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August, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

नरेन्द्र मोदी की बेलगाम भाषा के खतरे

बेलगाम भाषा का टकराव पैदा करती है।साथ ही पीड़ादायक आनंद की सृष्टि भी करती है। सुनने वाला आनंद में रहता है लेकिन इस तरह की भाषा सामाजिक कष्टों की सृष्टि करती है और तनाव पैदा करती है। मोदी बाबू ने मैनस्ट्रीम मीडिया में बेलगाम भाषा को जनप्रिय बनाया है। हाल ही में वे जब हरियाणा में बोल रहे थे तो लोग समझ ही नहीं पाए कि उनके साथ क्या घट रहा है,यही हाल चुनावी सभाओं का भी था।

मोदी के भाषायी प्रयोगों को ध्यान से देखें तो पाएंगे कि मोदी ने वक्तृता का ऐसा इडियम विकसित किया है जिसमें रेशनल के लिए कोई जगह नहीं है। वे भाषा में शब्दों का प्रयोग करते समय पद,सामाजिकता और संस्थान की भाषा के मानकों का अतिक्रमण करते हैं। चुनावों में इस तरह का अतिक्रमण चलता है लेकिन सामान्य स्थितियों में पद और संस्थान की भाषा का ख्याल रखा जाना चाहिए।

मसलन मोदी का हाल ही में वैज्ञानिकों को यह कहना कि 'चलता है' का रवैय्या नहीं चलेगा। यह कथन अपने आप में बहुत कुछ कहता है।प्रधानमंत्री अपनी संस्थान की भाषा भूलकर और पेशेवरलोगों की भाषा भूलकर जिस मुहावरे में बोल रहे थे वह बेलगाम भाषा का नमूना है। नभाटा के अनुसार …

अशोक वाजपेयी की शीतयुद्धीय दृष्टि और केदारनाथ सिंह

अजीब संयोग है कि केदारनाथ सिंह को जब से ज्ञानपीठ मिला है लगातार उसकी आलोचना हो रही है। इस आलोचना की नई कड़ी अशोक वाजपेयी हैं। उनका मानना है 'ज्ञानपीठ उनसे पहले, मुझ नाचीज की राय में, हमारे दो बड़े गद्यकारों कृष्णा सोबती और कृष्ण बलदेव वैद को मिलना चाहिए था। केदारजी अच्छे कवि हैं, लेकिन उन्हें बड़ा कवि कहने में मुझे संकोच होगा। हो सकता है कि मैं गलत होऊं अपने इस आकलन में, मेरे हिसाब से अज्ञेय-मुक्तिबोध-शमशेर-नागार्जुन की चतुर्थी के बाद हिंदी में पिछले लगभग पचास वर्षों में कोई बड़ा कवि नहीं हुआ है। लेकिन बड़े गद्यकार हुए हैं।' (जनसत्ता,17अगस्त 2014)

वाजपेयी की यह धारणा एकदम निराधार है। हिन्दी में 'कवि चतुष्टयी' तो कृत्रिम ढ़ंग से आलोचकों ने रची है। इस तरह की टीम अपने आप में बेमेल है,क्योंकि इसमें केदारनाथ अग्रवाल नहीं हैं,रघुवीर सहाय नहीं हैं,सर्वेश्वर नहीं हैं,हरीश भादानी शामिल नहीं हैं। ये सभी लेखक वाजपेयी के शीतयुद्धीय नजरिए के बाहर पड़ते हैं।

यह अजीब स्थिति है कि अशोक वाजपेयी पहले एक चतुष्टयी बनाते हैं फिर उसके आधार पर कौन महान कवि है और कौन अ-महान कवि है; आदि के ब…

यूपी में अफवाह का तूफान और फासिस्टों की नई रणनीति

फेसबुक से लेकर राजनीति तक बेवकूफी का नया तूफान चल रहा है । शिक्षित मध्यवर्ग के लोगों का एक हिस्सा सरेआम बेवकूफियां कर रहा है और मीडिया उसे कवरेज भी दे रहा है । बेवकूफी के इस नए तूफान का केन्द्र इन दिनों पश्चिमी उत्तरप्रदेश है ।
यूपी में कुछ भी हो या घटे ,तुरंत अफवाहें आरंभ हो जाती हैं। अफवाहों के दबाव के कारण आमलोग विवेक-कानून की बात सुनने को तैयार नहीं हैं । घटना हुई कि बेवकूफों फौज अपने –अपने घरों से निकल पड़ती है और 'मार साला को' हल्ला बचाना शुरु कर देती है। अविवेकवाद की यूपी में जिस तरह की आंधी चल रही है ऐसी आंधी पहले कभी नहीं देखी गयी। कई महिने हो गए लेकिन आंधी थमने का नाम नहीं ले रही ।
मसलन् कोई अपराध हुआ है कि हल्ला शुरु हो जाता है, उसके बाद किसी भी तर्क को लोग सुनने को तैयार नहीं होते । वे सिर्फ अफवाह सुनना चाहते हैं। उनके पास हर घटना के अपने तर्क,निष्कर्ष और फैसले होते हैं, ये लोग अपने तर्कों के आधार पर मीडिया कवरेज चाहते हैं, फेसबुक लेखन कर रहे हैं,जनता को भड़का रहे हैं, पुलिस को गरिया रहे हैं । इसके आधार पर राजनीतिक ध्रुवीकरण कर रहे हैं ।
पहले कभी- कभार कोई घट…

सी-सैट और फेसबुक

यूपीएससी की परीक्षा में सी-सैट का पेपर हटाए जाने की मांग को लेकर आंदोलन जारी है। यह आंदोलन मूलतःलोकतांत्रिक है और अभ्यर्थियों की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं को अभिव्यंजित करता है । हर जिम्मेदार नागरिक को इस आंदोलन का समर्थन करना चाहिए। इस आंदोलन में अनेक रंगत की विचारधारा के युवा सक्रिय हैं । इसके बावजूद इसकी प्रकृति अभी तक शांतिपूर्ण आंदोलन की बनी हुई है जो युवाओं की राजनीति करने वालों के लिए बड़ी उपलब्धि है । इस आंदोलन के असर से हमारी संसद भी प्रभावित हुई है और विपक्ष के प्रमुखदल अभी भी सी-सैट को हटाने की मांग पर अड़े हुए हैं। मोदी सरकार ने इस आंदोलन के प्रति जो रुख व्यक्त किया है वह अलोकतांत्रिक और युवाविरोधी है। हम यहां पर इस आंदोलन पर फेसबुक लिखी अपनी टिपप्णियां दे रहे हैं।

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एप्टीट्यूट और कॉम्प्रिहेंशन परीक्षा का सी- सैट से भिन्न प्रारूप तलाश करने में मुश्किल कहाँ है ?

लोकतंत्र में यदि यूपीएससी की परीक्षा का पूरा ढाँचा ही नए सिरे से तैयार करना पड़े तो इसमें कौन सी परेशानी है? यूपीएससी को युवाओं के विरोध की मूल स्प्रिट को समझना चाहिए ।

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क़ायदे से़ यूपीएससी को मोदी सरकार के द्वारा…