रविवार, 10 अक्तूबर 2010

विजया सिंह- स्त्रीत्व का सुखद नैसर्गिक सौंदर्य

पहली बार जाना,
'कितना खतरनाक होता है
दो स्तनों के साथ इस दुनिया में कदम रखना.'
पहली बार समझा,
महज़ अंग नहीं सजीव चेतन हैं हमारे...
और पहली बार ही,
दर्द की कँटीली रेखाएँ खड़ी हो गई हैं
रीर के एकाधिक पोरों में.
'मैं ठीक हूँ' का अपाहिज झूठ आश्वस्त नहीं
करता, न मुझे, न माँ-बाबूजी को.
ठंडे, दगहे रीर (आत्मा) में सौंदर्य
नहीं, आकंठ भयाकुलता है
किसी के कामुक-स्नेहिल छुअन में
अकेले हो जाने की सिहरन.
भीतर-भीतर ठस्स होते जाते, कठोर
आगत को नकार कर एकबारगी
मैंने कहा,' ठीक हूँ'.
पीले पड़े, बेजान जिस्म, झड़ते के,
आस्वादहीनता, दवाओं की अंतहीन फेहरिश्त,
बार-बार की लंबी नीम बेहोशी,
निहायत निर्मम हो गयी है.
उकताने लगी हूँ.
अकेले माँ-बाबू , अकेली मैं
बढ़ते जाते अकेलेपन में साथ-साथ हैं
यों कि साथ-साथ अकेले हो गए हैं.
मन की ऊरठ, रूखी हथेलियों ने
छीजती देह को थाम लिया है.
मेरी उन्मुक्त हँसी झूठी नहीं
मेरे-तुम्हारे स्पर्श के बीच अंकुरित
ष्मा भी सच है, अखंड है.
तुम और मैं हमेशा से
अखंड सत्य, अखंड सुंदर.
निरन्तर क्षीण होती मैं
तुममें अक्षुण्ण हूँ.
जोड़ने लगी हूँ अपनाआप
अधूरेपन की सहजता अस्वीकार कर पूर्ण होना चाहती हूँ
सतरंगे इंद्रधनु को ऑंचल में बाँध
लाँघ जाना चाहती हूँ सारा आका
जबकि टूट रहा है देह का तिलिस्म, बेआवाज़,
वाकई मैं जीना चाहती हूँ...

  लूसिले क्लिफ्टन-अमेरिकी अफ्रीकी कवयित्री (1936-2010). स्त्री जीवन,
  रीर,मन,चेतना से संबंधित अनेक कविताएँ इन्होंने लिखी हैं.
  लूसिले क्लिफ्टन की कविता '1994' की पंक्तियाँ. इसी वर्ष उन्हें स्तन कैंसर
    होने की सूचना मिली थी।
  


2 टिप्‍पणियां:

  1. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  2. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं

विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...