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गुरुवार, 29 सितंबर 2016

वे 27साल और कलकत्ते का हिन्दी छंद


आज से 27 साल पहले कलकत्ते में मेरी शिक्षक के रूप में पहली और आखिरी पक्की नौकरी लगी। कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में 22अप्रैल 1989 को प्रवक्ता के रूप में मैंने नौकरी आरंभ की।बाद में सन् 1993 में रीडर और 2001 में प्रोफेसर बना। जिस समय नौकरी आरंभ की थी तो मेरे पास 2शोध डिग्रियां थीं,उनके शोध –प्रबंध थे,वे अप्रकाशित थे।जेएनयू में पढ़ने और छात्र राजनीति में सक्रिय रहने के कारण सारे देश में कमोबेश प्रगतिशील खेमे से जुड़े लोग मुझे जानते थे।मैं शुरू से ही रिजर्व प्रकृति का रहा हूँ।कोई बोलता है तो बोलता हूं,हलो करता है तो हलो करता हूँ,अधिकतम समय घर पर रहना और पढ़ना-लिखना,यही मेरी दिनचर्या रही।इस चक्कर में कलकत्ते में 27साल तक रहने के बाद भी मैं न तो बहुत सारे लोगों को नहीं जानता और न मेरी मित्रता है।

मैं जब दिल्ली में जेएनयू में पढ़ता था तो 1979 से 1987 के बीच में मेरा अधिकतर समय जेएनयू कैम्पस में ही गुजरा,दिल्ली के लेखकों में बहुत कम आना जाना होता था,जब कभी जनवादी लेखक संघ के ऑफिस जाता तो वहां लेखकों से मुलाकात हो जाती थी,बातें हो जाती थीं।उससे ज्यादा लेखकों से मिलने का मौका मुझे नहीं मिला।कलकत्ता आया तो मेरे मन में दो लोगों से मिलने की इच्छा थी वे हैं सत्यजित राय और उत्पल दत्त।इन दोनों से मैं इनके घर जाकर मिला और बातें कीं।इनमें उत्पल दत्त से दो बार मिला।बाकी बंगला बुद्धिजीवियों से गणतांत्रिक लेखक-शिल्पी संघ के दो-तीन कार्यक्रमों में सामान्य शिष्टाचार के नाते मुलाकात जरूर हुई। चूंकि मैं माकपा का सक्रिय सदस्य था,इस नाते लोकसभा-विधानसभा चुनावों के समय 1989 से 2005 तक मैंने वाममोर्चे और माकपा की चुनावी सभाओं में जमकर हिस्सा लिया और उसी के बहाने पश्चिम बंगाल को करीब से गैर-कम्युनिस्ट की नजर से देखा।माकपा की चुनाव सभाओं में अधिकतर दलितों-मुसलमानों और हिन्दीभाषी बस्तियों में सभाएं करने जाता था।इसके कारण इन समुदायों के जीवन को बहुत करीब से देखने का मौका मिला। इसके अलावा जनवादी लेखक संघ और पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी की गतिविधियों में भी हिस्सा लेता रहा,क्योंकि इन दोनो में एक दौर में जिम्मेदार पदों पर काम कर रहा था। यही ले-देकर अपना 27 साल का राजनीतिक-सामाजिक लेखा-जोखा है।मेरी इस दौरान किसी भी नेता ,मंत्री आदि से कोई मित्रता नहीं हो पायी।जबकि मैं बहुत सारे मंत्रियों-नेताओं आदि को जानता था।

कलकत्ता विश्वविद्यालय में मैंने जब पढ़ाना आरंभ किया तो उस समय मेरे दो लक्ष्य थे,पहला था मीडिया को एकदम नए नजरिए से देखा और लिखा जाए जिससे हिन्दी में मासमीडिया के पठन-पाठन को बदला जाए,उस समय यह लग रहा था कि यह बड़ा क्षेत्र है जो आने वाले दौर में अकादमिक और सामाजिक तौर पर बहुत गर्म रहेगा।इसी चीज को मद्देनजर रखते हुए मीडिया पर नियोजित ढ़ंग से काम आरंभ किया।खासकर मीडिया के राजनीतिक अर्थशास्त्र,संरचना और विचारधारा के सवालों को 1960 के बाद सारी दुनिया में पैदा हुए वामपंथी विचारकों के विचारों की रोशनी में विश्लेषित करने की कोशिश की,संभवतः पहलीबार हिन्दी को मीडिया में वाम विचारकों का परिचय मेरी किताबों के माध्यम से हुआ।किताबें कब और कैसे लिखी गयीं इन पर बाद में कभी विस्तार से लिखूँगा।

यह एक विलक्षण संयोग है कि मैंने मीडिया पर जितना भी लिखा निरूद्देश्य लिखा,किसी पाठ्यक्रम के लिए नहीं लिखा,मैंने जिन विषयों पर लिखा वे विषय पाठ्यक्रम में कहीं पर भी पढ़ाए नहीं जाते थे, लेकिन बाद में किताब बाजार में आने के बाद अनेक विश्वविद्यालयों के मीडिया पाठ्यक्रम बदले गए और आज स्थिति तुलनात्मक तौर पर बहुत बेहतर है।संतोष की बात है मेरी सभी किताबें बिना किसी प्रचार के बिकी हैं,एक किताब को छोड़कर कोई किताब सरकारी खरीद में नहीं ली गयी,सारी किताबें छात्रों-शिक्षकों और पाठकों ने खरीदीं और मुझे संतोष दिया।

मैंने रॉयल्टी के लिए लेखन आरंभ नहीं किया।बल्कि यह कहना सही होगा कि किताब लिखने में मेरे पैसे ज्यादा खर्च हुए,संतोष यह था कोई किताब मैंने अपने पैसे नहीं छपवाई,प्रकाशक को जैसे उचित लगा उसने किताबें बेचीं,मैंने कभी हिसाब नहीं मांगा,उसने मन मर्जी से जो दे दिया वह मैंने ले लिया।क्योंकि मुझे बाजार की हकीकत का अंदाजा है। बाजार का सत्य यह है कि किताब की रायल्टी से मेरा एक महिने का खर्चा नहीं उठ सकता।मैंने फिर भी किताबें लिखीं ,क्योंकि यह मेरी सामाजिक जिम्मेदारी का अंग है।लेखन को मैं लाइफ लाइन मानता हूँ। जो लिखता नहीं है वह मर जाता है।सन् 1989 में कोई किताब नहीं थी,आज तकरीबन 50 किताबें हैं।यही ले-देकर मेरा सबसे बड़ा सुख है।यही मेरा संतति-सुख भी है।यह पिछले 27साल की सामान्य गतिविधि का लेखा-जोखा है।

मेरा दूसरा लक्ष्य था विभाग के सहकर्मियों के साथ न्यूनतम मतभेद रखकर काम किया जाय।मैं जब कोलकाता आया था तो मेरा बाहरी व्यक्ति के रूप में,पार्टी कैडर के रूप में जमकर प्रचार किया गया, बहुत ही विपरीत माहौल था।आज भी है। संभवतःबंगाल में हिन्दी में मैं पहला पार्टी मेम्बर था जिसकी नियुक्ति हुई थी।उस समय माकपा के सारे देश के विश्वविद्यालयों में चंद शिक्षक थे जो पार्टी मेम्बर थे।मेरे नौकरी जॉयन के करने के साथ ही स्थानीय अखबारों में खूब उलटा-पुलटा छपवाया गया,इसकी कहानियां बाद में फिर कभी लिखूँगा।लेकिन यह सच है कि मैंने 27 साल एकदम विपरीत माहौल में काम किया ।मैंने कभी सहकर्मियों के साथ संवाद बंद नहीं किया । साथ में काम करना है तो इतना स्पेस छोड़ना होगा कि सहकर्मी अपने मन की कर सकें।कुल मिलाकर विभाग में दो बार विभाग की अध्यक्षता पूरे समय रही ,इसके अलावा कार्यवाहक अध्यक्ष का काम मुझे लेक्चरर के रूप में ही मिल गया जो कि वि.वि. में थोड़ा विरल है।मैं अपने 27 साल के कार्यकाल में कभी किसी भी काम से वीसी से नहीं मिला।मेरी प्रकृति है मैं अधिकारियों से दूर रहता हूँ। मुझे अपना काम पसंद है अधिकारियों से मिलना-जुलना,उनकी गुडबुक में रहना,चमचागिरी करना यह मेरी प्रकृति में नहीं है। मैंने इसकी कीमत भी दी,लेकिन कीमत बहुत कम है।मेरा मानना है एक शिक्षक को अपना स्वाभिमान और निजता की हर हाल में रक्षा करनी चाहिए।

मैंने अपनी 27 साल की नौकरी में एक नियमित शिक्षक के रूप में काम किया,इसका मुझे फल मिला,छात्रों और शिक्षकों का भरपूर सहयोग मिला।मैंने जब नौकरी आरंभ की उस समय विष्णुकांत शास्त्री,पीएन सिंह,शंभुनाथ पढा रहे थे,चन्द्रा पाडेय ने मेरे साथ ही नौकरी आरंभ की इस विभाग में।बाद में अमरनाथजी आए, उसके बाद सोमा बंध्योपाध्याय,राजश्री शुक्ला,राम आह्लाद चौधरी ने विभाग में सहकर्मी के रूप में काम करना शुरू किया।इस समय अमरनाथ ,सोमा बंध्योपाध्याय,राजश्री शुक्ला,राम आह्लाद चौधरी साथ काम कर रहे हैं।इन सभी को बहुत शुक्रिया।यही 27 साल की कहानी है।





सोमवार, 15 अगस्त 2016

कलकत्ते के वे दिन

      मैं 1989 में जब कलकत्ता आया तो आने के कुछ ही दिन बाद रोज ´स्वाधीनता´अखबार के दफ्तर जाता था वहां अयोध्या सिंह,महादेव साहा,इजरायल, अरूण माहेश्वरी,सरला माहेश्वरी के साथ घंटों बैठना होता। तरह –तरह की बातें होतीं।हमलोगों का रोज शाम को चार बजे लेकर 8बजे तक का समय बहुत ही मस्ती और आनंद में कटता, इस दौरान देश-दुनिया की तमाम खबरों के साथ –साथ कम्युनिस्ट आंदोलन की समस्याओं,कम्युनिस्ट नेताओं के आचरण और उनमें आ रहे परिवर्तनों पर भी लंबी बातचीत होती थी।लंबे समय तक यही मेरी दिनचर्या थी , मैं कलकत्ता विश्वविद्यालय से कक्षाएं करके ´स्वाधीनता´चला आता,वहां 3-4घंटे रहता और अंत में लौटते समय अरूण माहेश्वरी अपनी गाड़ी से उलटा डांगा छोड़ देते और वहां से बस लेकर मैं अपने घर चला आता,अरूण जब ´स्वाधीनता´नहीं आता तब मैं जोडागिरजा से बस लेकर अकेले घर लौटता।इसी क्रम में धीरे –धीरे ´स्वाधीनता´ अखबार में कई साल मैंने जमकर लिखा। क्या लिखा और किस तरह की समस्याओं का सामना किया इस पर बाद में फिर कभी लिखूँगा। महादेव साहा चलते-फिरते इनसाइक्लोपीडिया थे। वहीं दूसरी ओर अयोध्या सिंह की इतिहास और कम्युनिस्ट आंदोलन को लेकर बहुत गहरी समझ थी।इनके बीच में शाम गुजारने के कई लाभ थे,पार्टी भी उनसे लाभान्वित होती थी,हमसब भी।

हम सबकी शाम का मुख्य नाश्ता मूडी(मुरमुरा),चना,मूंगफली,कभी -कभी पकौड़े या चॉप या समौसा हुआ करता,साथ में ब्लैक टी।हालत यह थी कि हम सब शाम को मिलने के आदी हो गए थे।रोज शाम मिलने के लिए बुरी तरह झटपटाते थे,किसी को देर भी हो जाए तब भी मिलने जरूर आते थे।इस मेल-मुलाकात में कॉमरेडशिप तो थी साथ ही बात करने का सुख था जिसके कारण हम सब एक-दूसरे के आने का बेसब्री से इंतजार करते रहते।इजरायल साहब का हाल यह था उनकी अरूण-सरला के साथ बातें रोज रात साढ़े दस बजे के पहले खत्म नहीं होती थीं।इजरायल,अरूण,सरला और मैं एक साथ अरूण की गाड़ी से निकलते,मैं बीच में उलटाडांगा उतर जाता ,वे तीनों अरूण के घर चले जाते।

इस दैनंदिन मेल-मुलाकात के कारण अनेक काम हुए,जमकर बेशुमार लिखना हुआ।सरला जब सांसद बनकर दिल्ली चली गयी तो अरूण भी साथ चला गया,लेकिन वो हर सप्ताह शनिवार को जरूर कोलकाता आ जाती और हम लोग फिर मिलकर बातें करते। बीच-बीच में महादेव साहा भी दिल्ली चले जाते लेकिन कुछ दिन वहां रहकर लौट आते।



मैं जेएनयू से जब कोलकाता आया तो बेहद परेशान था ,कोलकाता में शाम की संगत ,सुंदर बातचीत आदि के लिए सही साथी नहीं दीखे,हिन्दी के शिक्षकों की सीमाओं और सीमित दुनिया से मैं वाकिफ था इसलिए उसमें समय गुजारना बहुत मुश्किल था,हिन्दी शिक्षकों से विचारयुक्त मित्रता कोलकाता में संभव नहीं दिखी,ऐसी स्थिति में ´स्वाधीनता´में उपरोक्त कॉमरेडों का साथ बहुत सुखकारी साबित हुआ।

विभाजन की पीड़ा और कोलकाता

     कोलकाता कुछ मामले में असामान्य शहर है।इस शहर ने जितनी राजनीतिक उथल-पुथल झेली है वैसी अन्य किसी शहर ने नहीं झेली।यह अकेला शहर है जिसने दो बार भारत विभाजन की पीड़ा को महसूस किया है।यह असामान्य पीड़ा थी।मैं अभी तक समझ नहीं पाया हूं कि बंगाली समाज के मनोविज्ञान पर इन दोनों विभाजन की घटनाओं के किस तरह के असर रहे हैं।मैं स शहर के विभिन्न इलाकों में कईबार घूमा हूँ,अनेक रंगत के लोगों से मिला हूँ,लेकिन कहीं पर भी हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य की अनुभूति नहीं हुई ।दिलचस्प बात यह है पहले भारत विभाजन के समय कई साल आंदोलन चला । यह बंग-भंग के नाम से चला आंदोलन था।यह पहला सबसे बड़ा आंदोलन था जिसने राष्ट्रवाद की परिकल्पना को सड़कों पर साकार होते देखा।इस दौर के राष्ट्रवाद के हीरो थे सुरेन्द्र नाथ बनर्जी। सांस्कृतिक भिन्नता के बावजूद हम सब एक हैं का नारा,इसकी धुरी था। इस आंदोलन ने संस्कृति के भेदों और अंतरों को बीच में आने ही नहीं दिया।उल्लेखनीय है उस समय बंगाल समूचा राष्ट्रवादी नेतृत्व उच्च जाति के हिन्दुओं के हाथ में था,लेकिन हम सब एक हैं,का नारा प्रमुख रहा।राष्ट्रवाद के साथ धर्म को किसी ने नहीं जोड़ा।लेकिन दुखद है कि इधर के वर्षों में आरएसएस ने राष्ट्रवाद के साथ धर्म को जोड़ दिया है।कालांतर में चित्तरंजन दास ने सभी धर्मों की एकता को ´जन राष्ट्रवाद´ की शक्ल में रूपान्तरित कर दिया।इसका आधार उन्होंने हिन्दू-मुसलिम एकता को बनाया।

बंग-भंग आंदोलन के मुझे दो प्रसंग याद आ रहे हैं जिनसे हम आज भी बहुत कुछ सीख सकते हैं। 28सितंबर1905 को महालया अर्थात् पितृविसर्जन का दिन था।उस दिन के कलकत्ता के प्रसिद्ध कालीघाट के काली मंदिर में अनोखी विराट पूजा हुई।उसका वर्णन करते हुए अंग्रेजी दैनिक ´अमृत बाजार पत्रिका´ ने 29सितंबर को लिखा , ´सबेरे से ही नंगे पैर लोगों के जुलूस चितपुर रोड़ और कार्नवालिस स्ट्रीट में कालीघाट की तरफ चलने लगे।दोपहर 2बजे तक मंदिर के सामने 50हजार से ज्यादा विशाल जनसमुदाय जमा हो गया।कीर्तन पाटियां राष्ट्रीय गाने गा रही थीं।विराट पूजा के बाद मंदिर के ब्राह्मणों ने संस्कृत में आह्वान कियाः ´सब देवताओं से पहले मातृभूमि की पूजा करो; संकीर्णता,सारे धार्मिक मतभेदों,कटुता और स्वार्थपरता को छोड़ दो,सब लोग मातृभूमि की सेवा करने की सौगंध लो और उसके कष्ट दूर करने में अपना जीवन लगा दो ।´

इसके बाद लोग बड़े बड़े जत्थों में मंदिर के अंदर गए और निम्नलिखित सौगंध लीः

´मां इस पवित्र दिन आपके सामने और इस पवित्र स्थान में खड़े होकर मैं गंभीरता से प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं भरसक विदेशी वस्तुओं का कभी इस्तेमाल कभी न करूँगा,कि मैं ऐसी वस्तुओं को विदेशी दुकानों से न खरीदूँगा जो भारतीय दुकानों में मिलती हैं,कि मैं ऐसे काम के लिए विदेशियों को नियुक्त नहीं करूँगा जिसे मेरे देशवासी कर सकते हैं।´

दूसरा वाकया रवीन्द्रनाथ टैगोर से जुड़ा है।16अक्टूबर 1905 को ,जिस दिन भारत सरकार बंगाल के दो टुकड़े करने जा रही थी उस दिन उन्होंने ´राखी दिवस´मनाने का आह्वान किया और कहा ´यह दिन पूर्व बंगाल के लोगों और पश्चिम बंगाल के लोगों के बीच,धनियों और गरीबों के बीच,इस भूमि में पैदा हुए ईसाइयों,मुसलमानों और हिन्दुओं के बीच अटूट भातृत्व को सूचित करने के दिवस के रूप में मनाया जाए।´

इन दो घटनाओं ने आम जनता में अटूट एकता और साम्प्रदायिक सौहार्द बनाए रखने में बहुत बड़ी भूमिका अदा की।इसके विपरीत इन दिनों जितने भी आंदोलन हो रहे हैं उनमें आरएसएस खुलकर धर्म का राजनीतिक दुरूपयोग करके आम जनता की एकता तोड़ने,मुसलमानों और हिन्दुओं में भाईचारा नष्ट करने का प्रयास करता रहा है।इससे स्वतंत्र भारत, विषाक्त भारत की अनुभूति देने लगा है।बंग-भंग जैसी महान दुर्घटना के बावजूद नेताओं ने जनता की एकता बनाए रखने की भरपूर कोशिश की।यही वह मुख्य बिन्दु है जहां से हमें अपनी सभी किस्म की राजनीतिक गतिविधियों,लेखन,सांस्कृतिक कार्यों आदि को देखना चाहिए।जनता में एकता रहे,साम्प्रदायिक सद्भाव रहे चाहे जितनी कठिन परिस्थिति हो हम इस मार्ग से विचलित न हों।



रविवार, 14 अगस्त 2016

जीवन में माधुर्य की तलाश में-

              मैं पेशे से प्रोफेसर हूँ,कलकत्ता विश्वविद्यालय में पढाता हूं,कोलकाता के कॉलेज स्ट्रीट में हमारा विश्वविद्यालय है,यह मेरे घर से मुश्किल से पांच किलोमीटर दूर है।मैं अपने घर से कुछ दूर पैदल चलकर काकुरगाछी चौराहे तक जाता हूँ,वहां से शेयर का ऑटो लेता हूँ और फूलबागान उतरता हूँ फिर फूलबागान से कॉलेज स्ट्रीट बाटा के लिए ऑटो लेता हूँ,वहां उतरकर एक फर्लांग के करीब पैदल चलकर विश्वविद्यालय पहुँचता हूँ।मात्र 30 रूपये में आना जाना।कभी कभार टैक्सी से जाताहूँ। आमतौर पर सामान्य अवस्था में मात्र 20 मिनट में मैं विश्वविद्यालय पहुँच जाता हूँ।इसके बाद बमुश्किल पांच-दस मिनट शिक्षक मित्रों से गप होती है और उसके बाद कक्षा में और वहां मुझे दो पूीरियड पढ़ाने होते हैं,कभी एमए,कभी एमफिल और कभी पीएचडी की कक्षा में भी जाना होता है।लेकिन कुल मिलाकर दो घंटे की नौकरी है लेकिन इन दो घंटों के लिए घर पर मेहनत बहुत करनी पड़ती है।पहले समय बहुत खर्च होता था इधर कम,लेकिन कोई नई रिसर्च या नई किताब सामने आती है तो तैयारी में समय बहुत लगता है।

इस समूची प्रक्रिया में किताबें मेरी सबसे बड़ी मित्र हैं।वे मुझे सभी किस्म की तकलीफों से दूर रखने में मदद करती हैं।मान-अपमान के कष्ट से मुक्त करने का काम करती हैं।कमीने किस्म के लोगों की संगत और प्रतिक्रियाओं से मुक्त रखने का काम करती हैं।मुझे कभी -कभी लगता है किताबें न हों तो बुद्धिमान लोग अकालग्रस्त होकर मर जाएं।किताबें हमारे समाज की वह भूख मिटाती हैं जिसे आप अन्य तरीकों से नहीं मिटा सकते।

मेरी तमाम कठिनाईयों में किताबों ने सबसे ज्यादा मदद की है,आप यह भी कह सकते हैं कि मैं कायर हूँ इसलिए किताबों में सिर गढ़ाए बैठा रहता हूँ।लेकिन यह हकीकत है किताबें न होतीं तो जालिम लोग जीने न देते।मैं बार बार जालिमों से कहता हूं तुम अपना काम करो ,हम अपना काम करते हैं,देखते हैं समाज में कौन सी चीज बचती है,जालिमाना हरकतें या किताबों के पाठक-लेखक।

मैंने काफी गणित लगाया और पाया कि मुझे विश्वविद्यालय में पूरे महिने में मात्र 24घंटे से ज्यादा का काम नहीं है।इसलिए बाकी समय मैंने किताबों के हवाले कर दिया।मेरे कोलकता में बहुत कम मित्र हैं। उनकी संख्या न बताऊं तो ही अच्छा है।लेकिन हजारों लोग मुझे जानते हैं,मैं आमतौर पर आवारागर्दी नहीं करता,हां कभी कभी माल में जाकर नेत्रसुख जरूर लेता हूँ।आईसक्रीम खा लेता हूँ,कभी सिनेमा देख लेता हूँ,चाय पी लेता हूँ।लेकिन यह भी बहुत कम।

लेकिन बाजार में चलते लोग,बंगलाभाषा बोलते लोग,खासकर बंगाली औरतों की भाषा मुझे बहुत अच्छी लगती है।वे आमतौर बहुत सुंदर भाषा में बोलती हैं,वह माधुर्य हिन्दीभाषी औरतों में कम है।

आप मुझे कुछ भी कह सकते हैं,जेएनयूवाले -मथुरावाले पंडितजी कहते हैं,कुछ लोग कॉमरेड कहते हैं,कुछ मानते हैं मैं मोदी का भक्त हूँ,कुछ का मानना है मैं मार्क्सवादी हूँ,कुछ देवीवाले के नाम से जानते हैं,कुछ भाईसाहब कहकर काम चला लेते,छात्र-छात्राओं के लिए जेसी हूँ,कुछ प्यार करते हैं तो कुछ बेइंतिहा नफरत करते हैं। कुछ मेरी किताबें पढ़ते हैं,खरीदते हैं,कुछ हैं जो किताबों को नफरतभरी निगाहों से देखते हैं।कुछ का मानना है मेरा लेखन कचरा है,कुछ को काम का लगता है।

कुछ की नजर में मैं बहुत खराब इंसान हूँ,कहने का आशय यह कि मेरे अंदर इंसान के अच्छे-बुरे दोनों ही किस्म के गुण हैं।मैं अनेकबार झूठ भी बोलता हूँ,मंदिर जाता हूँ लेकिन भगवान को नहीं मानता ,भगवान के नाम पर चढावा पाता हूँ लेकिन मैं कभी किसी का अपमान नहीं करता,गाली भी देता हूँ,लेकिन गालियों को नापसंद करता हूँ।शराब नहीं पीता लेकिन पीने वालों से मित्रता रखता हूं,पीने को बुरा नहीं मानता,मांसहारी नहीं हूँ लेकिन मांसाहारी मित्रों के साथ बैठकर खाना खाता हूँ।मैं पैदाइशी हिन्दू हूँ लेकिन हिन्दुओं के कोई गुण-अवगुण मेरे अंदर नहीं हैं।

घंटों सोचता रहता हूँ,समाज की समस्याओं से परेशान रहता हूँ,उन पर अपने विचार जाहिर करता रहता हूं,लेकिन अपनी निजी समस्याएं कभी सार्वजनिक नहीं करता,दुख अपने अंदर रखता हूँ,मुझे गम खाने की आदत है।सपने देखकर गुजारा करता हूँ।हकीकत से डरता हूँ।हकीकत हमेशा खौफनाक नजर आती है।अकेले में रोता हूँ,केले-अमरूद-पपीता आदि खाता हूँ,कम अक्ली पर गुस्सा आता है,अक्लवालों पर फिदा रहता हूँ.शिक्षित हूँ,लेकिन बीच-बीच में झुंझला जाता हूँ.सरकार और नेताओं से कभी डर नहीं लगता,लेकिन सामान्य सी गलती करके डरने लगता हूँ।मजदूर और किसान और उनकी राजनीति अच्छी लगती है,इंकलाबी जोश अच्छा लगता है लेकिन भजनों में रस पाता हूँ।पता नहीं मैं ऐसा क्यों हूं ?



मेरे अनेक मित्र सलाह देते हैं मैं सब कुछ फेसबुक पर न लिखा करूँ। लोग तुम्हारे विचार चुरा लेते हैं और तुम्हारा जिक्र तक नहीं करते,मैं हंसता हूूं और कहता हूूं विचार ही तो चुरा रहे हैं,चुराने दो समाज के काम आएंगे,हमारा मकसद भी तो यही है कि हमारे विचार ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचें।एक दूसरे मित्र ने कहा इतना कैसे लिख लेते हो भाई, मैंने कहां बस कम्प्यूटर खोला,बटन दबाया और विचार चालू।मित्र बोला यार हम भी कम्प्यूटर खोलते हैं,फेसबुक पर जाते हैं लेकिन दिमाग में विचार ही नहीं आते,तुम इतना जल्दी कैसे लिख लेते हो,मैंने कहा विचार तो मेरे जेब में सब समय पड़े रहते हैं।मंटोकी भाषा में कहूूँ कि मैं फेसबुक पर अपनी ही जेब काटता रहता हूँ।अपनी जेब काटता हूूँ और फेसबुक मित्रों के हवाले कर देता हूँ।

तर्कवाद और मंदिर की प्रतिस्पर्धा का केन्द्र है कोलकाता

         कोलकाता में रहते मुझे 27साल हो गए,इस दौरान कोलकाता में बहुत कुछ बदलते देखा है।कोलकाता में अनेक किस्म की विचारधारात्मक लड़ाईयां देखीं,नए किस्म के जनांदोलन देखे।लेकिन सबसे बड़ा परिवर्तन यह देखा कि हठात् मंदिर संस्कृति चारों ओर छा गयी।कोलकाता में पहले इतने मंदिर नहीं थे, लेकिन मेरे देखते ही देखते हर गली के मुहाने पर,हर पेड़ के आसपास कोई न कोई मंदिर आ गया,मंदिर बनाने वालों का यहां संगठित गिरोह है.ये मंदिर स्वतःस्फूर्त्त नहीं हैं।मैं जिस इलाके (काकुरगाछी) में रहता हूँ वहां देखते ही देखते कई छोटे-छोटे मंदिर जन्म ले चुके हैं।

कोलकाता सबसे जागृत राजनीतिक धर्मनिरपेक्ष शहर है,लेकिन हजारों छोटे-छोटे मंदिरों का शहर है। इस शहर में जिस तरह हर व्यक्ति ´तर्कवादी´,´विवेकवादी´है ,उसी तरह हर व्यक्ति के सामने मंदिरों का नए सिरे से हर मुहल्ले में उभरकर आना भी एक चुनौती है।´तर्कवाद´ और´मंदिर´का यह द्वंद्व इस शहर की जान है।इस शहर को जानना है तो इस द्वंद्व को समझना होगा,इस द्वंद्व में ही पश्चिम बंगाल की आत्मा नजर आएगी और भारत की आत्मा भी नजर आएगी।

कोलकाता ही अकेला शहर नहीं है जहां मंदिरों की बाढ़ आई हो,देश के विभिन्न शहरों में विगत 40 सालों में मंदिरों की बाढ़ को सहज ही देखा जा सकता है। कोलकाता तो इस देश के वैचारिक द्वंद्वों की आत्मा है। भारत के वैचारिक संघर्षों का अध्ययन करना है तो कोलकाता को गहराई के साथ जानना बहुत जरूरी है।कहने के लिए कोलकाता मुख्यधारा से दूर,कटा हुआ,अलग-थलग नजर आता है,लेकिन असल में ऐसा नहीं है।

कोलकाता पहला शहर है जिसमें आधुनिककाल में ´तर्कवाद´ और ´विवेकवाद´ ने ´ईश्वर´के खिलाफ वैचारिक जंग सुनियोजित ढ़ंग से लड़ी।जो लोग ´विवेकवाद´के लिए संघर्ष कर रहे थे वे अपने लिए कच्चा माल परंपरा से बटोरकर ला रहे थे।वे जाना चाहते थे भविष्य में लेकिन उनका कच्चा माल था अतीत का।यह ऐसा द्वंद्व था जो अभी भी बना हुआ है,हमारा समाज जाना चाहता है अंतरिक्ष युग में लेकिन हनुमान की पूजा करते हुए! पहले तमाम संस्थाओं,रीति-रिवाजों और मूल्यों को तर्क की कसौटी और सामाजिक प्रासंगिकता के आधार पर परखा गया फिर उसमें से बहुत कुछ को छोड़ दिया गया और उसके कारण जो अभाव पैदा हुआ उसके लिए पश्चिम से मूल्य,मान्यताएं और परंपराएं ग्रहण कर ली गयीं।यही वह प्रस्थान बिंदु था जिसने भारतीय जनमानस में नए सिरे से ´तर्कवाद´को पैदा किया,आज इसी ´तर्कवाद´को कोलकाता से लेकर पश्चिम बंगाल के सुदूरवर्ती इलाकों में पैर पसारे देख सकते हैं,आम जनता में कभी-कभी यह तर्कवाद सोने भी लगता है,लेकिन फिर अचानक किसी शॉक के झटके खाकर उठ बैठता है।

कोलकाता में पैदा हुए ´तर्कवाद´ बनाम ´मंदिर´ (ईश्वर भी कह सकते हैं )के द्वंद्व ने सबसे मूल्यवान चीज विकसित की वाद-विवाद में अहिंसा।कोलकाता में वैचारिक विवाद हिंसक,अपमानजनक, गाली-गलौज से भरा नहीं होता। कोलकाता के इसी सहिष्णु रूप ने आधुनिक भारत के सहिष्णु चरित्र को बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की । 19वीं सदी से लेकर आज तक जितने ज्यादा वैचारिक संघर्ष और परिवर्तन कोलकाता ने देखे हैं उतने संभवतः भारत के किसी शहर ने नहीं देखे ।

शहर की नई परिभाषा गढ़ने में कोलकाता सबसे आगे है,यह इच्छाओं का शहर है।यहां ´तर्कवादी´इच्छाओं को जितना मान-सम्मान मिलता है आम लोग उतना ही धार्मिक इच्छाओं को भी सम्मान देते हैं।इस शहर में भगवान जितना जरूरी है उतना ही जरूरी मनुष्य और विवेकवाद भी है।भगवान और विवेकवाद के द्वंद्व को इस शहर ने बड़े ही कौशल के साथ हल किया है।विभिन्न धर्म हैं, उनके मानने वाले हैं,लेकिन अधिकांश धर्मनिरपेक्ष हैं।धर्म को राजनीति और सरकार के साथ घालमेल करके जनता नहीं देखती और राजनीतिकदल भी इस घालमेल से बचते हैं।यहां साम्प्रदायिक संगठन हैं लेकिन लोग उनके प्रति भी अहिंसक भाव से पेश आते हैं।इस शहर में सभी किस्म की विचारधाराओं के लिए समान रूप से जगह है। ´तर्कवाद´बनाम ´मंदिर´के द्वंद्वं को सामंजस्य और सहिष्णुता के पैमाने देखने की परंपरा यहां इतनी पुख्ता है कि हर तरह के विचार के व्यक्ति को यहां सुरक्षा महसूस होगी।इस समूची प्रक्रिया में कोलकाता से लेकर समूचे पश्चिम बंगाल में मानवाधिकारों को लेकर देश के अन्य इलाकों से बेहतर सचेतनता है। यहां विज्ञान की जितनी मान्यता है परम्परा का भी उतना ही सम्मान है।यहां परंपरावादी भी तर्कवाद का सहारा लेकर परम्पराओं को तरासते रहे।यहां जाग्रत आधुनिक समाज है तो ऐसा समाज भी है जो हिन्दू होने में गौरव का अनुभव करता है।अ-हिन्दू और हिन्दू में यहां कटुता नहीं है,लेकिन सामाजिक विकास के क्रम में दूरी बढ़ी है।सामाजिक सद्भाव है लेकिन संशय बढ़ा है।बड़े पैमाने पर मुसलिम समाज है जो अपने जलसे-त्यौहार आदि बड़ी तैयारियों के साथ मनाता है और सारा शहर उसमें सहयोग करता है,उसके साथ सामंजस्य बिठाता है,कभी कटुता नजर नहीं आती,उसी तरह हिन्दुओं के बड़े त्यौहार बड़े शान से मनाए जाते हैं और मुसलमान उनमें सहयोग करते हैं।शहर की पूरी अर्थव्यवस्था मिश्रित संस्कृति, मिश्रित खान-पान,मिश्रित भावनाओं पर टिकी है।



कोलकाता में आज भी सघन हिन्दू इलाकों में मुसलमानों की दुकानें,सघन मुसलिम इलाकों में हिन्दुओं की दुकानें मिल जाएंगी।एक ही मार्केट में हिन्दू-मुसलमानों की एक साथ दुकानें मिल जाएंगी।इसने इस शहर में साम्प्रदायिक कटुता को कभी पैदा ही नहीं होने दिया,जबकि कोलकाता पर भारत-विभाजन से लेकर बंगलादेश से आए शरणार्थियों तक का बहुत दबाव रहा है,लेकिन ´तर्कवाद´के आधार पर उसने इस तरह के संकटों का समाधान अहिंसक ढ़ंग से खोज लिया है।इस शहर में एक करोड़ से ज्यादा लोग रहते है लेकिन इसकी चाल एकदम कस्बे जैसी है।इसमें कहीं पर भी महानगर जैसी बेचैनी और असंतोष नहीं है।

सोमवार, 8 अगस्त 2016

दुख ही जीवन की कथा रही

       मेरे लिए सुख की बात यह है सारी जिन्दगी दुखों ने पीछा नहीं छोड़ा।अनंत दुख और अनंत आनंद का गजब खेल है जीवन ।मैं निराला की लिखी कविता ´सरोज स्मृति´पढ़ रहा था और बार –बार सोच रहा था,हिन्दी के किसी और कवि ने बेटी के दुखों पर निराला जैसी कविता बाद में क्यों नहीं लिखी ॽ रामविलास शर्मा ने निराला के अनेक किस्म के दुखों का विस्तार से जिक्र किया है लेकिन उस दुख में छिपे सर्जनात्मक पक्ष की उपेक्षा की है,इसी प्रसंग में मुझे वे लोग भी याद आ रहे हैं जो दुखों से परेशान रहते हैं और अपनी व्यथा आए दिन साझा करते रहते हैं।

संसार में आए हैं तो दुख तो हैं,हम सबके पास दुख हैं।संसार की दुखों के बिना कल्पना संभव नहीं है। सृष्टि को रहना है,विकास करना है तो दुख रहेंगे।दुखों को सकारात्मक दिशा में मोड़ने की कला विकसित करने की जरूरत है।दुख के बिना जीवन अपूर्ण है,नीरस है।

रवीन्द्रनाथ की बात मानें तो दुख तो ´रस´है।दुख रहते हैं तो अपूर्णता का एहसास बना रहता है और यही एहसास हमें सर्जनात्मक शक्ति देता है।सिर्फ संतोष और सुख रहे तो जीवन बहुत ही नीरस हो जाता है। हम बार - बार यह महसूस करते हैं हमारे पास यह नहीं है,वह नहीं है, यह अभाव और अपूर्णता ही है जो हमको बल देती है,संघर्षशील चेतना पैदा करती है.जिसने दुख नहीं देखा,दुख को महसूस नहीं किया वह सत्य को अर्जित नहीं कर सकता।दुख तो मनुष्य की सबसे बड़ी दौलत है,इसलिए दुखों से डरना नहीं चाहिए,कुंठा में नहीं जाना चाहिए,दुखों का सामना करना चाहिए।

मैंने अपने जीवन में सबसे ज्यादा सेवा की मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की और पश्चिम बंगाल में उनके कॉमरेडों ने उनके राज्य नेतृत्व ने अकारण मुझे सबसे ज्यादा सताया,मेरी अकल्पनीय क्षति की,मेरे अनेक मित्र-सहकर्मी-रिश्तेदार हैं जिनको मैंने कभी एक गाली तक नहीं दी,लेकिन वे सारी जिन्दगी मेरे खिलाफ निंदा अभियान में लगे रहे, अनेक करीबी नाते-रिश्तेदार हैं जो निरंतर विषवमन करने में लगे रहते हैं,ये वे लोग हैं जिनकी मैंने तन-मन-धन सब तरह से मदद की।बदले में मैंने कभी कोई मदद नहीं मांगी,लेकिन ये सभी लोग विभिन्न रूपो में दुख पहुंचाते रहे,मैंने वे दुख महसूस किए,झेले,क्षति उठायी,लेकिन कभी कुंठा और निराशा को पास फटकने नहीं दिया। अनेक लोग हैं जो अभी भी दुष्टता और असभ्यता से बाज नहीं आते।लेकिन मैंने उनको कभी कोई गाली नहीं दी।

मैं मानता हूं दुख को देखो,जानो,महसूस करो और उसे सुख में बदलो।यही वह चीज है जिसने मुझे दुखों में रहते हुए निरंतर लिखने,संवाद करने के लिए असीमित ऊर्जा दी।ये कलकत्ते के लोग दुख न देते तो मैं इतनी किताबें नहीं लिख पाता।मैं उस समय ज्यादा लिखता हूँ जब लोग कलकत्ते के लोग दुख देते हैं। मेरी किताबों के पीछे दुखों की सर्जनात्मक भूमिका है,इसी अर्थ में मुझे रवीद्रनाथ की यह बात सही लगती है कि दुख ही आनंद है।

टैगोर ने लिखा है ´मानव के इस दुःख में केवल आँसुओं का मृदुल वाष्प ही नहीं,हृद का प्रखर तेज भी है।विश्व में तेजःपदार्थ हैं।मानव-चित्त में दुख हैं।वही प्रकाश है,गति है,ताप है।वही टेढ़े-मेढ़े रास्तों से घूम-फिरकर समाज में नित्य-नूतन कर्मलोक और सौन्दर्य-लोक का निर्माण करता है।कहीं खुलकर तो कहीं छिपकर,दुःख के ताप ने ही मानव-संसार की वायु को धावमान रखा है।´



´इस दुःख को हम क्षुद्र नहीं समझेंगे।मस्तक उठाकर,सीना तानकर इसे स्वीकार करेंगे।इसकी शक्ति से हम भस्म नहीं होंगे,बल्कि अपने-आपको और कठिन रूप में गढ़ेंगे। दुःख की सहायता से अपने-आपको ऊपर उठाने के बदले यदि हम उसमें डूब जायें तो यह दुःख का अपमान होगा।जिसका भार सहने से जीवन सार्थक होता है उसीको आत्म-हत्या का साधन समझना दुःख-देवता के सामने अपराधी होना है। अस्तित्व की प्रतिष्ठा को समझने का दुःख के सिवा दूसरा मार्ग नहीं है।दुःख ही जगत् के पदार्थों का मूल्य है,जो कुछ आदमी ने रचा है दुःख की सहायता से रचा है।जिसे हमने दुःख से नहीं पाया वह हमारा अपना नहीं है।त्याग के द्वारा,दान तपस्या दुःख के द्वारा ही गम्भीर आत्मबोध सम्भव है-सुख या आराम के द्वारा नहीं। दुःख के अतिरिक्त किसी उपाय से हम अपना आन्तरिक सामर्थ्य नहीं जान सकते। ´

सोमवार, 4 जुलाई 2016

प्रमोशन और साहित्य का संकट

       कोलकाता में एक दशक से हिन्दी सेमीनार के प्रमाणपत्र जुटाने की संक्रामक बीमारी कॉलेज शिक्षकों में फैल गयी है। सेमीनार में वे इसलिए सुनने जाते हैं जिससे उन्हें सेमीनार में भाग लेने का सर्टीफिकेट मिल जाए। यह साहित्य के चरम पतन की सूचना है। ये वे लोग हैं जो हिन्दी साहित्य से रोटी-रोजी कमा रहे हैं। ये लोग सेमीनार में बोले बिना सेमीनार में भाग लेने का प्रमाणपत्र पाकर अपने को धन्य कर रहे हैं। आयोजक यह कहकर शिक्षकों को बुलाते हैं कि प्रमोशन कराना है तो सेमीनार सर्टीफिकेट लगेगा, आ जाओ सुनने, सर्टीफिकेट मिल जाएगा। फलतः ज्यादातर शिक्षक सेमीनार को सुनने आते हैं। सेमीनार का सर्टीफिकेट पाने के लिए वे डेलीगेट फीस भी देते हैं। इस प्रक्रिया में दो किस्म का साहित्यिक भ्रष्टाचार हो रहा है. पहला नौकरी में प्रमोशन के स्तर पर हो रहा है। श्रोता के सर्टीफिकेट को वक्ता के सर्टीफिकेट के रूप में पेश करके तरक्की के पॉइण्ट प्राप्त किए जा रहे हैं। दूसरा , साहित्य विमर्श के नाम पर कूपमंडूकता बढ़ रही है। सेमीनारों में वक्ताओं के भाषण साधारण पाठक की चेतना से भी निचले स्तर के होते हैं और सेमीनार के बाद सभी लोग एक-दूसरे की पीठ ठोंकते हैं, गैर शिक्षक श्रोता फ्रस्टेट होते हैं,वे मन ही मन धिक्कारते हैं और कहते हैं और कहते हैं कि वे सुनने क्यों आए। वक्तागण आशीर्वाद देते हैं,पैर छुआते हैं। इस समूची प्रक्रिया में कई लोग तो इस कदर नशे में आ गए हैं कि उन्हें यह बीमारी हो गयी है कि शहर में कोई भी साहित्यिक कार्यक्रम हो उनको अध्यक्षता के लिए बुलाओ,ये लोग अध्यक्ष न बनाए जाने पर कार्यक्रम में जाते नहीं है। नहीं बुलाने पर नाराज हो जाते हैं। इन पंडितों का मानना है वे जिस सेमीनार में जाते हैं उस सेमीनार को सार्थक करके आते हैं। इस प्रसंग में मुझे कई लेखकों की रचनाएं याद आ रही हैं। इनमें सबसे पहले में मुक्तिबोध को उद्धृत करना चाहूँगा। बहुत पहले मुक्तिबोध ने हिन्दी के प्रोफेसरों के बारे में लिखा, ''बटनहोल में प्रति‍नि‍धि पुष्‍प लगाए एक प्रोफ़ेसर साहि‍त्‍यि‍क से रास्‍ते में मुलाकात होने पर पता चला कि हि‍न्‍दी का हर प्रोफेसर साहि‍त्‍यि‍क होता है। अपने इस अनुसन्‍धान पर मैं मन ही मन बड़ा खुश हुआ। खुश होने का पहला कारण था अध्‍यापक महोदय का पेशेवर सैद्धान्‍ति‍क आत्‍मवि‍श्‍वास। ऐसा आत्‍मवि‍श्‍वास महान् बुद्धि‍मानों का तेजस्‍वी लक्षण है या महान् मूर्खों का दैदीप्‍यमान प्रतीक ! मैं नि‍श्‍चय नहीं कर सका कि वे सज्‍जन बुद्धि‍मान हैं या मूर्ख ! अनुमान है कि वे बुद्धि‍मान तो नहीं, धूर्त और मूर्ख दोनों एक साथ हैं।''
मुक्‍ति‍बोध ने यह भी लि‍खा है '' चूँकि प्रोफेसर महोदय साहि‍त्‍यि‍क हैं इसलि‍ए शायद वे यह कुरबानी नहीं कर सकते। नाम- कमाई के काम में चुस्‍त होने के सबब वे उन सभी जगहों में जाएंगे जहॉं उन्‍हें फायदा हो-चाहे वह नरक ही क्‍यों न हो।''
कोलकाता के शिक्षकों की अवस्था इससे बेहतर नहीं बन पायी है। हिन्दी के इस तरह के आयोजनों में किस तरह के भाषण होते हैं और चेले-चेलियां किस तरह प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं इस पर कवि -कहानीकार उदयप्रकाश की बड़ी शानदार कविता है 'पाँडेजी' उसका अंश देखें-
"छोटी-सी काया पाँडेजी की/छोटी-छोटी इच्छाएँ/ छोटे-छोटे क्रोध/और छोटा दिमाग।
गोष्ठी में दिया भाषण,कहा- 'नागार्जुन हिन्दी का जनकवि है '/फिर हँसे कि ' मैंने देखो
कितनी गोपनीय/चीज को खोल दिया यों।यह तीखी मेधा और/वैज्ञानिक आलोचना का कमाल है। '/एक स-गोत्र शिष्य ने कहा-' भाषण लाजबाब था /अत्यन्त धीर-गंभीर/
तथ्यपरक और विश्लेषणात्मक/हिन्दी आलोचना के खच्चर/ अस्तबल में/आप ही हैं /एकमात्र/काबुली बछेड़े/ 'तो गोल हुए पाँडे जी/मंदिर के ढ़ोल जैसे/ठुनुक -ठुनुक हँसे और/फिर बुलबुल हो गए/फूलकर मगन !"
मैं 20 सालों से कोलकाता में रह रहा हूँ और आए दिन हिन्दी सेमीनारों की दुर्दशापूर्ण अवस्था के किस्से अपने दोस्तों और विद्यार्थियों से सुनता रहा हूँ। मैं आमतौर पर इन सेमीनारों से दूर रहता हूँ। इसके कारण लोग यह मानने लगे हैं कि मैं साहित्य के बारे में नहीं जानता। कई मित्र हैं जो सेमीनार के कार्ड में वक्ता के रूप में मेरा नाम न देखकर दुखी होकर फोन करते हैं कि यहां तो आपको होना ही चाहिए था। मेरी स्थिति इस कदर खराब है कि एकबार कोलकाता की सबसे समर्थ साहित्यिक संस्था की कर्ताधर्ता साहित्यकार नेत्री ने चाय पर अपने घर बुलाया और कहा कि हम इतने कार्यक्रम करते हैं और आपस में बातें भी करते हैं कि स्थानीय स्तर पर कौन विद्वान हैं जिन्हें बुलाया जाए तो लोग आपका नाम कभी नहीं बताते, मैं स्वयं भी नहीं जानती कि आप विद्वान हैं। मैंने कहा मैं विद्वान नहीं हूँ। इसी प्रसंग में मैंने उन्हें त्रिलोचन की एक कविता ' प्रगतिशील कवियों की नयी लिस्ट निकली है' सुनायी, कविवर त्रिलोचन ने लिखा- " प्रगतिशील कवियों की नयी लिस्ट निकली है/उसमें कहीं त्रिलोचन का नाम नहीं था/आँख फाड़कर देखा/दोष नहीं था/पर आँखों का/सब कहते हैं कि प्रेस छली है/शुद्धिपत्र देखा ,उसमें नामों की माला छोटी न थी/ यहाँ भी देखा ,कहीं त्रिलोचन नहीं/तुम्हारा सुन सुनकर सपक्ष आलोचन कान पक गए थे/मैं ऐसा बैठा ठाला नहीं,तुम्हारी बकबक सुना करूँ/किसी जगह उल्लेख नहीं है,तुम्हीं एक हो,क्या अन्यत्र विवेक नहीं है/ तुम सागर लाँघोगे ? -डरते हो चहले से/बड़े-बड़े जो बात कहेंगे-सुनी जायगी/व्याख्याओं में उनकी व्याख्या चुनी जाएगी/"
कोलकाता हिन्दी के क्षयिष्णु वातावरण का एक अन्य पक्ष है हिन्दी के पठन-पाठन की ह्रासशील अवस्था। यह स्थिति कमोबेश पूरे राज्य में है। मसलन जो आज छात्र है वह कल शिक्षक होगा।जो विद्यार्थी एम.ए. में आते हैं उनमें अधिकांश ठीक से हिन्दी लिखना तक नहीं जानते । अब आप ही सोचिए कि जो विद्यार्थी एम.ए. तक आ गया वह हिन्दी लिखना नहीं जानता। इस तरह के विद्यार्थियों की संख्या हर साल बढ़ रही है। उच्च शिक्षाकी सुविधाओं का निचलेस्तर पर विस्तार हुआ है। बड़े पैमाने पर छात्र हिन्दी ऑनर्स कर रहे हैं , वे जब ठीक से हिन्दी लिखना नहीं जानते,ठीक से प्रश्नों का उत्तर तक नहीं देते तब वे कैसे एम.ए. तक अच्छे अंक प्राप्त करके आ जाते हैं, इसका रहस्य कोई भी आसानी से समझ सकता है कि कोलकाता में हिन्दी में अंक कैसे दिए जाते होंगे। हिन्दी प्रमोशन के नाम पर बड़े पैमाने पर ऐसे छात्रों की पीढ़ी तैयारहुई है जो येन-केन प्रकारेण अंक हासिल करके पास हुए हैं। पढ़ने,समझने और सीखने की आदत बहुत कम विद्यार्थियों में है। जिनमें यह आदत है उन्हें पग-पग पर छींटाकशी, अपमान और अकल्पनीय असुविधाओं का सामना करना पड़ता है। कोलकाता में सारे विद्यार्थी जानते हैं कि हिन्दी में नौकरी पाने के नियम क्या हैं ? किसके हाथ में नौकरियां हैं ? किस नेता और प्रोफेसर को पटाना है और कैसे पटाना है । इस समस्या की जड़ें गहरी हैं,गहराई में जाकर देखें तो हिन्दी के शिक्षक नए से डरते हैं,विचारों का जोखिम उठाने से डरते हैं। अन्य से सीखने और स्वयं को उससे समृध्द करने मेंअपनी हेटी समझते हैं। साहित्य को अनुशासन के रूप में पढ़ने पढ़ाने में इनकी एकदम दिलचस्पी नहीं है।
आज वास्तविकता यह है कि ज्यादातर शिक्षक और समीक्षक आजीविका और थोथी प्रशंसा पाने लिए अपनेपेशे में हैं।वे किसी भी चीज को लेकर बेचैन नहीं होते। उनके अंदर कोई सवाल पैदा नहीं होते। एक नागरिक के नातेउनके अंदर वर्तमान की विभीषिकाओं को देखकर उन्हें गहराई में जाकर जानने की इच्छा पैदा नहीं होती।वे पूरी तरहअतीत के रेतीले टीले में सिर गडाए बैठे हैं।
हिन्दी की सबसे बड़ी समस्या यह है कि शिक्षक और आलोचक अपने नियमित अभ्यास और ज्ञान विनिमय को अनुसंधान का जरिया नहीं बना पाए है। विद्यार्थियों में मासूमियत और अज्ञानता बनाए रखने में इस तरह के शिक्षकोंकी बड़ी भूमिका है।ये ऐसे शिक्षक हैं जो ज्ञान के आदान-प्रदान में एकदम विश्वास नहीं करते। कायदे से शिक्षक कोपारदर्शी, निर्भीक और ज्ञानपिपासु होना चाहिए।किन्तु हिन्दी विभागों में मामला एकदम उल्टा है।हिन्दी के शिक्षक कम ज्ञान में संतुष्ट,आरामतलब,और दैनन्दिन जीवन की जोड़तोड़ में मशगूल रहते हैं।
इसके विपरीत यदि कोई शिक्षक निरंतर शोध करतााहै या निरंतर लिख रहा है तो उसका उपहास उडाने और केरीकेचर बनाने में हमारे शिक्षकगण सबसे आगे होते हैं। और कहते हैं कि बड़ा कचरा लिख रहे हैं।हल्का लिख रहे हैं। यानी हमारे शिक्षकों को निरंतर लिखने वाले से खास तरह की एलर्जी है।वे यह भी कहते हैं कि फलां का लिखा अभीतक इसलिए नहीं पढ़ा गया या विवेचित नहीं हुआ क्योंकि जब तक उनकी एक किताब पढकर खत्म भी नहीं हो पातीहै तब तक दूसरी आ जाती है।इस तरह के अनपढों के तर्क उसी समाज में स्वीकार किए जाते हैं जहां लिखना अच्छानहीं माना जाता। कहीं न कहीं गंभीर लेखन के प्रति एक खास तरह की एलर्जी या उपेक्षा जिस समाज में होती है वहींपर ऐसी प्रतिक्रियाएं आती हैं। इस तरह की मनोदशा के प्रतिवादस्वरूप त्रिलोचन ने लिखा है- "शब्द/ मालूम है/व्यर्थ नहीं जाते हैं/पहले मैं सोचता था/उत्तर यदि नहीं मिले /तो फिर क्या लिखा जाय/किन्तु मेरे अन्तरनिवासी ने मुझसे कहा- लिखाकर/तेरा आत्म-विश्लेषण क्या जाने कभी तुझे/एक साथ सत्य शिव और सुंदर को दिखा जाय/अब मैं लिखा करता हूँ/अपने अन्तर की अनुभूति बिना रँगे चुने/कागज पर बस उतार देता हूँ/"
हिन्दी से जुड़े अधिकांश जटिल सवालों की हमारी समीक्षा ने उपेक्षा की है। वे किसी भी साहित्यिक और सांस्कृतिकबहस को मुकम्मल नहीं बना पाए हैं। हिन्दी में साहित्यिक बहसें विमर्श एवं संवाद के लिए नहीं होतीं,बल्कि यह तोएक तरह का दंगल है,जिसमें डब्ल्यू डब्ल्यू फाइट चलती रहती है।हमने संवाद,विवाद और आलोचना के भी इच्छितमानक बना लिए हैं। इसे भी हम अनुशासन के रूप में नहीं चलाते।
परंपरा का मूल्यांकन करते हुए हमने सरलीकरण से काम लिया है।परंपरा की इच्छित इमेज बनाई है परंपरा की जटिलताओं को खोलने की बजाय परंपरा के वकील की तरह आलोचना का विकास किया है। परंपरा का मूल्यांकनकरते हुए जो लेखक-शिक्षक परंपरा के पास गया वह परंपरा का ही होकर रह गया। परंपरा के बारे में हमारे यहां तीनतरह के नजरिए प्रचलन में हैं। पहला नजरिया परंपरावादियों का है जो परंपरा की पूजा करते हैं।परंपरा में सब कुछ कोस्वीकार करते हैं। दूसरा नजरिया प्रगतिशील आलोचकों का है जो परंपरा में अपने अनुकूल की खोज करते हैं और बाकीपर पर्दा डालते हैं।तीसरा नजरिया आधुनिकतावादियों का है जो परंपरा को एकसिरे से खारिज करते हैं। इन तीनों हीदृष्टियों में अधूरापन है और स्टीरियोटाईप है।
परंपरा को इकहरे,एकरेखीय क्रम में नहीं पढ़ा जाना चाहिए।परंपरा का समग्रता में जटिलता के साथ मूल्यांकन कियाजाना चाहिए।परंपरा में त्यागने और चुनने का भाव उत्तर आधुनिक भाव है। यह भाव प्रगतिशील आलोचकों में खूबपाया जाता है। परंपरा में किसी चीज को चुनकर आधुनिक नहीं बनाया जा सकता। नया नहीं बनाया जा सकता। परंपराके पास हम इसलिए जाते हैं कि अपने वर्तमान को समझ सकें वर्तमान की पृष्ठभूमि को जान सकें।हम यहां तक कैसेपहुँचे यह जान सकें।परंपरा के पास हम परंपरा को जिन्दा करने के लिए नहीं जाते। परंपरा को यदि हम प्रासंगिकबनाएंगे तो परंपरा को जिन्दा कर रहे होंगे। परंपरा को प्रासंगिक नहीं बनाया जा सकता।परंपरा के जो लक्षण हमें आजकिसी भी चीज में दिखाई दे रहे हैं तो वे मूलत: आधुनिक के लक्षण हैं, नए के लक्षण हैं।नया तब ही पैदा होता है जबपुराना नष्ट हो जाता है। परंपरा में निरंतरता होती है जो वर्तमान में समाहित होकर प्रवाहित होती है वह आधुनिक काअंग है।
हिन्दी में सबसे ज्यादा अनुसंधान होते हैं।आजादी के बाद से लेकर अब तक कई लाख शोध प्रबंध हिन्दी मेंलिखे जा चुके हैं।सालाना 7 हजार से ज्यादा शोध प्रबंध हिन्दी में जमा होते हैं। लेकिन इनमें एक फीसद शोध प्रबंधों में भी सामयिक समाज की धड़कन सुनाई नहीं देगी। हमें विचार करना चाहिए कि रामविलास शर्मा, नगेन्द्र,नामवरसिंह, विद्यानिवास मिश्र, मैनेजर पांडेय, शिवकुमार मिश्र, कुंवरपाल सिंह , चन्द्रबलीसिंह , परमानन्द श्रीवास्तव, नन्दकिशोरनवल आदि आलोचकों ने कितना वर्तमान पर लिखा और कितना अतीत पर लिखा है ? इसका यदि हिसाब फैलायाजाएगा तो अतीत का पलड़ा ही भारी नजर आएगा। ऐसे में हिन्दी के वर्तमान जगत की समस्याओं पर कौन गौर करेगा? खासकर स्वातंत्र्योत्तर भारत की जटिलताओं का मूल्यांकन तो हमने कभी किया ही नहीं है।

बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

कलकत्ते के खट्टे-मीठे अनुभव-


मैं सन्1989 में कोलकाता आया,जिस समय मेरी नियुक्ति कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में हुई उस समय हिन्दी एम.ए. में तकरीबन 45 छात्र पढ़ते थे।आज प्रत्येक सेमिस्टर में 125 छात्र पढते हैं।एम.फिल् भी है।मेरी नियुक्ति के पहले तक कलकत्ता वि.वि. में एससी,एसटी, आरक्षण नहीं था।कॉलेज सर्विस कमीशन में भी आरक्षण के आधार पर पद नहीं भरे जाते थे। यह समस्या जब मेरी नजरों में पहलीबार सामने आई तो मैंने इसे माकपा के शीर्ष नेतृत्व के सामने रखा और अंतमें काफी जद्दोजहद के बाद आरक्षण लागू हुआ। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि हिन्दी एमए का पाठ्यक्रम तकरीबन30सालों से नहीं बदला गया था,उसमें निरंतर अपडेटिंग की प्रक्रिया आंरंभ हुई। इस काम में विभाग के अन्य शिक्षकों ने सहयोग किया,लेकिन पहल मैंने की। आज पश्चिम बंगाल हिन्दी के पठन-पाठन के लिहाज से बहुत विकास कर गया है,इसमें वाम सरकारों की बड़ी भूमिका रही है।अनेक विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ायी जाती है।

कलकत्ते का सारा माहौल पुराने पैटर्न,आदतों,संस्कारों पर टिका है।नई दुनिया का उसमें प्रवेश बेहद धीमी गति से हो रहा है।चीजें बदल रही हैं लेकिन बेहद धीमी गति से। विद्यार्थियों के सामने सबसे बड़ी समस्या है पुस्तकों की।जरूरत की पुस्तकों को पढ़ने-पढ़ाने का यहां रिवाज कम है।अधिकतर शिक्षक भी उससे अपरिचित हैं।इसके कारण विद्यार्थियों तक सही सूचनाएं ,पुस्तकों के नाम नहीं पहुँच पाते। स्थिति की गंभीरता समझने के लिए मैं अपना एक अनुभव साझा करना चाहता हूँ।हमलोगों ने एमफिल् का पाठ्यक्रम आरंभ किया। पहला बैच था,उसमें मुझे साहित्य का समाजशास्त्र पढ़ाना था,किताबें नहीं मिल रही थीं, मैंने स्व.विष्णुकांत शास्त्री,जो विभाग के वरिष्ठतम प्रोफेसर थे,बेहतरीन शिक्षक थे, से पूछा कि मुझे मिखाइल बाख्तिन पढ़ाना है,क्या आपके पास उनकी कोई किताब है,वे बोले मैंने तो नाम ही पहलीबार सुना है,मैं सुनकर चौंक गया।दूसरे दिन मैंने भाषाविज्ञान विभाग के एक प्रोफेसर से पूछा कि क्या उनके पास बाख्तिन की कोई किताब है तो वे बोले, हां,वे बोले मेरे पास सब किताबें हैं,मैंने शास्त्रीजी से कहा कि देखिए कितना अंतर है ,हिन्दी के प्रोफेसर को नाम तक नहीं मालूम और भाषाविज्ञान के प्रोफेसर के पास किताबें तक हैं।इस एक घटना ने मेरी आंखें खोल दी साथ में यह भी मैसेज दिया कि हिन्दी के शिक्षक आधुनिक विचारकों के लेखन से परिचित होना तो दूर,उनका नाम तक नहीं जानते। यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां से मैंने काम आरंभ किया।

मैं जेएनयू से पढ़कर आया था,नए विषय,नए विचारक,सिद्धान्तकार आदि के बारे में गुरूमुख पढ़कर आया था अतःमेरे सामने वह संकट नहीं था जो यहां के शिक्षकों के सामने संकट था। कहने का आशय यह कि विद्यार्थी ज्ञान के नए स्रोतों से बाकिफ तब होगा जब शिक्षक बाकिफ होगा।कोलकाता जैसे महानगर में रहते हुए दुनिया के ज्ञान के बेखबर रहने वाला शिक्षक निश्चित रूप से तेजगति से अपना विकास नहीं कर सकता। पहले ज्ञान-विज्ञान के नए क्षितिज शिक्षक स्पर्श करे,बाद में वह अपने विद्यार्थियों को मौका दे,सारी समस्या की जड़ यहां पर है।



मैं जब कोलकाता आया तो मैंने पता किया कि यहां विदेशी किताबें कहां मिलती हैं ? पता चला कि विदेशी पुस्तक भंडार नाम से एक किताबों की दुकान है,मैं दुकानदार से मिला,उसने नई-नई किताबें दिखायीं,बात करने पर पता चला कि नामवरजी जब भी कलकत्ता आते हैं उस किताब वाले के यहां जरूर आते हैं, मैं नामवरजी से उस किताबवाले के बारे में जेएनयू में छात्रजीवन में सुन चुका था, नामवरजी जब भी कोलकाता आते सेमीनार आदि से जो भी रूपये मिलते उससे उस पुस्तक बिक्रेता से किताबें खरीदकर ले जाते।साल में कम से कम 3-4बार उनका कोलकाता आना होता था, मैंने किताब वाले से पूछा क्या कोई और हिन्दी का शिक्षक भी उससे किताबें खरीदने आता है तो उसने कहा कि हिन्दी का कोई शिक्षक कभी किताब खरीदने नहीं आया।यह वाकया इसलिए बताना जरूरी है कि हिन्दी शिक्षकों के दुनिया से संपर्क-संबंध को हम पहचान सकें।कलकत्ता वि.वि.की लाइब्रेरी से कभी किसी हिन्दी शिक्षक ने 1989 तक पश्चिमी समीक्षा की किताबें, आलोचना की नई किताबें निकलवाकर नहीं पढ़ीं,मैं पहला शिक्षक था जो किताबें निकालकर लाता और पढ़ता था।मेरे लिए यह सारी चीजें बेहद निराशा पैदा करने वाली थीं,जब आप नई किताबें नहीं पढ़ेंगे तो नई बहसों में शामिल कैसे होंगे, ज्ञान के समुद्र में दुनिया के साथ हिन्दीवालों को कैसे जोड़ेंगे? यह काम आशीर्वाद मात्र से नहीं हो सकता।

सोमवार, 30 जून 2014

कोलकाता की बंद गलियां और वोट का खेल

       

मुझे याद आ रहा है टॉलीगंज का वह चुनाव जब मैं आशीष दा के लिए चुनाव प्रचार के लिए नुक्कड़ सभाएं कर रहा था। रोज शाम होते ही इस विधानसभा क्षेत्र में नुक्कड़ सभाएं करने निकल पड़ता था। सभाओं को कहां करना है इसका पूरा कार्यक्रम माकपा के राज्य ऑफिस से तैयार होकर मिलता था और पार्टी की स्थानीय शाखाओं को पता रहता था। उस चुनाव से कुछ समय पूर्व तृणमूल कांग्रेस का जन्म हुआ था। आशीष दा के खिलाफ टीएमसी का राज्य अध्यक्ष चुनाव लड़ रहा था। आशीष दा माकपा के श्रेष्ठतम शिक्षकनेता थे, कलकत्ता वि वि में कॉमर्स विभाग में प्रोफेसर थे,वे हमारी पार्टी ब्रांच के सचिव भी थे। इसलिए उनके लिए ज्यादा काम करने पर जोर था। खैर, एक वाकया बेहद पीड़ादायक घटा।

एकदिन मैं टालीगंज इलाके में एक गली में चुनाव सभा के लिए गया। मेरे साथ एक लोकल कॉमरेड था और रिक्शे पर लाउडस्पीकर कसा हुआ था। स्थानीय कॉमरेड मुझे घुमाते हुए एक बंद गली में ले गया और एक ऐसी जगह खड़ा कर दिया जहां गली बंद हो जाती थी, मैंने कहा यहां तो कोई नहीं है और गली बंद है, कोई सुननेवाला नहीं है, वह बोला यहीं मीटिंग करनी है, शाम के सात-साढ़े सात बजे होंगे। मैंने उस कॉमरेड को काफी समझाने की कोशिश की कि यहां कोई सुनने वाला नहीं है ,तुम क्यों बोलने के लिए जोर डाल रहे हो, वह बोला आप भाषण दीजिए लोग घरों में बैठे हुए सुनेंगे। लाउडस्पीकर की आवाज दूर दूर तक जाएगी। मैंने बंद गली में बिना श्रोताओं के अपना भाषण दिया,वहां उस कॉमरेड और रिक्शाचालक के अलावा और कोई नहीं था।

मैं भाषण देकर स्थानीय पार्टी ऑफिस चला आया ,वहां पर बैठे लोकल सचिव से मेरे साथ गए कॉमरेड ने कहा कि मीटिंग बहुत अच्छी हो गयी है,और इन्होंने बढ़िया भाषण दिया। मैंने कहा कि वहां तो कोई सुनने वाला नहीं था, घर अंदर से बंद थे, जो लोग आ रहे थे वे रुक नहीं रहे थे,सीधे घरों में जा रहे थे और दरवाजे बंद कर ले रहे थे,यह मीटिंग नहीं है,बल्कि बकबास है, लोकल सचिव ने कहा आप नहीं जानते इस इलाके में ऐसे ही मीटिंग होती है मैंने पूछा क्यों तो बोला यह वेश्याओं की गली है यहां सब पेशेवर वेश्याएं रहती हैं और धंधा करती हैं। जो लोग आ जा रहे थे वे उनके ग्राहक थे। मैंने कहा आपलोग इसे रोकते क्यों नहीं ? इस पर वह ऊटपटांग तर्क देने लगा,मैं उससे सहमत नहीं हो पाया, अंत में मैंने राज्य पार्टी ऑफिस आकर का. अनिल विश्वास को सारा किस्सा बताया कि मुझे इस तरह के इलाकों में न भेजें, वे बोले क्या करें पार्टी को उन लोगों में वोट के लिए जाना होता है। मैंने कहा मैं ऐसे इलाकों में नहीं जा पाऊँगा।इस पर बोले लोकतंत्र में सबसे वोट चाहिए। हम वेश्यावृत्ति रोक नहीं सकते। लेकिन वोट तो मांग सकते हैं।



कोलकाता और मिथ भंजन

       
मैं पहलीबार कोलकाता एसएफआई कॉफ्रेंस में शामिल होने आया था। संभवतः1981-82 की बात है।अनेक मित्र थे जो जेएनयू से इस कॉफ्रेस में डेलीगेट के रुप में आए थे । मुझे याद है कॉफ्रेंस को बीच में आधा दिन का अवकाश करके डेलीगेट को फुटबाल का मैच दिखाने की व्यवस्था की गयी। मैं और अजय ब्रह्मात्मज दोनों मैच देखने की बजाय धर्मतल्ला घूमने चले आए,हमने मैच नहीं देखा। एक मजेदार हादसा हुआ और उसने कोलकाता और वाम राजनीति का पहलीबार एक मिथ तोड़ा। मिथ यह था कि वामदल जहां होते हैं वहां समाज बहुत ही सुंदर और नैतिक दृष्टि से अव्वल होता है।

हम दोनों धर्मतल्ला में मद्रास होटल के आसपास नीचे घूम रहे थे अचानक एक दलाल आया और मेरे कान में धीरे कहने लगा 'छोरी चाहिए छोरी चाहिए'-'चोरी का माल चाहिए ,चोरी का माल चाहिए' , वह लड़कियों का सप्लायर था। अजय मुझसे थोड़ा दूर मूडी बनवा रहा था, मैं घबड़ाकर उसके पास गया और कहा कि सामने जो आदमी देख रहे हो वो यह सब कह रहा है, अजय ने कहा वो मुझसे क्यों नहीं कहता,कुछ देर बाद वो आदमी फिर पास से गुजरा और वही पंक्तियां दोहरा गया। इस घटना ने पहलीबार वाम का मिथ तोड़ा।

ताकतवर वाम आंदोलन के होते हुए सड़क पर सरेआम औरतों को वेश्यावृत्ति कराने वाले छुट्टा घूम रहे थे,इस धंधे में शामिल औरतें वहीं कहीं पर मौजूद थीं,यह हमारे लिए चौंकाने वाली चीज थी। सड़क पर सरेआम धंधेबाजी बिना पुलिस की मदद के संभव नहीं थी, साथ ही कोलकता में जहां पर हर गली-मुहल्ला वाम के दखल और निगरानी में था वहां पर इस तरह का कांड़ निरंतर धंधे के रुप में चल रहा हो तो इसमें राजनीतिक दलों के संरक्षण से भी इंकार नहीं किया जा सकता।



रविवार, 29 जून 2014

कोलकाताचेतना नया फिनोमिना


       मैंने 1989 में कलकत्ता विश्वविद्यालय में नौकरी ली और वहां पढ़ाने गया तो दो-तीन दिन बाद स्टाफरुम में जेएनयू के दो पुराने मित्रों से मुलाकात हुई,एक राजनीतिविज्ञान में प्रवक्ता थे और दूसरे विज्ञान में। वे दोनों मिलकर बड़े खुश हुए ,लेकिन तत्काल बोले तुम दिल्ली छोड़कर यहां क्यों आए नौकरी करने ? कोलकाता कोई अच्छी जगह नहीं है। मेरे लिए उनका कथन चौंकाने वाला था।

दूसरी घटना यह घटी कि कोलकाता के दो स्वनाम धन्य हिन्दी शिक्षकों ने मेरे खिलाफ परिचय हुए बिना मोर्चा खोल दिया और रोज अखबारों में मेरे खिलाफ लिखाना आरंभ कर दिया । मेरे खिलाफ रोज एक नयी गॉसिप वे तैयार करके सप्लाई करते। उनके गॉसिप अभियान ने रंग दिखाया और आनंद बाजार पत्रिका से लेकर संडे मेल तक,यहां तक कि स्थानीय हिन्दी अखबारों में भी मेरा इन दो स्वनाम धन्य हिन्दी शिक्षकों ने यश फैला दिया। मजेदार बात थी कि ये दोनों शिक्षक मुझसे नियमित मिलते भी थे और सामने प्रशंसा करते पीछे से चुगली और निंदा करते। इस समूचे प्रकरण ने मुझे पश्चिम बंगाल के हिन्दीभाषी और बंगलाभाषी बुद्धिजीवियों को समझने के अनेक सूत्र दिए।

इस राज्य में हिन्दीभाषीचेतना मूलतः व्यक्तित्वहीनचेतना है। जिसकी अभिव्यंजना उन दो शिक्षकों में मिलती है जिनका मैंने जिक्र किया। विलक्षण बात है हिन्दीभाषी यहां व्यक्तित्व निर्माण नहीं कर पाए, अपनी अस्मिता का निर्माण नहीं कर पाए। बंगाली जाति अपनी अस्मिता बचाने के लिए जंग कर रही थी। अस्मिता के ह्रास और अभाव को इस तरह हिन्दीभाषी और बंगाली एक-दूसरे के पूरक की तरह झेल रहे थे।

जिन दो बंगाली शिक्षकों ने मेरे कोलकाता आने पर आश्चर्य व्यक्त किया था वे यह मान चुके थे कि कोलकाता एक चुका हुआ शहर है। इसमें विकास की संभावनाएं खत्म हो चुकी हैं। मैं उस समय वामचिंतन के असर में था लेकिन शहर और विश्वविद्यालय की दशा के साथ माकपा के नेताओं और खासकर शिक्षक नेताओं के रवैय्ये को देखकर अपने नजरिए को बदलने को मजबूर हुआ।

मैं जब कोलकाता आया था तो इस शहर का ह्रासकाल आरंभ हो गया था। शहर के ह्रासकाल में बुद्धिजीवियों .या फिर कहें मध्यवर्ग के लोगों में सबसे पहले भगदड़ मचती है ,वे नए शहरों की ओर भागते हैं। ह्रास के इस दौर में पहले मध्यवर्ग ने भागना आरंभ किया फिर गांवों से पलायन आरंभ हुआ।

वामशासन की विचारधारा आम जनता में स्थानीय मोह पैदा करने की बजाय स्थानीय अलगाव पैदा करने में सफल रही। वाम विचारधारा से स्थानीय अलगाव पैदा होता है यह बात मैंने यहीं पर आकर सीखी। मजेदार बात है कि जो वाम के साथ है वो ही बाहर जाने की कोशिश कर रहा है। जो वाम राजनीति कर रहा है वही कह रहा है चीजें बदल रही हैं,अपना राज्य अच्छा नहीं लग रहा। यहीं पर आकर मैंने कोलकाताचेतना के दर्शन किए इसे मैं पश्चिम बंगाल के लिए सबसे खतरनाक चेतना मानता हूँ।

कोलकाताचेतना के कारण ही जो बंगाली जाति एक जमाने में इस राज्य पर गर्व करती थी वही अब गर्व नहीं करती। वामशासन के बाद पश्चिम बंगाल के स्वाभिमान और आत्मनिर्भर भावबोध का क्षय हुआ और एक विलोम तैयार हुआ वह है कोलकाताचेतना। इस चेतना के लोग अब बाहर जाने के बाद कोलकाता लौटना नहीं चाहते। जो व्यक्ति एकबार यहां से निकल गया वह लौटकर वापस यहां आना नहीं चाहता। अपनी जमीन, अपने शहर, अपने परिवेश,अपनी भाषा,अपनी संस्कृति आदि से अलगाव कोलकाताचेतना की विशेषता है। बंगाली जाति को इस चेतना ने सामाजिक की बजाय व्यक्तिकेन्द्रित बना दिया। अब बंगाली जाति सामूहिक भावबोध की बजाय व्यक्तिगत भावबोध में डूब गयी। उनके लिए पश्चिम बंगाल रहने की नहीं कभी-कभार पर्यटन की जगह होकर रह गया। वामशासन के बाद कोलकाता में ही नहीं समूचे बंगाल में बुनियादी बदलाव आया उसने समूचे राज्य को देश के अन्यान्य क्षेत्रों में जाने के लिए मजबूर कर दिया। विकास की संभावनाएं खत्म होती चली गयीं उसके कारण मध्यवर्ग की आशाएं भी स्थानान्तरित होती चली गयीं।



पश्चिम बंगाल में वामशासन 1977 में आया उसके बाद चीजें तेजी से बदलीं इनमें सबसे बड़ी चीज बदली वह थी पश्चिम बंगाल की आत्मनिर्भरभावना। वाम के पहले यह राज्य आत्मनिर्भर राज्य था,वामशासन में आत्मनिर्भर भावबोध का चौतरफा ह्रास हुआ। आत्मनिर्भरता के अवसर इस शहर में कम होते गए। बाहर से आने वाले लोगों की संख्या कम होती गयी और बाहर जाने वाले लोगों की संख्या बढ़ती गयी।जो यहां रह गए उनमें सकारात्मक भावबोध की बजाय कुंठा-हताशा का विस्तार होता गया,उसका ही दुष्परिणाम है कि आज पश्चिम बंगाल सबसे ज्यादा निराशा में डूबा हुआ राज्य है। वाम आंदोलन,आक्रामक मार्क्सवाद,संगठनबद्ध समाज ने एक खास किस्म की घेरेबंदी आरंभ की जिसके कारण जो घेरे में है वह जीवित है जो घेरे के बाहर है वह परेशान है और भागने की तैयारी में है।

शनिवार, 28 जून 2014

भाषा की गुलेल

         बेहद संवेदनशील और गंभीर शहर है। इसमें महानगर ,गांव और छोटे शहर की मनोदशाएं एक ही साथ तैरती रहती हैं। इन तीनों मनोदशाओं को बाजार से लेकर ऑफिस तक,कॉलेज से लेकर विश्वविद्यालय तक अंतर्क्रियाएं करते देख सकते हैं। यहां इन तीनों मनोदशाओं के साक्षात चित्र भी मिल जाएंगे। इच्छाओं का ऐसा संगम अन्यत्र कम ही देखने को मिलता है। यह तय करना मुश्किल है कि इस शहर का ड्राइवर कौन है ? महानगरीय भावबोध या ग्रामीण भावबोध ?

यह ऐसा शहर है जिसके सामान्य बहस मुबाहिसे में गरीब-मेहनतकश के स्वर-दुख,भाषा,भाषिक मुहावरे और जरुरतों को आप चलते फिरते सुन सकते हैं,महसूस कर सकते हैं। विभिन्न समस्याओं पर लोग बातें करते,भाषण देते मिल जाएंगे,और एक ही नारा सब जगह मिलेगा,'गरीब की कौरे वांचबे',या गरीब कैसे जिंदा रहेगा ?

महंगाई पर बात करो यही टेक सुनने को मिलेगी, वाम और दक्षिण राजनीति पर बात करो तो यह टेक सुनने को मिलेगी। मेहनतकशों और ग्रामीणों की भाषा और उससे जुड़े मुहावरे ,टेक और संस्कृति को आप यहांके बाजारों में तैरते हुए महसूस कर सकते हैं। जिंदादिली और व्यंग्य में वाद-विवाद का तो खैर कोलकाता में जो आनंद है वह शायद और कहीं पर देखने को न मिले।

एक वाकया देखा।एक दिन मिनीबस में दमदम पार्क से मेडीकल कॉलेज जा रहा था। मिनीबस में अच्छी खासी भीड़ थी, लोगों के हाथ और शरीर एक-दूसरे से टकरा रहे थे। अचानक देखा कि दो यात्री आपस में विवाद करने लगे। एक का दूसरे से शरीर रगड़ा खा रहा था,पहले ने दूसरे से कहा सीधे खड़े हो और अपने शरीर का वजन ठीक रखो। दूसरे व्यक्ति ने कहा मैं ठीक ही खड़ा हूँ,आप सही ढ़ंग से खड़े हों।इसी पर बातचीत थोड़ा तेजभाषा में शिफ्ट कर गयी।

कुछ देर बाद पहले व्यक्ति ने दूसरे से कहा 'बोकार मतो दांडिए आछो', पहले ने ध्यान नहीं दिया,बात फिर आगे बढ़ गयी ,पहले ने फिर कहा ' इडियटेर मतो दांडिए आछो', यह शब्द सुनते ही दूसरा व्यक्ति भड़क गया और बोला 'इडियट ' क्यों कहा ? यह मेरा अपमान है ? पहले ने कहा मैंने तो तुमको पहले 'बोका' कहा था तब तुमको गुस्सा क्यों नहीं आया ? अब इडियट कहने पर क्यों भड़क रहे हो,इस पर पहला बोला 'इडियट' मत बोलो,यह गाली है,दूसरे ने कहा 'बोका' भी तो कहा तब गुस्सा क्यों नहीं आया ? यह संवाद सुनकर सारी मिनीबस हँस रही थी और वे दोनों 'बोका' और 'इडियट' की बहस में उलझे हुए इन दोनों शब्दों की सांस्कृतिक मीमांसा करते हुए अपने गुस्से का इजहार कर रहे थे। भाषा में आनंद लेना,सहज ग्रामीण और शिक्षित भाषा में तकरार करना और भाषिक प्रयोगों पर गर्व करना कोलकाता की जान है। यह भाषिक रंग अन्यत्र कम ही देखने को मिलता है।













































शुक्रवार, 27 जून 2014

कमाऊ चेतना के हिन्दीभाषी

        सन् 1989 से पहले कोलकाता दो बार आया था।एकबार एसएफआई के राष्ट्रीय अधिवेशन के समय और दूसरीबार अपनी शादी के समय।लेकिन कोलकता को समझने का मौका तब ही मिला जब 1989 में कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रवक्ता पद पर नौकरी मिली। उसके बाद ही कोलकाता के हिन्दीभाषी बुद्धिजीवियों और बंगाली बुद्धिजीवियों को करीब से देखने और जानने का मौका मिला।

पहले दो अनुभव बड़े ही शानदार रहे। मैंने एकदिन एक कार्यक्रम के सिलसिले में अभिनेता उत्पल दत्त को फोन किया, मैंने फोन पर उनसे लंबी बातचीत की।मैं बेहद खुश हुआ कि फोन उन्होंने ही उठाया था। मैं चाहता था कि कोलकाता के 300साल होने पर वे बोलें। मेरा प्रस्ताव सुनकर वे बेहद खुश हुए काफी बातें भी कीं,बोले, मैं इनदिनों अस्वस्थ चल रहा हूँ वरना मैं जरुर जाता। उसके बाद मैंने रंगमंच के बड़े अभिनेता अरुण मुखर्जी को फोन किया उनसे मिलने घर गया,लंबी बातचीत हुई,वे कार्यक्रम में आए भी। उनसे बातचीत में पता चला कि उत्पल दत्त और सत्यजित राय दोनों अपना फोन स्वयं उठाते हैं और घर पर आने वाले को दरवाजे तक छोड़ने भी जाते हैं। यह शिष्टाचार बहुत ही अच्छा लगा।

मजा तब आया जब कोलकाता के 300 के कार्यक्रम में विष्णुकांत शास्त्री को अभिनेता अरुण मुखर्जी की तीखी आलोचना का मंच से सामना करना पड़ा। मुझे याद पड़ रहा है शास्त्रीजी के पास अपनी कोई डिफेंस नहीं थी। हिन्दीभाषी और बंगलाभाषी बुद्धिजीवी भिडंत का यह मेरा पहला अनुभव था। अरुण मुखर्जी ने साफ कहा कि हिन्दीभाषी लोग कोलकाता की मुख्यधारा में रहकर भी बंगला संस्कृति और सभ्यता को न तो समझे हैं और और नहीं उनमें आत्मसात्करण की प्रक्रिया नजर आती है। इस क्रम में उन्होंने कहा मैंने बंगला नाटकों के दर्शकों में कभी हिन्दीभाषी नहीं देखे। कभी-कभार इक्का-दुक्का हिन्दीभाषी दर्शक नजर आते हैं।



पहली भिडंत में यह तथ्य सामने आया कि एक साथ रहते हुए भी बंगला रैनेसां का हिन्दीभाषियों पर कोई खास असर नहीं पड़ा है। हिन्दीभाषी लोग यहां कमाने,खाने,मनीआर्डर करने से आगे चेतना विकसित नहीं कर पाए हैं। यह कार्यक्रम कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दीविभाग ने आयोजित किया था।

गुरुवार, 19 जून 2014

चटपटे गोलगप्पों की हिमायत में

कोलकाता आएं और फुचका न खाएं यह हो नहीं सकता। कोलकाता में रहें और फुचका न खाएं यह भी हो नहीं सकता। फुचका के खोमचे पर जाएं और औरतें नजर न आएं यह भी हो नहीं सकता। फुचका वाला किसी कच्ची बस्ती में न रहता हो यह भी हो नहीं सकता। दिल्ली में इसे गोलगप्पे कहते हैं और मैं जब मथुरा रहता था तो वहां टिकिया कहते थे। शाम को अमूमन टिकिया खाने की आदत सी पड़ गयी थी। मैं आज भी गोलगप्पे को टिकिया कहता हूँ।
     कोलकाता की पहचान में जहां एक ओर लालझंडा है,छाना की मिठाई और रसगुल्ला है। वहीं दूसरी ओर फुचका भी है। फुचका बनाने और बेचने वाले अधिकांश लोग हिन्दीभाषी हैं। जिह्वा सुख के लिए,स्वाद को चटपटा बनाने या मोनोटोनस स्वाद से छुट्टी पाने के लिए जब भी कुछ चटपटा-खट्टा खाने की इच्छा होती है फुचका मददगार साबित होता है।
     फुचका औरतों का प्रिय खाद्य है,इसलिए इसके साथ जेण्डर पहचान भी है। फुचका शौकीनों में औरतों की संख्या ज्यादा है। मैं नहीं जानता कि बाजार में बिकने वाले अन्य किसी खाद्य के साथ जेण्डर पहचान इस तरह जुडी हो। औरतों के साथ फुचका का जुड़ना कई मजेदार पहलुओं की ओर ध्यान खींचता है , आमतौर पर औरतें घरेलू काम करते और घरेलू भोजन खाते हुए बोर हो जाती है और स्वाद बदलने के लिए पुचका खाती हैं। फुचका भोजन नहीं है। यह दोपहर के खाने और शाम के नाश्ते के बीच का लघु नाश्ता है,यह अंतराल में भूख या स्वाद को जगाने के लिए लिया जाने वाला खाद्य है।
      फुचका पूरी तरह लघुव्यापार है और लंबे समय तक इसी अवस्था में इसके बने रहने की संभावनाएं हैं। यदि आप अपने शहर को देखें तो पाएंगे कि वहां क्रमशःफुचका की खपत बढ़ी है।
    यह छोटी पूंजी का व्यापार है और ऐसे लोगों का व्यापार है जो कच्ची बस्ती या झुग्गी-झोंपडियों में रहते हैं। फुचका की बढ़ती खपत ने बड़े हलवाईयों को भी गोलगप्पे बेचने के लिए मजबूर किया है।
   फुचका इस बात का भी संदेश देता है कि हमारे समाज में चटपटे और खट्टे भोजन की मांग लगातार बढ़ रही है। अनेक लोग इसके अस्वास्थ्यकर होने की बातें भी कर रहे हैं। इसके बावजूद फुचका खाने वालों की संख्या में लगातार इजाफा हुआ है।
    फुचकावाला जानता है उसका कितना माल आमतौर पर रोज खप सकता है। पुचका के व्यापार में रिस्क कम है बशर्ते फुचका बढ़िया खिलाएं। फुचका पर्यावरण फ्रेंडली खाद्य है। इसके बनाने और बेचने में घर के लोग ही मदद करते हैं इस अर्थ में फुचका गरीब की रसोई का विस्तार है।
    फुचका खाते हुए हम सब जाने- अनजाने गरीब के स्वाद में शिरकत करते हैं। गरीब के स्वाद में खूब लाल और हरी मिर्च और तीखापन होता है।
     फुचकावाले की खूबी है कि वह स्वाद को नियंत्रण में रखता है ,आप जैसा और जितना तीखा-चटपटा खाना चाहते हैं वह खिलाएगा। हर खाने वाले के स्वाद के वैविध्य की वह कदर करता है और स्वाद को मांग के अनुरुप ढाल देता है। इस अर्थ में फुचकावाला मुझे ज्यादा खुला,लोकतांत्रिक लगता है। वह हलवाई से भिन्न है। हलवाई इकसार स्वाद का मास्टर होता है।जबकि फुचकावाला स्वाद का नियंत्रक और लोकतांत्रिक होता है। फुचका का सिस्टम रिस्क मुक्त और पर्यावरण फ्रेंडली होता है।
  फुचका की सामान्य विशेषता है कि यह स्वाद के मानकीकरण का निषेध करता है। यह निषेध इसमें अन्तर्निहित है। यही वजह है कि फुचका हर इलाके में और अलग-अलग फुचकावाले के यहां भिन्न स्वाद में मिलेगा। यह स्वाद की भिन्नता फुचका से इतर सामग्रियों की प्रकृति पर निर्भर करती है। इसके कारण ही फुचका के स्वाद का खाने के पहले अनुमान नहीं कर सकते। फुचका वाला आमतौर पर पब्लिक स्पेस में खड़ा रहता है। पब्लिक स्पेस में अनौपचारिक ढ़ंग से खाने की आदत के विकास में फुचका की बड़ी भूमिका है। भोजन की अनौपचारिकता हमें ज्यादा मानवीय बनाती है। इस अर्थ में फुचकावाला इंसानियत के कम्युनिकेशन और लिंक का काम भी करता है।    

रविवार, 27 मार्च 2011

प्रमोशन और साहित्य का संकट


     कोलकाता में एक दशक से हिन्दी सेमीनार के प्रमाणपत्र जुटाने की संक्रामक बीमारी कॉलेज शिक्षकों में फैल गयी है। सेमीनार में वे इसलिए सुनने जाते हैं जिससे उन्हें सेमीनार में भाग लेने का सर्टीफिकेट मिल जाए। यह साहित्य के चरम पतन की सूचना है। ये वे लोग हैं जो हिन्दी साहित्य से रोटी-रोजी कमा रहे हैं। ये लोग सेमीनार में बोले बिना सेमीनार में भाग लेने का प्रमाणपत्र पाकर अपने को धन्य कर रहे हैं।  आयोजक यह कहकर शिक्षकों को बुलाते हैं कि प्रमोशन कराना है तो सेमीनार सर्टीफिकेट लगेगा, आ जाओ सुनने, सर्टीफिकेट मिल जाएगा। फलतः ज्यादातर शिक्षक सेमीनार को सुनने आते हैं। सेमीनार का सर्टीफिकेट पाने के लिए वे डेलीगेट फीस भी देते हैं। इस प्रक्रिया में दो किस्म का साहित्यिक भ्रष्टाचार हो रहा है. पहला नौकरी में प्रमोशन के स्तर पर हो रहा है। श्रोता के सर्टीफिकेट को वक्ता के सर्टीफिकेट के रूप में पेश करके तरक्की के पॉइण्ट प्राप्त किए जा रहे हैं। दूसरा , साहित्य विमर्श के नाम पर कूपमंडूकता बढ़ रही है। सेमीनारों में वक्ताओं के भाषण साधारण पाठक की चेतना से भी निचले स्तर के होते हैं और सेमीनार के बाद सभी लोग एक-दूसरे की पीठ ठोंकते हैं, गैर शिक्षक श्रोता फ्रस्टेट होते हैं,वे मन ही मन धिक्कारते हैं और कहते हैं और कहते हैं कि वे सुनने क्यों आए। वक्तागण आशीर्वाद देते हैं,पैर छुआते हैं। इस समूची प्रक्रिया में कई लोग तो इस कदर नशे में आ गए हैं कि उन्हें यह बीमारी हो गयी है कि शहर में कोई भी साहित्यिक कार्यक्रम हो उनको अध्यक्षता के लिए बुलाओ,ये लोग अध्यक्ष न बनाए जाने पर कार्यक्रम में जाते नहीं है। नहीं बुलाने पर नाराज हो जाते हैं।  इन पंडितों का मानना है वे जिस सेमीनार में जाते हैं उस सेमीनार को सार्थक करके आते हैं। इस प्रसंग में मुझे कई लेखकों की रचनाएं याद आ रही हैं। इनमें सबसे पहले में मुक्तिबोध को उद्धृत करना चाहूँगा। बहुत पहले मुक्तिबोध ने हिन्दी के प्रोफेसरों के बारे में लिखा, ''बटनहोल में प्रति‍नि‍धि पुष्‍प लगाए एक प्रोफ़ेसर साहि‍त्‍यि‍क से रास्‍ते में मुलाकात होने पर पता चला कि हि‍न्‍दी का हर प्रोफेसर साहि‍त्‍यि‍क होता है। अपने इस अनुसन्‍धान पर मैं मन ही मन बड़ा खुश हुआ। खुश होने का पहला कारण था अध्‍यापक महोदय का पेशेवर सैद्धान्‍ति‍क आत्‍मवि‍श्‍वास। ऐसा आत्‍मवि‍श्‍वास महान् बुद्धि‍मानों का तेजस्‍वी लक्षण है या महान् मूर्खों का दैदीप्‍यमान प्रतीक ! मैं नि‍श्‍चय नहीं कर सका कि वे सज्‍जन बुद्धि‍मान हैं या मूर्ख ! अनुमान है कि वे बुद्धि‍मान तो नहीं, धूर्त और मूर्ख दोनों एक साथ हैं।''       
मुक्‍ति‍बोध ने यह भी लि‍खा है '' चूँकि प्रोफेसर महोदय साहि‍त्‍यि‍क हैं इसलि‍ए शायद वे यह कुरबानी नहीं कर सकते। नाम- कमाई के काम में चुस्‍त होने के सबब वे उन सभी जगहों में जाएंगे जहॉं उन्‍हें फायदा हो-चाहे वह नरक ही क्‍यों न हो।''
    कोलकाता के शिक्षकों की अवस्था इससे बेहतर नहीं बन पायी है। हिन्दी के इस तरह के आयोजनों में किस तरह के भाषण होते हैं और चेले-चेलियां किस तरह प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं इस पर कवि -कहानीकार उदयप्रकाश की बड़ी शानदार कविता है 'पाँडेजी' उसका अंश देखें-
"छोटी-सी काया पाँडेजी की/छोटी-छोटी इच्छाएँ/ छोटे-छोटे क्रोध/और छोटा दिमाग।
गोष्ठी में दिया भाषण,कहा- 'नागार्जुन हिन्दी का जनकवि है '/फिर हँसे कि ' मैंने देखो
कितनी गोपनीय/चीज को खोल दिया यों।यह तीखी मेधा और/वैज्ञानिक आलोचना का कमाल है। '/एक स-गोत्र शिष्य ने कहा-' भाषण लाजबाब था /अत्यन्त धीर-गंभीर/
तथ्यपरक और विश्लेषणात्मक/हिन्दी आलोचना के खच्चर/ अस्तबल में/आप ही हैं /एकमात्र/काबुली बछेड़े/ 'तो गोल हुए पाँडे जी/मंदिर के ढ़ोल जैसे/ठुनुक -ठुनुक हँसे और/फिर बुलबुल हो गए/फूलकर मगन !"
    मैं 20 सालों से कोलकाता में रह रहा हूँ और आए दिन हिन्दी सेमीनारों की दुर्दशापूर्ण अवस्था के किस्से अपने दोस्तों और विद्यार्थियों से सुनता रहा हूँ। मैं आमतौर पर इन सेमीनारों से दूर रहता हूँ। इसके कारण लोग यह मानने लगे हैं कि मैं साहित्य के बारे में नहीं जानता। कई मित्र हैं जो सेमीनार के कार्ड में वक्ता के रूप में मेरा नाम न देखकर दुखी होकर फोन करते हैं कि यहां तो आपको होना ही चाहिए था। मेरी स्थिति इस कदर खराब है कि एकबार कोलकाता की सबसे समर्थ साहित्यिक संस्था की कर्ताधर्ता साहित्यकार नेत्री ने चाय पर अपने घर बुलाया और कहा कि हम इतने कार्यक्रम करते हैं और आपस में बातें भी करते हैं कि स्थानीय स्तर पर कौन विद्वान हैं जिन्हें बुलाया जाए तो लोग आपका नाम कभी नहीं बताते, मैं  स्वयं भी नहीं जानती कि आप विद्वान हैं। मैंने कहा मैं विद्वान नहीं हूँ। इसी प्रसंग में मैंने उन्हें त्रिलोचन की एक कविता ' प्रगतिशील कवियों की नयी लिस्ट निकली है' सुनायी, कविवर त्रिलोचन ने लिखा- " प्रगतिशील कवियों की नयी लिस्ट निकली है/उसमें कहीं त्रिलोचन का नाम नहीं था/आँख फाड़कर देखा/दोष नहीं था/पर आँखों का/सब कहते हैं कि प्रेस छली है/शुद्धिपत्र देखा ,उसमें नामों की माला छोटी न थी/ यहाँ भी देखा ,कहीं त्रिलोचन नहीं/तुम्हारा सुन सुनकर सपक्ष आलोचन कान पक गए थे/मैं ऐसा बैठा ठाला नहीं,तुम्हारी बकबक सुना करूँ/किसी जगह उल्लेख नहीं है,तुम्हीं एक हो,क्या अन्यत्र विवेक नहीं है/ तुम सागर लाँघोगे ? -डरते हो चहले से/बड़े-बड़े जो बात कहेंगे-सुनी जायगी/व्याख्याओं में उनकी व्याख्या चुनी जाएगी/"
  कोलकाता हिन्दी के क्षयिष्णु वातावरण का एक अन्य पक्ष है हिन्दी के पठन-पाठन की ह्रासशील अवस्था। यह स्थिति कमोबेश पूरे राज्य में है। मसलन जो आज छात्र है वह कल शिक्षक होगा।जो विद्यार्थी एम.ए. में आते हैं उनमें अधिकांश ठीक से हिन्दी लिखना तक नहीं जानते । अब आप ही सोचिए कि जो विद्यार्थी एम.ए. तक आ गया वह हिन्दी लिखना नहीं जानता। इस तरह के विद्यार्थियों की संख्या हर साल बढ़ रही है। उच्च शिक्षाकी सुविधाओं का निचलेस्तर पर विस्तार हुआ है। बड़े पैमाने पर छात्र हिन्दी ऑनर्स कर रहे हैं , वे जब ठीक से हिन्दी लिखना नहीं जानते,ठीक से प्रश्नों का उत्तर तक नहीं देते तब वे कैसे एम.ए. तक अच्छे अंक प्राप्त करके आ जाते हैं, इसका रहस्य कोई भी आसानी से समझ सकता है कि कोलकाता में हिन्दी में अंक कैसे दिए जाते होंगे। हिन्दी प्रमोशन के नाम पर बड़े पैमाने पर ऐसे छात्रों की पीढ़ी तैयारहुई है जो येन-केन प्रकारेण अंक हासिल करके पास हुए हैं। पढ़ने,समझने और सीखने की आदत बहुत कम विद्यार्थियों में है। जिनमें यह आदत है उन्हें पग-पग पर छींटाकशी, अपमान और अकल्पनीय असुविधाओं का सामना करना पड़ता है। कोलकाता में सारे विद्यार्थी जानते हैं कि हिन्दी में नौकरी पाने के नियम क्या हैं  ? किसके हाथ में नौकरियां हैं ? किस नेता और प्रोफेसर को पटाना है और कैसे पटाना है । इस समस्या की जड़ें गहरी हैं,गहराई में जाकर देखें तो हिन्दी के शिक्षक नए से डरते हैं,विचारों का जोखिम उठाने से डरते हैं। अन्य से सीखने और स्वयं को उससे समृध्द करने में अपनी हेटी समझते हैं। साहित्य को अनुशासन के रूप में पढ़ने पढ़ाने में इनकी एकदम दिलचस्पी नहीं है।
        आज वास्तविकता यह है कि ज्यादातर शिक्षक और समीक्षक आजीविका और थोथी प्रशंसा पाने लिए अपने पेशे में हैं।वे किसी भी चीज को लेकर बेचैन नहीं होते। उनके अंदर कोई सवाल पैदा नहीं होते। एक नागरिक के नाते उनके अंदर वर्तमान की विभीषिकाओं को देखकर उन्हें गहराई में जाकर जानने की इच्छा पैदा नहीं होती।वे पूरी तरह अतीत के रेतीले टीले में सिर गडाए बैठे हैं।
       हिन्दी की सबसे बड़ी समस्या यह है कि शिक्षक और आलोचक अपने नियमित अभ्यास और ज्ञान विनिमय को अनुसंधान का जरिया नहीं बना पाए है। विद्यार्थियों में मासूमियत और अज्ञानता बनाए रखने में इस तरह के शिक्षकों की बड़ी भूमिका है।ये ऐसे शिक्षक हैं जो ज्ञान के आदान-प्रदान में एकदम विश्वास नहीं करते। कायदे से शिक्षक को पारदर्शी, निर्भीक और ज्ञानपिपासु होना चाहिए।किन्तु हिन्दी विभागों में मामला एकदम उल्टा है।हिन्दी के शिक्षक कम ज्ञान में संतुष्ट,आरामतलब,और दैनन्दिन जीवन की जोड़तोड़ में मशगूल रहते हैं।
    इसके विपरीत यदि कोई शिक्षक निरंतर शोध करतााहै या निरंतर लिख रहा है तो उसका उपहास उडाने और केरीकेचर बनाने में हमारे शिक्षकगण सबसे आगे होते हैं। और कहते हैं कि बड़ा कचरा लिख रहे हैं।हल्का लिख रहे हैं। यानी हमारे शिक्षकों को निरंतर लिखने वाले से खास तरह की एलर्जी है।वे यह भी कहते हैं कि फलां का लिखा अभी तक इसलिए नहीं पढ़ा गया या विवेचित नहीं हुआ  क्योंकि जब तक उनकी एक किताब पढकर खत्म भी नहीं हो पाती है तब तक दूसरी आ जाती है।इस तरह के अनपढों के तर्क उसी समाज में स्वीकार किए जाते हैं जहां लिखना अच्छा नहीं माना जाता। कहीं न कहीं गंभीर लेखन के प्रति एक खास तरह की एलर्जी या उपेक्षा जिस समाज में होती है वहीं पर ऐसी प्रतिक्रियाएं आती हैं। इस तरह की मनोदशा के प्रतिवादस्वरूप त्रिलोचन ने लिखा है- "शब्द/ मालूम है/व्यर्थ नहीं जाते हैं/पहले मैं सोचता था/उत्तर यदि नहीं मिले /तो फिर क्या लिखा जाय/किन्तु मेरे अन्तरनिवासी ने मुझसे कहा- लिखाकर/तेरा आत्म-विश्लेषण क्या जाने कभी तुझे/एक साथ सत्य शिव और सुंदर को दिखा जाय/अब मैं लिखा करता हूँ/अपने अन्तर की अनुभूति बिना रँगे चुने/कागज पर बस उतार देता हूँ/"
   हिन्दी से जुड़े अधिकांश जटिल सवालों की हमारी समीक्षा ने उपेक्षा की है। वे किसी भी साहित्यिक और सांस्कृतिक बहस को मुकम्मल नहीं बना पाए हैं। हिन्दी में साहित्यिक बहसें विमर्श एवं संवाद के लिए नहीं होतीं,बल्कि यह तो एक तरह का दंगल है,जिसमें डब्ल्यू डब्ल्यू फाइट चलती रहती है।हमने संवाद,विवाद और आलोचना के भी इच्छित मानक बना लिए हैं। इसे भी हम अनुशासन के रूप में नहीं चलाते।

    परंपरा का मूल्यांकन करते हुए हमने सरलीकरण से काम लिया है।परंपरा की इच्छित इमेज बनाई है।परंपरा की जटिलताओं को खोलने की बजाय परंपरा के वकील की तरह आलोचना का विकास किया है।  परंपरा का मूल्यांकन करते हुए जो लेखक-शिक्षक परंपरा के पास गया वह परंपरा का ही होकर रह गया। परंपरा के बारे में हमारे यहां तीन तरह के नजरिए प्रचलन में हैं। पहला नजरिया परंपरावादियों का है जो परंपरा की पूजा करते हैं।परंपरा में सब कुछ को स्वीकार करते हैं। दूसरा नजरिया प्रगतिशील आलोचकों का है जो परंपरा में अपने अनुकूल की खोज करते हैं और बाकी पर पर्दा डालते हैं।तीसरा नजरिया आधुनिकतावादियों का है जो परंपरा को एकसिरे से खारिज करते हैं। इन तीनों ही दृष्टियों में अधूरापन है और स्टीरियोटाईप है।
   परंपरा को इकहरे,एकरेखीय क्रम में नहीं पढ़ा जाना चाहिए।परंपरा का समग्रता में जटिलता के साथ मूल्यांकन किया जाना चाहिए।परंपरा में त्यागने और चुनने का भाव उत्तर आधुनिक भाव है। यह भाव प्रगतिशील आलोचकों में खूब पाया जाता है। परंपरा में किसी चीज को चुनकर आधुनिक नहीं बनाया जा सकता। नया नहीं बनाया जा सकता। परंपरा के पास हम इसलिए जाते हैं कि अपने वर्तमान को समझ सकें वर्तमान की पृष्ठभूमि को जान सकें।हम यहां तक कैसे पहुँचे यह जान सकें।परंपरा के पास हम परंपरा को जिन्दा करने के लिए नहीं जाते। परंपरा को यदि हम प्रासंगिक बनाएंगे तो परंपरा को जिन्दा कर रहे होंगे। परंपरा को प्रासंगिक नहीं बनाया जा सकता।परंपरा के जो लक्षण हमें आज किसी भी चीज में दिखाई दे रहे हैं तो वे मूलत: आधुनिक के लक्षण हैं, नए के लक्षण हैं।नया तब ही पैदा होता है जब पुराना नष्ट हो जाता है। परंपरा में निरंतरता होती है जो वर्तमान में समाहित होकर प्रवाहित होती है वह आधुनिक का अंग है।
       हिन्दी में सबसे ज्यादा अनुसंधान होते हैं।आजादी के बाद से लेकर अब तक कई लाख शोध प्रबंध हिन्दी में लिखे जा चुके हैं।सालाना 7 हजार से ज्यादा शोध प्रबंध हिन्दी में जमा होते हैं। लेकिन इनमें एक फीसद शोध प्रबंधों में भी सामयिक समाज की धड़कन सुनाई नहीं देगी। हमें विचार करना चाहिए कि रामविलास शर्मा, नगेन्द्र,नामवर सिंह,विद्यानिवास मिश्र, मैनेजर पांडेय,शिवकुमार मिश्र, कुंवरपाल सिंह , चन्द्रबलीसिंह ,परमानन्द श्रीवास्तव,नन्दकिशोर नवल आदि आलोचकों ने कितना वर्तमान पर लिखा और कितना अतीत पर लिखा है ? इसका यदि हिसाब फैलाया जाएगा तो अतीत का पलड़ा ही भारी नजर आएगा। ऐसे में हिन्दी के वर्तमान जगत की समस्याओं पर कौन गौर करेगा ? खासकर स्वातंत्र्योत्तर भारत की जटिलताओं का मूल्यांकन तो हमने कभी किया ही नहीं है।




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