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बुधवार, 31 अगस्त 2016

घृणा के सौदागर


         मैं इसी साल जब कश्मीर में घूम रहा था,लोगों से मिल रहा था,बातें कर रहा था,तो एक बात साफ नजर आ रही थी कि कश्मीर तेजी से बदल रहा है.इस बदले हुए कश्मीर से कश्मीरी पृथकतावादी और हिन्दू फंडामेंटलिस्ट बेहद परेशान थे।मैं पुराने श्रीनगर इलाके में कई बार गया,वहां विभिन्न किस्म के लोगों से मिला,उनसे लंबी बातचीत की,खासकर युवाओं का बदलता हुआ रूप करीब से देखने के लिए कश्मीर विश्वविद्यालय में भी गया वहां युवाओं की आपसी बातचीत के मसले देखे,उनके चेहरे पर एक खास किस्म का चैन देखा,युवाओं में पैदा हुए लिबरल भावों और उनकी आपसी संगतों में उठने वाले सवालों और विचार-विमर्श के विषयों को सुनकर लगा कि कश्मीर के युवाओं में पृथकतावाद-आतंकवाद या धार्मिक फंडामेंटलिज्म को लेकर एकसिरे से घृणा का भाव है।
         
कश्मीर विश्वविद्यालय में एक जगह दीवार पर पृथकतावादी नारा भी लिखा देखा,जिसमें लिखा था ´भारत कश्मीर छोड़ो´,मेरी आंखों के सामने एक घटना घटी जिसने मुझे यह समझने में मदद की कि आखिर युवाओं में क्या चल रहा है। हुआ यह कि मैं जब साढ़े तीन बजे करीब हजरतबल मस्जिद से घूमते हुए कश्मीर विश्वविद्यालय पहुंचा तो देखा दो लड़कियां एक बैनर लिए कैंपस में प्रचार कर रही हैं, वे विभिन्न छात्र-छात्राओं के बीच में जाकर बता रही थीं कि एक जगह बलात्कार की घटना घटी है और उसमें कौन लोग शामिल हैं,मैं उनका बैनर नहीं पढ़ पाया क्योंकि वह कश्मीरी में लिखा था।लेकिन बैनर लेकर प्रचार कर रही दोनों लड़कियों की बात को कैंपस में विभिन्न स्थानों पर बैठे नौजवान सुनने को राजी नहीं थे,वे बिना सुने ही मुँह फेर ले रहे थे।इस घटना से मुझे आश्चर्य लगा,मैंने एक छात्र से पूछा कि बैनर लेकर चल रही लड़कियां किस संगठन की हैं ,तो वो बोला ,मैं सही -सही नहीं कह सकता लेकिन ये पृथकतावादी संगठनों के लोग हैं और आए दिन इसी तरह बैनर ले कैम्पस में घूमते रहते हैं,कोई इन संगठनों की बातें नहीं सुनता,क्योंकि कश्मीरी छात्र अमन-चैन चाहते हैं।

दिलचस्प बात यह थी मेरी आँखों के सामने तकरीबन 30मिनट तक वे बैनर लेकर घूम-घूमकर छात्रों को बताने की कोशिश करते रहे लेकिन हर बार उनको छात्रों के छोटे छोटे समूहों में निराशा हाथ लग रही थी कोई उनकी बात सुनने को तैयार नहीं था,अंत में बैनर लिए युवाओं ने निराशा भरे शब्दों में अंग्रेजी में धिक्कारभरी भाषा में अपने गुस्से का इजहार किया,इस पर कुछ लड़कियों ने मुँह बनाकर उनको चिढ़ाने की कोशिश की,थोड़ी दूर चला तो देखा लड़के-लड़कियां बड़े आनंद से एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए टहल रहे हैं,बाहर निकलकर मुख्य सड़क से जब कार से घूमते हुए मैं पुराने शहर की ओर आया तो देखा कई युवा युगल मोटर साइकिल पर एक-दूसरे से चिपके हुए दौड़े चले जा रहे हैं,यह भी देखा कि बड़ी संख्या में मुसलिम लड़कियां और लड़के आधुनिक सामान्य सुंदर ड्रेस पहने हुए घूम रहे हैं,बाजार में खरीददारी कर रहे हैं,मुख्य बाजार में अधिकतर मुसलिम औरतें बिना बुर्के के जमकर खरीददारी कर रही हैं।रात को 11बजे एक रेस्तरां में डिनर करने गया तो वहां पर पाया कि कश्मीरी प्रेमी युगल और युवाजन आराम से प्रेमभरी बातें कर रहे हैं,कहीं पर कोई आतंक का माहौल नहीं,किसी की भाषा में घृणा के शब्द नहीं,मैंने अपने टैक्सी ड्राइवर और होटल के मालिक से पूछा इस समय कश्मीर में लड़कियां किस तरह शादी कर रही हैं ॽ सभी ने एकस्वर में कहा इस समय कश्मीरी लड़कियां गैर-परंपरागत ढ़ंग से,प्रेम विवाह कर रही हैं,वे स्वयं तय कर रही हैं,यह 1990-91 के बाद पैदा हुआ एकदम नया फिनोमिना है।

कश्मीरी युवाओं में उदातावादी रूझानों को देखकर मन को भय भी लग रहा था कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि कश्मीर में फिर से अशांति लौट आए ॽक्योंकि फंडामेंटलिस्ट ताकतें नहीं चाहतीं कि कश्मीर में उदारतावादी भावनाएं लौटें,मुझे यह भी लग रहा था कि जल्द ही टकराव हो सकता है।मैंने इस तनाव को बार बार वहां महसूस किया ,मुझे लगा वहां आम जनता में उदारतावादी राजनीति और जीवन मूल्यों के प्रति जबर्दस्त आग्रह है और आतंकी-पृथकतावादी और हिन्दू फंडामेंटलिस्ट नहीं चाहते कि कश्मीर में उदारतावाद की बयार बहे,वे हर हालत में आम जनता के मन में से उदारतावाद के मनोभावों को मिटाने की कोशिश करेंगे।मैंने कश्मीर से लौटकर वहां के उदार माहौल पर फेसबुक में लिखा भी था,दुर्भाग्यजनक है कि मेरे लिखे जाने के कुछ दिन बाद ही बुरहान वानी की हत्या होती है और अचानक कश्मीर में उदारतावादी माहौल को एक ही झटके में आतंकी-पृथकतावादी माहौल में तब्दील कर दिया गया।

जिसने भी बुरहान वानी की हत्या का फैसला लिया ,वह एकदम बहुत ही सुलझा दिमाग है उसके मन में बुरहान वानी नहीं बल्कि कश्मीर का यह उदार माहौल था जिसकी उसने हत्या की है।ये वे लाखों कश्मीरी युवा हैं जिनके उदार मूल्यों में जीने की आकांक्षाओं को एक ही झटके में रौंद दिया गया।मैं इस तरह की आशंकाओं को लेकर लगातार सोच रहा था कि मोदीजी-महबूबा के सरकार में रहते कश्मीर में शांति का बने रहना संभव नहीं है,मैं जब सोच रहा था तो उस समय सतह पर शांति थी,लेकिन मैं आने वाले संकट को महसूस कर रहा था,अफसोस की बात है कि मोदी-महबूबा की मिलीभगत ने कश्मीर की जनता के अमन-चैन में खलल डाला,शांति से जी रहे कश्मीर को फिर से अशांत कर दिया,नए सिरे से आतंकियों और सेना की गिरफ्त में कश्मीर के युवाओं को कैद कर दिया।









बुधवार, 20 जुलाई 2016

मोदीजी का कश्मीरी खेल



मोदी सरकार का कश्मीर को लेकर रवैय्या साफ है वे कानून-व्यवस्था का मसला मानकर चल रहे हैं इसीलिए वहां सेनाध्यक्ष को परिस्थिति का जायजा लेने भेजा है,यदि राजनीतिक समस्या मानते तो गृहमंत्री राजनाथ सिंह को भेजते।दुर्भाग्यजनक है मोदी मंत्रीमंडल के किसी सदस्य का,यहां तक कि मोदीजी का कश्मीर के हालात पर ट्विट मूवमेंट नजर नहीं आ रहा,सवाल यह है संकट की अवस्था में इन सबके मुँह पर ताला क्यों लग जाता है? आतंकियों के खिलाफ और आम जनता के पक्ष में बोलने के लिए इनके पास कोई वाक्य तक नहीं है,इतने गूंगे तो नहीं हो ट्विटर नरेश मोदीजी!

कश्मीर के बिगड़े हुए हालात पर सर्वदलीय बैठक बुलाने से पीएम मोदी भाग क्यों रहे हैं,यह देश आऱएसएस के इशारे पर चलेगा तो हर राज्य में संकट पैदा होगा।कश्मीर पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग एक सप्ताह से विपक्ष कर रहा है लेकिन मोदीजी के कानों पर जूँ तक नहीं रेंग रही।देश को चलाने का यह तरीका अंततःदेश का नुकसान करेगा,गरीब कश्मीरियों के लिए और संकट पैदा करेगा।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने कश्मीर की घटना का संज्ञान लिया,केन्द्र -राज्य सरकारों को 15 दिन में जबाव देने का आदेश दिया। हमने भी फेसबुक पर यह मांग रखी थी कि मानवाधिकार आयोग संज्ञान ले। आयोग का शुक्रिया।

कश्मीर की निहत्थी जनता पर पुलिसबलों की कार्रवाई के परिणाम सामने आने लगे लगे हैं विभिन्न अस्पतालों में पेलेटगन और गन से घायल हुए मरीजों में से 93मरीज हमेशा के लिए अपाहिज हो सकते हैं,ये गंभीर रूप से घायल हैं,इनके इलाज का खर्चा न तो राज्य सरकार दे रही है और केन्द्र सरकार दे रही है बल्कि अस्पताल अपनी ओर से मुफ्त इलाज कर रहे हैं और खर्चा उठा रहे हैं। Bone & Joint Hospital में इसतरह के 60 मरीजों का इलाज चल रहा है बाकी 30मरीजों का दूसरे अस्पतालों में इलाज चल रहा है। इन मरीजों को देखने अभी तक कोई नेता नहीं पहुँचा,किसी ने सहायता कोष नहीं बनाया,कमाल है 40 से ज्यादा निर्दोष लोग मारे गए हैं लेकिन अभी तक इन मौतों पर सुप्रीमकोर्ट ने भी संज्ञान नहीं लिया। कहां सो गया भारत का मानवतावाद ।



जम्मू-कश्मीर उच्चन्यायालय ने हाल के घटनाक्रम में घायल लोगो को मुफ्त इलाज की सुविधा दिए जाने का आदेश दिया है ।

जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने आम जनता को सरकारी दुकानो से राशन तुरंत मुहैय्या कराने के आदेश दिए हैं,साथ में यह भी कहा है कि नागरिकों को उधार राशन दिया जाय।

जम्मू-कश्मीर उच्चन्यायालय ने राज्य सरकार की इस बात के लिए आज तीखी आलोचना की कि उसने कर्फ्र्यू ग्रस्त इलाकों में जरूरत की अनिवार्य वस्तुओं की सप्लाई नहीं की।न्यायालय की यह टिप्पणी केन्द्र सरकार के मुँह पर भी करारा तमाचा है।अदालत ने राज्य के हालात में अदालत में पेश की गयी रिपोर्ट पर असंतोष व्यक्त किया है। रिपोर्ट के अनुसार अकेले श्रीनगर में 400 सरकारी दुकानें हैं जिनमें बमुश्किल 50दुकानें खुली रही हैं।



कश्मीर के हाल के घटनाक्रम में 2115लोग घायल हुए थे इनमें से 1924 को अस्पताल से इलाज के बाद घर भेज दिया गया है।लेकिन191लोग अभी भी गंभीर रूप से घायल हैं जिनका इलाज चल रहा है,इनमें 70 की आंखों में पेलेट गन के छर्रे लगे हैं।

कल (18जुलाईR 2016)अनंतनाग जिले के गाजीगुंड इलाके में सेना के ऑपरेशन के दौरान तीन लोग मारे गए,इनमें दो औरतें भी हैं,सेना ने इस घटना के जांच के आदेश दिए हैं।यह सही दिशा में उठाया कदम है,उल्लेखनीय है सेना के वाहन पर लोग पत्थर फेंक रहे थे जिसके जबाव में सेना ने गोली चलायी।कायदे से सेना को बुरहान वानी की मौत और उसके बाद के समूचे घटनाक्रम पर जांच का आदेश देना चाहिए।

सवाल यह घायलों को देखने अभी तक जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री अस्पताल और उनके घर क्यों नहीं गयीं,किसके आदेश का इंतजार है मैडम।

हमारे पुराने जेएनयू के मित्र अमिताभ मट्टू इन दिनों जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री के सलाहकार हैं ,दिलचस्प बात यह है कि कोई नहीं जानता कि बुरहान वानी को मारने का आदेश किसने दिया। जबकि महबूबा मुख्यमंत्री होने के साथ राज्य की गृहमंत्री भी हैं।कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है,फिर वानी के बारे में आदेश किसने दिए ?

भाजपा ने पीडीपी के साथ जो साझा कार्यक्रम बनाया था उसमें हुर्रियत से बात करने का वायदा किया था, आज टीवी पर भाजपा नेता कह रहे हैं हुर्रियत से बात नहीं करेंगे क्योंकि वह पृथकतावादी संगठन है। सवाल यह है जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव के समय भी वह पृथकतावादी संगठन था , उस समय उससे समझौता करके चुनाव में वोट क्यों लिए ? बातचीत करने का वायदा क्यों किया ?

कश्मीरियत, इंसानियत और जम्हूरियत का मोदीजी ने जम्मू-कश्मीर के चुनाव में वोट के लिए दिया नारा है, आज यही नारा मोदीजी और महबूबा ने अंगारों की भेंट चढ़ा दिया है।

यह है भाजपा पीडीपी समझौते का आधारभूत कार्यक्रम जिसमें १५ सूत्र रखे गए हैं आज इस न्यूनतम साझा कार्यक्रम को मोदीजी ने अंगारों के हवाले कर दिया है,जम्मू-कश्मीर की जनता के साथ यह धोखाधडी है-

The PDP and the BJP on Sunday released their common minimum programme (CMP) for running the coalition government in Jammu and Kashmir.

Here are the 15 highlights of the CMP:

1) To meet the political and economic objectives of the alliance, it is important to create an environment of peace, certainty and stability.

2) The government will be transformed into a 'smart government' which will be pro-active, transparent and accountable.

3) It shall be the mission of the government to be the most ethical state in the country from the present day position of being the most corrupt state.

4) The overall economic policy will align the economic structure of Jammu and Kashmir with its own resources, skills and society.

5) The government will ensure genuine autonomy of institutions of probity which include the state accountability commission, vigilance commission, which will be re-designated as transparency commission and an organisation which deals with the Right to Information Act.

6) Following the principles of "Insaniyat, Kashmiriyat and Jamhooriyat" of the earlier NDA government led by Atal Bihari Vajpayee, the state government will facilitate and help initiate a sustained and meaningful dialogue with all internal stakeholders which include political groups irrespective of their ideological views and predilections.

The dialogue will seek to build a broad based consensus on resolution of all outstanding issues of the state.

7) The government will examine the need for de-notifying disturbed areas which will as a consequence enable the union government to take a final view on the continuation of the Armed Forces Special Powers Act (AFSPA) in these areas.

8) Article 370: The present position will be maintained on all constitutional provisions including special status.

9) Dialogue with Hurriyat Conference: The coalition government will facilitate sustained dialogue with all stakeholders irrespective of their ideological views.

10) All the land other than those given to the security forces on the basis of lease, licenses and acquisition under the provision of the land acquisition act shall be returned to the rightful owners except in a situation where retaining the land is absolutely imperative in view of a specific security requirement.

11) The government will work out a one-time settlement for refugees from Pakistan occupied Kashmir of 1947, 1965 and 1971.

12) The government will take measures for sustenance and livelihood of the West Pakistan refugees.

13) It will extend all benefits accruing to the people living on the Line of Control (LoC) to the people living on the international border.

14) It will secure a share in the profits of NHPC emanating from Jammu and Kashmir's waters to the state government.

15) It will reverse all royalty agreements with NHPC.

हुर्रियत नेता सैय्यद अली शाह जिलानी ने कश्मीर में सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए विश्वसमुदाय को जो पत्र लिखा है वह निंदनीय है।यह पत्र भारत की संप्रभुता और अखंडता के खिलाफ है।

जो संगठन समाज में हिन्दू बनाम मुसलमान ,भारत बनाम पाक का गंदा खेल खेल रहे हैं वे स्टीरियोटाइप विचारों,इमेजों और तर्कों के आधार पर बातें कर रहे हैं।किसी भी किस्म का स्टीरियोटाइप विमर्श अंततःज्ञानहीन बनाता है,सही समझ नष्ट करता है।

आरएसएस और आतंकियों में राष्ट्रवाद महान है,एक को हिन्दू राष्ट्र चाहिए,दूसरे को मुस्लिम राष्ट्र चाहिए,दोनों कश्मीरमें राष्ट्रवाद का ढोल पीटते रहते हैं,आतंकी बंदूक और बारूद के जरिए राष्ट्रवाद लाना चाहते हैं, मोदी सरकार को सेना के जरिए राष्ट्रवाद की रक्षा करनी पड़ रही है,सच्चाई यह है कश्मीर को किसी भी रंगत का राष्ट्रवाद नहीं चाहिए,वहां की जनता मानवतावाद चाहती है।जो संगठन राष्ट्रवाद को महान बनाने में लगे हैं वे वस्तुतःमानवता और कश्मीरी जनता के दुश्मन हैं।कश्मीर की जनता को राष्ट्रवाद नहीं मानवतावाद चाहिए।सेना नहीं सहयोग चाहिए।

कश्मीर के सभी अखबारों के संपादकों ने अखबारों के प्रकाशन पर लगी पाबंदी को अनुचित बताया है और उसकी कड़े शब्दों निंदा की है और मांग की है कि राज्य सरकार यह पाबंदी तुरंत हटाए। दिलचस्प बात यह है कि राज्य सरकार खुलेआम पृथकतावादी संगठनों के प्रति हमदर्दी दिखाती रही है,उनको नियंत्रित करने के लिए उसने कोई कदम नहीं उठाए,लेकिन प्रेस पर हमला करने के लिए तुरंत कदम उठा लिए,यदि राज्य सरकार को किसी अखबार की किसी रिपोर्ट,तथ्य आदि को लेकर आपत्ति थी तो उसे संपादक को बुलाकर पूछना चाहिए,बात करनी चाहिए,कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए,लेकिन यह सब न करके सीधे सभी अखबारों के प्रकाशन पर पाबंदी लगाकर यह संदेश दिया है कि कश्मीर का प्रेस आग भड़का रहा था।वास्तविकता यह है कि आग भड़काने का काम किसी और ने किया,आग भड़काने वाले को राज्य सरकार कुछ नहीं बोल रही।

कश्मीर की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रहीं।जो लोग सोच रहे हैं कि मीडिया को बंद करके हालात सुधारे जा सकते हैं,वे गलतफहमी के शिकार हैं।इस समय कश्मीर में अघोषित आपातकाल है।राज्य सरकार ने सभी अखबारों पर पाबंदी लगा दी है।मोबाइल बंद हैं,इंटरनेट बंद है।सड़कों पर कर्फ्यू है।आम नागरिक किस तरह गुजर बसर कर रहा होगा,रोज खाने-कमाने वाले कैसे जी रहे होंगे,इसकी ओर किसी का ध्यान नहीं है।जम्मू-कश्मीर सरकार तुरंत अखबारों पर लगी पाबंदी हटाए और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बहाल करे।

कश्मीर को शांति नहीं सहानुभूति और सही समझ की जरूरत है। जो लोग कश्मीर को भारत के साथ देखना चाहते हैं वे शांति स्थापित करने तक न देखें। इससे समस्या सुलझने वाली नहीं है। कश्मीर को सहानुभूति और सही समझदारी के साथ देखो।


रविवार, 17 जुलाई 2016

खान ड्रेस ,पेंट शर्ट और सेना

            पाक समर्थित आतंकियों की कश्मीर में भूमिका को कम करके नहीं देखना चाहिए।खासकर पीडीपी-भाजपा सरकार आने के बाद नए सिरे से आतंकियों को जनता में फैलने का मौका मिला है, इनमें से अनेक ग्रुपों ने पीडीपी-भाजपा के लिए चुनावों में काम किया है।ऐसी स्थिति में वहां सामान्य स्थिति बहाल करने में सेना को कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी। आतंकियों के जनाधार बनाने के नए नए तरीके सामने आ रहे हैं,उनमें से एक है साइबर मंच।साइबर मंचों के जरिए युवाओं को आतंकी विभिन्न रूपों में गोलबंद कर रहे हैं,लेकिन सरकार ने इसको रोकने के लिए कोई मैकेनिज्म विकसित नहीं किया। उल्लेखनीय है आतंकी –साम्प्रदायिक –पृथकतावादी संगठन सब समय हथियारबंद जंग ही नहीं लड़ते,वे विभिन्न छद्म रूपों में युवाओं को अपने इर्द-गिर्द गोलबंद करते हैं। यहां एक पुराना वाकया याद आ रहा।

सन् 1989-90 के बाद कश्मीर में जो आतंकी उभार आया था उसमें एक बार आतंकियों ने सारे पुरूषों को खान ड्रेस पहनने का आदेश दे दिया,उन दिनों घाटी में आतंकियो का भय इस कदर व्याप्त था कि कोई व्यक्ति उनके आदेस की अवहेलना नहीं कर सकता था।

खान ड्रेस (पठान ड्रेस) पहनने का आदेश निकलते ही देखते ही देखते एक सप्ताह में सभी पुरूषों ने पठान ड्रेस बनवाए और फिर पहनने लगे,यहां तक कि पुरूष पठान ड्रेस पहनकर ऑफिस भी जाते थे,यह सिलसिला दो महिने तक चला।एक दिन सेना ने तय किया कि पठान ड्रेस के खिलाफ मुहिम चलायी जाय। सेना को तुरंत एक्शन में जाने के आदेश दिए गए,सेना ने सड़कों-गलियों-मुहल्लों में खान ड्रेस पहने पुरूषों को पकडकर उनके चूतड़ पर कसकर आठ-दस डंडे लगाने शुरू किए,जो भी खान ड्रेस पहने दिखता उसकी खबर ली जाती,लोग घरों में जाकर अपने चूतडो की सिकाई कर रहे थे और परेशान होकर दर्द से कराह रहे थे,कुछ सप्ताह चले इस अभियान के कारण समूची घाटी में पुरूषों ने पठान ड्रेस पहननी बंद कर दी।सेना जिसे भी पठान ड्रेस पहने देखती सीधे सवाल करती ,चूतड पर डंडे लगाती और कहती कि कल से पैंट-शर्ट में दिखाई दो,इस तरह पठान ड्रेस से कश्मीर को मुक्ति मिली।जबकि आतंकियों ने दो माह तक सारे कश्मीर के पुरूषों को पठान ड्रेस बंदूक की नोंक पर पहनाकर अपना वैचारिक-सामाजिक वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश की जिसे सेना ने नाकाम कर दिया।



इस कहानी को कहने का आशय यह है कि आतंकी-साम्प्रदायिक संगठन आम जनता की जीवनशैली पर हमला बोलते हैं और अपना ड्रेसकोड थोपते हैं।इसलिए इन संगठनों से सिर्फ राजनीतिक संघर्ष ही नहीं जीवनशैली के स्तर पर भी संघर्ष करना पड़ता है।

आतंकी टीपू सुल्तान की मौत और हमारी सेना

         यह वाकया 1992-93 का जब कश्मीर में संकट गहरा था।आतंकी-पृथकतावादी संगठनों का उभार चरम पर था,घर –घर तलाशी हो रही थी।हर आदमी पर पुलिस नजर रखे हुए थी,ऐसे हालात में पाक स्थित आतंकियों ने कश्मीर के क इलाके के सरगना के तौर पर टीपू सुल्तान का नाम मीडिया में उछाल दिया,टीपू सुल्तान ने भी खुशी-खुशी इलाके के कमांडर की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। यह वाकया कश्मीर के किसी छोटे इलाके का है, आतंकी कमांडर बनाए जाने की घोषणा के बाद टीपू सुल्तान बड़े अहंकारी भाव में रहने लगा,दिन में एक-दोबार बाजार में एके47 लेकर घूम आता था।इलाके के लोग घरे रहते लेकिन जानते थे कि वह आतंकी नहीं है गरीबी का मारा चिरकुट किस्म का आदमी है।

टीपू सुल्तान खुश था कि उसको आतंकियों ने इलाके का कमांडर बना दिया, वास्तविकता यह थी कि टीपू सुल्तान ढाई पसली का आदमी था,एकदम सूखा हुआ शरीर, लेकिन साढ़े छह फुट लंबा। खाने और सोने का कोई ठिकाना नहीं ,उसके परिवार में कोई नहीं था,वह एक छोटे से कमरे के घर में रहता था। मीडिया में ज्योंही टीपू सुल्तान का नाम आतंकियों ने उछाला उस मुहल्ले को पुलिस ने कुछ ही दिन बाद आकर उसे घेर लिया।उसके नाम की घोषणा के बाद उस पर इनाम भी घोषित कर दिया गया।लेकिन मुश्किल यह थी पुलिस और सेना के पास उसका कोई फोटो नहीं था,यहां तक कि आतंकियों के पास भी फोटो नहीं था। दस-पन्द्रह दिन बाद कश्मीर के डाउन टाउन इलाके को तकरीबन 11सौ सैनिकों ने घेर लिया,मुहल्ले के सारे लोगों को कहा गया कि वे टीपू सुल्तान को सेना को सौंप दें,दिल्लगी यह कि टीपू सुल्तान की सेना में फोटो किसी ने देखी नहीं थी,मुहल्ले के लोगों के अलावा उसे कोई जानता नहीं था,सेना के पास उसकी कोई फोटो नहीं थी, ऊपर के अफसरों का आदेश था जाओ और टीपू को पकड़कर लाओ, लेकिन 1500सैनिकों में से कोई भी उसे पहचानता नहीं था।



टीपू आतंकियों का इलाका कमांडर था इसलिए मुहल्ले के लोग उससे डरने लगे थे,मजेदार बात यह कि कमांडर घोषित होने के पहले टीपू सुल्तान को किसी ने किसी भी किस्म की बदमाशी,शरारत,गुंडागर्दी आदि करते नहीं देखा,लेकिन अचानक एक रात वह कमांडर बन गया,उसके हाथ में एके 47 बंदूक आ गयी और उसने भी बंदूक के साथ मुहल्ले में प्रदर्शन करके सूचना देदी कि वह आतंकी संगठन का इलाके का कमांडर है। लेकिन ज्योंही सेना ने मुहल्ले को घेरा तो बाहर जीप से लाउडस्पीकर लगाकर सेना का कमांडर टीपू सुल्तान को समर्पण करने की अपील कर रहा था, घरों में तलाशी शुरू हो गयी,लेकिन टीपू सुल्तान तो अपने कमरे से निकलकर सीधे कमांडर के पास कर खड़ा हो गया,कमांडर को उसकी कद-काठी देखकर नहीं लगा कि यह कोई आतंकी है।वह कमांडर के पास सहज भाव से खड़ा,घरों में दहशत थी,कई घंटे तलाशी अभियान चला ,सेना को टीपू नहीं मिला,जबकि टीपू तो बाहर सेना के कमांडर के पास ही खड़ा था। सेना के जाने के बाद टीपू ने मुहल्ले के लोगों में बढ़-चढ़कर बातें कहीं और अपनी वीरता के किस्से सुनाए,लोगों को आश्चर्य था कि टीपू तो सेना के कमांडर के पास ही खड़ा था फिर सेना ने उसको पकड़ा क्यों नहीं। कुछ दिन तक टीपू के किस्से चलते रहे, अंत में एक दिन टीपू को अपनी बंदूक से पुलिस पर गोली चलाने का शौक चर्राया और उसने सीधे बंदूक करके फायरिंग शुरू कर दी,वह जानता नहीं था कि एक47 गन से फायरिंग के साथ ही पीछे तेजी से झटका लगता है,वह बेहद दुबला-पतला था, उसने ज्योंही फायरिंग शुरू की बंदूक की दिशा पलटकर उसकी ओर हो गयी और वह अपनी ही गोली से ढेर हो गया,बाद में आतंकियों ने खबर फैला दी कि एरिया कमांडर टीपू सुल्तान सेना से मुठभेड़ करते मारा गया।

सोमवार, 11 जुलाई 2016

कश्मीर के फायरब्राँण्ड आतंकी


   कश्मीर में आप मुहल्लों में जाएं और आम लोगों से बात करें तो पाएंगे कि वहां जितने आतंकी आऱंभिक दिनों में आतंकी टोलियों में शामिल हुए उनमें से अधिकांश जानते तक नहीं थे कि वे आतंकी टोली में क्यों शामिल हो रहे हैं।अनेक मर्तबा ऐसे युवा भी आतंकी टोली में शामिल हुए जो किसी न किसी रूप में सैन्यबलों के उत्पीड़न के शिकार रहे हैं।अनेक इस तरह के युवा भी थे जो बंदूक या पिस्तौल चलाना जानते तक नहीं थे और आतंकियों की बंदूक-पिस्तौल लेकर घूमते रहते थे,हथियार चमकाकर इलाके में दादागिरी करते थे। किस तरह मूर्खताएं करते थे और पाकप्रेरित आतंकी संगठनों के जाने-अनजाने एजेंट बन गए।एक सच्चा किस्सा पढ़ें-एक कश्मीरी युवा देखने में सुंदर और छरछरे किस्म का था, नाम था उस्मान।एक दिन उसको आतंकियों ने एक ग्रेनेड दे दिया और उसको कहा कि जाकर नशाने पर फेंक दो।वह जानता नहीं था उसका किस तरह इस्तेमाल करें।ग्रेनेड में एक पिन होता है,उस पिन को निकालते ही उसे सात सैकिण्ड में निशाने पर फेंक देना होता है लेकिन वह युवा पिन निकालकर देख रहा था कि कहां फेंकूँ,वह जानता ही नहीं था कि उसे कितनी देर में फेंकना है,वह युवक सोचता रह गया सात सैकिण्ड के बाद ग्रेनेड उसी युवक के हाथ में फट गया।फलतःवह उसी क्षण मर गया।लेकिन आतंकियों ने प्रचारित कर दिया कि सैन्यबलों ने मार दिया।यह श्रीनगर के डाउन टाउन की सच्ची कहानी है।





रविवार, 10 जुलाई 2016

कश्मीर में मूल समस्या आतंकवाद नहीं आर्थिक गरीबी है

           कश्मीर इन दिनों फिर से चर्चा के केन्द्र में है।जिन लोगों ने 1989-90 से शुरू हुई तहरीक को देखा है वे जानते हैं आखिरकार कश्मीर में अशांति कैसे आई।वे यह भी जानते हैं कश्मीर की अशांति की जड़ें कहां हैं।कश्मीर पर बातें होती हैं तो सारी बहस आतंकवाद-पृथकतावाद और पाकिस्तान के रेगिस्तान में भटक जाती है।कोई कश्मीर की अर्थव्यवस्था और राजनीतिक अर्थशास्त्र पर बातें नहीं करता। कश्मीर की समस्या की मूल जड़ है बहस के केन्द्र से अर्थव्यवस्था का गायब हो जाना।जितने लोग फेसबुक पर कश्मीर के सुनहरे अतीत और आतंकी वर्तमान पर लिख रहे हैं वे यदि गंभीरता से एक-एक लेख जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था पर भी लिख दिए होते तो बहुत बड़ा उपकार कर दिए होते।

कश्मीर की त्रासदी है कि उसके वास्तव मुद्दे केन्द्र में नहीं हैं। आज भी कश्मीर पर बात होती है तो आतंकवादी ही प्रमुख रूप से चर्चा के केन्द्र में रहता है,कायदे से हमें कश्मीर विमर्श का मूलाधार वहां की अर्थव्यवस्था की समस्याओं को बनाना चाहिए।वहां पर प्राकृतिक संतुलन के जो संभावित खतरे हैं उनको बनाना चाहिए।मैंने कश्मीर को बहुत करीब से देखने-जानने और समझने की कोशिश की है। मुझे यही लगा कश्मीर वह नहीं है जो मीडिया में नजर आता है।कश्मीर का आतंकी चेहरा मीडिया ने बनाया है.इसमें हिन्दुत्ववादी ताकतों की बहुत बड़ी भूमिका है।आश्चर्य की बात है मैं वर्षों से नियमित टीवी टॉक शो देखता रहा हूँ लेकिन एक भी चैनल याद नहीं पड़ता जिसने कश्मीर की अर्थव्यवस्था की समस्याओं पर कभी बातें की हों।

कश्मीर में आतंकियों की समस्या से ज्यादा बड़ी बेकारी की समस्या है,लाखों युवाओं के पास कोई काम नहीं है।मीडिया कवरेज की आज परिणति यह हुई है कि हर कश्मीरी को कश्मीर के बाहर संदेह की नजर से देखा जाता है,यदि कश्मीर के बाहर कोई कश्मीरी नौकरी कर रहा है तो लोग हरह आतंकी घटना का कारण उस कश्मीरी से पूछते हैं,जबकि सच्चाई यह है उसे वास्तविकता में मालूम ही नहीं है कोई आतंकी घटना क्यों और कैसे हुई।मसलन्,जिस व्यक्ति को अभी पुलिसबलों ने मारा वह आतंकवादी था,लेकिन पुलिसबलों की पकड़ से कई सालों से बाहर था।उसका कोई कवरेज नहीं मिलेगा,अचानक पता चला वो बहुत बड़ा आतंकवादी था।

मीडिया की सूचनाओं को हम इस कदर पवित्र मानकर चल रहे हैं कि संदेह तक नहीं करते।सारी खबरें वही हैं जो पुलिसबल या सेना बता रही है। मैनस्ट्रीम मीडिया के जरिए कोई भी रिपोर्टर जमीनी हकीकत बताने की कोशिश नहीं कर रहा ।

आतंकवाद पर मैनस्ट्रीम मीडिया अमूमन झूठ बोलता है कम से कम यह विकीलीक के दस्तावेजों को देखकर तो हमलोगों को समझ लेना चाहिए।दूर क्यों जाएं हाल ही में चिलकोट साहब ने इराक पर जो जांच रिपोर्ट पेश की है उससे सीख लें।



कहने का अर्थ है कश्मीर के बारे में बातें करें तो वहां के बुनियादी आर्थिक सवालों पर बातें करें।आम कश्मीरी अपने को आतंकियों से बहुत पहले दूर कर चुका है।मीडिया के कवरेज से राय न बनाएं। कश्मीर पर मीडिया बहुत घटिया काम कर रहा है वह प्रत्येक कश्मीरी को आतंकवाद समर्थक बता रहा है।कल एक आतंकी की शवयात्रा का कवरेज और उस पर आए बयान इस बात को पुष्ट करते हैं कि आम कश्मीरी और आतंकी के बीच में अंतर करना मीडिया,नेता और भोंपुओं ने बंद कर दिया है। आज कश्मीर की मूल समस्या आतंकवाद या पृथकतावाद नहीं है बल्कि उसके विकास की आर्थिक समस्याएं जिन पर बातें करने से वहा के राजनीतिकदल और मीडिया दोनों परहेज कर रहे हैं।कायदे से मीडिया-नेता रचित यह कश्मीर एजेण्डा बदलना चाहिए।

सोमवार, 4 जुलाई 2016

बलि नहीं न्याय दो-

       यह बहुत खतरनाक खेल है भाजपावालो,इस खेल में फिलहाल कुछ कवरेज ले सकते हो,लेकिन इस खेल में हमेशा फासिस्ट पिटे हैं और तुम भी पिटोगे। अजीब स्थिति है कुछ लड़कों को कहीं से पकड़ा जाता है और तुरंत ही भाजपा-संघ और भोंपू मीडिया आंखें बंद करके देशद्रोही,आईएस एजेंट आदि कहकर अहर्निश निंदा अभियान शुरू कर देता है,यह कौन सा न्याय है,पुराने हिन्दूसमाज में भी ऐसा न्याय नहीं था,इस तरह का न्याय तो तालिबान,अलकायदा,आईएस के यहां होता है,वे लोग जिसे पकड़ते हैं उसे सीधे ऊपर पहुँचाते हैं,कोई दलील,अपील,न्याय नहीं।जिसे पकड़ लिया उसे दोषी करार देने की कला तो तालिबानी कला है,अफसोस है कि भाजपा जैसा राजनीतिक दल जो संविधान और कानून में आस्था रखने के वायदे करता है,संविधान को काम तक नहीं करने दे रहा,भारतीय न्याय प्रणाली को एकदम सरकने नहीं दे रहा। हैदराबाद में कुछ युवाओं की गिरफ्तारी के तत्काल बाद ही मीडिया में हमले शुरू,फेसबुक आदि सोशलमीडिया पर अंधाधुंध मोदीभक्तों की पोस्ट आ रही हैं,इनमें कुछ जेएनयू के पुराने मित्रों की भी पोस्ट हैं,भाजपा-आरएसएस का ऐसा वैचारिक पतन तो आपातकाल में भी नहीं हुआ था जैसा मोदीकाल में हुआ है।अभी भी समय है ठहर जाओ,पुलिस को अपना काम करने दो,कानून की राह में यमराज बनकर मत खड़े हो.कानून को यमराज के मार्ग का पथिक बनाना आईएस का हथकंडा है,हम भाजपा-संघ से कहना चाहते हैं यह भारत है,यह अफगानिस्तान-यमन और सीरिया नहीं है,जहां आईएस की चलती हो। भारत में कानून का शासन है,कानून के अनुसार किसी को पकड़ा जाता है तो अदालतें देखेंगी,पुलिस का काम है अदालतों में आरोपियों को ले जाना,वहां सजा दिलवाना,आरोपिियों को पूरा हक है कि वे अपना बचाब करें,कोई चाहे तो उनकी मदद करे,इसका अर्थ यह नहीं है कि आरोप लगाने मात्र से ही दोषी हो गया।एनआईए के हाथों पकड़े गए हैं तो इंतजार करो सच आ जाएगा,लेकिन संघियो आपलोग तो गिरफ्तार होते ही नाचने लगते हो,बलि दो बलि दो,का नारा लगाने लगते हो,बलि दो,का नारा आईएस का नारा है भारतीय का नारा नहीं है,भारत में यदि रहना है तो कहना होगा बलि नहीं न्याय दो।

रविवार, 19 जून 2016

मुफ़्तख़ोर आतंकी जुनून

          श्रीनगर के पुराने शहर यानी डाउनटाउन इलाक़े में आज भी विलक्षण पुराने क़िस्म की रमणीयता नज़र आती है। छोटी गलियाँ, छोटे पुराने घर,सामान्य और सरल क़िस्म के लोग, पुराने क़िस्म की दुकानें, पुरानी तहज़ीब इसके समूचे परिवेश में फैली हुई है।एक ख़ास क़िस्म की अनौपचारिकता और मधुरभाव यहाँ की तहज़ीब में सहज ही महसूस कर सकते हो।
पुराने शहर का बाज़ार जब बंद हो जाता है तब गलियों का सौंदर्य नज़र आता है। लेकिन जब बाज़ार खुला होता है तो लोगों से भरा, माल से भरा लगता है। मैं जब फ़ोटो खींच रहा था तो एक बुज़ुर्ग ने कहा हमारी ग़ुरबत यानी ग़रीबी को मत दिखाना। यह वह इलाक़ा है जिसने १९८९ के बाद तक़रीबन २० साल तक चैन नहीं देखा। कब और किस तरह इस शांत इलाक़े में अशांति चली आई यह अपने आपमें सबसे जटिल सवाल है। लोग अभी भी चुप हैं और सही उत्तर खोज रहे हैं।
यहाँ के लोग आज भी वह सुबह याद करते हैं तो भय से काँपने लगते हैं। पुराने शहर का कोई घर नहीं होगा जिसमें पुलिस-बीएसएफ़ या सेना कभी घुसी न हो, कोई घर नहीं है जिसकी अंदर की साँकल -कुंडी -चटखनी लात मार -मारकर सैन्यबलों ने तोड़ी न हो,एक समय तो लोगों ने अंदर से घर बंद करना ही बंद कर दिया । त्रासद पहलू यह था कि इस इलाक़े में एक तरफ़ पाकिस्तान की ओर से अबाध हथियार और पैसा आ रहा था तो दूसरी ओर से भारतीय सेना नव्य आतंकियों से जूझ रही थी। मैं नव्य आतंकी इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि ये वे नौजवान थे जो आरंभ में जानते तक नहीं थे कि वे क्या करने जा रहे हैं। एक वाक़या है जिसे समझकर आप स्थिति का अंदाज़ा लगा सकते हैं।
एक दिन अचानक पुराने शहर में सुबह पाँच बजे क़रीब अत्याधुनिक हथियारों से भरा एक ट्रक मुहल्ले के बीच में आकर खड़ा हो गया और उसमें सवार चंद नौजवानों ने आसपास के लोगों से कहा कि जिसे जो हथियार चाहिए वह मुफ़्त में घर ले जाएँ। देखते ही देखते चारों ओर से युवाओं की भीड़ आई और हर घर में बंदूक़ , पिस्तौल, एके ४७ आदि पहुँच गए। देखते ही देखते पुराने शहर में सड़कों और पार्क में युवाओंमें अपने अपने हथियार चमकाने दिखाने की होड़ लग गयी और यही वह प्रस्थान बिंदु है जहाँ से पुराने शहर के अधिकांश युवा अनजाने पाक से भेजे हथियारों की गिरफ़्त में आ गए। जो युवा मुफ़्त हथियार घर ले आए वे जानते ही नहीं थे कि जो मुसीबत वे अपने घर लेकर आए हैं वह उनको किस नर्क तक ले जाएगी। चंद दिनों में ही युवाओं को पुराने शहर में अत्याधुनिक हथियारों से सड़कों पर हवाई फ़ायर करते देखा गया इस समूचे उपक्रम में कब किसने युवाओं के मन में भारत से मुक्त होकर अलग कश्मीर बनाने की बात बिठा दी इसे कोई नहीं जानता।
जिन युवाओं ने मुफ़्त हथियार लिए वे न तो राजनीति जानते थे और नहीं हथियार चलाना जानते थे, वे सब शहरी युवा थे,मुफ़्त के हथियारों के पीछे सक्रिय राजनीति से एकदम अनभिज्ञ थे। आज उन युवाओं में से सैंकड़ों परिपक्व हो गए हैं। वे पिछले दो दशक की पीड़ाओं को आज तक भूल नहीं पाए हैं। वे आज भी आज़ादी का मतलब समझ नहीं पाए हैं। उनके लिए "भारत से आज़ादी का "नारा चंद दिग्रभ्रमित युवाओं द्वारा पाकजनित जुनून में दिया गया नारा था। वे जिस समय मुफ़्त में हथियार लाए तो सतह पर यह मुफ़्त का माल लग रहा था और उसने सामान्य युवा के लोभी मन को अपनी ओर खींच लिया, लेकिन यह विवेक और राजनीति नज़रिए के आधार पर लिया गया फ़ैसला नहीं था।यह बात पुराने शहर का हर शहरी मानता है।

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

आतंकवाद,साम्प्रदायिकता और मीडिया

        आतंकवाद और साम्प्रदायिकता जुड़वाँ भाई हैं। इसलिए उनको संक्षेप में ´आ –सा´ कहना समीचीन होगा।इन दोनों में साझा तत्व है कि ये दोनों मीडिया कवरेज के बिना जी नहीं सकते।इनके लिए मीडिया कवरेज संजीवनी है।वे गिनती में कम होते हैं लेकिन टीवी और समाचारपत्र में कवरेज को लेकर पगलाए रहते हैं। वे मीडिया कवरेज के सहारे ही अपना विकास करते हैं। मीडिया कवरेज के जरिए ही ये भारतीय मध्यवर्ग तक अपनी पैठ बनाने में सफल हो जाते हैं।इनके मीडिया कवरेज का अल्पकालिक और दीर्घकालिक दो तरह का असर होता है।ये अपने को राष्ट्र-राज्य के संरक्षक के रूप में पेश करते हैं,उनकी यह छवि मध्यवर्ग को अपील करती है।खासकर पश्चिमी जीवनशैली से प्रभावित मध्यवर्ग को अपील करती है,क्योंकि यह वर्ग भारतीय समाज में अपने को राष्ट्र संरक्षक के रूप में पेश करता है। उनके इस नजरिए का पत्रकारों पर गहरा असर होता है और वे भी अपने मीडिया कवरेज के लिए राष्ट्र संरक्षकों को खोजने लगते हैं और यही वह प्रस्थान बिंदु है जहं पर टीवी बहसों से लेकर समाचारपत्रों तक साम्प्रदायिक लेखक,प्रवक्ता ,नेता आदि राष्ट्र संरक्षक के रूप में हमारे सामने पेश किए जाते हैं। ये वे लोग हैं जो राष्ट्र के प्रति अंधभक्ति का प्रचार करते हैं और राष्ट्र के बारे में किसी भी किस्म के विवेकपूर्ण विमर्श,बहस आदि को एकसिरे से खारिज करते हैं।


      ´आ-सा´के प्रवक्ताओं का मीडिया में मुख्य लक्ष्य होता है ´भय´ के फ्रेमवर्क में हर चीज को पेश करना।दूसरा लक्ष्य है विवेकवान और विवेक को निशाना बनाना,मनमाने ढ़ंग से उनकी हत्या करना,उन पर हमले करना,बोलने न देना आदि।वे शुरूआत किसी एक से करते हैं लेकिन उनके निशाने पर असल में पूरा समाज होता है। वे तकनीकी कौशल,परंपरागत नैतिकता,हिंसा और प्रभुत्वशाली भाषा इन चारों का अपने विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए इस्तेमाल करते हैं।

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2016

जेएनयू छात्र आंदोलन, आतंकवाद और राष्ट्रवाद


जेएनयू छात्र आंदोलन में विभिन्न रंगत की विचारधाराएं सक्रिय रही हैं।इनमें मार्क्सवादी,उग्र वामपंथी, लिबरल,समाजवादी,मुक्त चिंतक,माओवादी आदि शामिल हैं। इन सभी रंगत के विचारों को छात्रसंघ की साधारणसभा में वाद-विवाद करते सहज ही देखा जा सकता है।जेएनयू छात्र आंदोलन की सबसे अच्छी बात है अहिंसा ।इस अर्थ में जेएनयूवाले पक्के बौद्ध हैं।वे वाम नहीं है। किसी भी संस्थान या संगठन की विचारधारा उसके आचरण से तय होती है,विचारों से नहीं।जेएनयू के छात्रों का आचरण बौद्ध परंपरा के करीब है,वाम के नहीं।बौद्ध परंपरा का निर्वाह करते हुए जेएनयू छात्र आंदोलन ने कभी हिंसा नहीं की और न कभी हिंसा का समर्थन किया। असहमति और संवाद को छात्र जीवन की धुरी बनाया। यह भी उल्लेखनीय है कि जेएनयू छात्रसंघ में कभी कोई क्रिमिनल चुनकर नहीं आया।

जेएनयू छात्रसंघ देश में अकेला छात्रसंघ है जो पूरी तरह स्वायत्त है, वि.वि. प्रशासन से उसका कोई संबंध नहीं है।छात्रसंघ अपने फैसले खुद लेता है और अपनी सारी गतिविधियों की सभी जानकारी छात्रों को पर्चे आदि के माध्यम से मुहैय्या कराता है। छात्रों को वहां चुने गए नेताओं से ज्यादा अधिकार प्राप्त हैं, छात्र चाहें तो छात्रसंघ के द्वारा तय लिए गए फैसले रद्द कर सकते हैं।इस तरह की व्यवस्था दुनिया में कहीं पर भी नहीं है। जेएनयू छात्रों ने अनेक आंदोलन किए हैं लेकिन हिंसा का कभी सहारा नहीं लिया।इस अर्थ में वे पक्के बौद्ध हैं।

जेएनयूछात्रसंघ की परंपरा मेें कभी किसी भी आतंकी या पृथकतावादी संगठन के पक्ष में कोई प्रस्ताव पास नहीं हुआ है।हमेशा समय-समय पर आतंकवाद और उससे जुड़े आंदोलनों की जेएनयू छात्रसंघ ने निंदा की है और उसके खिलाफ छात्रों को एकजुट किया है।मैं स्वयं 7साल तक जेएनयू की छात्र राजनति में सक्रिय रहा हूँ और यह वह दौर था जब पंजाब से लेकर असम तक,उत्तर-पूर्व से लेकर कश्मीर तक आंदोलन और हिंसाचार जारी था।इसलिए यह कहना कि जेएनयू के छात्र आतंकवाद के समर्थक हैं,कश्मीर की आजादी के समर्थक हैं,अफजल के समर्थक हैं,एकसिरे से गलत है। जेएनयू के छात्र किस ओर हैं यह बात छात्रसंघ के प्रस्तावों के जरिए,पदाधिकारियों के बयानों के जरिए समझी जानी चाहिए,न कि नारों या पोस्टरों के जरिए।

आरएसएस के लोग झूठा प्रचार कर रहे हैं कि जेएनयू के छात्र आतंकियों को समर्थन दे रहे हैं,वे प्रमाण पेश करें कि छात्रसंघ ने क्या कभी कोई प्रस्ताव आतंकियों के समर्थन में पास किया है ? मीडियावाले प्रमाण पेश करें।

आतंकियों के पक्ष में जेएनयू की दीवारों पर लिखे नारों या किसी संगठन के द्वारा बांटे गए पर्चों या नारेबाजी के लिए जेएनयू छात्रसंघ जिम्मेदार नहीं है। यदि कोई छात्र संगठन जेएनयू में आतंकियों का समर्थन करता है तो यह उस संगठन की राय है जेएनयू छात्रसंघ की राय नहीं है,जेएनयू के छात्रों की राय नहीं है।जेएनयूके छात्रों की राय का प्रतिनिधित्व जेएनयूछात्रसंघ करता है।वही एकमात्र आवाज है उनकी।

मंगलवार, 24 नवंबर 2015

जर्मनी से क्यों हो रही है आतंकीसेना में भरती


आज से एक साल पहले इराक में कुर्द इलाके में जब भाड़े के सैनिक-आतंकी के रुप में एक जर्मन की लाश मिली तो सारी दुनिया का ध्यान आतंकियों की भर्ती क्षमता की ओर गया। हमने कभी इस सवाल पर विचार नहीं किया कि जर्मन देश में मजबूत सरकार,मजबूत राष्ट्रवाद,उदार समाज और बेहतरीन शिक्षा के बावजूद वहां से आतंकी संगठनों के लिए भाड़े के सैनिक कैसे मिल रहे हैं ? सीरिया में आतंकियों के संगठनों में तकरीबन 600जर्मन-मुसलिम भाड़े के सैनिकों के होने का अनुमान जर्मन सरकार ने व्यक्त किया है।

उल्लेखनीय है भाड़े के सैनिकों की एक ऐसे देश से भर्ती हो रही है जिसकी प्रति व्यक्ति आय सारे यूरोप में सबसे ज्यादा है।जर्मन अधिकारियों के अनुसार सीरियाई आतंकियों के लिए काम करते हुए 60जर्मन भाड़े के सैनिक मारे जा चुके हैं और तकरीबन180वापस जर्मनी लौट चुके हैं। जर्मनों की आतंकी भाड़े के सैनिक के रुप में संघर्ष करने की लंबी परंपरा है, एक जमाने में अफगानिस्तान में भी भाड़े के जर्मन सैनिक लड़ने के लिए गए थे। भाड़े के जर्मन आतंकीसैनिकों को चेचेन्या और बोसनिया की भाड़े की सेनाओं में भी लड़ते हुए देखा गया। सवाल यह है अतिविकसित देश जर्मन अपने नागरिकों को आतंकियों-पृथकतावादियों को क्यों मुहैय्या करा रहा है ?जर्मनी में “मल्टी कल्चरल हाउस” नामक संस्था है जिसने चेचेन्या-बोसनिया आदि में भाड़े के सैनिकों की भर्ती करके आतंकियों को जर्मन-मुसलिम युवाओं की सेवाएं उपलब्ध करायीं। इसके अलावा हेमबर्ग की एक मसजिद के जरिए भी भाड़े के सैनिकों की भर्ती का काम होता रहा है। यही वह मसजिद है जिसके जरिए 9/11 के आतंकी हमले लिए भी आतंकी भर्ती किए गए थे।सन् 2009 और 2010 में अलकायदा के पाक ग्रुप के लिए भी यहाँ से भाड़े के सैनिक भर्ती किए गए। इसके अलावा यमन,सोमालिया, सीरिया और इराक में भी आतंकियों की भाड़े की सेना में जर्मनी से भर्ती युवा काम कर रहे हैं। सीरिया में काम करने वाले आतंकी संगठन “सलाफी जेहादी ऑर्गनाइजेशन मिलातु इब्राहीम” में जर्मनों की बड़ी संख्या है। इस संगठन का निर्माण अलकायदा के मीडिया फ्रंट “ग्लोबल इस्लामिक मीडिया फ्रंट” के महमूद और डेनिश कुस्पर्ट नामक एक आतंकी ने किया था। महमूद को 2007 में गिरफ्तार किया गया बाद में 2011 में उसे छोड़ दिया गया। डेनिश कुस्पर्ट इन दिनों सीरियाई आतंकियों का महत्वपूर्ण प्रचारक बना हुआ है। उनके नेटवर्क-वीडियो आदि के कामों को अंजाम दे रहा है। जर्मनों की आईएसआईएसएल में उपस्थिति कितनी महत्वपूर्ण है इसका अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं उन्होंने अपनी एक स्वतंत्र ब्रिगेड़ इस संगठन के अंदर बना ली है।

बाली में आतंकी हमला और भाड़े के सैनिकों की परंपरा


    आईएस की भाड़े की फौज को देखकर ऐसा लग रहा है कि यह नया फिनोमिना है। लेकिन सच यह है कि भाड़े की फौज खड़ी करना,आतंकी हमले करना,स्थिर सरकारों को गिराना और उनके स्थान पर कठपुतली सरकारों को बिठाने का धंधा बहुत पहले से सीआईए करता रहा है। मध्यपूर्व में दाखिल होने के पहले अनेक देशों में भाड़े के सैनिकों की भर्ती करके हमला करने,हमला गुटों को हथियार देने,पैसा देने,प्रशिक्षण देने आदि के काम भी सीआईए करता रहा है। मीडिया में आईएस और उसकी भाड़े की सेना का कवरेज कुछ इस तरह आ रहा है कि यह कोई नई बात हो। शीतयुद्ध के दौरान सीआईए ने भाड़े की सेना खड़ी करने के मामले में विशेषज्ञता हासिल कर ली थी और अनेक देशों में जनता के द्वारा चुनी गयी सरकारों को गिराया,उनके खिलाफ भाड़े के सैनिकों के जरिए युद्ध चलाए, उन देशों में अस्थिरता पैदा की ।

शीतयुद्ध की तथाकथित समाप्ति के बाद भाड़े के सैनिकों के जरिए उत्पात मचाने का सिलसिला अफगानिस्तान से सन् 1979 में आरंभ हुआ,उस समय यही कहा गया कि सोवियत सेनाओं की अफगानिस्तान में मौजूदगी का विरोध करने के लिए भाड़े की सेना बनायी जा रही है और उस सेना को खड़ा करने का ठेका फंड़ामेंटलिस्टों को बिन लादेन के नेतृत्व में आधिकारिक तौर पर सीआईए ने सौंपा,अमेरिकी राजकोष से इसके लिए धन मुहैय्या कराया गया। सीआईए के इतिहास का यह सबसे बड़ा प्रच्छन्न ऑपरेशन था, वहां से जो सिलसिला आरंभ हुआ है आज वह अब समूचे मध्यपूर्व में फैल गया है। भाड़े के सैनिकों को आतंकवाद और फंडामेंटलिज्म के विचारधारात्मक आवरण में पेश किया जा रहा है।भाड़े के सैनिकों का मुख्य काम है समूचे क्षेत्र में अस्थिरता पैदा करना। भाड़े के सैनिक जहां पर भी बर्ती किए गए हैं उन्होंने हमेशा संबंधित इलाके में अस्थिरता पैदा करने का काम किया है। इससे अमेरिकी प्रभुत्व,बहुराष्ट्रीय हथियार कंपनियों के कारोबार के प्रसार और भय के विस्तार में मदद मिलती है। इस तरह की गतिविधि का आतंकवाद तो एक ऊपरी आवरण है मूल लक्ष्य है भय और सामाजिक असुरक्षा पैदा करना,राजसत्ता को कमजोर करना।

मसलन्, हाल के माली में हुए आतंकी हमले को ही लें। इस हमले का मीडिया में कवरेज आया,लगातार रिपोर्टिंग आई,लेकिन मीडिया वालों ने यह नहीं बताया कि आखिरकार कौन संगठन है जिसने इस ऑपरेशन को अंजाम दिया। उसकी विचारधारा क्या है ,उसकी फंडिंग कहां से होती है,उसे किसने स्थापित किया,क्यों स्थापित किया आदि ।

माली के “बामको रेडीशन होटल ब्लू” पर हुए आतंकी हमले में 21लोग मारे गए, इस हमले में “इस्लामिस्ट अल-मुल्थामीन ब्रिगेड” और “अलकायदा इन दि इस्लामिक मगरिब” का हाथ था। इस संगठन को मोटे तौर पर “मुख्तार बेलमोख्तार” के नाम से जाना जाता है। “अलकायदा इन दि इस्लामिक मगरिब” संगठन का सीआईए की मदद से 2012 में लीबिया को मुक्त कराने के लिए गठन किया गया, यह संगठन आरंभ में नशीले पदार्थों की तस्करी,हथियारों की तस्करी,आतंकी हमलों ,अपहरण आदि में शामिल हुआ करता था।

न्यूयार्क टाइम्स ने 20नवम्बर2015 को माली के हमले पर लिखा-“ A member of Al Qaeda in Africa confirmed Saturday that the attack Friday on a hotel in Bamako, Mali, had been carried out by a jihadist group loyal to Mokhtar Belmokhtar, an Algerian operative for Al Qaeda. The Qaeda member, who spoke via an online chat, said that an audio message and a similar written statement in which the group claimed responsibility for the attack were authentic. The SITE Intelligence Group, which monitors jihadist groups, also confirmed the authenticity of the statement.

The Qaeda member, who refused to be named for his protection, said that Mr. Belmokhtar’s men had collaborated with the Saharan Emirate of Al Qaeda in the Islamic Maghreb, … In the audio recording, the group, known as Al Mourabitoun, says it carried out the operation in conjunction with Al Qaeda’s branch in the Islamic Maghreb.

The recording was released to the Al Jazeera network and simultaneously to Al Akhbar, … The recording states: “We, in the group of the Mourabitoun [Arabic Rebel Group], in cooperation with our brothers in Al Qaeda in Islamic Maghreb, the great desert area, claim responsibility for the hostage-taking operation in the Radisson hotel in Bamako.”

जिस समय बिन लादेन के नेतृत्व में मुजाहिदीनों की भर्ती हो रही थी और समूची दुनिया में सोवियत विरोधी उन्माद चरम पर था तो तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने मुजाहीदीनों को आतंकी कहने की बजाय “स्वाधीनता सेनानी” कहा था। “अलकायदा” का अरबी में अर्थ है “आधार” ,इस संगठन की समूची व्यूह रचना का गोमुख है सीआईए। माली की घटना में “बेलमोख्तार” संगठन का हाथ बताया जा रहा है और इस संगठन के इतिहास के बारे में प्रसिद्ध आतंकवाद विशेषज्ञ मिशेल चोदुसोवस्की ने लिखा है माली हमले में शामिल दोनों संगठनों “इस्लामिस्ट अल-मुल्थामीन ब्रिगेड” और “अलकायदा इन दि इस्लामिक मगरिब” का गहरा संबंध है। “इस्लामिस्ट अल-मुल्थामीन ब्रिगेड” नामक संगठन “अलकायदा इन दि इस्लामिक मगरिब” के सहयोगी संगठन के रुप में जाना जाता है। “अलकायदा इन इस्लामिक मगरिब” को प्रशिक्षित करने का काम 1979-89 के बीच में अफगानिस्तान में ही हुआ था। वाशिंगटन स्थित “कौसिल ऑन फॉरेन रिलेशन” ने इनके आंतरिक संबंधों को माना है। उसने लिखा है- “Most of AQIM’s major leaders are believed to have trained in Afghanistan during the 1979-1989 war against the Soviets as part of a group of North African volunteers known as “Afghan Arabs” that returned to the region and radicalized Islamist movements in the years that followed. The group is divided into “katibas” or brigades, which are clustered into different and often independent cells.The group’s top leader, or emir, since 2004 has been Abdelmalek Droukdel, also known as Abou Mossab Abdelwadoud, a trained engineer and explosives expert who has fought in Afghanistan and has roots with the GIA in Algeria.”



भाड़े के सैनिकों की भर्ती की परंपरा में इन दिनों भारत का नाम भी आ गया है तकरीबन 29भारतीय भी आईएस की भाड़े की फौज में शामिल हो चुके हैं, जिनमें से 6 मारे जा चुके हैं, कुछ भारत वापस आ गए हैं, कुछ अभी वहीं पर लड़ रहे हैं। सीरिया-इराक के प्रसंग में भाड़े के फौजियों की भर्ती के केन्द्र के रुप में कनाडा बहुत बड़े भर्ती केन्द्र के रुप में उभरकर सामने आया है। उल्लेखनीय है कनाडा से ही बड़ी मात्रा में एक जमाने में भाड़े के आतंकी पंजाब में आतंकवाद फैलाने आए थे,आज भी पंजाब में सक्रिय आतंकियों का बहुत बड़ा केन्द्र कनाडा से ही संचालित है। यही दशा सीरिया की भी है। सीरिया में राष्ट्रपति असद के खिलाफ जो संगठन सीआईए और नाटो ने खड़े किए उनके लिए भाड़े के सैनिकों की बहुत बड़ी खेप कनाडा से ही लायी गयी। आज इराक और सीरिया में कनाड़ा से भर्ती किए गए भाड़े के सैनिक सबसे ज्यादा लड़ रहे हैं। ये लोग विभिन्न गुटों की सेनाओं में भर्ती होकर काम कर रहे हैं। उल्लेखनीय है विभिन्न आतंकी संगठनों की अपनी निजी सेनाएं है,हत्यारे गिरोह हैं जो तयशुदा निशानों और लक्ष्यों पर आदेशानुसार हमले करते हैं। सतह पर देखेंगे तो कनाड़ा शांत देश है,बहुलतावादी देश है,सारी दुनिया उसके बहुलतावाद पर गर्व करती है लेकिन आतंकी संगठनों की निजी सेनाओं के लिए भाड़े के सैनिकों की भर्ती का यह बहुत बड़ा केन्द्र भी है ।सवाल यह है कि बहुलतावाद-उदारतावाद आदि के बावजूद कनाडा से युवालोग आतंकी सेना में भाड़े के सैनिक के रुप में भर्ती क्यों किए जा रहे हैं ? कनाडा का बहुलतावाद-उदारतावाद उनको रोक क्यों नहीं पा रहा ? अमेरिका-कनाडा की सरकारें बेहतर ढ़ंग से जानते हुए भी इन युवाओं को रोकती क्यों नहीं ?

गुरुवार, 21 मई 2015

राजीव गांधी के बहाने



फ़ेसबुक पर जस्टिस मार्कण्डेय काटजू की राजीव गांधी पर पोस्ट पढ़कर लगा कि हमारे मध्यवर्ग में एक तबक़ा ऐसा पैदा हुआ है जो मानवीय संवेदनाओं और लोकतांत्रिक संवेदनाओं के मामलों में एकसिरे से अमानवीय हो चुका है या जैसी करनी-वैसी भरनी की मनोदशा का शिकार है। 
      राजीव गांधी की स्वाभाविक मौत नहीं हुई थी, वे लंकाई तमिल आतंकी संगठन लिट्टे के हाथों मारे गए , उनकी लिट्टे मरजीवडों ने हत्या की थी। इस हत्या की किसीभी रुप में हिमायत सही नहीं है। राजीव गांधी की मृत्यु सामान्य मृत्यु नहीं है। वह राजनीतिक हत्या है । हत्यारों ने ख़ास मंशा और उद्देश्य को ध्यान में रखकर हत्या की थी। यह भारत के प्रधानमंत्री की हत्या है। यह हत्या ऐसे समय में की गयी जब भारत लिट्टे की आतंकी मुहिम से श्रीलंका में जूझ रहा था। आतंकी गिरोह के हाथों हमारे प्रधानमंत्री का मारा ज़ाना मार्कण्डेय साहब को क्यों नहीं दिखा ? लिट्टे के ख़िलाफ़ भारत ने यदि श्रीलंका में अभियान न चलाया होता तो आज वह समूचे एशिया में वह सबसे ताक़तवर आतंकी संगठन होता । लिट्टे को नेस्तनाबूद करने बाद ही हम श्रीलंका में शांति स्थापित करने में मदद कर पाए। 
     हमारे देश के राजनेताओं की मुश्किल यह है कि वे आरंभ में आतंकी संगठनों की भावी रणनीतियाँ भाँप नहीं पाते। यही स्थिति भिण्डरावाले के संदर्भ हुई और यही स्थिति लिट्टे के संदर्भ में हुई। भारतीय राजनेता आतंकी या पृथकतावादियों की हर राजनीतिक गतिविधि को अपने तात्कालिक वोट बैंक के फ़ायदे और नुक़सान के आधार पर तय करते रहे हैं। फ़िलहाल जम्मू-कश्मीर में मोदी यही चाल चल रहे हैं। जबकि भिण्डरावाले और लिट्टे के प्रसंग में यह रणनीति पूरी तरह पिट चुकी है । इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी तक सभी का आरंभ में आतंकी और पृथकतावादी संगठनों के प्रति सॉफ़्ट रवैय्या था । इसका ख़ामियाज़ा इन दोनों नेताओं को जान गँवाकर भुगतना पड़ा । इसका यह अर्थ नहीं है कि इन दोनों नेताओं की आतंकियों के द्वारा की गयी हत्या जायज़ है। 
             इसके विपरीत हमें देखना चाहिए कि राजीव की हत्या का मतलब क्या है ? राजीव की हत्या का मतलब है भारत की संप्रभुता और लोकतंत्र पर हमला। आज का दिन राजीव गांधी से हिसाब माँगने का दिन नहीं है बल्कि राजीव गांधी के हत्यारों के ख़िलाफ़ एकजुट होकर आवाज़ बुलंद करने का दिन है। काटजू साहब बाक़ी किसी दिन राजीव गांधी की करनी का हिसाब कांग्रेस से माँग लीजिए, लेकिन खुदा के वास्ते आज के दिन बख़्श दीजिए। 

      लोकतंत्र में प्रधान और हाशिए के अंतर्विरोध में अंतर करना चाहिए। हम यह देखें कि आतंकी संगठन लिट्टे के ख़िलाफ़ एकजुट हैं या नहीं ? लिट्टे के ख़िलाफ़ एकजुटता दिखाने की बजाय काटजू साहब तो राजीव गांधी पर हमले कर रहे हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है संप्रभु राष्ट्र के लोकतांत्रिक प्रधानमंत्री की हत्या के पीछे कार्यरत  राजनीतिक मंशा को काटजू जैसा सुलझा हुआ व्यक्ति नहीं समझ पाया ! 
      हमें कारण खोजना चाहिए कि जस्टिस काटजू से चूक क्यों हुई ? असल में इन दिनों संकीर्ण फलक पर रखकर देखने की हवा चल रही है, हम अपनी पीड़ा और अपने नज़रिए को ही प्यार करते हैं उसके आगे देख ही नहीं पाते । इस तरह बम राजीव गांधी की हत्या को ठीक से समझ ही नहीं पाएँगे, इसे निजी या सामाजिक हानि लाभ के राजनीतिक व्यवहारवाद से भी समझ में नहीं आएगी । इसे लोकतांत्रिक नज़रिए से देखने की ज़रूरत है। 
       प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या हमारे लोकतंत्र और राष्ट्रीय संप्रभुता पर किया गया हमला थी और सारे देश ने एकजुट होकर उसका प्रतिवाद किया था । आज हम यह सबक़ लें कि आतंकी और पृथकतावादी संगठनों के प्रति नरम रुख़ नहीं अपनाएँगे । राजीव गांधी को यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी। 

सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

अफजल गुरु को फांसीःभाजपा की बेचैनी बढ़ी


          
शुक्रवार 8फरवरी को शाम 5बजे अफजल गुरू को सूचना दी गयी कि 9फरवरी को सुबह उसे 8 बजे फांसी दी जाएगी। शुक्रवार शाम को उसे फांसी घर के पास की बैरक में ले जाया गया , जो फांसीघर से करीब 30 कदमों की दूरी पर था। रास्ते में पड़ने वाले बैरकों से कैदियों को हटा दिया गया था, ताकि किसी को इस बात की भनक तक न लग सके।फांसी घर में अफजल का वजन तोला गया।लम्बाई नापी गयी। ताकि फंदे की रस्सी उसका वजन सह सके।  तमाम जरूरी चीजें देख लेने  के बाद अफजल को उसके बैरक में भेज दिया गया। जेल अधिकारियों ने उससे पूछा कि अगर कोई चीज़ चाहिए हो तो बता दे। इस पर अफजल ने कहा कि उसे कुरान चाहिए।फांसी के पहले उसने कुरान पढ़ी। 9फरवरी की सुबह सात बजे उसका रक्तचाप देखा गया और आठ बजे फांसी पर लटका दिया गया ।उसके तत्काल बाद टीवी चैनलों को कहा गया कि अफजल गुरू को फांसी दे दी गयी है। इसी दौरान फांसी घर के सामने ही अफजल के लिए कब्र खोद ली गई  और इस्लामिक रीति-रिवाजों के मुताबिक मौलाना की मौजूदगी में नमाज-ए-जनाजा पढ़ी गई और उसे दफन कर दिया गया।
उल्लेखनीय है अफजल गुरु का मर्सी पिटीशन 3 फरवरी को खारिज हुआ।4फरवरी को गृह मंत्रालय ने मोहर लगायी और अदालत से 9फरवरी को फांसी दिए जाने का आदेश ले लिया गया। इस समूची प्रक्रिया को गोपनीय रखा गया। यहां तक कि फांसी की तिथि को उसके परिवारीजनों से भी छिपाकर रखा गया।  उल्लेखनीय है 12 साल पहले 13 दिसंबर 2001 को देश की संसद पर सफेद एंबेसडर कार में सवार होकर आए 5 आतंकियों ने हमला किया था।  इन हमलावरों को स्थानीयस्तर पर सभी किस्म की  सुविधाएं मुहैय्या कराने का काम अफजलगुरु ने किया था। वह हमला होने के 5मिनट पहले तक आतंकियों से मोबाइल के जरिए जुड़ा था और लगातार सूचनाएं दे रहा था। उसने कभी अपने किए पर पश्चाताप नहीं किया और अदालत में अपना अपराध स्वीकार किया।
अफजल गुरु को फांसी दिए जाने के साथ ही आतंकी संगठनों में एक बड़ा संदेश गया है कि भारत उसके लिए ऐशगाह नहीं है। पकडे जाने पर मौत तय है। इस फांसी का एक अर्थ यह भी है मनमोहन सरकार अपनी प्रशासनिक सक्रियता का भी दावा कर सकती है। इससे प्रकारान्तर से भाजपा को थोड़ा विचारधारात्मक धक्का लग सकता है। कसाब और अफजलगुरु को फांसी देकर कांग्रेस ने भाजपा के उन्माद पैदा करने वाले दो आईकॉन छीन लिए हैं। लेकिन इससे मुस्लिम वोटबैंक पर कोई असर नहीं होगा।
अफजलगुरु को फांसी दिए जाने पर सरकार दावा कर रही है कि उसने न्याय प्रक्रिया का पालन किया है।सरकार एक हद तक सही कह रही है।  लेकिन कई सवाल उठ रहे हैं जिनका केन्द्र सरकार को भविष्य में जबाब देना होगा। मसलन् अफजल गुरु की मर्सी पिटीशन खारिज होने के बाद सरकार ने उसकी पत्नी को खबर क्यों नहीं दी ? फांसी दिए जाने से पहले परिवारीजनों को खबर क्यों नहीं दी ? अफजल गुरू का परिवार भारत में रहता है और वे भारत के नागरिक हैं। उसके शरीर को दफनाए जाने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।    
शनिवार की सुबह टीवीवाले कह रहे थे अफजल की फांसी के बारे में किसी को पता नहीं था ।लेकिन यह झूठ है,संबंधित जेल अधिकारियों,गृहमंत्रालय के उच्च अधिकारियों, जम्मू-कश्मीर  राज्य सरकार को पहले बता दिया गया कि अफजल को फांसी किस दिन और किस समय दी जाएगी।
  आतंक के मामले में सरकार को सत्ता और न्याय के वर्चस्व के आधार पर देखना चाहिए।सत्ता और न्यायपालिका ने आतंक के मुकाबले अपना वर्चस्व स्थापित किया है। अफजलगुरू की फांसी के बाद एक दार्शनिक सवाल भी उठा है फांसी देने के बाद अभियुक्त के शरीर का मालिक कौन है ?  व्यक्ति का परिवार मालिक है ? या सरकार मालिक है ? क्या फांसी के बाद आतंकी के शरीर का स्वामित्व सरकार का होगा ?  
अफजल गुरू ने आतंकी गिरोह में शामिल होकर अपने को आतंकी बनाया, लेकिन उसके एक एक्शन ने उसके पूरे परिवार,नाते,रिश्तेदारों आदि का वर्तमान और भविष्य सब कुछ नष्ट कर दिया। वह आतंकी बना और उसने अपने सभी मानवाधिकार खो दिए । साथ ही प्रकारान्तर से अपने रिश्तेदारों के भी मानवाधिकार और सामाजिकता को हमेशा के लिए कलंकित कर दिया।नष्ट कर दिया। एक आतंकी स्वयं को ही नष्ट नहीं करता अपितु पूरे कुनबे के वर्तमान और भविष्य को नष्ट कर देता है।

गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

आदिवासी जीवन में परिवर्तन का विरोध क्यों ?

    आदिवासियों के जब भी सवाल उठते हैं तो एक सवाल मन में आता है कि क्या आदिवासी अपरिवर्तनीय हैं ? क्या वे जैसे रहते आए हैं उन्हें वैसे ही रहने दिया जाए ? भारत में पूंजीवादी परिवर्तनों का आदिवासियों पर क्या असर हुआ है ?  भारत में 400 आदिवासी समुदाय रहते हैं। जिन्हें आधिकारिक तौर पर शिड्यूल ट्राइव के नाम से जानते हैं। विगत 200 सालों में इनमें बुनयादी परिवर्तन आए हैं। इन परिवर्तनों को हमें वैज्ञानिक तरीके से देखना चाहिए।
आदिवासियों में आए परिवर्तन दो तरह के हैं। पहली कोटि में वे परिवर्तन आते हैं जो स्वाभाविक हैं और स्वाभाविक सामाजिक प्रक्रिया के गर्भ से जन्म ले रहे हैं। दूसरी कोटि में ऐसे परिवर्तन आते हैं जो अस्वाभाविक हैं और उन पर थोपे गए हैं अथवा उन्हें अपनाने के लिए मजबूर किया गया है।
   आदिवासी परिवर्तनों को देखने के लिए मिथकीय पूर्वाग्रहों से बाहर आकर देखने की जरूरत है। आदिवासियों को समझने के लिए उन्हें मिथक बनाने से बचना चाहिए। यह मिथ है कि वे जैसे रहते आए हैं ,वे वैसे ही बने रहना चाहते हैं । दूसरा मिथ यह भी है कि आदिवासियों के जीवन में परिवर्तन सामाजिक -परिवेशगत अलगाव और बृहत्तर समाज के साथ एकीकरण से पैदा होता है।   
 आदिवासियों के बारे में जब भी बातें होती हैं या कोई आंदोलन आरंभ होता है तो एक ही बात कही जाती है कि आदिवासी इलाकों में विकास नहीं हुआ, विकास के अभाव में ही इन इलाकों में उग्रवाद पनप रहा है। आदिवासी इलाकों में विकासहीनता की बात में एकदम दम नहीं है। विकास का अभान जिस तरह बहाना बनाया जा रहा है उसे यदि गंभीरता से लेंगे तो  पंजाब में 1980 के दशक में पैदा हुए खालिस्तानी आंदोलन के लिए कोई तर्क हमारे पास नहीं होगा। पंजाब में हरित क्रांति के बाद उग्रवाद का पनपना इस बात का संकेत है कि उग्रवाद का विकासहीनता से कोई संबंध नहीं है। उग्रवाद एक राजनीतिक फिनोमिना है और यह उन ताकतों के लिए सहज रास्ता है जो मुख्यधारा की राजनीति में स्वाभाविक राजनीति के जरिए स्थान नहीं बना पाते। उग्रवाद के संदर्भ में विकासहीनता एक स्टीरियोटाइप है।  विकासहीनता की बात लालगढ़ (पश्चिम बंगाल) में भी गलत है। लालगढ़ की नौ हजार की आबादी में 10 माध्यमिक स्कूल,एक कॉलेज और अनेक निजी स्कूल हैं। लालगढ़ में विगत 25 सालों से वाममोर्चे का शासन नहीं था। इस इलाके की पंचायतों पर झारखण्डियों के एक दल का कब्जा रहा है। हाल ही में ममता बनर्जी ने जो रैली लालगढ़ में की है उसमें भाग लेने वाले सभी लोग अच्छे कपड़े पहनकर आए थे। सिर्फ पिछले चुनाव में वाममोर्चा जीता है।
    आदिवासियों के बारे में नस्ल और मुख्यधारा से अलगाव का मिथ अंग्रेजों ने बनाया था और उन्होंने ही इसे प्रसारित किया था। इसी तरह मैदानी और पर्वतीय का मिथ भी उनका ही बनाया हुआ है। कहा गया मैदानी लोगों से पर्वतीय लोग भिन्न होते हैं। स्थिति इतनी खराब हो गयी कि 1973 में इनर लाइन रेगूलेशन कानून लागू करना पड़ा। मैदानी इलाके के लोगों को पर्वतीय इलाकों में जाने के लिए अनुमति लेनी पड़ती है,खासकर नागा हिल (नागालैण्ड) मिजोरम की मिजो हिल और अरूणाचल प्रदेश के पर्वतीय इलाकों में जाने के लिए विशेष अनुमति लेनी होती है। भारत से कटे होने की अनुभूति ने उत्तर-पूर्व के राज्यों के निवासियों के मन में अलगाव की भावना को हवा दी। भारत के नामी मार्क्सवादी इतिहासकारों तपनराय चौधरी और इरफान हबीब ने विस्तार के साथ उत्तर-पूर्व के इतिहास का अध्ययन किया है। लेकिन ‘कैम्ब्रिज इकोनोमिक हिस्ट्री’ (भाग1) में इन इतिहासकारों ने असम के मध्यकालीन इतिहास को शामिल किया है। लेकिन यह काम एपेंडिक्स में ही हो पाया है। इतिहास में नागा,जमातिया,खासी,मिजो,मणिपुरी आदि जनजातियों के ब्रिटिश विरोधी संघर्षों को कोई स्थान नहीं मिला है। इसने भी उत्तर-पूर्व के आदिवासियों को राष्ट्रीय अलगाव की अनुभूति में ठेला है। मजेदार बात यह है कि इतिहास कांग्रेस के समय पढ़े जाने वाले पर्चों के जो दस्तावेजी वोल्यूम देखे हैं उनमें उत्तर-पूर्व के आदिवासियों के ब्रिटिश विरोधी संघर्षों के पर्चों को ‘गैर-भारतीय’ की केटेगरी में शामिल किया गया है। ( विस्तार से जानकारी के लिए देखें- Proceedings of North-East India History Association (NEIHA), Session XVII)  
   इतिहासकारों में एक बड़ा तबका रहा है जो उत्तर-पूर्व के आदिवासियों के बारे में सुनियोजित ढ़ंग से साम्राज्यवादी मिथों का प्रचार करता रहा है। इनमें पहला मिथ है नस्ल का। इसके तहत आर्य-मंगोल विभाजन बनाकर इतिहास लिखा गया है। एडवर्ड गेट ने इसकेआदार पर सुर-असुर का विभाजन किया है। उन्होंने सुर-असुर के आधार पर उत्तर-पूर्व के इतिहास को व्याख्यायित करने की कोशिश की है। इसके अलावा इन लोगों ने आदिवासी जातियों के माइग्रेसन को भी अतिरंजित बनाया है। सुर-असुर के नाम पर आदिवासियों को देखने का नस्ली नजरिया है। साम्राज्यवादी विचारकों ने इसी तरह कोर-फ्रिंज के अन्तर्विरोध की बात को भी बेवजह हवा दी है। हिन्दी में इसे केन्द्र-हाशिए के अन्तर्विरोध के नाम से जाना जाता है। इसे हम आदिवासियों के संदर्भ में मुख्यधारा और हाशिए पर पड़े आदिवासियों के अन्तर्विरोध के रूप में देख सकते हैं। इस पदबंध का उदार बुद्धिजीवी भी खुलकर प्रयोग करते हैं।
  आदिवासी अलग-थलग तब ही लगेंगे जब उनको हम भारत का समग्र इमेज के बाहर देखेंगे। वामदलों ने आदिवासियों को भारत की समग्र छबि के अंग के रूप में उन्हें देखा है। आदिवासी पूरे देश से कभी भी अलग नहीं थे,वे हमेशा जुड़े रहे हैं। इनका देश से संबंध था साथ ही पास के राज्यों से भी संबंध-संपर्क था। आदिवासियों का समूचे देश और पड़ोसी राज्यों से जमीनी मार्ग के जरिए गहरा संबंध रहा है। मध्यकाल से लेकर आधुनिककाल तक इस संपर्क-संबंध के प्रमाण उपलब्ध हैं। प्राचीनकाल से उत्तर-पूर्व के राज्य भारत का हिस्सा रहे हैं, इसका विस्तार के साथ इतिहास की किताबों में जिक्र मिलता है। आजादी के बाद पैदा हुए नागा आंदोलन का एकमात्र बड़ा योगदान था उत्तर-पूर्व केराज्यों में बंदूक की संस्कृति की स्थापना। नागा आंदोलन नागालैण्ड की स्थापना के साथ शांत नहीं हुआ। आम आदिवासी में इस आंदोलन से यह संदेश गया कि नागालैण्ड का गठन बंदूक की नोंक पर हुआ है,आदिवासियों को अगर कोई चीज हासिल करनी है तो वे बंदूक की राजनीति करें। नागालैण्ड की मांग को मानने के साथ समूचे उत्तर-पूर्व में समस्याओं का पिटारा खुल गया और इस समूचे क्षेत्र में विभिन्न किस्म के उग्रवादी गुटों की हमलावर कार्रवाईयां बढ़ी हैं। नागा गुटों का यह प्रचार रहा है कि उन्हें जो राज् मिला है वह सशस्त्र संघर्ष की देन है। यही सशस्त्र संघर्ष का छद्म प्रचार ही है जो उत्तर-पूर्व के आदिवासियों में पृथकतावादी-उग्रवादी संगठनों को पैदा करता रहा है। इन दिनों स्थिति य़ह है कि उत्तर-पूर्व में आदिवासियों के हितों की रक्षा के नाम पर बने तमाम उग्रवादी संगठन हफ्ता वसूली, जबरिया कर वसूली,विकास योजनाओं में हफ्ता वसूली,अपहरण,कारचोरी,हत्या आदि के जरिए धन वसूली का व्यापक उद्योग बन चुका है। हाल ही में मीडिया में इसके चौंकाने वाले समाचार आए हैं। जिनमें एक ही चीज साफतौर पर उभर कर आ रही है कि आदिवासी विकास के नाम पर लालगढ़ से लेकर नागालैण्ड तक जितने भी आंदोलन उभरकर सामने आए हैं उनमें कई चीजें साझा हैं। जैसे- इन आंदोलनों का आदिवासियों के हितों के संरक्षण और विस्तार के साथ कोई संबंध नहीं है। उदाहरण के लिए लालगढ़ में चल रहे माओवादी संघर्ष में यह तथ्य सामने आ चुका है कि इस आंदोलन में नेतृत्व करने वाले आदिवासी नहीं हैं। आदिवासी पेड़ नहीं काटते। वे पेड़ की पूजा करते हैं। लेकिन इस इलाके में सक्रिय और माओवादी आंदोलन से जुड़े ‘पुलिस संत्रास विरोघी कमेटी’ के लोगों ने सुरक्षाबलों को लालगढ़ में प्रवेश न करने देने के नाम पर सैंकड़ो पेड़ काट डाले और उन्हें सड़कों पर अवरोध के रूप में पहले इस्तेमाल किया,बाद में सैंकड़ों पेड़ों को अवैध ढ़ंग से बाजार में बेच दिया।  उल्लेखनीय है आदिवासी पेड़ लगाते हैं,उसकी पूजा करते हैं, उसे काटते और बेचते नहीं हैं। ठीक यही फिनोमिना उत्तर-पूर्व के राज्यों में चल रहे आंदोलनों को दौरान भी देखा गया,इसने इस क्षेत्र में टिम्बर माफिया की शक्ल लेली है। टिम्बर माफिया, अवैध हथियारों की स्मगलिंग,फिरौती वसूली, स्थानीय दादा कर आदि इसके चर्चित रूप हैं। माओवादी नेता किसनजी के लैपटॉप और अन्य गिरफ्तार माओवादियों के पास से जो दस्तावेज मिले हैं,झारखण्ड के नेता मधु कोडा के पास से सीबीआई ने छापे के दौरान जो दस्तावेज पकड़े हैं वे इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि माओवाद प्रभावित इलाकों में पंचायतों से लेकर खानों तक माओवादियों का हफ्ता बंधा है और सालाना दो हजार करोड़ रूपये की वे वसूली कर रहे हैं। इन रूपयों से हथियार खरीदने से लेकर कैडरों के पालन-पोषण और बुद्धिजीवियों के खर्चे के लिए धन भी मुहैय्य़ा कराया जाता है। माओवादियों के पास बेनामी धन कैसे पहुँच रहा है और वे उसे कैसे जमा करते हैं। इसका एक ही उदाहरण काफी है। सन् 2009 में पश्चिम बंगाल की पुलिस ने एक युवा माओवादी को गिरफ्तार किया था, इसके बैंक खाते में एक साल में 36 करोड़ रूपये जमा हुए हैं। असम में एक कांग्रेस नेता के माध्यम से 11 सौ करोड़ रूपये उग्रवादी संगठनों के पास विकास खातों में घपला करके पहुँचाया गया। यह तथ्यहाल ही में मीडिया में सुर्खियों में आया है,जिसे सबसे पहले सीएनएन-आईबीएन ने उजागर किया। उत्तर-पूर्व में काम कर रही तमाम सरकारी कंपनियां,तेल कंपनियां और निजी कारपोरेट कंपनियां उग्रवादियों को नियमित हफ्ता देती हैं। इनमें टाटा टी कंपनी द्रवारा उल्फा को सालाना एक करोड़ रूपये सुरक्षा के नाम पर देने का मामला कंपनी के आधिकारिक दस्तावेजों में पाया गया है। इस तथ्य क् प्रकाश में आने के बावजूद इस कंपनी के खिलाफ पुलिस में एफआईआर तक दर्ज नहीं करायी गयी। इसी तरह बोडोलैण्ड आंदोलन के संचालक ‘नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैण्ड ’ को 1994-95 और 1995-96 में विलियमसन मगर नामक कंपनी ने एक करोड़ चंदा दिया था,यह तथ्य कंपनी के आधिकारिक ऑडिट खाते में पाए गए हैं। इसी तरह एक छोटी कंपनी भेरगांव टी स्टेट ने पच्चीस लाख रूपये दिए। इस कंपनी के एक ही साल में दो अपहरण का घटनाएं झेलनी पड़ीं। उल्लेखनीय है कि 1990 में असम के राज्यपाल देवीदास ठाकुर ने राष्ट्रपति को  भेजी रिपोर्ट में लिखा कि अकेले उल्फा ने फिरौती,हफ्ता वसूली,सुरक्षा-कर आदि के नाम पर तकरीबन 400 करोड़ रूपये वसूले हैं। किसी भी सशस्त्र उग्रवादी संगठन को चलाने के लिए बड़े पैमाने पर धन की आवश्यकता होती है। उग्रवादी संगठन शुद्ध विचारधारा के आधार पर नहीं चलते। मसलन् उल्फा जैसे उग्रवादी संगठन को सिर्फ अपने मुख्यालय के लिए के लिए सालाना 30 करोड़ रूपये की जरूरत होती थी। यह जानकारी सुरक्षाबलों को छापे में मिले उल्फा के दस्तावेजों से मिली है। इसके अलावा बटालियन के लिए रसद,गोला-बारूद,हथियार,भोजन,कपड़े आदि के कितने धन की आवश्यकता होती होगी इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। उल्फा के भूटान स्थित मुख्यालय ने अपनी गतिविधियों का पूरा ब्यौरा छापा है। यह एक खुला सच है कि उत्तर-पूर्व उग्रवादियों के फंड सबसे बड़ा स्रोत सरकारी प्रकल्प हैं। सरकारी स्रोतों से धन जुटाना और उससे संगठन चलाना बेहतर धंधा साबित हुआ है। सरकारी सार्वजनिक कंपनियों और बैंक के अधिकारियों से बड़ी रकम ऐंठने में उग्रवादी सफल रहे हैं। उत्तर-पू्र्व के राज्यों के लिए विकास प्रकल्पों के लिए आवंटित धन का अधिकांश हिस्सा उग्रवादी संगठनों के पास जा रहा है। यह बात सरकार जानती है लेकिन इसे रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठा पायी है। उल्फा से जुड़े ठेकेदारों को विकास के बड़े ठेके दिए जाते रहे हैं और उन प्रकल्पों का कहीं पर भी अता-पता नहीं है। इस धंधे में नौकरशाह और राजनेता भी धन खा रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार ग्रामीण विकास के 1992-93 से फरवरी 1998 तक की अवधि में 11.65 बिलियन रूपये आवंटित किए गए। इसमें से मुश्किल से चार बिलियन रूपये ग्रामीण विकास पर वैध योजनाओं पर खर्च हुए हैं,बाकी पैसा उग्रवादी संगठनों और स्थानीय नेताओं ने मिलकर खाया है। विकास फंड का असामाजिक कार्यों के लिए स्थानान्तरण स्वयं में केन्द्र और राज्य सरकार की असफलता को बयान करता है। मीडिया की रिपोर्ट बताती हैं कि उत्तर-पूर्व में सुरक्षा संबंधी खर्चा बढ़ता जा रहा है। सन् 2001 से सालाना 100 करोड़ रूपये सुरक्षा के नाम पर उग्रवादियों की जेब में जा रहे हैं। इसके अलावा विकास फंड से न्यूनतम 10 प्रतिशत धन उग्रवादियों के पास जा रहा है। नागालैण्ड और मिजोरम के उग्रवादी प्रत्येक व्यक्ति से सुरक्षा हफ्ता वसूलते हैं। प्रत्येक सरकारी कर्मचारी को हफ्ता देना होता है।  प्रति तेल टैंकर 3000 हजार प्रतिबार, खाने के गैस सिलेण्डर ले जाने वाले ट्रक से प्रति चक्कर 2000 रूपये,सीमेंट ट्रक से 1000 हजार वसूले जाते हैं। इसके अलावा इस क्षेत्र के उग्रवादी प्रति ट्रक 7000 हजार,टूरिस्ट बस से 12000 हजार रूपये सालाना परमिट शुल्क वसूल करते हैं। मार्च 2008 में सम्पन्न हुए आम चुनाव में नागालैण्ड में 58 उम्मीदवार करोड़पति थे। ये आंकड़े नागालैण्ड इनेक्शन वॉच नामक संगठन ने जारी किए हैं। मेघालय में 27 करोड़पति उम्मीदवार खड़े हुए थे। यह तो छोटे से राज्य का हाल है।  इन सभी उम्मीदवारों की आपराधिक पृष्ठभूमि थी। इसी तरह मणिपुर में तो उग्रवादियों ने सभी आर्थिक गतिविधियां ठप्प ही कर दी हैं। मणिपुर के मध्यवर्ग के ज्यादातर युवा राज्य के बाहर चले जाते हैं। बाहर ही पढ़ते हैं। उल्लेखनीय है कि उत्तर-पूर्व के राज्यों में एकमात्र त्रिपुरा ऐसा राज्य है जहां पर विकास फंड किसी भी तरह उग्रवादियों के हाथ नहीं लगा है और विकास कार्यों पर सीधे धन खर्च किया जा रहा है। इसके परिणाम भी सामने आने लगे हैं। त्रिपुरा की विकास दर सालाना 9 प्रतिशत दर्ज की गयी है। सरकार फंड का उग्रवादियों को मिलना एकदम बंद है। कभी-कभार उग्रवादी संगठन हिंसा की वारदात करने में सफल हो जाते हैं। कुछ इलाकों में नियमित रूप से उग्रवादी अभी भी हफ्ता वसूल रहे हैं। लेकिन सरकारी फंड का स्रोत बंद है। इससे राज्य की आर्थिक दशा में तेजी से परिवर्तन आया है। 
 





शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

26/11 के सबकः आतंकवादी खबरों के उत्पादक थिंक टैंक

मुम्बई की 26/11 की घटना के बाद से आतंकवाद पर मीडिया में काफी चर्चा हुई है। इस चर्चा के केन्द्र में आमतौर आतंकी कसाब पर चल रहा मुकदमा सुर्खियों में रहा है। यह कवरेज कैसे आया और अतिरंजित ढ़ंग  से क्यों आया ? इस पर कभी मीडिया के लोगों का ध्यान नहीं गया। इस प्रक्रिया में आतंकियों के प्रति सतर्कता और सावधानी के सवालों पर कम ध्यान दिया गया ।

     पिछले दिनों अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा के आने के साथ यह अनुभूति पैदा करने की कोशिश की गई थी कि मुंबई में आतंकी हमला हो सकता है। लेकिन सामान्यतौर पर मुम्बई में आतंकी हमला कोई समस्या नहीं रहा है। इसी तरह अन्य महानगरों में भी आतंकवाद समस्या नहीं है।
      केन्द्र सरकार बड़े उत्सवधर्मी ढ़ंग से सतर्कता वार्ता जारी करती रहती है ,आज भी जारी की गई है। सवाल उठता है भारत के लिए क्या आतंकवाद सचमुच में एक बड़ी समस्या है ? यदि ऐसा है तो विगत एक वर्ष में सारी दुनिया में आतंकी हमले में कितने हिन्दुस्तानी मारे गए ? काश्मीर को छोड़कर देश के अन्य भागों में कितने लोग विगत एक साल में आतंकी हमले में मारे गए ?
    इसी तरह हम अमेरिकी मीडिया में आतंकवाद के खतरे के बारे में खूब हंगामा देखते हैं। लेकिन सच क्या है ? कितने अमेरिकी सारी दुनिया में आतंकी हमलों में मारे गए ? गूगल पर सर्च करने जाओगे तो इसके उत्साहजनक परिणाम नहीं मिलेंगे। अमेरिका के गृहमंत्रालय के अनुसार 2009 में सारी दुनिया में 9 अमेरिकी मारे गए। कोई भारतीय विगत एक साल में आतंकियों के हाथों नहीं मारा गया।
   भारत में आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरे का भोंपू की तरह प्रचार करने वाले मीडिया,सरकारी तंत्र और रिसर्च संगठनों के बीच की सांठगांठ को इसी प्रसंग में समझना बेहतर होगा। अमेरिका स्थित पेनसिलवेनिया विश्वविद्यालय के थिंक टैंक एण्ड सिविल सोसायटी प्रोग्राम के तहत आंकड़े एकत्र किए हैं। मसलन अमेरिका में2000 थिंक टैंक संगठन हैं। भारत में 422 थिंक टैंक संगठन हैं। यानी सारी दुनिया में अमेरिका के बाद दूसरा नम्बर हमारे देश के थिंक टैंक संगठनों का है। 422 संगठनों में से 63 सुरक्षा संबंधी रिसर्च और विदेशनीति पर काम कर रहे हैं। इन्हें विश्व के बड़े शस्त्र निर्माताओं से सालाना मोटा फंड सप्लाई किया जाता है। इन संगठनों में सैन्य-पुलिस के बड़े अफसरों के साथ भू.पू.राजनयिक भी काम कर रहे हैं। ये संगठन मूलतः शस्त्र उद्योग के जनसंपर्क फोरम की तरह काम करते हैं। ये लोग फेक आतंकी खबरें बनाते हैं और फिर उन्हें मीडिया और गुप्तचर एजेंसियों के जरिए प्रचारित करते हैं। वे आदिवासी ,दलितों और अल्पसंख्यकों में विस्फोटक सामग्री का प्रचार और इस्तेमाल करते हैं, फेक धमाके कराते है,या नियोजित धमाके कराते हैं जिससे अत्याधुनिक शस्त्रों की खरीद को वैधता प्रदान की जा सके।
    हाल के दिनों में हिन्दू आतंक की अधिकांश खबरें इसी लॉबी के द्वारा तैयार करके प्रसारित करायी गयी हैं। इस समूची प्रक्रिया में पहला लाभ यह हुआ है कि आरएसएस को बदनाम करने का मौका मिला है। दूसरा लाभ यह मिला है कि इन थिंक टैंक के थिंकरों को अपने निजी हितों का विस्तार करने का अवसर मिला है। इसके बदले में  बड़े अफसरों को समृद्ध देशों में नागरिकता,मकान,बैंक में धन,उनके बच्चों को विदेशों में पढ़ाई की शानदार व्यवस्था करा दी जाती है।
      उल्लेखनीय है भारत को दुनिया का सबसे बड़ा शस्त्र खरीददार माना जाता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत ने 2000-07 के बीच में सारी दुनिया में हथियार खरीददारों में दूसरा स्थान पाया है। सारी दुनिया के सकल शस्त्रों का 7.5 फीसदी हथियार भारत ने खरीदे हैं। चीन,रूस और अमेरिका के बाद हथियारों पर खर्च करने वाला चौथे नम्बर का देश है।
    सारी दुनिया में 1,130 कंपनियां हथियार बनाने का काम करती हैं। इनमें से 90 फीसदी  अमेरिका, ब्रिटेन,रूस, चीन और फ्रांस की हैं। ये परंपरागत हथियार बनाती हैं। जबकि अफ्रीका,एशिया,लैटिन अमेरिका,मध्यपूर्व में सारी दुनिया के 51 फीसदी भारी हथियार लगे हुए हैं।
      ग्लोबल पीस इंडेक्स के अनुसार भारत का स्थान सबसे नीचे 122 वें नम्बर पर 2.422 स्कोर के साथ है। हिन्दुत्वादी ताकतों का मीडिया,नौकरशाही,शासकों आदि में जिस तरह का व्यापक प्रभाव है उसके चलते यह भी संभावना व्यक्त की जा रही है कि थिंक टैंकों के एक हिस्से के साथ हिन्दुत्ववादियों की सांठगांठ भी हो सकती है। लेकिन भारत में शस्त्र उद्योग और उसके थिंक टैंक संगठन जिस तरह की आबोहवा बनाने में लगे हैं उससे भारत में लोकतंत्र के लिए सीधे खतरा पैदा हो गया है।




रविवार, 7 नवंबर 2010

टेलीविजन चैनलों में बराक ओबामा की मानवीयता और हमारी संप्रभुता

(अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा और उनकी पत्नी मिशेल ओबामा 26/11 के शहीदों को मुंबई के ताज होटल में श्रद्धांजलि भाषण देते हुए)
   अमेरिका के राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा जब कल भारत पहुँचे तो उनके कई चेहरे नजर आए। इनमें पहला मानवीय चेहरा नजर आया है। ओबामा के मानवीय पहलू पर टीवी चैनलों ने खूब जोर दिया है। बराक ओबामा ने आते ही 26/11 के शहीदों को श्रद्धांजलि दी और जिस तरह का गंभीर भाषण दिया वह काबिले तारीफ़ है।
     ओबामा किसी भी किस्म के उन्माद से रहित होकर 7 मिनट बोले उससे एक संकेत तो यही गया है कि आतंकवाद के खिलाफ उन्मादी भाषण काम नहीं आते बल्कि वे आग में घी का काम करते हैं। यह बात ओबामा पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के पराभव और हाल में सम्पन्न अमेरिकी चुनावों में अपने दल की पराजय से सीख चुके हैं।
     ओबामा ने बड़े ही ठंड़े दिमाग से 26/11 के शहीदों की याद में उन्होंने जो कुछ कहा वह काफी मूल्यवान है और यह उन लोगों के लिए चेतावनी है जो भारत में आतंकवाद विरोधी मुहिम के नाम पर पाकविरोधी घृणा फैला रहे हैं। आतंकवाद पर ओबामा का ताजहोटल में दिया गया भाषण ठंड़ा और शानदार भाषण है। इस भाषण का पहला संदेश है आतंकवाद से लड़ो पाकिस्तान से नहीं। दूसरा संदेश है आतंकवाद से उन्माद फैलाकर,घृणा फैलाकर नहीं लड़ा जा सकता है। ठंड़े दिमाग से लड़ो।
     अधिकांश टीवी चैनल वाले यह उम्मीद लगाए बैठे थे कि ओबामा जब 26/11 के बारे में बोलेंगे तो पाक का हवाला जरूर देंगे। उन्होंने 26/11 में पाक की भूमिका का कहीं कोई जिक्र नहीं किया। ऐसा करके ओबामा ने एकदम सही काम किया। वे जानते हैं कि आतंकवाद को उन्माद या घृणा फैलाकर नहीं पछाड़ सकते। हमारे टीवी चैनल 26/11 के बहाने और अन्य मौकों पर पाक विरोधी घृणा का प्रचार करते रहते हैं और कल भी अधिकांश टीवी चैनलों में यही भावना व्यक्त की गई कि ओबामा को कम से कम इस घटना में पाक की घृणित भूमिका की निंदा करनी चाहिए थी ।
      यह सच है पाक 26/11 की घटना का आयोजक था और आज भी सीमापार से आतंकवादी गतिविधियों का संचालन पाक के प्रमुख संस्थान कर रहे हैं। समस्या यह है कि पाक के खिलाफ राय बनायी जाए या आतंकवाद के खिलाफ राय बनायी जाए। इसी संदर्भ में ओबामा ने जोर आतंकवाद के खिलाफ राय बनाने पर दिया है और ऐसा करके उन्होंने ठीक किया है। 
    ओबामा का यह कहना ही काफी है कि हम 26/11 की इमेजों को नहीं भूल सकते । आतंकी हमले के संदर्भ में ओबामा ने बड़े ही सकारात्मक मनोभाव का परिचय दिया है। उन्होंने आतंकियों को हत्यारे की संज्ञा दी है। उन्होंने मुंबई की जनता,होटल के स्टाफ,पुलिस जवानों की बहादुरी आदि की भूरि-भूरि प्रशंसा की और उन लोगों के परिवारीजनों से भी मिले जो इस हमले में मारे गए थे। ओबामा ने कहा “We'll never forget the awful images of 26/11, including the flames from this hotel that lit up the night sky. We'll never forget how the world, including the American people watched and grieved with all of India.”
    जो लोग ओबामा में उन्माद की तलाश कर रहे हैं उन्हें पहले दिन के भाषण से निराशा हाथ लगी है। क्योंकि उनकी इस यात्रा में अमेरिका के बड़े हित दांव पर लगे हैं ,बड़े हितसाधन करने के लिए उन्मादी भाषण मदद नहीं करते। ठंड़े भाषण मदद करते हैं।
    ओबामा की इस यात्रा का लक्ष्य है अमेरिका के व्यापारिक-सैन्य हितों का विस्तार करना।  देखना यह है कि ओबामा की पब्लिक रिलेशन की यह पद्धति कितनी प्रभावी सिद्ध होती है।
     ओबामा के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि वे भारत से क्या लेकर जाते हैं। पहलीबार कोई अमेरिका राष्ट्रपति भारत से कुछ मांगने आया है,ओबामा ने बड़ी साफगोई के साथ अपने देश के संकट का जिक्र कर दिया है ,उन्हें भारत से व्यापार करना है और वे चाहते हैं कि अमेरिकी युवाओं को नौकरियां मिलें। भारत में कभी किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने युवाओं के लिए नौकरियां नहीं मांगी हैं,ओबामा ने कल भारत की जितनी प्रशंसा की है उतनी प्रशंसा भी किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने नहीं की हैं।  
    ओबामा की इस साफगोई और मानवीय भावनाओं के पीछे सुरक्षा,संप्रभुता और मातहत बनाने का बड़ा खेल चल रहा है। ओबामा का सामने मानवीय चेहरा मुझे निजी तौर पर अच्छा लग रहा है लेकिन उसके सैन्य और संप्रभुता संबंधी निहितार्थ खतरनाक लग रहे हैं। देखना है कहीं ओबामा की मानवीय इमेज की ओट में भारत की संप्रभुता को नष्ट करने का शैतानी खेल तो नहीं चल रहा ? क्योंकि कल ही ‘टाइम्स नाउ’ चैनल ने एक बड़ा ही सनसनीखेज दस्तावेज जारी किया है जिसमें बताया गया है कि अमेरिका के द्वारा भारत को सैन्य और तकनीकी रूप में मातहत बनाने की साजिशें चल रही हैं।
      पेंटागन और भारत के रक्षा मंत्रालय के बीच में  ‘इंटर ऑपरेविलिटी एग्रीमेंट’ नांमक समझौते पर अंदर ही अंदर वार्ताएं चल रही हैं। अगर यह समझौता हो जाता है तो भारत के लिए बड़ा अहितकारी होगा। चैनल के अनुसार भारत को इस सैन्य समझौते के तहत पेंटागन का मातहत बनाने की कोशिशें की जा रही हैं। चैनल ने यहां तक कहा कि य़ह एक और पाकिस्तान बनाने की योजना है।
     इस दस्तावेज का सनसनीखेज खुलासा ओबामा की यात्रा के पहले दिन करके चैनल ने उस खेल की ओर संकेत किया है जो ओबामा की इस यात्रा की आड़ में चल रहा है। देखना होगा कि ओबामा भारत से जाते हैं तो क्या लेकर जाते हैं और क्या देकर जाते हैं।
     संभावनाएं यही हैं कि ओबामा इस यात्रा से अमेरिका में अपनी खोई हुई साख को बचाना चाहते हैं। वे अमेरिकी जनमानस को यह सदेश देना चाहते हैं कि मैं भारत से अमेरिका के आम नागरिकों के लिए बहुत कुछ लेकर आया हूँ। ओबामा के पहले दिन के कार्यक्रमों पर ‘टाइम्स नाउ’ चैनल की संदेह दृष्टि लगी थी। वहीं अन्य चैनलों जैसे एनडीटीवी ,सीएनएन-आईबीएन आदि ने इस यात्रा के पहले दिन के कवरेज में अमेरिकी सरकार के जनसंपर्क चैनल की तरह काम करते हुए ओबामा की व्यापार और मानवीयता की भावना को खूब उभारा है।






बुधवार, 3 नवंबर 2010

ओबामा यात्रा पर विशेष- गुलामों की टोली के लालच

   अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत आ रहे हैं और हमारे देश की पूरी मशीनरी उनकी खिदमत के लिए तैयार की जा रही है। ओबामा की खूबी है उनका बड़बोलापन। उनके बड़बोलेपन से एक खास किस्म का विभ्रम पैदा होता है। टीवी भाषणकला में वे परम दक्ष हैं।
    हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस मामले में एकदम फिसड्डी हैं। वे नीति और दफ्तर के आदमी हैं,फाइलों का काम बढ़िया कर लेते हैं। पुराने प्रोफेसर हैं अच्छा सोच लेते हैं,समझाने और नीति बनाने में कुशल हैं, लेकिन वक्तृता में एकदम फिसड्डी हैं। सोनिया गांधी सोचने और बोलने दोनों में फिसड्डी हैं।
   काश, ओबामा के आगमन के समय अटलबिहारी बाजपेयी प्रधानमंत्री होते। फिर हम देखते बोलने में कौन बाजी मारता है। वक्तृत्वकला में बाजपेयी के सामने ओबामा दुधमुँहे बच्चे हैं।
     ओबामा से सार्वजनिक तौर पर बातों में कोई नहीं जीत सकता,वे अपनी बातों से भ्रमित और चकित करते हैं। वे अपना जादुई प्रभाव छोड़ते हैं। वे बोलकर ठगते हैं। वे नीति निपुण नहीं हैं। मनमोहन सिंह नीति निपुण हैं। हमें गर्व है हमारे पास मनमोहन सिंह हैं,लेकिन दुख है कि वे ओबामा की भाषणकला के कायल हैं।
   मनमोहन सिंह और पूरी कांग्रेस पर खासकर राहुल गांधी पर ओबामा का जादू सवार है । वे नहीं जानते कि ओबामा को वकृत्व कला विकसित करने में उनके वकालत के पेशे ने मदद की है। वकालत की कला झूठ की कला है। सच को झूठ में और झूठ को अति वास्तविकता में बदलना इस पेशे की खूबी है। ओबामा को इस पेशे ने माहिर बनाया है,इस काम में उनकी मीडिया उस्तादों ने मदद की है।
  इसे ओबामा का जादू ही कहा जाएगा कि वे सारी दुनिया को सादगी और खर्चे कम करने का वे उपदेश देते रहे हैं और अब जब भारत आ रहे हैं तो उनके ऊपर भारत के इतिहास में सबसे ज्यादा पैसा खर्च किया जा रहा है। भारत आने वाले पहले के किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति पर इतना पैसा खर्च नहीं किया गया।
    अमेरिका इन दिनों जिस बदहाल अवस्था में है वैसी अवस्था उसकी कभी रही। लाखों बेकार युवक सड़कों पर आवारागर्दी कर रहे हैं। हजारों लोग मकानों की बैंक किश्तें न चुकाए जाने के कारण बेघर हो चुके हैं। अमेरिका की आबादी में सामान्य जीवन बसर करने लायक आम आदमी के पास सुविधाएं नहीं हैं। इसके बाबजूद ओबामा अपनी यात्रा पर बेशुमार दौलत खर्च कर रहे हैं। उनकी इस खर्चीली मानसिकता का अमेरिका की उपभोक्तावादी संस्कृति से गहरा संबंध है।
   आज की खबर है कि ओबामा जितने दिन भारत में रहेगे उनके ऊपर अमेरिकी प्रशासन 900 करोड़ रूपये प्रतिदिन खर्चा आएगा।  इसके अलावा भारत सरकार का कितना खर्चा होगा इसे आसानी से जोड़ा जा सकता है। मौटे तौर पर ओबामा की यात्रा पर प्रतिदिन 1500-2000 करोड़ रूपये प्रतिदिन का खर्चा आएगा। क्या इतने बड़े खर्चे को आर्थिकमंदी के दौर में जायज ठहराया जा सकता है ? जब हम ओबामा की यात्रा पर इतने बड़े पैमाने पर अतार्किक ढ़ंग से खर्चा कर रहे हैं तो समझौते किस तरह के तर्क से भरे होंगे ?
   ओबामा की यात्रा और अमेरिकी नव्य उदारतावाद ने भारत के अंदर अमीर देश होने की हसरत पैदा की है और इस हसरत का ही दुष्परिणाम है कि कांग्रेस का  नेतृत्व यह मोटी बात अभी समझने के लिए तैयार नहीं है कि अमेरिकी नव्य उदारतावाद और उससे जुड़ी सुरक्षा नीतियां अमेरिका को इराक-अफगानिस्तान युद्ध के मुँह में ले जा चुकी हैं। समूची अमेरिकी अर्थव्यवस्था टूट गयी है। भारत को नव्य उदार सुरक्षा नीतियों के कारण ही कश्मीर में आतंकी मार झेलनी पड़ रही है। बेशुमार पैसा खर्च करना पड़ रहा है।
   नव्य उदार सुरक्षा पहलकदमी के गर्भ से ही अलकायदा,आईएसआई ,हिजबुल मुजाहिदीन आदि जैसे आतंकी तंत्रों का जन्म हुआ था और इसके निर्माण में अमेरिका का सीधा पैसा लगा और दिमाग लगा है।
    ओबामा को चुनाव जीतकर आए दो साल होने को आए किसी भी किस्म की राहत आम जनता के जीवन में नहीं आयी है। बेकारी, गरीबी,निरूद्योगीकरण की भयावह प्रक्रिया थमी नहीं है। 3 ट्रिलियन ड़ालर से ज्यादा के कारपोरेट घरानों को आर्थिक पैकेज दिए जाने के बावजूद अमेरिका में जनता का हाहाकार थमा नहीं  है।
   उल्लेखनीय है कारपोरेट घरानों ने अमेरिकी में विगत 10 सालों में जितनी मोटी कमाई की है उतनी विगत 50 सालों में नहीं की थी। दूसरी ओर जिस तरह की गरीबी, बेकारी और आर्थिक विपन्नता अमेरिका ने विगत तीन सालों में देखी है,वैसी पहले कभी नहीं देखी थी।
    मनमोहन सिंह को पटाने के चक्कर में कई मर्तबा ओबामा विश्वमंचों पर कह चुके हैं कि मनमोहन सिंह इस युग के सबसे सुलझे अर्थशास्त्री हैं। वे उनकी तारीफों के कई बार पुल बांध चुके हैं और उन तारीफों के पुल के पीछे छिपी मंशा को कांग्रेस और उसके नेतृत्व को भांपने की कोशिश करनी चाहिए।
    हमें भारत की संप्रभुता के साथ प्रशंसा और सुरक्षा के मुहावरे और जादुई संसार में सौदा करने की मनमोहन सिंह को अनुमति नहीं देनी चाहिए। ओबामा चाहते हैं  जिस तरह सोवियत रूस टूटा और वैसे ही भारत भी टूटे और उनकी नजर कश्मीर पर है। वे अफगानिस्तान में रहकर जो कर रहे हैं उससे इस इलाके में आतंकी और पृथकतावादी ताकतों को बल मिला है। ओबामा के सारे प्रयास भारतीय उपमहाद्वीप को अस्थिर करने वाले हैं,वे अमेरिका के सैन्यहितों का इस इलाके में स्थायी बंदोबस्त करने आ रहे हैं। वे चाहते हैं इस काम में भारत उनकी मदद करे।
    आने वाले दिनों में ओबामा के भाषणों को देरिदियन ढ़ंग से विखंडित करके देखा जाना चाहिए। वे चाहते हैं कि भारत ,अफगानिस्तान में उनका जूनियर पार्टनर बनकर काम करे,वे उस्ताद बने रहेंगे और भारत पट्ठे की तरह काम करे।
    वे जानते हैं कि अफगानिस्तान की जनता में अमेरिका और उनके नाटो समूह के देशों की कोई साख नहीं है,वे यह भी जानते हैं कि नाटो की विशाल सेना के रहते हुए आज तक अफगानिस्तान के काबुल शहर के बाहर नाटो की सेनाएं निकल नहीं पायी हैं। नाटो की सेनाएं काबुल एयरपोर्ट से लेकर सैन्यशिविरों के आने-जाने वाले मार्ग तक ही सुरक्षित हैं,बाकी काबुल में तो उन पर अलकायदा के लोग कभी भी हमला कर जाते हैं औऱ नाटो की सेनाएं उनका बाल बांका नहीं कर पाती हैं।
    अफगानिस्तान में नाटो की सेनाओं का आलम यह है कि वे अलकायदा को घूस दिए बिना अपने रसद से लदे ट्रकों को सुरक्षित सैन्य कैंपों तक नहीं ले जा सकते। प्रति ट्रक उन्हें 1500 ड़ालर से ज्यादा की अलकायदा के सैनिकों को घूस देनी पड़ती है। यह अमेरिकी सीनेट की आधिकारिक रिपोर्ट में वर्णित सत्य है।
    अनेकों मर्तबा अलकायदा के सैनिक नाटो की सेनाओं की रसद लूट चुके हैं। ऐसी अवस्था में अमेरिका का जूनियर बनने का सपना भारत के लिए विपत्ति ला सकता है। अफगानिस्तान के अधिकांश इलाकों में स्थानीय दादाओं का कब्जा बरकरार है ।
   ओबामा यह भी जानते हैं कि भारत की अफगानिस्तान की जनता में साख है और भारत पर अफगानिस्तान की जनता भरोसा करती है। ओबामा की मंशा है अमेरिकी सैन्यहितों के विस्तार के लिए भारत की इसी छवि को भुनाया जाए और वे मूल रूप से इसी काम से आ रहे हैं।  
अमेरिका इस इलाके में दोहरा गेम खेल रहा है। एक तरफ वह आतंकवाद के खिलाफ खोखला हल्ला कर रहा है,दूसरी ओर आतंकियों को शह और पाक को हथियारबंद कर रहा है। वह आतंकियों को परास्त करने के नाम पर पाक को अमेरिका खोखला कर चुका है।
  अमेरिका का आतंकविरोधी विश्व अभियान राष्ट्रों को नष्ट करने वाला,खोखला करने वाला,संप्रभुता छीनने वाला अभियान है। इराक,अफगानिस्तान और पाकिस्तान उसके आतंकविरोधी अभियान में छिपी बर्बरता ,साम्राज्यवादी लूट और वर्चस्व का आदर्श उदाहरण हैं। भारत को कभी भी अमेरिका के सैन्य और रणनीतिक सहयोगी की टोली में शामिल नहीं होना चाहिए। इस टोली का सदस्य बनने के बाद से ब्रिटेन की आर्थिक बर्बादी हमारे सामने है।
   ओबामा साहब समानता और विशाल लोकतांत्रिक देश के नाम पर हमें कितना ही भ्रमित करने की कोशिश करें हमें अमेरिका की सैन्य-रणनीतिक टोली का हिस्सा नहीं बनना है। उनके पूर्ववर्ती राष्ट्राध्यक्ष ,अफगानिस्तान को सोवियत सेनाओं से मुक्ति दिलाने के नाम पर अफगानिस्तान को बर्बाद कर चुके हैं। सोवियत संघ को सही विकास के मार्ग पर लाने के नाम पर पूर्व अमेरिकी राष्ट्राध्यक्ष कंगाली के रास्ते पर फेंक चुके हैं।
   अमेरिका के सैन्य-रणनीतिक खेल में शामिल होने के बाद सोवियत संघ जैसा शक्तिशाली देश टूट चुका है। मनमोहन सिंह सरकार ने यदि ओबामा की सैन्य-रणनीतिक टोली का सदस्य बनने के लिए समझौते किए तो भारत की जनता और राष्ट्रीय संप्रभुता के साथ उनकी यह सबसे बड़ी गद्दारी होगी और इसके लिए भारत की जनता उन्हें कभी माफ नहीं करेगी।
   हम मनमोहन सिंह और उनके सहयोगी नीति निर्माताओं को इस मौके पर बताना चाहते हैं अमेरिका की टोली में शामिल होकर कुछ लोग अमीर बन सकते हैं देश अमीर नहीं बन सकता। अमेरिका की टोली लुटेरों की टोली है। गुलामों की टोली है। नव्य उदारतावाद की तबाही से संभवतः हमारे शासक यह बात आसानी से समझ सकते हैं।    




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