहरु

पंडित नेहरु के जीवन पर बातें हों और उनकी पत्नी कमला पर बातें न हों,यह हो नहीं सकता। विचारणीय पहलु यह है कि लेखक के नाते नेहरु को कौन सी चीजें कमला में रेखांकित करने की जरुरत पड़ी ? पहली चीज जिसे नेहरु मूल्यवान मानते हैं वह है इन्सानी रिश्ता। इन्सानी रिश्ते को राजनीति और अर्थशास्त्र की बहसों के बहाने नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। खासकर पति-पत्नी के संबंधों के बीच इन्सानी रिश्तों का एहसास रहना चाहिए।नेहरु ने रेखांकित किया है कि भारत और चीन में इन्सानी रिश्तों के एहसास को नजर-अंदाज नहीं किया गया। यह हमारी पुरानी अक्लमंद तहज़ीब की देन है। इंसानी एहसास व्यक्ति में संतुलन और हम-वज़नीपन पैदा करता है। नेहरु लिख रहे हैं कि इन दिनों यह एहसास कम हो गया है। इसी क्रम में नेहरु ने लिखा '' यक़ीनी तौर पर इसे मुमकिन होना चाहिए कि भीतरी संतुलन का बाहरी तरक्की से,पुराने ज़माने के ज्ञान का नये जमाने की शक्ति और विज्ञान से मेल क़ायम हो। सच देखा जाय, तो हम लोग दुनिया के इतिहास की एक सी मंज़िल पर पहुँच गए हैं कि अगर यह मेल न क़ायम हो सका,तो दोनों का ही अंत और नाश रखा हुआ है।'' न…

नेहरु का पत्नी प्रेम

व्यक्तित्व मूल्यांकन का आधार नैतिकता नहीं, नजरिया होना चाहिए।व्यक्ति के नजरिए और निजी जीवनशैली को जोड़कर देखना चाहिए। भारतीय परंपरा में नजरिए की उपेक्षा करके नैतिकता के आधार पर हमेशा सामंती और फासिस्ट ताकतें हमले करती रही हैं। ये ताकतें नेहरु को भी ऩिशाना बनाती रही हैं। नेहरु की आलोचना का कोई मुद्दा नहीं मिलता तो ये नैतिकता के ठेकेदार उनके निजी जीवन के मसलों पर हमले आरंभ कर देते हैं। हमारे यहाँ फेसबुक से लेकर तमाम किस्म के किताबी संस्मरणों तक नेहरुजी की निजी जिंदगी के पहलुओं के विकृतिकरण की खूब कोशिशें होती रही हैं। नेहरु जैसे बड़े व्यक्तित्व को देखने –समझने के लिए अभी हमारे देश में खुलकर विमर्श करने की जरुरत है। नेहरु के निजी पहलुओं को नेहरु के नजरिए के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए। मुश्किल यह है कि नेहरु पर हमले करने वाले, पहलु नेहरु का चुनते हैं, और नजरिया अपना जोड़ देते हैं ,और इस तरह वे नेहरु की 'कलंकगाथा' निर्मित करते हैं। नेहरु के व्यक्तित्व और आचरण से हम आधुनिक मूल्यों और मानवतावादी नजरिए को लेकर बहुत कुछ सीख सकते हैं। इस प्रसंग में पहली शर्त है कि व्यक्ति के रुप …

पंडित जवाहरलाल नेहरु के जन्मदिन पर विशेष- ''क्लिक कल्चर'' के प्रतिवाद में पंडित नेहरु

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नई डिजिटल कल्चर 'क्लिक कल्चर' है। 'क्विक' कल्चर है।इसने 'पुसबटन' और इमेज को महान और लोकतांत्रिक मूल्यों और विचारों को खोखला और निरर्थक बनाया है। सम्प्रति टीवी से लेकर फेसबुक तक अनेक संगठन और नेता इसके शैतान खिलाड़ी के रुप में खेल रहे हैं और भारत की मासूम युवापीढ़ी को इमेजों के जरिए दिग्भ्रमित करने में लगे हैं। 'क्लिक कल्चर' ने युवाओं के विवेक पर सीधे हमला बोला हुआ है।  कहा जा रहा है 'क्लिक ' इमेज ही सत्य है,विचार तो बकबास होते हैं,बोर करते हैं,कमाना मूल्यवान काम है,सोचना फालतू चीज है, व्यवहारवादी बनो,जनवादी मत बनो,  धर्मनिरपेक्षता फालतू चीज़ है,लोकतंत्र में रहो लेकिन लोकतांत्रिक मूल्यों के बिना। लोकतांत्रिक मूल्य तो बोझा हैं, वोट दो, लेकिन विवेकवाद के आधार पर सोचो मत, सार्थक है सिर्फ चुनाव जीतना। इस 'क्लिक कल्चर' के नायक इन दिनों पंडित नेहरु का भी 'क्लिक संस्कार' करने में मशगूल हैं।
     उल्लेखनीय है पंडित जवाहरलाल नेहरु देश के सामान्य प्रधानमंत्री नहीं थे, वे सामान्य राजनेता भी नहीं थे। आमतौर पर लोकतंत्र में नेता आते …

संघ का नया नारा 'क्लिक करो और गप करो''

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संघ का नया नारा है 'क्लिक करो और गप करो'', यह मूलतः इमेज अपहरण और असभ्यता का  नारा है। कैमरा इसकी धुरी है।  इसके तहत धर्मनिरपेक्षता और धर्मनिरपेक्ष नेताओं को हड़पने के सघन प्रयास हो रहे हैं। संघवालों की मुश्किल यह है कि वे  धर्मनिरपेक्षता पर हमला करते -करते थक गए हैं!मुसलमानों पर हमले करते-करते थक गए हैं ! अब वे उन क्षेत्रों में प्रवेश कर रहे हैं जहाँ से उनके खिलाफ वैचारिक प्रतिवाद आता रहा है। वे उन तमाम धर्मनिरपेक्ष नेताओं को 'अपना' बनाने में लगे हैं जिनके नजरिए और आचरण से उनका तीन-तेरह का रिश्ता है।
    संघ की 'क्लिक करो और गप करो''मुहिम में सीखने-सिखाने ,मूल्यांकन, विचार-विमर्श का कोई काम नहीं हो रहा,सिर्फ मीडिया इवेंट बनाने,मूर्तियाँ लगाने, शिलान्यास करने और मीडिया बाइट्स देने पर  जोर है। उनके अनुसार 'क्लिक करो और गप करो'' मुहिम का लक्ष्य है कैमरे में धर्मनिरपेक्ष नेताओं के साथ अपनी इमेज को प्रचारित-प्रसारित करो। हेकड़ी के साथ ,सीना ताने असभ्यों की तरह अपने को धर्मनिरपेक्ष नेताओं की इमेज के साथ पेश करो। संघवाले तर्क दे रहे …

'भाईयों' का लोकतंत्र

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दलालों की भाषा एक होती है,उनकी कर्म संस्कृति भी एक जैसी होती है।उसमें थोड़ा भाषिक अंतर होता है। दलाल बनाना और दलाल पालना हुनरमंदों के वश का काम नहीं है!यह काम तो सिर्फ 'बड़ा भाई'(कारपोरेट घराने) ही कर सकता है! दलाल को तो बस 'बड़ा भाई' ही संभाल सकता है! 'भाई' यदि खुद दलाल हो तो फिर तो कहने ही क्या जी! यह तो सोने में सुहागा हो गया! कश्मीर के एक पृथकतावादी नेता ने कल बड़ी ही गरमजोशी के साथ भगवारत्न से 7नम्बर में भेंट की, भेंट के बाद घर से बाहर निकलकर मीडिया से कहा कि वे तो मुझे ''भाई जैसे लगे'', जाहिर है ,'भाई' को तो 'भाई' ही पहचानेगा! कश्मीरी पृथकतावादी यदि किसी भगवानेता को 'भाई'कहे तो यह राजनीतिक तौर पर करेक्ट बयान है! इस बयान को हमें राजनीतिविज्ञान की सही स्प्रिट में ही लेना चाहिए!

मजेदार बात यह है कि ऩए स्वच्छता अभियान के दौर में 'स्वच्छता के आदर्श नायक' (साम्प्रदायिक,पृथकतावादी और वैदिकजी) एक-दूसरे देश से 'भाई' की तरह मिल रहे हैं,स्वच्छ राजनीति का यह आदर्श है! इसबार कश्मीर में 'भगवा वैदिक'' …

इक़बाल के नजरिए की मुश्किलें

अल्लामा इक़बाल उर्दू के प्रमुख शायरों में से एक हैं जिनकी शायरी में धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिकता के गहरे अंतर्विरोध मिलते हैं। ये अंतर्विरोध इस बात का संकेत है कि एक लेखक के अंदर में वैचारिक पराभव की प्रक्रिया कभी भी पैदा हो सकती है यदि वो धर्मनिरपेक्ष राजनीति के प्रति वफादार न हो। इक़बाल की कविता में एक अच्छा-खासा अंश है जो धर्मनिरपेक्ष है, लेकिन दूसरी ओर उनकी कविता पर मुस्लिमलीगी साम्प्रदायिक राजनीति का भी गहरा असर है। कहने का तात्पर्य है कि इकबाल जब प्रतिक्रियावादी राजनीति में खुलकर खेलने लगे तो इससे उनकी कविता सीधे प्रभावित हुई।उनकी साम्प्रदायिक राजनीति के रंग में रंगी कविताएं सबसे कमजोर कविताएं हैं,जबकि उनकी आरंभिक दौर की कविताओं में धर्मनिरपेक्षता जमकर अभिव्यंजित हुई है। इक़बाल का जन्म 9नवम्बर1877 को स्यालकोट में (पंजाब, अब पाक में है) हुआ। एम.ए. की परीक्षा में वे यूनीवर्सिटी भर में अव्वल आए थे।शायरी का उनको स्कूली जीवन से ही शौक था। शायरी की बदौलत उनको जर्मन सरकार ने 'डाक्टरेट' की उपाधि दी।भारत सरकार ने 'सर' की उपाधि दी।टैगोर के बाद वे ही भारत के…

इंटरनेट और सामाजिक परिवर्तन के आयाम

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संचार तकनीक बहुरंगी होती है।वह कभी एकायामी नहीं होती।उसका संस्कृति ,राजनीति और अर्थव्यवस्था से गहरा सम्बन्ध भी होता है। वह महज कम्युनिकेशन का उपकरण मात्र नहीं है। बल्कि वह तो समाज की धुरी है। सामाजिक अध्ययन किया जाता है वैसे ही कम्युनिकेशन का भी अध्ययन किया जाना चाहिए। समाज कैसा है और कैसा होगा,इन दोनों सवालों को जानने के लिए उत्पादन सम्बन्धों और कम्युनिकेशन तकनीक की अवस्था का संयुक्त रुप से अध्ययन किया जाना चाहिए। प्रत्येक सामाजिक व्यवस्था में लंबे समय से कम्युनिकेशन के एकाधिक तकनीकी रुप सक्रिय हैं। इनमें वह तकनीकी रुप खोजना चाहिए जो प्रभुत्वशाली हो।प्रभुत्वशाली तकनीकी रुप की पहचान संचार की गति पर आधारित है। संचार की गति के नजरिए से देखें तो आज इंटरनेट तीव्रगामी संचार माध्यम है। यह माध्यम है और तकनीक भी है।यह ऐसा माध्यम है जिसने अपने पूर्ववर्ती सभी माध्यमों का अपने अंदर समाहार कर लिया है।इसका तकनीकी आधार है उपग्रह संचारप्रणाली और कम्प्यूटर।

कम्प्यूटर और इंटरनेट के आने के बाद कम्युनिकेशन में मूलगामी बदलाव आया है।राजनीति से लेकर संस्कृति तक सब क्षेत्रों में व्यापक परिवर्तन घटित हु…

नामवर सिंह और साहित्य की कसौटियाँ

मार्क्स से एकबार एक पत्रकार ने पूछा था कि मार्क्सवाद क्या है ? तो मार्क्स ने कहा कि यह स्वयं के ख़िलाफ़ संघर्ष है। तक़रीबन इससे मिलती - जुलती बात देरिदा ने अपने अंतिम साक्षात्कार में कहीं कि ' मैं स्वयं के ख़िलाफ़ युद्धरत हूँ ।'यह बात उन्होंने जिस समय कहीं उस समय वे गंभीर शारीरिक कष्टों और बीमारियों से जूझ रहे थे । तक़रीबन यही नज़रिया हिन्दी आलोचक नामवर सिंह का रहा है। वे निरंतर अपने कहे से संघर्ष करते रहे हैं।   पिछले दिनों उनको दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में सुनने का मौक़ा मिला । ज्ञानपीठ द्वारा आयोजित 'वाक्' नामक कार्यक्रम में उन्होंने कई महत्वपूर्ण बातें कहीं जिनसे उनके अंदर की छटपटाहट का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। उनकी पहली गंभीर आलोचना तो यह थी कि उनसे लोग तीखे आलोचनात्मक सवाल नहीं पूछते,विश्वनाथ त्रिपाठी ने बातचीत की जो पृष्ठभूमि तैयार की थी उसकी आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि आपने जिस तरह से पूछा है उससे तो सारी बातचीत संस्मरणात्मक होकर रह जाएगी, जबकि मैं चाहता हूँ कि लोग आलोचनात्मक सवाल करे। लेकिन जैसाकि होता रहा है उनसे किसी ने आलोचनात्मक सवाल नहीं पूछा…