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रविवार, 8 मार्च 2015

किसान के हक में

       किसान का नाम आते ही राजनीति का रोमांस गायब हो जाता है। किसान के सवाल आते ही राजनीति की वर्गीयबुनाबट खुलने लगती है। लोकतंत्र के विभ्रम टूटने लगते हैं। किसानों का नंदीग्रामप्रतिवाद हाल के वर्षों का ऐसा आंदोलन रहा है जिसने मनमोहन सरकार को पुराना भूमिअधिग्रहण कानून बदलने के लिए मजबूर किया था। जबकि पुराने कानून के तहत सारे देशमें तकरीबन दस लाख एकड़ जमीन विभिन्न सरकारें किसानों से छीनकर कारपोरेट घरानों कोसौंप चुकी थीं। नंदीग्राम आंदोलन ने वाम राजनीति को शिखर से लेकर नीचे तक बुरी तरहक्षतिग्रस्त किया। उस आंदोलन के बाद मनमोहन सरकार ने नया भूमि अधिग्रहण कानूनबनाया था,जिसे पिछली संसद पास कर चुकी थी, नई मोदी सरकार को उसे लागू करना थालेकिन मोदी सरकार ने उसे लागू करने के पहले ही खत्म कर दिया और नया भूमि अधिग्रहणअध्यादेश जारी कर दिया,यह अध्यादेश क्या है इसके परिणाम क्या होंगे इस पर मीडियामें बहुत सार्थक और सटीक सामग्री और सूचनाएं आ रही हैं,यह किसानों के  पक्ष में मीडिया की सकारात्मक भूमिका को सामनेलाता है। इस कानून के खिलाफ बृहत्तर राष्ट्रीय एकता भी बनती नजर आ रही है। जरुरतहै इस कानून के खिलाफ जनांदोलन तेज करने की । भाजपा के दुरंगेपन को नंगा करने की ।

     उल्लेखनीय है कि मनमोहनसरकार में निर्मित भूमि अधिग्रहण कानून को भाजपा ने पूर्ण समर्थन दिया था,यहां तककि संपूर्ण विपक्ष ने समर्थन दिया था, वह कानून संसद की आम सहमति से बना था, मोदीसरकार ने बिना किसी कारण के उस कानून को लागू करने के पहले ही खत्म करके नयाअध्यादेश जारी करके संसद का अपमान किय़ा है, राजनीतिक सहमति को तोड़ा है और इससे भीबड़ी बात यह है कि यह मसला भाजपा के चुनाव घोषणापत्र में नहीं था। जो मसला चुनावघोषणापत्र में नहीं है उसे मोदी सरकार जोर-जबर्दस्ती से पास करना चाहती है । यदियह कानून इतना ही जरुरी था तो भाजपा ने अपने घोषणापत्र में इसका जिक्र क्यों नहींकिया ? मोदी ने अपने भाषणों में इस तरह का कानूनलाने की मंशा जाहिर क्यों नहीं की ?
        सवाल यह है मोदी सरकारइतने उतावलेपन से कानून क्यों बदलना चाहती है ? क्यादेश के कारपोरेट घराने देश में पैसा निवेश करने के लिए इतने बेचैन हैं कि उनकोरातों-रात देश की जमीन कौडियों के भाव पर सब कानून तोड़कर दे दी जाय ? हम जानना चाहते हैं कि भारत के कारपोरेट घरानों को विगत मनमोहन सरकारने जो जमीन आवंटित की थी क्या उस पर कारखाने लगाए गए हैं ? क्याजो जमीन भारत सरकार ने विकास के नाम पर किसानों से ली है उस पर काम हो रहा है ? यदि पुरानी जमीन खाली पड़ी है और कारपोरेट घराने वायदा नहीं निभा पाएहैं तो फिर नई जमीन हासिल करने के लिए वे बैचैन क्यों हैं ? हमारे देश में लाखों बीमार-बंद कारखाने हैं पहले उनको चंगा करने की ओरकारपोरेट घराने ध्यान क्यों नहीं देते ? वे नई जमीनें क्यों हड़पना चाहते हैं ?क्या जमीनें खरीद लेनेभर से विकास होता है ? क्या हाउसिंग सोसायटियों के बनाने सेदेश का विकास होगा ? क्या इससे देश की उत्पादन क्षमता बढ़ेगी ? क्या किसान औरमजदूरों की उत्पादकता में बढोतरी होगी ?
    अब तक का अनुभव बताता है कि किसानों से विगत सरकारों के जरिए हथियाई गई दसलाख एकड़ से ज्यादा जमीन के बावजूद देश की उत्पादकता में कोई इजाफा नहीं हुआ है।नए कारखाने बहुत कम इलाको में खुले हैं, अधिकतर सेज के इलाके सूने पड़े हैं । मोदीसरकार कम से कम सीएजी की रिपोर्ट को ही गंभीरता से देख लेती तो उसे सेज प्रकल्पोंकी दशा का अंदाजा लग जाता। लेकिन मोदी सरकार ने तो तय कर लिया है हर हालत में राष्ट्रीयसंपदा और संसाधनों को कारपोरेट घरानों के हाथों में सौंप देना है। इससे आरएसएस काहिन्दूमार्ग भी आसानी से समझ में आ सकता है। आरएसएस कहने के लिए राष्ट्रवादी होनेका दावा करता है लेकिन उनका हिन्दू नायक जब पीएम बनता है तो खुलकर किसानों औरगरीबों की संपदा पर डाकेजनी का कानून बनाकर पेश करता है। यह मजेदार तथ्य है किआरएसएस के नियंत्रण में केन्द्र सरकार के आने के बाद से सबसे खुशहाल हैं कारपोरेटघराने। कारपोरेट घरानों को जितना फायदा मिला है और उनकी संपदा में जिस तेज गति सेइजाफा हुआ है उसने संघ को कारपोरेट संघ में रुपान्तरित कर दिया है।
    हमें किसानों के पक्ष में बिना किसी संशय के सोचना चाहिए। किसान के मसलोंके लिए जो भी संगठन संघर्ष करें, जो भी नेता लड़े , हमें उससे सहयोग करना चाहिए।किसान के सवाल और खासकर किसान की जमीन को विकास के नाम पर हथियाने के सभी प्रयासोंको हर स्तर पर विफल करने की जरुरत है । मोदी सरकार का भूमि अधिग्रहण अध्यादेशवस्तुतः किसान और विकास विरोधी है। यह देश के साथ भाजपा की गद्दारी का आदर्शप्रमाण है। यह आरएसएस के दुरंगेपन का भी आदर्श प्रमाण है ।     

        

बुधवार, 29 जून 2011

ममता सरकार की आर्थिक चुनौतियां


              ममता सरकार ने हाल ही में जो नए आर्थिक कदम उठाए हैं उनमें सबसे महत्वपूर्ण है नव्य उदार आर्थिक नीतियों के प्रति खुला समर्थन। यह समर्थन पिछली सरकार की नीतियों के क्रम में ही आया है। ममता सरकार ने विधानसभा में जो बजट पेश किया है वह कमोबश पुरानी सरकार का बनाया हुआ है। इसमें कोई नई चीज नहीं है। बल्कि कुछ लोग जो नए की उम्मीद कर रहे थे उन्हें निराशा हाथ लगी है। बजट प्रस्तावों में प्रत्येक मद में औसतन 10फीसदी की बढोतरी का वाम जमाने का फार्मूला बरकरार है। नए वित्तमंत्री ने पुराने वित्तमंत्री द्वारा बनाई लक्ष्मणरेखा का अतिक्रमण नहीं किया है। एक नई चीज है राज्य में 17 नए औद्योगिक केन्द्रों का निर्माण। सवाल यह है कि राज्य के अंदर क्या इतने बड़े पैमाने पर औद्योगिक विकास की संभावनाएं हैं ?
वाम शासन ने एक जमाने में इस दिशा में सोचा था लेकिन यह योजना बुरी तरह पिट गयी। ममता सरकार को कायदे से पहले उन तमाम व्यापारिक समझौतों को उठाना चाहिए जो पिछली सरकार ने किए थे। उन प्रकल्पों में काम आरंभ करने के प्रयास करने चाहिए जिनको तृणमूल कांग्रेस के नेताओं-माओवादियों ने धमकी देकर बंद करा दिया था। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है जिंदल ग्रुप का सालबनी इस्पात प्रकल्प। यह प्रकल्प चालू कराने में यदि ममता सरकार सफल होती है जो इससे राज्य में उद्योग जगत का विश्वास लौटेगा साथ ही ममता सरकार को माओवादियों का भी कद छोटा करने का मौका मिलेगा। साथ ही उन कारखानों के निर्माण पर जोर देना चाहिए जहां विवाद नहीं है। विवाद के क्षेत्रों से बचना चाहिए। ममता सरकार की अच्छी बात है कि इसमें नव्य आर्थिक उदारीकरण के पक्षधर और विरोधी दोनों ही वामविरोध के कारण शामिल हैं। इससे नव्य आर्थिक उदारीकरण के खिलाफ चले आ रहे प्रचार अभियान को धराशायी करने में उन्हें मदद मिलेगी। इससे अमेरिका,ब्रिटेन आदि खुश होंगे और यहां पर विदेशी पूंजी निवेश भी बढ़ेगा।
ममता सरकार ने जिस तरह केन्द्र सरकार द्वारा गैस के दामों में 50 रूपये की बढ़ोतरी को अस्वीकार किया और राज्य में गैस पर 16 रूपये कम किए हैं। उससे वामशासन की वैट कम करने की नीति का ही विस्तार हुआ है। वामशासन ने एकबार पेट्रोल-डीजल के दामों पर एक रूपया वैट कम करने का फैसला किया था इसी मार्ग पर चलते हुए राज्य सरकार ने गैस पर 16 रूपये कम करने का फैसला किया है। कायदे से केन्द्र में तृणमूल कांग्रेस को दबाब की कोशिश करनी चाहिए थी,लेकिन केन्द्र सरकार पर दबाब न डालकर ममता सरकार ने संदेश दिया है कि वह डीजल-गैस-कैरोसीन के दामों में की गई बढोतरी के बारे में एकमत है, लेकिन स्थानीय राजनीतिक दबाब और पापुलिज्म के एजेण्डे के चलते 16 रूपये कम कर रही है।  नई बढ़ोतरी से गैस के दामों में नाममात्र की राहत मिलेगी लेकिन इससे फंड के लिए परेशान राज्य को 75 करोड़ रूपये का नुकसान उठाना पड़ेगा।
    ममता सरकार को पापुलिज्म पर अंकुश लगाना होगा। पापुलिज्म के आधार पर भीड़ जुटायी जा सकती है। आंदोलन हो सकता है लेकिन अर्थव्यवस्था को नहीं चलाया जा सकता। आने वाले महिनों में गैस ,डीजल और पेट्रोल के दामों में और भी बढोतरी होगी तब राज्य सरकार क्या करेगी ? ममता सरकार को आर्थिक नीतियों के मामले में तदर्थवाद से बचना चाहिए। इसी तरह पिछली वाम सरकार द्वारा अधिग्रहीत जमीन के मामले में भी पापुलिज्म से बचना होगा। ममता सरकार ने नई भूमिनीति के तहत राजारहाट इलाके में 1,795 एकड़ जमीन के सरकारी अधिग्रहण नोटिसों को वापस ले लिया है। इस संदर्भ में उन्हें यह पक्ष ध्यान में रखना चाहिए कि जिन जमीनों का अधिग्रहण वापस लिया है उससे क्या औद्योगिक घरानों के पूंजी निवेश और चालू योजनाओं पर असर होगा ? ममता सरकार का भूमि अधिग्रहण नोटिस वापस लेना स्वयं में अनेक बुनियादी किस्म की समस्याओं को जन्म देगा ? मसलन् राज्य में उद्योगों के लिए राज्य सरकार ने जो जमीनें विगत वर्षों में किसानों  से अधिग्रहीत की हैं क्या वे सब जमीनें भी किसानों को वापस देदी जाएंगी ? क्या इससे औद्योगिक विकास होगा ? अथवा वामशासन में पैदा हुआ निरूद्योगीकरण और बढ़ेगा ? एक जमाने में वाम मोर्चा यही सोचता था कि किसानों की जमीन उनके पास रहे और वे उसका जैसे चाहें इस्तेमाल करें। लेकिन इससे राज्य लगातार पिछड़ता चला गया,किसानी में गिरावट आयी।
बड़ी संख्या में किसानों ने खेती बंद कर दी है। खेती से उनका गुजर-बसर नहीं हो रहा है। राज्य में विगत 34 सालों में खेती करने वाले किसानों की संख्या में कमी आयी है। ममता सरकार यदि किसानों को जमीनें वापस दिलाकर खेती के काम में ठेलना चाहती है तो इससे किसानों के जीवन में खुशहाली नहीं आएगी।  आज के दौर में किसानी फायदे का सौदा नहीं है।नेशनल सेम्पिल सर्वे के अनुसार राज्य में सन् 1987-88 में 39.6 प्रतिशत भूमिहीन मजदूर परिवार थे जो सन् 1993-94 में बढ़कर 41.6 प्रतिशत और 1999-2000 में 49.8 प्रतिशत हो गए। पश्चिम बंगाल में विभिन्न कारणों से पट्टादार और बर्गादार का जमीन से संबंध टूटा है। तेजी से पट्टादार और बरगादार किसानी छोड रहे हैं। सन् 2001 तक 13 प्रतिशत पट्टादार और 14 प्रतिशत बर्गादार खेती छोड़ चुके थे। दक्षिण 24 परगना में 22 प्रतिशत पट्टादार ,11 प्रतिशत बरगादार ,उत्तर 24 परगना में 17 प्रतिशत पट्टादार , 17 प्रतिशत बरगादार,बर्धमान में 12 प्रतिशत पट्टादार,15 फीसदी बरगादार,उत्तर दिनाजपुर में  23 प्रतिशत पट्टादार और 32 प्रतिशत बर्गादार, दक्षिण दिनाजपुर में 20 प्रतिशत पट्टादार और 31 प्रतिशत बरगादार ,दार्जिलिंग में 15 प्रतिशत पट्टादार और 16 प्रतिशत बरगादार,जलपाईगुड़ी में 17 प्रतिशत पट्टादार और 32 प्रतिशत बरगादार,कूचबिहार में 13 प्रतिशत पट्टादार और 31 फीसदी बरगादार, मालदा में 11 फीसदी पट्टादार 7 फीसदी बरगादार,मुर्शिदाबाद में 16 प्रतिशत पट्टादार और 19 प्रतिशत बरगादार खेती करना छोड़ चुके हैं। यानी जब किसानों में किसानी का रूझान घट रहा तब उन्हें किसानी की ओर धकेलने के प्रयास सफल नहीं हो सकते।

           



शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

किसान ज्ञान परंपरा- झारखंड के किसान -स्वामी सहजानंद सरस्वती

    बिहार प्रान्त को असल में 'बिहार और छोटानागपुर' के नाम से ही पुकारा जाता है। यों कभी-कभी संक्षेप में केवल 'बिहार' भी कह देते हैं। जब उड़ीसा का सम्‍बन्‍ध बिहार से था तब तो 'बिहार और उड़ीसा' अकसर कहा जाता था। मगर उड़ीसा के अलग हो जाने के बाद केवल 'बिहार' के बजाए 'बिहार और छोटानागपुर' कहना ही उचित प्रतीत होता है। यों तो उड़ीसा के मिले रहने पर भी कभी-कभी केवल 'बिहार' ही कहते थे। चाहे जो भी हो, छोटानागपुर का महत्‍व काफी है और जान या अनजान में इसकी याद हमेशा बनी रही है।

    बात असल यह है कि इस प्रान्त के कुल सोलह जिलों में सिर्फ सारन, चम्पारन, दरभंगा, मुजफ्फरपुर और पूर्णिया यही पाँच ऐसे हैं जहाँ पहाड़ नहीं हैं। शेष ग्यारह में तो कमोबेश पहाड़ पाए ही जाते हैं। यह ठीक है कि छोटानागपुर के पाँच जिलों पलामू, राँची, हजारीबाग, मानभूम और सिंहभूमतथा संथाल परगना, इन छह जिलों की भूमि जिस प्रकार पार्वत्य या पहाड़मयी है वैसी गया, मुंगेर आदि की नहीं है। ये छह तो पहाड़ों और जंगलों से घिरे हैं। मगर गया वगैरह के कुछ ही हिस्से पहाड़ी हैं। फिर भी यह बात सही है कि ये जिले भी अपने भीतर कुछ न कुछ जंगल और पहाड़ रखते ही हैं। पटना जिले में ही सबसे कम पहाड़ और जंगल हैं। इस प्रकार जंगलों की प्रधानता का खयाल करके ही पलामू आदि छह जिलों को बहुत पहले से झारखंड कहते चले आते हैं। बाकी जो ग्यारह जिले बच जाते हैं उनमें या तो जंगल पहाड़ ही नहीं, या बहुत ज्यादा नहीं हैं। यह भी बात है कि उनमें बौद्धकाल में बौद्ध भिक्षुओं के रहने और पढ़ने आदि के लिए जगह-जगह मठ या मकान प्राय: बने रहते थे जिन्हें बौद्ध सम्प्रदाय में विहार कहते हैं। इसीलिए वे ग्यारह जिले विहार कहे जाने लगे। असल में तो इस लम्बे सूबे को दो भागों में बाँटकर जैसे जंगली भाग को झारखंड कहते थे वैसे ही दूसरे भाग को विहार खंड ही कहना उचित था। मगर जाने क्यों केवल 'विहार' ही कहा जाता था।

    इस प्रकार बिहार या विहार खंड और झारखंड के नाम से दो भागों में बँटे इस सूबे में विहार खंड के किसानों की दशा सुधारने की कोशिशें तो इध्‍यानर बहुत हुई हैं। मगर यह बात झारखंड के बारे में नहीं हुई है। बिहार प्रान्तीय किसान सभा ने भी उतना ध्‍यान इस ओर नहीं दिया है जितना विहार खंड की ओर। फलत: और तो और, बाहरी लोगों को यहाँ के किसानों की समस्याओं तथा मुसीबतों की जानकारी तक प्राय: हुई नहीं! थोड़ी बहुत टूटी-फूटी बातें ही लोग जानते हैं। कभी-कभी कोई उथल-पुथल हो जाने पर ही कुछ नई बातें मालूम हो पाती हैं। जिसे पक्की और ब्यौरे की जानकारी कहते हैं वह तो फिर भी नहीं होती। वहाँ के असली निवासी, जिन्हें आदिवासी भी कहते हैं, आमतौर से मूक जैसे हैं। पढ़ने-लिखने की तो बात ही जाने दीजिए। उनकी भाषा ऐसी है कि दूसरे लोग समझी नहीं सकते। उनके रस्मोरिवाज भी निराले ही हैं। वे सीधे भी हद से ज्यादा हैं।
यह प्रान्त तो बड़ा है नहीं। कुल सोलह जिले हैं। जनसंख्या भी प्राय: साढ़े तीन (36340000) करोड़ ही है। मगर जहाँ तक किसानों की बात है, यहाँ तीन तरह के काश्तकारी कानून लागू हैं। बिहार काश्तकारी कानून Bihar Tenancy Actसिर्फ विहार खंड के दस जिलों में ही लागू है। उसका ताल्लुक झारखंड से ही नहीं। झारखंड में भी दो कानून हैं। संथाल परगनाको छोड़ बाकी पाँच जिलों में छोटानागपुर काश्तकारी कानून Chotanagpur Tenancy Act—प्रचलित है और उसी के अनुसार वहाँ काम होता है। मगर संथाल परगनाकी तो बात ही निराली  हलत मुरारेस्तृतीय: पन्था: है। इन दोनों में एक भी वहाँ लागू नहीं है। उस जिले के लिए एक तीसरी ही कानूनी व्यवस्था है जिसे संथाल परगना मैनअल Santhal Pargana Manualकहते हैं। उसी के अनुसार वहाँ का इन्तजाम होता है। यह मैनुअल भी बना है ज्यादातर 1872 और 1886 के नियम कायदों (Regulations) के आधार पर ही। झारखंड की पेचीदगी इसीलिए और भी बढ़ जाती है।

    बदकिस्मती की बात यह भी है कि वहाँ के मूल निवासियों का नेतृत्व दूसरों के ही हाथ में है। ईसाइयों के जाने कितने ही मिशन वहाँ बहुत दिनों से काम करते हैं। उनने ईसाइयत का प्रचार भी वहाँ काफी किया है। अतएव एक तो वही लोग वहाँ के किसानों का नेतृत्व करते आए हैं। उनके सिवाय समय-समय पर सूबे के उत्तारी भाग या विहार खंड से भी पढ़े-लिखे सूदखोर बनिए या व्यापारी लोग वहाँ समय-समय पर बसते गए हैं। वकील, मुख्तार या और तरह के पढ़े-लिखे लोग, या तो वही हैं या बंगाली। अबरक, कोयला, लोहा वगैरह के कारबार और लाह या लकड़ी के रोजगार के सिलसिले में भी सभी तरह के लोग भारत के कोने-कोने से ही नहीं, बल्कि दूसरे देशों से भी आके वहाँ बस गए हैं। इसलिए स्वभावत: ऐसे लोग उन गरीबों के अगुवा बनने की कोशिश करते हैं। कांग्रेस जैसी प्रभावशाली संस्था के जितने प्रमुख नेता झारखंड में हैं वे सभी बाहर वाले ही हैं।

    आदिवासी आन्दोलन के रूप में आज एक संस्था वहाँ खड़ी हो गई है सही और उसका नेतृत्व भी आदिवासियों के हाथ में ही बताया जाता है। कई ऐसे लोग भी हैं जो आदिवासी ही हैं और किसान सभा के नाम पर उनने एक संस्था भी बना ली है। मगर उनका नेतृत्व निहायत लचर और अवसरवादी है। वे किसानों को उठाना नहीं चाहते। किन्तु अपना काम निकालना चाहते हैं। आदिवासी आन्दोलन की कमी यह है कि शुद्ध मध्‍यमवर्गीय ढंग से ही चालू हो रहा है। यदि वह किसानों के वर्ग स्वार्थों के ही आधार पर चालू होता तो उसमें अपार शक्ति आ जाती और वह सचमुच झारखंडवासियों का निस्तार ही कर देता।

    यही कारण है कि असलियत का पता नहीं लग पाता और घपले बढ़ गए हैं। मैं शुद्ध किसान हित के खयाल से ही वहाँ की स्थिति पर प्रकाश डालना चाहता हूँ ताकि उस अन्‍धेरीगुफा की झाँकी हमें मिले। हमें और हमारे कार्यकर्ताओं को सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वहाँ के निवासियों के अभाव-अभियोगों को जानते ही नहीं। वहाँ के काश्तकारी कानून की खास बात क्या है और उसमें क्या कमी है यह बात हमें मालूम नहीं। फिर उसके सुधार का आन्दोलन भी किया जाए तो कैसे? बाहरी लोगों की दृष्टि से वहाँ के काश्तकारी कानून में पेचीदगियाँ हैं। कांग्रेसी मंत्रियों के समय वहाँ का कानून भी बहुत कुछ सुधारा गया ठीक बिहार के काश्तकारी कानून के ही ढंग पर। मगर कितने मेम्बरों ने असेम्बली में उसे समझा भी, यह एक सवाल है। सिर्फ रस्मअदाई के खयाल से या दो-चार लोगों के कहने से ही जो कानून बने उससे हम लोगों का फायदा कहाँ तक कर सकते हैं? बिहार के कितने कांग्रेसी नेता हैं जो उन कानूनों को समझते हैं।

    जब तक हम वहाँ की असली परिस्थिति न जानें, लोगों की सबसे चुभने वाली माँगों की हमें पूरी जानकारी न हो, सरकारी महकमे वहाँ कैसे काम करते हैं, कचहरियाँ कहाँ तक किस तरह उन गरीबों के साथ मौजूदा कानून के अनुसार भी न्याय कर पाती हैं, इत्यादि बातें हम न समझें उनके लिए कुछ भी कर सकते हैं क्या और कैसे? आदिवासियों की भाषा न तो हाकिम समझते और न दूसरे ही लोग। बाहरी वकील, मुख्तार भी सिर्फ कामचलाऊ बातें ही जानते हैं। नतीजा यह होता है कि वे बेचारे बहुत बार नाहक लद जाते हैं। अंग्रेजी कानूनों की पेचीदगियाँ वे क्या जानने गए? यदि जानते तो बचाव का रास्ता भी निकालते। इधर तो उन्हें पता ही नहीं है उधर सख्त से सख्त सजाएँ उन पर लद जाती हैं। जेल में रहके उनसे बातें करने और उनके साथ बार-बार हिलने-मिलने पर पता चलता है कि वे किस बला में फँस गए हैं। अपने पक्ष का सबूत उनके पास मौजूद है सही। फिर भी ठीक समय पर या कायदे के मुताबिक वे हाकिम के सामने पेश न कर सके और लद गए! मगर वे इन कायदे-कानूनों को जानने क्या गए? उन्हें किसने ये बातें सिखाने की कोशिश कीं? कानून बनते हैं अंग्रेजी में और आदि जनता की तो बात ही नहीं, उनके जो खास सदस्य असेम्बली में चुने गए हैं उनमें शायद ही एकाध अंग्रेजी जानते हैं। बाकियों की तो हालत ज्यादातर 'लिख लोढ़ा पढ़ पत्थर' जैसी ही है। थोड़ी-बहुत हिन्दी जानने से भी काम तो नहीं चलता।

    ऐसी दशा में आगे जो कुछ लिखा जाएगा वह सबों की जानकारी के ही लिए। किसी दल या पार्टी या सम्प्रदाय के खंडन-मंडन से हमारा मतलब नहीं है। हमें तो अपना काम करना है। यदि हम झारखंड की जनता की और खासकर वहाँ के किसानों की कुछ भी सच्ची सेवा करना चाहते हैं तो सबसे पहले उस क्षेत्र की, उस अन्‍धेरी गफा no man's land की झाँकी लगाना और परिस्थिति समझ लेना जरूरी है। नहीं तो भटक जाने की पूरी सम्भावना है। वैसी हालत में केवल दो-चार ऊपरी बातों से ही हम सन्तोष कर के तह में घुसने की कोशिश करी नहीं सकते हैं। कहा नहीं जा सकता कि हमें इसमें सफलता कहाँ तक मिलेगी।



सेण्ट्रल जेल, हजारीबाग   स्वामी सहजानन्द सरस्वती

नवम्बर दिवस, शुक्रवार 7.11.41

सोमवार, 27 दिसंबर 2010

झारखण्ड में जमशेदजी टाटा और किसान- स्वामी सहजानंद सरस्वती

 ( प्रसिद्ध किसान नेता और अखिल भारतीय किसान सभा के संस्थापक अध्यक्ष स्वामी सहजानंद सरस्वती ने भारत के किसानों की समस्या पर गंभीरता के साथ विचार किया है। खासकर झारखण्ड राज्य के आदिवासी किसानों के जीवन का बारीकी से अध्ययन किया था। यहां हम उनके जमशेदजी टाटा और किसानों के संदर्भ में किए गए मूल्यांकन को पेश कर रहे हैं)

   झारखंड की बात अधुरी ही रह जाएगी यदि टाटा  का विशेष वर्णन न किया जाए। पारसनाथ पहाड़ के सिलसिले में जैनी सेठों की करतूतों का जिक्र तो होई चुका है। मगर टाटा  का महत्‍व उनसे कहीं ज्यादा है। टाटा  का यहाँ जमींदार और पूँजीपति दोनों ही हैसियत से प्रभाव है। लाखों मजदूरों पर उसकी हुकूमत चलती है। जाने कितने नेताओं और कार्यकर्ताओं को टाटा  ने अपने पाकेट में रख लिया है। ऐसा जादू चलता है कि सबों की बोलती ही बन्द हो जाती है और छोटे-बड़े सभी नेता वहीं जमशेदपुर में ही हजम हो जाते हैं। टाटा  की ही कृपा का फल है कि अब तक जाने कितने नेता जमशेदपुर के मजदूरों का संगठन करने गए और नाकामयाब रहे। नेताओं के प्रति जितना अविश्वास वहाँ के मजदूरों में है उतना और कहीं शायद ही है। फलत: वहाँ जोई जाता है उसी पर अविश्वास किया जाता है। 'धारी न काबू धीर सबके मन मन सिज हरे' वहीं चरितार्थ होता है। यह टाटा  की चातुरी और व्यवहार कुशलता का ज्वलन्त प्रमाण है।
    मगर मुझे तो किसान सभा के कार्यकर्ता की हैसियत से सिर्फ टाटा  की वही बातें लिखनी हैं जिसका ताल्लुक किसानों और सर्व साधारण से है। कारखाने और मजदूरों की दशा के बारे में लिखना इस पुस्तक का लक्ष्य भी नहीं है जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है। मैं उस विषय की विशेष जानकारी भी नहीं रखता। कांग्रेस की स्वराज्य पार्टी जब केन्द्रीय असेम्बली में थी तो टाटा  को सरकारी सहायता देने का प्रश्न उठा था। उसने इसका समर्थन किया। जब वहाँ के मजदूरों के हक में यह शर्त पेश की गई कि टाटा  कम्पनी उन्हें आराम पहुँचाने की गारंटी करे तभी सहायता दी जाए, तो इसका विरोध स्वराज्य पार्टी ने किया था और बिना शर्त ही सहायता का समर्थन किया। जब मजदूरों के सम्‍बन्‍ध में बड़े-बड़ों और ऐसी संस्थाओं की कार्यवाहियाँ पहेली की तरह खड़ी हो जाती हैं तो हमारे जैसा आदमी घबराता है और उस झमेले से अलग रहके किसानों का ही सवाल हल करने की कोशिश करता है। इसीलिए यहाँ भी वही सवाल है। जमशेदपुर के पुराने मजदूर लीडर कहे जाने वाले मिस्टर होमी को भी हम किसानों के ही सिलसिले में याद रखना चाहते हैं। इसीलिए उनका भी थोड़ा उल्लेख होगा। मगर इस सम्‍बन्‍ध में सिंहभूम जिला किसान कान्फ्रेंस, घाटशिला में 3, 4 जुलाई 1939 को हमने जो भाषण दिया था उसे ही यहाँ उध्दृत करके सन्तोष कर लेना चाहते हैं। ज्यादा कहने की जरूरत नहीं प्रतीत होती है। वह इस तरह हैµ
    'बाहरी दुनिया की नजरों में तो आमतौर से टाटा  का काम है जमशेदपुर में केवल इस्पात वगैरह तैयार करना और इस तरह टाटा  कम्पनी सबसे बड़ी पूँजीवादी है। टाटा  से ताल्लुक रखने वाले और किसानों के लिए दिल रखने दूसरे लोगों में भी चन्द लोग ही ऐसे हैं जो यह जानते हैं कि टाटा  कम्पनी जमींदार भी है और प्राय: बीस छोटे-बड़ें गाँवों से, जो जमशेदपुर में और इर्द-गिर्द शामिल हैं, बीस-पच्चीस लाख लगान वसूलती है। इन गाँवों के नाम हैं उलियान, भाटिया, गोभरोगोड़ा, सोनाड़ी, खुटाड़ी, बेलड़ी, जोजाबेरा, साकची, बारा, बारीडीह, महरड़ा, मुड़कटी, निलदी, कालीमाटी, सुसनिगड़िया, गोलमुड़ी, सिद्धगोड़ा वगैरह। इनके कष्ट वर्णनातीत हैं। टाटा  के लिए सरकार ने इन मौजों को 1919-20 में ले लिया। आगे इन गाँवों के कुछ भयंकर कष्टों का वर्णन वहीं के लोगों के शब्दों में किया जाता है। उनने मेरी जमशेदपुर की अप्रैल वाली उसी साल की यात्रा के समय मुझे जो कुछ लिख के दिया था वही यहाँ लिख दिया जाता है। उनका कहना है कि 'जमशेदपुर और आसपास के जो गाँव पहले दलभूम के राजा के मातहत थे हम उन्हीं के शुरू के ही बाशिन्दे हैं। कम्पनी के लिए सरकार ने इन्हें तथा और गाँवों को 1919-20 में ही राजा से हासिल किया था। कम्पनी ने हमें कहा कि आप लोग पूर्ववत् पड़े रहें। क्योंकि हमें अपने ही लिए आपकी सेवाओं की मजदूर, गाड़ीवान, साग-तरकारी उपजाने वाले आदि के रूप में जरूरत है। इसलिए गाँवों का राजा से लिया जाना तो केवल कागजी लिखा-पढ़ी है। स्थिति में अन्तर न होगा।
    1906-09 के सर्वे में जो लगान ठीक था उसे इस कम्पनी ने इन गाँवों को बाकायदा दखल करने के बाद, धीरे-धीरे बढ़ाना और हमारी जमीनों से भारी लगान वसूलना शुरू कर दिया। उस समय तो हमने यह चीज किसी तरह बर्दाश्त की। क्योंकि उस समय चावल, साग, तरकारी वगैरह की कीमत काफी ऊँची थीं।
    'चन्द साल के बाद, जब कि बिना हमारी मदद के भी कम्पनी का कारबार चलने लगा, उसने हमें अपने झोंपड़ों और घरों वगैरह से निकाल के अपने काम के लिए सबकुछ कब्जाना चाहा। फलत: तरह-तरह से हमें परेशान किया जाने लगा। 1932 में लगान न देने के बहाने हमारी बेदखली के केस किए गए। मगर हम लोग सभी केस जीत गए। तब बल प्रयोग शुरू हुआ और इसके चलते कम्पनी का जो प्रधान रूप से इस शहर का प्रबन्धक है। वही नोटिफाइड एरिया कमिटी का चेयरमैन भी है। वह कुछ औरों के साथ नाजायज दूसरे के घर आदि में घुसने के लिए फौजदारी में भी फँसा था और हाईकोर्ट तक सजा बहाल रही। उसके बाद हम लोगों के विरुद्ध 145 धारा के अनुसार फौजदारी के बहुत ज्यादा मुकदमे चलवाए गए। मगर उनमें भी हम जीते।
    'अब जमशेदपुर एरिया कमिटी की ही मदद से हमें तंग करने लगे हैं। कहा जाता है कि इस कमिटी के इलाके के भीतर हैं। मगर इस म्यूनिसिपलिटी का कोई भी फायदा तो पहुँचता नहीं। हाँ, इससे हमारी दिक्कतें जरूर बढ़ गई हैं।
    'अपने छप्परों को फिर से छाने में भी हमें प्लान बनवाने और कमिटी से मंजूरी लेने को कहा जा रहा है। हमें साफ पीने का पानी तो मिलता नहीं। गंदा पानी हममें बीमारियाँ फैला रहा है। मगर कुऑं खोदने की हमें इजाजत नहीं! हमारे न तो सड़कें हैं, न रोशनी और न मेहतरों का प्रबन्ध। हमारे गाँवों में पढ़ाने के प्रबन्ध की तो बातें ही मत पूछें।
    'हमारे यहाँ जो पड़ती जमीनें चरागाह के काम आती थीं वे गत साल से जोत-जात के ईंटों के बनाने के लिए कम्पनी के द्वारा ठेके पर दी जाने लगी हैं। इसका तो सीधा अर्थ है कि हम खेती के जानवरों को खत्म कर दें। क्योंकि अड़गड़े में डाले जाने के डर से उन्हें बाहर तो निकाल सकते नहीं। कम्पनी की इस करतूत ने हमें सबसे ज्यादा परेशान किया है। क्योंकि पशुओं के बिना तो खेती हो नहीं सकती। फलत: हमें गाँव छोड़ के भागना पड़ेगा। इन कारणों से और लगान की कड़ाई के चलते भी हम उसे चुकता कर पाते नहीं। फलत: हमारी बहुत सी जमीन नीलाम हो रही है। आज जो लगान है वह दलभूम के मौजूदा लगान से चौगुना और सर्वे के लगान से पूरा दस गुना है। यह बात नीचे की तालिका से साफ हो जाती है। धानी (धान की जमीनों) और बारी या भीठे (गोड़ा) जमीनों के लगान की दर अलग-अलग दी गई है।
दलभूम का लगान फी बीघा   कम्पनी का लगान फी बीघा
धानी अव्वल नम्बर एक रुपया   चार रुपया, तीन रुपया, दो रुपया और
धानी दोयम नम्बर आठ आना   तीन रुपया क्रमश: इन्हीं चारों जमीनों का।
धानी सोयम नम्बर छह आना    साग तरकारी वाली का तो आठ रुपया है।
गोड़ा जमीन दो आना     सभी गाँवों में कम्पनी की दर एक-सी नहींहै।
    ''साकची तो जमशेदपुर शहर का ही हिस्सा है। इसीलिए वहाँ के लोगों को बाजार, आबपाशी और सड़क वगैरह की आसानी भी है जो अन्य गाँवों को नहीं है। मगर वहाँ का लगान कम है और कम्पनी के ही एक अफसर ने कबूल किया है कि दूसरे गाँवों के किसानों को सभी दिक्कतें बढ़ी-चढ़ी हैं। देखिए

साकची की धानी अव्वल का उल्यान, मांटिया, गोभरागोड़ा का
लगान तीन रुपया        चार रुपया।
साकची की धानी दोयम का उल्यान, मांटिया, गोभरागोड़ा का
लगान करीब सवा दो।     तीन रुपया।
साकची की धानी सोयम   उल्यान, मांटिया, गोभरागोड़ा का दो रुपया
साकची गोड़ा अव्वल डेढ़ रुपया    इन तीन गाँवों की सभी तरह की गोड़ा
साकची गोड़ा दोयम सात आना   जमीनों का लगान तीन रुपया फी बीघा।
साकची गोड़ा सोयम सवा दो आना साग तरकारी का आठ रुपया फी             बीघा
    'टाटा  कम्पनी के मिल का निकला हुआ पानी नदी को गन्दा करता है। मगर क्या मजाल कि किसान उससे अपना खेत पटा लें? गाड़ी पर टैक्स है और जानवरों के मरने पर उन्हें हटाने के लिए जो पाँच रुपया टैक्स है वह तो हमें तबाह कर रहा है।
    'सिंचाई की सुविधा पहले थी। मगर अब नहीं रही। लगान की बाकायदा रसीद नहीं मिलती। छह मास हुए हम बिहार के अर्थमंत्री से और बाद में प्रधानमंत्री के पास भी लिखित प्रार्थना ले के पहुँचे थे। मगर नतीजा अब तक कुछ मालूम नहीं हुआ!' इस लम्बी दास्तान पर टीका-टिप्पणी बेकार है।
    अब जरा मिस्टर होमी की बात सुनिए। अब तक तो यही सुना जाता था कि मिस्टर होमी यहाँ के मजदूरों की लीडरी का दावा करते हैं और दूसरे लोग इसका विरोध करते हैं। यह तो उन्हीं का काम है जो मजदूर हैं कि फैसला करें कि किसे वे अपना लीडर मानते हैं। हमें तो उनके बारे में पड़ोस के ही मानभूम जिले के पोटम्बा थाने के गाँव माँगों के जमींदार या मुकर्ररीदार के रूप में ही यहाँ सामने लाना और कुछ सुनाना है। मानगो गाँव सुवर्ण रेखा नदी के उस पार ही यहीं है। पिछली बार जो मैं वहाँ गया था और पता लगाया तो मालूम पड़ा कि उस गाँव पर जो उनने मुकर्ररीदार का दावा ठोंक दिया है उसके चलते वहाँ के किसानों और कमिया लोगों को बड़ा कष्ट है। श्री मानिक होमी के भाड़े वाले आदमी किस तरह वहाँ के लोगों को सताते और जलील करते हैं इसकी दर्दनाक कहानी वहाँ के स्‍त्री-पुरुषों और श्री क्रिस्टो गौड़ प्रधान ने रो-रो के कह सुनाई। उस जुल्म के बारे में अपनी ओर से कुछ न कह के न्यायालय के दो फैसलों के कुछ अंश उध्दृत कर देता हूँ और मामला साफ हो जाएगा। यह गाँव मानभूम जिले के किनारे पर थाने से सोलह मील पर पड़ता है। इसलिए चालाक और चलते पुर्जे यार लोग यहाँ के हो और भूमिज आदि निवासियों को खूब ही सताते हैं। पहला फैसला पुरुलिया के एस.डी.ओ. मिस्टर एस.के.अहसान का लिखा हुआ अंग्रेजी में है। दूसरा फैसला मिस्टर बी. के. गोखले, डिस्ट्रिक्ट मजिस्टे्रट मानभूम का 5.9.27 का है। दोनों का हिन्दी अनुवाद ही दिया जाता है। पहला यों है
    'पुलिस की रिपोर्ट में होमी और उसके आदमियों के विरुद्ध यह शिकायत थी कि होमी, उसके आदमी और उसी के साथी कुछ और लोग भी किसानों को अनेक ढंग से सताते हैं और धामका के, मारपीट के और जबर्दस्ती रुपया वसूल के दिक करते हैं।
    'अपनी पार्टी की तरफ से उसने साफ-साफ यह शर्त कबूल की है कि बिना अदालती कार्यवाही के दूसरे ढंग से हम लोग अपना अधिकार जबर्दस्ती न चलाएँगे और न किसी को सताएँगे ही, जैसा कि इलजाम है। इसलिए इस समय तो मैं उनके खिलाफ कोई कार्यवाही न करता। मगर इसी के साथ मिस्टर होमी और उनके आदमियों को साफ-साफ चेतावनी देता हूँ कि किसानों को, फिर चाहे वह कोई भी हों, वे लोग किसी भी तरह दिक या परेशान हर्गिज न करें। इस हुक्म की एक नकल पोटम्बा के थानेदार के पास भेजी जाए। ताकि यदि वे लोग अपना वादा तोड़ें तो वह उनके खिलाफ रिपोर्ट करे।'
    दूसरा केस का, जो 1936 के स्फुट केसों में 309 का है, फैसला यों है
    'जो कुछ सबूत है उससे मुझे पता चलता है कि मिस्टर होमी जंगल और पेड़ों को अपनी निजी जायदाद मानता है जिन्हें जब जैसे चाहे काट सकता है और गाँव वालों के जो परम्परा प्राप्त अधिकार जंगल पेड़ों में हैं उन्हें उनका उपभोग रोकना चाहता है। इसी तरह गैर आबाद जमीन के बारे में भी वह किसानों को रोकना चाहता है कि आबाद न करें। हालाँकि प्रधानी प्रथा के अनुसार उन्हें यह अधिकार है कि आबाद करें और उसके लिए उचित लगान दें। मिस्टर होमी का अपना बयान है कि मुझे पता नहीं कि किसान लोग आबाद की गई जमीनों का मुनासिब लगान देना चाहते हैं।' इससे पता चलता है कि पुश्त दर पुश्त से वहाँ रहने वाले किसानों से कोई वास्ता न रख के वह अपने मन के ही लोगों को वहाँ बसाना चाहता है। इसलिए समस्त ग्रामवासी इसे खामख्वाह नापसन्द करते हैं। पुलिस सुपरिंटेंडेंट को जो पत्रे मिस्टर होमी ने 26.1.27 को लिखा था उसके पाँचवें पैराग्राफ में लिखा है कि 'हमने जो पहले पहल दो हजार एकड़ जमीन हासिल की थी उस समूची को एक आदर्श फार्म बनाके उसे नए ढंग से चलाने का हमारा पक्का इरादा है।' मुझे अफसोस है कि यहाँ की हालातों के सम्‍बन्‍ध की अपनी नादानी के करते उसने नया ढंग के आदर्श फार्म के लिए एक प्रधानी (प्रधानवाला) गाँव चुन लिया, जिसमें कि गाँव के समूचे बाशिन्दों के अपने खास हक होते हैं और वे बखूबी माने जाते हैं।
    'पुश्त दर पुश्त से गाँवों में प्रचलित रीति-रिवाजों के विरुद्ध काम करने के अपने इस विचार को मिस्टर होमी जितनी जल्दी छोड़ दें उतना ही खुद उनके लिए अच्छा है और मैं वहाँ जिस अमन और शान्ति के लिए फिक्रमन्द हूँ उसके लिए भी उतना ही अच्छा है।'
    इस पर भी और कुछ लिखना बेकार है। इसने मिस्टर मानिक होमी की जन सेवा का सुन्दर चित्र खींचा है। मजदूरों का नेता तो बना जाता है उन जैसों की सेवा के ही लिए। मगर उनका अमली तरीका तो बड़ा ही खतरनाक है। उसी माँगों गाँव में उनने अपने कहने के लिए एक बँगला अलग बनवाया है। गाँव वालों ने पहले समझा होगा कि ये गरीबों के सेवक आ रहे हैं। इनसे हमारा कल्याण होगा। मगर पीछे उन्हें पता चला कि 'मुनि न होय यह निशिचर घोरा।' मगर अब तो देर हो गई और उनका पाँव वहाँ जम चुका है। अब तो रह-रह के उन गरीबों को अनेक ढंग से उनके फौलादी पंजे का मजा चखना ही होगा जब तक कि गरीबों में अपने हकों की रक्षा करने की पूरी ताकत आ नहीं जाती। वह ताकत तो आएगी जरूर। सवाल यही है कि जल्द आए।




बुधवार, 15 दिसंबर 2010

ममता का किसानों से पार्टटाइम प्रेम

        रेलमंत्री ममता बनर्जी का अशांत किसानप्रेम उन्हें अंधे गली में ले गया है। वे किसानहठ की शिकार हैं। किसानहठ राजनीतिक प्रतिगामिता को जन्म देता है। ममता का किसान से रोमैंटिक संबंध है।  उसका किसान के हितों और भावबोध से कोई लेना-देना नहीं है। ममता के आंदोलन के कारण लालगढ़ और नंदीग्राम अशांति के बड़े केन्द्र के रूप में उभरकर सामने आए हैं। सवाल उठता है क्या अशांति में किसान बचेगा ?
ममता के हमले के केन्द्र में माकपा है,वामपंथ हैं। लेकिन नव्य उदार आर्थिक नीतियां नहीं हैं जिनके कारण किसानों के जीवन में हाहाकार मचा हुआ है। ममता को सिंगूर के बाद किसान याद आया है। उसके पहले उन्हें किसान नजर क्यों नहीं आया ? उन्हें 15 साल बाद राजारहाट के किसानों की याद क्यों आयी है? असल में ,ममता बनर्जी का किसानों के हितों की रक्षा के साथ कोई संबंध नहीं है। किसान के लिए भूमि मिले,राज्य में भूमि सुधार लागू हों,यह मांग उनके और कांग्रेस के राजनीतिक एक्शन से गायब रही है। उनके पास किसानों की जीवनरक्षा का कोई कार्यक्रम नहीं है । किसान की समस्या जमीन की समस्या नहीं है ,किसान की समस्या जमीन पाने,खेती करने,बेचने,उचित दाम पाने की समस्या भी है।खाली जमीन किसान को बचा नहीं सकती।  ममता बनर्जी और उनके संरक्षण में चलने वाली जमीन उच्छेद कमेटी ने कभी भी पश्चिम बंगाल में किसानों को जमींदारों से जमीन दिलाने के लिए संघर्ष नहीं किया। किसानों को फसल के बाजिव दाम मिलें इसके लिए आंदोलन नहीं किया। ममता बनर्जी केन्द्र सरकार में है और उनके दल के 7 सांसद मंत्री भी हैं ,वे एक भी बार केन्द्र सरकार के पास पश्चिम बंगाल के किसानों के आर्थिक हितों की रक्षा से जुड़ी मांगों पर अब तक क्यों नहीं मिलीं ? वे एक भी ऐसा फैसला केन्द्र सरकार से नहीं करा पायी हैं जिससे किसानों को सीधे लाभ मिले। इसके बाबजूद रेलमंत्री ममता बनर्जी की भाषणकला ने वामनेताओं की भाषणकला के प्रभामंडल को नष्ट कर दिया है।  ममता के भाषण में ‘मैं ऐसा नहीं करने दूँगी’, का नारा बुनियादी नारा है। इस नारे के इर्दगिर्द वह अपनी राजनीतिक साख बनाने में लगी हैं। उनके भाषणों में प्रतिदिन आश्वासन और वायदे रहते हैं। ‘हम करेंगे’ के पदबंध के बहाने अपने को वाम से अलग दिखाने की चेष्टा करती हैं। हर चीज को भविष्य में ले जाती हैं। उनका कहना है मुझे राज्य सरकार में आने दो तब मांगें पूरी होंगी। यानी लोग भविष्य का इंतजार करें। यह सीधे राजनीतिक ठगई है। ममता के भाषण में भावुकता होती है,गुस्सा होता है लेकिन सच नहीं होता। ममता ने जमीन बचाओ-किसान बचाओ का नारा दिया हुआ है लेकिन वे यह भूल गयी हैं कि किसान को उसकी जमीन से बांधकर रखना संभव नहीं है,किसानी में पामाली बढ़ी है। पश्चिम बंगाल में खेती करने वाले किसानों की संख्या में गिरावट आयी है। कृषियोग्य भूमि कम हुई है। यह वामपंथ के सभी सद् प्रयासों के बाद हुआ है। ममता यह देख ही नहीं पा रही हैं कि किसानों की पामाली क्यों बढ़ी है ? किसान की मुख्य समस्या है पामाली।उसके बारे में ममता के पास कोई कार्यक्रम नहीं है। आंकड़ों के अनुसार पश्चिम बंगाल में खेतमजदूरों की संख्या सन् 1987-88 में 39.6 प्रतिशत थी जो सन् 1993-94 में बढ़कर 41.6 प्रतिशत और सन् 1999-2000 में बढ़कर 49.8प्रतिशत हो गयी। यह आंकड़ा तब का है जब राज्य सरकार ने कारखानों के लिए जमीन नहीं ली थी। ममता बनर्जी जमीन बचाओ की आड़ में असल में जमींदारों के राजनीतिक खेल का मोहरा बन गई हैं । पश्चिम बंगाल के किसान की समस्या है बैंक से सस्ती दर पर उन्हें कर्ज मिले। खाद,बीज, बिजली, पानी, बाजार, उपज संरक्षण,कृषि उपज के सही दाम आदि मिलें । ममता बनर्जी ने इनमें से एक भी मसला नहीं उठाया है और इनमें से अधिकांश मसलों का सीधे संबंध केन्द्र सरकार की नव्य उदार नीतियों से है। ममता बनर्जी अच्छी तरह जानती हैं कि नव्य उदार आर्थिक नीतियों ने किसानों के जीवन में भयावह स्थिति पैदा की है। किसानों के सामने अस्तित्व रक्षा का संकट है । क्या ममता बनर्जी के पास किसानविरोधी नव्य उदार नीतियों का कोई विकल्प है ? ममता की मुश्किल यह है कि वे किसान समस्या को महज माकपा की साजिश और लूट के रूप में देख रही हैं ? किसान के अस्तित्व के सवाल जमीन से आगे जाते हैं। किसान के हितों की रक्षा के सवालों पर वाम का रिकॉर्ड शानदार रहा है। पश्चिम बंगाल में सन् 2000 तक 95,000 एकड़ अधिग्रहीत की गई जिसमें से 94,000 एकड़ जमीन किसानों में वितरित की गई है। इनमें अनुसूचित जाति के 37.1 प्रतिशत पट्टादार और 30.5 प्रतिशत बर्गादार हैं। अनुसूचित जनजाति के 19.3 प्रतिशत पट्टादार और 11.0 प्रतिशत बर्गादार हैं।बाकी अन्य में वितरित की गई है। यहां तक कि औरतों को भी संयुक्त और स्वतंत्र रूप से पट्टे दिए गए हैं। 10प्रतिशत औरतों को संयुक्त और 6 प्रतिशत औरतों को अकेले जमीन के पट्टे दिए गए हैं और यह भारत के इतिहास की विरल घटना है। हाल के अध्ययन बताते हैं पामाली के कारण सन् 2001 तक 13 प्रतिशत पट्टादार अपनी जमीन से हाथ धो बैठे हैं। सब से कम मेदिनीपुर में 5.62 प्रतिशत और उत्तर दिनाजपुर में सबसे ज्यादा 22.35 प्रतिशत पट्टादारों के पास से जमीन चली गयी है। किसानों को उनके अस्तित्व के वास्तव कारणों का ज्ञान कराने की बजाय ममता ने फेक और असंभव कारणों को उछाला है,इससे ममता को राजनीतिक लाभ मिल सकता है लेकिन किसान को कोई लाभ नहीं मिलेगा। यह ममता का किसान से पार्टटाइम प्रेम है। इसने गांवों में टकराव पैदा किया है। गांव की शांति नष्ट की है। इससे बड़े पैमाने पर किसानी से किसान विमुख होंगे। खेती में गिरावट आएगी। उनकी उपज के उचित दाम मिलना मुश्किल हो जाएगा। गांवों में जमींदारों का नए सिरे से राजनीतिक दबदबा बढ़ेगा । किसानों का शोषण ,दमन, उत्पीड़न और पामाली बढ़ेगी।
                                                        

शनिवार, 27 नवंबर 2010

भूखा किसान,नीतीश की जीत और मीडियाखेल

     बिहार में नीतीश बाबू विधानसभा चुनाव जीत गए लेकिन किसान पर कोई कृपादृष्टि किए बगैर। लालू यादव ने इसे एनडीए की रहस्यमय जीत कहा है। एनडीए ने अपने प्रचार में मीडिया फ्लो को ध्यान में रखकर मध्यवर्गीय एजेण्डे को केन्द्र में रखा था। सवाल उठता है एनडीए और खासकर नीतीश कुमार जैसे पुराने समाजवादियों को बिहार में चुनाव लड़ते हुए किसानों की समस्याएं नजर क्यों नहीं आईं ? मीडिया के तथाकथित कवरेज से बिहार का किसान क्यों गायब था ? बिहार के विभिन्न जिलों से आने वाले किसी भी टॉक शो में किसान को प्रधान एजेण्डा क्यों नहीं बनाया गया ? इसके कारण क्या हैं ? क्या बिहार के विकास का कोई भी नक्शा किसान को दरकिनार करके बनाया जा सकता है ? जी नहीं। लेकिन मीडिया में एनडीए के चतुर खिलाडियों ने यही ज्ञान बांटा है बिहार तरक्की पर है और एनडीए उसके कारण ही जीता है। यह प्रचार है इसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है।
    जरा बड़ी तस्वीर पर नजर ड़ालें तो चीजें साफ दिखने लगेंगी। टेलीविजन विज्ञापनों में खाना खाता किसान नजर नहीं आता। आमतौर पर मध्यवर्ग के बच्चे,औरतें और पुरूष खाना खाते या पेय पदार्थ पीते नजर आते हैं। चॉकलेट खाते नजर आते हैं। मैगी खाते नजर आते हैं। मध्यवर्गीय सुंदर रसोई नजर आती है। होटल के कुक नजर आते हैं। मध्यवर्गीय औरतें खाना बनाने की विधियां बताती नजर आती हैं लेकिन किसान औरतों का चूल्हा और खाना बनाने की विधियां नजर नहीं आती।  
   टेलीविजन या मीडिया में किसान की कभी-कभार आत्महत्या की खबर आती है। स्वाभाविक खबरें नहीं आतीं। किसान को हमने भूख के साथ जीना सिखा दिया है और मीडिया भी इस काम में सक्रिय भूमिका अदा कर रहा है। महान किसान नेता सहजानंद सरस्वती ने लिखा है ‘‘अमीर और जमींदार लोग, कानून की पाबन्दी और उस पर अमल कराने वाले लोग और जो लोग कानून बनाते हैं उनसे,  सभी से यदि कहा जाए कि भूखे रहकर यह काम कीजिए तो धीरे से सलाम करके चट हट जाएँगे। साफ कहेंगे कि बाबा,   यह काम हमसे न होगा। लीजिए हमारा इस्तीफा। नहीं-नहीं, भूखे रहना तो दूर रहे। जरा चाय न मिले, एक समय नाश्ता और जलपान न मिले तो भी उनके माथे में चक्कर आता है और बीमार पड़ जाते हैं। फलत: उनकी सारी ऐंठ और सारा कारोबार ही रुक जाता है।’’
      किसान की स्थिति इससे थोड़ा भिन्न है। उसकी भूख,उसकी सामाजिक-आर्थिक जरूरतें, उसकी राजनीतिक इच्छाएं आदि को मीडिया कभी व्यक्त नहीं करता। मीडिया कवरेज से लेकर राजनीतिक हंगामे तक कहीं पर भी बिहार का किसान और उसकी समस्याएं चर्चा के केन्द्र में नहीं थीं। विकास का तथाकथित एजेण्डा बुर्जुआ एजेण्डा है। किसान एजेण्डा नहीं है। प्रकारान्तर से बिजली,पानी,सड़क और कानून व्यवस्था के सवाल चर्चा के केन्द्र में थे। ये विश्व बैंक और विश्व की नामी वित्तीय संस्थाओं का सुझाया एजेण्डा है। इसमें भी दो कामों की ओर बिहार की नीतीश सरकार ने ध्यान दिया था। वह है सड़क निर्माण और कानून व्यवस्था । कानून व्यवस्था में आए सुधार का बहुत गहरा संबंध माफिया गिरोहों को सड़क निर्माण के धंधे में खपा देने के साथ है। माफिया गिरोहों में सत्ता की लूट का विभाजन बड़े ही कौशल के साथ किया गया है और तथाकथित सड़क निर्माण और ऐसे ही कार्यों में बाहुबलियों को स्थानांतरित कर दिया गया है। सरकारी खजाने की विभिन्न मदों में हुई लूट में हिस्सेदारी दे दी गयी है। इसका परिणाम यह निकला कि आम जनजीवन में कानूनभंजन की घटनाओं का ग्राफ तेजी से गिर गया। बाकी वोटों के प्रबंधन में सामाजिक समीकरण के गणित को लगा दिया गया।
    किसान को भूखा रखकर आई यह जीत कितनी बिहार के लिए भविष्य में कितनी सार्थक होगी यह तो भविष्य ही बताएगा। लेकिन एक बात तय है कि किसान की भूख को अभी बिहार में प्रमुख एजेण्डा बनना है। सहजानंद सरस्वती के शब्दों में कहें ‘‘लेकिन वही लोग उम्मीद करते हैं कि भूखों रहकर और दिन-रात खप-मर के किसान लगान और टैक्स चुकता करे सलामी और नजराना दे और सुन्दर-सुन्दर पदार्थ उन्हें भोग लगाने को मुहय्या करे ? किसान उनसे पूछता क्यों नहीं कि 'खुदरा फजीहत, दीगरे रा नसीहत?' आप लोग स्वयं तो जरा सी नाश्ते में देर बर्दाश्त नहीं कर सकते और घी-दूध के बिना काम ही नहीं कर सकते। तो फिर हमीं से वैसी आशा क्यों करते हैं ? हम भूखों रहके सब-कुछ गैरों के लिए उपजावें ऐसा क्यों सोचते हैं ? क्या आपका शरीर एवं दिल दिमाग खून मांस वगैरह से बना है और हमारा पत्थर और मिट्टी से कि हमारा काम यों ही चल जाएगा ? हमारे साथ आप भी भूखों रह के काम कीजिए। तब तो पता चलेगा कि लेक्चर और हुक्म देना कितना आसान है और भूख कितनी बुरी है। ऊँट को तभी पता चलेगा कि जितना आसान बलबलाना है, उतना पहाड़ पर चढ़ना नहीं है।’’
       सहजानंद सरस्वती ने लिखा है किसान का काम है कि वह कानूनी ढिंढोरा पीटने वालों से और उसका खून चूसने वालों से सीधा कह दे कि बिना कोयला-पानी के निर्जीव और लोहे का बना इंजिन भी काम नहीं करता और आगे नहीं बढ़ता, चाहे ड्राइवर मर जाए। यदि घोड़े को दाना और घास न दें और पानी न पिलाएँ। मगर पीठ पर सवार होकर कोड़े मारकर ही उसे चलाना और दौड़ाना चाहें तो यह असम्भव है। वह तो सिर्फ आगे बढ़ने से इन्कार ही नहीं करता, किन्तु अगले पाँवों को उठाकर खड़ा हो जाता और अपना शरीर बुरी तरह झकझोर के सवार को नीचे गिरा देता है। तब सवार को अक्ल आती है। फलस्वरूप चाहे घोड़े को और कोड़े भले ही लगें। मगर सवार की हड्डियाँ तो चूर हो ही जाती हैं। हम भी अब यही करेंगे यदि हमें दिक किया गया। हम तो पहले खाएँ-पिएँगे। पीछे और कुछ करेंगे।
बिहार में चूंकि नव्य उदार आर्थिक नीतियों को लागू किया जा रहा है तो जमीन-मकान-जायदाद के धंधे में उछाल आएगा। इससे स्थानीय  बाहुबलियों का वर्चस्व मजबूत होगा। नई सरकार तेजी से सेज प्रकल्पों की ओर भी बढ़ेगी इस सबसे प्राकृतिक असंतुलन और बढ़ेगा। अवरूद्ध विकास के कारण पहले से ही बिहार प्राकृतिक असंतुलन को झेल रहा है। प्राकृतिक तबाही झेल रहा है। आश्चर्य की बात है बिहार के सैंकड़ों लड़के पूरे देश में एनजीओ कर रहे हैं लेकिन बिहार के प्राकृतिक विनाश पर उनका ध्यान ही नहीं जाता।
      सहजानंद सरस्वती के शब्दों में बिहार के सामने तीन बड़ी समस्याएं हैं वे हैं हवा,   पानी और खाना। हवा बिना एक क्षण भी जिन्दा रहना गैर-मुमकिन है। इसलिए प्रकृति ने उसे सब जगह इफरात से बनाया है। बिना विशेष यत्न के ही वह सर्वत्र सुलभ है। सो भी जितनी चाहें उतनी। इस कदर सुलभ और ज्यादा है कि हम उसे यों ही गन्दा और खराब बनाते रहते हैं, बिना कारण के ही और प्रकृति को उसे शुद्ध बनाने के लिए न जाने कितने उपाय करने पड़ते हैं। मगर इतने से रंज हो के उसने हमारी जरूरत-भर हवा नहीं दी है और न जरूरत में कमी ही की है। जो जितना ही जरूरी है वह यदि उतना ही सुलभ और पर्याप्त हो, तभी काम चल सकता है। यही नियम इस बात से सिद्ध होता है।

   हवा के बाद स्थान है पानी का। यह हवा जितना जरूरी है नहीं। मगर भोजन से तो कहीं ज्यादा जरूरी है। पानी पीके कुछ दिन जिन्दा रह सकते हैं बिना खाये भी। इसीलिए पुराने लोगों ने पानी का नाम जीवन भी रखा है। यह पानी भी हवा जैसा सुलभ, सर्वत्र प्राप्य न होने पर भी जरूरत के लिए मिल ही जाता हैं। जहाँ ऊपर नहीं है वहाँ थोड़ी सी जमीन खोदने पर जितना चाहे पा सकते हैं। यों तो नदियाँ,   तालाब, झरने और मेघ उसे पहुँचाते ही रहते हैं। सहारा के रेगिस्तान और बीकानेर के तालुकामय मरुस्थली में भी ऊँटों और जंगली लोगों के लिए प्रकृति ने ऐसा सुन्दर प्रबन्ध कर दिया है कि आश्चर्यचकित होना पड़ता है। जहाँ पानी का पता नहीं। मेघ भी शायद ही कभी भूल-चूक से थोड़ा कभी बरस जाए। दिन-रात लू चलती रहती है। वहीं पर जमीन के थोड़ा ही नीचे मनों वजन के तरबूजे (मतीरे) होते हैं जो बारह महीने पाए जाते हैं। उनमें खाना और पानी दोनों हैं। वह इतने मीठे होते हैं कि कहिए मत। उनकी खेती कोई नहीं करता जमीन के भीतर ही उनकी लताएँ फैलती और फलती हैं। वहाँ के निवासियों के लिए यह प्रकृति का खास (special-arrengement) है।

    तीसरा नम्बर भोजन का आता है। रोशनी, मकान, कपड़े आदि के बिना भी हम जिन्दा रह सकते हैं। मगर भोजन के बिना कितने दिन टिक सकते हैं। जैसे-तैसे मर-जी के कुछ ही दिन के बाद जीना असम्भव है यदि खाना न मिले। इसीलिए सहारा और राजपूताने में जहाँ पेड़ नहीं हैं, प्रकृति का खास इन्तजाम खाने-पीने के बारे में बताया है। यह भी तो देखिए कि जब किसान या दूसरा आदमी नन्हा-सा बच्चा था और माता के पेट से अभी-अभी बाहर आया था, तो उसके खाने-पीने का प्रबन्‍ध पहले से ही था। माता के स्तनों में इतना मीठा दूध बिना कोशिश के ही मौजूद था कि खाने और पीने दोनों ही,  का काम करता था। पशुओं के लिए भी यही बात है। बच्चे कमा नहीं सकते और न हाथ-पाँव चला सकते हैं। इसलिए भगवान या प्रकृति ने खुद पहले से सुन्दर इन्तजाम कर दिया। जंगलों और पहाड़ों और सारी जमीन पर घास-पात और फल-फूल की, जड़ और मूल की इतनी बहुतायत है कि सभी पशु-पक्षी खा-पी सकते हैं। यहाँ तक कि किसान जब निरा बच्चा है तब तक वह अमृत जैसा माँ का दूध पीने को पाता है।

     मगर सयाना होने पर ? हाथ-पाँव चलाने और दिन-रात एड़ी-चोटी का पसीना एक करने पर ? उसका पेट नहीं भरता और भूखों मरता है। क्या यह बात समझ में आने की है ? लोग कहते हैं कबीर ने उल्टी बातें बहुत कही हैं, जैसे 'नैया बीच नदिया डूबी जाए' मगर क्या यह नैया बीच नदिया का डूबना नहीं है ? वर्तमान सामाजिक व्यवस्था ने अमन और कानून ने जो यह भूखों मरने की व्यवस्था कमाने वालों के लिए,  किसानों के लिए,  बना रखी है और जिसका समर्थन सारी शक्ति लगा कर किया जाता है, क्या वह प्रकृति को पसन्द है ? प्रकृति ने तो हवा, पानी, दूध आदि प्रचुर मात्रा में प्रस्तुत करके बता दिया है कि भोजन जैसी जरूरी चीज जरूरत-भर पाने का हर किसान को नैतिक अधिकार है, कुदरती हक है। मगर अभागा किसान समझे तब न ?















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