बुधवार, 28 जुलाई 2010

संस्कृत ,उर्दू और हिन्दी काव्य के तुलनात्मक अध्ययन की समस्याएं-2-

     (जनकवि बाबा नागार्जुन)
      साहित्य के तुलनात्मक मूल्यांकन के पक्ष में जितनी भी दलीलें दी जाएं ,एक बात सच है कि मूल्यांकन की यह पद्धति बहुत दूर तक साहित्य मूल्यांकन में मदद नहीं करती। क्योंकि साहित्य और साहित्यिक उत्पादन के बीच में बिखरा हुआ संबंध होता है। जरूरी नहीं है कि एक देश और एक ही काल में समान प्रवृत्ति का साहित्य लिखा जाए।
     साहित्य का विकास और प्रक्रिया बेहद जटिल होती है। साहित्य के निर्माण में अनेक दृश्य या ज्ञात कारणों के अलावा अज्ञात कारणों,साहित्येतर कारणों की भी भूमिका होती है। ज्ञात-अज्ञात कारणों का ज्ञान जितना होता जाता है,मूल्यांकन बदलता जाता है। इसी तरह प्रत्येक भाषा के साहित्य और विधा की अपनी निजी परंपरा होती है। अधिकांश मामलों में परिस्थितियों और प्रभावित करने वाले कारणों के बीच में भयानक अंतराल होता है। सामाजिक वर्गों के उदय और विकास की परंपरा में अंतराल होता है। यह अंतराल एक देश में भी संभव है।
    मसलन् भारत में हिन्दी और बांग्ला में कविता और उपन्यास के विकास की परंपरा एक जैसी नहीं है। इसी तरह मध्यवर्ग का उदय भी भिन्न समय पर हुआ है। यही स्थिति हिन्दी-उर्दूभाषी मध्यवर्ग की है। एक ही क्षेत्र में रहने के बावजूद उर्दूभाषी समाज में मध्यवर्ग का विकास उसी रूप में अभी तक नहीं हो पाया है। यही स्थिति कमोबेश संस्कृतभाषियों की है।
   तुलनात्मक साहित्य मूल्यांकन की दूसरी महत्वपूर्ण समस्या है कि इसके जरिए एकल साहित्यिक कृतिकार का मूल्यांकन संभव नहीं है। इसके जरिए साहित्येतिहास पर भी रोशनी नहीं पड़ती।
     किसी लेखक का साहित्य पर क्या प्रभाव पड़ा और उसका समाज पर क्या असर हुआ,पड़ोसी भाषा पर क्या असर हुआ आदि सवालों के समाधान की तुलनात्मक साहित्य सैद्धान्तिकी में कोई सुनिश्चित पद्धति नहीं है। मसलन्, हिन्दी साहित्य के महान आधुनिक लेखक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का रैनेसांकालीन साहित्य पर क्या प्रभाव पड़ा ,यह हम जानते हैं और अनेक आलोचकों ने उसका विवेचन भी किया है। लेकिन जिस पद्धति से भारतेन्दु के साहित्य प्रभाव को खोजा गया है क्या उसी पद्धति से भारतेन्दु साहित्य के सामाजिक प्रभाव की खोज संभव है ? भारतेन्दु पर बांग्ला के नवजागरण का प्रभाव था ,लेकिन क्या बांग्ला साहित्य पर भारतेन्दु का प्रभाव पड़ा था ? यदि नहीं था तो क्या कारण हो सकते हैं ?   
     रैनेसां युग में बांग्ला में मध्यवर्ग का जन्म हो चुका था । क्या भारतेन्दु के समय हिन्दी में भी मध्यवर्ग का जन्म हो चुका था ? रैनेसां के समय बांग्ला में पूंजीवाद का उदय और विकास होता है। हिन्दीभाषी क्षेत्र में भारतेन्दुयुग के समय पूंजीवाद का उदय नहीं हुआ था। ऐसी असमान स्थितियों में बांग्ला और हिन्दी के नवजागरण का तुलनात्मक अध्ययन करने में असुविधा होगी। इस प्रसंग में जितनी भी तुलनाएं आलोचकों ने पेश की हैं वे समस्याएं ज्यादा पैदा करती हैं। यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जातीयता के आधार पर तुलनात्मक अध्ययन की परंपरा है।
    तुलनात्मक अध्ययन दो भिन्न भाषाओं में होता है। एक ही भाषा के दो रचनाकारों या विधाओं में तुलनात्मक अध्ययन नहीं हो सकता । ऐसी अवस्था में साहित्य के एक ही क्षेत्र में यानी हिन्दी भाषी क्षेत्र में हिन्दी-उर्दू, हिन्दी-भोजपुरी, हिन्दी-मैथिली ,हिन्दी-संथाली आदि भाषाओं की कविता का तुलनात्मक अध्ययन करें तो पाएंगे कि आधुनिक हिन्दी कविता का जिस गति से विकास हुआ है। गद्य साहित्य का जिस तरह विकास हुआ है, उतनी तेज गति और गुणवत्ता का साहित्य हिन्दीभाषी क्षेत्र की हिन्दी से इतर भाषाओं में नहीं हुआ है। यही स्थिति इन भाषाओं में मीडिया के विकास की है। हिन्दी मीडिया बेहद शक्तिशाली है लेकिन उर्दू का प्रेस और मीडिया बेहद कमजोर है। जबकि उर्दू के पास समृद्ध साहित्य परंपरा है। कई मायनों में आधुनिककाल की उर्दू कविता हिन्दीभाषी क्षेत्र की सबसे समृद्ध और जनप्रिय कविता है।
    हमें इस सवाल पर भी विचार करना चाहिए कि हिन्दी में भाषा ,शिल्प और अंतर्वस्तु को लेकर प्रयोग ज्यादा हुए हैं या उर्दू में ? काव्य के क्षेत्र में उर्दू कविता और कवि इतने जनप्रिय क्यों हैं ? उर्दू में मध्यवर्ग कमजोर और अविकसित अवस्था में है, उर्दू को हाशिए पर ड़ाल दिया गया है। प्रेस कमजोर है। इसके बावजूद उर्दू की तुलना में हिन्दी का काव्य-संसार काफी पीछे नजर आता है। 
    यह प्रश्न विचारणीय है कि उर्दू कविता जनप्रिय क्यों है ? वैसी जनप्रियता किसी भी हिन्दी के आधुनिक कवि को क्यों नहीं मिली ? मसलन् कैफी आज़मी,शाहिर लुधियानवी,इकबाल आदि जैसी जनप्रियता आम जनता में हिन्दी के लेखकों जैसे निराला,केदारनाथ अग्रवाल,नागार्जुन आदि को क्यों नहीं मिल पायी ?
हम देख सकते हैं कि उर्दू के अनेक कवियों का समूचे राष्ट्र और राष्ट्रीयता पर असर हुआ। वैसा राष्ट्रीय असर हिन्दी का कोई कवि क्यों नहीं छोड़ सका ? क्या किसी कवि के सामाजिक प्रभाव का अध्ययन करने का कोई पैमाना या विशेष पद्धति तुलनात्मक साहित्य के पास है ?  
     

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