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शनिवार, 8 अगस्त 2015

संसद के रक्षक टीवी भांड



   टाइम्स नाउ टीवी चैनल पर वक्ताओं और एंकर अर्णव गोस्वामी की अ-लोकतांत्रिक चाल देखकर यही नज़र आ रहा है कि जनहितों के लिए संघर्ष करने वालों को एकओर मोदी सरकार से लड़ना होगा वहीं दूसरी ओर कारपोरेट न्यूज़ टीवी चैनलों के प्रायोजित टॉक शो और न्यूज़ प्रसारण से भी लड़ना होगा। आज अर्णव गोस्वामी जिस तरह सरकारीभोंपू की तरह बोल रहा था उसने डीडी न्यूज़ को भी लज्जित कर दिया, मज़ेदार बात यह है डीडी न्यूज़ पर मोदीभक्ती कम दिख रही है इसके विपरीत टाइम्स नाउ आदि निजी चैनलों पर सरकारभक्ति का नशा छाया हुआ है । 
  अर्णव गोस्वामी की बातों को सुनकर लग रहा था कि मोदी सरकार ढेर सारे विकासमूलक और भ्रष्टाचारविरोधी काम करना चाहती है लेकिन विपक्ष करने नहीं दे रहा ! यह अपने आप में बेबुनियाद तर्क है । संसद चले या न चले , इसे लेकर मोदी सरकार गंभीर नहीं रहे ।संसदीय गरिमा और संसद के प्रति मोदी सरकार न तो गंभीर है और न ज़िम्मेदार है। महंगाई, ग़रीबी, मिड डे मिल , ग़रीबों के लिए घर बनाने आदि कार्यों को लेकर गंभीर है तो उसे किसने काम करने से रोका है। यह सरकार अध्यादेश के ज़रिए काम करना चाहती है। सरकार नहीं चाहती कि लोकतांत्रिक ढंग से शासन और संसद चले। लोकतांत्रिक ढंग से सरकार चल रही होती तो पीएम को सभी मंत्रालयों के फ़ैसले लेने का हक़ नहीं दिया जाता। मोदी की बुनियादी प्रकृति अ-लोकतांत्रिक और सर्वसत्तावादी है ।
      मोदी के सत्ता में आने के बाद से सब फ़ैसले प्रधानमंत्री कार्यालय में लिए जा रहे हैं। यहाँ तक कि विदेश,गृह और वित्त मंत्रालय के पास भी कोई स्वायत्तता नहीं बची है । ऐसी स्थिति में पीएम मोदी को लोकतंत्र और विकास का पक्षधर बताना और यह कहना कि विपक्ष उसे काम नहीं करने दे रहा है , यह आरोप बेबुनियाद है। सच यह है मोदी किसी भी क़िस्म के लोकतंत्र और स्वायत्तता को अपने मंत्रियों तक को देना नहीं चाहते। हाल ही में नागा समझौते की घोषणा की गयी लेकिन इस काम में विदेश और गृहमंत्री ग़ायब थे, पड़ोसी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से कोई सलाह-मशविरा करना जरुरी नहीं समझा गया । यह सब ग़लत है ।
           मोदी यदि लोकतांत्रिक होते तो भूमि अधिग्रहण बिल बार बार अध्यादेश के ज़रिए लागू न करते। वे संसदीय समिति को पहले ही दिन अपना प्रस्ताव भेज सकते थे लेकिन उन्होंने यह सामान्य सा काम नहीं किया , ऐसी स्थिति में यह कहना कि मोदी सरकार लोकतांत्रिक ढंग से काम करना चाहती है, पूरी तरह ग़लत है। 
                संसद में विपक्ष ने लगातार प्रतिवाद करके सही क़दम उठाया है, इस तरह के प्रतिवाद संसद के उदय के समय से होते रहेहैं। जिस तरह लोकसभा स्पीकर ने कांग्रेस के सांसदों को थोक में संसद से निष्कासित किया है वह भी संसदीय नीति का अंग है। ऐसे में संसद चलेगी या नहीं यह तो सरकार को ही सुनिश्चित करना होगा। 
                  मोदी सरकार की मुश्किल है हठधर्मिता। सरकार तय कर चुकी है कि वह विपक्षी दलों की कोई माँग नहीं मानेगी, लेकिन इससे गतिरोध बढ़ेगा और हर स्तर पर टकराव भी बढ़ेगा । सरकार ने टकराव और हठधर्मिता के बल पर यदि देश चलाने का मन बना लिया है तो फिर विपक्ष बीच में कहाँ आता है । संसद बीच में कहाँ आती है, दनादन अध्यादेश  निकालकर सरकार काम कर सकती है । 

रविवार, 7 दिसंबर 2014

संसद ,अंधविश्वास और वैज्ञानिकचेतना



जिस देश में प्रधानमंत्री से लेकर सांसद तक अंधविश्वासी और गँवार संतों की चरणरज को परम प्रसाद मानते हों!कूपमंडूक और जाहिल संतों को प्रेरक मानते हों!जिस देश के सांसद कूपमंडूक ज्ञान को विज्ञान मानते हों और लाखों जनता उनको जय- जय हो करके चुनती हो! गंभीरता से सोचो उस देश की संसद की चेतना कैसी होगी ?  हमने कभी लोकतंत्र के परम स्वायत्तरुप संसद और "परम मनुष्य "सांसदों के बारे में वैज्ञानिकचेतना की कसौटी पर बातें नहीं कीं।इससे अनेक क़िस्म के लोकतांत्रिक अंधविश्वास फैले हैं।
    लोकतंत्र में दो तरह के अंधविश्वास हैं, पहली कोटि में परंपरागत अंधविश्वास आते हैं, ये हमें विरासत में मिले हैं, दूसरी कोटि में पूँजीवादी अंधविश्वास आते हैं जो हमें पूँजीवाद के आगमन के साथ समाजवाद और बुर्जुआ लोकतंत्र ने दिए हैं। मज़ेदार बात है हमने कभी न तो समाजवादरचित अंधविश्वासों पर बहस की और न बुर्जुआ अंधविश्वासों पर सवाल खड़े किए । समाजवाद ने पुराने या विरासत में प्राप्त अंधविश्वासों को नष्ट किया लेकिन नए समाजवादरचित अंधविश्वासों पर किसी को सवाल ही खड़े करने नहीं दिया गया। भारत में भी अंग्रेज़ों के ज़माने से लेकर आजतक ईश्वर की सत्ता को ख़ारिज करना अपराध घोषित कर दिया गया, मज़ेदार बात तो यह है कि हमारे यहाँ भगवान के नाम पर ज़मीन-जायदाद होती है, भगवान मुकदमे लड़ता है!ऐसे में उसके न होने की बातें करना तो "महान अपराध "ही माना जाएगा!संविधान की सौगंध सबसे बड़ा अंधविश्वास है! सांसदों का आचरण उसके अनुरूप नजर ही नहीं आता,इसके बावजूद सांसद महान हैं! कहने का आशय यह कि बुर्जुआ लोकतंत्र में पुराने और नए अंधविश्वास बने रहते हैं , विभिन्न तरीक़ों के जरिए उनको क़ानूनी और अन्य क़िस्म का संरक्षण मिला हुआ है।

        संसद को लेकर जिस तरह का पूजाभाव हमारे ज़ेहन में है वह अपने आपमें एक रुढि है, सांसदों को लेकर जो मान्यता है वह भी रुढिग्रस्त है,इससे भी बड़ी बात यह कि लोकतंत्र भी रुढियों और तथाकथित लोकतांत्रिक अंधविश्वासों से भरा हुआ है। लोकतांत्रिक अंधविश्वास न हों तो लोकतंत्र ख़त्म हो जाय। हमने कभी विचार ही नहीं किया है हमारे सांसद कितने वैज्ञानिकचेतना संपन्न है? कोई सर्वे भी नहीं किया कि जिन सांसदों को हम आज़ादी के बाद से लेकर आज तक चुनते रहे वे वैज्ञानिकचेतना से लैस हैं या नहीं? सच यह है हमारे अधिकांश सांसद अंधविश्वासी और अवैज्ञानिक चेतना से लैस हैं।इसके बावजूद संसद महान हैं!
   हमारे न्यायाधीशों में अधिकांश में वैज्ञानिकचेतना का अभाव है,इसके बावजूद न्याय महान है !न्यायाधीश महान हैं! ये धारणाएँ बताती हैं कि हमारे अंधविश्वास और रुढियों के खिलाफ कोई गंभीर जंग न तो संसद में लड़ी गयी और न संसदीय संरचनाओं में ही लड़ी गयी।
      यूपीएससी पास करने वाले अधिकतर "महानजन" भगवान के आगे भीख माँगते,रोते बिसूरते देखे गए हैं! जिस देश के क्रीम कहे जानेवाले "महानजनों" में अंधविश्वास का यह आलम हो वहाँ वैज्ञानिकचेतना की रक्षा करना , उसका प्रचार- प्रसार करना बहुत ही मुश्किल काम है। ऐसी अवस्था में भारत विश्वगुरु कैसे बन सकता है ?
वैज्ञानिकचेतना हासिल करना नए मनुष्य के निर्माण के आत्मसंघर्ष की प्रक्रिया से जुडा है। हमने अपने देश में सतही संरचनाओं को तो यूरोप की नक़ल पर तैयार कर लिया , यूरोप जैसे कपड़े पहन लिए हैं, यूरोपीय वस्तुएँ जमा कर लीं,लेकिन नए यूरोपीय वैज्ञानिक मूल्यों को ग्रहण नहीं किया , मूल्यों की पुरानी मीनारों में बंद रहकर हम विश्वगुरु का सपना देख रहे हैं लेकिन साक्षात जीवन में घट रही अनहोनी और अमानवीय ज़िन्दगी के प्रति बेख़बर बने हुए हैं। 
     वैज्ञानिकचेतना की सबसे बड़ी खूबी है कि हम अमानवीय मूल्यों और ऐसी चीजों को न मानें जिनको यथार्थ में रेशनल तर्क की कसौटी पर परख न सकें।हमारे वैज्ञानिक सोच का आलम यह है कि हमने सवाल खड़े करने बंद कर दिए हैं!" हाँ जी-हाँ जी कहना उसी गाँव में रहना", की मनोदशा ने पुरानी और नई रुढियों और अंधविश्वासों के प्रति हमें गूँगा बना दिया है। वैज्ञानिकचेतना हमने गूंगेपन से मुक्त करती है।" हाँ जी" के गुलामबोध से मुक्त करती है ।सोचो क्या गूंगाभारत विश्वगुरु बन सकता है ?

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