शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

हिन्दी साहित्य के जुगनूओं की बोगस दुनिया



हिन्दी लेखकों पर दलितलेखकों ने बहुत सही जगह आलोचनात्मक हमला किया है और इसके कारण हिन्दी के आलोचक दलितलेखकों से घबडाए हुए बात करते हैं। प्रार्थनाशैली में बात करते हैं,झूठी प्रशंसाभाव करते हैं। इस आलोचना का सामाजिक परिणाम यह निकला कि हिन्दी के एक नामी कथाकार को 60साल बाद पता चला कि वह आरक्षित जाति में आता है। अब समझ जाइए इस शर्मनाक चालाकी को कि ये 60साल तक साहित्य की मलाई खाते रहे। जबकि साहित्य को कोटि को ही दलित लेखक नहीं मानते। वे कहते हैं यह वर्णवादी कोटि है। वे दलितसाहित्य की नई कोटि की हिमायत करते हैं। अब सवर्णलेखक अपने पूर्वजों में दलितजाति खोज रहे हैं और बेशर्मी से कह रहे हैं मेरे पूर्वज दलित थे। असल में साहित्य की यह नई बीमारी है। वर्ण बीमारी।
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हिन्दी में लेखक-प्रोफेसर आए दिन गरीबीभरा अतीत, सत्ता के दबाब, ह्रासमेंट, विक्टमाइजेशन आदि के आए दिन किस्से सुनाते हैं और सहानुभूति जुगाड़ करने की कोशिश करते हैं। ये साहित्य के थोथे किस्से हैं। थोथे किस्सों से लेखक- प्रोफेसर समझ में नहीं आता।
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यह दौर अमीरों पर भी तबाही लेकर आया है किंगफिशर और सहारा के मालिकों पर जिस तरह कानून की गाज गिरी है उसने कारपोरेट ईमानदारी को नंगा कर दिया है।
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हिन्दी में जो लोग कहते हैं साहित्य की गोष्ठियां और धड़ेबंदी महान बनाती है वे जरा रामविलास शर्मा से सीखें कि किस तरह साहित्य साधना महान बनाती है. हिन्दी के ज्ञानी गुणी और पुरस्कार प्राप्त लेखक शोहरत के नशे में इस कदर डूबे हैं कि वे रामविलास शर्मा की पूजा करना जानते हैं लेकिन उनसे कोई बात सीखना नहीं चाहते। यह बीमारी बड़े लेखक -आलोचक से लेकर नए लेखकों तक फैली हुई है।
जो लेखक अपनी भाषा के साहित्यकार की मूल्यवान बातों को ग्रहण नहीं करते वे जल्द ही अंतर्ध्यान हो जाते हैं। वे साहित्य में जुगनू की तरह हैं।
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हिन्दी में चुगद किस्म के लेखकों की भीड़ पैदा हो गयी है,इनमें कुछ नामी लेखक भी हैं , अकादमी पुरस्कार प्राप्त हैं , ये लोग अहर्निश आत्मप्रशंसा में लीन रहते हैं, आत्मप्रशंसा कोसाहित्य का चुगद भाव कह सकते हैं।ये लोग कम से कम लिखते हैं, हेकड़ी,शोहरत और दौलत के शुरूर में डूबे रहते हैं। इन लेखकों को मंन्नू भंडारी,मृदुलागर्ग,मैत्रेयी पुष्पा जैसी लेखिकाओं से अभी बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। इन लेखिकाओं ने बिना किसी अंहकार, हेकड़ी, चमचागिरी के किस तरह हिन्दी साहित्य को श्रेष्ठतम रचनाएं दी हैं। खासकर मैत्रेयी पुष्पा ने तो कमाल किया है उसने बहुत कम समय में अनेक श्रेष्ठ उपन्यास दिए हैं।
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जब पाठक लेखक के सामने हां -हां करता रहता है और लेखक की महानता का जयगान करता रहता है तो इस तरह के पाठक को हिन्दी का लेखक सुधीपाठक - जागरूकपाठक कहता है।
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कोलकाता से दिल्ली,दिल्ली से मद्रास तक हिन्दी के जो लेखक सनसनाते चमचों के साथ मस्ती लेते नजर आते हैं और यह दावा करते हैं वे बेहद जनप्रिय हैं। वे एक सामान्य तथ्य की उपेक्षा करते हैं.वह यह कि हिन्दी के अधिकांश लेखकों से हिन्दीभाषी लड़कियां मिल नहीं पातीं या मिलना तक नहीं चाहतीं।
मसलन् आपको लेखक के इर्दगिर्द 3-4चार चमचे मिल जाएंगे, लेकिन चमचागिरी करते लड़की नजर नहीं आएगी।
कहने का अर्थ है कि लेखक को चमचाकल्चर को साहित्यसंस्कृति समझने की भूल नहीं करनी चाहिए।
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आप यात्री की तरह कोलकाता को देखेंगे तो आपको यह शहर कभी समझ में नहीं आएगा।आज के दिन यही लगेगा कि यह शहर सरस्वती पूजा में डूबा है ,लेकिन यथार्थ एकदम विलोम है और भयावह है।
देश में बलात्कार के मामलों में यह राज्य विगत आठ सालों में टॉप पर है। अभी कुछदिन पहले ही एक शिक्षित परिवार के लोगों ने अपनी वृद्धा माँ को पीट-पीट कर अधमरा कर दिया और बाद में उसकी मौत हो गया। मुहल्ले के लोगों के दबाब में पूरे परिवार,जिसमें उस औरत का पति,बेटा,बहू आदि को गिरफ्तार करना पड़ा। पता चला वृद्धा को विगत दो सालों से अहर्निश यातनाएं दी जा रही थीं। इस तरह की औरतों को यातना की घटनाएं यहां आम हो गयी हैं। इसके बावजूद आप यदि सरस्वती पूजा के रस में निमग्न हैं तो रहें लेकिन इससे स्त्री के सम्मान और सुख का पता नहीं चलता। कोलकाता आज स्त्री के लिए सबसे त्रासद शहर में तब्दील हो चुका है। यदि आपके पास साहित्यिक नजरिया है तो आपको औरत की बदहाल अवस्था नजर क्यों नहीं आती ?
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हिन्दी आलोचक का ईंधन है ईर्ष्या ! ये बेचारे नहीं जानते इससे निजी ब्लडप्रेशर हाइ रहता है।
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हरिशंकर परसाई ने लिखा है - "श्रद्धेय, बड़े बौड़म लगते हैं। "
ये पंक्तियां हमारे उन तमाम लेखकों को अपने सीने पर लगानी चाहिए जो नगरी-नगरी श्रद्धालु खोजते फिर रहे हैं।
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हरिशंकर परसाई ने लिखा है -" देश में जो मौसम चल रहा है उसमें श्रद्धा की टांग टूट चुकी है। " क्या हिन्दीलेखक गण सुन रहे हैं ?
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हिन्दी में महानता का ढ़ोंग वे ज्यादा कर रहे हैं जो आत्ममुग्ध हैं और आत्मप्रशंसा में लीन हैं। ये लोग पढ़ते कम हैं हांकते ज्यादा हैं। भक्ति ( चाटुकारिता) करने वालों को ज्ञानी मानते हैं।
सवाल यह है कि यदि इस तरह के लोग ज्ञानी हैं तो लिखकर आम पाठकों को अपने ज्ञान से लाभान्वित क्यों नहीं करते ? ज्ञान पेट में रखने की चीज नहीं है अन्य को बताने की चीज है।
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हरिशंकर परसाई ने विकलांग श्रद्धा का दौर निबंध में लिखा है- "यह चरण छूने का मौसम नहीं ,लात मारने का मौसम है।मारो एक लात और क्रांतिकारी बन जाओ।"
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1 टिप्पणी:

  1. मुझे लगता है कि दलितो क ये नातक हद से ज्यादा हो चला है। हिन्दि जगत के सहित्यकरोन को किसी एह्रे - गेह्रे कि सुन ने कि जरुरत नही।

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