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गुरुवार, 21 अगस्त 2014

नरेन्द्र मोदी की बेलगाम भाषा के खतरे

बेलगाम भाषा का टकराव पैदा करती है।साथ ही पीड़ादायक आनंद की सृष्टि भी करती है। सुनने वाला आनंद में रहता है लेकिन इस तरह की भाषा सामाजिक कष्टों की सृष्टि करती है और तनाव पैदा करती है। मोदी बाबू ने मैनस्ट्रीम मीडिया में बेलगाम भाषा को जनप्रिय बनाया है। हाल ही में वे जब हरियाणा में बोल रहे थे तो लोग समझ ही नहीं पाए कि उनके साथ क्या घट रहा है,यही हाल चुनावी सभाओं का भी था।

मोदी के भाषायी प्रयोगों को ध्यान से देखें तो पाएंगे कि मोदी ने वक्तृता का ऐसा इडियम विकसित किया है जिसमें रेशनल के लिए कोई जगह नहीं है। वे भाषा में शब्दों का प्रयोग करते समय पद,सामाजिकता और संस्थान की भाषा के मानकों का अतिक्रमण करते हैं। चुनावों में इस तरह का अतिक्रमण चलता है लेकिन सामान्य स्थितियों में पद और संस्थान की भाषा का ख्याल रखा जाना चाहिए।

मसलन मोदी का हाल ही में वैज्ञानिकों को यह कहना कि 'चलता है' का रवैय्या नहीं चलेगा। यह कथन अपने आप में बहुत कुछ कहता है।प्रधानमंत्री अपनी संस्थान की भाषा भूलकर और पेशेवरलोगों की भाषा भूलकर जिस मुहावरे में बोल रहे थे वह बेलगाम भाषा का नमूना है। नभाटा के अनुसार मोदी ने कहा ''अब 'चलता है' वाला रवैया बिल्कुल नहीं चलेगा और इसे छोड़ना ही होगा।'' । मोदी ने यह भी कहा '' डीआरडीओ ग्लोबल समुदाय को ध्यान में रखकर खुद में बदलाव लाए।'' , अफसोस की बात है कि मोदी को इतना ही नहीं मालूम कि यह संस्थान विश्व प्रतिस्पर्धा को ध्यान में रखकर अपनी प्राथमिकताएं तय करके काम कर रहा है। सबसे बेहतरीन वैज्ञानिक इसमें काम करते हैं।इन वैज्ञानिकों के बीच में प्रधानमंत्री की भाषा में बोलना चाहिए न कि गैर-सांस्थानिक भाषा में।इसके अलावा वैज्ञानिकों के बीच में बोलते समय यह भी ध्यान रहे कि वे गुलाम नहीं हैं जो आदेशों पर काम करें। वे जो तय करते हैं उसकी रोशनी में काम करते हैं। इसी तरह जब 15अगस्त को लालकिले से मोदी बोल रहे थे तो पद-संस्थान की भाषिक मर्यादा का अतिक्रमण करके बोल रहे थे।मसलन् , बिना संसद की अनुमति के उन्होंने योजना आयोग को खत्म करने की घोषणा कर डाली।साथ में हिदायतों और नसीहतों की जड़ी लगा दी। नसीहतें तानाशाह देते हैं,लेकिन मोदी तो लोकतंत्र के नायक के रुप में बोल रहे थे उनको नसीहतें देने की जरुरत नहीं थी।

मोदी ने अपनी भाषा को पद-संस्थान की भाषा के अनुकूल भाषा परिवर्तन नहीं किया तो वह दिन दूर नहीं कि वे देश में भाषा में भिडंत करते-कराते नजर आएंगे। हाल ही में हरियाणा में हाइवे के उदघाटन पर उनका जो भाषण था वह प्रधानमंत्री का उदघाटन भाषण नहीं था वह तो भिड़ंत भाषण था ,जाहिरा तौर पर परिणाम सामने है,कांग्रेस के कई नेताओं ने तेज और सही प्रतिक्रिया व्यक्त की है। इस तथ्य को मोदी समझें और दुरुस्त करें कि वे देश के प्रधानमंत्री हैं और उस पद और संस्थान की भाषायी परंपरा है,वह परंपरा यदि टूटती है तो जमीनी स्तर पर सामाजिक बिखराव और टकराव पैदा होना लाजिमी है।

मोदी की भाषा में हेकड़ी,उपदेश,दादागिरी के साथ फासिस्ट भाषायी भावबोध छिपा है ,मोदी को इसको सचेत रुप से अपने भाषिक संसार से बेदखल करना होगा वरना टकरावों का जन्म होगा।



रविवार, 23 अगस्त 2009

लालगढ़ के असली अपराधी हैं माओवादी

संतोष राणा के आलेख में बड़े ही वि‍स्‍तार और पारदर्शिता के साथ लालगढ़ आन्‍दोलन के बारे में वि‍श्‍लेषण कि‍या गया है ।यह वि‍श्‍लेषण जि‍स चीज पर रोशनी डालता है वह है लालगढ़ आन्‍दोलन की असफलता। क्‍या लालगढ़ में कोई आंदोलन चल रहा था ? लालगढ़ में कोई आंदोलन नहीं चल रहा था,सालबनी की बारूदी सुरंग वि‍स्‍फोट की घटना के बाद जि‍स तरह का बर्बर व्‍यवहार पुलि‍स ने कि‍या था उसके लि‍ए राज्‍य प्रशासन ने यदि‍ स्‍थानीय लोगों की मांगों को मान लि‍या होता तो यह समस्‍या उसी दि‍न खत्‍म हो जाती। राज्‍य सरकार ने अपनी दीर्घकालि‍क योजना के तहत पुलि‍स कैंप हटाने का फैसला लि‍या था, जनता का यदि‍ इलाके में कोई आंदोलन रहा होता तो वि‍गत बीस सालों से नि‍कम्‍मे लोग पंचायतों से लेकर लोकसभा तक चुनाव नहीं जीत पाते,इस इलाके में माकपा का वि‍गत बीस सालों से राजनीति‍क वर्चस्‍व नहीं है बल्‍कि‍ अन्‍य दलों का है। लालगढ़ में माओवादि‍यों ने जो हिंसाचार कि‍या है,जनता को उत्‍पीड़ि‍त कि‍या है,सजाएं दी हैं,माकपा और अन्‍य दलों के कार्यकर्त्‍ताओं की हत्‍याएं की हैं, उन्‍हें लेकर क्‍या कानूनी और राजनीति‍क कदम उठाए जाने चाहि‍ए ? दूसरी बात, आन्‍दोलन और संगठन के दम पर ‘इलाका दखल’ की राजनीति‍ मूलत: फासीवादी राजनीति‍ है, दुर्भाग्‍य यह है कि‍ माकपा से लेकर माओवादि‍यों तक,तृणमूल कांग्रेस से लेकर कांग्रेस तक सभी दल अपने- अपने तरीके से समय-समय पर इसका दुरूपयोग करते रहे हैं। माओवादी संगठनों के पूर्वज ‘इलाका दखल’ के जनक हैं ,बाकी तो उनके अनुयायी मात्र हैं। समस्‍या यह है क्‍या भारत में लोकतंत्र और लोकतांत्रि‍क संस्‍थाओं को बंद करा दें अथवा उन्‍हें सुचारू रूप से काम करने दें ? माओवादि‍यों के जो गि‍रोह ‘इलाका दखल’ अभि‍यान में लगे हैं उनके बयान कि‍तने ही क्रांति‍कारी हों, वे मूलत: लोकतंत्र वि‍रोधी हैं और राजनीति‍क और सामाजि‍क अपराधी की कोटि‍ में रखे जाने योग्‍य हैं। नागरि‍कों के जीवन , संपत्‍ति‍, वातावरण,रहन-सहन, स्‍वतंत्रताओं के हनन को ‘जनउभार’ कहना सही नहीं है। माओवादि‍यों की कार्यशैली मूलत: माफि‍या सरदारों से जैसी होती है,उसमें ‘क्रांति‍’ ‘जनउभार’ और ‘सामाजि‍क परि‍वर्तन’ के तर्क खोजना एकसि‍रे से गलत है। ‘क्रांति‍कारी’ भय पैदा करके,दमन करके,दंडि‍त करके यदि‍ वर्चस्‍व स्‍थापि‍त करना चाहेंगे तो बुर्जुआ राज्‍य उन्‍हें चैन की नींद सोने नहीं देगा चाहे उसके लि‍ए जो भी कीमत अदा करनी पड़े। हमें यह मानना पडे़गा कि‍ भारत में लोकतंत्र की पुख्‍ता बुनि‍याद है और उसमें सबके लि‍ए जगह है आप राजनीति‍ करें,संगठि‍त करें,जनता के लि‍ए संघर्ष करें और लोकतंत्र बनाए रखें, भारतीय लोकतंत्र में प्रति‍वाद और वि‍कल्‍प राजनीति‍ के लि‍ए पर्याप्‍त जगह है।माओवाद के भारतीय संस्‍करण स्‍वभावत: भारतीय मनोदशा के वि‍परीत हैं।
( उपरोक्‍त वि‍चार प्रसि‍द्ध नक्‍सलनेता संतोष राणा के 'काफि‍ला' वेबसाइट पर प्रकाशि‍त लेख के संदर्भ में व्‍यक्‍त कि‍ए गए हैं,उस लेख को देखने के लि‍ए kafila पर जाएं। )

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