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February, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

आर्थिकमंदी में फंसी मनमोहन सरकार की मुश्किलें

राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने संसद का बजटसत्र आरंभ होने पर अपना जो अभिभाषण पढ़ा है वह नई उम्मीदों की बात करता है। भारतीय राजनीति की बिडम्बना है कि राष्ट्रपति के भाषण को हमारे नेता-सांसद और अन्य जागरूक लोग ध्यान से नहीं पढ़ते। असल में राष्ट्रपति का अभिभाषण तो मनमोहन सरकार की नीतियों का आधिकारिक बयान है इस बयान में कई नए सवालों और संभावनाओं को पेश किया गया है। इस भाषण में आगामी लोकसभा चुनाव का पापुलिज्म झलक मार रहा है। आने वाले 2014 के लोकसभा चुनाव में यूपीए सरकार और खासकर कांग्रेस किस-किस क्षेत्र के मतदाताओं की ओर नजर गढ़ाए है और किनकी ओर भविष्य में देख रही है इसकी झलक देखी जा सकती है। यह भी सच है कि मनमोहन सरकार अकल्पनीय भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरी होने के बावजूद कई मामलों में कुछ मूल्यवान काम कर बैठी है। विपक्ष की सारी रणनीति इस पर टिकी है कि किसी तरह मनमोहन सरकार को अपनी उपलब्धियां प्रचारित न करने दिया और उस पर दनादन हमले जारी रहें।     प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों का पहला विश्वव्यापी असर यह हुआ है कि आज विकसित पूंजीवादी मुल्कों के राज्याध्यक्ष हमारे देश में पूंजीनिवेश …

फांसी के उन्माद और भ्रष्टाचार में फंसी मनमोहन सरकार

कमजोर का लक्षण है कि वह मीडिया उन्माद से डरता है। यह आभास दिया जा रहा है कि मनमोहन सरकार राजनीतिक तौर पर सबसे कमजोर सरकार है। वह मीडिया के दबाब में फांसी दे रहे है। मीडिया में जब भी किसी मसले को लेकर हो-हल्ला आरंभ होता है ,सरकार ऐसा आभास देती है कि वह मीडिया की सुन रही है। असल में भ्रष्टाचार के आरोपों पर केन्द्र सरकार मीडिया का सामना करने से कतराती रही उसने है और मीडिया के दबाब में हमेशा काम करती रही है। भ्रष्टाचार के मामलों में अपने विवेक से बहुत कम एक्शन लिए हैं।        हाल ही में विचारधीन फांसी के कैदियों की मर्सी पिटीशनों पर सरकार ने जिस तरह की सक्रियता दिखाई है वैसी सक्रियता पहले कभी नहीं दिखाई।    उल्लेखनीय है दामिनी बलात्कार कांड के प्रतिवाद में जब जुलूस निकल रहे थे और देश में चारों ओर प्रतिवाद हो रहा था उस समय एक ही नारा सभी दिशाओं से मीडिया से गूंज रहा था बलात्कारी को फांसी दो। लगता है इस नारे को केन्द्र सरकार ने अपनी नई न्यायनीति का एक्शन प्लान बना लिया है।      राष्ट्रपति पद संभालने के बाद प्रणव मुखर्जी की सक्रियता देखने लायक है। केन्द्र सरकार की फांसी की सजा को लागू करने क…

हिन्दी साहित्य के जुगनूओं की बोगस दुनिया

हिन्दी लेखकों पर दलितलेखकों ने बहुत सही जगह आलोचनात्मक हमला किया है और इसके कारण हिन्दी के आलोचक दलितलेखकों से घबडाए हुए बात करते हैं। प्रार्थनाशैली में बात करते हैं,झूठी प्रशंसाभाव करते हैं। इस आलोचना का सामाजिक परिणाम यह निकला कि हिन्दी के एक नामी कथाकार को 60साल बाद पता चला कि वह आरक्षित जाति में आता है। अब समझ जाइए इस शर्मनाक चालाकी को कि ये 60साल तक साहित्य की मलाई खाते रहे। जबकि साहित्य को कोटि को ही दलित लेखक नहीं मानते। वे कहते हैं यह वर्णवादी कोटि है। वे दलितसाहित्य की नई कोटि की हिमायत करते हैं। अब सवर्णलेखक अपने पूर्वजों में दलितजाति खोज रहे हैं और बेशर्मी से कह रहे हैं मेरे पूर्वज दलित थे। असल में साहित्य की यह नई बीमारी है। वर्ण बीमारी। -2- हिन्दी में लेखक-प्रोफेसर आए दिन गरीबीभरा अतीत, सत्ता के दबाब, ह्रासमेंट, विक्टमाइजेशन आदि के आए दिन किस्से सुनाते हैं और सहानुभूति जुगाड़ करने की कोशिश करते हैं। ये साहित्य के थोथे किस्से हैं। थोथे किस्सों से लेखक- प्रोफेसर समझ में नहीं आता। -3- यह दौर अमीरों पर भी तबाही लेकर आया है किंगफिशर और सहारा के मालिकों पर जिस तरह कानून की गाज गिरी…

फेसबुक और पुस्तकमेला

कोलकाता पुस्तकमेला में साहित्यिक पत्रिकाओं का सबसे बड़ा पंडाल होता है और उसमें अनेक लेखक अपनी पत्रिकाएं लिए बैठे रहते हैं। कुछ मेले में बिक्री करते भी नजर आते हैं। साहित्यिक पत्रिकाओं के स्टॉल देखने लायक होते हैं। जिस पुस्तकमेले में साहित्यिक पत्रिकाओं का वैभव दिखता है वहां पर साहित्यप्रेम की जड़ें गहरी होती हैं। -
कोलकाता बुकफेयर में देश के बड़े लेखक और विचारक जितनी बड़ी तादाद में भाग लेते हैं और तरह -तरह के विषयों पर भाषण देते हैं वह अपने आप में विलक्षण अनुभव है यह अन्यत्र दुर्लभ है। इस मेले का आयोजन राज्य सरकार की मदद से प्रकाशक गिल्ड करता है। - कोलकाता पुस्तकमेला में रविवार-शनिवार को इतनी भीड़ होती है कि आपको लोगों से सटकर चलना-निकलना होता है। औसतन 7-8लाख आते हैं। 15दिन तक चलने वाले मेले में कुल मिलाकर 35-40लाख लोग आएंगे। - मुंबई में दौलत है और लाखों शिक्षितजन हैं। दिल्ली में पैसा है,शोहरत है,सत्ताकेन्द्र हैं,मध्यवर्गीय लेखकों की हेकड़ी है ,लेकिन बुकफेयर में भीड़ नहीं है। कोलकाता में न सत्ता है,न शोहरत है, न पैसा है,किताबें ही किताबें हैं और लाखों की भीड़ है। किताबों के खरीददार हैं। मुं…

सत्यजित राय के सपनों का अंत

पश्चिम बंगाल में विलक्षण फिनोमिना देखने में आया है। यहां पर नेता एक-दूसरे की नकल में व्यस्त हैं। राजनीति में नकल सबसे बुरी छवि बनाती है। राजनेता का अनुकरणीयभाव कभी नए की सृष्टि नहीं करता। बुरी नीतियों का तबाही मचा सकता है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जिस पार्टी (माकपा) से सबसे ज्यादा नफरत करती हैं व्यवहार में उसी पार्टी की गलत नीतियों का इन दिनों अनुसरण कर रही हैं। हाल ही में राज्य सरकार संचालित फिल्म लेबोरेटरी रूयायन को बंद किए जाने का ममता सरकार ने मन बना लिया है। रूपायन लेबोरेटरी का स्टूडियोसॉल्टलेक सेक्टर -5 में है और इस स्टूडियो के पास अपना बहुत बड़ा फिल्मी जखीरा है। यह राज्य में फिल्म संपादन की एकमात्र लेबोरेटरी है। सॉल्टलेक में इसके पास 2.5 एकड़ जमीन है जिसमें एक एकड़ में लेबोरेटरी है और बाकी जमीन का अन्य कामों में इस्तेमाल किया जा सकता है। इस लेबोरेटरी में फिल्म संपादन की तमाम अत्याधुनिक सुविधाएं और तकनीक उपलब्ध है लेकिन पेशेवर लोग नहीं हैं।      इनदिनों इस लैब में बंगाली फिल्मकार अपनी फिल्मों का संपादन कम करते हैं,ज्यादातर फिल्मकार फिल्म संपादन के लिए चेन्नई जाते हैं.वाममोर्चा शास…

अफजल गुरु को फांसीःभाजपा की बेचैनी बढ़ी

शुक्रवार 8फरवरी को शाम 5बजे अफजल गुरू को सूचना दी गयी कि 9फरवरी को सुबह उसे 8 बजे फांसी दी जाएगी। शुक्रवार शाम को उसे फांसी घर के पास की बैरक में ले जाया गया , जो फांसीघर से करीब 30 कदमों की दूरी पर था। रास्ते में पड़ने वाले बैरकों से कैदियों को हटा दिया गया था, ताकि किसी को इस बात की भनक तक न लग सके।फांसी घर में अफजल का वजन तोला गया।लम्बाई नापी गयी। ताकि फंदे की रस्सी उसका वजन सह सके।  तमाम जरूरी चीजें देख लेने  के बाद अफजल को उसके बैरक में भेज दिया गया। जेल अधिकारियों ने उससे पूछा कि अगर कोई चीज़ चाहिए हो तो बता दे। इस पर अफजल ने कहा कि उसे कुरान चाहिए।फांसी के पहले उसने कुरान पढ़ी। 9फरवरी की सुबह सात बजे उसका रक्तचाप देखा गया और आठ बजे फांसी पर लटका दिया गया ।उसके तत्काल बाद टीवी चैनलों को कहा गया कि अफजल गुरू को फांसी दे दी गयी है। इसी दौरान फांसी घर के सामने ही अफजल के लिए कब्र खोद ली गई  और इस्लामिक रीति-रिवाजों के मुताबिक मौलाना की मौजूदगी में नमाज-ए-जनाजा पढ़ी गई और उसे दफन कर दिया गया। उल्लेखनीय है अफजल गुरु का मर्सी पिटीशन 3 फरवरी को खारिज हुआ।4फरवरी को गृह मंत्रालय ने मोहर ल…

जगदीश्वर चतुर्वेदी -सुधा सिंह की प्रमुख किताबें

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मुक्तिबोध और फेसबुक

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लाभ-लोभ से प्रेरित समझदारी ने मौजूदा संकट पैदा किया है। इस संकट को हम राजनीति से लेकर साहित्य तक सुरसा की तरह विराटरूप में देख रहे हैं। लाभ-लोभ से प्रेरित समझदारी के आप जितने गुलाम होते जाएंगे आप उतने टुच्चे,कमीने,भ्रष्ट और ओछे होते चले जाएंगे।

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भीड़ और जुलूस में शामिल होने का अर्थ है आंतरिक व्यक्तित्व का संहार। जिन लोगों ने जुलूस को महान बनाया वे सोचें कि जुलूस महान कर्म है तो भीड़ का हमला भी महानता का डंका बजाएगा।

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जो फटेहाल है,सामान्य है, उसे मान्यता देने के लिए कोई हिन्दीवाला विद्वान तैयार नहीं है। वे रावण की दासता स्वीकार करने की नेक सलाह देते हैं। वे समझदारी को पागलपन कहते हैं। व्यवहारवादी को दुनियादार कहते हैं। यदि उनके गुट में है तो समझदार है, और अन्य के गुट में हैं या किसी गुट में नहीं हैं तो बेबकूफ है,घटिया है,बोगस है। इस तरह की मनोदशावाले हिन्दीवाले वस्तुतःनैतिक और दैहिक तौर पर मृतवत् हैं। उनके यहां नैतिकता का अर्थ सौदेबाजी और अवसरवादिता है।

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गधे को काका कहो। शैतान से समझौता करो। बड़ों की हाँ में हाँ मिलाओ ।यह बुर्जुर्गों ने सिखाया। सारी प्रगतिशीलता इस बीमारी स…