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मां के आंसू और निर्दयी नायक!

मां बचपन में क्या करती थी ? किस तरह कमरतोड़ मेहनत करती थी,घर घर जाकर बर्तन मांजती थी,काम करती थी,ये वाक्य दुख नहीं गर्व पैदा करते हैं,मां की कुर्बानियां इस रुप में याद करने से शक्ति मिलती है,आंसू नहीं निकलते! नायक,तुमने देखा होगा कि कोई भी सीईओ तुम्हारे आंसू देखकर रोया नहीं! नायक रोते नहीं हैं!
आंसू इसलिए निकले क्योंकि मां को आप अपने साथ नहीं रखते,मां का प्यार नहीं मिल रहा इसलिए मन दुखी हो गया होगा!
सवाल यह है मां से यदि इतना ही प्यार है तो साथ क्यों नहीं रखते ? मां को त्यागकर सरकारी वैभव में खोए क्यों हो ?
हास्यास्पद है बटुक भी पिघल रहे हैं लेकिन नायक से मांग नहीं करते कि मां को साथ रखो,यह कैसा ढोंग है जिसमें मां साथ नहीं रहती ! यह एकदम फिल्मी मेलोड्रामा है बटुक! नायक के आंसू कभी उसे सहृदय नहीं बना सकते! वैसे भी तुमको मां के आंसू की पीड़ा को लेकर कोई ग्यान नहीं ,ग्लानि नहीं,वरना सैंकडों माताओं की गोद सूनी हुई थी २००२ के दंगों में ,किसी मां के आंसू पोंछते तुमको हमने नहीं देखा,रोते भी नहीं देखा! कम से उस समय रो लेते तो भी देश याद रखता कि तुम कितने सहृदय हो,लेकिन तुम्हारे आंसू न…

बैंकिंग सेवा और भाषा समस्या

भारत में राष्ट्रीयकृत बैंक मूलत मासबैंकिंग का अंग हैं। यहाँ पर जनता के व्यापकतम समूहों की सक्रियता सहज ही देखी जा सकती है। सामान्यतौर पर बैंकिंग में अंग्रेज़ी मूल भाषा है। लेकिन जनता के लिए बंगला,हिन्दी आदि के उपयोग की व्यवस्था है। यह सच है कि हिन्दी और लोकल भाषा का प्रयोग बढ़ा है। लेकिन सच यह है बैंकिंग में लोकल भाषाओं का क्षय हुआ है। हिन्दी का प्रतीकात्मक उपयोग बढ़ा है।
समस्या यह है कि बैंकिंग सिस्टम में लोकल भाषाओं का ह्रास कैसे रोका जाय ? बैंकिंग भाषा समस्या को हमने मानकीकरण के ज़रिए हल करने की कोशिश की है। मानकीकरण से संचार तो होता है लेकिन जातीय और लोकल बोली और भाषा का विकास बाधित होता है। इस तरह मानकीकरण के कारण जो भाषायी अन्तर्विरोध पैदा होता है वह अंतत: मानक भाषा को बढ़त दिलाता है और स्थानीय भाषा और बोलियों को क्षतिग्रस्त करता है।
सिस्टम में मानक भाषा के विकास के साइड इफ़ेक्ट के बारे में हमने कभी खोज ख़बर नहीं ली। बैंकिंग सिस्टम ने कभी भाषायी समृद्धि के विकल्पों की खोज नहीं की। मसलन्, बैंकों ने भाषा और साहित्य के विकास की मूलभूत संरचनाओं के निर्माण की ओर कभी ध्यान नहीं दिया।…

सुब्रह्मण्यम स्वामी के कु-विचार

भाजपा नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी आरएसएस के विचारों की ताजा गंध देते हैं। स्वामी का कहना है " दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) में एक एंटी नारकोटिक्स ब्यूरो और सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ़) का एक कैंप होना चाहिए." इस बात के बहाने स्वामी बताना चाहते हैं कि उनकी मंशाएं साफ हैं वे जेएनयू को "नरक" के रुप में देखते हैं। उनके लेखे वहां छात्र पढ़ने लिखने नहीं जाते ,बल्कि अन्य किस्म के कामों के लिए जाते हैं। स्वामी ने अपने ट्विटर हैंडल @Swamy39 पर लिखा, "जेएनयू कैंपस में छापा मारकर नक्सलियों, जिहादियों को पकड़ने के लिए बीएसएफ़ कैंप और एंटी नारकोटिक्स ब्यूरो होना चाहिए." सवाल यह है मोदी पुलिस को एक्शन लेने से किसने रोका है ?पुलिस जेएनयू कैम्पस में जाती क्यों नहीं है ? छापे क्यों नहीं मारते मोदी पुलिस के दस्ते ?किसने रोका है नक्सलियों को पकड़ने से ,डेढ़ साल में एक भी दिन पुलिस भेजने का भी समय नहीं मिला बटुक नायक को!!धिक्कार है 56 इंच के सीने को !
हम जानना चाहते हैं कि स्वामी की सूचनाओं का स्रोत क्या है ? उनको किसने बताया कि जेएनयू में नक्सली,जेहादी और नशेड़…

बर्बर बंगाल और कलंकित जनतंत्र

सुनने में अटपटा लगता है लेकिन सच है कि पश्चिम बंगाल निरंतर बर्बरता की ओर कदम बढ़ा रहा है। गांवों से लेकर कस्बों तक प्रेम करने वाले युवाओं पर संगठित हमले हो रहे हैं। इन संगठित हमलों में संस्था के रुप में सालिसी सभाएं अग्रणी भूमिका अदा कर रही हैं। पश्चिमी बंगाल में वाम जमाने में बनायी गयी सालिसी सभाएं इन दिनों बर्बरता के मामले में चरम पर हैं,सालिसी सभाओं के जरिए गांवों में तमाम किस्म के यंत्रणादायी दण्ड नियमित दिए जा रहे हैं,कल एक तरुण की सभा की पब्लिक सुनवाई में सरेआम हत्या कर दी गयी,बांकुड़ा में कल सालिसी सभा में लड़की के पिता ने लड़के की चाकू मारकर हत्या कर दी,बंगाल में अब तक सालिसी सभा ने हजारों प्रेमियों को बर्बर दण्ड दिए हैं,हम मांग करते हैं ये सभाएं तुरंत खत्म की जाएं, अब तक सैंकडों प्रेमियों को ये सभाएं विभिन्न किस्म के बर्बर दण्ड दे चुकी हैं,लेकिन राजनीतिकदलों के मुँह पर ताला लगा है,वे सालिसी सभाओं के फैसलों के खिलाफ कभी नहीं बोलते।      उल्लेखनीय है वामशासन में बर्बर यंत्रणा के लिए बनायी गयी ये सालिसी सभाएं वाम के कलंकित कर्म का आदर्श प्रमाण हैं,टीएमसी ने शासन में आने के …

भ्रष्टाचार और माकपा

माकपा के पश्चिम बंगाल में निरंतर ह्रास के कारणों की पड़ताल की जानी चाहिए। बिना गंभीर पड़ताल के यह पता लगाना मुश्किल है कि माकपा इस दुर्दशापूर्ण अवस्था में कैसे पहुँची।   माकपा के अंदर और माकपा के बाहर बहुस्तरीय भ्रष्टाचार हमने करीब से देखा है। मैं 2005 तक पार्टी में था,बाद में पार्टी छोड़ दी। मसलन्, राज्य के विश्वविद्यालय सिस्टम में पेशागत सीनियरटी का कोई महत्व नहीं है। वाम जमाने में ऐसा सिस्टम बनाया गया कि उसमें पार्टी वफादार ही सीनियर होता था,उसे ही पदों पर बिठाया गया।विश्वविद्यालय के अंदर लोकतांत्रिकीकरण के नाम पर दलीय आदेश पर विभिन्न पदों पर लोग बिठाए गए और उनका मनमाफिक ढ़ंग से इस्तेमाल किया गया। किसी भी किस्म की सीनियरटी और अकादमिक विद्वत्ता को कभी भी माकपा ने कोई जगह नहीं दी। इस तरह के लोगों  को पश्चिम बंगाल में प्रोफेसर बनाया गया जिन्होंने एक निबंध लिखा,किसी विद्यार्थी को पीएचडी तक नहीं करायी,न स्वयं पीएचडी की। इस तरह की पदोन्नति और नियुक्ति पाने वाले लोगों में भाजपा से लेकर माकपा के लोग शामिल हैं,सभी किस्म की पदोन्नतियों और नियुक्तियों में माकपा का होना या माकपा की सिफारिश का …