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चुनावी हिंसा का मतलब

पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव खत्म हुए हैं लेकिन दो राज्य ऐसे हैं जहां चुनाव के बाद हिंसा अभी जारी  है।ये हैं पश्चिम बंगाल और केरल। संयोग की बात है दोनों ही राज्यों में वाम निशाने पर है या निशाना लगा रहा है।सवाल यह है वाम जहां रहता है वहां पर चुनावी हिंसा क्यों होती रही है ॽ बिहार में कुछ महिना पहले चुनाव हुए उसके पहले दिल्ली में चुनाव हुए,हाल ही में तमिलनाडु,असम और पांडुचेरी में भी चुनाव हुए लेकिन कहीं पर चुनावी हिंसा नहीं हुई।संयोग की बात है इन सब राज्यों में वाम नहीं के बराबर है।     पश्चिम बंगाल में विगत पाँच सालों में वामदलों खासकर माकपा पर असंख्य हमले हुए हैं।इसबार भी  चुनाव के पहले और बाद में असंख्य हमले हुए हैं।वाम पर हमले ऐसे समय में हो रहे हैं जब टीएमसी को अपार बहुमत मिला है।टीएमसी वाले जीत के बाद भी उदार बनने को तैयार नहीं हैं।लगातार हिंसक हमले कर रहे हैं।     सवाल उठता है इस हिंसा की जड़ कहां है ॽ हिंसा वे लोग करते हैं जिनका जनता पर विश्वास नहीं होता।जो जनता के दिलो-दिमाग पर हिंसा के जरिए कब्जा या वर्चस्व रखना चाहते हैं।जिस दल का जनता में असर होगा वह हिंसा का सहारा…

विवेकहीनता विकल्प नहीं है फेसबुक मित्रो!

हमारे फेसबुक मित्र उन्मादियों की तरह ,भाजपा के प्रचारक की तरह जीत गए जीत गए हल्ला मचाए हुए हैं ! उनकी इन हरकतों को देखकर हंसी भी आ रही है ,गुस्सा भी आ रहा है,मित्रो,फेसबुक कम्युनिकेशन है, कम्युनिकेशन की शर्त है कि दिमाग की खिड़कियां खुली रहें,दिमाग की खिड़कियां बन्द करके लोकतंत्र नहीं बचता।लोकतंत्र बचता है विवेकपूर्ण कम्युनिकेशन से,असहमतियों की गंभीर मीमांसा करने से। आपलोग पढ़े-लिखे हो,आप लोग किसी के कार्यकर्ता के तौर पर फेसबुक में दाखिल नहीं होते।आप निजी व्यक्ति के नाते यहां संवाद करते हो।यह भी जानते हो कि यह संवाद वोटरों में नहीं हो रहा,फिर इस तरह की विवेकहीनता क्यों ॽ     विवेकहीनता सबसे बड़ी पूंजी है फासिज्म की।लोकतंत्र बचे और समृद्ध बने,यह आप-हम सबको देखना होगा।लेकिन आपलोग तो अपने कम्युनिकेशन से उलटी दिशा में दौड़ रहे हैं।मसलन्, हाल के विधानसभा चुनावों को ही लें तो अनेक नई चीजें देख पाएंगे,इन पर हमें खुलकर बातें करनी चाहिए।मसलन्,नीतियों के सवाल को प्रमुख सवाल बनाया जाना चाहिए,लेकिन आपलोग नीतियों पर तो बात नहीं करना चाहते। नीतिहीनता और अवसरवाद को लोकतंत्र के लिए कैंसर माना जाता है।…

मोदी की जीत पर मुग्ध क्यों हो मित्रवर!

इसेकहते हैं मोदी के प्रचार की जीत ! आप कुछ भी कहें फेसबुक मोदी भक्त सोचने को तैयार नहीं हैं ! वे पूरी तरह माने बैठे हैं,वे राजनीति को सरकार के गठन के आर-पार देखने को तैयार नहीं हैं।वे यह भी भूल गए कि इंदिरा गांधी जैसी दिग्विजयी नेत्री को क्षेत्रीय दल मिलकर धूल चटा चुके हैं,उसके पराभव में उनकी बड़ी भूमिका थी,आज कांग्रेस यदि हाशिए पर है तो क्षेत्रीय दलों के कारण,न कि भाजपा के कारण।भाजपा का उदय तो हाल के वर्षों में हुआ है।केन्द्र सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ असल मोर्चा तो क्षेत्रीय दलों ने लिया था,निकट भविष्य में भी वही होगा।कम से कम कांग्रेस को कभी -कभार किसी क्षेत्रीय दल का राजनीतिक सहयोग मिल भी जाता था लेकिन भाजपा के साथ तो कोई क्षेत्रीय दल भरोसे के साथ जाना नहीं चाहता। भाजपा के लिए विधानसभा चुनाव के आंकड़े उतने संतोषजनक नहीं हैं जितने बताए जा रहे हैं।यह सच है भाजपा की सरकार असम में बन गयी है,लेकिन यह स्थिति तो विगत दो साल से साफ है।कांग्रेसनिकम्मेपन, गुटबाजी और भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी है।सोचने वाली बात यह है कि कांग्रेस के अलावा किस दल को भाजपा ने हराया है,क्या किसी क्षेत्…

बंगाल और हिन्दी के बुद्धिजीवी-लेखक

मुझे पश्चिम बंगाल में रहते हुए 27साल गुजर गए।इसबीच यहां बहुत कुछ बदला है लेकिन अफसोस यह है हिन्दी के बुद्धिजीवियों-लेखकों का संस्कार नहीं बदला।पश्चिम बंगाल में हिन्दी के बुद्धिजीवी देश के विभिन्न कोनों से आते रहे हैं।भाषण करते रहे हैं,सम्मान लेते रहे हैं।लेकिन कभी इन बुद्धिजीवियों ने आँखें खोलकर बंगाल के यथार्थ पर नहीं लिखा,जो कुछ लिखा वह किताबी विषयों पर लिखा,मसलन् रैनेसां पर लिखा,लेकिन उसकी जमीनी हकीकत को कभी जानने की कोशिश नहीं की।चूंकि अधिकांश बुद्धिजीवी प्रगतिशील थे अतःवे यहां के जमीनी यथार्थ से आँखें चुराकर भागते रहे हैं।यही हालत पश्चिम बंगाल के बंगाली बुद्धिजीवियों की है।वे नंदीग्राम के बहाने उठे और फिर सो गए।

सवाल यह है पश्चिम बंगाल के यथार्थ को जानने और समझने के लिए जिस जोखिम को उठाने की जरूरत है वह जोखिम लेखक उठाने से क्यों कतराते रहे हैं ॽ जो भी थोडा-बहुत लेखन है वह वाम के पक्ष और विपक्ष में है।वाम की आलोचना पर है। लेकिन वाम के अलावा बंगाल का सामाजिक यथार्थ भी है जिसकी ओर आलोचनात्मक नजरिए से देखने की जरूरत है।यह काम पहले नहीं हुआ अभी भी नहीं हो रहा।सारी समस्याएं …

वाम- कांग्रेस गठजोड़ पराजय के सबक-

पश्चिम बंगाल में वाम की पराजय काफी महत्व रखती है।जिन लोगों की वाम के प्रति सहानुभूति है वे वाम को पश्चिम बंगाल के सामाजिक यथार्थ के संदर्भ में बहुत कम जानते हैं,जो वाम इस राज्य में है वह विचारधारा के नशे और ३४साल सत्ता में रहने के कारण यथार्थ से एकदम कटा हुआ है।लोकल से लेकर नेशनल स्तर के वामनेता,खासकर माकपानेता जमीनी यथार्थ को देखने से भागते रहे हैं।सच्चाई यह है कि वाम के पराभव का सिलसिला थमा नहीं है ऊपर से राजनीतिक अवसरवाद ने वाम को घेर लिया है।आयरनी यह है कि माकपा पोलिट ब्यूरो सदस्य पी.विजयन( केरल) से प्रणव राय से हाल ही में केरल कवरेज के दौरान पूछा कि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस से वाम ने जो गठबंधन किया है उस पर क्या कहना है ? विजयन ने कहा मैं नहीं जानता।आश्चर्य है वाम-कांग्रेस का यहां गठबंधन था सारे मीडिया में खबर है पूरी पार्टी मिलकर चुनाव लड़ रही है लेकिन पोलिट ब्यूरो सदस्य कह रहा है,मैं नहीं जानता! चुनावी सभाओं में पोलिट ब्यूरो सदस्य गठबंधन कह रहे हैं,लेकिन एक दूसरे पोलिट ब्यूरो सदस्य विमान बसु ने कहा गठबंधन कहां है ? यह राजनीतिक दोगलापन यदि माकपा नेताओं के मन में है तो ज…

ममता की जीत को यहां से देखो-

पश्चिम बंगाल में माकपा का जनाधार जिस तरह खत्म हो रहा है वह बताता है कि माकपा ने 34साल की वामशासन की गलतियों से कोई सबक हासिल नहीं किया ।मसलन् इसबार के चुनाव में माकपा को मात्र 19.7फीसदी वोट मिले हैं जबकि टीएमसी को 44.9फीसदी वोट मिले हैं।यानी टीएमसी अकेले अपने दम पर समाज के बृहत्तर तबकों के बीचमें अपनी स्वीकृति अर्जित करने में सफल रही है।खासकर अल्पसंख्यकों,एससी,एसटी और ग्रामीणों में उसे व्यापक जन समर्थन तो मिला है, इसके अलावा शहरीजनों में भी वह जनाधार का विस्तार करने में सफल रही है।इसबार के चुनाव से यह भी निष्कर्ष निकलता है कि टीवी चैनलों का जनता पर कोई असर नहीं होता।आज भी निजी जनसंपर्क और परंपरागत संगठन के जरिए किया गया प्रचार कार्य प्रभावी होता है।जो लोग सोचते हैं कि टीवी और सोशलमीडिया से चुनाव जीता जाता है,वे गलतफहमी में हैं।
पश्चिम बंगाल में अधिकांश टीवी चैनलों ने अहर्निश ममता के खिलाफ प्रचार किया,लेकिन आम जनता पर उसका कोई असर नहीं हुआ।इसका प्रधान कारण है ममता का कैडर आधारित संगठन।दूसरी बात यह कि ममता सरकार ने विकासमूलक योजनाओं को नीचे तक लागू करके,स्वयं निरीक्षण और निर्देशन का…

हिन्दी की कब्र पर खड़ा है आरएसएस

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आरएसएस के हिन्दी बटुक अहर्निश हिन्दी-हिन्दी कहते नहीं अघाते। वे हिन्दी –हिन्दी क्यों करते हैं ॽ यह मैं आज तक नहीं समझ पाया। इन लोगों के हिन्दीप्रेम का आलम है कि ये अभी तक इंटरनेट पर रोमनलिपि में हिन्दी लिखते हैं,मेरे अनेक दोस्त हैं जो रोमनलिपि में हिन्दी लिखते हैं,मेरी उनसे कोई तकरार नहीं है,मेरी आरएसएस भक्तों के अंग्रेजी लिपि या फॉण्ट में हिन्दी लेखन को लेकर भी कोई आपत्ति नहीं है।भाषा को मैं स्वैच्छिक मानता हूँ,जिसकी जैसी रूचि हो,जिस तरह लिखना चाहे लिखे,भाषा में मन का स्वभाव या लिखने की आदत या बोलने की आदत की बहुत बड़ी भूमिका होती है।इसके अलावा मिश्रण का भी भाषा पर असर होता है।

फासिज्म के भाषाई जंजाल में जीने वाले आरएसएसवाले हिन्दी को शुद्ध करने की जब मुहिम चलाते हैं तो हंसी आती है,वे शुद्धभाषा,शुद्ध हिन्दी के प्रयोग पर बल देते हैं।लेकिन खुद कम से कम लिखते हैं। पर उपदेश का यह आदर्श नमूना है।हिन्दी को जनप्रिय बनाना है तो खूब लिखो,लेकिन ट्विटर पोस्ट से अधिक तो संघी लोग लिखते नहीं हैं ! इतने कम शब्दों से हिन्दी बचने से रही !

हिन्दी या कोई भी भाषा लेखन और शिक्षा से बचती है,नारेबाज…

हिन्दू भारत !!

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जितनी सड़कों के नाम बदलने हों एकबार पत्र लिखकर मोदीजी को दे दो ! सब एक साथ बदल लो !यह रोज-रोज का झगड़ा खत्म करो !! देखते हैं उसके बाद क्या चाहते हो ?
राममंदिर बनाना है वह भी बना लो! जितनी मस्जिदें गिरानी हैं और मंदिर बनाने हैं,सब एक साथ बना लो ! न्यायपालिका पसंद न हो तो उसे अपदस्थ कर दो !!इसके बाद क्या करोगे ?
पाकिस्तान को खत्म करना हो तो वो भी कर लो ! अखंड भारत बनाना हो तो वो भी बना लो ! फिर क्या करोगे ? इसके बाद का तो तुम्हारे पास कोई एजेण्डा नहीं है।
रही बात शिक्षा की तो मारो एक अध्यादेश सारे विश्वविद्यालयों को वैदिक विश्वविद्यालय,योग पीठ,संत पीठ सिंहस्थ पीठ आदि में तब्दील कर दो ! वैज्ञानिकों से कहो कि वे और कहीं नौकरी ढूँढ लें! वैज्ञानिक संस्थान बंद कर दो!!कल-कारखाने बंद कर दो! प्रसाधन की सामग्री बंद कर दो !गोपीचंदन लगाना अनिवार्य कर दो!
लड़कियों से कहो वे देशी बनें,कपड़े बदलें,दर्जियों से कहो पुराने किस्म के देशी हिन्दू कपडों के सिवा और किसी तरह के कपड़े न बनाएं। मुसलमानों और ईसाईयों के कपड़े,संस्कार,आदतें,विचार ,नाम ,संगीत आदि सब बदल दो!!
सबको सिर पर चोटी रखना,यज्ञोपवीत…

RSSअंत में कहां मिलेगा ?

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आरएसएस वाले कहते हैं उनको हिन्दू आतंकी संगठन मत कहो,हिन्दू फंडामेंटलिस्ट और साम्प्रदायिक संगठन मत कहो,हम तो यही कहेंगे अपनी राजनीति गतिविधियां बंद कर दो, लोग बोलना बंद कर देंगे।स्वयंसेवी संगठन की आड़ में राजनीति करोगे,अन्य किस्म की हथियारयुक्त गतिविधियां करोगे तो लोग अंगुली उठाएंगे,तुमने वायदा किया था राजनीति नहीं करोगे ,लेकिन सामाजिक संगठन होने का दावा करते हो।
तुम्हारे सदस्य फेसबुक से लेकर पीएम की कुर्सी तक संघ की राजनीति करते हैं,संघ प्रमुख राजनीतिक बयान देते रहते हैं ,जाहिर है राजनीति करोगे तो राजनीतिक गतिविधियों के आधार पर तुम्हारा नामकरण भी होगा,उससे चिढो मत,झेलो,और सामाजिक संगठन का दावा करना बंद करो।जितने भी नए नाम आरएसएस को दिए गए हैं वे गतिविधियों के कारण दिए गए हैं।
तुम अपने सदस्यों पर लगे केस हटवा सकते हो लेकिन गतिविधियों को नहीं मिटा सकते,आम जनता गतिविधियों को याद रखती है,वह मौका मिलने पर सबक भी सिखाती है।लेकिन तुमने जनता को सबक सिखाने,उसके दिलोदिमाग को प्रदूषित करने की नई कला विकसित की है,तुम समाचार चैनलों का जमकर दुरूपयोग कर रहे हो,आम जनता के मन को प्रदूषित कर रहे हो,लेकिन…

धार्मिक फंडामेंटलिज्म का तर्कशास्त्र

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धार्मिक फंडामेंटलिज्म किसी एक धर्म के लोगों तक सीमित नहीं है बल्कि वह धर्म का आवरण के रूप में इस्तेमाल करता है।बुनियादी तौर पर इसका धर्म से कोई संबंध नहीं है।चूंकि ये लोग धर्म का आवरण के रूप में इस्तेमाल करते हैं इसीलिए हिन्दू फंडामेंटलिज्म,इस्लामिक फंडामेंटलिज्म,क्रिश्चियन फंडामेंटलिज्म नाम से इनकी विचारधारा को सम्बोधित किया जाता है। भारत में इनमें से दो किस्म फंडामेंटलिस्ट संगठन सक्रिय हैं ये हैं हिन्दू फंडामेंटलिस्ट और इस्लामिक फंडामेंटलिस्ट।धर्म इनके लिए मुखौटा मात्र है।असल चीज है धार्मिक फंडामेंटलिज्म।धर्म के आवरण की इनको जरूरत इसलिए पढ़ती है जिससे ये अपने हिंसक कर्मों को वैध बना सकें।खासकर पुरानी मनोदशा के लोगों में अपने कुकर्मों को वैध बना सकें।धार्मिक फंडामेंटलिज्म उन लोगों को जल्दी अपील करता है जो धार्मिक नजरिए से घटनाओं को देखते हैं।फंडामेंटलिस्ट संगठन अपने हिंसक लक्ष्यों के लिए धर्म का राजनीतिक उपयोग करते हैं।

         धार्मिक फंडामेंटलिज्म का लोकतांत्रिक संविधान ,धर्मनिरपेक्षता,न्यायपालिका आदि में कोई विश्वास नहीं है,वे बुनियादी तौर पर हाशिए के लोगों और औरतों के हकों और…

गरीब के पांच स्टीरियोटाइप –

गरीबी समस्त सामाजिक विपदा की जड़ है।गरीबी को आमतौर पर हम देखकर भी अनदेखा करते हैं या फिर उसके स्टीरियोटाइप रूप से बंधकर सोचते हैं।मीडिया के प्रचार ने हमारे मन में गरीब विरोधी धारणाएं बिठा दी हैं।ये सभी धारणाएं विभिन्न किस्म के स्टीरियोटाइप के जरिए मन में आती हैं। गरीब को लेकर पहला स्टीरियोटाइप तो यही है कि गरीब पढ़ना नहीं चाहता,शिक्षा को महत्व नहीं देता।इस तरह के स्टीरियोटाइप में गरीबों के बच्चों का स्कूल न जाना,मिड डे मिल के लिए स्कूल जाना,बीच में ही पढ़ाई छोड़ देना आदि चीजें हैं जो इस स्टीरियोटाइप को पुख्ता बनाते हैं।इस स्टीरियोटाइप को बनाने में गरीब के परिवार की भी भूमिका है,गरीब के परिवार की यह स्थिति नहीं होती कि वह अपने बच्चे का ठीक से ख्याल रख सके,उसके शैक्षणिक कार्य-व्यापार पर नजर रख सके।गरीब की पढ़ने में रूचि नहीं है यह स्टीरियोटाइप तुरंत नष्ट हो जाए यदि गरीब का परिवार बच्चे पर नजर रखे,उसके शिक्षा संबंधी कार्य-व्यापार में शिरकत करे।शिक्षा का संबंध सिर्फ स्कूल से ही नहीं है उसमें परिवार की बहुत बड़ी भूमिका है। गरीब यदि शिक्षा के प्रति उपेक्षा भाव व्यक्त कर रहा है तो …

स्टीरियोटाइप से निकलकर देखो

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फेसबुक पर स्टीरियोटाइप लेखन खूब है।जाति ,धर्म,राजनीति और लिंगाधारित स्टीरियोटाइप ने समूचे संचार को घेरा हुआ है,हम उससे भिन्न संचार की कभी चर्चा ही नहीं करते।जो जिस पर लगा है वह उसी पर लगा है।इसने संचार में रूढ़िबद्धता को जन्म दिया है।संप्रेषण के मामले में हमें स्टीरियोटाइप बनाया है। जो मोदी विरोधी हैं वे मोदी विरोध पर ही केन्द्रित हैं,जो साहित्य पर केन्द्रित हैं वे लगातार साहित्य पर लिख रहे हैं,जो दलित केन्द्रित हैं वे हमेशा दलितों के सवालों पर ही लिख रहे हैं,जो मोदी भक्त हैं वे मोदीभक्ति में ही हमेशा डूबे रहते हैं।जो समलैंगिक हैं वे उसी मसले पर चिपके पड़े हैं,जो जेएनयू केन्द्रित हैं वे सिर्फ जेएनयू के मसले पर ही ध्यान लगाए बैठे हैं।कायदे से संप्रेषण में इस तरह के रूढ़िबद्ध दायरे टूटने चाहिए लेकिन हो उल्टा रहा है।रूढ़िबद्धता बढ़ रही है।इससे वैचारिक तौर पर फंडामेंटलिज्म को मदद मिलती है।विकल्प की राजनीति के विकास में बाधाएं पैदा होती हैं। रूढिबद्ध संप्रेषण वस्तुतःनिरर्थक संप्रेषण है,वह विकल्प के रूपों के बारे में सोचने ही नहीं देता।फेसबुक सेलेकर मीडिया तक रूढिबद्धता का फलक इतना व्यापक ह…

कीर्तन ,संस्कृति और राजनीति

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कीर्तन-भजन हमारा समाज कब से कर रहा है यह ठीक-ठीक बताना मुश्किल है।भजन के लिए पवित्र मंत्र चाहिए।जबकि कीर्तन के लिए संगीत और लय चाहिए।भजन अकेले की साधना है ,जबकि कीर्तन सामूहिक आनंद है।कीर्तन बुनियादी तौर पर शास्त्रीय संगीत का विकल्प है।शास्त्रीय संगीत में गायक प्रमुख है। जबकि कीर्तन एकल नहीं सामूहिक होता है।शास्त्रीय संगीत में गायक-श्रोता आमने-सामने होते हैं। उनमें विभाजन या अंतराल बना रहता है।जबकि कीर्तन में श्रोता की भिन्न स्थिति नहीं होती।बल्कि कीर्तन में वह शामिल होता है।गायक-श्रोता का वर्गीकरण कीर्तन के लिए बेमानी है।

शब्द का अपना इतिहास होता है,मंशा होती है और उससे जुड़ी राजनीति भी होती है।मजदूरों की बस्ती में जब कीर्तन होता है तो उसका लक्ष्य वही नहीं रहता जो मन्दिर में होने वाले कीर्तन का है।कईबार दंगों के पहले कीर्तन का आयोजन करके दंगों के लिए माहौलबनाया गया है।अपराधी लोग अपने को पुण्यात्मा के रूप में स्वीकृति दिलाने के लिए कीर्तन कराते हैं।इस नजरिए से देखें तो कीर्तन का अर्थ संदर्भ और परिस्थितियों पर निर्भर करता है।फलतःकीर्तन भिन्न भिन्न परिस्थितियों में भिन्न अर्थ क…

औरत के हक में और संशय के प्रतिवाद में

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फ़ेसबुक से लेकर मासमीडिया तक , नेताओं से लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं तक औरतों के प्रति संशय और संदेह का वातावरण बन रहा है । औरत हो या पुरुष किसी पर भी संदेह या संशय के आधार पर बातचीत नहीं करनी चाहिए ।मानवीय सभ्यता के विकास में मानवीय भरोसे और विश्वास की बड़ी भूमिका रही है। कभी-कभार इन संबंधों में विपर्यय भी देखा गया है।औरतों में बहुत छोटा किंतु नगण्य अंश है जो विश्वासघात भी करता रहा है । यह पहले भी था और आगे भी रहेगा ।

मानवीय संबंध स्त्री-पुरुष संबंधों के बिना नहीं बनते । नए युग में इन संबंधों का स्वरुप नए ढंग और तरीक़े से बनाना होगा । नए मानवीय मूल्यों को औरतें भी अर्जित कर रही हैं ।वे निडर होकर जीने की कोशिश कर रही हैं ,हमें उनकी इस कोशिश में हर संभव मदद करनी चाहिए ।औरत निडर और आधुनिक बनेगी तो वह हमारी पुरानी आस्थाओं को तोड़ेगी और चुनौती भी देगी ।हम सभी लोग औरत के इस नए परिवर्तन को समझ नहीं पा रहे हैं ।

औरत बदलती है तो सबसे पहले पुरानी आस्थाएँ टूटती हैं , औरत का पुराना स्टीरियोटाइप टूटता है । इस क्रम में अनेक मर्दों और औरतों को त्रासदियाँ झेलनी पड़ सकती हैं।औरत का बदलना और समाज …

चैनलों का पागलपन

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टीवी चैनलों की खबरें और टॉकशो यही संदेश देते हैं कि हमारे देश का मीडिया इरेशनल और पगलाए लोगों के हाथों में कैद है। किसी व्यक्ति विशेष या चर्चित व्यक्ति के नाम का अहर्निश प्रसारण पागलपन है।एक जाता है दूसरा आता है। पहला पागल तब तक रहता है जब तक दूसरा पागल मिल नहीं जाता । यह मीडिया पागलपन है। हमें जनता की खबरें चाहिए,पागलों की खबरें नहीं चाहिए। यदि यह रिवाज नहीं बदला तो समाचार टीवी चैनलों को पागल चैनल कहा जाएगा।टीवी पागलपन वस्तुतः मीडिया असंतुलन है ।मीडिया अपंगता है ।मीडिया संचालक अपने को समाज का संचालक या जनमत की राय बनाने वाला समझते हैं। सच इसके एकदम विपरीत है। अहर्निश प्रसारणजनित राय निरर्थक होती है। और चिकित्साशास्त्र की भाषा में कहें तो पागल की बातों पर कोई विश्वास नहीं करता । उन्मादी प्रसारण राय नहीं बनाता बल्कि कान बंद कर लेने को मजबूर करता है ।

मीडिया पागलपन के तीन सामयिक रुप "मोदी महान","कांग्रेस भ्रष्ट" और "विपक्ष देशद्रोही "। टीवी वालो खबरें लाओ। एक बात का अहर्निश प्रसारण खबर नहीं है। चैनलों को देखकर लगेगा कि भारत गतिहीन समाज है। यहां इन तीन के अल…

भक्त प्रोफेसरों के प्रतिवाद में -

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जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की एकेडमिक कौंसिल की बैठक में शिक्षकों ने जिस एकजुटता का परिचय दिया है वह हम सबके लिए गौरव की बात है।इससे देश के प्रोफेसरों को सीखना चाहिए। जेएनयू के शिक्षकों ने अपने संघर्ष और विवेक के जरिए जेएनयू कैंपस के लोकतांत्रिक परिवेश और लोकतांत्रिक परंपराओं को मजबूत किया है।हमारे देश के विश्वविद्यालयों के अधिकांश प्रोफेसर यह भूल गए हैं कि उनका स्वतंत्र अस्तित्व तब तक है जब तक विश्वविद्यालय स्वायत्त हैं।प्रोफेसर अपने पेशे के अनुरूप आचरण करें।लेकिन हमारे अधिकांश प्रोफेसरों ने अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति हेतु विश्वविद्यालय के स्वायत्त स्वरूप पर हमलों को सहन किया ,हमलों में मदद की ,इसके कारण राजनेताओं और मंत्री का मन बढ़ा है।इस तरह के प्रोफेसरों को ´भक्त प्रोफेसर´ कहना समीचीन होगा। प्रोफेसर का पद गरिमा और बेहतरीन जीवनमूल्यों से बंधा है उसकी ओर भक्तप्रोफेसरों ने आलोचनात्मक ढ़ंग से देखना बंद कर दिया है।वे शासन की भक्ति में इसकदर मशगूल हैं कि उनको देखकर प्रोफेसर कहने में शर्म आती है,इस तरह के ´भक्तप्रोफेसरों´ की स्थिति गुलामों जैसी है।हमें हर हाल में विश्…

फेक डिग्रियों के खेल में-

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पी एम नरेन्द्र मोदी की बीए,एमए की डिग्री के मामले पर डीयू के रजिस्ट्रार ने जिस तरह का बयान दिया है वह बताता है कि मोदीजी की डिग्रियां फेक हैं।रजिस्ट्रार का कहना है नाम और वर्ष की त्रुटियां सामान्य बात है।रजिस्ट्रार गलत कह रहे हैं,किसी भी छात्र के प्रमाणपत्र और अंकतालिका में ये त्रुटियां पकड़ी जाने पर आपराधिक मामला बनता है।वि.वि.संबंधित छात्र पर केस करता है या फिर उसे दाखिला नहीं देता।दूसरी बात नाम और वर्ष की त्रुटियों को तो प्रकारान्तर से रजिष्ट्रार ने मान लिया है,ऐसे में मोदीजी की डिग्रियां फेक है।डीयू के वीसी ने रजिस्ट्रार के बयान से अपने को पृथक रखा है,यानी डिग्री फेक हैं।असल में,  मोदीजी को अपनी डिग्रियों का मूल रूप दिखाना चाहिए।गुजरात वि वि और दिल्ली विवि के मौजूदा प्रशासन को इस बीच में उन्होंने शामिल क्यों किया है ? उनको डिग्री मिल चुकी है,मूल उनके पास है वही दिखाया जाना चाहिए।डुप्लीकेट का सवाल तब पैदा होता है जब मूल खो जाए,मूल खोया नहीं है,मूल उनके ही पास है,यदि खोया है तो उन्होंने पहले कभी डुप्लीकेट निकलवाया होगा वही दिखाएं। यह भी बताएं डुप्लीकेट कब बनवाया और क्यों …

फेसबुक पापाचार

एक सज्जन हैं और लेखक हैं। लेकिन फेसबुक पर लड़की देखकर लंपट भावबोध में चले जाते हैं।फेसबुक पर उनके कुकर्म देखें ,फेसबुक में कुकर्म भाषा में होता है।जैसे, हलो, कैसी हो,अकेली हो,मैं तो अंधेरे में बैठा हूँ। वगैरह -वगैरह। अब इन जनाब को कौन समझाए कि जान न पहचान बड़े मियाँ सलाम करके लड़की देखी और पीछे हो लिए।काश,ये जनाब सभ्य हो पाते ! जीवन में कमीनापन पसंद नहीं करते तो फेसबुकलेखन में कमीनापन कैसे मान लें। कमीनेपन की लेखन में कोई जगह नहीं है। कमीनापन असभ्यता है। लेखन का काम है कमीनेपन को नंगा करना, न कि कमीनापन करना। फेसबुक पर सक्रिय पापबुद्धि का एक और रुप है, हाल ही में जिस दिन समलैंगिकता पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया तो मैंने उसदिन कई पोस्ट लगायीं। एक जनाब चैटिंग में आए और लगे बतियाने,बोले अजी सर,अब आपके पास तो कई समलैंगिकों के प्रस्ताव आ जाएंगे। अब आपलोग ही बताएं इस तरह की मनोदशा के लोगों का पागलखाने के अलावा और कहीं इलाज संभव है ? फेसबुक पर पापाचार का आलम यह है कि पढ़ी-लिखी लड़कियों को दुष्टलोग आए दिन सताते हैं। सताने के तरीके जानें - शुरु होतेही कहेंगे, हलो,कैसी हो,इसके बाद नाम-पता-अभिरुचि आ…

भारतीय परिवार और लोकतंत्र

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भारतीय परिवार स्वभाव से अ-राजनीतिक और पुंसवादी है।परिवार का यह ढाँचा बदले इसकी ओर स्वाधीनता संग्राम में ध्यान गया।जिन परिवारों में लोकतांत्रिक राजनीतिक माहौल था वहाँ से जो राजनीति में आया उसकी राजनीतिक भूमिका बेहतर रही है।बेहतर से मतलब लोकतंत्र की मान्यताओं और संस्थाओं के निर्माण में ऐसे लोगों की बेहतर भूमिका रही है । सवाल है कि लोकतंत्र के निर्माण में परिवार की भी कोई भूमिका होती है क्या ? क्या लोकतंत्र के लिए परिवार को बदलने की ज़रुरत है या नहीं ? संघ परिवार ने ऐसे नेता दिए जो परिवारविहीन हैं। परिवारविहीन नेता सामाजिक ज़िम्मेदारियाँ कम निबाहते हैं। सामाजिक विध्वंस ज़्यादा करते हैं !

पूरा परिवार राजनीति करे, यह संस्कार हमारे देश में स्वाधीनता संग्राम ने पैदा किया था । नेहरु परिवार आज़ादी की लड़ाई में तपा और बदला। गांधी परिवार ने नेहरु परिवार की इस विरासत की यथाशक्ति रक्षा की । गांधी परिवार की तरह कोई परिवार संघ के नेता क्यों नहीं पैदा कर पाए ? लोकतांत्रिक परिवार हो और राजनीतिक परिवार हो, यह स्वाधीनता संग्राम की देन है,आज़ादी के बाद कम्युनिस्टों,सोशलिस्टों और कांग्रेसियों ने लोकतांत्र…

गालिब के रंग-

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ग़ालिब सदा किराये के मकानों में रहे, अपना मकान न बनवा सके। ऐसा मकान ज़्यादा पसंद करते थे, जिसमें बैठकख़ाना और अन्त:पुर अलग-अलग हों और उनके दरवाज़े भी अलग हों, जिससे यार-दोस्त बेझिझक आ-जा सकें।
5 अक्टूबर को (18 सितम्बर को दिल्ली पर अंग्रेज़ों का दुबारा से अधिकार हो गया था) कुछ गोरे, सिपाहियों के मना करने पर भी, दीवार फाँदकर मिर्ज़ा के मुहल्ले में आ गए और मिर्ज़ा के घर में घुसे। उन्होंने माल-असबाब को हाथ नहीं लगाया, पर मिर्ज़ा, आरिफ़ के दो बच्चों और चन्द लोगों को पकड़कर ले गए और कुतुबउद्दीन सौदागर की हवेली में कर्नल ब्राउन के सामने पेश किया। उनकी हास्यप्रियता और एक मित्र की सिफ़ारिश ने रक्षा की। बात यह हुई जब गोरे मिर्ज़ा को गिरफ़्तार करके ले गए, तो अंग्रेज़ सार्जेण्ट ने इनकी अनोखी सज-धज देखकर पूछा-‘क्या तुम मुसलमान हो?’ मिर्ज़ा ने हँसकर जवाब दिया कि, ‘मुसलमान तो हूँ पर आधा।’ वह इनके जवाब से चकित हुआ। पूछा-‘आधा मुसलमान हो, कैसे?’ मिर्ज़ा बोले, ‘साहब, शरीब पीता हूँ; हेम (सूअर) नहीं खाता।’



जब कर्नल के सामने पेश किए गए, तो इन्होंने महारानी विक्टोरिया से अपने पत्र-व्यवहार की बात बताई और अपनी…

भारत का मर्म और पंडित नेहरू

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भारत की आत्मा को समझने में पंडित जवाहरलाल नेहरू से बढ़कर और कोई बुद्धिजीवी हमारी मदद नहीं कर सकता।पंडितजी की भारत को लेकर जो समझ रही है ,वह काबिलेगौर है।वे भारतीय समाज,धर्म, संस्कृति, इतिहास आदि को जिस नजरिए से व्यापक फलक पर रखकर देखते हैं वह विरल चीज है।

       पंडित नेहरू ने लिखा है ''जो आदर्श और मकसद कल थे,वही आज भी हैं,लेकिन उन पर से मानो एक आब जाता रहा है और उनकी तरफ बढ़ते दिखाई देते हुए भी ऐसा जान पड़ता है कि वे अपनी चमकीली सुंदरता खो बैठे हैं,जिससे दिल में गरमी और जिस्म में ताकत पैदा होती थी।बदी की बहुत अकसर हमेशा जीत होती रही है लेकिन इससे भी अफसोस की बात यह है कि जो चीजें पहले इतनी ठीक जान पड़ती थीं,उनमें एक भद्दापन और कुरूपता आ गई है। '' चीजें क्रमशःभद्दी और कुरूप हुई हैं,सवाल यह है कि यह भद्दापन और कुरूपता आई कहां से ॽक्या इससे बचा जा सकता था ॽयदि हां तो उन पहलुओं की ओर पंडितजी ने जब ध्यान खींचा तो सारा देश उस देश में सक्रिय क्यों नहीं हुआ ॽ

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है" हिंदुस्तान में जिंदगी सस्ती है। इसके साथ ही यहां जिंदगी खोखली है,भद्दी है,…

सोशलमीडिया के डिजिटल संस्कार-

फेसबुक पर अश्लील वीडियो पोस्ट करने,अश्लील गालियां लिखने,औरतों के प्रति अशालीन आचरण करने,गद्दी बातें लिखने वालों की संख्या बढ़ रही है। कायदे से फेसबुक प्रबंधकों को अश्लील, अपमानजनक भाषा और कामुक सामग्री आदि को निजी पहल करके सेंसर करना चाहिए। अश्लील -कामुक सामग्री और गालियां फेसबुक की आचारसंहिता का उल्लंघन है।सभी यूजरों को अश्लील भाषा और कामुक सामग्री के फेसबुक पर प्रचार-प्रसार का विरोध करना चाहिए.

फोटोग्राफी,डिजिटल तकनीक और विज्ञापनों के दबाब ने हमारे चेहरे-मोहरे सब बदल दिए हैं। खासकर नकली शरीर और नकली शक्ल की जो संस्कृति पैदा हुई है उसने असली चेहरे और असली शरीर के बोध ही खत्म कर दिया है। सवाल यह है कि नकली शक्ल और नकली स्कीन से हमारे नकली विचारों और व्यवहार का संबंध भी बन रहा है क्या ?उल्लेखनीय है भारत के मीडिया और सोशलमीडिया में बेरोजगारी, निरूद्योगीकरण और किसानों की बदहाली पर न्यूनतम कवरेज है । मीडिया से लेकर इंटरनेट तक सैलीब्रिटी चेहरे,फिल्म-टीवी,क्रिकेट आदि का ज्यादा कवरेज है। यह वस्तुतः डिजिटल संस्कृति है।इससे राजनीतिक अचेतनता बढती है।

सोशल नेटवर्क और खासकर फेसब…