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रविवार, 8 मई 2016

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क्षण मेरे जीवन के सबसे मूल्यवान क्षण हैं,दुखों में जितना सीखा उतना सुखो में नहीं सीख पाया।रिश्तेदार-सगे -संबंधी-मित्र आदि की पहचान दुख में ही हुई। दुख में किसी को पास नहीं पाया।यह बात आज से पचास पहले जितनी सच थी उतनी ही आज भी सच है।दुख जब आते हैं तो चारों ओर से आते हैं।कोई मदद करने वाला नहीं होता।सारे सामाजिक संबंध बेकार नजर आते हैं।दुख जीवन के अनिच्छित कर्मों में से एक है,दुखों को कभी भूलना नहीं चाहिए।कष्टमय जीवन को जो लोग भूल जाते हैं वे अपने हृदय के द्वार मानवीय संवेदनाओं के लिए बंद कर देते हैं।
मैं जब पैदा हुआ तो माँ की उम्र 13-14 साल रही होगी।उसके लिए बच्चा पैदा करना चमत्कार से कम न था।सुंदर पुत्र संतान को जन्म देकर वह खुश थी,लेकिन भविष्य को लेकर चिंतित और सतर्क । उसके लिए मातृत्व आनंद की चीज थी। वह मातृत्व से नफरत नहीं करती थी और नहीं बोझ समझती थी। उसके लिए मातृत्व स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति जैसा था।
उसके लिए यह विलक्षण स्थिति थी ,एक तरफ मातृत्व का अहं और आनंद, दूसरी ओर अहंकाररहित गौरवानुभूति। मातृत्व को वह सृजन के रूप में देखती थी।दाई की मदद से मेरा जन्म घर में ही हुआ।इस प्रसंग में मुझे हेगेल के शब्द याद आते हैं,हेगेल ने लिखा है, ´सन्तान का जन्म माता-पिता की मृत्यु भी है।बालक अपने स्रोत से पृथक होकर ही अस्त्विमान् होता है।उसके पृथकत्व में माँ मृत्यु की छाया देखती है।´ संभवतःयही वजह रही होगी कि मेरी माँ ने मुझे अपने से कभी दूर नहीं रखा।वह जितनी बेहतर चीजें जानती थीं उनकी कल्पना में रहती थी,उसे अनेक किस्म के हुनर आते थे,जिनको लेकर वह व्यस्त रहती थी।वह कभी उदासीनता या अवसाद में नहीं रहती थी,हमेशा कोई न कोई काम अपने लिए खोज लेती थी।उसकी इसी व्यस्तता ने उसे आत्मनिर्भर और स्वतंत्रता प्रिय बना दिया था।
अमूमन बच्चा माँ पर आश्रित होता है लेकिन मेरे मामले में थोड़ा उलटा था चीजों को जानने के मामले में माँ मुझ पर आश्रित थी,मैं उसे जब तक नहीं बताता वह जान नहीं पाती थी और तुरंत जानना उसकी विशेषता थी,तुरंत जानना और तुरंत जबाव देना।याद नहीं है उसने मुझे कभी पीटा हो,वह नाराज होती थी लेकिन पिटाई नहीं करती थी,जबकि पिता के हाथों दसियों बार पिटा हूँ।उसे समाज को लेकर गुस्सा नहीं था लेकिन असहमतियां थीं,जिनको वह बार-बार व्यक्त करती थी।वह पिता के आचरण से बहुत नाराज रहती थी,उसे असंतोष था कि पिता उसकी बात नहीं मानते बल्कि अपनी माँ की बातें मानते हैं।


उसका स्वभाव शासन करने का नहीं था बल्कि वह शिरकत करने में विश्वास करती थी,कोई उसके ऊपर शासन करे यह वह कभी मानने को तैयार नहीं होती थी।शिरकत वाले स्वभाव के कारण वह अपनी माँ और नानी की प्रतिदिन घरेलू कामों में समय निकालकर मदद करने उनके घर जाती थी,उसको जब मन होता था घर से निकल पड़ती थी,उसे बंदिशें एकदम पसंद नहीं थीं,पिता और दादी उसके इस स्वभाव को जानते थे और उसे आने-जाने में कभी बाधा नहीं देते थे।वह शिरकत वाले स्वभाव के कारण घर में हर काम में दादी की मदद करती थी, वहनियमित सिनेमा देखती थी, पिता हर सप्ताह उसे सिनेमा दिखाने ले जाते थे। जबकि ताईजी की स्थिति एकदम विपरीत थी,वे कभी घर के काम में शिरकत नहीं करती थीं।उसकी शिरकत वाली भावना का सबसे आनंददायी रूप वह होता था जब मैं छत पर पतंग उडाता था और वह छत पर आकर बैठी रहती और सिलाई करते हुए देखती रहती ,उसे हमेशा मेरी चिन्ता रहती कि कहीं बन्दर मुझे काट न लें। वह बंदरों से मुझे बचाने के लिए छत पर डंडा लिए बैठी रहती।तकरीबन यही दशा मेरी भी थी गर्मियों में आलू के पापड़ आदि बनाने में मैं उसकी मदद करता,घंटों छत पर बैठा रहता जिससे पापड़ आदि की बंदरों से रक्षा कर सकूँ। कहने के लिए और भी बच्चे थे घर में लेकिन उसकी विशेष कृपा मेरे ऊपर थी,वह छत पर काम करेगी और मैं बंदरों पर नजर रखूँगा।जैसाकि सब जानते हैं मथुरा में बंदरों की संख्या बहुत है और वे बहुत परेशान करते हैं,नुकसान पहुँचाते हैं,काट लेते हैं।तेज गर्मियों में वह पापड़ आदि बनाने का छत पर काम करती थी और मैं भरी दोपहरी उसको कम्पनी देता था।
वह देखने में बहुत सुंदर थी,सारा शरीर सुंदर गठा हुआ था।हाथों की अंगुलियां कलात्मक थीं। अच्छी बात यह थी बच्चे उसके लिए बंधन या बोझ नहीं थे,वह उनमें आनंद लेती थी और अपना मूल्यवान समय उन पर खर्च करती थी।उसका साहचर्य हम सबमें ऊर्जा भरता था।दिलचस्प बात यह थी कि वह मुझसे कोई भी चीज छिपाती नहीं थी,प्रेम,गुस्सा,आनंद हर चीज मेरे साथ शेयर करती थी,अनेक चीजों की मेरे पास जानकारी होती थी,पिता को पता ही नहीं होता था,पिता पूछते थे तब मैं बताता था।शरीर,सेक्स,कला,सिनेमा,समाचार सब कुछपर उसकी नजर थी और इनसे जुड़ी चीजों पर वह बातें करती रहती थी।उसकी जिज्ञासाएं अनंत थीं,सबसे दुर्लभ चीज यह थी कि वह कभी थकती नहीं थी,उसके शरीर ने जब धोखा दे दिया तब ही वह बैठी,वरना वह कभी खाली नहीं बैठती,उसके पास हमेशा काम रहते।




मेरा बचपनः माँ के आँसू और आनंद


           वह रो रही थी और अभिव्यक्त कर रही थी।उसके पास भाषा नहीं थी,सिर्फ आँसू थे।पता नहीं कब और कैसे आँसू निकलते-निकलते बंद हो गए और वह उठी और घर के कामों में जुट गयी।आँसू और श्रम यही उसकी दिनचर्या थी।पता नहीं उसे आँसू में राहत मिलती थी या घरेलू श्रम में शांति मिलती थी,यह बात मैं कभी जान नहीं पाया,जब भी जानने की कोशिश की वह हमेशा टालती रही।वह बोलती नहीं थी,लेकिन इशारों में सब कुछ कहती थी,बार-बार पूछने पर हमेशा टाल देती थी,उसको किस बात का दुख है या फिर किन चीजों से उसे तकलीफ होती है,वह सब बताने की वह जरूरत महसूस नहीं करती थी, मैं हमेशा उसके साथ रहता था ,वह मेरे जरिए सारी बातें समझती थी,हर बात,हर समस्या वह सामने रखती,हर चीज जानना चाहती,उसकी अनंत जिज्ञासाएं थीं,शर्त एक ही थी कि मैं हमेशा उसकी आँखों के सामने रहूँ।कहने को हम पाँच भाई-बहन थे,लेकिन वह मेरे ऊपर कुछ ज्यादा मेहरबान थी।वह मेरा ख्याल सबसे ज्यादा रखती थी,उसे अच्छा लगता था कि मैं खूब पढूँ,मैं जब पढ़ता था तो वो हमेशा मेरे पास मौजूद रहती,संयुक्त परिवार था,हलचल रहती थी घर में,वह मेरे लिए एकांत बनाती थी, जिससे मुझे कोई परेशान न करे,मेरा पढ़ने से ध्यान न बंटाए।

मुझे याद है कि मैंने जब कक्षा पाँच पास की और मथुरा के माथुर चतुर्वेद संस्कृत महाविद्यालय में प्रथमा में मेरा दाखिला लिया तो माँ बहुत खुश थी,पिता ने गुरूपूर्णिमा के दिन ले जाकर दाखिला कराया,कॉलेज के सभी शिक्षकों को 1-1 किलो आम गुरूदक्षिणा में भेंट किए।उसके बाद पढ़ने का जो सिलसिला शुरू हुआ वह आज तक जारी है।मुझे माँ से बेइंतहा प्यार मिला,संभवतःअपने बचपन के मित्रों में मैं अकेला था जिसके लिए प्रथमा में ही निजी तौर पर 1969 में टेपरिकॉर्डर और रेडियो था। मेरे लिए घर में एक छोटा कमरा बनवाया गया।उसमें चारपाई,कुर्सी,टेबिल और दीवार में पत्थर की दो बड़ी अलमारियाँ बनवाई गईं।यानि कक्षा 8से मैं स्वतंत्र रूप से अपने कमरे में अलग रहा हूं,मेरी प्राइवेसी थी और उसमें कोई दखल नहीं देता था,कहने को संयुक्त परिवार था,लेकिन उसमें उसने मेरे लिए रहने,सोने,पढ़ने की स्वतंत्र व्यवस्था करा दी थी,मुझे पतंगबाजी का खूब शौक था,उसके लिए नियमित पैसे मिलते थे,कंचे या गोली खेलने की आदत थी उसके लिए भी पैसे मिलते थे,हाथ खर्च के लिए दो आने रोज मिलते थे।इस सबमें मेरी दादी उसकी मदद करती थी क्योंकि वो घरकी मुखिया थी।मेरी माँ और दादी का मानना था कि मुझमें पढ़ने-लिखने की संभावनाएं सबसे ज्यादा हैं अतःमेरा ज्यादा ख्याल रखा जाए।हमारे ताऊजी के दो लड़के थे,मेरे खुद के 4भाई-बहन थे,लेकिन इन सबके रहते हुए,मेरे लिए बचपन में ही स्वतंत्र कमरे की व्यवस्था हो गयी।यह सब कुछ संभव हुआ माँ के कारण।वह पढ़ी लिखी नहीं थी,लेकिन शिक्षा के महत्व को जानती थी।संस्कृत पाठशाला में जाने के बाद मेरा कोर्स बढ़ गया,किताबें बढ़ गयीं,इसके लिए मैंने सुबह चार बजे उठने की आदत डाली,इसमें मेरी माँ की महत्वपूर्ण भूमिका थी,वह सुबह की नल आने के समय जग जाती और मुझे भी जगा देती।जगाने का एक सिस्टम था। माँ नीचे के कमर में सोती थी,मेरे लिए कमरा ऊपर बनाया गया,उस कमरे में एक खुली खिड़की बनायी गयी जिसके जरिए एक डोरी मेरी माँ के पास रहती और मेरे कमरे में एक घंटा मंदिर से उतारकर लाकर बाँध दिया गया था उसकी आवाज सुनकर मैं जग जाता था और सुबह जगने के साथ ही एक कप चाय मेरे पास रहती थी,माँ नीचे से नजर रखती थी कि मैं जगा हूँ या सो रहा हूँ,नियम से मुझे कुर्सी पर बैठकर पढ़ना पढ़ता,चारपाई पर बैठकर पढ़ना मना था,इसमें प्रधान कारण यह था कि मेरी माँ नीचे से कुर्सी-टेबिल देख सकती थी और नजर रखती थी कि मैं कहीं सो तो नहीं गया,यदि मैं सो जाता तो वह ऊपर आकर प्यार से सिर सहलाकर जगा देती और जोर देती कि पढो।इस पढाई का एक अन्य प्रेरक तत्व था रोज सुबह दो कचौड़ी और 2जलेबी का नाश्ता या कलेवा।मुझे खास तौरपर प्रतिदिन यह नाश्ता मिलता,नाश्ते के पहले यमुना स्नान,संध्यावंदन,गायत्री मंत्र का जप,महात्रिपुरसुंदरी की पूजा।कभी-कभी पूजा छूट जाती थी जिसे मैं शाम को करता था,माँ इन सबकी निगरानी रखती कि मैं यह सब ठीक से करता हूँ या नहीं ,ठीक से न करने पर गुस्सा भी होती और इस सबमें वह यह ख्याल रखना नहीं भूलती कि मैंने समय पर खाया है कि नहीं,समय पर शरीर साफ किया है कि नहीं। उसकी निगरानी का ही सुफल है जिसने मुझे नियमित,संगठित और नियोजित ढ़ंग से पढ़ने का आदी बना दिया।

मैं जब भी लिखता हूँ मां की इमेज आँखों में रहती है।संभवतःअपने मित्रों में अकेला हूँ जिसने जमकर लिखा,खूब लिखा।यह लिखना हो ही नहीं पाता यदि मेरी गूंगी-बहरी माँ ने मेरी जिन्दगी संगठित न की होती।संगठित होकर रहने कला मैंने माँ से सीखी,जबकि लिखने और बोलने की कला पिता से सीखी।

यह सच है मैं जितना अपनी माँ पर गर्व करता हूँ वह भी अपने बच्चों पर गर्व करती थी,मैंने जब शास्त्री की परीक्षा पास की तो मेरी माँ बेइन्तहा खुश हुई।उसे खुशी इस बात से हुई कि मैं पिता से ज्यादा डिग्री पाने में सफल हो गया।वह यह चाहती थी कि मैं पिता से ज्यादा पढूँ।मैंने समझाया कि पिता शास्त्री प्रथम वर्ष तक ही पास कर पाए हैं,जबकि मैंने दोनों साल की परीक्षा पास करके शास्त्री की डिग्री हासिल की है,मैंने शास्त्री 1976 में पास किया, मैं अपने वंश में पहला स्नातक हूँ। अफसोस यह कि मेरे शास्त्री परीक्षा परिणाम आने के चारदिन बाद ही माँ की मृत्यु हो गयी।





माँ सोशलमीडिया और भाषा

        इंटरनेट का पहला सुख है आत्माभिव्यक्ति।दूसरा सुख है वर्चुअल प्रशंसा।इन दो सुखों ने सोशलमीडिया पर निजी जीवन के अनुभवों की बाढ़ पैदा कर दी है।जाहिर है आत्भिव्यक्ति की यह विश्वव्यापी सुविधा पहले कभी उपलब्ध नहीं थी।आज है तो लोग बढ़-चढ़कर माँ के साथ अपनी तस्वीरें शेयर कर रहे हैं,बहुत कम लोग हैं जो निजी अनुभव शेयर कर रहे हैं।यह सच है फोटो बहुत कुछ कहता है।लेकिन आत्माभिव्यक्ति का अभी भी सबसे ताकतवर मीडियम भाषा है।समस्या यह है कि भाषा में माँ के अनुभव कैसे व्यक्त करें ॽ अभी भी बहुतों के पास माँ के बारे में सही भाषा नहीं है।मात्र फोटो हैं।यह मूलतःआदिम अभिव्यंजना है। माँ को भाषा में लाना चाहिए।माँ जितनी भाषा में आएगी स्त्री की ताकत और स्पेस का उतना ही विकास होगा। भाषा में अभिव्यक्त करने के बाद ही मनुष्य को स्थान मिलता है,पहचान मिलती है।फोटो दें ,लेकिन फोटो को भाषा भी दें,फोटो को गद्य-पद्य से जब तक नहीं जोड़ेंगे, जीवन संघर्ष सामने नहीं आएंगे।जीवन संघर्ष के बिना मां या किसी का भी रूप निरर्थक है।माँ हमें भाषा देती है,भाषा बनाने में मदद करती है,वह जब भी मिलेगी भाषा में मिलेगी।

रविवार, 10 मई 2015

माँ की सामाजिक ताकत

 माँ के बारे में लिखना बेहद मुश्किल काम है।सामने वो प्रशंसा सुनती नहीं थी, इस समय वो मौजूद नहीं है। जब तक रही अपार ऊर्जाका स्रोत बनी रही। हम सब भाई-बहन बेहद खुश रहते थे। कभी किसी चीज के बारे मेंमैंने निजी तौर पर कमी महसूस नहीं  की। वह हम सबकी सामाजिक ताकत थी। माँ का जन्म जिसपरिवार में हुआ वह  मथुरा के पढ़े-लिखे परिवारों में से एक बेहतरीन परिवारथा। उस परिवार के पास   बेहतरीनसांस्कृतिक और बौद्धिक परंपराएं थीं,नानाजी सोहनलाल चतुर्वेदी  संगीत के विद्वान थे, दोनों मामा पक्के खांटीमार्क्सवादी बुद्धिजीवी थे। मथुरा के चौबों की पंडिताई-प्रोहिताई की परंपरा सेमुक्त इस परिवार में तमाम किस्म के आधुनिक संस्कार थे।  माँ बचपन में टाइफायडके कारण गूंगी-बहरी हो गई, इसके अलावा उसकी छोटी उम्र में ही शादी भी हो गयी,शादी तकरीबन 6-7साल की उम्र में हुई,सात साल बाद द्विरागमन हुआ, वह मुश्किल से15-16साल की रही होगी जब मेरा जन्म हुआ। वह जब तक जिंदा रही मैं अधिकांश समय छायाकी तरह उसके साथ रहा। वह पढ़ी लिखी नहीं थी, लेकिन शिक्षा की ताकत जानती थी, नएविचारों और खासकर प्रगतिशील विचारों को व्यवहार से पहचानती और मानती थी। प्रगतिशीलविचारों का संस्कार मुझे माँ से ही मिला।
         माँके अंदर विलक्षण शारीरिक क्षमता थी और वह इसका अपने परिवार के साथ ,अपनी माँ औरनानी की मदद के लिए जमकर इस्तेमाल करती थी, उसके पास कभी खाली समय नहीं होता था,वहबेहद संगठित थी और परिवार के दूसरे लोगों की मदद करने में उसकी गहरी रुचि थी। आजकललड़कियों में जिस तरह  घरेलू काम के प्रति अरुचि दिखती है,वह उसमें एकदम नहींथी।  हमलोगों का संयुक्त परिवार था,तीनआंगन का बड़ा घर था और उसमें नौ कमरे थे, मेरी दादी और माँ ये दोनों उस घर की एकतरह स्वामिनी थीं,ताई मस्त थी ,उसकी घरेलू कामों में कोई दिलचस्पी नहीं थी, वहसुबह होते ही यमुना नहाने, मंदिरों में दर्शन करने चली जाती थी,वहां से समय बचतातो गप्प करने अपनी माँ के यहां चली जाती और दोपहर  खाने के वक्त घर लौटती । ऐसी अवस्था में संयुक्तपरिवार के समस्त घरेलू काम  माँ और दादी मिलकर करते थे, घर में कोई नौकर नहींथा।
    कालान्तर में परिवार मेंबंटबारा हो जाने बाद माँ ने घर के काम के साथ मंदिर की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले लीऔर पिता को उस काम में मदद की, मंदिर का काम बहुत ही परिश्रम साध्य था,वह घर औरमंदिर के काम में सुंदर संतुलन बनाकर काम करती थी और धीरे धीरे उसने पिता को मंदिरसे तकरीबन मुक्त ही कर दिया था।
         माँ केअंदर यह भावबोध था कि वह जिस परिवार में जन्मी है वह बहुत पढ़ा लिखा सांस्कृतिक तौरपर समृद्ध परिवार है। इसलिए उसकी यह मंशा थी कि मैं खूब पढूँ । संयोग की बात थीमेरे तीन भाई-बहन कम उम्र में ही विभिन्न बीमारियों के कारण मर गए। बाद में हम दोभाई बच गए । मेरे छोटे भाई की पढ़ने में कोई रुचि नहीं थी। लेकिन मेरी रुचि थी, इसरुचि को बनाने में परिवार के अन्य सदस्यों जैसे माता-पिता के अलावा दोनों मामा कीभी भूमिका रही है। लेकिन मैं नियमित संगठित ढ़ंग से पढूँ इस भावबोध को निर्मितकरने में माँ की केन्द्रीय भूमिका थी। माँ के कारण ही यह संभव हो पाया किचौदह-पन्द्रह साल की उम्र में ही मेरे लिए अलग से कमरा बनवा दिया गया जिसमेंपढ़ने-सोने की व्यवस्था के साथ एक रेडियो भी लगवा दिया गया जिससे में अपडेट करकेरहूँ।
      मैं वैसे संस्कृत पाठशालामें पढ़ता था लेकिन माँ के संस्कारों के असर के कारण मुझे स्वतंत्र रुप सेकमरा मिला,इसने  मेरे अंदर आधुनिक भावबोध ने जगह बनाने में मदद की। मैंने अधिकांश आधुनिकबातें माँ से ही सीखीं। माँ के कारण मुझे स्वतंत्र कमरा मिला,यह मेरे जीवन की सबसेबड़ी घटना थी, मेरे किसी भी संगी-साथी के पास अपना निजी कमरा नहीं था। इसके अलावा मुझेरोज सुबह चार बजे जगाने का काम भी माँ करती थी। 
      मैं सुबह उठकर पढता था और माँ केसाथ में  एक कप चाय भी पीता था, चाय पिलाकरवह चली जाती थी, लेकिन नजर रखती थी कि मैं कहीं बाद सो न जाऊँ, यदि कभी सोने कीकोशिश करता तो आकर जगा देती थी, उसका मानना था  सुबह पढ़ने से चीजें जल्दी याद हो जाती हैं औरसारी जिन्दगी मन में रहती हैं। खैर, बचपन में सुबह चार बजे उठने की जो आदत उसनेडाली वह आज भी मेरी सबसे बड़ी ताकत है ।
      मित्रलोग पूछते हैं मैं लिखता-पढ़ता कब हूँ, मैंयही कहता हूँ सुबह चार बजे।बचपन में संस्कार बना कि सुबह चार बजे उठने का मतलब हैमाँ से जुड़े रहना।किताबें पढ़ने का मतलब है माँ से जुड़े रहना।
      बाद में 1967-68 में माँके दबाव के कारण ही मुझे एकदम नया जापानी टेपरिकॉर्डर मेरे पिता ने खरीदकर दिया।जो मेरे पास अभी तक सुरक्षित है। संभवतः कम्युनिकेशन के संस्कार बनाने और बाद मेंकम्युनिकेशन और मीडिया पर लिखने की आदत इससे ही पड़ी। मैं तो यही सोचता हूँ कि माँये कम्युनिकेशन और स्वाध्याय के संस्कार न बनाती तो मैं लिख ही नहीं पाता।
     माँ के लिए वह क्षण बड़ा ही महत्वपूर्ण होता थाजब मैं परीक्षा में पास होता था, वह श्रेणी नहीं समझती थी,पास-फेल समझती थी। मुझेयाद है मैंने जब शास्त्री की परीक्षा पास की,तो वह बेहद खुश हुई थी ,उसने पिता कोबुलाकर कहा ,आज मैं बहुत खुश हूं मेरा बेटा तुमसे ज्यादा पढ़ गया। मेरे पिताशास्त्री प्रथम वर्ष तक पढ़ाई कर पाए, धनाभाव और घरेलू जिम्मेदीरियों की वजह से वेआगे नहीं पढ़ पाए,मैंने जब शास्त्री द्वितीय वर्ष की परीक्षा पास की तो मैंने उसेसमझाया कि मैं पिता से पढाई में आगे निकल गया हूँ तो वह बेइंतहा खुश हुई, यह अजीबसंयोग ही था कि मेरा शास्त्री का परीक्षाफल  आने के चार दिन बाद ही सन् 1976 में उसकी अचानकहृदयाघात के कारण मौत हो गयी।   

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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...