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May, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मनमोहिनी ममता और मीडिया

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य की कमान संभाल ली है। वहकोशिश में है कि सभी वर्गों और समूहों की इच्छाओं का ख्याल रखा जाए और इसी दबाब में मंत्रीमंडल की पहली बैठक में 30 मिनट में 18 फैसले कर डाले। यह मनमोहिनी प्रशासनिक कार्यप्रणाली का नमूना है। इसी क्रम में वे अपनी गतिविधियों को खबरों के प्रवाह के रूप मेंबनाए रखना चाहती हैं। फलतःप्रशासन और मीडिया के बीच में एक नया संबंध जन्म ले रहा है। अब तक पश्चिम बंगाल में राज्य प्रशासन और मीडिया आमने-सामने थे। पहलीबार मीडिया और राज्य सरकार एक ही धुन में बज रहे हैं। यह मीडिया के लिए खतरे की घंटी है। मीडिया को सरकार और जनता के बीच क्रिटिकल सेतु होना चाहिए। उल्लेखनीय है ममता बनर्जी की जीत के कवरेज में मीडिया ने आम जनता के आनंद को ज्यादा उभारा है। ममता बनर्जी की जीत के राजनीतिक पक्ष पर कम जोर दिया है । जबकि ममता बनर्जी की विजय में राजनीति की बड़ी भूमिका है,इच्छाओं की कम। लेकिन बाजार में मीडिया की प्रतिस्पर्धा राजनीति के साथ कम और इच्छाओं के साथ ज्यादा खेल रही है। भारत में उदार लोकतंत्र है और इसकी विशेषता है सहमति। यहां कहने को सहमति के आधार फैसले होते है…

आधुनिकता की नई चुनौतियां

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हिन्दी साहित्य में आधुनिकता के सवालों पर आए दिन बहस होती रहती है। आधुनिकता की शुरूआत 'अन्य' या विकल्प के उत्पादन से हुई है। आज 'अन्य' को मारने,हत्या करने,,वंचित करने या उसका शोषण करने या सामना करने की जरूरत नहीं है। उससे घृणा,प्रतिस्पर्धा,प्रेम करने की भी जरूरत नहीं है। आज की चुनौती है कि 'अदर' या 'अन्य' को पैदा किया जाय। अब 'अन्य' पेशन की वस्तु नहीं रह गया है।बल्कि उत्पादन की वस्तु बन गया है। पूंजीवाद के बिना आधुनिकता का उदय नहीं होता,व्यक्तिगत मूल्यों और व्यक्तिवाद का उदय नहीं होता ,अतः आधुनिकता पर कोई भी बहस पूंजीवाद को दरकिनार करके संभव नहीं है। आधुनिकता मूलतः पूंजीवादी प्रकल्प का हिस्सा है। आधुनिकता के उदय के साथ अन्य या हाशिए के लोगों के सवाल,स्त्री,मुसलमान,आदिवासी आदि के सवाल केन्द्र में आ गए हैं। आधुनिकता इस अर्थ में महत्वपूर्ण है कि वह अन्य को या हाशिए के लोगों के सवालों को केन्द्र में ले आ जाती है। हाशिए के लोगों पर प्रतीकात्मक हमले तेज हो जाते हैं। 'अन्य' के भविष्य को लेकर हमारा कोई अनुभव नहीं था,अत: 'अन्य' की हमने …

पराजय से क्या सही सबक लेगी माकपा ?- कुलदीप कुमार

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वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप कुमार
पश्चिम बंगाल और केरल में वाम मोर्चे को मिली चुनावी हार के बाद लगभग वही माहौल है जैसा 1991 में सोवियत यूनियन के विघटन के बाद था. वाम-विरोधियों के उत्साह का ठिकाना नहीं है. उनकी राय में अब वामपंथी राजनीति को ऐसी पटखनी मिल गयी है कि उसका फिर से उठना मुश्किल है. उधर वामपंथी, विशेषकर मार्क्सवादी, यह दिखाने में लगे हैं मानों कुछ हुआ ही न हो. हम हार गए तो क्या, हमें 41 प्रतिशत वोट नहीं मिले क्या? क्या इससे पता नहीं चलता कि हमारा जनाधार बरकरार है? हमारी हार तो सबको दीख रही है, पर जनाधार नहीं दीख रहा. ठीक है, कुछ गलतियां हुई हैं, लेकिन हमारी पार्टी में इतनी शक्ति है, हमारे यहाँ इतना आतंरिक लोकतंत्र है कि हम इन्हें दूर कर लेंगे.
लेकिन क्या चुनाव परिणामों की समीक्षा करने भर से यह सब हो जाएगा? क्या कम्युनिस्ट पार्टियों को कुछ अधिक बुनियादी सवालों पर विचार करने की ज़रुरत नहीं है? क्या उन्हें इस सवाल पर नहीं सोचना चाहिए कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर लेनिनवादी पार्टी संगठन की संगति बैठती है या नहीं? दूसरे, क्य…

1857 के एलाननामे और हुक्मनामे -इंकबाल हुसैन

1857 की जंगे-आजादी का एक सकारात्मक पक्ष यह है कि यह जंग हथियारों के अलावा एलाननामों और हुक्मनामों के द्वारा भी लड़ी गई थी, जो स्वतंत्रता सेनानियों ने उर्दू और हिंदी भाषा में प्रकाशित किए थे। यह जंग भारतीय फौजों ने शुरू की थी, बाद में उनके साथ अवाम और खवास विभिन्न कारणों से सभी शामिल हो गए थे। स्वतंत्रता संग्रामियों ने आम भारतीयों के अंदर राष्ट्रीय और धार्मिक एकता पैदा करने के लिए आवश्यकतानुसार बहुत सारे एलाननामे जारी किए थे। अफसोस है कि एलाननामों की मूल कापियां नहीं के बराबर मिलती हैं। 1858 तक ये मौजूद थीं जिन्हें अंगरेज हुकूमत ने स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ किए मुकदमों में सबूत के तौर पर अंगरेजी में अनुवाद करवा कर पेश किया था जो राष्ट्रीय अभिलेखागार नई दिल्ली, इलाहाबाद, यूपी में सुरक्षित हैं। मैंने गोरखपुर के सैयद हामिद अली साहब के पुस्तकालय में मौजूद एलाननामों की मूल कापियां प्राप्त की हैं। इनमें अधिकतर उर्दू में हैंतीन एलाननामे उर्दू और हिंदी और कई फारसी में हैं। इन एलाननामों को हम तीन विभिन्न दौर में बांट सकते हैं। पहले दौर के एलाननामों में जोशो-वलवला के साथ जनता को संबोधित किया…

नयी सरकार की नयी चुनौतियां

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ममता बनर्जी के नेतृत्व में नई सरकार 20 मई को शपथ लेगी। वाम मोर्चे का इसबार के विधानसभा चुनाव में हारना कई मायनों में महत्वपूर्ण है। ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस-कांग्रेस गठबंधन की जीत का पहला संदेश है कि लोकतंत्र में अकल्पनीय शक्ति है। लोकतंत्र को पार्टीतंत्र के नाम पर बंदी बनाकर रखने की राजनीति पराजित हुई है। पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने पिछले दिनों एक महत्वपूर्ण बात कही थी कि कम्युनिस्ट अपने पुराने सोच से बाहर नहीं निकलते तो उनको जनता खारिज कर देगी। यह भविष्यवाणी सही साबित हुई है। वाम मोर्चा और खासकर माकपा ने अपनी विचारधारा में युगानुरूप परिवर्तन नहींकिया। पार्टी के अंदर लोकतंत्र की संगति में परिवर्तन नहीं किए । इसके कारण ही पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे की अभूतपूर्व पराजय हुई है। वाम की पराजय पहला कारण है वाम मोर्चे और माकपा का सरकारी दल में रूपान्तरण। माकपा ने 1977 में सत्ता संभालने के बाद वाम मोर्चे ने भूमि सुधार आंदोलन के अलावा कोई भी बड़ा आंदोलन नहीं किया। खासकर अपनी सरकार के खिलाफ कोई संघर्ष नहीं किया। माकपा के नेतृत्व वाले जनसंगठनों की भूमिका जनप्रबंधक…

अम्मा का मंगलसूत्र- डा.सुधा सिंह

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अन्नाद्रमुक पार्टी की नेत्री और तमिलनाडु में चौथी बार चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बनी जयललिता ने शपथग्रहण के तुरंत बाद ही अपने कई चुनावी वादे पूरे किए। जयललिता ने अपने चुनावी घोषणापत्र में कहा था कि वे चुनाव जीतीं तो शादी करनेवाली लड़कियों को चार ग्राम का मंगलसूत्र देंगी। अब जयललिता चुनाव जीत चुकी हैं और उन्होंने अपना यह वायदा भी पूरा कर दिया है। शादी करनेवाली लड़कियों को चार ग्राम सोने का मंगलसूत्र सरकार की ओर से दिया जाएगा।

वायदे उन्होंने और भी किए थे पर पहले पूरा होनेवाले वायदों में से एक वायदा यह भी है। इससे समझा जा सकता है कि मुख्यमंत्री अपने इस वायदे को लेकर गंभीर थीं। जिन सात वायदों को तुरंत पूरा किया गया है उनमें स्त्रयों से जुड़े दो वायदे हैं – एक तो यह कि शादी करनेवाली लड़कियों को जयललिता सरकार चार ग्राम सोना देगी और महिला सरकारी कर्मचारियों का मातृत्व अवकाश तीन महिने के बजाए छः महीने मिला करेगा। दोनों वायदों में दो तरह के तबके की महिलाओं की जरूरतों का ध्यान रखा गया है- घरेलू और कामकाजी। महिलाओं को मातृत्व अवकाश ज़्यादा समय का मिले- ये तमाम भारतीय और विश्व महिला संगठनों की पुरानी…

बुद्ध जयंती पर विशेष- धर्म की नई भूमिका की तलाश

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बौद्ध धर्म के बारे में अनेक मिथ हैं इनमें एक मिथ है कि यह शांति का धर्म है।गरीबों का धर्म है। इसमें समानता है। सच इन बातों की पुष्टि नहीं करता। आधुनिककाल में श्रीलंका में जातीय हिसा का जिस तरह बर्बर रूप हमें तमिल और सिंहलियों के बीच में देखने को मिला है। चीन, बर्मा,कम्बोडिया आदि देशों में जो हिंसाचार देखने में आया है उससे यह बात पुष्ट नहीं होती कि बौद्ध धर्म शांति का धर्म है। बौद्ध धर्म के प्रति आज (अन्य धर्मों के प्रति भी) सारी दुनिया में इजारेदार पूंजीपतियों और अमीरों में जबरदस्त अपील है। इसका प्रधान कारण है बौद्ध धर्म में आरंभ से ही अमीरों की प्रभावशाली उपस्थिति। एच.ओल्डेनबर्ग ने "बुद्धः हिज लाइफ ,हिज टीचिंग्स,हिज आर्डर" ( 1927) में लिखा है कि बुद्ध को घेरे रखने वाले वास्तविक लोगों और प्रारंभिक धर्माचार्यों में जो लोग थे उन्हें देखने से प्रतीत होता है कि समानता के सिद्धान्त का पालन नहीं होता था।प्राचीन बुद्ध धर्म में कुलीन व्यक्तियों के प्रति विशेष झुकाव बना हुआ प्रतीत होता है जो अतीत की देन था। धर्म का प्रचार करने वाले विश्व के प्रथम प्रचारक तापस और भल्लिक व्यापारी वर्ग स…

बांग्ला चैनलों में प्रतिगामी राजनीति का अंत

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बांग्ला चैनलों के आने बाद से पश्चिम बंगाल का राजनीतिक वातावरण बुनियादी तौर पर बदला है। बांग्ला चैनलों ने नए सिरे से राजनीतिक ध्रुवीकरण किया है। नव्य उदार आर्थिक नीतियों और पूंजीवाद विरोधी वातावरण को तोड़ा है। यह प्रक्रिया 2006 में आरंभ हुई थी। इस समय तारा न्यूज,महुआ खबर,स्टार आनंद,24 घंटा,न्यूज टाइम,कोलकाता टीवी, आर न्यूज , आकाश आदि आधे दर्जन से ज्यादा समाचार चैनल हैं जिनसे अहर्निश खबरों का प्रसारण होता है। इनमें '24 घंटा' और 'आकाश' चैनल की 'वामचैनल' हैं।माकपा के प्रति इनकी सहानुभूति है। अन्य चैनलों का किसी दलविशेष से संबंध नहीं है। इन्हें 'अ-वाम चैनल' कहना समीचीन होगा। इन चैनलों की राजनीतिक खबरों का फ्लो वामविरोध पर आधारित है। वामविरोधी समाचार फ्लो बनाए रखने के नाम पर वाम उत्पीड़न पर इन चैनलों ने व्यापक कवरेज दिया है। अन्य विषयों को मुश्किल से 5 फीसदी समय दिया है। 'अ-वाम चैनलों' की प्रस्तुतियों ने स्टीरियोटाइप वक्ता और रूढ़िबद्ध तर्कों के आधार पर वाम राजनीति के बारे में नए आख्यान को जन्म दिया है। इससे वामविरोधी राजनीतिक दलों की इमेज चमकी है। इसस…

साहित्य का मायाजाल और यथार्थ

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साहित्य इन्द्रधनुषी मायाजाल है। इसमें फंसा व्यक्ति हमेशा ख्बाबों की दुनिया में रहता है। ख्बाबों में खोए रहना,इच्छित यथार्थ की कामना के लिए के लिए लिखना और फिर उसे ही सच मान लेना। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो लेखक में निजी और समाज ,अवधारणाओं और आंदोलनों के बारे में विभ्रम की सृष्टि करती है। जो लेखक इस तिलिस्म को जानते हैं वे विभ्रम में नहीं रहते। यही वजह है लेखक के जीवन में कष्ट होते हैं लेकिन रचना में सुख रहता है। पाठक को साहित्य सुख देता है लेकिन लेखक को दुख देता है। साहित्य सृजन से लेखक के लिए दुख और समाज के लिए सुख मिलता है। साहित्य के मायाजाल की धुरी है लेखक का विचारधारा और अवधारणाओं के सम्मोहन में बंधा रहना। साहित्य में जब भी किसी अवधारणा का प्रयोग आरंभ होता है तो एक अवधि के बाद वह रूढ़ि बन जाती है। लेखक इससे जल्द मुक्त नहीं हो पाता। सवाल यह है साहित्यकार नई अवधारणा को जल्द ही रूढ़ि क्यों बना देता है ? फिर उसके विभ्रम में लंबे समय तक क्यों फंसा रहता है ? असल में अवधारणा और यथार्थ की सटीक समझ के अभाव में वह अवधारणा के विभ्रम में फंसा रहता है। इसके कारण वह खास विषय,शैली,भाषा और साहित्य…

पश्चिमबंगाल में 'स्वशासन' बनाम 'सुशासन' की जंग

पश्चिम बंगाल में इसबार का विधानसभा चुनाव 'स्वशासन' ( पार्टी शासन) बनाम 'सुशासन' के नारे के तहत लड़ा जा रहा है। 'सुशासन' की धुरी है जनता और कानून का शासन। 'स्वशासन' की धुरी है पार्टीतंत्र की मनमानी और सामाजिक नियंत्रण। इसके आधार पर वोट पड़ने जा रहे हैं। इसबार का चुनाव नव्य आर्थिक उदारीकरण के सवालों पर नहीं हो रहा। यह चुनाव माओवादी हिसा के सवाल पर भी नहीं लड़ा जा रहा। इस चुनाव में ममताबनर्जी की इमेज और वर्गीय चरित्र को लेकर पर भी बहस नहीं हो रही। इस चुनाव का प्रधान मुद्दा 'स्वशासन' बनाम 'सुशासन' है। मुख्य सवाल है राज्य में पार्टीतंत्र का शासन चलेगा या भारतीय कानून का शासन चलेगा। ममता ने सुशासन के सवालों को प्रधान मुद्दा बनाया है और यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। 
इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो पश्चिम बंगाल विधानसभा के आगामी चुनाव असाधारण होंगे। 35 सालों में वाम मोर्चे ने सातबार आराम से चुनाव जीता है लेकिन इसबार ऐसा लग रहा है कि वाम मोर्चा कठिन चुनौती का सामना कर रहा है। वाम मोर्चा और खासकर भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ( मार्क्सवादी) या माकपा और मम…