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January, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

लोकतंत्र के कु-संवादी और पाँच सवाल का झुनझुना

आज (30जनवरी ) गांधी की हत्या की गयी थी।यह हत्या उस विचार ने की जिसके हिमायती इन दिनों दिल्ली में घर –घर जाकर वोट मांग रहे हैं। गांधी से बड़ा कोई संवादी नहीं था,लेकिन संवाद करने की बजाय हत्यारे ने उनकी ह्त्या कर दी। गांधी की हत्या में जिस संगठन के विचारों की भूमिका थी उसे सारा देश जानता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि गांधी के हत्यारे को नायक बनाकर पेश किया जा रहा है। हत्यारे के पूजकों के खिलाफ मोदी सरकार के किसी भी मंत्री या प्रधानमंत्री ने एक बयान तक जारी नहीं किया। सवाल यह है गांधी के हत्यारे का महिमामंडन करने वालों की संघ प्रमुख और प्रधानमंत्री ने अभी तक निंदा क्यों नहीं की ? यह क्यों नहीं कहा कि देश में हम कहीं पर भी गोडसे की मूर्ति नहीं लगने देंगे।
दिल्ली में गांधी मारे गए और दिल्ली में ही गांधी के हत्यारे का मंदिर बनाने की तैयारियां हो रही हैं। किरनबेदी साफतौर पर जबाव दें कि यदि वे मुख्यमंत्री बनती हैं तो गांधी के हत्यारे का मंदिर बनेगा या नहीं ? मंदिर बनाने वालों की उन्होंने अभी तक निंदा क्यों नहीं की ? क्या इस उत्तर से काम चलेगा कि कानून अपना काम करेगा ! संघ के…

किरनबेदी जी ! पुंसवाद का हिमालय है आरएसएस !!

कल भाजपानेत्री-मंत्री और पूर्व जेएनयू छात्रा निर्मला सीतारामन प्रेस को सम्बोधित करके औरतों के सवाल पर अरविंद केजरीवाल को कोस रही थीं तो अजीब और बेतुका लग रहा था। अरविंद केजरीवाल की औरतों के सवालों पर आलोचना आधारहीन है। यह भाजपा के राजनीतिक दिवालिएपन का प्रमाण है। मैं निजी तौर पर निर्मला सीतारामन को छात्र जीवन से जानता हूँ वे भी किरनबेदी की तरह अ-राजनीति की राजनीति किया करती थीं और मुक्तचिंतकों (फ्रीथिंकर संगठन) के दल में थीं,यह बताने की जरुरत नहीं है कि वे क्या नजरिया रखती थीं। उस दौर के सभी जेएनयू मित्र जानते हैं कि उनकी राजनीति में कोई खास रुचि नहीं होती थी। आमतौर पर महिलाओं के सवालों से जुड़े संघर्षों से वे दूर रहती थीं । इस व्यक्तिगत अवगुण के अलावा हम उस समस्या की ओर आएं जिसकी ओर उन्होंने ध्यान खींचा है।

दिल्ली में भाजपा नया दल नहीं है।संघ का सबसे ताकतवर संगठन इस शहर में है ,इसके बावजूद दिल्ली में औरतों के प्रति सामान्य शिष्ट संस्कृति नहीं बची है। संघ के अलावा कांग्रेस का व्यापक जनाधार है। सवाल यह है दिल्ली में औरत के लिए असुरक्षित माहौल बनाने में इन दोनों दलों की कोई भूमिका …

लोकतंत्र ,कुर्सी संघ और रसमलाई !

लोकतंत्र में कुर्सीसंघ का जन्म हुआ है। कुर्सीसंघ का नया नारा है डिलीवरी और डिलीवरी ! कुर्सीसंघ ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में 11 केन्द्रीय मंत्री, 70 सांसद, प्रधानमंत्री, 1 सुपरकॉप, डेढ़ लाख संघ के तोते मैदान में उतारे हैं। कमाल का सीन बन रहा है ! दिल्ली में इतनी बड़ी संख्या में तोते और  बिल्लियां कभी मैदान में नहीं उतरी थीं। जहाँ देखो तोता जहाँ देखो बिल्ली ! तोते बोलते कम हैं और बिल्लियों का स्वभाव है डिलीवरी ! तोते कह रहे हैं हम न हिन्दू हैं न मुसलमान हैं ! चमार हैं न कुम्हार हैं! हम तो बस तोते हैं! तोते आठ महिने में ख़ूब मोटे हुए हैं! उडते हैं तो सुंदर लगते हैं! बोलते हैं तो ध्यान खींचते हैं! वे कह रहे हैं कलरव ही जीवन है!         कुर्सीसंघ के सर्जक ने कहा है लोकतंत्र  के लिए तोते- बिल्लियाँ सबसे उपयुक्त पात्र हैं! लोकतंत्र लाना है तो तोते और बिल्लियों की मानो और मजे में रहो ! कुर्सी संघ का नारा है  डिलीवरी -डिलीवरी - डिलीवरी! टीवी टॉकशो -टॉक शो !       दिल्ली में तोते - बिल्लियाँ और टीवीवाले समझा रहे हैं लोकतंत्र लाना है तो धरना मत दो, आंदोलन मत करो, नारे मत लगाओ,हडताल मत करो,…

कैमरा और जनतंत्र

कैमरे ने नेताओं के होश उडाए हुए हैं। कैमरे की खूबी है आप उसके बिना रह भी नहीं सकते,राजनीतिज्ञ की मुश्किल है वे कैमरे में जी नहीं सकते। कैमरे के प्रबंधन के कौशल में जो माहिर हैं उनको राजनीति प्रबंधन सीखने की जरुरत है। हमारे अधिकांश नेता न तो ठीक से कैमरा प्रबंधन जानते हैं और नहीं राजनीति प्रबंधन कला के उस्ताद हैं। वे कैमरे के सामने खड़ा होना भर जानते हैं। नेताओं के लिए कैमरे के तदर्थ है, जबकि राजनीति के वे होलटाइमर का रवैय्या है। राजनीति में वे पेशेवर नहीं हैं। राजनीति में होलटाइमर बहुत खराब होता है। यह राजनीति का निष्क्रिय तत्व है।राजनीति और कैमरा दोनों ही राजनेताओं से पेशेवर और नाटकीय रवैय्ये की मांग करते हैं।

किरनबेदी के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी कमजोरी है कि वे कैमरा और राजनीति दोनों में तदर्थभाव से काम कर रही हैं। पहले वे स्वयंसेवी राजनीति करती थीं,फिलहाल भाजपा की होलटाइमर हैं। राजनीति और कैमरे के लिहाज से ये दोनों रुप निरर्थक हैं। अप्रासंगिक हैं। कैमरा तब अपील करता है जब आप नाटकीय हों और जनता में हों। कैमरा तब अपील नहीं करता जब आप कैमरे के फ्रेम में हों। किरनबेदी की सारी मुश्…

ओबामा -मोदी विज़न का लक्ष्य असुरक्षित भारत

अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत से जा चुके हैं। उनकी तीन दिन की यात्रा कई मायनों में उल्लेखनीय रही। इसमें सबसे उल्लेखनीय है भाजपा का परमाणु शांति संधि पर यू-टर्न। भाजपा जब विपक्ष में थी तो उसने इस संधि का हर स्तर पर वाम के साथ विरोध किया था और कहा था कि भाजपा जब सत्ता में आएगी तो परमाणु संधि पर पुनर्विचार करेगी,लेकिन हुआ उल्टा,भाजपा ने भारत की शर्तों को लागू कराने की बजाय संधि के प्रसंग में अमेरिकी बातों को मान लिया । इसका अर्थ है कि परमाणु संधि पर भाजपा को मनाने में मनमोहन सिंह की बजाय ओबामा सफल रहे।

भाजपा को परमाणु संधि पर यदि अपना नीतिगत मंतव्य बदलना ही था तो उसे कम से कम आम जनता के सामने उसके कारणों पर रोशनी डालनी चाहिए। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि लायबिलटी बिल पर संसद से पारित प्रावधानों में कोई कतर-ब्योंत करने का प्रधानमंत्री को अधिकार नहीं है। सच्चाई यह है भारतीय कंपनियां इस बिल के प्रावधानों को एकसिरे से खारिज करती रही हैं और यही काम भिन्न तरीके मोदी ने किया है। लायबिलटी बिल में कोई संशोधन किए बिना परमाणु समझौते को लागू करना संभव नहीं होगा। तीसरी बात यह कि दुर्धटना की …

नामवर सिंह और अस्मिता विमर्श

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अस्मिता का सवाल तदर्थ सवाल नहीं है। इसे चलताऊ ढ़ंग से नहीं देखना चाहिए । अस्मिता की पेचीदगियों और वैचारिक सरणियों पर हिन्दी में संवाद कम हो रहा है। खासकर मार्क्सवादी आलोचना ने अस्मिता से जुड़े साहित्यिक सवालों को कभी गंभीरता से नहीं लिया। अस्मिता पर चलताऊ नजरिए को देखने के लिहाज से नामवरजी के अस्मिता सम्बन्धी विचारों को विश्लेषित करना समीचीन होगा। नामवर सिंह ने लिखा है ,' भारतीय नवजागरण की मूल समस्या है भारतेन्दु के शब्दों में 'स्वत्व निज भारत गहै।' यह 'स्वत्व' वही है जिसे आजकल 'अस्मिता' कहते हैं। राजनीतिक स्वाधीनता इस स्वत्व-प्राप्ति की पहली शर्त है। नवजागरण के उन्नायक इस आवश्यकता का अनुभव न करते रहे होंगे, यह सोचना कठिन है, फिर भी तथ्य यही है कि नवजागरणकालीन प्रकाशित साहित्य में राजनीतिक स्वाधीनता का स्पष्ट स्वर कम ही सुनाई पड़ता है।' ( हिन्दी का गद्यपर्व, 2010, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.87) यह ‘स्वत्व’ भाषायी अस्मिता के संदर्भ में आया है। इसका अस्मिता के विराट फलक के साथ घालमेल नहीं कर सकते। 'स्वत्व' का अर्थ अस्मिता है तो इसका अर्थ यह …

युवाओं का नरक और मोदी का कौशल

हाल ही में 11शहरों के स्कूल और कॉलेजों में पढ़ने वाले दस हज़ार युवाओं में बंगलौर स्थित " चिल्ड्रन्स मूवमेंट्स फ़ॉर सिविल एवेयरनेस " नामक संस्था ने एक सर्वे किया जिसमें यह तथ्य सामने आया है कि आधे से ज्यादा युवा यह मानते हैं कि लोकतंत्र की तुलना में फौजीशासन अच्छा होता है, पैंसठ फ़ीसदी युवा मानते हैं कि विभिन्न धर्मों के लड़के- लड़कियों में मिश्रण नहीं होना चाहिए। आधे से ज्यादा युवा यह मानते हैं कि लड़कियां उत्तेजक कपड़ों के जरिए पुरुषों को उत्तेजित करती हैं। आधे से ज्यादा युवा मानते हैं औरतों के पास हिंसा स्वीकार करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। सर्वे में आधे से ज्यादा युवाओं की राय है कि देश को तानाशाह नेता की ज़रुरत है ।            यह सर्वे इस बात का प्रतीक है कि हमारे देश में लोकतंत्र की चेतना कितनी कमज़ोर है और लोकतांत्रिक भावबोध और लोकतांत्रिक मूल्यों से रहित किस तरह का युवावर्ग हमारे समाज में निर्मित हो रहा है। ये वे युवा हैं जो शिक्षित हैं और जिन तक लोकतंत्र के फ़ायदे पहुँचे हैं। इससे यह भी पता चलता है कि हमारी आधुनिक शिक्षा और मीडिया की समस्त प्रस्तुतियाँ किस त…

जयपुर-बड़ौदा के साहित्य- कला उत्सव और वामलेखक संगठनों की चुनौतियाँ

जयपुर साहित्य मेला आरंभ हो गया है और बड़ौदा का कला - संगीत उत्सव आरंभ होने वाला है। इन दोनों आयोजनों से भाजपा की राज्य सरकारें जुड़ी हैं। भारत के वामलेखकों को इस तरह के आयोजनों को ध्यान से देखना और सीखना चाहिए । वामलेखकों के संगठनों जनवादी लेखक संघ, प्रगतिशील लेखक संघ और अन्य सांस्कृतिक संगठनों को भी इस तरह के आयोजनों के बारे में गंभीरता से लेखकों में संवाद चलाने की ज़रुरत है। इस तरह के आयोजन स्वागतयोग्य हैं। इस तरह के आयोजन जहाँ एक ओर साहित्य और कलाओं को लोकप्रिय बनाते हैं , वहीं मध्यवर्गीय युवाओं में साहित्य और कलाओं के प्रति नयी उमंग और कला संस्कार पैदा करने में मदद करते हैं। हमारे वाम लेखक संगठनों के आयोजन बंद दायरों में कैद होकर रह गए हैं और वे युवाओं के बृहत्तर तबक़ों और मीडिया को आकर्षित नहीं कर पाते हैं। वे गिनतीभर लोगों के आयोजनमात्र होकर रह गए हैं।         नए दौर की माँग है कि साहित्य और कलाओं को आम जनता के बृहत्तर मध्यवर्गीय युवा समूहों से जोड़ा जाय। साहित्य और कलाओं को सैलीब्रिटी बनाकर यह काम किया जा रहा है। इसमें साहित्य और कला के संस्कार या आदतों के निर्माण पर मुख्य रु…

टीवी डिबेट:लोकतंत्र में टीवी संपन्न और सूचना विपन्न

राजनीति के लिए टीवी युग कलियुग है। जो टीवी में गया वह वहीं का होकर रह गया। टीवी में दाखिल होना जितना मुश्किल है उससे जान बचाकर निकलना उससे भी ज्यादा मुश्किल है। सामान्य दर्शक ,टीवी ज्ञान का भूखा होता है। यह वह दर्शक है जो ज्ञान और सूचना से वंचित है और टीवी के जरिए अपने दिमाग़ के स्तर को "ऊँचा "उठाना चाहता है। समाचार टीवी चैनल यह भ्रम पैदा करते हैं कि वे सूचना संपन्न बनाते हैं ,टीवी दर्शक सूचना संपन्न नागरिक है, वे सच के रखवाले हैं!      भारत में टीवी ने लोकतंत्र को ताक़तवर बनाया है लेकिन लोकतांत्रिक मनुष्य को न्यूज़ कंगाल बनाया है। टीवी के टॉकशो हों या धर्म शो हों या इवेंट शो हों वे मन को संतोष देने का , तुरंता प्रचार का काम करते हैं। टीवी शो वस्तुत: "सेल-सेल"की रणनीति की साझा परिणति है। आमतौर पर नेतागण टीवी का इमेज निर्माण के लिए इस्तेमाल करते हैं लेकिन टीवी टॉकशो इमेज नहीं बनाते बल्कि इमेज बिगाड़ते हैं, यही वजह है टीवी टॉकशो में दलीय प्रतिनिधि के तौर पर वे नेता या प्रवक्ता बैठे रहते हैं जिनका कोई जनाधार नहीं है, मसलन् जिनकी संगठन में फ़ोटो से ज्यादा हैसियत नहीं है…