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जॉर्ज सिंपसन- उसने अपनी जान क्यों ली ? - 3-

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हालांकि मनोविश्लेषक मनोविकृति विज्ञान का यह मानना है कि आचरण के उसके व्याख्याकारी सिध्दांतों के बीच ऐसे उपकरण हैं जिनसे आत्महत्या के कारणों का पता लगाया जा सकता है लेकिन अनुभवजन्य आंकड़ों या सत्यापित सिध्दांतों के निष्कर्षों के आधार पर वह कोई भी पक्की कारणवैज्ञानिक अवधारणा तय नहीं करना चाहता। जिलबुर्ग ने लिखा है : '...स्पष्ट है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से आत्महत्या की समस्या आज भी अनसुलझी है। न तो सामान्य समझ और न नैदानिक और न मनोविकृति विज्ञान इसका कारण कार्यात्मक या अनुभवात्मक समाधान खोज पाया है।' 1918 में विएना में एक मनोविश्लेषक विचारगोष्ठी में सिगमंड फ्रायड ने चर्चा का सारांश इस प्रकार प्रस्तुत किया : 'इस चर्चा से बहुत मूल्यवान सामग्री मिली है, लेकिन हम किसी निश्चित निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाए हैं...हमें तब तक कोई मत तय करने से बचना चाहिए जब तक अनुभव इस समस्या का हल नहीं निकाल देता।' इसके बाद से फ्रायड, जिलबुर्ग, अब्राहम, मैनिंगर, ब्रिल और अन्यों सहित विशेषज्ञ और अत्यधिक प्रशिक्षित मनोविश्लेषकों ने आत्महत्या पर काम किया है। यहां एक प्रणालीवैज्ञानिक बाधा का उल्लेख …

विचारों की बंद गली में नहीं रहते मुसलमान

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कारपोरेट मीडियाऔर अमेरिकी साम्राज्यवाद के इशारे पर इस्लाम और मुसलमान को जानने की कोशिश करने वालों को इनके बारे में अनेक किस्म के मिथों से गुजरना पड़ेगा। मुसलमान और इस्लाम के बारे में आमतौर पर इन दिनों हम जिन बातों से दो-चार हो रहे हैं वे अमेरिका के संस्कृति उद्योग के कारखाने में तैयार की गई हैं। अमेरिकी संस्कृति उद्योग ने मिथ बनाया है इस्लाम का अर्थ है अलकायदा,तालिबान या ऐसा ही कोई आतंकी खूंखार संगठन। दूसरा मिथ बनाया है मुसलमान का । इसका अर्थ है बम फोड़ने वाला, अविश्वनीय,संदेहास्पद, हिंसक,हत्यारा, संवेदनहीन,पागल,देशद्रोही,हिन्दू विरोधी, ईसाई विरोधी, आधुनिकताविरोधी,पांच वक्त नमाज पढ़ने वाला आदि ।तीसरा मिथ बनाया है इस्लाम में विचारों को लेकर मतभेद नहीं हैं। मुसलमान भावुक धार्मिक होते हैं। ज्ञान-विज्ञान, तर्कशास्त्र,बुद्धिवाद आदि से इस्लाम और मुसलमान को नफ़रत है। मुसलमानों के बीच में एक खास किस्म का ड्रेस कोड होता है। बढ़ी हुई दाढ़ी,लुंगी,पाजामा,कुर्ता,बुर्का आदि। कहने का अर्थ यह है कि अमेरिकी संस्कृति उद्योग के कारखाने से निकले इन विचारों और मिथों के आधार पर मुसलमान और इस्लाम को आप सही र…

आओ मुसलमानों से प्यार करें

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मैं बाबा रामदेव को प्यार करता हूँ। मोहन भागवत को भी प्यार करता हूँ।मदर टेरेसा, सोनिया गांधी,मनमोहन सिंह,प्रकाश कारात को भी प्यार करता हूँ। वैसे ही हिन्दुस्तान के हिन्दुओं, ईसाईयों, सिखों,जैनियों,बौद्धों को भी प्यार करता हूँ। इन सबके साथ मैं मुसलमानों को भी प्यार करता हूँ।     मेरा मानना है इस संसार में मनुष्य से घृणा नहीं की जा सकती,उसी तरह पशु-पक्षियों से भी नफरत नहीं की जा सकती। मुझे मोहन भागवतएक मनुष्य के नाते प्रिय हैं। संघ के नाते मैं उनका आलोचक हूँ। इसी तरह बाबा रामदेव मनुष्य ने नाते ,एक योगी के नाते प्रिय हैं। एक योगव्यापारी के नाते मैं उनका आलोचक हूँ। इसी तरह मुझे पंकजझा और उनके तमाम संघभक्त दोस्त भी प्रिय हैं। वे मेरे शत्रु नहीं हैं। मैं नहीं समझता कि वे अपनी तीखी प्रतिक्रियाओं से कोई बहुत बड़ा अपकार कर रहे हैं। वे मनुष्य प्राणी के नाते हमारे बंधु हैं । हिन्दुओं में कुछ लोग मेरे लेखन से असहमत हों। वे इस कारण तरह-तरह के निष्कर्ष निकाल रहे हैं। मैं निजी तौर पर उनका भी शुक्रगुजार हूँ जो मुझमें बुखारी देख रहे हैं। वे अभी न जाने क्या -क्या नहीं बना देंगे। क्योंकि मैं उनके गंभीर विचा…

जॉर्ज सिंपसन- उसने अपनी जान क्यों ली ? - 2-

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आत्महत्या पर दुर्खीम के काम के बाद से इस विषय में हमारी जानकारी बीमा संबंधी आंकड़ों और मनोविश्लेषक मनोविकृति विज्ञान से आई है। दुर्खीम के अपने दृष्टिकोण को उसके छात्र और मित्र मोरिस हल्बवाच्स ने अपनी लेस कॉजिज डु सुइसाइड में आगे बढ़ाया है, उसकी जांच की है और उसे लागू किया है। यहां खुलासे के लिए नोट किया जाना चाहिए (जैसा कि पार्सन्स ने जिक्र किया है) कि हल्बवाच्स के अनुसार आत्महत्या के सामाजिक और मनोविकृति वैज्ञानिक स्पष्टीकरण में ऐसा कोई विरोध नहीं है जैसा कि दुर्खीम ने देखा है, बल्कि ये तो एक दूसरे के पूरक हैं। बीमाविदों ने आत्महत्या के सकल विस्तार प्रवृत्तियों का अध्ययन किया है और उसे प्रजाति और रंग प्रभाव, उम्र और लिंग विभाजन, शहरी और ग्रामीण क्षेत्र, मौसम स्वरूप (इन्हें दुर्खीम ने कॉस्मिक तत्व कहा है), आर्थिक स्थितियों, धार्मिक संबध्दता, वैवाहिक स्थिति से जोड़ा है। लेकिन बीमाविदों ने आत्महत्या के कारणों की कोई पक्की, सुसंगत और व्यवस्थित परिकल्पना विकसित नहीं की। दुर्खीम इसी तरह की परिकल्पना विकसित करना चाहते थे। इस बारे में बीमाई काम का गंभीर संग्रह लुईस आई. डबलिन और बैसी बनजेल क…

एमिल दुर्खीम की महान कृति आत्महत्या का हिन्दी में प्रकाशन

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विख्यात फ्रांसीसी समाजशास्त्री एमिल दुर्खीम के चार बड़े कामों में से केवल लि सुइसाइड अनुवाद के लिए बचा है। दि एलिमेंटरी फार्म ऑफ दि रिलिजियस लाइफ पहली बार 1915 में अंग्रेजी में छपी; दि डिविजन ऑफ लेबर इन सोसाइटी 1933 में और दि रूल्स ऑफ सोशियोलोजिकल मैथड 1938 में। लि सुइसाइड को पहली बार छपे पचास वर्ष से अधिक हो गए हैं लेकिन समाजशास्त्रीय, सांख्यिकीय और मनोवैज्ञानिक क्षेत्रों में इसके प्रति दिलचस्पी किसी पुराने काम के प्रति दिलचस्पी से कहीं अधिक है। सामाजिक विचारधारा की दृष्टि से इसका ऐतिहासिक महत्व ही अंग्रेजी पाठक संसार में इसे ले जाने का पर्याप्त कारण बन जाता है। समाजशास्त्र में यह पुस्तक मील का पत्थर है और फ्रांस में शैक्षिक समाजशास्त्र की आधारशिला रखने वाले और उसे सुदृढ़ करने वाले और फ्रांस के बाहर दुनिया को प्रभावित करने वाले व्यक्ति को समझने के लिए अपरिहार्य है। इसे देखते हुए इसका बहुत पहले अनुवाद हो जाना चाहिए था। आज हमारी सांख्यिकीय सामग्री अधिक परिष्कृत और व्यापक है और दुर्खीम के मुकाबले हमारा सामाजिक मनोवैज्ञानिक तंत्र बेहतर स्थापित है, लेकिन आत्महत्या पर उनका काम विषय को आं…

जॉर्ज सिंपसन- उसने अपनी जान क्यों ली ? - 1-

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(आज के ‘टाइम्स ऑफ इण्डिया’ के कोलकाता संस्करण में आत्महत्या की दो खबरें छपी हैं। इस तरह की खबरें आए दिन मीडिया में आती रहती हैं। लोग आत्महत्या क्यों करते हैं और इससे कैसे बचा जाए इस पर हमारे पास बहुत कम जानकारी है। सामान्य रूप में आंध्र और महाराष्ट्र के किसानों ने कर्ज के कारण जब आत्महत्याएं कीं तो आम लोगों का इस समस्या की ओर ध्यान गया और हमारे मीडिया विशेषज्ञों ने इस पर कुछ लिखा भी। लेकिन आत्महत्या एक गंभीर सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक समस्या है। यहां पर हम महान प्रसिद्ध समाजशास्त्री एमिल दुर्खीम की महान कृति ‘आत्महत्या’ के कुछ अंश प्रकाशित कर रहे हैं,जिससे इस फिनोमिना को समझने में मदद मिले। एमिल दुर्खींम की इस महान किताब को ग्रंथशिल्पी ने छापा है। इसका अनुवाद रामकिशन गुप्ता ने किया है। इस किताब की भूमिका जॉर्ज सिंपसन ने लिखी है,पेश है,वह भूमिका) सामाजिक और प्राकृतिक तत्व के साथ आत्महत्या के अंतर्संबंध का एमिल दुर्खीम का फलक इतना व्यापक और विविध है कि इसके सभी मार्गों और उन मार्गों को इस छोटे से परिचय में शामिल करना संभव नहीं है। एक नातिदीर्घ वॉल्यूम में दुर्खीम ने सामान्य और असामान्य मन…

रोजे बूर्दरों - फासीवादी विचारधारा : व्याख्या का प्रयास

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फासीवादी विचारधारा के कुछ सारभूत तत्व हैं जो निश्चित ही पर्याप्त सरल लगते हैं। वे ऐसी धारणाओं पर आधारित हैं जिन्हें उचित-अनुचित की परिधि में रखना कठिन हैं। देखा जाए तो उन्नीसवीं सदी के समस्त गैर समाजवादी राजनीतिक और सामाजिक विचारों से यहां वहां ले लेकर फासीवादी की बौद्धिक नींव रखी गई है। राष्ट्रीय एकीकरण के दौरान राष्ट्रवाद के दक्षिण और अति-दक्षिण को लोकप्रिय राष्ट्रवाद से जोड़कर फासीवादी का ढांचा बनाया गया है। उदाहरण के लिए 'संपूर्ण इटली' का आंदोलन जो इटली के एकीकरण के पहले से जारी था फासीवादी में समन्वित कर लिया गया था। फासीवादी में राज्य के सिद्धांत, वर्ग समन्वय, अच्छी और बुरी पूंजी जैसी धारणाओं में अनेक अनुदार और अतिवादी राजनीतियों के तत्व पहचाने जा सकते हैं। साथ ही व्यक्ति का उदात्तीकरण, उसकी क्षमता और सफलता का अंतरसंबंध, सामाजिक असमानता का स्रोत है। व्यक्तियों के गुणों और प्रतिभाओं में असमानता जैसे विचार उदारपंथी सोच की विरासत हैं। यह देखा जा सकता है कि फासीवादी कार्यक्रम में समाजवाद का प्रभाव दिखता भी हो तो विचारधारा के स्तर पर समाजवाद के प्रति तनिक भी सकारात्मक झुकाव न…

फासिस्ट शब्दवीरों का अविवेकजगत

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आमतौर पर लोग पूछते हैं कि फासीवाद की भाषा का नमूना कैसा होता है ? फासीवाद पर जिन लोगों ने अकादमिक अध्ययन किया है और उसकी विभिन्न धारणाओं और पहलुओं की गंभीर मीमांसा की है उन विद्वानों को पढ़कर आप सहज ही पता कर सकते हैं कि फासीवाद की भाषा में सत्य की सबसे पहले हत्या की जाती है। सत्य की हत्या करने के लिए शब्दवीरों की सेना का इस्तेमाल किया जाता है। भाड़े पर शब्दवीर रखे जाते हैं ,ये शब्दवीर अहर्निश असत्य की उलटियां करते रहते हैं। गोयबेल्स और उनके भारतीय शिष्य भी यही काम कर रहे हैं। वे मीडिया के विभिन्न रूपों का असत्य के प्रचार-प्रसार के लिए दुरूपयोग कर रहे हैं। इन दिनों वेबपत्रिकाओं में भी इन शब्दवीरों को टीका-टिप्पणी करते हुए सहज ही देख सकते हैं। हमारे ब्लॉग पर भी ऐसे शब्दवीर बीच बीच में आते हैं। असभ्य और गैर अकादमिक भाषा के प्रयोग का प्रयोग करते हैं। शब्द वमन करते हैं और चले जाते हैं। प्रसिद्ध मार्क्सवादी सिद्धांतकार जार्ज लुकाच की एक शानदार किताब है ‘डिस्ट्रक्शन ऑफ रीजन’( बुद्धि का विध्वंस) इस किताब में लुकाच ने विस्तार के साथ उस सांस्कृतिक -बौद्धिक परंपरा को खोजने की कोशिश की है जिसके क…

औरतों की कारपोरेट गुलामी का नया आयाम

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भारत में औरतों की गुलामी काएक नया पहलू सामने आया है। यह पहलू चौंका देने वाला है कि आखिरकार कारपोरेट घराने हमारे देश में किस तरह की कर्म संस्कृति पैदा कर रहे हैं।समस्या के संदर्भ में हमारी किसान और महिला संगठनों से अपील है कि वे आगे आएं और इस अकल्पनीय शोषण से औरतों को मुक्त कराएं। इस संदर्भ में हम यहां ‘बिजनेस स्टैंडर्ड ’ के 25 अक्टूबर 2010 के अंक में प्रकाशित श्रीलता मेनन की एक रिपोर्ट साभार दे रहे हैं जो हमारी नयी कारपोरेट संस्कृति के इस नए आयाम पर रोशनी डालती है। रिपोर्ट पढ़ें-
सवालों के घेरे में है गरीब महिलाओं की मदद करने वाली परियोजना -श्रीलता मेनन जब वर्गीज कुरियन ने डेयरी सहकारी आंदोलन का मार्ग प्रशस्त किया था, तब गुजरात की लाखों गरीब महिलाएं अरबों डॉलर वाले ब्रांड की मालकिन बन गई थीं। दूध उपलब्ध कराने वालों को ब्रांड का मालिकाना हक देने वाला ऐसा ही मॉडल पंजाब में ट्रू मिल्क के नाम से उभरा है। हालांकि यह लाभ के बंटवारे और अवैतनिक श्रम से जुड़े सवाल उठा रहा है।
किला रायपुर विधानसभा के कांग्रेस विधायक जस्सी खंगूड़ा ने लुधियाना में मैक्रो वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड की स्थापना की है, लेक…