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गुरुवार, 10 अगस्त 2017

सोनिया गांधी का मतलब



         पिछले तीन सालों से देश में जो कुछ चल रहा है उसके प्रतिवाद के संदर्भ में सोनिया गांधी की राजनीतिक भूमिका फिर से महत्वपूर्ण हो उठी है।सोनिया गांधी ने मोदी की आँधी में जिस तरह लोकसभा का चुनाव जीता और नियोजित ढंग से कांग्रेस के मूल स्वभाव को बदलने की दिशा में  कदम उठाए हैं वे इस बात को पुष्ट करते हैं कि सोनिया गांधी देश की राजनीति में सामान्य नेत्री नहीं हैं।सोनिया गांधी में कांग्रेस को जोड़े रखने की क्षमता है।साथ ही देश के विकास का एजेण्डा भी तय करने की क्षमता है। यह सच है कांग्रेस को जितना आक्रामक होना चाहिए वह उतनी आक्रामक नजर नहीं आ रही लेकिन यह भी बडा सच है कि कांग्रेस के नए कलेवर के निर्माण के लिए सोनिया गांधी का नेतृत्व में बने रहना भी जरूरी है। पिछले तीन सालों में सबसे ज्यादा राजनीतिक हमले सोनिया गांधी झेलती रही हैं लेकिन उन्होंने कभी उफ़ तक नहीं की। उन्होंने जितनी बार बोला है देश के सच को बयां किया है।लोकतंत्र के लिए वह नेता मूल्यवान होता है जो सच बोलता है, सोनिया गांधी सच बोलती हैं और सच में जीती हैं यह उनकी सबसे बडी ताकत है।
         सोनियागांधी के चरित्र हनन की जिस तरह कोशिशें हुई हैं उससे उनके व्यक्तित्व पर कोई असर नहीं पडा उलटे वे ताकतवर होकर निकली हैं। सोनिया गांधी कम बोलती हैं लेकिन प्रासंगिक बोलती हैं। वे नियमित संसद जाती हैं वहाँ बैठकर सारी बहस सुनती हैं, इसके विपरीत मोदीजी संसद में न्यूनतम समय भी नहीं बैठते। संसद उनके लिए फालतू चीज है। मोदी के लिए संसदीय परंपराओं और संवैधानिक मान्यताएँ अवसरवादियों के खेल की तरह है वहीं सोनिया के लिए ये प्राणवायु हैं।

शुक्रवार, 20 मई 2016

वाम- कांग्रेस गठजोड़ पराजय के सबक-


        पश्चिम बंगाल में वाम की पराजय काफी महत्व रखती है।जिन लोगों की वाम के प्रति सहानुभूति है वे वाम को पश्चिम बंगाल के सामाजिक यथार्थ के संदर्भ में बहुत कम जानते हैं,जो वाम इस राज्य में है वह विचारधारा के नशे और ३४साल सत्ता में रहने के कारण यथार्थ से एकदम कटा हुआ है।लोकल से लेकर नेशनल स्तर के वामनेता,खासकर माकपानेता जमीनी यथार्थ को देखने से भागते रहे हैं।सच्चाई यह है कि वाम के पराभव का सिलसिला थमा नहीं है ऊपर से राजनीतिक अवसरवाद ने वाम को घेर लिया है।आयरनी यह है कि माकपा पोलिट ब्यूरो सदस्य पी.विजयन( केरल) से प्रणव राय से हाल ही में केरल कवरेज के दौरान पूछा कि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस से वाम ने जो गठबंधन किया है उस पर क्या कहना है ? विजयन ने कहा मैं नहीं जानता।आश्चर्य है वाम-कांग्रेस का यहां गठबंधन था सारे मीडिया में खबर है पूरी पार्टी मिलकर चुनाव लड़ रही है लेकिन पोलिट ब्यूरो सदस्य कह रहा है,मैं नहीं जानता! चुनावी सभाओं में पोलिट ब्यूरो सदस्य गठबंधन कह रहे हैं,लेकिन एक दूसरे पोलिट ब्यूरो सदस्य विमान बसु ने कहा गठबंधन कहां है ? यह राजनीतिक दोगलापन यदि माकपा नेताओं के मन में है तो जनता कैसे उन पर विश्वास करती !माकपा ने दो टूक ढंग से कभी खुलकर नहीं बताया कि वाम- कांग्रेस गठबंधन है या चुनावी तालमेल है ?इस तालमेल को किन तर्कों को लेकर किया गया उसकी कोई लिखित रूप में चर्चा नजर नहीं आई! कोई विश्वास करेगा कि केरल के माकपा नेताओं को मालूम नहीं है कि बंगाल में क्या हो रहा है!
माकपा की जिन मुद्दों को लेकर आलोचना हमने की उन पर कभी ध्यान नहीं दिया गया।इससे भी बड़ी बात यह कि जब संगठन कमजोर है और हमले हो रहे हैं ,माकपानेता अपने लोगों को सुरक्षा देने में असमर्थ हैं,पोलिंग एजेंट तक देने में असमर्थ हैं,तब फिर चुनाव लड़ने क्यों गए ? क्या संगठन के बिना चुनाव लड़ना चाहिए? बंगाल में कई बार चुनाव होते हैं और माकपा चुनाव में लड़ने लायक अवस्था में नहीं है।ऐसी स्थिति में माकपा को पश्चिम बंगाल में कुछ वर्षों के लिए चुनावी राजनीति से विरत रहकर संगठन निर्माण के काम पर ध्यान देना चाहिए,इस समय माकपा अधेड़ और बूढ़ों का दल मात्र होकर रह गया है।युवाओं का संगठन में अभाव है ,और सही नीतियों का भी अभाव है।
माकपा की सबसे बड़ी चुनौती है कि वह अपनी सांगठनिक संरचनाओं ,नियमों और नीतियों को नागरिक समाज की परिकल्पना और नीतियों की संगति में नए सिरे से बनाए,यदि वह ऐसा करता है तो भविष्य में संभावनाएं हैं।वरना लोकतंत्र में हाशिए पर रहने के लिए तैयार रहे।



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शुक्रवार, 6 मई 2016

सोनिया विरोधी उन्माद और आरएसएस का खेल

          आरएसएस-पीएम मोदी एंड कंपनी मिलकर कांग्रेस-सोनिया गांधी-राहुल गांधी आदि के खिलाफ सुनियोजित ढ़ंग से झूठा प्रचार अभियान चलाए हुए हैं।आरएसएस की रणनीति यह है कि नियमित सोनिया गांधी के खिलाफ समाचार,स्कैंडल आदि मीडिया से लेकर संसद तक उछाले जाएं,इस काम में वे पेशेवर प्रचारकों,साइबर प्रचारकों , मीडिया संवाददाताओं और स्तंभलेखकों की मदद ले रहे हैं।इस पूरी षडयंत्रकारी योजना का लक्ष्य है देश की बुनियादी समस्याओं सूखा,कृषि संकट,पानी संकट,स्वास्थ्य,महंगाई,शिक्षा के आदि के बुनियादी सवालों से आम जनता को विमुख करना। इस काम के लिए सरकारी धन का तो दुरूपयोग हो ही रहा है साथ ही कारपोरेट फंड भी इस काम में इस्तेमाल हो रहा है।
संघ संचालित पत्रकार-नेता-चैनल इस तरह पेश आ रहे हैं गोया वे कोई महान चीज खोजकर लाए हैं।इस समूची प्रक्रिया मे सत्य का अनुसंधान करने की मानसिकता का मीडिया से लोप हो गया है।कोई भी संघी नेता कुछ भी बोल देता है और मीडिया उसे बिना किसी छानबीन के सीधे प्रकाशित कर देता है।वहीं आम जनता में इस तरह के कु-लेखन और कु-समाचारों को अनालोचनात्मक ढ़ंग से हजम करने की प्रवृत्ति को बल मिला है,पाठकों के एक बड़े वर्ग ने विवेक,तर्क और प्रमाण के आधार पर सोचना और देखना बंद कर दिया है,अब जो मीडिया में दिख रहा है वही प्रमाण है,इस मनोदशा ने समूचे मीडिया परिदृश्य को सोनिया विरोधी कु-खबरों से भर दिया है।
दिलचस्प बात यह है कि मीडिया में सोनिया गांधी के खिलाफ कु-खबरें भरी पड़ी हैं,संघी उछल-उछलकर हंगामे कर रहे हैं लेकिन किसी भी खबर का अनुसरण करके सोनिया गांधी के खिलाफ कोई भी कार्रवाई करने से मोदी सरकार भागती रही है। इस तरह निराधार खबरों,तथ्यहीन बातों और मीडिया प्रेशर के आधार पर सोनिया गांधी विरोधी उन्माद निर्मित किया जा रहा है।इस तरह के षडयंत्रकारी लेखन और प्रचार का जमकर विरोध किया जाना चाहिए। इस तरह के प्रचार का मूल लक्ष्य है लोकतंत्र को नष्ट करना,आम जनता के मन को अफवाह और तथ्यहीन खबरों से भरकर उन्मादी भीड़ के रूप में आरएसएस की मुहिम में इस्तेमाल करना।

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2016

जेएनयू छात्र आंदोलन, आतंकवाद और राष्ट्रवाद


जेएनयू छात्र आंदोलन में विभिन्न रंगत की विचारधाराएं सक्रिय रही हैं।इनमें मार्क्सवादी,उग्र वामपंथी, लिबरल,समाजवादी,मुक्त चिंतक,माओवादी आदि शामिल हैं। इन सभी रंगत के विचारों को छात्रसंघ की साधारणसभा में वाद-विवाद करते सहज ही देखा जा सकता है।जेएनयू छात्र आंदोलन की सबसे अच्छी बात है अहिंसा ।इस अर्थ में जेएनयूवाले पक्के बौद्ध हैं।वे वाम नहीं है। किसी भी संस्थान या संगठन की विचारधारा उसके आचरण से तय होती है,विचारों से नहीं।जेएनयू के छात्रों का आचरण बौद्ध परंपरा के करीब है,वाम के नहीं।बौद्ध परंपरा का निर्वाह करते हुए जेएनयू छात्र आंदोलन ने कभी हिंसा नहीं की और न कभी हिंसा का समर्थन किया। असहमति और संवाद को छात्र जीवन की धुरी बनाया। यह भी उल्लेखनीय है कि जेएनयू छात्रसंघ में कभी कोई क्रिमिनल चुनकर नहीं आया।

जेएनयू छात्रसंघ देश में अकेला छात्रसंघ है जो पूरी तरह स्वायत्त है, वि.वि. प्रशासन से उसका कोई संबंध नहीं है।छात्रसंघ अपने फैसले खुद लेता है और अपनी सारी गतिविधियों की सभी जानकारी छात्रों को पर्चे आदि के माध्यम से मुहैय्या कराता है। छात्रों को वहां चुने गए नेताओं से ज्यादा अधिकार प्राप्त हैं, छात्र चाहें तो छात्रसंघ के द्वारा तय लिए गए फैसले रद्द कर सकते हैं।इस तरह की व्यवस्था दुनिया में कहीं पर भी नहीं है। जेएनयू छात्रों ने अनेक आंदोलन किए हैं लेकिन हिंसा का कभी सहारा नहीं लिया।इस अर्थ में वे पक्के बौद्ध हैं।

जेएनयूछात्रसंघ की परंपरा मेें कभी किसी भी आतंकी या पृथकतावादी संगठन के पक्ष में कोई प्रस्ताव पास नहीं हुआ है।हमेशा समय-समय पर आतंकवाद और उससे जुड़े आंदोलनों की जेएनयू छात्रसंघ ने निंदा की है और उसके खिलाफ छात्रों को एकजुट किया है।मैं स्वयं 7साल तक जेएनयू की छात्र राजनति में सक्रिय रहा हूँ और यह वह दौर था जब पंजाब से लेकर असम तक,उत्तर-पूर्व से लेकर कश्मीर तक आंदोलन और हिंसाचार जारी था।इसलिए यह कहना कि जेएनयू के छात्र आतंकवाद के समर्थक हैं,कश्मीर की आजादी के समर्थक हैं,अफजल के समर्थक हैं,एकसिरे से गलत है। जेएनयू के छात्र किस ओर हैं यह बात छात्रसंघ के प्रस्तावों के जरिए,पदाधिकारियों के बयानों के जरिए समझी जानी चाहिए,न कि नारों या पोस्टरों के जरिए।

आरएसएस के लोग झूठा प्रचार कर रहे हैं कि जेएनयू के छात्र आतंकियों को समर्थन दे रहे हैं,वे प्रमाण पेश करें कि छात्रसंघ ने क्या कभी कोई प्रस्ताव आतंकियों के समर्थन में पास किया है ? मीडियावाले प्रमाण पेश करें।

आतंकियों के पक्ष में जेएनयू की दीवारों पर लिखे नारों या किसी संगठन के द्वारा बांटे गए पर्चों या नारेबाजी के लिए जेएनयू छात्रसंघ जिम्मेदार नहीं है। यदि कोई छात्र संगठन जेएनयू में आतंकियों का समर्थन करता है तो यह उस संगठन की राय है जेएनयू छात्रसंघ की राय नहीं है,जेएनयू के छात्रों की राय नहीं है।जेएनयूके छात्रों की राय का प्रतिनिधित्व जेएनयूछात्रसंघ करता है।वही एकमात्र आवाज है उनकी।

जेएनयू छात्र आंदोलन राष्ट्रवाद और आरएसएस


    जेएनयू छात्र आंदोलन के लिए 'अन्य' ( 'अदर' 'हाशिए के लोग') बहुत ही महत्वपूर्ण है। संयोग है कि जेएनयू के अकादमिक वातावरण,पाठ्यक्रम और अकादमिक संस्कृति का मूलाधार भी यही है। जेएनयूछात्र संघ के बिना जेएनयू की परिकल्पना असंभव है,छात्रसंघ जेएनयू आत्मा है। आज यही मूलाधार संकटग्रस्त है, उस पर केन्द्र सरकार के जरिए हमले संगठित किए जा रहे हैं। जेएनयू में अन्य या अदर के हकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है। जेएनयू में छात्रों की हर स्तर पर भागीदारी है,जेएनयू में छात्रों की सलाह को तरजीह दी जाती रही है,उनको स्वतंत्र और स्वायत्त माहौल दिया गया है।

        जेएनयू के लिए राष्ट्रवाद का मतलब वह नहीं है जो संघियों या बुर्जुआ कांग्रेस के लिए है।जेएनयू छात्र आंदोलन की साझा समझ रही है कि भारत सांस्कृतिक-जातीय और धार्मिक विविधतावाला देश है।जेएनयू के जन्म के बाद से इस थीम पर हजारों पर्चे और अनेकों प्रस्ताव इस समझ के आधार पर छात्रसंघ ने प्रकाशित किए हैं।जेेएनयू के छात्रों की नजर में भारत के राष्ट्र की धुरी धर्म नहीं नागरिक हैं।राष्ट्रचेतना की धुरी धार्मिक चेतना नहीं,नागरिकचेतना है।जेएनयू में ताकतवर की पूजा नहीं होती,लोकतंत्र की पूजा होती है, उसका सम्मान होता है।वहां जनता यानी छात्रों के सहयोग से लोकतांत्रिक शक्ति पैदा हुई है।जेएनयू के छात्र आंदोलन की प्रेरणा के स्रोत अन्य या अदर या हाशिए के लोगों के आंदोलन हैं।जेएनयू में छात्रचेतना की धुरी है- छात्रों को शिक्षित करो, लोकतांत्रिक बनाओ और संगठन की कला सिखाओ।

इसके विपरीत आरएसएस की विचारधारा में अन्य के लिए कोई जगह नहीं है,लोकतंत्र के लिए कोई जगह नहीं है,आरएसएस की विचारधारा का आधार जनता नहीं हिन्दुत्व है,गोलवलकर की विचारधारा है।यही वजह है कि जेएनयू के आम वातावरण में आरएसएस का कभी कोई बहुत बड़ा आधार नहीं बन पाया।आरएसएस देश में जिन छात्रसंघों को नियंत्रित करता है वहां किसी भी संगठन में लोकतंत्र और संवाद की परंपरा नहीं है,ऐसी स्थिति में जेएनयू छात्र आंदोलन और आरएसएस में यदि सीधे टकराव नजर आ रहा है तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

रविवार, 16 अगस्त 2015

राहुल गांधी की नई इमेज और नई राजनीति

    

           राहुल गांधी की नई इमेज परिवर्तनकामी है,खुली है, यह कांग्रेस के मूल स्वभाव से भिन्न है। कांग्रेस का मूल स्वभाव सत्ता अनुगामी और छिपानेवाला रहा है,जबकि राहुलगांधी सत्ता से मुठभेड़ कर रहे हैं,पार्टी को खेल रहे हैं। वे इस क्रम में दो काम कर रहे हैं,पहला यह कि वे कांग्रेस की नीतियों में परिवर्तन कर रहे हैं, पुरानी नीतियों से अपने को अलगा रहे हैं, उन पर क्रिटिकली बोल रहे हैं। इससे नई राजनीतिक अनुभूति अभिव्यंजित हो रही है।
कांग्रेस के शिखर नेतृत्व में यह प्रवृत्ति रही है कि वह नीतियों पर हमले कम करता रहा है लेकिन राहुल इस मामले में अपवाद हैं वे मनमोहन सिंह के जमाने में भी नीतिगत मसलों पर निर्णायक हस्तक्षेप करते थे और इन दिनों तो वे भिन्न तेवर में नजर आ रहे हैं। इस क्रम में समूची कांग्रेस की मनोदशा में परिवर्तन घटित हो रहा है। आज राहुल गांधी पहल करके जनता के मसलों को उठा रहे हैं,जनांदोलनों के बीच में जा रहे हैं। हाल ही में पूना फिल्म एवं टीवी संस्थान और पूर्व सैनिकों के आंदोलन स्थल पर राहुल गांधी का जाना शुभलक्षण है। राहुल गांधी पूना संस्थान के छात्रों के जुलूस के साथ राष्ट्रपति से मिलने गए, यह सामान्य घटना नहीं है। कांग्रेस ने कभी इस तरह के जनांदोलनों में, अन्य के द्वारा संचालित आंदोलन में शिरकत नहीं की है। मेरी जानकारी में राहुल गांधी से पहले कभी किसी कांग्रेसी शिखर नेता ने जनांदोलन के साथ खड़े होकर राष्ट्रपति को मांगपत्र पेश नहीं किया। यह नया फिनोमिना है और इसका स्वागत होना चाहिए।

राहुल गांधी के एक्शनों ने भाजपा-संघ परिवार के मीडिया नियंत्रण और सरकार नियंत्रण की चूलें हिलाकर रख दी हैं। यह बात साफ नजर आ रही है कि राहुल गांधी जो कह रहे हैं वैसा ही वे आचरण कर रहे हैं और उसी दिशा में राजनीतिक चक्र घूम भी रहा है। भूमि अधिग्रहण कानून को लेकर कांग्रेस ने जो कहा उसे तकरीबन करके दिखा दिया है, मोदी सरकार कई बार अध्यादेश निकालकर भी इस कानून को लागू नहीं कर पाई है। साथ ही भाजपा करप्ट है यह संदेश आम जनता में सम्प्रेषित करने में राहुल गांधी पूरी तरह सफल रहे हैं। इससे मोदी सरकार की साख में बट्टा लगा है,उनके भाषणों की लय टूटी है। चमक फीकी पड़ी है।

राहुल गांधी के नए रुप ने कांग्रेसी राजनीति को पारदर्शी, आक्रामक और सेल्फ क्रिटिकल बनाया है। बार बार हर कदम पर कांग्रेस को अपनी ही सरकार के नीतिगत फैसलों की आत्मालोचना भी करनी पड़ रही है। इससे कांग्रेस में नई संस्कृति बन रही है और इससे भाजपा-संघ बहुत परेशान हैं। यही वजह है कि वे हर मसले पर राहुल गांधी पर व्यक्तिगत हमले कर रहे हैं, अ-राजनीतिक कमेंटस कर रहे हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि राहुल के एक्शनों पर मीडिया से लेकर राजनीतिक दलों तक सकारात्मक राय बन रही है और इससे नए किस्म की कांग्रेस के जन्म की संभावनाएं पैदा हो रही हैं।






शनिवार, 8 अगस्त 2015

संसद के रक्षक टीवी भांड



   टाइम्स नाउ टीवी चैनल पर वक्ताओं और एंकर अर्णव गोस्वामी की अ-लोकतांत्रिक चाल देखकर यही नज़र आ रहा है कि जनहितों के लिए संघर्ष करने वालों को एकओर मोदी सरकार से लड़ना होगा वहीं दूसरी ओर कारपोरेट न्यूज़ टीवी चैनलों के प्रायोजित टॉक शो और न्यूज़ प्रसारण से भी लड़ना होगा। आज अर्णव गोस्वामी जिस तरह सरकारीभोंपू की तरह बोल रहा था उसने डीडी न्यूज़ को भी लज्जित कर दिया, मज़ेदार बात यह है डीडी न्यूज़ पर मोदीभक्ती कम दिख रही है इसके विपरीत टाइम्स नाउ आदि निजी चैनलों पर सरकारभक्ति का नशा छाया हुआ है । 
  अर्णव गोस्वामी की बातों को सुनकर लग रहा था कि मोदी सरकार ढेर सारे विकासमूलक और भ्रष्टाचारविरोधी काम करना चाहती है लेकिन विपक्ष करने नहीं दे रहा ! यह अपने आप में बेबुनियाद तर्क है । संसद चले या न चले , इसे लेकर मोदी सरकार गंभीर नहीं रहे ।संसदीय गरिमा और संसद के प्रति मोदी सरकार न तो गंभीर है और न ज़िम्मेदार है। महंगाई, ग़रीबी, मिड डे मिल , ग़रीबों के लिए घर बनाने आदि कार्यों को लेकर गंभीर है तो उसे किसने काम करने से रोका है। यह सरकार अध्यादेश के ज़रिए काम करना चाहती है। सरकार नहीं चाहती कि लोकतांत्रिक ढंग से शासन और संसद चले। लोकतांत्रिक ढंग से सरकार चल रही होती तो पीएम को सभी मंत्रालयों के फ़ैसले लेने का हक़ नहीं दिया जाता। मोदी की बुनियादी प्रकृति अ-लोकतांत्रिक और सर्वसत्तावादी है ।
      मोदी के सत्ता में आने के बाद से सब फ़ैसले प्रधानमंत्री कार्यालय में लिए जा रहे हैं। यहाँ तक कि विदेश,गृह और वित्त मंत्रालय के पास भी कोई स्वायत्तता नहीं बची है । ऐसी स्थिति में पीएम मोदी को लोकतंत्र और विकास का पक्षधर बताना और यह कहना कि विपक्ष उसे काम नहीं करने दे रहा है , यह आरोप बेबुनियाद है। सच यह है मोदी किसी भी क़िस्म के लोकतंत्र और स्वायत्तता को अपने मंत्रियों तक को देना नहीं चाहते। हाल ही में नागा समझौते की घोषणा की गयी लेकिन इस काम में विदेश और गृहमंत्री ग़ायब थे, पड़ोसी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से कोई सलाह-मशविरा करना जरुरी नहीं समझा गया । यह सब ग़लत है ।
           मोदी यदि लोकतांत्रिक होते तो भूमि अधिग्रहण बिल बार बार अध्यादेश के ज़रिए लागू न करते। वे संसदीय समिति को पहले ही दिन अपना प्रस्ताव भेज सकते थे लेकिन उन्होंने यह सामान्य सा काम नहीं किया , ऐसी स्थिति में यह कहना कि मोदी सरकार लोकतांत्रिक ढंग से काम करना चाहती है, पूरी तरह ग़लत है। 
                संसद में विपक्ष ने लगातार प्रतिवाद करके सही क़दम उठाया है, इस तरह के प्रतिवाद संसद के उदय के समय से होते रहेहैं। जिस तरह लोकसभा स्पीकर ने कांग्रेस के सांसदों को थोक में संसद से निष्कासित किया है वह भी संसदीय नीति का अंग है। ऐसे में संसद चलेगी या नहीं यह तो सरकार को ही सुनिश्चित करना होगा। 
                  मोदी सरकार की मुश्किल है हठधर्मिता। सरकार तय कर चुकी है कि वह विपक्षी दलों की कोई माँग नहीं मानेगी, लेकिन इससे गतिरोध बढ़ेगा और हर स्तर पर टकराव भी बढ़ेगा । सरकार ने टकराव और हठधर्मिता के बल पर यदि देश चलाने का मन बना लिया है तो फिर विपक्ष बीच में कहाँ आता है । संसद बीच में कहाँ आती है, दनादन अध्यादेश  निकालकर सरकार काम कर सकती है । 

गुरुवार, 21 मई 2015

राजीव गांधी के बहाने



फ़ेसबुक पर जस्टिस मार्कण्डेय काटजू की राजीव गांधी पर पोस्ट पढ़कर लगा कि हमारे मध्यवर्ग में एक तबक़ा ऐसा पैदा हुआ है जो मानवीय संवेदनाओं और लोकतांत्रिक संवेदनाओं के मामलों में एकसिरे से अमानवीय हो चुका है या जैसी करनी-वैसी भरनी की मनोदशा का शिकार है। 
      राजीव गांधी की स्वाभाविक मौत नहीं हुई थी, वे लंकाई तमिल आतंकी संगठन लिट्टे के हाथों मारे गए , उनकी लिट्टे मरजीवडों ने हत्या की थी। इस हत्या की किसीभी रुप में हिमायत सही नहीं है। राजीव गांधी की मृत्यु सामान्य मृत्यु नहीं है। वह राजनीतिक हत्या है । हत्यारों ने ख़ास मंशा और उद्देश्य को ध्यान में रखकर हत्या की थी। यह भारत के प्रधानमंत्री की हत्या है। यह हत्या ऐसे समय में की गयी जब भारत लिट्टे की आतंकी मुहिम से श्रीलंका में जूझ रहा था। आतंकी गिरोह के हाथों हमारे प्रधानमंत्री का मारा ज़ाना मार्कण्डेय साहब को क्यों नहीं दिखा ? लिट्टे के ख़िलाफ़ भारत ने यदि श्रीलंका में अभियान न चलाया होता तो आज वह समूचे एशिया में वह सबसे ताक़तवर आतंकी संगठन होता । लिट्टे को नेस्तनाबूद करने बाद ही हम श्रीलंका में शांति स्थापित करने में मदद कर पाए। 
     हमारे देश के राजनेताओं की मुश्किल यह है कि वे आरंभ में आतंकी संगठनों की भावी रणनीतियाँ भाँप नहीं पाते। यही स्थिति भिण्डरावाले के संदर्भ हुई और यही स्थिति लिट्टे के संदर्भ में हुई। भारतीय राजनेता आतंकी या पृथकतावादियों की हर राजनीतिक गतिविधि को अपने तात्कालिक वोट बैंक के फ़ायदे और नुक़सान के आधार पर तय करते रहे हैं। फ़िलहाल जम्मू-कश्मीर में मोदी यही चाल चल रहे हैं। जबकि भिण्डरावाले और लिट्टे के प्रसंग में यह रणनीति पूरी तरह पिट चुकी है । इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी तक सभी का आरंभ में आतंकी और पृथकतावादी संगठनों के प्रति सॉफ़्ट रवैय्या था । इसका ख़ामियाज़ा इन दोनों नेताओं को जान गँवाकर भुगतना पड़ा । इसका यह अर्थ नहीं है कि इन दोनों नेताओं की आतंकियों के द्वारा की गयी हत्या जायज़ है। 
             इसके विपरीत हमें देखना चाहिए कि राजीव की हत्या का मतलब क्या है ? राजीव की हत्या का मतलब है भारत की संप्रभुता और लोकतंत्र पर हमला। आज का दिन राजीव गांधी से हिसाब माँगने का दिन नहीं है बल्कि राजीव गांधी के हत्यारों के ख़िलाफ़ एकजुट होकर आवाज़ बुलंद करने का दिन है। काटजू साहब बाक़ी किसी दिन राजीव गांधी की करनी का हिसाब कांग्रेस से माँग लीजिए, लेकिन खुदा के वास्ते आज के दिन बख़्श दीजिए। 

      लोकतंत्र में प्रधान और हाशिए के अंतर्विरोध में अंतर करना चाहिए। हम यह देखें कि आतंकी संगठन लिट्टे के ख़िलाफ़ एकजुट हैं या नहीं ? लिट्टे के ख़िलाफ़ एकजुटता दिखाने की बजाय काटजू साहब तो राजीव गांधी पर हमले कर रहे हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है संप्रभु राष्ट्र के लोकतांत्रिक प्रधानमंत्री की हत्या के पीछे कार्यरत  राजनीतिक मंशा को काटजू जैसा सुलझा हुआ व्यक्ति नहीं समझ पाया ! 
      हमें कारण खोजना चाहिए कि जस्टिस काटजू से चूक क्यों हुई ? असल में इन दिनों संकीर्ण फलक पर रखकर देखने की हवा चल रही है, हम अपनी पीड़ा और अपने नज़रिए को ही प्यार करते हैं उसके आगे देख ही नहीं पाते । इस तरह बम राजीव गांधी की हत्या को ठीक से समझ ही नहीं पाएँगे, इसे निजी या सामाजिक हानि लाभ के राजनीतिक व्यवहारवाद से भी समझ में नहीं आएगी । इसे लोकतांत्रिक नज़रिए से देखने की ज़रूरत है। 
       प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या हमारे लोकतंत्र और राष्ट्रीय संप्रभुता पर किया गया हमला थी और सारे देश ने एकजुट होकर उसका प्रतिवाद किया था । आज हम यह सबक़ लें कि आतंकी और पृथकतावादी संगठनों के प्रति नरम रुख़ नहीं अपनाएँगे । राजीव गांधी को यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी। 

रविवार, 18 जनवरी 2015

दिल्ली विधानसभा चुनावः तीन दिशाएं क्रेजी,लेजी और भोगी

               
      दिल्ली के विधानसभा चुनाव में आम जनता के सामने तीन रास्ते हैं क्रेजी (आम आदमी पार्टी),लेजी(कांग्रेस) और भोगी (भाजपा) । अरविंद केजरीवाल ने आम जनता को क्रेजी बनाया है यही उसका लोकतंत्र में सबसे बड़ा योगदान है। वह इस अर्थ में मूल्यवान है कि उसने ईमानदारी को फिर से मूल्यवान बनाया है। आमलोग ईमानदार की इज्जत करने लगे हैं,जबकि केजरीवाल के राजनीति में आने के पहले ईमानदारी को राजनीति में सबसे बोगस प्रवृत्ति के रुप में देखा जाता था। कांग्रेस की नीतियों का यह सबसे बुरा साइड इफेक्ट था। लोकतंत्र में ईमानदार नेता की आवाज हो,जनता उस पर विश्वास करे और आम जनता में ईमानदारी के प्रति कुर्बानी का जज्बा हो,यह प्रवृत्ति नए सिरे पैदा करने में केजरीवाल ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।

केजरीवाल की पहचान अराजकतावादी के रुप में नहीं एक ईमानदार नेता के रुप में होनी चाहिए। उसने ईमानदारी को आम जनता का नए सिरे से मूल्य और आदत बनाने का काम किया, ईमानदारी उसकी सबसे बड़ी ताकत है।केजरीवाल की ईमानदार मुहिम ने लोकतंत्र के सभी रंगत के दलों पर गहरा असर छोड़ा है। सारे दल किसी न किसी रुप में उसकी इस उपलब्धि और जनप्रभाव से ईर्ष्या करते हैं। साथ ही उसके खिलाफ किसी भी दल का साहस नहीं है कि बेईमान नेता पेश करे। इससे केजरीवाल ने जो राजनीतिक परिदृश्य बनाया है वह लोकतंत्र के लिए शुभ कहा जा सकता है। इसकी तुलना में नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी मूल्यहीन नेता नजर आते हैं।

असली बात यह है कि समाज में एक बड़ा तबका है जो ईमानदार है लेकिन इन तबके की राजनीतिक भूमिका खत्म हो गयी थी। राजनीति में ईमानदारी बोगस कब और कैसे हुई इस पर हमें गंभीरता से सोचना चाहिए। यह कैसे हुआ कि समाज में ईमानदार हैं लेकिन ईमानदारी बोगस हो गयी, कौन हैं इसके लिए जिम्मेदार ? इसी अर्थ में केजरीवाल महत्वपूर्ण नेता है कि उसने ईमानदारी के प्रति क्रेजी भाव पैदा किया। केजरीवाल इसलिए भी मूल्यवान है कि उसने नेताओं को कथनी-करनी में साम्य रखने पर जोर दिया और इस चीज को परीक्षण का आधार बना दिया कि नेता बोलता क्या है और करता क्या है ? आज सभी दल परेशान हैं और कथनी-करनी में साम्य खोज रहे हैं।

केजरीवाल का एक अन्य मूल्यवान पक्ष है दैनंदिन जनसमस्याओं को केन्द्रीय मुद्दा बनाना और उनके समाधान की दिशा में अनवरत सक्रिय रहना। बिजली,पानी के सवाल पर वोट मांगना और इन सवालों को सचमुच में विवाद के विषय बनाना,जनता को जागरुक बनाना और गोलबंद करना,यह बड़ी उपबल्धि है। दिल्ली में सभी दलों ने इन दोनों सवालों को लेकर आम जनता को जागरुक बनाने का काम बंद कर दिया था, आम जनता के जेहन में ये दोनों मुद्दे थे ,नेतागण आते थे ,आश्वासन देते थे और चले जाते थे, इसके आगे कोई राजनीतिक गतिविधि नहीं होती थी, केजरीवाल ने इन दोनों मुद्दों को ज्वलंत मुद्दे बनाकर सभी राजनीतिकदलों की नींद हराम कर दी है,वह इससे एकदम आगे गया है उसने आम जनता को गोलबंद करके इस पर जिस तरह की जागरुकता और राजनीतिक सक्रियता पैदा की है वह विरल घटना है। कम से कम दिल्ली में उसने इन दो मसलों को टाइमबम बना दिया है। कोई भी सरकार आए उसे इस टाइमबम को डिफ्यूज करना ही होगा।वरना भविष्य खराब है।

आम जनता से वोट मांगना और चुनाव जीतना अलग बात है और आम जनता को उसकी समस्याओं को लेकर जागरुक बनाना और राजनीतिक तौर पर गोलबंद करना एकदम भिन्न चीज है। इससे लोकतंत्र मजबूत बनता है।

केजरीवाल आज सारे देश में भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का निर्विवाद नायक है। यह नायकत्व उसने संघर्षों के जरिए हासिल किया है। सत्ता से मुठभेड़ें करते हुए हासिल किया है। भ्रष्ट अफसर और नेता उसके नाम से थर्राते हैं। यह खूबी आज न तो मोदी में है न शीला दीक्षित में है और न अजय माकन में है। नाम से ही भ्रष्ट अफसर थर्राएं यह चीज आम जनता के लिए चैन देने वाली है। इसलिए केजरीवाल बेहतर विकल्प है।

यह सच है कांग्रेस ने 15साल में दिल्ली के इंफ्रास्ट्रक्चर का कायाकल्प किया है लेकिन इसकी बहुत बड़ी कीमत दिल्ली को चुकानी पड़ी है। दिल्ली का सामाजिक इंफ्रास्ट्रक्चर पूरी तरह टूट गया है। दिल्ली में मूल्यहानि,पर्यावरणहानि,धनहानि,अधिकारहानि और सामाजिक असुरक्षा आम बात हो गयी है और कांग्रेस ने आलसियों की तरह यह सब देखा है। उसके अंदर इन सबसे लड़ने की कोई बेचैनी नहीं बची है।



दूसरी ओर नरेन्द्र मोदी के मैदान में आने के बाद भाजपा बेहूदे तर्कों के आधार पर चुनाव लड़ रही है। दिल्ली में सबसे भ्रष्ट नगरनिगम प्रशासन देने का वे भारतकेसरी खिताब जीत चुके हैं। उनका तर्क है चूंकि मोदी केन्द्र में जीते हैं अतः उनको दिल्ली में भी जिताओ। यह भोगी का राग है। दिल्ली में भाजपा ने विगत 15 सालों में राजनीतिक –सामाजिक क्षय में सक्रिय भूमिका अदा की है। वह कांग्रेस के लूटतंत्र का अंग बनकर काम करती रही है। उसने लोकतंत्र के स्वस्थ मूल्यों को खोखला बनाया है। लोकतंत्र को हर स्तर पर धोखा दिया है और सिर्फ लोकतंत्र के भोगियों के मन में अपील पैदा की है। मोदी का सबसे बड़ा योगदान है कि उसने लोकतंत्र को भोगियों का तंत्र बनाया है। लोकतंत्र के उपभोग की भावना पैदा की है।मोदी के सारे एक्शन भोगी के एक्शन है। लोकतंत्र में भोगी होना वस्तुतः कैंसर है।लोकतंत्र बचता तब है जब इसमें भोग और आलस्य से लड़ने वाले जज्बाती और कुर्बानी के जज्बे वाले मूल्य पैदा किए जाएं, मोदी के मूल्य भोगी के मूल्य हैं। लोकतंत्र का भोगी अकर्मण्य होता है वह संचित पूंजी खाता है। मोदी अकर्मण्य भोगी नेता है ,जिसका लक्ष्य है लोकतंत्र की एफडी (फिक्स डिपोजिट) खाना। इस परिप्रेक्ष्य में आम आदमी पार्टी एकमात्र विकल्प है जिसको कायदे से वोट दिया जाना चाहिए।

रविवार, 18 मई 2014

पापुलिज्म का प्रेत और लोकतंत्र

सन् 2014 का लोकसभा चुनाव पापुलिज्म के आधार पर लडा जाएगा। पापुलिज्म के आधार पर पहले कांग्रेस वोट जुगाड़ करती रही है। लंबे समय के बाद पहलीबार यह दृश्य नजर आ रहा है कि पापुलिज्म की प्रतिस्पर्धा में कांग्रेस से आम आदमी पार्टी और भाजपा ने बाजी मार ली है ।

सन् 1971 के चुनाव श्रीमती इंदिरा गांधी ने पापुलिज्म के आधार पर लड़ा था। उस समय नारा दिया 'समाजवाद लाओ,गरीबी हटाओ।' इसके बाद आपातकाल आया और 1977 का चुनाव 'लोकतंत्र लाओ देश बचाओ' के नारे पर लड़ा गया ।

पापुलिज्म के रुप क्षेत्रीय स्तर पर विभिन्न रुपों में अभिव्यक्त होते रहे हैं लेकिन परंपरागत पार्टी व्यवस्था को अस्वीकार करते हुए अन्ना आंदोलन का होना और बाद में उस आंदोलन से निकले लोगों के द्वारा आम आदमी पार्टी का गठन करना अपने आप में एक बड़ी परिघटना है। यह परिघटना सन् 1974 के जेपी आंदोलन से पूरी तरह भिन्न है। जेपी आंदोलन के लोगों ने जनता पार्टी का उन्हीं कायदे-कानूनों और सिद्धांतों के आधार पर गठन किया जो पहले से प्रचलन में थे ,इसके कारण उसमें शामिल विभिन्न विचारधाराओं के नेताओं और उनके अनुयायियों में वैचारिक एकीकरण नहीं हो पाया । लेकिन आम आदमी पार्टी ने एकदम भिन्न पैराडाइम से काम आरंभ किया है और अपने साथ आने का उन तमाम लोगों से आह्वान किया है जो उसके नजरिए और एक्शन से सहमत हैं ।

आम आदमी पार्टी भारत के संविधान के पैराडाइम में काम करने के वायदे के साथ मैदान में उतरी है । वे लोग संविधान में कल्पित सपने को साकार करना चाहते हैं और यह इस दल की सबसे महत्वपूर्ण बात है । हमारे देश में सक्रिय अधिकतर राजनीतिकदलों में प्राथमिकताएं बदलती रही हैं और कभी न कभी संविधान के दायरे के परे जाकर काम करते रहे हैं। मसलन् साम्प्रदायिक,आतंकवादी या पृथकतावादी संगठनों की मदद लेना या उनके साथ प्रत्क्ष –अप्रत्यक्ष संबंध बनाए रखने का काम अधिकांश प्रमुख दल करते रहे हैं । इसके अलावा लोकतांत्रिक व्यवस्था की चरमराती व्यवस्था को भी आम आदमी पार्टी ने अपनी राजनीतिक गतिविधियों में निशाने पर रखा है ।

लोकतंत्र की चरमराती स्थितियों ने अन्ना आंदोलन को राष्ट्रीय आंदोलन के रुप में विकसित होने का जनप्रिय आधार प्रदान किया और इस आंदोलन के दौरान आंदोलनकारियों ने बार-बार परंपरागत दलों की अप्रासंगिकता और असमर्थताओं की ओर ध्यान खींचकर नए दल की संभावनाओं के लिए आम जनता में भावभूमि निर्मित की । आम आदमी पार्टी के नेताओं ने यह भी रेखांकित किया कि आमलोगों की प्रचलित दलों के नेताओं के प्रति कोई आस्था नहीं है और आम जनता में इन दलों की कोई साख नहीं है।

आम आदमी फिनोमिना के पापुलिज्म को समझने के लिए हमें परंपरागत सोच की प्रक्रिया के बाहर निकलना पड़ेगा। परंपरागत सोच यह है कि पहले दल का बडा नेता या उच्च कमेटी जो कुछ कहती थी वही प्रामाणिक राजनीतिक कम्युनिकेशन माना जाता था।लेकिन इस कम्युनिकेशन से साधारण आदमी अपने को विच्छिन्न महसूस करता था और यहीं पर अन्ना आंदोलन में सड़क पर चलता फिरता आम आदमी बहुत बड़े कम्युनिकेटर के तौर पर दाखिल हो ता है। भ्रष्टाचार के सवाल पर साधारण नागरिकों के बीच में खड़े होकर अन्ना आंदोलन के नेताओं का बोलना। साधारण आदमी का भ्रष्टाचार के सवाल पर मुखर होकर टीवी के सामने बोलना,यह नया फिनोमिना था। इस प्रक्रिया में आम आदमी को राजनीतिक कम्युनिकेटर के रुप में अभिव्यक्ति का अवसर मिला और एक नए किस्म का राजनीतिक कम्युनिकेटर मीडिया और राजनीति में दाखिल होता है जो कल तक हमारे प्रचलित राजनीतिक कम्युनिकेशन के बाहर था। प्रचलित राजनीतिक कम्युनिकेशन में दलविशेष का नेता दाखिल होता था और वह अपने को प्रामाणिक राजनीतिक कम्युनिकेटर के रुप में पेश करता था। अन्ना आंदोलन और आम आदमी पार्टी ने आम आदमी को राजनीतिक अभिव्यंजना में समायोजित करके नए किस्म के राजनीतिक कम्युनिकेशन और लोकतांत्रिक संवाद को जन्म दिया।

पहले राजनीतिक दल बहुत बड़े राजनीतिक लक्ष्यों को केन्द्र में रखकर बातें करते थे, संगठन निर्माण करते थे।लोकतंत्र में कल तक नेता प्रवक्ता होते थे लेकिन आम आदमी पार्टी ने साधारणजन को राजनीतिक प्रवक्ता बनाकर लोकतंत्र की अंतर्वस्तु को ही बदल दिया ।

नेता हमेशा से किसी न किसी रुप में लोकतंत्र में समस्यामूलक रहे हैं लेकिन साधारणजन को लोकतंत्र के लिए कभी खतरा नहीं माना गया । लेकिन यह जनता के प्रति या आम आदमी के प्रति अंधश्रद्धा से पैदा हुई धारणा है।

लोकतंत्र में जनता को गैर-समस्यामूलक मानने के कारण अंधलोकवाद का खतरा हमेशा बना रहता है। जो नेता जनता की अंधी भक्ति करके जन-जागरण के नाम पर जनोन्माद पैदा करते हैं वे अंततः लोकतंत्र विरोधी दिशा में गए हैं ।

आम आदमी कहें या साधारणजन या जनता कहें, हमें जनता को अनालोचनात्मक ढ़ंग से नहीं देखना चाहिए। अनालोचनात्मकता लोकतंत्र की मौत है। लोकतंत्र में शिरकत बढ़ाने के लिए जनता के प्रति आलोचनात्मक नजरिया जरुरी है।

जनशिरकत के नाम पर ,जन समाधान के नाम पर हमेशा पापुलिज्म ने कॉमनसेंस समाधानों की सिफारिश की है। कॉमनसेंस समाधानों की बजाय संस्थानगत ,नियम-कानू बनाकर समाधान खोजे जाने चाहिए।

यह सच है कि भ्रष्टाचार समस्या है,महंगाई समस्या है,लेकिन इसके समाधान कॉमनसेंस के आधार नहीं खोजे जाएं । इसके लिए संरचनात्मक परिवर्तनों पर जोर दिया जाय । संरचनात्मक परिवर्तनों को करते समय पहले से उपलब्ध अधिकारों को कम नहीं किया जाना चाहिए बल्कि उनमें इजाफा करने वाले समाधान सुझाने की जरुरत है। मसलन्, सोवियत संघ और अनेक समाजवादी यूरोपीय देशों में समाजवाद के खिलाफ भायानक जनोन्माद देखने में आया । समाजवाद विरोधी पापुलिज्म को लोकतंत्र की आंधी या तूफान या उभार आदि नामों से पुकारा गया। लेकिन इस समूचे उभार में यह भूल ही गए कि कहीं समाजवाद में जो जन अधिकार और जन सुरक्षा प्राप्त थीं कहीं वे ही कम न हो जाएं। वास्तव में यही हुआ। येरोप का तथाकथित जनउभार समाजवाद को धराशायी करने में सफल रहा । आम जनता खुश थी कि समाजवादी व्यवस्था खत्म हो गयी। लेकिन इस समूची प्रक्रिया में वे भूल ही गए कि समाजवाद के दौरान जो अधिकार और सामाजिक सुरक्षाएं प्राप्त थीं वे भी आम जनता के पास से चली गयीं। इसे कहते हैं अंधलोकवाद।

अंधलोकवाद हमारे सामने अनेकबार जिन समाधानों को लेकर आता है हम उसकी दूरगामी परिणतियों को नहीं देपाते , वह हमारे सामने तात्कालिक समाधान पेश करता है और तात्कालिक समाधानों से हमे एक हद तक राहत भी मिलती है। मसलन्, समाजवाद में अभिव्यक्ति की आजादी नहीं थी, निजी स्वतंत्रता नहीं थी। समाजवादी व्यवस्था के पतन के साथ ही नागरिकों को निजी अभिव्यक्ति की आजादी मिली, निजी स्वतंत्रताएं भी मिलीं। लेकिन इस प्रक्रिया में पहले से उपलब्ध सुरक्षाएं और अधिकार चले गए । समाजवाद में स्त्रियां सुरक्षित थी,सामाजिक सुरक्षा की गारंटी भी थी, लेकिन समाजवाद के पतन के साथ ही सामाजिक सुरक्षाएं खतरे में पड़ गयीं और औरतों के सामने अनेक किस्म की असुरक्षाएं आ खड़ी हुईं। इसके कारण लाखों औरतें जिस्म की तिजारत करने के लिए मजबूर हुईं। हठात संचित धन मुद्रा के अवमूल्यन के कारण कौडियों में तब्दील हो गया और रातों-रात राज्य की संपदा की लूट करके अरबपतियों का लुटेरा जगत पैदा हो गया ।

जो लोग समाजवाद में मानवाधिकारों के हनन को लेकर परेशान थे और आलोचनाएं कर रहे थे, खासकर कम्युनिस्ट पार्टी के नेता और कार्यकर्ता ही यह शिकायत कर रहे थे, उनकी इस संदर्भ में शिकायतें जायज थीं , इसके लिए जरुरी था कि समाजवादी संरचनाओं में मानवाधिकार के संरचनात्मक सुधार ईमानदारी से लागू किए जाते। लेकिन यह काम न करके समूचे समाजवाद को ही ध्वस्त करके लोकतंत्र के निर्माण का जो मार्ग चुना गया वह आत्मघाती और जन-उत्पीडक मार्ग था। यह अंधलोकवाद से पैदा हुआ मार्ग था।

लोकतंत्र के लिए संघर्ष करें या समाजवाद के लिए संघर्ष करें या फिर किसी यूनियन की मांगों के लिए संघर्ष करें, बुनियादी तौर पर यह ध्यान रखें कि नई मांग के मानने से कहीं पहले से प्राप्त अधिकार कम तो नहीं जाएंगे। आंदोलन का अर्थ उपलब्ध जनाधिकार और सुविधाएं खोना नहीं बल्कि उनको बचाए रखकर नए अधिकार पाना है। जनांदोलन खोने के लिए नहीं किए जाते । जो जनांदोलन पहले से उपलब्ध हकों को कम कर दे वह आत्मघाती आंदोलन है। वह जनघाती आंदोलन है । समाजवाद के खिलाफ पूर्वी यूरोपीय देशों और समाजवादी देशों में चले सभी जनांदोलन इसी अर्थ आत्मघाती साबित हुए हैं उनसे सोवियत संघ और कमजोर हुआ,सोवियत संघ का विभाजन हो गया। तमाम समाजवादी यूरोपीय देश पहले की तुलना में कमजोर हो गए,विभाजित हो गए । जो आंदोलन देश को तोडे,विभाजित करे, वह आत्मघाती जनांदोलन है। इस विवेचन में जाने का मकसद यह है कि बार-बार जनांदोलनों के नाम पर तमाम अकादमिक और राजनीतिक विमर्श में पापुलिज्म के बारे में जितना लिखा गया है उसमें समाजवादी देशों में चले समाजवाद विरोधी पापुलर आंदोलनों को प्रमुख संदर्भ सूत्र बनाया गया है।

'पापुलिज्म' क्या है ? यह जन-असंतोष है। जब व्यवस्था या नेता समस्या का समाधान जने में असफल होते हैं और आम जनता के पास कोई विकल्प नहीं होता तो हमेशा जन-असंतोष की शक्ल में पापुलिज्म अपने को अभिव्यक्त करता है। जन-असंतोष का अवरुद्ध विकास से गहरा संबंध है । पापुलिज्म की अभिव्यक्ति कईबार सांस्कृति रुपों में होती है ,लेकिन वहां पर वो जनशिरकत,जनता के आनंद और धार्मिक-सांस्कृतिक जलसों के रुपों में व्यक्त होता है ।

भ्रष्टाचार का मौजूदा नियमों के तहत व्यवस्था समाधान नहीं दे पा रही थी तो पापुलर अभिव्यक्ति के रुप में कईबार इसकी अभिव्यक्ति हो चुकी है लेकि हमेशा इसकी अभिव्यक्ति सरकार हटाओ आंदोलन में तब्दील होती रही है। मसलन्, संपूर्ण क्रांति आंदोलन,नवनिर्माण आंदोलन या वीपी सिंह का बोफोर्स भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन हो, इन सबकी समस्या थी भ्रष्टाचार लेकिन मांग थी सरकार बदलो। इससे भ्रष्टाचार ज्यों का त्यों बना रहा सरकारें गिर गयीं और बदल गयीं । लेकिन भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना आंदोलन इस अर्थ में भिन्न था कि इसका लक्ष्य सरकार गिराना नहीं था बल्कि भ्रष्टाचार निरोधक संरचनाओं और कानूनों का निर्माण करना था ।

अन्ना आंदोलन इस अर्थ में महत्वपूर्ण है कि उसके दबाव में सरकार थी और संसद थी। सरकार और संसद दोनों ने माना की भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों का निर्माण किया जाय। जनलोकपाल कानून बनाया और उससे जुड़े तमाम कानून बनाए जाएं । इस आंदोलन ने सरकार के खिलाफ गुस्सा पैदा किया लेकिन सरकार को गिराया नहीं,सरकार को मजबूर किया कि वो जनता की सुने और संरचनात्मक समाधान खोजे ।

भारत में 'पापुलिज्म' के कई रुप रहे हैं जैसे मातृभाषा आंदोलन,अंग्रेजी हटाओ आंदोलन,गो रक्षा आंदोलन, राममंदिर आंदोलन, आरक्षण विरोधी आंदोलन,विभिन्न राज्यों में पृथकतावाद और अंध क्षेत्रीयतावाद के आंदोलन,आपातकाल विरोधी आंदोलन,भाषावार राज्य निर्माण आंदोलन,नए राज्य बनाने के आंदोलन और जन समस्याओं पर केन्द्रित युवा आंदोलन जैसे संपूर्ण क्रांति,नवनिर्माण आंदोलन ,अन्ना आंदोलन आदि । कहने का तात्पर्य है कि पापुलर आंदोलन हमेशा सही नहीं होते । पापुलर आंदोलन में जनता की बेशुमार शिरकत देखकर उन्मादित होकर निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए । पापुलर आंदोलन में चूंकि जनता शामिल है इसलिए उसका समर्थन करो इस विचार से बचने की जरुरत है ।

पापुलर आंदोलन को देखने का आधार है उस आंदोलन का नजरिया और कार्यक्रम। नजरिए और कार्यक्रम के आधार ही तय किया जा सकता है कि संबंधित आंदोलन जनहित और समाजहित में है या सामाजिक विभाजनकारी है ।

समस्या विशेष पर जनसमूह की लामबंदी पापुलर जनांदोलन बनाती है लेकिन यह परिभाषा काफी अमूर्त है। समस्या, एकजुट जनसमूह और निरंतर आंदोलन मात्र से पापुलिज्म को परिभाषित करने में दिक्कतें हैं।

'पापुलिज्म' स्वयं में अमूर्त वैचारिक पदबंध है। किसी भी पदबंध की अमूर्तता को तोड़ने के लिए उसकी विचारधारात्मक पड़ताल की जानी चाहिए। इसी तरह पापुलिज्म की पड़ताल के लिए भी प्रत्येक पापुलर आंदोलन का विचारधारात्मक विश्लेषण किया जाना चाहिए। विचारधारा विश्लेषण के दौरान ही पता चलेगा कि संबंधित आंदोलन की मांगें क्या हैं ? जनाधार किन वर्गों में है ? राजनीतिक मंशा क्या है और नजरिया क्या है ? और सामाजिक-राजनीतिक परिणतियां क्या हो सकती हैं ? आदि ।

भारत में 'पापुलिज्म ' के फ्रेमवर्क में जन्मे अधिकांश आंदोलन सरकार बदलने या सरकार पाने के आंदोलन रहे हैं । सिर्फ दो आंदोलन इसके अपवाद हैं, आपातकाल विरोधी आंदोलन और अन्ना का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन। इन दोनों आंदोलनों के कारण संविधान में संशोधन हुए । आपातकाल विरोधी आंदोलन के कारण 42वां संविधान संशोधन नए 43वें संविधान संशोधन के जरिए निरस्त किया गया और नए संविधान संशोधन के जरिए आंतरिक आपातकाल लगाना मुश्किल बना दिया गया । वहीं पर अन्ना आंदोलन के कारण भ्रष्टाचार विरोधी अनेक कानूनी परिवर्तन आए हैं और अनेक भविष्य में आएंगे ।

भारत में 'पापुलिज्म' का एक साइडइफेक्ट यह है कि इसने हमेशा प्राकारान्तर से लोकतांत्रिकचेतना में इजाफा किया है और संवैधानिक सचेतनता बढायी है। मसलन्, पंजाब का खालसा आंदोलन हो या दार्जिलिंग का गोरखालैंड या मिजोरम का पृथकतावादी आंदोलन हो या असम गण संग्राम परिषद और आसू का असम छात्र आंदोलन हो, इन सभी आंदोलनों के जरिए सारे देश में सुधाजनों के बीच में लोकतांत्रिक विमर्श का विस्तार हुआ है और लोकतंत्र के पाठ को संविधान के पावधानों को बार-बार सिरे से व्याख्यायित किया गया है । इस परिप्रेक्ष्य में भारतीय लोकतंत्र में पापुलिज्म प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्षतौर पर लोकतंत्र को समृद्ध करता रहा है ,जहां पर वह यह काम नहीं कर पाया है वहां पर पापुलिज्म पिटा है और हाशिए पर चला गया है। पंजाब,दार्जिलिंग, मिजो आंदोलन,नागा आंदोलन,आसू का आंदोलन इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।

भारत का लोकतंत्र बहुत समृद्ध है और इसकी संरचनाएं बेहद सक्रिय हैं। इसमें शासन करने वाले नेताओं के कान भी हैं। इसका सुफल यह है कि भारत में पापुलिज्म कभी पश्चिमी देशों की तरह अंधड़ नहीं बन सकता । पश्चिमी देशों में पापुलिज्म को आंधी के रुप में चलते देखा गया है लेकिन भारत में पापुलिज्म आरंभ कभी आंधी के रुप में नहीं हुआ । पापुलिज्म हमेशा धीमी गति से आया, जरम पर जाकर आंधी बना है और उसके बाद ढलान पर लुढ़कता चला गया है । हमारे संविधान में पापुलिज्म के समाधान हैं और जिन सवालों पर समाधान नहीं मिलते उन पर नेताओं और दलों ने मिलकर समाधान खोजे हैं, जब ये दोनों विफल रहे हैं तो न्यायपालिका ने समाधान पेश किए हैं । अनेक समस्याएं हैं जिनके प्रङावशाली समाधान, कानून में नहीं हैं, संविधान में नहीं है।दलों में एकमत के अभाव के कारण समाधान बन नहीं पा रहा है तो अदालत के हस्तक्षेप से समाधान निकलता रहा है ।हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को ध्यान से देखें जिसमें दो साल या उससे ज्यादा सजा पाए नेता को संसद-विधानसभा का चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित कर दिया गया। यह मसला राजनीतिकदलों में हल नहीं हो पा रहा था, संसद और चुनाव आयोग भी तय नहीं कर पा रहे थे।लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने फैसला देकर चुनाव आयोग को व्यवस्था करने का आदेश दे दिया। ऐसे अनेक विवाद हैं जिनका समाधान संसद में नहीं निकलता लेकिन सुप्रीम कोर्ट में निकल आता है। कहने का तात्पर्य है कि भारत में लोकतंत्र को सक्रिय और जीवंत बनाए रखने में न्यायालयों की बड़ी भूमिका रही है। कम से कम पश्चिमी देशों में लोकतंत्र के हित में न्यायालय दखल नहीं देते।

'पापुलिज्म' के हथियार का आमतौर पर दक्षिणपंथी विचारधारा के संगठन इस्तेमाल करते रहे हैं। मसलन्, राम मंदिर आंदोलन आंदोलन के नाम पर पूरे देश में बाबरी मस्जिद को नष्ट करने के लिए पूरी शक्ति के साथ आंदोलन संघ परिवार-भाजपा आदि ने आरंभ किया। लेकिन इन्हीं संगठनों ने सर्वधर्मसमभाव के लिए आंदोलन नहीं किया । बाबरी मस्जिद गिराने के लिए मुहिम चलायी गयी लेकिन देश के सभी मंदिर- मस्जिद-गुरुद्वारों-गिरजाघरों की रक्षा के लिए आंदोलन नहीं चलाया गया। इन दिनों नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में विकास की बातें की जा रही हैं लेकिन विकास के किसी भी ठोस प्रस्ताव के बिना। विकास को अमूर्त बनाकर पेश किया जा रहा है। समानता की बातें की जा रही हैं लेकिन छोटे-बड़े,ऊँच-नीच के भेदो को खत्म करने की बातें नहीं हो रही हैं । ऐसे में सवाल उठता है कि समानता तो होगी लेकिन छोटे-बड़े का भेद बनाए रखकर। विकास तो होगा लेकिन गरीब-अमीर का भेद बनाए रखकर। विकास की बातें करते समय अमीर-गरीब के भेद की अनदेखी करने का अर्थ है एकायामी विकास करना । विकास के मॉडल में अमीर-गरीब का भेद केन्द्र में रखे बिना बातें नहीं हो सकतीं। सत्ता के विकेन्द्रीकरण की बातें तब तक बेमानी है जब तक शक्तिशाली और शक्तिहीन के भेद को सम्बोधित न करें।

इसी तरह पंचायतें होने का अर्थ आम आदमी तक लोकतंत्र का पहुँचना नहीं है आम आदमी तक लोकतंत्र तब पहुँचता है जब फैसला लेते समय पंचायतें लिंग, जाति, सामाजिक हैसियत आदि को सम्बोधित करते हुए फैसले लें ,फैसले में सभी वर्ग के लोगों की शिरकत हो। अभी हमारे यहां लोकतांत्रिक संरचनाएं सामाजिक हैसियत का अंग हैं। यह स्थिति जब तक रहेगी निचले स्तर पर सामाजिक भेद,ऊँच-नीच का भेद, स्त्री-पुरुष का भेद बना रहेगा।

'पापुलिज्म' जब आंदोलन करता है तो राजनीतिकदलों को चुनोती देता है, उनकी विचारधारा को चुनौती देता है। इसके अल्वा वह दैनंदिन जीवन शैली और उपभोग को भी चुनौती देता है। सामाजिक संबंधों और सामाजिक विश्वासों को भी चुनौती देता है । इससे भी बड़ी बात यह है कि वह हमेशा औरतों के अधिकारों अस्तित्व को खतरे में डालता है।

भारत में पृथकतावादी आंदोलनों से से लेकर राममंदिर आंदोलन तक ,सभी पापुलर आंदोलनों का यह साझा अनुभव है कि औरतों के लिए इस तरह के आंदोलन सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आते हैं । हिन्दुत्व के नए उभार ने युवा लड़के-लड़कियों के उदार सामाजिक संबंधों और उदार जीवन शैली पर सबसे पहले हमला किया। अंतर्जातीय ,अंतर्धामिक विवाह करने से बढ़-चढ़कर रोका गया। जगह-जगह प्रेमी युगलों पर वेलेंटाइन डे के मौके पर हमले किए गए, उनके लिए ड्रेसकोड,फोनकोड, आवागमन कोड आदि के नाम पर नित नई संहिताएं और आदेश जारी किए गए। कहने का तात्पर्य है कि 'पापुलिज्म' सिर्फ राजनीतिकदलों को बी प्रभावित नहीं करता बल्कि पूरे समाज को और खासकर औरतों को सबसे ज्यादा पकरता है । हिदुत्व के नए उभार ने शादी-ब्याह में दहेज की मांग, सुंदर-सलोनी दहेज युक्त घरेलू स्त्री की मांग को जनप्रिय बनाया है । वैचारिकतौर पर 'पापुलिज्म' हमेशा पितृसत्ता की विचारधारा को पुख्ता बनाता है। इस अर्थ में वह वैचारिकतौर पर प्रतिक्रियावादी होता है । उल्लेखनीय है अन्ना के इलाके में पितृसत्ता का वर्चस्व है।

'पापुलिज्म' हमेशा वैचारिक शार्टकट मारता है और हमेशा प्रतिस्पर्धी भाव में सक्रिय रहता है। यह दीर्घकालिक फिनोमिना नहीं है। 'पापुलिज्म' के रुप में समाजवाद,धर्मनिरपेक्षता, विकेन्री लकरण या स्वस्थ लोकतांत्रिक जीवन मूल्य आंदोलन के रुप में अभिव्यक्त होते हैं तो इससे लोकतंत्र समृद्ध होता है। क्योंकि ये सब तत्व लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन प्रतिक्रियावादी पापुलिज्म हमेशा लोकतंत्र को क्षतिग्रस्त करता है। कहने के लिए राष्र् वाद,संकीर्णतावाद,क्षेत्रीयतावाद को लोकतंत्र का अंग माना जाता है लेकिन ये लोकतंत्र को पंगु बनाने वाले तत्व हैं ।

आम आदमी पार्टी का फिनोमिना सकारात्मक लोकतांत्रिक फिनोमिना है और लोकतांत्रिक 'पापुलिज्म' का हिस्सा है। उसी तरह यूपीए-2 के द्वारा उटाए गए अनेक संवैधानिक-संरचनात्मक सुधार और पापुलर कार्यक्रम जैसे सूचना प्राप्ति का अधिकार,सबके लिए भोजन, सबके लिए शिक्षा,मनरेगा,जन लोकपाल, आदि 'लोकतांत्रिक पापुलिज्म' का हिस्सा हैं ।

( यह लेख लोकसभा चुनाव की प्रक्रिया आरंभ होने के पूर्व लिखा गया)















शनिवार, 17 मई 2014

कांग्रेस की पराजय के प्रमुख कारण

इस बार के लोकसभा चुनाव में विकास के मुद्दे ने सभी मुद्दे अपहृत कर लिए इन अपहृत मुद्दों में बड़ा मुद्दा स्त्री के अधिकारों और सुरक्षा संबंधी मसलों से जुड़ा था। यह दुर्भाग्यजनक है कि स्त्री के सवाल जो विगत दो साल से मीडिया में सबसे ज्यादा स्थान घेरे रहे वे सवाल मीडिया में से ठेलकर बाहर कर दिए गए। यह प्रक्रिया क्यों और कैसे संपन्न हुई यह विचारणीय समस्या है। दूसरी बड़ी समस्या यह है कि नव्य उदार आर्थिक नीतियों के जनविरोधी पहलू की तो चर्चा हुई लेकिन विकल्प की नीतियों पर कोई बात नहीं हुई।

कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व ने इसबार के लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ी चूक यह की कि उसने मनमोहन सिंह को सामने रखकर चुनाव नहीं लड़ा। भारतीय समाज में बूढ़ा नेता साखदार होता है। मनमोहन सिंह को सामने रखकर चुनाव लड़ा जाता तो परिणाम भिन्न होते और राजनीतिक जबावदेही के नाते उन्हें जनता में भेजना चाहिए था लेकिन अफसोस यह कि जनता में मनमोहन कम से कम गए। मनमोहन सिंह देश की नीतियों के प्रतीक हैं वे चुनाव के समय चुप रहेंगे तो यह बात देश की जनता हजम नहीं कर सकती।

कांग्रेस के दोनों नेताओं सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने  कांग्रेस की पराजय तो मानी  लेकिन इस पराजय में कांग्रेस की जनविरोधी नीतियों और कांग्रेसी नेता और जनता के बीच में पैदा हुए अलगाव को नहीं देखा।
   कांग्रेस को रेखांकित करना चाहिए कि वे कौन सी नीतियां है जिनके कारण जनता से कांग्रेस का अलगाव बढ़ा। कांग्रेस यदि अपनी नीतियों के जनविरोधी चरित्र को नहीं देखेगी तो वह पराजय के सही कारणों को नहीं खोज पाएगी। वह यह भी नहीं देख पाएगी कि कांग्रेस का क्षय क्यों हो रहा है।
कांग्रेस को बताना होगा कि उसकी नीतियों के गर्भ से भाजपा जैसा अनुदार दल शक्तिशाली कैसे बना। भाजपा की शक्ति में इजाफा मनमोहन युग में हुआ है। कांग्रेस ने जिस ग़रीब विरोधी एजेण्डे को राजनीतिक बुलंदियाँ पर पहुँचाया है उसे चुनौती देना फ़िलहाल किसी भी दल का लक्ष्य नहीं है फलत:विकल्पहीनता पैदा हुई है और इस विकल्पहीनता को मोदी ने आक्रामक नव्य उदार एजेण्डे से भरा है और इस काम में जनता ने मोदी के हाथों सत्ता सौंपकर अपने लोकतांत्रिक दायित्व का पालन किया है।
अब देखना है कि मोदी अपने कार्यकाल में कांग्रेस की जनविरोधी नीतियों को ख़त्म करते हैं या उन पर ही चलते हैं ? यहाँ नेता बदला है, दल बदला है। नव्य उदार आर्थिक नीतियाँ नहीं बदली हैं। देखना होगा मोदी नव्य उदार नीतियों के प्रति संघ के स्वदेशी एजेण्डे के साथ आते हैं या मनमोहन नीतियों को जारी रखते हैं।






शनिवार, 31 अगस्त 2013

मनमोहन नीतियों का उल्टा खेल

भारत की अर्थव्यवस्था में अनेक समस्याएं हैं, विश्वमंदी का असर है, औद्योगिक उत्पादन कम हुआ है, भ्रष्टाचार चरम पर है,रूपया लुढ़क रहा है।बेकारी और मंहगाई है, इसके बाबजूद हालात बहुत खराब नहीं हैं। बैंकों में पर्याप्त पैसा है। सरकारी कर्मचारियों को नियमित पगार मिल रही है। संकट के बाबजूद साढ़े चार फीसदी विकास दर बनी हुई है। निवेश का माहौल भी है। कोई बैंक दिवालिया नहीं हुई है। 
जीवन की गति और विकास की गति में द्वंद्व और तनाव है लेकिन विकास धीमी गति से जारी है। इस स्थिति का श्रेय नेहरूयुगीन नीतियों के द्वारा निर्मित ठोस आर्थिक आधार को जाता है। मनमोहन सिंह के अनेक प्रयासों के बाबजूद बैंकिंग प्रणाली से लेकर अन्य क्षेत्रों में नियमों की विदाई नहीं की गयी और इसमें मजदूरों-किसानों के संगठनों खासकर वामदलों और कांग्रेस के अंदर सक्रिय नेहरूपंथियों की भी भूमिका रही है।
नव्य उदारवादियों की मांग थी कि अर्थव्यवस्था की सारी खिड़कियां खोल दो।यह मांग वामदलों ने कभी नहीं मानी और कहा था सारी खिड़कियां मत खोलो वरना ग्लोबल हवा में वह जाओगे वैसे भी जितनी खिड़कियां खोल रहे हो उससे भी प्रदूषित हवा ही आएगी और अब यह धारणा सही साबित हुई है।
कल मनमोहन सिंह संसद में मैन्यूफैक्चरिंग पर जोर दे रहे थे, ये ही साहब विगत बीस सालों से सेवाक्षेत्र पर जोर दे रहे थे। कल मनमोहन सिंह सादगी और कम खर्चे की बात कर रहे थे बीस सालों से खूब खर्च करो,बचत कम और खर्चे ज्यादा करो ,का नीतियों के तहत सुझाव दे रहे थे।
उपभोक्तावाद को बेलगाम हवा देने में मनमोहन सिंह की अक्षम्य भूमिका रही है। उनकी नीतियों ने सादगी को समाज में घृणा की चीज बना दिया है। अमीरी और शानोशौकत को आदर्श जीवन शैली बना दिया है। इसका ही दुष्परिणाम है कि आज मनमोहन सिंह कह रहे हैं सोना मत खरीदो। कांग्रेस को मनमोहन सिंह की नीतियों का उपभोक्तावादी और उपभोगवादी पैराडाइम बदलने के प्रयास करने चाहिए। मनमोहन सिंह और आनंद शर्मा ने विपक्ष और न्यायालयों को विकास का शत्रु या बाधक कहा है। असल में अवरूद्ध विकास तो मनमोहन सिंह की नीतियों में ही है। इनलोगों ने उत्पादक शक्तियों और बुनियादी उद्योगों के निर्माण पर कम जोर दिया और सेवाक्षेत्र पर ज्यादा जोर दिया। असंतुलित परिणाम सामने हैं। मनमोहन सिंह से पूछा जाए कि उनके विगत 9साल के शासन में केन्द्र सरकार ने कितने बड़े बुनियादी क्षेत्र में उद्योग स्थापित किए और जिन कारपोरेट घरानों के वे छूट और सहायता देते रहे हैं उनके द्वारा कितने बड़े उद्योग स्थापित किए गए ? मनमोहन सिंह से सवाल है कि उन्होंने क्या भिलाई जैसा कोई कारखाना स्थापित किया ? क्या दूरसंचार जैसा महान नेटवर्क स्थापित किया ? जी नहीं उल्टे दूरसंचार को निजीक्षेत्र को सौंप दिया ,मनमोहन सरकार को संचित पूंजी को खाने वाली सरकार कहा जा सकता है।

मंगलवार, 25 जून 2013

फेसबुक विचार वैतरणीः भाजपा और 2014 का लोकसभा चुनाव




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BJP अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने भाजपा को असली भगवा रंग में पेश करके भाजपा का राजनीतिक भविष्य अंधकारमय कर दिया है। राजनाथ सिंह ने धर्मनिरपेक्षता को बीमारी कहा है और उसे बुरा माना है। उन्होंने कहा- “You know there is a disease called encephalitis which is very bad .....similarly there is another disease called secularitis from which the Congress and its allies are suffering in the manner they have been trying to create a divide on the lines of secularism and communalism in the country,”( हिन्दू,24जून 2013)

राजनाथ सिंह ने इस बयान के जरिए धर्मनिरपेक्षता पर हमला किया है। कल मोदी ने राष्ट्रवादीभावबोध से हमला किया था।आज धर्मनिरपेक्षता पर हमला किया गया,अगला हमला संभवतः राष्ट्रीयएकता पर होगा।
धर्मनिरपेक्षता भारतीय जीवन का महासच है, और साम्प्रदायिकता लघुसच है, यह देखना होगा कि देश की जनता किस सच को स्वीकार करती है।
साम्प्रदायिक भाजपा-संघ परिवार-मोदी को देश की जनता लगातार ठुकराती रही है। भाजपा को अपनी राजनीतिक महत्ता का अहसास हो जाएगा यदि वे इसबार अकेले चुनाव लड़ लें।
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भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा है- “Our country must be saved from this disease (secularitis),” he said and urged all political parties to oppose it.
यानी देश को फंडामेंटलिज्म और प्रतिक्रियावादी राजनीति की ओर ले जाने का आह्वान किया है राजनाथ सिंह ने। राजनाथ सिंह जबाव दें कौन सा देश है जो फंडामेंटलिज्म या अनुदारवादी नीतियों के आधार पर अपना प्रगतिशील ढ़ंग से विकास कर पाया है ? आधुनिक होने के लिए धर्मनिरपेक्ष होना जरूरी है।
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जो लोग गुजराती अस्मिता और गुजराती जातीयता को आगामी चुनाव में भाजपा के वोटबैंक का आधार बनाकर मोदी को नेता बनाना चाहते हैं वे जानलें कि आंध्र में क्या हो रहा है।
आंध्र में आज विभाजन का खतरा साक्षात खड़ा है,यह तेलुगू जातीयता के राज्य विभाजन की नई दिशा है। यह वैसे ही है जैसे राममंदिर आंदोलन के बाद हिन्दू उन्माद पैदा करके भाजपा-कांग्रेस आदि ने मिलकर यूपी-मध्यप्रदेश और बिहार को विभाजित किया।
कहने का मतलब है जातीयता और राष्ट्रवाद के आधार मोदी जो राजनीति कर रहे हैं वह विभाजनकारी है और इसके कभी भी कहीं पर भी सुखद परिणाम नहीं निकले हैं। यह बात योरोप से लेकर भारत तक सही है।
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भाजपा -संघ परिवार और मोदी को इस सवाल का जबाव देना होगा कि उनका आगामी लोकसभा 2014 चुनाव में एजेण्डा राष्ट्रवाद है या राष्ट्रीय विकास है ?
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जो राजनेता अपने तुच्छ राजनीतिक स्वार्थ के लिए राष्ट्रीयता का इस्तेमाल करते हैं वे यह भूल जाते हैं कि राष्ट्रीयता में अंतर्गृथित तौर पर विभाजनकारी तत्व शामिल रहता है। राष्ट्रीयता कभी भी साम्प्रदायिकता या पृथकतावाद या आतंकवाद में रूपांतरित हो सकती है।
नरेन्द्र मोदी ने गुजराती अस्मिता और गुजराती जातीयता के सवाल को जिस शक्ति के साथ उठाया उसने स्वाभाविकतौर पर साम्प्रदायिक हिंसाचार में रूपान्तरण किया, यह हिंसा तब भी होती यदि गोधराकांड न होता।
पंजाब में अकालियों की पंजाबी जातीयता का हश्र हम देख चुके हैं.शिवसेना के मराठी जातीयता के विभाजनकारी रूपान्तरण से हम बाकिफ हैं।
सवाल यह है कि मोदी,भाजपा या संघ परिवार जातीय उन्माद और राष्ट्रवाद को छोड़कर आगामी चुनाव लड़ता है या नहीं ? ये दोनों ही प्रवृत्तियां आधुनिक भारत के निर्माण में सबसे बड़ी बाधा हैं।
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मोदी और भाजपा को यह बात समझ में आ गयी है कि गुजरात महान,गुजराती जातीयगर्व आदि के आधार पर मोदी राष्ट्रीयनेता नहीं बन सकते। यह राष्ट्रीयता की सीमा है। नरेन्द्र मोदी ,संघ परिवार और भाजपा को यह बात समझनी होगी कि राष्ट्रीयता के ईंधन से देश की अन्य राष्ट्रीयताओं में अपील पैदा नहीं की जा सकती।
राष्ट्रीयता का उन्माद एक सीमा के बाद राजनीतिक बेड़ी बन जाता है और यही कष्ट इनदिनों मोदी का है। वे गुजराती राष्ट्रीयता की जंजीरों में बंधे हैं। ये बेडियां उन्होंने ही डाली हैं, अब वे इनको तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं इसमें उनको शायद ही सफलता मिले। क्योंकि वे अपना राष्ट्रीयताप्रेम खारिज कर नहीं सकते और बिना राष्ट्रीयताप्रेम खारिज किए राष्ट्रप्रेम पैदा नहीं होता। डर है कि गुजराती राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद के द्वंद्व में भाजपा अपनी गुजरात के संसदीय आधार से हाथ न धो बैठे.
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कल (22जून2013 )जब नरेन्द्र मोदी पंजाब से अपना चुनाव अभियान शुरू कर रहे थे तो अचानक उन्हें कश्मीर के युवाओं का खूब ख्याल आया, सवाल यह है कि चुनावी प्रचारसभा में ही ख्याल क्यों आया ,पहले कभी मोदी को कश्मीर के युवा नजर क्यों नहीं आए ? असल में युवाओं को मोदी राष्ट्रवादी उन्माद का ईंधन बनाने की कोशिश कर रहे थे। जो नेता युवाओं को राष्ट्रवाद का ईंधन बनाता है वह उनका सबसे ज्यादा नुकसान करता है। आज के दौर में राष्ट्रवाद कैंसर है।
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कोई ये बता सकता है कि गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी ने किस फार्मूले से केवल गुजरातियों को चुनचुनकर सड्क और हवाई मार्ग से राहत सुविधाएं मुहैया करवाई होंगी। क्‍या प्रांतीयता पूछकर राहत कार्य संभव है्।(सुधासिंह का स्टेटस)
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केदारनाथ आपदा में फंसा है वहां मदद की जरूरत है ,सन् 2014 के लोकसभा चुनाव अभी बहुत दूर हैं ,लेकिन नरेन्द्र मोदी चुनावप्रचार पर निकल दिए हैं। इसे क्या कहें -चुनावप्रेम या देशप्रेम ?
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बिहार के मुख्यमंत्री ने नरेन्द्र मोदी को कारपोरेट घरानों के साथ जोड़ा है और इसी प्रसंग में मुझे आडवाणी की सबसे रोचक टिप्पणी याद आ रही है। उन्होंने लिखा है- "देश में राजनीतिक भ्रष्टाचार के बारे में सन 2008 के राष्ट्रमंडल खेलों से सुना जा रहा है जिसके चलते हमारे राष्ट्र की काफी बदनामी हुई है। परन्तु वर्तमान के दौर में अलग श्रेणी के नायकों के शामिल होने से यही तथ्य उभरता है कि इस सभी गिरावट की जड़ में पैसा मुख्य है।

किसी ने सही ही कहा है: धन रखना बहुत अच्छा है; यह एक मूल्यवान चाकर हो सकता है। लेकिन धन आपको रखे तो यह ऐसा है जैसे कोई शैतान आपको पाल रहा है, और यह सर्वाधिक स्वार्थी और खराब किस्म का शैतान है!"
यहां जोडें यदि धनवान पाले तो हैवान हो सकता है।
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मोदी के नवरत्न अदालत के जरिए पुरस्कृत- एनडीए के टूटने की खबरों के बीच बीजेपी कैंपेन कमिटी के अध्यक्ष और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को करारा झटका लगा है। गुजरात में नरेंद्र मोदी सरकार में सीनियर मंत्री बाबूभाई बुखेरिया को अवैध खनन मामले में पोरंबदर की एक अदालत ने सजा सुनाई है। अदालत ने गुजरात के जल संसाधन मंत्री बुखेरिया और 3 अन्य लोगों के साथ 3 साल कैद की सजा सुनाई है। बुखेरिया पर 5 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है।
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आज आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और लालकृष्ण आडवाणी के बीच मुलाकात हुई और तकरीबन 45 मिनट बातें हुईं। इस बातचीत में आडवाणी ने मोदी के खिलाफ एक पूरी चार्जशीट दी है और अपनी राय रखकर समझाने की कोशिश की है संघ का नया दांव भाजपा का देश में राजनीतिक अलगाव बढ़ाएगा। इस पर मोहन भागवत सहमत नहीं थे। अंत में दोनों में मोदी पर कोई सहमति नहीं बन पायी है। संभावना यह है कि मीडिया और इंटरनेट में आडवाणी अपने हमले और तेज करेंगे।
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भाजपानेता लालकृष्ण आडवाणी ने अपने ब्लॉग में एक सुंदर उद्धरण दिया है,
डेविडसन की टिप्पणी है: ”पैसा नगण्य है। लेकिन इससे जो सिध्दान्त स्थापित हुआ है, और जो इतिहास फिर से लिखा गया है, वह अथाह है।”
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भाजपा का पुनःहिन्दुत्व की शरण में लौटना इस बात का संकेत है कि भाजपा के पास 21वीं सदी का कोई सपना नहीं है। वे हिन्दुओं को गरमाकर कुछ समय बाद अलकायदा टाइप दिशा ग्रहण करेंगे। यह बात आडवाणी पहचान रहे हैं और यही वह बिंदु है जहां पर उनको चुप रहने को कहा गया है।
आज भाजपा के सामने दो रास्ते हैं -1.एनडीए का रास्ता और 2.अलकायदा रास्ता। अलकायदा रास्ता प्रकारान्तर से कांग्रेस की सेवा है और भारत की सत्ता राहुल गांधी को सौंपने की एक तरह से प्रच्छन्न घोषणा भी है।
मोदी वैसे ही लड़ रहे हैं कांग्रेस से ,जैसे विन लादेन कभी अमेरिका से लड रहा था ,और अंत में अमेरिका के हाथों अफगानिस्तान सौंपकर ही मरा।
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आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने मेरठ में मोदी की हिमायत करते हुए जो बयान दिया है उससे साफ हो जाना चाहिए कि मोदी को अगुवा बनाकर संघ परिवार देश में विकास का नहीं विभाजनकारी एजेंडा लागू करना चाहता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को बीजेपी में राष्ट्रीय भूमिका दिए जाने का समर्थन करते हुए कहा कि "हिन्दुत्व ही वह रास्ता है जिससे देश में परिवर्तन लाया जा सकता है।"

मोदी का कद बढ़ाए जाने का विरोध कर रहे बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नाम लिए बिना उन्होंने कहा कि" कोई पसंद करे या नहीं करे, हिन्दुत्व ही वह मार्ग है जो देश में परिवर्तन लाएगा। इसी में देश का सम्मान निहित है"।

भागवत ने सोमवार की शाम संघ के प्रशिक्षण शिविर में कहा कि" हमने नेता और एजेंडा बदल कर देख लिया, कुछ काम नहीं आया। राजनीति के द्वारा भारत को महाशक्ति नहीं बनाया जा सकता है, ऐसा सिर्फ हिन्दुत्व से किया जा सकता है।"

यानी भाजपा में जो कुछ बदलाव आए हैं वे संघ के आदेश पर आए हैं। संघ का इससे चरित्र फिर से साफ हुआ है कि वह सांस्कृतिक संगठन का मुखौटा लगाए राजनीतिक संगठन है।
दूसरी बात यह कि जब सारी दुनिया साइबरयुग में जाने की सोच रही है देश,नस्ल,राष्ट्र,राष्ट्रवाद आदि की सीमाओं का अतिक्रमण कर रही है ऐसी स्थिति में हिन्दुत्व के नाम पर एकजुट करना देश को 14वीं सदी में ले जाने की कोशिश ही कही जाएगी।
तीसरी बात यह कि मोदी के बहाने आनेवाले समय में विकास का नहीं हिन्दुत्व का एजेण्डा आने वाला है।
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कांग्रेस के नेताओं के विलक्षण बयान आने लगे हैं। एक नेता ने कहा है कि धर्मनिरपेक्ष भारत कभी भी नरेन्द्र मोदी को अपना नेता नहीं मानेगा। यह बयान धर्मनिरपेक्षता की गलत समझ पर आधारित है।
धर्मनिरपेक्ष भारत में साम्प्रदायिक व्यक्ति भी प्रधानमंत्री -मंत्री-मुख्यमंत्री आदि हो सकता है। अटल-आडवाणी-नानाजी देशमुख -कल्याण सिंह आदि खांटी साम्प्रदायिक नेता इसके आदर्श उदाहरण हैं। यहां तक कि कागज पर नियमानुसार भाजपा धर्मनिरपेक्ष दल है और यह बात उसने अपने दलीय संविधान में मानी है। यह दीगर बात है कि उसके नेता अहर्निश साम्प्रदायिक प्रचार करते रहते हैं। कांग्रेस के नेताओं को इस तरह के बयानों से बचना चाहिए। धर्मनिरपेक्ष भारत में अनिश्वरवादी भी मंत्री आदि हो सकता है।
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भाजपा या किसी भी दल को साम्प्रदायिक है या धर्मनिरपेक्ष है ,उसके अल्पसंख्यकों के प्रति नजरिए के आधार पर देखना चाहिए।
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भाजपा क्या है और कांग्रेस क्या है,यह मुद्दा यहां बहस तलब नहीं है।एक घटना केन्द्र में है और उसकी संभावित परिणतियों पर अनुमान हमसब लगा रहे हैं। कानूनन भाजपा धर्मनिरपेक्षदल है।हमारा संविधान किसी साम्प्रदायिकदल को चुनावी मान्यता नहीं देता। लेकिन उसकी विचारधारात्मक समझ उसे साम्प्रदायिक बनाती है।इसी तरह कांग्रेस कहने को धर्मनिरपेक्षदल है विचारधारा के आधार पर ,लेकिन उसने अनेकमर्तबा निहितदलीय स्वार्थों के लिए साम्प्रदायिक पत्ते खेले हैं।
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एनडीए का बिखरना लोकतंत्र के लिए अशुभ है,उसमें से धर्मनिरपेक्ष जदयू का निकल जाना और भी अशुभ है,क्योंकि अब यह मोर्चा और भी ज्यादा कंजरवेटिव और विभाजनकारी मुद्दों के आधार पर लोगों में उन्माद पैदा करेगा। जदयू ने अलग होकर साम्प्रदायिक ताकतों के लिए उन्मादी रास्ते तलाशने की मोड़ दिया है।
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नरेन्द्र मोदी -भाजपा के जंजाल से मुक्त होकर नीतीश कुमार ने ठीक वही काम किया है जो किसी जमाने में वीपी सिंह ने कांग्रेस से अलग होकर किया था। भारत की नई लीडरशिप अब नीतीश-अखिलेश यादव -राहुल गांधी और मायावती के चतुष्कोण पर केन्द्रित है और नई लोकसभा की संभावनाओं में वाममोर्चा इनके पूरक होंगे। यह काम यूपीए से अलग तीसरा मोर्चा बनाकर हो या अन्य किसी शक्ल में,वामदलों का आगामी कन्वेंशन इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा। नए समीकरण में नीतीश महत्वपूर्ण हैं।
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भाजपा के लोग नीतीश के पुराने भाषणों को बांट रहे हैं, वे नहीं जानते कि उनके नेताओं के पुराने भाषण यदि बंटेंगे तो मोदी,भाजपा और संघ परिवार की क्या गत होगी ? चुनाव में पुराने भाषण कम जाति, नए भाषण और नए मुद्दे ज्यादा काम करते हैं,खासकर बिहार और यूपी में।
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नीतीश कुमार ने मोदी को एक ही एक्शन में नायक से खलनायक बना दिया है और भावी रणनीति अब यादवों और नीतीश कुमार पर निर्भर है। बिहार-यूपी में गणित साफ दिख रहा है कि भाजपा हाशिए के बाहर है।
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नरेन्द्र मोदी बड़े नसीब वाले हैं,कांटे निकालने में माहिर हैं,भाजपा की उलझी जुल्फें संवारने में लगे हैं,इस पर पढ़ें-

उलझी थी ज़ुल्फ़ उस ने सँवारा सँवर गई
शाने को क्या ख़बर ये बला किस के सर गई।।जमील मजहरी।।
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भाजपा-जदयू विवाद में अंदर खाते की बातें आनी बाकी हैं,लेकिन बात बिगड गयी है तो इसका कोई समाधान संभव नहीं है.रहीम ने क्या कहा है पढ़ें-

बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय ।
रहिमन बिगरै दूध को, मथे न माखन होय ॥
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आज भाजपा के सभी नेता चैन की नींद सोएंगे,कई दिनों से नीतीश कुमार से परेशान थे।
कांटा निकल गया और दर्द बंद अब आराम से देश में रामरथ दौडाएंगे,कोई न रोकनेवाला है और न साथ से भागनेवाला।
हमें तो लगता है नीतीश बाबू ने भाजपा का साथ रामजी की कृपा के कारण ही छोड़ा है. राजनाथ सिंह की भगवान ने जिस तरह मदद की है,ईश्वर यूपीए की भी इसी तरह मदद करे।
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नरेन्द्र मोदी के नाम पर भाजपा-संघ परिवार और कारपोरेट मीडिया सुनियोजित प्रचार चला रहा है । कहा जा रहा है भारत की सब बीमारियों की रामबाण दवा है मोदी। मोदी को गद्दी दो और देश की तकदीर बदलो।मोदी को लाने का अर्थ है हिन्दुस्तान को मूर्खिस्तान बनाना। मूर्खिस्तान पर काका की कविता पढ़ें-

मूर्खिस्तान ज़िंदाबाद / काका हाथरसी

स्वतंत्र भारत के बेटे और बेटियो !
माताओ और पिताओ, 
आओ, कुछ चमत्कार दिखाओ। 
नहीं दिखा सकते ?
तो हमारी हाँ में हाँ ही मिलाओ। 
हिंदुस्तान, पाकिस्तान अफगानिस्तान
मिटा देंगे सबका नामो-निशान
बना रहे हैं-नया राष्ट्र ‘मूर्खितान’
आज के बुद्धिवादी राष्ट्रीय मगरमच्छों से
पीड़ित है प्रजातंत्र, भयभीत है गणतंत्र
इनसे सत्ता छीनने के लिए
कामयाब होंगे मूर्खमंत्र-मूर्खयंत्र
कायम करेंगे मूर्खतंत्र।

हमारे मूर्खिस्तान के राष्ट्रपति होंगे-
तानाशाह ढपोलशंख
उनके मंत्री (यानी चमचे) होंगे-
खट्टासिंह, लट्ठासिंह, खाऊलाल, झपट्टासिंह
रक्षामंत्री-मेजर जनरल मच्छरसिंह
राष्ट्रभाषा हिंदी ही रहेगी, लेकिन बोलेंगे अँगरेजी। 
अक्षरों की टाँगें ऊपर होंगी, सिर होगा नीचे, 
तमाम भाषाएँ दौड़ेंगी, हमारे पीछे-पीछे।
सिख-संप्रदाय में प्रसिद्ध हैं पाँच ‘ककार’-
कड़ा, कृपाण, केश, कंघा, कच्छा। 
हमारे होंगे पाँच ‘चकार’-
चाकू, चप्पल, चाबुक, चिमटा और चिलम।

इनको देखते ही भाग जाएँगी सब व्याधियाँ
मूर्खतंत्र-दिवस पर दिल खोलकर लुटाएँगे उपाधियाँ
मूर्खरत्न, मूर्खभूषण, मूर्खश्री और मूर्खानंद।

प्रत्येक राष्ट्र का झंडा है एक, हमारे होंगे दो, 
कीजिए नोट-लँगोट एंड पेटीकोट 
जो सैनिक हथियार डालकर 
जीवित आ जाएगा
उसे ‘परमूर्ख-चक्र’ प्रदान किया जाएगा। 
सर्वाधिक बच्चे पैदा करेगा जो जवान
उसे उपाधि दी जाएगी ‘संतान-श्वान’
और सुनिए श्रीमान-
मूर्खिस्तान का राष्ट्रीय पशु होगा गधा, 
राष्ट्रीय पक्षी उल्लू या कौआ, 
राष्ट्रीय खेल कबड्डी और कनकौआ। 
राष्ट्रीय गान मूर्ख-चालीसा, 
राजधानी के लिए शिकारपुर, वंडरफुल !
राष्ट्रीय दिवस, होली की आग लगी पड़वा। 

प्रशासन में बेईमान को प्रोत्साहन दिया जाएगा, 
ईमानदार सुर्त होते हैं, बेईमान चुस्त होते हैं। 
वेतन किसी को नहीं मिलेगा, 
रिश्वत लीजिए, 
सेवा कीजिए !

‘कीलर कांड’ ने रौशन किया था
इंगलैंड का नाम, 
करने को ऐसे ही शुभ काम-
खूबसूरत अफसर और अफसराओं को छाँटा जाएगा
अश्लील साहित्य मुफ्त बाँटा जाएगा। 

पढ़-लिखकर लड़के सीखते हैं छल-छंद, 
डालते हैं डाका, 
इसलिए तमाम स्कूल-कालेज 
बंद कर दिए जाएँगे ‘काका’।
उन बिल्डिगों में दी जाएगी ‘हिप्पीवाद’ की तालीम 
उत्पादन कर से मुक्त होंगे
भंग-चरस-शराब-गंजा-अफीम
जिस कवि की कविताएँ कोई नहीं समझ सकेगा, 
उसे पाँच लाख का ‘अज्ञानपीठ-पुरस्कार मिलेगा। 
न कोई किसी का दुश्मन होगा न मित्र, 
नोटों पर चमकेगा उल्लू का चित्र !

नष्ट कर देंगे-
धड़ेबंदी गुटबंदी, ईर्ष्यावाद, निंदावाद। 
मूर्खिस्तान जिंदाबाद !
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नीतीश कुमार-मोदी प्रसंग में-

पत्ता बोला वृक्ष से, सुनो वृक्ष बनराय ।
अब के बिछुड़े ना मिले, दूर पड़ेंगे जाय ॥
-27-
नरेन्द्र मोदी पर कबीर ये पंक्तियां पढ़ें-

जहाँ आप तहाँ आपदा, जहाँ संशय तहाँ रोग ।
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मोदीपंथी मीडिया पर-

फूटी आँख विवेक की, लखे ना सन्त असन्त ।
जाके संग दस-बीस हैं, ताको नाम महन्त ॥कबीर।।
-29-


रविवार, 3 मार्च 2013

चुनावी पापुलिज्म की आम बजट से विदाई


       

      एक जमाना था केन्द्रीय बजट के आने के पहले आमलोगों में उत्सुकता होती थी ,आम आदमी मन लगाकर रेडियो –टीवी पर सुनता-देखता  था कि केन्द्र सरकार के आमबजट में नया क्या आनेवाला है ?  लेकिन इनदिनों बजट को लेकर जिज्ञासा एकसिरे से खत्म हो गयी है।मीडिया का भी वित्तमंत्री पर कोई दबाब नजर नहीं आया।  
     आमबजट को लेकर सांसदों से लेकर आम आदमी तक बढ़ते बेगानेपन ने एक नए किस्म के आर्थिक अज्ञान को बढ़ावा दिया है। कायदे से संचारक्रांति के दौर में बजट की सूचनाओं का विवेचन ज्यादा से ज्यादा होना चाहिए लेकिन हो उलटा रहा है। आम बजट आज सबसे ज्यादा रहस्यमय दस्तावेज है और इस रहस्य को कारपोरेट मीडिया ने जमकर बढ़ावा दिया है।
वित्तमंत्री पी.चिदम्बरम् ने जब पिछले सप्ताह सन् 2013-14 का आमबजट पेश किया तो उन्होंने पहला अच्छा काम यह किया है कि बजट को चुनावी राजनीति से पृथक् कर दिया है। पहले बजट में चुनावी प्रलोभन हुआ करते थे लेकिन इसबार के बजट में कोई आर्थिक प्रलोभन नहीं हैं।
यह मनमोहन सरकार का आखिरी बजट है। बजट को चुनावी राजनीति से अलग करने का अर्थ है देश की अर्थव्यवस्था को पापुलिज्म से अलग करना। इससे यह भी संकेत मिलता है कि आगामी चुनाव में कॉग्रेस कोई पापुलिज्म का नारा और योजनाएं उछालने नहीं जा रही है ।इसका एक अन्य आयाम यह भी है मीडिया प्रौपेगैण्डा के जरिए मौजूदा विकास योजनाओं की उपलब्धियों को आने वाले समय में खूब उछाला जाएगा।
   सन् 2013-14 के आमबजट की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि इससे मंदी से लड़ने में कोई बड़ी मदद नहीं मिलेगी। इसका प्रधान कारण यह है कि केन्द्र सरकार के पास बजटघाटा कम करने के वैज्ञानिक विकल्पों का अभाव है। बजटघाटा 5,20,925 करोड़ रूपये का है।  जबकि लक्ष्य था 5,73,630करोड़ रूपये। यानी केन्द्र सरकार सारी कोशिशों के बावजूज बजटघाटा कम करने का लक्ष्य हासिल नहीं कर पायी है। मनमोहन सरकार के बजटघाटे के लक्ष्य को हासिल न कर पाने के पीछे प्रधान कारण है अमीरों को दी गई आर्थिक सुविधाएं। जबकि केन्द्र सरकार ने आम आदमी को मिलने वाली सब्सीडी में कटौती की है। पिछले साल के बजट की तुलना में इस साल 4फीसदी की कटौती की गयी है।
  सन् 2013-14 के आम बजट में चमड़े से बनी चीजें और सिलेसिलाए कपड़े सस्ते होने की संभावना है वहीं दो हजार से ज्यादा की कीमत के मोबाइल फोन महंगे हो जाएंगे। इसके अलावा वातानुकूलित रेस्टोरैंट में खाना महंगा होगा।
  एक करोड़ रूपये से ज्यादा आमदनी वाले 42,800 लोगों पर 10 फीसदी अधिभार लगाने की घोषणा की है जो इस इन धनियों के लिए कोई खास मायने नहीं रखता। इससे इसवर्ग के लोगों में कम आमदनी दिखाने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है। महिलाओं के विकास के लिए महिला बैंक खोलने का बजट में प्रस्ताव पेश किया गया और इसके लिए आरंभिक पूँजी के तौर पर एक हजार करोड़ रूपये आवंटित किए गए हैं। इस बैंक की परिकल्पना आंध्र में राज्य सरकार द्वारा संचालित श्रीनिधि बैंक से ली गयी है। महिला बैंक को रिजर्व बैंक के दिशा निर्देशों से मुक्त रखा गया है ,इस बैंक को सार्वजनिक क्षेत्र में खोला जाएगा और इसके लिए अलग से कानून भी बनाया जाएगा।
    इसी तरह छोटे शहरों में अपना पहला मकान खरीदने का सपना देख रहे लोगों को वित्त मंत्री ने ब्याज पर छूट का तोहफा दिया है। वित्त मंत्री ने कहा कि 40 लाख रुपये मूल्य तक के मकान खरीदने वालों को ब्याज पर मिलेगी अतिरिक्त 1 लाख रुपये की छूट मिलेगी। सरकार की शर्त के मुताबिक 25 लाख रुपये के आवास ऋण पर पहली बार घर खरीदने वालों को ही कर छूट मिलेगी। इसके अलावा यह प्रावधान बेहद छोटी अवधि के लिए किया गया है और अप्रैल 2013 से मार्च 2014 तक मकान खरीदने वालों को ही यह छूट प्राप्त होगी। 2 से 5 लाख के स्लैब में आने वालों को अब 2,000 रुपये का टैक्स क्रेडिट मिलेगा।
     आमआदमी का उपभोगखर्चा विगत 3सालों से 8फीसदी चला आ रहा है उसमें इस साल मात्र 4फीसदी इजाफा हुआ है। लेकिन इससे महंगाई पर अंकुश लगाने में सफलता नहीं मिली है। पिछले साल की तुलना में सब्सीडी कम हुई है। खाद्य सब्सीडी का मनमोहन सरकार खूब हल्ला मचाती रही है लेकिन इसबार के बजट में खाद्य सब्सीडी में पिछले साल की तुलना में पांच हजारकरोड़ रूपयों की कटौती की गयी है। जबकि वित्तमंत्री ने फूड़ सब्सीडी के लिए 10हजार करोड़ रूपये अतिरिक्त देने की बात कही है। लेकिन वास्तव अर्थ में फूड़सब्सीडी में पिछले साल की तुलना में इस साल 5हजार करोड़ रूपये की कटौती की गयी है। साथ ही पिछले साल की तुलना में इस साल तेल और पेट्रोलियम पदार्थों की सब्सीडी में तीस हजार करोड़ रूपये की कटौती की गयी है। संशोधित आंकड़े ज्यादा ही होंगे।
    मनरेगा योजना के मद में पिछले साल की तुलना में कोई बढोत्तरी नहीं हुई है। जबकि गांवों से लेकर शहरों तक बेकारी में इजाफा हुआ और आर्थिकमंदी चरम पर है।ऐसी दशा में मनरेगा के लिए अतिरिक्त राशि आवंटित करने की जरूरत थी। दूसरी ओर सार्वजनिक क्षेत्र की पचास हजार करोड़ रूपये की संपदा के विनियमन का प्रस्ताव रखा गया है। यानी मनरेगा आदि के लिए धन केन्द्र सरकार सार्वजनिक संपत्ति को निजी हाथों में बेचकर जुगाड़ करेगी।
   इस साल के बजट में पिछले साल की तुलना में शिक्षामद में आवंटित राशि में भी गिरावट आई है। स्वास्थ्य और चिकित्सा के मद में जरूरत से बहुत कम धनराशि आवंटित की गयी है। इसी तरह सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में ग्रामीण विकास के लिए आवंटित राशि कम रखी गयी। आदिवासियों के विकास के चिदम्बरम ने जो धनराशि आवंटित की है वह संवैधानिक नियमों के अनुसार आवंटित धनराशि से कम है। इससाल आदिवासियों के लिए 20900 करोड़ रूपये आवंटित किए गए हैं जो संवैधानिक नियमों के अनुसार तयशुदा आनुपातिक आवंटन से कम है।यही दशा अनुसूचित जाति के लिए आवंटित राशि की है वहां पर भी संवैधानिक नियमों का उल्लंघन करते हुए 50फीसदी कम राशि (47000 हजार करोड़) आवंटित की गयी है।


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