शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2010

लखनऊ जजमेंट - दबाब की राजनीति में इतिहास और तथ्य की विदाई

(हिन्दू दबाब की राजनीति के सिरमौर संघ प्रमुख मोहन भागवत)
      समझौते , समाधान या न्याय के नाम पर इतिहास और तथ्यों की अनदेखी करने, इतिहास और तथ्य की बलि चढ़ाने का अधिकार किसी भी व्यक्ति या संस्थान को नहीं दिया जा सकता। चाहे वह जज ही क्यों न हों।
      लखनऊ बैंच ने कई मुद्दों पर इतिहास और तथ्यों की अनदेखी की है। आधुनिककाल में इतिहास और तथ्यों की अनदेखी के आधार पर कोई भी रास्ता शांति के समाधान की ओर नहीं ले जा सकता।
 बाबरी मसजिद के प्रसंग में जजों ने अपने फैसले में दो असंतुलित काम किए हैं पहला , जजों ने कानून को ‘दबाब की राजनीति’ का हिस्सा बना दिया है। कानून जब भी दबाब की राजनीति का हिस्सा बनकर काम करेगा कानूनी और सामाजिक संतुलन गड़बड़ाएगा।
    दूसरा, खराब काम यह किया कि कानून,इतिहास,संविधान आदि के ऊपर उसने धार्मिक आस्थाओं को रखा है और इसमें भी उसने हिन्दू धार्मिक आस्थाओं के प्रति घोषित रूप में पक्षधरता का प्रदर्शन किया है। इससे भारत के गैर हिन्दुओं की न्यायपालिका के प्रति आस्थाएं कमजोर होंगी।    
   यह आयरनी है कि जब विवादित पक्ष इंतजार कर रहे थे कि उन्हें बाबरी मसजिद की विवादित जमीन के स्वामित्व का फैसला सुनाया जाए उस समय अदालत ने उन्हें राम जन्म के बारे में फैसला करके सुना दिया। राम कहां हुए कैसे हुए ? राम का जन्म हुआ था या नहीं ? राम मंदिर आस्था का प्रश्न है ? आदि प्रश्न कानून के दायरे में नहीं आते। इसके बारे में सर्वोच्च न्यायालय 1994 में एकबार निर्णय दे चुका है । तत्कालीन जस्टिस वर्मा ने कहा था कि  संपत्ति के स्वामित्व का अदालत फैसला कर सकती है। लेकिन आस्था का फैसला नहीं कर सकती। राम जन्म कहां हुआ इसका फैसला अदालत नहीं कर सकती।
    इलाहाबाद हाईकोर्ट की तीन सदस्यीय लखनऊ बैंच ने राम मंदिर का फैसला राम भक्तों की आस्था के आधार पर करके कानून का एक गलत उदाहरण पेश किया है। अदालत के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट को अपने पुराने फैसले की रोशनी में दुरूस्त करना चाहिए। वरना अब अगला नम्बर काशी-मथुरा और ताजमहल का होगा। क्योंकि हिन्दू आस्थाओं के अनुसार ये तीनों स्थान हिन्दुओं के पवित्र मंदिर हैं। इस तरह की तकरीबन 3000 मसजिदों को संघ परिवार ने चिह्नित किया है ,जिन्हें वह मुसलमानों के कब्जे से मुक्त करना चाहते हैं।
     दूसरी बात यह कि आस्थाओं के आधार पुराने धार्मिक विवादों को उठाना और उनमें देश को उलझाए रखना भारत के भविष्य के लिहाज से सही नहीं होगा । जजों ने आस्था और मान्यताओं के आधार पर कानूनी फैसला देकर दबाब की राजनीति के सामने कानून को बौना बनाया है। यह संदेश भी दिया है कि यदि कोई संगठन या सामाजिक समुदाय अपनी भावनाओं को बार-बार आंदोलन के माध्यम से या समूहबल के आधार पर उठाता है तो उसके दबाब में अदालतें आ सकती हैं। इतिहास और तथ्य को तिलांजलि दी जा सकती है। न्यायपालिका में यह खतरनाक रूझान का संकेत है। यह इस बात का भी संकेत है कि हमारे न्यायाधीशों के मन में पुरानी धार्मिक अस्मिता के अवशेष अभी भी सक्रिय हैं। वे इतिहास और तथ्यों की बजाय आस्था के आधार पर सोचते हैं।
विवादित अंश है -    
Whether the disputed site is the birth place of Bhagwan Ram?
 The disputed site is the birth place of Lord Ram. Place of birth is a juristic person and is a deity. It is personified as the spirit of divine worshipped as birth place of Lord Rama as a child. Spirit of divine ever remains present every where at alltimes for any one to invoke at any shape or form in accordancewith his own aspirations and it can be shapeless and formless also.’
    इस फैसले का एक और विवादित अंश महत्वपूर्ण है । इसमें दो बातें हैं, पहली, यह कि बाबर ने बाबरी मसजिद के निर्माण का आदेश दिया था, लेकिन यह मसजिद कब बनी इसे निश्चित करने में जज महोदय असमर्थ रहे हैं। साथ ही उन्होंने यह भी लिखा है कि इस्लाम धर्म की मान्यताओं के आधार पर यह मसजिद नहीं बनी। इसलिए इसे मस्जिद मानना सही नहीं होगा। इस प्रसंग में सबसे पहली बात तो यह है कि बाबरी मसजिद थी और सैंकड़ों सालों से ठोस शक्ल में थी। वह तो मसजिद थी वह कैसे बनी और किन नियमों के आधार पर बनी इसका फैसला आज करना संभव नहीं है। इस पर विवाद नहीं हो सकता कि वह मसजिद थी या नहीं ? इस्लाम धर्म के अनुसार उसका निर्माण हुआ था या नहीं ? यदि इसके आधार पर मसजिदों के बारे में फैसले अदालत लेने लगेंगी तो मामला गंभीर दिशा ग्रहण कर सकता है। यह कानून के दायरे बाहर है कि वह यह बताए कि बाबरी मसजिद गैर-इस्लामिक है।
    जजमेंट का यह बिंदु भड़काने वाला है और इसको सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जानी चाहिए। साथ ही यह मुसलमानों के निजी कानूनों में खुला हस्तक्षेप है। कोई इमारत मसजिद है या नहीं यह फैसला भारतीय अदालतें नहीं कर सकतीं इसका फैसला मुसलमान और उनके धार्मिक संस्थान ही कर सकते हैं। बाबरी मसजिद का स्वामित्व सुन्नी वक्फ बोर्ड के पास है । मसजिद के मालिक कम से कम हिन्दू नहीं हो सकते। मंदिर के मालिक हिन्दू हो सकते हैं। मसजिद के मालिक के रूप में कानूनन वक्फ बोर्ड को ही अधिकार हैं। मुसलमान ही मसजिदों की देखभाल करते रहे हैं। विवादित अंश को पढ़ें-
Whether the disputed building was a mosque? When was it built? By whom?
The disputed building was constructed by Babar, the year is not certain but it was built against the tenets of Islam. Thus, it cannot have the character of a mosque.
  इस फैसले का एक अन्य विवादास्पद हिस्सा है जिसमें यह कहा गया है कि हिन्दू मंदिरों को तोड़कर मसजिद बनायी गयी थी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा जो रिपोर्ट दी गयी है उस पर भारत के अधिकांश इतिहासकार पहले ही अनेक तथ्यपूर्ण आपत्तियां उठा चुके हैं और उस रिपोर्ट की ऐतिहासिक आलोचना कर चुके हैं। अदालत ने उन सबकी अनदेखी की है और इस अनदेखी का प्राथमिक आधार है हिन्दू आस्थाओं के प्रति जजों का समर्पणभाव। वे इसके कारण अन्य इतिहासकारों की राय की अनदेखी करके इस नतीजे पर पहुँचे हैं।
सवाल उठता है क्या धार्मिक जमीन के स्वामित्व के विवादों को सैंकड़ों-हजारों साल पीछे ले जाकर सुलझाना सही कानूनी तरीका है ? क्या इससे हम भारत में एक नए विवादों को जन्म नहीं दे रहे हैं ? हाईकोर्ट के जजों ने सामाजिक भविष्य,तथ्य ,इतिहास और कानून को आधार बनाकर फैसला नहीं दिया है। जजों की नजर अतीत और आस्था पर टिकी रही है।
     अतीत और आस्था के आधार पर कानून सिर्फ उनका मददगार हो सकता है जो इस समाज को अंधियारे अतीत में ले जाना चाहते हैं। आधुनिक जज जब अतीत की ओर भरोसा करके फैसले देंगे तो फैसले अन्तर्विरोधपूर्ण होंगे। अस्पष्ट होंगे। इस फैसले में कानूनी और तथ्यपूर्ण समझ कम व्यक्त होती है राजनीतिक समाधान की ओर झुकाव ज्यादा व्यक्त हुआ है। जजों को राजनीति के पीछे चलने वाले भक्त नहीं होना चाहिए। बल्कि वे तो राजनीति के आगे चलने वाली मशाल हैं।
भारत में कोई भी इमारत ऐसी नहीं होगी जो किसी न किसी पुरानी इमारत के मलबे पर न बनी हो।  सवाल यह है कि लखनऊ के आधुनिक जज हमारे सामने निर्णय की किस तरह की आधारशिला रख रहे हैं ? उनकी नजर में वर्तमान है और वे उसके संकट से निकलना भी चाहते हैं । लेकिन वर्तमान के संकट से अतीत के मार्ग और राजनीतिक शार्टकट के जरिए नहीं निकला जा सकता। अतीत का मार्ग यदि संकटमुक्त रहा होता तो हम इस विवाद का अतीत का मलबा अब तक न ढ़ो रहे होते। बाबरी मसजिद के गैर इस्लामिक अस्तित्व के सवाल को उठाकर जजों ने आग में घी डालने का काम किया है। एक अन्य चीज है जिस पर हम गौर करें ,जब मंदिर के मलबे पर बनी बाबरी मसजिद अवैध है तो मसजिद के मलबे पर बना राम मंदिर वैध कैसे हो सकता है ? यह कैसे हो सकता है मंदिर के मलबे पर इमारत बनाना अवैध है लेकिन मसजिद के मलबे पर इमारत बनाना वैध है । मलबे में भी हिन्दू पक्षधरता की जजों ने यह बेजोड़ मिसाल पेश की है। विवादित अंश देखें-      
Whether the mosque was built after demolishing a Hindu temple?
The disputed structure was constructed on the site of old structure after demolition of the same. The Archaeological Survey of India has proved that the structure was a massive Hindu religious structure.

आश्चर्य की बात है कि जजों ने माना कि 22 दिसम्बर 1949 की रात को बाबरी मसजिद में राम की मूर्ति कोई रख गया। कौन रख गया ,कैसे रख गया ,इसका ब्यौरा एफआईआर में उपलब्ध है और जज भी मानते हैं बाबरी मसजिद में उपरोक्त तारीख को ये मूर्तियां रखी गयीं । सवाल यह है कि ये मूर्तियां वैध रूप में जब नहीं रखी गयीं तो फिर इन्हें हटाने का निर्णय माननीय जजों ने क्यों नहीं लिया ? जजों ने सैंकड़ों साल पुरानी बाबरी मसजिद को गैर-इस्लामिक मान लिया, लेकिन चोरी से मसजिद में जाकर राम की मूर्ति को रखे जाने को गैर हिन्दू धार्मिक हरकत नहीं माना। राम मंदिर को अवैध नहीं माना ? यह जजों की खुली हिन्दुत्ववादी पक्षधरता है।
    यह खुला सच है कि बाबरी मसजिद के अंदर वाले हिस्से में या इस इमारत के अन्य किसी भी हिस्से में 22-23 दिसम्बर 1949 के पहले कोई हिन्दू मूर्ति नहीं थी। ये मूर्तियां अवैध रूप से रखी गयी थीं और भारत के संविधान,कानून और हिन्दू धर्म की समस्त धार्मिक मान्यताओं और मर्यादाओं को ताक पर रखकर रखी गयी थीं। इन मूर्तियों को किसी भी रूप में वैधता प्रदान नहीं की जा सकती। कम से कम कानून और हिन्दू धर्म की नजर में ये मूर्तियां अवैध और अधार्मिक कृत्य के दायरे में आती हैं। लेकिन जजों को इसमें कोई अधार्मिकता और अवैधता नजर ही नहीं आयी। इससे यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जजों का हिन्दू धर्म के लिए एक पैमाना था,और इस्लाम धर्म के लिए दूसरा पैमाना था। धर्म के प्रति अपने और पराए का भाव जजों के लिए खतरनाक बात है। पेशेवर लोगों को धर्म,नस्ल,भेदभाव आदि से ऊपर उठकर काम करना होता है। वे सबके होते हैं। जज सबके हैं। वे किसी एक जाति या धर्म के नहीं हो सकते। वैसे ही एक डाक्टर सबका होता है, एक शिक्षक या इंजीनियर सबका होता है। वह किसी एक धर्म के मानने वालों का नहीं हो सकता।
    कानून की नजर में ,पेशेवर लोगों में धर्मों के प्रति यदि भेदभाव का नजरिया आने लगेगा तो इससे बेहद खतरनाक स्थिति पैदा हो सकती है । बाबरी मसजिद में चोरी छिपे मूर्तियां बिठा देना गलत था। भारत के कानून का उल्लंघन था। इसे किसी भी आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता। जजमेंट के इस विवादित अंश को पढ़ें-    
4. Whether the idols were placed in the building on the
night of December 22/23rd, 1949? The idols were placed in the middle dome of the disputed structure in the intervening night of 22/23.12.1949.

लखनऊ पीठ के फैसले ने एक सकारात्मक काम किया है कि उसने इस विवाद को समाधान करने की दिशा में ठेल दिया है। उम्मीद है हाईकोर्ट के जजमेंट में जो कमियां हैं वे सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान दूर हो जाएंगी। इस जजमेंट का एक बड़ा संदेश है कि राजनीतिक दल और संसद जो काम करने में असफल रहे हैं उन कामों को अदालतें कर सकती हैं। न्यायपालिका के इस साहस भरे काम की हम सबको प्रशंसा करनी चाहिए। इससे यह मसला आगामी दिनों में जल्दी सुलझने की प्रक्रिया में आ गया है। लेकिन इस समस्या के राजनीतिक शार्टकट से बचने की जरूरत है। लखनऊ बैंच की सबसे बड़ी कमजोरी यही है और इसे सुप्रीम कोर्ट को दुरूस्त करना चाहिए।  








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