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शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी और फेसबुक

श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर मंदिरों से मूर्ति औरउत्सव की इमेज वर्षा जिस तरह हो रही है, उसने श्रीकृष्ण को डिजिटल कृष्ण बना दिया है। डिजिटल होने का मतलब आभासी है। आभासी कृष्ण अंतत: जो संदेश देता है - जो डिजिटल है वह अनुपस्थित है। इस तरह की इमेज वर्षा अपील करती है ,जनता को एक्टिव करती है, लेकिन कृष्ण को ज़ीरो बनाती है। कृष्ण का ज़ीरो बन जाना भगवान की डिजिटल त्रासदी है।यह पूँजीवाद की परम विजय की अवस्था है।

श्री कृष्ण को गोपियों में जनप्रिय नायक क्यों बनाया गया ? गोपियों का नायक बनाकर सर्जक असल में किसे चुनौती देता है ?

कृष्ण के साथ गोपियों का संसार सामंतकाल में जुड़ता है। श्रीकृष्ण और गोपियों का प्रेम वस्तुत: सामंती बंदिशें और नियमों का निषेध है।

सवाल यह है इतने ताक़तवर आख्यान को रचने के बाद भी ब्रज के इलाक़े में सामंती मूल्य ध्वस्त क्यों नहीं हुए? आज भी जो जय हो जय हो कर रहे हैं वे सामंती मूल्यों के मोह में क्यों बँधे हैं? यह भक्ति का ग़ैर -यथार्थवादी रूप है।



श्रीकृष्ण कल्पना है ,कल्पना को सत्य बनाने में हमारा समाज महान है।फिर श्रीकृष्ण की कल्पना मनोहर,मनोरंजक और ज्ञान से भरी है।संभवतः खृष्म पहले ऐसे विचारक हैं जो गीता के जरिए विकसित समाज व्यवस्था की परिकल्पना पेश करते हैं।गीता जब लिखी गयी तो उसमें वर्गहीन,आदिम समाज व्यवस्था से आगे बढ़ी हुई नई चातुर्वण्य व्यवस्था की ओर ले जाने का सपना पेश किया गया।यानि आने वाला व्यवस्था के प्रति ऐतिहासिक आकांक्षा व्यक्त की गयी।यह वर्गहीन समाज से वर्गों वाले समाज के रूपान्तरण की दिशा में बड़ा ऐतिहासिक परिवर्तन था।

कृष्ण का चरित्र ग़ैर-परंपरागत है। ग़ैर- परंपरागत चरित्र और आचरण किस तरह सिस्टम में तनाव पैदा कर सकता है , आनंद, प्रेम और युद्ध का नायक बन सकता है यह सीखना चाहिए कृष्ण से।

श्रीकृष्ण पहले विचारकों में हैं जो संसार मिथ्या है ,इस धारणा का खंडन करते हैं,वे कहते है संसार विमुख होकर कोई पूर्णता प्राप्त नहीं कर सकता।निष्काम कर्मयोग उनकी ही देन है,जिसका कालांतर में शासकवर्गों ने जमकर उपयोग किया।लेकिन इस धारणा का प्रगतिशील ताकतों ने नए समाज के निर्माण के लिए इस्तेमाल किया।

श्रीकृष्ण ऐसा चरित्र है जो भगवान के रूप में कम चरित्र रूप में ज़्यादा लोकप्रिय है।लोकप्रिय कहानियों के ज़रिए सबसे ज्यादा जनप्रिय है।



रविवार, 16 अगस्त 2015

सम्राट अकबर के मायने


        अकबर के शासन में भारत की जो इमेज बनी वह हम सबके लिए गौरव की बात है। एक शक्तिशाली राष्ट्र के रुप में भारत को निर्मित करने में अकबर का अतुलनीय योगदान था। भारत को शक्तिशाली राष्ट्र बनाकर अकबर ने भारतीय जनता की जो सेवा की है उसके सामने सभी मुस्लिमविरोधी आलोचनाएं धराशायी हैं। भारत के मुसलमान कैसे हैं और कैसे होंगे अथवा भारत नागरिक कैसे होंगे, यह तय करने में अकबर की बड़ी भूमिका थी । राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है अकबर के जमाने में हिन्दू जितने रुढ़िवादी और कूपमंडूक थे,उसकी तुलना में मुसलमान उदार हुआ करते थे। मसलन्,हिन्दुओं में इक्का-दुक्का लोग ही विदेश जाते थे जबकि मुसलमानों में बहुत बड़ा हिस्सा हज करने के बहाने  मक्का यानी विदेश जाता था। अकबर के जमाने में भारत में यूरोपीय लोग गुलाम की तरह बिकते थे,यह रिवाज अकबर को नापसंद था। उसने अनेक यूरोपीय गुलामों को मुक्ति दिलाई और उनको पोर्तुगीज पादरियों के हवाले कर दिया,इनमें अनेक रुसी थे। दुखद पहलू यह है अकबर के बाद जो शासक सत्ता में आए उनमें वैसी अक्ल और विवेक नहीं था,फलतः अकबर के जमाने में पैदा हुई अनेक परंपराएं आगे विकसित नहीं हो पायीं।
       अकबर को इस बात का श्रेय जाता है कि उसने पहलीबार जनाना बाजार की अवधारणा साकार की,मीना बाजार का निर्माण किया।अकबर यह भी चाहता था कि भारत में बहुपत्नी प्रथा बंद हो और एकपत्नी प्रथा आरंभ हो। लेकिन वह इस मुतल्लिक कानून बनाने में असफल रहा। अकबर की धारणा थी कि भारत की औरतें आजाद ख्याल हों और उन पर कोई बंधन न हो। मीना बाजार के बहाने अकबर ने पहलीबार औरतों को पर्दे,महलों और घरों की बंद चौहद्दी से बाहर निकाला। मीना बाजार में औरतें खूब आती थीं, एक-दूसरे से मिलती थी,औरतें ही दुकानें चलाती थीं। जिस दिन जनाना बाजार लगता था उसे “खुशरोज” (सुदिन) कहा जाता था। मीना बाजार में यदि कोई लड़की पसंद आ जाती थी तो लड़का-लड़की में प्रेम हो जाता था। जैन खाँ कूका की बेटी पर यहीं सलीम आशिक हो गया था , लड़की की शादी नहीं हुई थी,मालूम होने पर  अकबर ने खुद शादी कर दी। अकबर के जमाने में बाजार में प्रेम की परंपरा की नींव पड़ी,अकबर ने इसे संरक्षण दिया और आज यह परंपरा युवाओं में खूब फल-फूल रही है। पर्दा प्रथा की विदाई हुई।
     अकबर की विशेषता थी कि वह दासता का विरोधी था। उसने अपने दासों को मुक्त कर दिया था। अबुलफजल के अनुसार अकबर ने सन् 1583 में दासमुक्ति का आदेश दिया। लेकिन समाज में दासों की समस्या बनी रही। अकबर के रुढ़िवादी रुप का आदर्श रुप था उसका दाढ़ी विरोधी नजरिया। अकबर और उसका बेटा दाढ़ी नहीं रखते थे। दाढियों से अनेक रुढ़ियां चिपकी हुई थीं,इसलिए अकबर ने दाढ़ी को निशाना बनाया। अकबर और उसके शाहजादे ने दाढ़ी नहीं रखी।जहाँगीर ने सारी जिन्दगी दाढ़ी नहीं रखी।  लेकिन शाहजहाँ और उसके बाद के जमाने में दाढ़ी लौट आयी। अकबर के दाढ़ी न रखने का आम जनता में व्यापक असर पड़ा और हजारों लोगो ने अपनी दाढ़ियां मुडवा दीं।
    
    अकबर का दिमाग पूरी तरह आधुनिक था उसने  भारत में व्यापक स्तर पर बारुद का इस्तेमाल किया। बारुदी हथियारों का प्रयोग किया।  जबकि बाबर ने ईरान के शाह इस्माइल के सहयोग से बारुद और तोपों के इस्तेमाल की कला सीख ली थी।  तोपों का सबसे पहले प्रयोग किया। अकबर पहला ऐसा शासक था जिसको मशीनों से प्रेम था,मशीनों के जरिए आविष्कार करना उसे पसंद था।  जेस्वित साधु पेरुश्ची के अनुसार “ चाहे युद्ध सम्बन्धी बात हो या शासन सम्बन्धी बात हो या कोई यांत्रिक कला ,कोई चीज ऐसी नहीं है,जिसे वह नहीं जानता या कर नहीं सकता था।” राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है “ अकबर ने महल के अहाते के भीतर भी कई बड़े-बड़े मिस्त्री खाने कायम किये थे,जिनमें वह अक्सर स्वयं अपने हाथ से हथौड़ी –छिन्नी उठाने से परहेज नहीं करता था। उसने हथियारों और यन्त्रों में कई आविष्कार किये थे,जिनका उल्लेख ‘आईन अकबरी’ में अबुलफजल ने किया है।  चित्तौड़ के आक्रमण के समय उसने अपनी देख-रेख में आध-आध मन के गोले ढलवाये ।बन्दूक चलाने में वह बड़ा ही सिद्धहस्त था शायद ही उसका कोई निशाना खाली जाता था।”   

शुक्रवार, 12 जून 2015

ग़ज़ल के मर्म की तलाश में


   ग़ज़ल पर फ़िदा पाठकों की किल्लत नहीं है। सवाल यह है  ग़ज़ल पर इतने पाठक फ़िदा क्यों हैं ? भारत में जिस तरह श्रृंगार रस के चाहने वालों की परंपरा रही है, उसी तरह फारसी और उर्दू की परंपरा में ग़ज़ल के चाहने वालों की परंपरा भी रही है। नवरसों में जिस तरह श्रृंगार रस का वर्चस्व रहा है। उसी तरह उर्दू कविता में ग़ज़ल का वर्चस्व रहा है। ग़ज़ल की लोकप्रियता के कारण ही उसको अनेक स्तरों पर रचने वाले शायरों की जमात पैदा हुई। ग़ज़ल के बहुस्तरीय रुपों को देखकर यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि ग़ज़ल दरबारी और बाजारु है।
      ग़ज़ल एक तरह की नहीं बल्कि अनेक किस्म की लिखी गयी है। फिर भी यह सवाल अपनी जगह कायम है कि ग़ज़ल क्या है ? क्या वह स्थायी रुप में कायम है अथवा बदलती रही है ? लेकिन यह बात सच है कि ग़ज़ल पर श्रृंगार –रस का गहरा असर है। जिस तरह श्रृंगारवादी कवि स्त्रीकेन्द्रित पुंसवादी नजरिए का प्रतिपादन करते थे वैसे ही ग़ज़ल लेखक भी औरतों पर पुंसवादी नजरिए से लिखते थे।
     फारसी में 'ग़ज़ल' का अर्थ था औरतोंका जिक्र करना,उनके इश्क़का दम भरना और उनकी मुहब्बतमें मरना। दिलचस्प बात यह थी कि ग़ज़ल में शायर लोग इश्को-मुहब्बतमें इस तरह व्यस्त थे कि उनको परिवारके अन्य सदस्यों के साथ मुहब्बत का ख्याल ही नहीं आया। आरंभिक दौर में ग़ज़ल में काम-भावना से संबंधित विषयों की भरमार थी। इस दौर में कोमल और रसभरी भावनाओं पर केन्द्रित रचनाएं लिखी गयीं। लेकिन ग़ज़ल यहीं तक रुकी नहीं रही। उसमें कालान्तर में ईश्वर और दार्शनिक विषयों का समावेश होने लगा। इससे ग़ज़ल में मिश्रण की परंपरा शुरु हुई।
     आरंभिक दौर के प्रेमकेन्द्रित ग़ज़ल शायरों का हाल यह था कि वे विचारों की जंग तो लड़ना जानते थे लेकिन विचारों का जोखिम उठाना नहीं जानते थे, मसलन् , वे प्रेम या इश्क पर कविता लिखना जानते थे लेकिन सामाजिक बन्धनों से संघर्ष करना नहीं जानते थे। वे पारिवारिक मर्यादाओं को तोड़ना नहीं जानते थे। इनके अलावा इस तरह के शायरों में 'हकीकी ' और 'मजाज़ी ' दो किस्म के शायर थे। इनमें 'हकीकी' शायरों में निराकार ईश्वर का जलवा मिलता है । वे उसे इसी संसार में प्रेयसी के रुप में साकारभाव में देखना चाहते हैं। सूफी शायरों ने इस परंपरा का जमकर विकास किया। उनकी शायरी में मानवीय प्रेम खूब व्यक्त हुआ है।मसलन्, 'रियाज़' खैराबादीने लिखा-
  '' हम आँख बन्द किये तसव्वुरमें पड़े हैं।
    ऐसेमें कहीं छमसे वोह आ जाय तो क्या हो ??''
इसी भाव को इकबाल ने इसतरह व्ययक्त किया-
          '' कभी ऐ हक़ीक़ते -मुन्तजिर! नज़र आ लिबासे-मज़ाज़में।
           कि हजारों सजदे तड़प रहे हैं,मेरी जबीने-नियाजमें।।''
इश्क के सूफियाना अंदाज़ को 'मीर' ने लिखा -'' इश्क बिन यह –अदब नहीं आता।''
आधुनिककाल में इश्क पर लिखने वाले शायरों में दो तरह के शायर मिलते हैं एक वे हैं जो 'स्वानुभव' के आधारपर लिख रहे थे,दूसरे वे हैं  जिन्हें कभी तिरछी नजरसे न तो घायल होना नसीब हुआ , न कभी किसी की चौखट पर सर टेकना मयस्सर हुआ। इनमें अधिकतर नकली आशिक शायर हैं। ये वे शायर हैं जिनकी शायरी में आँसुओं का दरिया बहता नजर आएगा लेकिन जिन्दगी में आंसू की कभी इन शायरों ने एक बूँद भी नहीं गिरायी।
        ऐसे भी शायर रहे हैं जिन्होंने एकबार जिसे दिल दे दिया फिर दिल सारी जिन्दगी उसके नाम कर दिया। ये अनुभवहीन शायर हैं, ये लोग 'खुदा मुहब्बत है, और मुहब्बत खुदा है।'के नारे इर्द-गिर्द शायरी करते रहे हैं। 'मीर' संभवतः पहले शायर हैं जिनके यहां यह परंपरा आरंभ होती है ,'मीर' ने लिखा-
         '' चाहें तो तुमको चाहें,देखें तो तुमको देखें।
          ख़्बाहिश दिलोंकी तुम हो.आंखोंकी आरजू तुम।।''
        ''ज़ौक़'' ने लिखा
          '' मैं ऐसे साहिबे –अस्मत परी-पैकरै आशिक हूँ।
            नमाजैं पढ़ती हैं हूरें,हमेशा जिसके दामन पर।''  
इनमें ही दूसरी कोटि बाजारु शायरों की है।यह कामलोलुप,विषयासक्त लोगों की शायरी है।इस तरह की शायरी पर वेश्याओं के संपर्क और दरबारी संस्कृति का गहरा असर है। चंचल और खण्डिता नायिका का विचार इनके असर से ही आया है। इस तरह के शायरों को कामुक शायर कहना समीचीन होगा। बाजारी इश्क के अलावा बेवफ़ा माशूक आदि विषयों को शायरों ने दरबारों से ग्रहण किया।
     मुश्किल यह भी है कि दिल्ली के शायरों और लखनऊ के शायरों का अनेक विषयों पर नजरिया एक जैसा नहीं था। मसलन्, लखनऊ के शायरों में निराशा और असफलता की अभिव्यंजना बहुत कम मिलती है जबकि दिल्ली के शायरों में यह खूब है, इसका प्रधान कारण है लखनऊ में जिन दिनों अवधप्रांत के दरबारों चमक मार रही थी ,, इसके कारण अवध के शायरों में एक बड़ा अंश श्रृंगार रस और दरबारी संस्कृति से प्रभावित था। वहीं उस समय दिल्ली के शायरों ने कष्ट में जिन्दगी गुजारी। यह कष्ट उनकी शायरी के लिए वरदान साबित हुआ। इसलिए देहलवी शायरों ने दुख दर्द, पीड़ा,भरण-पोषण की चिन्ताएं,असफलता आदि विषयों पर जमकर लिखा।
  जोश मलाहाबादी ने लिखा- '' मेरे रोनेका जिसमें क़िस्सा है।
                          उम्रका बहतरीन हिस्सा है।।''    
जिगर मुरादाबादी ने लिखा - '' इससे बढ़कर दोस्त कोई दूसरा होता नहीं ।
                          सब जुदा हो जायें,लेकिन ग़म जुदा होता नहीं ।।
कहने का आशय यह कि लखनऊ और दिल्ली के शायरों के परिवेशगत अंतर ने उनकी शायरी और नजरिए को गहरे प्रभावित किया। दिल्ली के शायरों की आपदाओं में जवानियाँ गुजरीं. वहीं दूसरी ओर लखनवी शायरोंने भोग-विलास में आँखें खोली थीं ।
        यह भी हकीकत है कि 'मीर' जब लखनऊ जाते तो उनको भी लखनऊ की रंगीन फ़िजा आकर्षित करती और कह बैठते-'' मिलो इन दिनों हमसे एकरात जानी। कहीँ हम कहाँ तुम कहाँ फिर जवानी।'

   सन् 1780 ई. के पूर्व 'हबीब' का तसव्वुर स्पष्ट नहीं था। उसके लिए संज्ञा,विशेषण,क्रिया,सम्बोधन आदि सब स्त्री लिंग के न होकर पुलिंग के व्यवहृत होते थे। हबीब का अर्थ है 'प्यारा' । यानी जिसे प्यार किया जाय वोह हबीब है। ग़ज़लमें सबसे पहले हसरत देहलवी (1772-1797 ई.) ने स्त्री को हबीब का दर्जा दिया। तबसे लखनवी शायरी में स्त्री के लिए हबीब का प्रयोग होने लगा।  धीरे धीरे यही शायरी जनानी शायरी होती चली गयी। उसमें श्रृंगार रस का वर्चस्व बढ़ता चला गया। 

रविवार, 6 फ़रवरी 2011

ज्ञान और विवेक के अनुरागी प्रचारक के रूप में थी नालंदा की प्रतिष्ठा -डा.अमर्त्यसेन

     इस परिचर्चा का विषय है नालंदा और विज्ञान की खोज, लेकिन इस बेशक जटिल विषय की पड़ताल के पहले, मैं नालंदा पर ही कुछ बोलना चाहूंगा, क्योंकि दुनिया भर के लोगों में अभी भी इसका अस्तित्व अज्ञात ही है। फिलहाल, जबकि संयुक्त एशियाई पहलकदमी से इस विश्वविद्यालय की पुर्नस्थापना हो रही है, तो यह तथ्य कि नालंदा एक अत्यंत प्राचीन विश्वविद्यालय है, जग-जाहिर हो रहा है। लेकिन विश्व के प्राचीन विश्वविद्यालयों से यह अद्वितीय कैसे है?

अच्छा, दुनिया का प्राचीनतम विश्वविद्यालय कौन-सा है? इस सवाल के जवाब में हमारा दिमाग घूमता है, 1088 में आरंभ बोलोग्ना की ओर, 1091 में स्थापित पैरिस की ओर और अन्य विद्या-गत्रढों, जिसमें 1167 में स्थापित ऑक्सफोर्ड और 1209 में स्थापित कैम्ब्रिज भी शामिल हैं। इस चित्र में नालंदा की मुनासिब जगह कहाँ है? यदि हम सतत अस्तित्वमय विश्वविद्यालय ढूँत्रढ रहे होंगे तो सबसे छोटा जवाब होगा, 'कहीं नहीं।'

इस्वी सन 1193 में नालंदा अफगानियों के आक्रमण में बलपूर्वक नष्ट कर दिया गया था, जिसका नेतृत्व निर्दयी शासक बख्तियार खिलजी ने किया था। यह ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के आरंभ होने के कुछ ही समय बाद की और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की स्थापना के कुछ ही समय पहले की बात है। नालंदा विश्वविद्यालय, जो भारत में उच्च शिक्षा का विश्वविख्यात केन्द्र था, जिसे पाँचवीं शती के आरंभ में स्थापित किया गया था, सात सौ साल से ज्यादा समय तक अपना वजूद बनाए रखने और यूरोप के प्राचीनतम विश्वविद्यालय बोलोग्ना से तुलना के बावजूद खत्म हो रहा था, ठीक उसी समय, ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज अपना वजूद पा रहे थे।

नालंदा छहः सौ साल का हो गया था, जब बोलोग्ना का जन्म हो रहा था। यदि उसे नष्ट नहीं किया गया होता और वह हमारे समय तक अपना वजूद बनाए रख पाता, तो नालंदा विश्वविद्यालय, एक लंबे अंतराल से, दुनिया का प्राचीनतम विश्वविद्यालय होता। एक और विशिष्ट विश्वविद्यालय, जिसका वजूद भी सतत नहीं टिक पाया, वह था कैरो का अल-अजहर विश्वविद्यालय, जिसकी अक्सर नालंदा से तुलना होती थी और जिसे इस्वी सन 970 में बसाया गया था, उस समय नालंदा विश्वविद्यालय की उम्र पाँच सौ साल से ज्यादा हो चुकी थी।

तो उम्र को लेकर काफी शेखी हो गई (जैसा कि आप जानते हैं, हम भारतीय लोग उम्र को काफी गंभीरता से लेते हैं), और मुझे उम्मीद है कि आप समझ ही गए होंगे कि हम लोग उम्र के लिहाजन, बजाय कि वजूद-ए-मुसस्सल् दुनिया के प्राचीनतम विश्वविद्यालय के बारे में बात कर रहे हैं। फिल वक्त इस विश्वविद्यालय को दोबारा शुरु किया जा रहा है और क्योंकि मैं अंतरिम प्रबंध परिषद के अध्यक्षता का दुष्कर दायित्व निभा रहा हूँ, मैं इस निष्कर्ष पर हूँ कि 800 वर्षों की विवृत्ति के पश्चात विश्वविद्यालय की पुर्नस्थापना कितना कठिन कार्य है। लेकिन हम नतीजों के करीब हैं। आज की यह परिचर्चा मुझे एक मौका उपलब्ध कराती है कि मैं प्राचीन नालंदा के विज्ञान की खोज का स्मरण करूँ, जिससे कि हम सभी को प्रेरणा मिले और नए नालंदा के लिए हमारे सुदीर्घ प्रयासों का पथ प्रदर्शन हो। मैं सुदीर्घ शब्द का इस्तेमाल मुख्यतः लागत की वजह से, बल्कि कहें कि सिर्फ लागत की वजह से कर रहा हूँ। हम विज्ञान संकाय तत्काल शुरु नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि भौतिकी एवं जैविक विज्ञान शाखाओं के लिए मानविकी एवं समाज विज्ञान शाखाओं से कहीं-कहीं ज्यादा धन की जरूरत है। प्राचीन नालंदा की वैज्ञानिक परंपराओं का पुर्नस्मरण या कहें कि मूल्यांकन ज्यादा चुनौतीपूर्ण है, लेकिन इस समय अत्यंत महत्वपूर्ण भी, कुछ इसलिए कि हमें सुदीर्घ प्रयास (हालाँकि स्थापना एवं विस्तार के लिए हम धन इकट्ठा करने की कोशिश कर ही रहे हैं।) के बारे में सोचना शुरु करना है और मुख्यतः इसलिए भी कि नए नालंदा की संपूर्ण अवधारणा, जिसमें मानविकी (जैसे इतिहास, भाषा एवं भाषा संबंधी तथा तुलनात्मक धर्म) के तथा सामाजिक विज्ञान एवं व्यवसाय विश्व (जैसे अंतर्राष्ट्रीय संबंध, प्रबंधन एवं विकास तथा सूचना प्रोद्योगिकी) के अध्यापन-अनुसंधान में वैज्ञानिक अभिवृत्ति एवं अनुशासित विचार महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

नालंदा में विज्ञान की खोज से तादातम्य रखते कुछ सवाल उठाने की इजाजत चाहता हूँ। पहला, क्या नालंदा जिस भी तरह के अनुसंधान का हिमायतगार था, उसके उपादान में उसे यथेष्ट विशालता हासिल थी? क्या वह अंधविश्वास एवं अज्ञान के सागर की महज एक बूँद की तरह तो नहीं था; जिसे कि कुछ लोग प्राचीन भारत की विशेषता के तौर पर देखते थे; यह समझने के लिए कि आधुना भारत को नियंत्रण में रखने के लिए यह अवधारणा कितनी सुदृढ़ और राजनीतिक तौर महत्वपूर्ण थी, आपको सिर्फ जेम्स मिल्स की 'हिस्ट्री ऑफ इंडिया' पढ़ने की जरूरत है, जिसे कि राज चलाने के लिए भेजे जाने वाले ब्रिटिश प्रशासनिक सेवा के नौकरशाहों के लिए पढना अनिवार्य था।

बहरहाल, नालंदा ज्ञान का प्राचीन केन्द्र था, जिसका दुनिया के कई देशों, विशेषतः चीन और तिब्बत, कोरिया और जापान तथा शेष एशिया के साथ सुदूर पश्चिम के तुर्की जैसे देश के विद्यार्थियों में भी आकर्षण था। नालंदा एक आवासीय विश्वविद्यालय था, जहाँ 10,000 की चरम सीमा तक विद्यार्थी थे, जो विविध विषयों का अध्ययन कर रहे थे। चीनी विद्यार्थियों ने खास तौर पर नालंदा में जो देखा अथवा जो भी शैक्षिक मानक उन्हें पसंद आए, उस पर विस्तार से लिखा, इनमें सातवीं शताब्दी के चीनी विद्यार्थी जुआनज़ैंग और याइ जिंग के नाम उल्लेखनीय हैं। प्राचीन चीन के इतिहास में संयोगन् नालंदा ही एकमात्र गैर-चीनी संस्थान है, जहाँ चीनी विद्वानों ने ज्ञानार्जन किया था।

यह समझना भी जरूरी है कि नालंदा अतिविशिष्ट था, बावजूद इसके वह उस काल में भारत के विशेषकर बिहार में सुव्यवस्थित उच्च शिक्षा की वृहद परंपरा का एक अंग मात्र था। नालंदा के अलावा समीप ही दूसरे संस्थान भी थे, जैसे विक्रमशिला एवं ओदांतपुरी। वास्तव में जुआंगज़ैंग ने इनके विषय में भी लिखा, हालाँकि वह नालंदा में अध्ययन कर रहा था। नालंदा उस समय की सामाजिक संस्कृति से सम्बद्ध था और नालंदा की परंपरा के बारे में विचार करते समय यह याद रखना जरूरी है।

दूसरा प्रश्न जरा जटिल है क्योंकि यह एक धार्मिक संस्थान में विज्ञान की गुंजाइश के बारे में है। विक्रमशिला एवं ओदांतपुरी की ही तरह नालंदा भी एक बौद्ध संस्थापन था, तो तय है कि इन संस्थानों में बौद्ध दर्शन एवं अभ्यास की ही पढ़ाई होती थी। यहाँ याद रखने की बात यह है कि बुद्ध दर्शन के तत्वों के अनुरूप प्रबोधनात्मक (गौतम को बुद्ध नाम दिया गया था, जिसका अर्थ था जो प्रबुद्ध है।) उपदेश ही केन्द्र-बिंदू थे, फिर भी बौद्धवादी बुद्धिजीवी ज्ञान-मीमांसा एवं नीति-विषयक जिज्ञासा की परंपरा के चलते विविध विषयों में ज्ञानार्जन करते थे। कुछ विषय बौद्ध प्रतिबद्धताओं से सीधे जुड़े हुए थे, जैसे चिकित्सा-शास्त्र एवं स्वास्थ्य रक्षा, दूसरे विषय बौद्ध संस्कृति के विकास एवं प्रसार से जुड़े थे, जैसे वास्तुशिल्प एवं मूर्तिकला; और कुछ, विश्लेषणात्मक विद्याभिमुख बौद्ध बुद्धिजीवियों के प्रश्नों से।

इस अंतिम बात को और स्पष्ट करता हूँ, सिर्फ नालंदा के संदर्भ में ही नहीं, वरन् बौद्ध बुद्धिजीवियों के प्रभाव को समझने के एक प्रयास के तौर पर। भारतीय एवं चीनी बुद्धिजीवियों के परस्पर जुड़ाव और उन पर सामान्यतः बौद्ध प्रभावों के साक्ष्यों की भरमार है, विशेषतः तांत्रिक बौद्धवाद के अनुषंग में, जिसका सातवीं और आठवीं शताब्दी के तांग काल के चीनी गणित एवं खगोल विज्ञान पर खासा प्रभाव था। याइ जिंग, जो नालंदा का विद्यार्थी था और जिसका उल्लेख मैं पहले कर चुका हूँ, तांत्रिक पाठों का संस्कृत से चीनी भाषा के अनुवादकों में से एक था। सातवीं और आठवीं शताब्दी तंत्रवाद चीन की एक मुख्य शक्ति थी और कई विद्वान चीनी बुद्धिजीवी इसके अनुयायी थे। क्योंकि कई तांत्रिक विद्वानों की गणित में गहन रुचि थी (अथवा कहें कि शुरु में अंकों के तांत्रिक आकर्षण में बँधे थे), इसलिए तांत्रिक गणितज्ञों का चीनी गणित पर विशेष प्रभाव था।

जैसा कि जोसेफ नीधम लिखते हैं, 'सबसे महत्वपूर्ण तांत्रिक आइ-हिसिंग (+ 672 से + 717) था, अपने समय का महानतम गणितज्ञ एवं खगोल विज्ञानी।' नीधम टिप्पणी करते हैं, 'यह तथ्य ही हमें विचार का प्रस्ताव देता है, क्योंकि इसी में वह संभावित संकेत है, जो बौद्धवाद के इस स्वरूप के महत्व को सभी प्रकार के अवलोकनीय एवं प्रयोगात्मक विज्ञानों के लिए रेखांकित करता है।' याइ सिंग (अथवा नीधम के शब्दों में कहें तो आइ-हिसिंग), असल में कभी भी नालंदा का विद्यार्थी नहीं था, लेकिन उसी परंपरा से जुड़ा था, जिसके परिणामों में से एक नालंदा थी, वह धाराप्रवाह संस्कृत बोलता था (इस फर्क पर ध्यान देना जरूरी है कि याइ सिंग गणितज्ञ था, जब कि याइ जिंग नालंदा से ज्ञानार्जित बुद्धिजीवी और उसकी अन्य विधाओं के अलावा चिकित्सा शास्त्र में भी रुचि थी।)। एक बौद्ध भिक्षु के रूप में याइ सिंग भारतीय धार्मिक साहित्य से भिज्ञ था ही, उसने गणित और खगोल विज्ञान पर किए गए समस्त भारतीय लेखन में महारत हासिल कर ली थी। उसके तमाम धार्मिक जुत्रडावों के बावजूद यह मानना भूल होगी कि याइ सिंग के गणितीय अथवा वैज्ञानिक कार्य की कोई धार्मिक प्रेरणा थी। एक सामान्य गणितज्ञ जो तांत्रिक भी था, याइ सिंग विविध विश्लेषकीय एवं संगणनकीय समस्याओं से जूझता रहा, जिसमें से कइयों के तंत्रवाद अथवा बौध्दवाद से दूर-दूर तक लेना-देना नहीं था। जिन कुछ संयोजकीय गणना के शास्त्रीय सवालों से याइ सिंग दो-चार होता रहा उनमें से एक था, 'शतरंज में संभावित स्थितियों के कुल अंकों की गणना।' याइ सिंग पंचांगीय गणनाओं में विशेष दिलचस्पी रखता था, उसने चीन के लिए शाही व्यवस्था पर आधारित पंचांग की रचना की थी।

चीन में आठवीं शताब्दी में याइ सिंग के साथ पंचांगीय अध्ययनों में जो भारतीय खगोल विज्ञानी जुटे हुए थे, उन्होंने उस त्रिकोणमितिय प्रगति का बेहतर उपयोग किया था, जो उस समय तक भारत में हो चुकी थी (हालाँकि भारतीय त्रिकोणमितिय की मूल जत्रडें यूनानी हैं।) भारतीय त्रिकोणमितिय का पूर्वी संचलन विचारों के वैश्विक आदान-प्रदान का हिस्सा था, जो कालांतर में पश्चिम की ओर गया। वास्तव में, यही वह समय था, जब भारतीय त्रिकोणमितिय का अरब विश्व पर भी खासा प्रभाव हो रहा था (आर्यभट्ट, वाराहमिहिर, ब्रम्हगुप्त एवं अन्य के लेखनकार्यों के अरबी अनुवाद के जरिए), और बाद में अरबों के जरिए यूरोपीय गणित को भी प्रभावित कर पाया (1150 में भारतीय लेखन पर आधारित अरब गणितीय पाठों का प्रथम लातिनी अनुवाद हो रहा था, यह नालंदा के आकस्मिक समापन के थोड़े ही समय पहले की बात है।)

यही वह सामान्य बौद्धिक सजीवता है, इस सजीवता में विश्लेषकीय एवं वैज्ञानिक सवालात भी है, जिनकी, प्राचीन नालंदा की गतिविधियों को समझते समय हमें तारीफ करनी है। मैं संपूर्ण स्वाधीनता से यहाँ उल्लेख करना चाहूँगा कि नालंदा हालाँकि धार्मिक संस्थापन था, लेकिन संस्थापन के धर्म को साझा करने की बजाय जन कल्याण के सामान्य बौद्धिक एवं वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसरण की परंपरा वहाँ विद्यमान थी। आइसैक न्यूटन धार्मिक थे, वास्तव में रहस्ययभिमुखी थे और फिर भी भौतिक विज्ञान, गणित और प्रकाश विज्ञान के स्वाभाव में उन्होंने क्रांति की और उन्हें अपने महाविद्यालय (जो कि मेरा और वेंकी रामाकृष्णन का भी महाविद्यालय है) की (यानी त्रिनिटी की) अतिधर्मिता से किसी तरह की कोई समस्या नहीं थी, न ही उन्होंने उसकी संगतता को लेकर किसी तरह के सवाल, ताकतवर तर्कों के जरिए उठाए जो कुछ साल बाद हेनरी सिड्गविक जैसे त्रिनिटी के लोगों ने उठाए थे। नालंदा में धर्म और विज्ञान का मेल किसी भी तरह से अनूठा नहीं था और इसे और एक उदाहरण के जरिए समझा जाए; वर्तमान में विश्व के प्राचीन विश्वविद्यालयों में से एक, पैडूआ क्रिश्चियन विश्वविद्यालय, गैलिलियो गैलिली जहाँ की देन हैं। (संयोगन, पैडूआ विश्वविद्यालय से मानद डॉक्टरेट की उपाधि स्वीकारते समय मैं हँस रहा था, क्योंकि मैंने सुना कि पॉल रिकोएर, जिन्हें भी यह उपाधि दी जानी थी, पैडूआ विश्वविद्यालय को खूब कोस रहे थे कि यह विश्वविद्यालय गैलिलियो के पक्ष में ठीक तरह से खड़ा नहीं था। रिकोएर के तर्क निर्दोष थे, लेकिन पैडूआ के वर्तमान अधिष्ठाता को गैलिलियो के समर्थन में पैडूआ के न खड़े होने के लिए दोष देना जरा अन्यायकारी प्रतीत होता है।) मैं नहीं जानता कि नालंदा में इस तरह के विवाद किस हद तक उभरे, लेकिन जैसे-जैसे दस्तावेज प्रकाश में आ रहे हैं, हम जान पाएंगे कि क्या नालंदा में धर्म और विज्ञान के संबंध में किसी तरह का तनाव था या नहीं। लेकिन जो बात स्पष्ट है वह यह कि बौद्ध संस्थापन ने विश्लेषकीय एवं वैज्ञानिक विषयों की खोज के लिए नालंदा विश्वविद्यालय परिसर में ही जगह उपलब्ध कराई थी।

तीसरा प्रश्न नालंदा में पढ़ाए जाने वाले विषयों से संबंधित है। यहीं पर समस्या हो रही है, क्योंकि नालंदा के दस्तावेज बख्तियार और उसकी विजेता सेना ने अधाधुंध तरीके से जला दिए थे। इसलिए हमें नालंदा के विद्यार्थियों द्वारा लिखे गए ऑंखों देखे नोट्स पर निर्भर करना होगा और क्योंकि भारतीय इतिहास लेखन के प्रति मौन साधे रखते हैं (यही अपने आप में रोचक विषय है) और बाहरी लोग भारतीयों के इस मौन से इत्तेफाक नहीं रखते, जैसे, जुआंगज़ैंग और याइ जिंग। हम वहाँ पढ़ाए जाने वाले विषयों के बारे में और जिन विषयों पर अनुसंधान हुए उनके बारे में जानते हैं, जो कि चिकित्सा शास्त्र, जन स्वास्थ्य, वास्तुशिल्प और खगोल विज्ञान हैं, धर्म, इतिहास, कानून और भाषा संबंधी विषयों के साथ।

लेकिन गणित के बारे में क्या? नालंदा के चीनी इतिहास लेखक जैसे याइ जिंग और जुआंगज़ैंग गणितीय अध्ययनों में शामिल नहीं थे। भारतीय गणित में गहन रुचि रखने वाले चीन के लोग, जैसे कि याइ सिंग नालंदा के विद्यार्थी नहीं थे। हो सकता है कि कुछ लोग हों जो कि भारत में रहते हों या कि चीन में या फिर दुनिया में और कही, जिन्होंने नालंदा से गणित (उस कालखंड में यह विषय खूब फल-फूल रहा था) की पढ़ाई की हो और उनके दस्तावेज गुम हो गए हों। बहरहाल, भारतीय संदर्भों से हम जानते हैं कि नालंदा में तर्कशास्त्र एक विषय के तौर पर पढ़ाया जाता था और मुझे उम्मीद है कि गणित के नालंदा के पाठयक्रम में होने के बारे में साक्ष्य भविष्य में हमें कभी न कभी जरूर मिलेंगे।

नालंदा के पाठयक्रम में गणित की उपस्थिति की दिशा में अपरोक्ष साक्ष्य यह है कि खगोल विज्ञान नालंदा के पाठयक्रम का हिस्सा था। जुआंगज़ैंग ने इस पर टिप्पणी लिखी है और अवलोकनार्थ बनाए गए मीनार के संदर्भ में लिखा है मानो यह बादलों के बीच ऊपर अवस्थित हो, और जिससे नालंदा के परिसर का विहंगम दृश्य दिखाई देता था। उस कालखंड में भारतीय और चीनी खगोल विज्ञान की प्रगति, गणित के, खासकर त्रिकोणमितिय विकास, से अत्यंत करीब से जुड़ी हुई थी। असल में, चीनी जिन भी भारतीय विद्वानों को खगोल विज्ञान के कार्यों के लिए चीन लेकर गए थे, वे सभी गणितज्ञ थे (उनमें से एक आठवीं शताब्दी के चीन में खगोल विज्ञान के लिए बनी आधिकारिक परिषद के निदेशक भी बने।)। जो भारतीय गणितज्ञ चीन गए उनके वंशक्रम के बारे में हम ज्यादा नहीं जानते कि जिससे उनका नालंदा से संबंध निर्धारित हो सके, लेकिन हम यह तो जानते हैं कि पाँचवीं शताब्दी के आरंभ से ही पाटिलपुत्र (पटना) के समीप कुसुमपुर नामक स्थान पर इस विषय के प्रवर्तक अग्रणी गणितज्ञगण एकत्रित होते थे।

मैं दो अंतिम टिप्पणियों के साथ अपनी बात समाप्त करता हूँ। पहला नालंदा के बौद्धिक आयाम से संबंधित है, जो नालंदा के विषय में चीनी और भारतीय विद्वानों के वृतांतों में पूरी ताकत से उभरता है। नालंदा के गुरु-शिष्य तर्क-प्रेमी थे और कई बार शास्त्रार्थ का आयोजन करते थे। मैंने कहीं और तर्कशास्त्र के गहन स्वरूप के भारतीय बौद्धिक इतिहास पर चर्चा की है, यहाँ मैं यह जोड़ना चाहता हूँ कि यह वैज्ञानिक परंपरा का भी हिस्सा है, तर्कों की प्रस्तुति और रक्षा, स्थितियों और दावों को अस्वीकारना सिर्फ विश्वास के भरोसे। नालंदा में तर्क-शास्त्रार्थ के खूब मुकाबले आयोजित होते थे और कहा जा सकता है कि अत्यंत सामान्य तरीके से यह नालंदा के वैज्ञानिक संबंधों में फिट भी होते थे।

अंतिम टिप्पणी नालंदा के ज्ञान और विवेक के अनुरागी प्रचारक रूप से संबंधित है। यह भी एक कारण है कि हमेशा वहाँ विदेश के विद्यार्थियों के लिए एक आतुरता होती थी। जुआंगज़ैग आर याइ जिंग ने चीन से नालंदा पहुँचने पर हुए गर्मजोशी भरे स्वागत का जिक्र किया है। जुआंगज़ैंग ने तो वास्तव में नालंदा में शिक्षा पूर्ण करने के बाद एक शिक्षक द्वारा वहीं रुककर शिक्षा देने की पेशकश और दबाव पर तर्क देते हुए वही प्रतिबद्धता जाहिर की। उसने अपनी प्रतिबद्धता का उल्लेख करते हुए बुद्ध के ही वचन का सहारा लिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि सारी दुनिया को प्रबुद्ध बनाओ। उसने भाषणगत सवाल किया, 'कौन यह रहकर अकेले ही आनंदित होना चाहेगा और उन्हें भूल जाएगा जो प्रबुद्ध नहीं हैं?' यदि साक्ष्यों की तलाश एवं आलोच्य तर्कों से उनका रक्षण विज्ञान की परंपरा का एक भाग है, तो ज्ञान और विवेक को स्थानीयता से मुक्त करने की प्रतिबद्धता भी उसी परंपरा का हिस्सा है। विज्ञान को संकीर्णता से जूझना पड़ता है और नालंदा इसके प्रति दृढ़ता से प्रतिबद्ध था।

(चेन्नई में 4 जनवरी को संपन्न 98वीं भारतीय विज्ञान कांग्रेस में डॉ. अमर्त्य सेन का मुख्य भाषण, डॉ. अमर्त्य सेन को 1998 में अर्थशास्त्र के लिए नोबल पुरस्कार मिला और 1999 में भारत रत्न। वह अमेरिका के हावर्ड विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र एवं दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर हैं और नालंदा विश्वविद्यालय के अंतरिम प्रशासकीय परिषद के अध्यक्ष हैं।मूल अंग्रेजी से अनुवादः पुष्पेन्द्र फाल्गुन,पुष्पेन्द्र जी के फेसबुक से साभार) 

बुधवार, 15 सितंबर 2010

नामवर सिंह के भक्त और लोकसमाज के लोकसेवक

                    (आलोचक नामवर सिंह)   
           हिन्दी में अनेक आलोचक हैं जो अभी भी चेतना की आदिम अवस्था में जी रहे हैं. कुछ ऐसे हैं जो सचेत रूप से आदिम होने की चेष्टा कर रहे हैं। समाज जितना तेजी से आगे जा रहा है वे उतनी ही तेजी से पीछे जा रहे हैं। हमें इस फिनोमिना पर गौर करना चाहिए कि हिन्दी का आलोचक और शिक्षक तेजी से कूपमंडूक क्यों बन रहा है ? कूपमंडूकता का आलम यह है कि जिनकी ज्यादा बेहतर विश्वविद्यालय,यानी जेएनयू जैसे विश्वविद्यालय  ,में शिक्षा हुई है वे और भी ज्यादा कूपमंडूक बनते जा रहे हैं ।
    यह भी कह सकते हैं हिन्दी के कुछ आलोचकों में जल्दी -जल्दी कूपमंडूक बनने की होड़ लगी है। कहीं इस कूपमंडूकता की जड़ें हमारे हिन्दी के पठन-पाठन में तो नहीं हैं ? यह भी हो सकता है हमारी हिन्दी साहित्य की शिक्षा-दीक्षा खास किस्म का हनुमान तैयार करती हो ? हमें सोचना चाहिए कि आखिरकार वे कौन से कारण हैं जिनके कारण हिन्दी का सबसे शिक्षित तबका तेजी से कूमंडूकता,अतीतप्रेम और पुराने के नशे में मजा लेने लगा है।
      इस भूमिका को बनाने का एक कारण है,पिछले दिनों कोलकाता में भारतीय भाषा परिषद ने एक सेमीनार किया जिसमें हिन्दी के एक नामी ‘आलोचक’ को बुलाया गया और उन्होंने बड़ी ही ‘विद्वतापूर्ण शैली’ में अपनी बातें रखीं। वह मेरा दोस्त है, हम साथ पढ़े हैं,वह समझदार और संवेदनशील भी है। गुरूभक्ति में उसने सभी साथियों को पछाड़ा है और जितने भी आशीर्वाद गुरूवर नामवर सिंह से मिल सकते थे वे प्राप्त किए हैं।
      वह नामवर सिंह ( हिन्दी के द्रोणाचार्य हैं) का अर्जुन है। यह सच है गुरूवर नामवर सिंह ने हिन्दी के द्रोणाचार्य के रूप में जितने अर्जुन पैदा किए हैं उससे ज्यादा एकलव्य पैदा किए हैं। जिन्हें कभी गुरू का आशीर्वाद नहीं मिला,हां, गुरूदक्षिणा लेने में गुरूवर ने कभी देरी नहीं की।
   गुरूवर नामवर सिंह का व्यक्तित्व महान है । जो उनके महान व्यक्तित्व के प्रभाव में आकर भक्ति करता है वह कूपमंड़ूकता के मार्ग पर जाता है । दूसरी ओर उनके व्यक्तित्व की भक्ति किए बिना जो उनका सम्मान करते हैं वे शिष्य वैज्ञानिकचेतना के करीब पहुँचे हैं। नामवर सिंह के व्यक्तित्व के इस दुरंगे प्रभाव की आमतौर पर हिन्दी में अनदेखी हुई है। कहने का अर्थ है नामवर सिंह की शिक्षा में शिष्य को मनुष्य और बंदर एक ही साथ बनाने की विलक्षण क्षमता है। समस्या यह है गुरूवर नामवर सिंह से शिष्य क्या सीखता है ? किस परंपरा में जाता है। बंदर,भक्त और अर्जुन की परंपरा में जाता है या वैज्ञनिकचेतना संपन्न आधुनिक और मार्क्सवादी की परंपरा में जाता है।
   यह सच है गुरूवर नामवर सिंह की दो परंपराएं हैं, एक भक्त परंपरा जो सीधे भक्ति साहित्य तक ले जाती है और दूसरी मार्क्सवादी परंपरा जो अत्याधुनिक विषयों और आधुनिक समाज की समस्याओं की ओर ले जाती है। जिन शिष्यों ने भक्तिमार्ग का अनुसरण किया वे लेखन में पुराने विषयों के प्रेमी बने। अतीत के प्रचारक बने। वे वर्तमान में लौटते ही नहीं हैं। वे सत्ता के चाकर बने। वर्चस्वशाली ताकतों का हिस्सा बने। भीड़ बने।
    नामवर सिंह की कक्षा में हमेशा भक्त और आलोचक दो कोटि के विद्यार्थी रहे हैं। भक्तों को मेवा मिली ,डिग्री मिली,ग्रेड मिले,पद मिले,पुरस्कार मिले,लेकिन ज्ञान नहीं मिला। आलोचक शिष्यों को ज्ञान मिला,सम्मान मिला,आलोचनात्मक विवेक मिला,संघर्ष का रास्ता मिला,चुनौतियां मिलीं और जनता का बेइंतिहा प्यार मिला।
    गुरूवर नामवर सिंह के जो आलोचक शिष्य थे वे उनकी बातों पर विवाद करते थे, उनकी बातों,धारणाओं पर असहमति व्यक्त करते थे। इस कारण उन्हें अनेकबार क्षति भी उठानी पड़ती थी और क्षति का सिलसिला बाद में भी बना रहता था। इसके बावजूद नामवर सिंह की विद्वतापूर्ण परंपरा का विकास इन्हीं आलोचक शिष्यों ने किया ,भक्त शिष्यों ने नहीं किया।
     गुरूवर नामवर सिंह की शिष्य परंपरा का जिक्र करना इसलिए भी जरूरी है कि उसमें जो कूपमंडूक शिष्य रहे हैं ,जो इन दिनों गुरूकृपा और सिंहों (स्व.विश्वनाथप्रताप सिंह,अर्जुन सिंह,दिग्विजय सिंह आदि) की  कृपा से परमपदों को प्राप्त कर चुके हैं,वे इन दिनों ज्ञान में दूर की कौडियां फेंक रहे हैं उनमें से ही एक जनाब पिछले दिनों कोलकाता आए और बताकर गए कि 12वीं सदी में ही लोकसमाज था और उस लोकसमाज की अभिव्यक्ति का भक्ति साहित्य लिखा गया। अब बताइए इस अतीतप्रेम का क्या करें ?
    हमारे बीच में अतीतपूजकों की भीड़ है और वे सब जगह उपलब्ध हैं। श्रोताओं ने वाह-वाह की,अध्यक्षता कर रहे एक स्थानीय विद्वान ने प्रशंसा करते-करते चरण ही पकड़ लिए। मेरी समस्या यह नहीं है कि बोलने वाले कितने बड़े विद्वान हैं, विद्वान तो वे हैं ही, वे जेएनयू में प्रोफेसर रहे हैं, इन दिनों लोकसंघसेवा आयोग के सदस्य हैं। उनका नाम पुरूषोत्तम अग्रवाल है। वे सुंदर वक्ता हैं। लोग उनकी भक्ति करें और प्रशंसा में बिछ जाएं, मुझे इससे भी कोई शिकायत नहीं है। मेरी समस्या यह है कि भारत में 12वीं सदी में लोकसमाज कहां से पैदा हो गया ?
    आज के जमाने में कोई व्यक्ति ,वह भी जेएनयू का पढ़ा-लिखा,वहां का भू.पू. प्रोफेसर जब यह कहे तो निश्चित रूप से चिंता की बात है। तथ्य , सत्य  और सामाजिक इतिहास इन तीनों ही दृष्टियों से यह बात गलत और आधारहीन है। मजेदार बात यह है कि यह सच्चाई किसी भी मध्यकाल के मार्क्सवादी और गैर मार्क्सवादी इतिहासकार को नजर नहीं आयी। स्वयं कार्ल मार्क्स,एंगेल्स को एशियाई उत्पादन पद्धति का विश्लेषण करते हुए दिखाई नहीं दी। देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय से लेकर के.दामोदरन तक किसी भी दर्शनशास्त्री को नजर नहीं आयी। रामशरण शर्मा से लेकर रोमिला थापर,मोहम्मद हबीब से लेकर इरफान हबीब तक किसी को भी 12 वीं सदी में लोकसमाज की धारणा हाथ नहीं लगी।
     तकरीबन सभी बड़े इतिहासकारों ने भक्ति आंदोलन पर काम किया है उन्हें भी वहां लेकसमाज दिखाई नहीं दिया। यहां तक कि समाजशास्त्री धूर्जटि प्रसाद मुखर्जी को भी भक्ति आंदोलन के मूल्यांकन के क्रम में यह धारणा नजर नहीं आयी। मार्क्सवादी समाजशास्त्री टाम बाटमोर को भी दिखाई नहीं दी। मानवविज्ञानियों को भी यह बात नजर नहीं आयी और यह दूर की कौड़ी पुरूषोतम अग्रवाल को दिख गई है। धन्य हैं वे और उनका ज्ञान । लोकसमाज समाज कभी औद्योगिक पूंजीवाद के बिना जन्म नहीं लेता। व्यापारिक पूंजीवाद में किसी भी देश में लोकसमाज नहीं बना है।
    हिन्दी में पुरूषोत्तम अग्रवाल अकेले ‘आलोचक’ नहीं हैं जो 12वीं सदी में लोकसमाज खोज लाए हैं यह काम बड़े ही अवैज्ञानिक ढ़ंग से रामविलास शर्मा पहले कर चुके हैं। अन्य छुटभैय्ये आलोचक तो अनुकरण करके रामविलास शर्मा का भावानुवाद करते रहे हैं।
    12वीं शताब्दी का भारत कैसा था और सामाजिक संरचनाएं कैसी थीं इस पर मध्यकाल के इतिहासकार अधिकारी विद्वानों ने इतना लिखा है कि उसे भी यदि गंभीरता से पुरूषोत्तम अग्रवाल ने पढ़ लिया होता तो उनका उपकार होता। लेकिन वे अतीतप्रेम और मौलिक खोज के चक्कर में जिन तर्कों के आधार पर 12 वीं सदी में लोकसमाज खोज रहे हैं वैसा और उससे भी सुंदर लोकसमाज तो वैदिककाल में भी है। ईसा के जमाने और देश में भी था। कुरान के रचनाकाल में था।
    लोकसमाज एक समाजशास्त्रीय केटेगरी है। हिन्दी का आलोचक इसका बड़े ही चलताऊ ढ़ंग से इसका इस्तेमाल करता है और उसका यही चलताऊ ढ़ंग ही है जो उसे अवैज्ञानिक अवधारणात्मक समझ तक ले जाता है।
     12 वीं सदी में लोकसमाज नहीं था बल्कि वर्ण व्यवस्था पर आधारित जाति समाज था। यह निर्विवाद सत्य है। जाति समाज में क्षय के लक्षण नजर आ रहे थे। लेकिन जाति संरचनाओं के सामाजिक आधार को कभी उस दौर में चुनौती नहीं दी गयी। भक्ति आंदोलन के कवियों के यहां जो जाति व्यवस्था का विरोध है वह एक मानसिक कोटि के रूप में है ,भक्ति के कवि जातिप्रथा के सामाजिक आधार को कभी चुनौती नहीं देते। भौतिक तौर पर यह संभव भी नहीं था।
    दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि लोकसमाज के उदय और विकास के लिए प्रकृतिविज्ञान का उदय जरूरी है। प्रकृतिविज्ञान की खोजों के पहले लोकसमाज,औद्योगिक पूंजीवाद जन्म नहीं लेता। कम से कम 12 वीं सदी में प्रकृतिविज्ञान का उदय सारी दुनिया में कहीं पर भी नहीं हुआ था। भारत में भी नहीं। प्रकृतिविज्ञान और आधुनिक विज्ञान की अन्य खोजों के कारण लोकसमाज के निर्माण की प्रक्रिया 18वीं सदी के आरंभ से दिखती है। उसके पहले नहीं।  
     

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