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चिदम्बरम् के बयान से राज्य प्रशासन गुस्साया

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मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जिस समय केन्द्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम को पत्र लिख रही थीं और उनसे हिंसा के आंकडों पर कैफियत मांग रही थीं ठीक उसी समय शासकदल के रणबाँकुरे सईदुल्ला कॉलेज (बशीरहाट ) में हिंसा कर रहे थे और कॉलेज शिक्षकों की नकल रोकने के कारण जमकर पिटाई कर रहे थे। इस हिंसा में 6लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं। ममता का प्रशासन हिंसा रोकने की बजाय वहां हिसा की संगठित अभिव्यक्ति में मदद कर रहा था। राज्य के हिंसक वातावरण की यह एक चस्वीर मात्र है। इस तरह के चित्र गांवों और कच्ची बस्तियों में बिखरे पड़े हैं।लेकिन वे मुख्यमंत्री को नजर नहीं आ रहे। वे चिदम्बरम् पर नाराज हैं कि उन्होंने राज्य में हिंसा के बारे गलत आंकड़े क्यों दिए ?

उल्लेखनीय है हाल ही दो केन्द्रीय मंत्री कोलकाता आए। इन दोनों का मकसद एक था लेकिन आने के बहाने अलग-अलग थे। केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से शिक्षा संबंधी नए सुधारों को लेकर चर्चा की ,जबकि चिदम्बरम साहब एक सेमीनार में बोलने आए थे, जिसे कलकत्ता चेम्बर ऑफ कॉमर्स ने आयोजित किया था। असल में इन दोनों का मकसद था ममता बनर्ज…

मानवाधिकार के ग्लोबल पैराडाइम के अंतर्विरोध

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लोकतंत्र की मानवाधिकारों के बिना कल्पना असंभव है। भारत में लोकतंत्र पर बातें होती हैं लेकिन मानवाधिकार के परिप्रेक्ष्य में बातें नहीं होतीं। हमारे यहां का अधिकांश लेखन संवैधानिक नजरिए और उसके विकल्प के वाम-दक्षिण दृष्टियों के बौद्धिक विभाजन या दलीय वर्गीकरण में बंटा है।इसके अलावा मानवाधिकारों पर शीतयुद्धीय राजनीति के परिप्रेक्ष्य के परे जाकर देखने की भी आवश्यकता है।

भारत में लोकतंत्र है लेकिन लोकतांत्रिक सामाजिक जीवन संबंधों का अभाव है।लोकतंत्र के लिए वोट डालने वाली जनता है लेकिन लोकतांत्रिक मनुष्य हम अभी तक नहीं बना पाए। लोकतांत्रिक जीवन संबंधों के अभाव में मानवाधिकारचेतना का विकास संभव नहीं है। सामाजिक जीवन में पूर्व-पूंजीवादी जीवन संबंधों का वर्चस्व आज भी बना हुआ है। इसमें भी अनेक किस्म के सामाजिक स्तर और जीवनशैलियां हैं।

भारतीय समाज में आदिवासी, अल्पसंख्यक,जातिवादी,धार्मिक,लिंग आदि आधारों पर विभिन्न किस्म के जीवन संबंध हैं। इन संबंधों के आधार पर वैविध्यपूर्ण नजरिया है। इनमें आपस में सह-अवस्था में जीने की भावना है ,लेकिन नए लोकतांत्रिक जीवन संबंधों और लोकतांत्रिक विचा…