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September, 2009 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मुनाफे की खान है मीडि‍या हिंसा

दर्शक जब हिंसा देखता है तो उसमें नकारात्मक भाव पैदा होते हैं। मन में सोचता है। आक्रामक एक्शन की कैद में होता है। ऐसी अवस्था में हथियार ,प्रतीक या नाम वगैरह की उपस्थिति एक्शन के लिए तैयार कर सकती है। इससे दर्शक में भय पैदा होता है। यह हिंसा का तात्कालिक असर है। साथ ही भावनात्मक प्रतिक्रिया,बेचैनी और हताशा पैदा करती है। तात्कालिक मनोवैज्ञानिक प्रभाव को कई अन्य कारण भी प्रभावित करते हैं। जैसे लक्ष्य के साथ में स्वयं को जोड़कर देखना,मसलन् चरित्र आकर्षक हो,बहादुर हो,अथवा दर्शक के सोच से मिलता-जुलता हो। ऐसी स्थितियों में तदनुभूति पैदा होती है। जब किसी हिंसा के शिकार चरित्र के साथ दर्शक अपने को जोड़कर देखता है तो भय में बढ़ोतरी होती है। इस तरह की अवस्था में उसका आनंद भी प्रभावित हो सकता है। पी.एच.तेन्नेवुम और इ.पी.गीर ने ''मूड चेंज एज ए फंक्शन ऑफ स्ट्रेस ऑफ प्रोटागोनिस्ट एण्ड डिग्री ऑफ आइडेंटीफिकेशन इन फिल्म व्यूइंग सिचुएशन''(1965) में लिखा है कि जो दर्शक हीरो के साथ जोड़कर देखते हैं उन्हें ज्यादा तनाव में रहना पड़ता है। ऐसे लोगों के लिए सुखान्त राहत पहुँचाता है। इसके विपरीत …

लालगढ का हिंसाचार और प्रमोद मल्‍लि‍क का हिंसा प्रेम

प्रमोद मल्‍लि‍क साहब,वाममोर्चा जब सन्77 में सत्‍ता में आया था तो मानवाधि‍कारों के हनन के खि‍लाफ आवाज बुलंद करके ही आया था और उस नीति‍ का लंबे समय उसने पालन भी कि‍या। आज उन इलाकों में जाएं जहां पर तृणमूल कांग्रेस के लोग पंचायतों से लेकर संसद तक जीते हैं तो आपको उनकी कार्यप्रणाली देखकर हैरानी होगी। माओवादी लालगढ इलाके में हफता वसूली से लेकर तथाकथि‍त जनअदालतों के जरि‍ए आम लोगों को बि‍ना कि‍सी कारण के दण्‍डि‍त कर रहे हैं। वि‍श्‍वास न हो तो एकबार नंदीग्राम की यात्रा जरूर कर लें। कि‍स तरह का वि‍कल्‍प माओवादी,कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस ने जमीनी स्‍तर पर तैयार कि‍या है उसकी श्‍ाक्‍ल देखकर बि‍हार का माफि‍या राज भी बौना नजर आएगा। बंदूक की नोंक पर माकपा के सदस्‍यों और हमदर्दों को माकपा का साथ छोडने के लि‍ए दबाव डाला जा रहा है, आतंकि‍त कि‍या जा रहा है, ऐसा नहीं करने पर गले में जूतों की माला पहनाकर जुलूस नि‍काले जा रहे हैं,जुर्माना ठोका जा रहा है। जहां पर ऐसा नहीं कर पा रहे हैं वहॉं सरेआम कत्‍ल कि‍या जा रहा है। वि‍गत चार महीनों से हिंसा का ताण्‍डव चल रहा है। गरीब कि‍सानों और आदि‍वासि‍यों की रक्षा…

सामयि‍क युवा संस्‍कृति‍ के बि‍ना 'नयापथ'

जनवादी लेखक संघ कमाल का संगठन है यह संगठन सामयि‍क संसार के साथ संवाद कम से कम करता है। वि‍गत छह महीनों में इस संगठन की साहि‍त्‍यि‍क पत्रि‍का 'नयापथ' के दो 'युवा अंक' आए हैं। इन दोनों अंकों के सम्‍पादकीय और प्रकाशि‍त सामग्री को देखकर यह महसूस होगा कि‍ भारत के युवाओं की कोई समस्‍या नहीं है। उनकी एकमात्र समस्‍या है क्रांति‍कारी प्रेरणा का अभाव। इस अभाव की पूर्ति‍ को केन्‍द्र में रखकर दोनों अंक तैयार कि‍ए गए हैं। वि‍चारणीय सवाल यह है कि‍ अगर हि‍न्‍दी-उर्दू लेखकों की पत्रि‍का में युवालेखन के मूल्‍यांकन के नाम पर यदि‍ शून्‍य है तो भारत का भवि‍ष्‍य क्‍या होगा ? क्‍या हि‍न्‍दी-उर्दू के युवा लेखकों के मूल्‍यांकन की जरूरत नहीं है ? सवाल उठता है कि‍ हि‍न्‍दी-उर्दू से लेकर भारत की कि‍सी भी भाषा के सामयि‍क युवा लेखन को संपादकों ने मूल्‍यांकन योग्‍य क्‍यों नहीं समझा ? युवा लेखन के प्रति‍ इस उपेक्षाभाव की जमकर आलोचना की जानी चाहि‍ए। अप्रैल-जून 2009 के अंक में एकमात्र बजरंग बि‍हारी ति‍वारी का '' भारतीय दलि‍त लेखन:मौजूदा परि‍दृश्‍य''नामक लेख है। दो अंकों में युवालेखन के…

तकनीक के तंत्र में जनतंत्र

आज वि‍देश राज्‍यमंत्री शशि‍ थरूर की टि‍प्‍पणी चर्चा में है। ऐसा क्‍यों है कि‍ एक मंत्री का साधारण आदमी से बात करना भी नीति‍गत समझ माना जाए,क्‍या एक मंत्री को अपनी नि‍जी बातचीत का हक नहीं है, क्‍या तकनीक हमारे बोलने के हक को छीन लेती है,क्‍या प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सही टि‍प्‍पणी की, इस सभी सवालों के जबाव इस तथ्‍य पर नि‍र्भर करते हैं कि‍ आपकी संचार तकनीक की क्‍या समझ है।
संचार तकनीक समानतापंथी होती है। सबको शि‍रकत का समान अवसर देती है। इसका इस्‍तेमाल करते समय चि‍न्‍ति‍त या परेशान होने की जरूरत नहीं है। तकनीक को भय की भाषा में नहीं समझा जा सकता। अब तक संचार तकनीक के मानव सभ्‍यता ने जो खेल देखे हैं वे यही संदेश देते हैं कि‍ तकनीक से बडा समानतावादी कोई नहीं है। संचार तकनीक उन सबकी मदद करती है जो इसमें शि‍रकत करते हैं,चाहे उनकी वि‍चारधारा कुछ भी हो, वे कि‍सी भी धर्म के मानने वाले हों। कि‍सी भी जाति‍ या नस्‍ल के हों। तकनीक सबकी होती है और सबकी मदद करती है। संचार तकनीक अपनी शि‍रकत वाली भूमि‍का के कारण लोकतंत्र का सबसे प्रभावशाली अस्‍त्र भी है।
संचार तकनीक की सर्वोत्‍तम कृति‍ है…

डि‍जि‍टल संस्‍कृति‍ की संभावनाएं

डिजिटल तकनीक आने के बाद संस्कृति का आसान ऊँचा हुआ है,संस्कृति दीर्घायु हुई है।संस्कृति के प्राचीन रूपों के पुनरूत्थान की संभावनाएं प्रबल हुई हैं। इसने संस्कृति और तकनीकी के बीच मित्रता को और भी प्रगाढ़ बनाया है।वे लोग जो संस्कृति और तकनीकी में तनाव और अन्तर्विरोध देखते रहे हैं,आज वे भी डिजिटल के जादू पर मंत्रमुग्ध हैं।तकनीकी और संस्कृति के अन्त:संबंध पर विचार करते हुए हमेशा यह समस्या रही है कि बौध्दिकों का एक बड़ा हिस्सा तकनीकी के विकास का अंध विरोधी रहा है।किंतु डिजिटल के आने के बाद वे भी चुप हैं और डिजिटल के जरिए पुरानी संस्कृति के नवीकृत रूपों का आनंद ले रहे हैं। तकनीकी और संस्कृति के अन्त:संबंध पर विचार करते समय तथ्य ध्यान रखें कि ये दोनों एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़े हैं,साथ ही इनका स्वायत्ता संसार भी है।हम ऐसी संस्कृति की कल्पना नहीं कर सकते जिसमें तकनीकी का इस्तेमाल न किया गया हो, इसी तरह हम ऐसी तकनीकी की कल्पना नहीं कर सकते जिसके निर्माण में संस्कृति की निर्णायक भूमिका न रही हो। यह बात दीगर है कि शोषण पर टिकी व्यवस्थाओं में शासकवर्ग तकनीकी और संस्कृति के बीच कृत्रिम टकराव प…

इंटरनेट युग में भाषाओं का भवि‍ष्‍य

आज दुनिया में तकरीबन 200 देश हैं। जिनमें पांच हजार एथनिक समूह रहते हैं। दो-तिहाई देशों में एकाधिक एथनिक और धार्मिक समूह हैं जो कुल जनसंख्या का 10 फीसदी अंश हैं। अनेक देशों में बड़ी संख्या में मूल बाशिंदे रहते हैं जिन्हें उपनिवेशिकरण और बाद के विकास ने हाशिए पर पहुँचा दिया है। समस्या यह है कि क्या अमेरिकी कंपनियां ,खासकर मीडिया और उपभोक्ता सामान की कंपनियां इस वैविध्य को उपभोक्तावाद की तेज लहर पैदा करके नष्ट कर रही हैं या नहीं ? क्या इंटरनेट मौजूदा उपभोक्तावादी रूझानों से अलग हटकर नई परंपरा शुरू करके जिन्दा रह सकता है ? क्या इंटरनेट का विज्ञापन और उपभोक्तावाद के विकास के लिए इस्तेमाल रोका जा सकता है ? इंटरनेट के लिए अबाधित संप्रसारण अधिकार चाहिए, उपभोक्तावाद और भूमंडलीकरण चाहिए और इन सबके कारण कारपोरेट घरानों के मुनाफों में वृध्दि होगी। वैषम्य बढ़ेगा।सामाजिक-राजनीति तनाव में इजाफा होगा।इंटरनेट और कम्प्यूटर तकनीकी के विकास के दौर में अल्पसख्यकों को सबसे ज्यादा संकटों का सामना करना पड़ रहा है। प्रशासन से लेकर राजनीति सभी स्थानों पर उन्हें हाशिए पर डाल दिया गया है। उनकी भाषा,संस्कृति,सं…

इंटरनेट ,जनान्दोलन और भारतीयता

इंटरनेट के प्रसार ने एकदम नए किस्म के सामाजिक-राजनीतिक और धार्मिक जन-जागरण की शुरूआत की है।ग्लोबल स्तर पर विचारों के आदान-प्रदान के साथ ग्लोबल स्तर के नए सामाजिक आंदोलनों के लिए जनता की शिरकत की अपार संभावनाओं को खोला है। ग्लोबलाइजेशन के खिलाफ विश्वस्तर पर जनता और स्वैच्छिक संगठनों की लामबंदी को एकदम नई ऊँचाईयों पर पहुँचाया है।जनतंत्र के एकदम नए अध्याय की शुरूआत की है।
ग्लोबलाइजेशन वि‍रोधी,युध्द विरोधी,पर्यावरणवादी,स्त्रीवादी और जनतंत्रवादी संघर्षों के पक्ष में विश्वस्तर पर जनता और संगठनों को गोलबंद करने और जागृति पैदा करने में इंटरनेट सबसे आगे है। इंटरनेट उस अमूर्त्त जनता को जगाता है जिसे अभी तक देखा नहीं है।उन्हें एकजुट करता है जो हाशिए पर थे।सामाजिक,राजनीतिक,पर्यावरण,शांति आदि के सवालों पर साधारण जनता को अपने विचार व्यक्त करने और चेतना विकसित करने का मौका देता है।आम जनता को ज्वलंत सवालों पर विवादों में शामिल करता है।यह असल में डिजिटल नागरि‍कता है। यह राष्ट्र-राज्य के दायरे को तोड़ती है।
राष्ट्र-राज्य ने नागरिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की आजादी को सीमाबध्द किया।जबकि डिजिटल जनतंत्र इन …

हिंदी की पहली स्‍त्रीवादी लेखि‍का प्रभा खेतान

प्रभा खेतान की मौत को आज एक साल हो गया है। आज ही अचानक उनकी मौत की खबर अरूण माहेश्‍वरी ने दी थी। सोचा था कभी मौका मि‍लेगा तो जरूर लि‍खूँगा। कई बार दोस्‍तों ने भी अनुरोध कि‍या था किंतु लि‍ख ही नहीं पाया। प्रभाजी की मौत मेरी व्‍यक्‍ति‍गत क्षति‍ थी। मेरे साथ उनका बीस सालों से गहरा संबंध था। बीस सालों में उनके सुख-दुख के तमाम क्षणों में शामि‍ल होने का मौका भी मि‍ला था। प्रभाजी से मि‍लने के बाद कोलकाता के हिंदीभाषी समाज का अमानवीय चेहरा भी देखने में आया। आरंभ में प्रभाजी को यहां के तमाम लेखक और तथाकथि‍त बुद्धि‍जीवी बुरी नजर से देखते थे। जबकि‍ आरंभ से ही प्रभाजी ने अपनी लेखि‍का के रूप में पहचान बनानी शुरू कर दी थी।
प्रभाजी कैसे स्‍त्रीवाद के मार्ग पर आयीं और उनके साथ हिंदी के समर्थ लेखकों के कि‍तने गहरे संबंध थे,यह तथ्‍य सभी लोग जानते हैं। लेकि‍न प्रभाखेतान स्‍त्रीवादी कैसे बनी यह संभवत: कम ही लोग जानते हैं। राजेन्‍द्र यादव और उनके जैसे बड़े लेखकों की उनके लेखन के पीछे प्रेरणा थी,स्‍त्रीवाद का मार्ग पकड़ने के बाद प्रभाजी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। हिंदी में गर्व के साथ अपने को स्‍…

जूते वाला क्रांति‍कारी

मुतादर अल जैदी आखि‍रकार जेल से बाहर आ ही गए। जेल से बाहर आते ही उन्‍होंने खुदा का शुक्रि‍या अदा कि‍या और दुख व्‍यक्‍त कि‍या कि‍ उनका देश अभी अमेरि‍की गुलामी और सेना के जूतों तले कराह रहा है। उल्‍लेखनीय है यह वही पत्रकार है जि‍सने तत्‍कालीन अमेरि‍की राष्‍ट्रपति‍ जॉर्ज बुश पर जूता फेंका था और उन्‍हें इराकी सेना ने गि‍रफ्तार कर लि‍या था और सजा भी दी थी,अब मुतादर जेल के बाहर है। जेल से बाहर आते ही उसने एक बयान में कहा है , मैं कैद से मुक्‍त हो गया हूँ किन्‍तु मेरा देश अभी भी युद्ध में कैद है। मेरे प्रति‍वाद के समय जि‍न लोगों ने मेरा साथ दि‍या था,चाहे वो देश अंदर या बाहर हों,मैं उन सबका धन्‍यवाद करता हूँ। मेरा वह प्रतीकात्‍मक प्रति‍वाद था।
मुतादर ने अपने देश की दुर्दशा देखकर दुस्‍साहसि‍क फैसला लि‍या और बुश के ऊपर अपना जूता फेंककर मारा था। अपने बयान में उसने कहा है मेरे देश की जनता के साथ जि‍स तरह का अन्‍याय हो रहा है,देश पर कब्‍जा जमाने वालों ने हमारी मातृभूमि‍ को जूतों तले रौंदकर जि‍स तरह अपमानि‍त कि‍या है,उसके कारण ही मैंने जूता फेंककर प्रति‍वाद करने का फैसला लि‍या था। वि‍ग…

हाईटेक औरत का गहना है वि‍श्‍वास

मैत्रेयी पुष्‍पा बड़ी लेखि‍का हैं। उनका लि‍खा वजनदार होता है। लेकि‍न जि‍स तरह से उन्‍होंने 'देशकाल' पर एक लेख में प्रति‍क्रि‍या दी है। वह स्‍वीकार्य नहीं है। उन्‍होंने जो बातें कही हैं, वह औरत ,स्‍त्री वि‍मर्श ,स्‍त्रीभाषा और स्‍त्रीवाद के संदर्भ में पुंसवादी हैं। संयम, बंदि‍श, उपदेश, भवि‍ष्‍य,इति‍हास,मूल्‍य,मान-मर्यादा,परंपरा,रीति‍-रि‍वाज , सुकून, स्‍थास्‍थ्‍य, अकलमंदी, बुद्धि‍मानी इत्‍यादि‍ पदबंध औरत के सामने आकर दम तोड़ देते हैं। औरत की दुनि‍या अनुभूति‍ की दुनि‍या है। उसके यहाँ सारे फैसले अनुभूति‍ के आधार पर ही लि‍ए जाते हैं। अनुभूति‍ की कसौटी पर ही वह सारी दुनि‍या को कसकर देखती है।
ज्ञान,वि‍वेक,मूल्‍य,मान-मर्यादा आदि‍ पदबंधों से औरत को कोई लेना देना नहीं है। ये पुंसवादी वि‍मर्श और स्‍त्री को पुंसवादी घेरे में बांधने वाले पदबंध हैं। जि‍स वि‍ज्ञापन की भाषा का मैत्रेयी जी ने अपने लेख में जि‍क्र कि‍या है वह वि‍ज्ञापन है और वि‍ज्ञापन की भाषा उसकी शब्‍दरचना में नहीं होती। उसके अन्‍तर्नि‍हि‍‍त संदेश में होती है। यहां संदेश या सूचना गोली की है, आनंद की नहीं। मैत्रेयी जी की …

प्रायोजि‍त लोकतंत्र का प्रहसन

अफगानि‍स्‍तान में पश्‍चि‍मी लोकतंत्र का प्रहसन चल रहा है। हाल ही में वहां पर राष्‍ट्रपति‍ पद के लि‍ए चुनाव हुए हैं और यह कहा जा रहा है कि‍ यह लोकतंत्र की जीत है। पहली बात यह कि‍ अफगानि‍स्‍तान में लोकतंत्र नहीं नाटो का सेनातंत्र है। नाटो लोकतंत्र पश्‍चि‍म का नया फि‍नोमि‍ना है। सैन्‍य मौजूदगी और अफगानी जनता की संप्रभुता को रौंदते हुए राष्‍ट्रपति‍ चुनाव सम्‍पन्‍न हुए हैं। यहां पर पक्ष-वि‍पक्ष दोनों का ही फैसला पेंटागन और सीआईए के नीति‍ नि‍र्धारकों ने कि‍या था। इस चुनाव को जनतंत्र कहना और अफगानि‍स्‍तान प्रशासन को संप्रभु सुशासन का नाम देना सही नहीं होगा।
20 अगस्‍त 2009 को राष्‍ट्रपति‍ के पद के लि‍ए मतदान हुआ और अभी तक ( 16 सि‍तम्‍बर 2009) परि‍णाम नहीं आए हैं। वि‍देशी पर्यवेक्षकों से भरा नि‍गरानी कमीशन 2,740 शि‍कायतों की जांच कर रहा है। उन तमाम मतदान केन्‍द्रों पर दोबारा मतगणना के आदेश दि‍ए गए हैं जहां पर राष्‍ट्रपति‍ करजई को शत-प्रति‍शत मत मि‍ले हैं। उल्‍लेखनीय है कि‍ जि‍न मतदान केन्‍द्रों पर 600 से ज्‍यादा वोट पड़े हैं उन सभी मतदान केन्‍द्रों पर करजई को शत-प्रति‍शत वोट मि‍ले हैं।
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सभ्‍य देश का झूठा राष्‍ट्रपति‍

अमेरि‍का के राष्‍ट्रपति‍ बराक ओबामा ने हाल ही में स्‍वास्‍थ्‍य और चि‍कि‍त्‍सा की अमेरि‍का में स्‍थि‍ति‍ को लेकर हाल ही में अपने देश की सीनेट में जब बयान दि‍या तब उस बयान को लेकर सीनेटरों ने ओबामा को झूठा तक करार दे दि‍या। यह मामला थमा ही नहीं था कि‍ भू.पू.राष्‍ट्रपति‍ जि‍मी कार्टर ने आग में घी डालने वाला बयान दे डाला कि‍ ओबामा के खि‍लाफ जो लोग हल्‍ला मचा रहे हैं वे ओबामा के प्रति‍ रंगेभेदीय घृणा व्‍यक्‍त कर रहे हैं। कार्टर साहब के बयान में सच का लेशमात्र भी अंश नहीं है । सच यह है कि‍ राष्‍ट्रपति‍ ओबामा ने सीनेट में असत्‍य कहा था। ओबामा ने अपनी 40 मि‍नट के भाषण की शुरूआत ही इस वाक्‍य से की थी 'एक चि‍न्‍ता की खबर है', ' यह पता चला है कि‍ 65 साल की उम्र के तकरीबन आधे से ज्‍यादा अमरीकी आगामी 10 सालों अपनी स्‍वास्‍थ्‍य सुरक्षा गारंटी खो देंगे।'' और '' एक-ति‍हाई से ज्‍यादा लोगों के पास एक वर्ष से भी ज्‍यादा समय तक कोई स्‍वास्‍थ्‍य सुरक्षा गारंटी नहीं होगी।'' सीनेटरों ने चीखकर ओबामा के बयान का प्रति‍वाद कि‍या और कहा कि‍ राष्‍ट्रपति‍ झूठ बोल रहे हैं। तथ्‍य…

स्‍वर्ग में गरीबी

गरीबी और भुखमरी वि‍श्‍वबैंक और अमरीकी कारपोरेट घरानों का सबसे प्रि‍य वि‍षय है। यह वि‍षय जि‍तना त्रासद है उतना ही उपेक्षा का शि‍कार भी है। वि‍श्‍वबैंक की सन् 2008 में जारी एक रि‍पोर्ट के अनुसार सारी दुनि‍या में सन् 2005 में 350 करोड़ से ज्‍यादा जनसंख्‍या ढाई डालर प्रति‍दि‍न के आधार पर गुजारा कर रही थी। इनमें भी 44 प्रति‍शत लोग मात्र सवा डालर प्रति‍दि‍न के आधार पर ही गुजारा कर रहे थे। अब इतनी बड़ी जनसंख्‍या के पास जब खाने के ही लाले पड़े हैं तो ऐसे में फोन,मोबाइल,घर,दवा,चि‍कि‍त्‍सा आदि‍ की बातें तो स्‍वर्ग की कल्‍पना नजर आती हैं। सारी दुनि‍या में प्रति‍दि‍न भूख से तीस हजार लोग मर जाते हैं। इनमें पांच साल से कम उम्र के 85 प्रति‍शत बच्‍चे कुपोषण ,भूख और इलाज होने लायक बीमारि‍यों के कारण ही मर जाते हैं।गैर जरूरी कारणों से मरने वालों की संख्‍या वि‍गत चालीस सालों में 30लाख का आंकड़ा पार कर गयी है। इन मरने वालों में वे लोग ज्‍यादा हैं जो अभागे स्‍थानों में पैदा हुए हैं।
अभागे और भाग्‍यवानों के बीच में बंटे हुए इस संसार में संपत्‍ति‍ भी बंटी हुई है। डेवि‍ड रूथकॉफ ने 'सुपरक्‍लास' नामक क…

लेखक अब डर गए हैं: चन्‍द्रबली सिंह

हाल ही में कोटा से प्रकाशि‍त पत्रि‍का 'अभि‍व्‍यक्‍ति‍' का नया अंक देखने को मि‍ला। इस अंक में हिंदी के सबसे बडे लेखक और आलोचक चन्‍द्रबली सिंह का एक शानदार साक्षात्‍कार छपा है। चन्‍द्रबली सिंह का व्‍यक्‍ति‍त्‍व और कृतित्‍व हिंदी लेखकों से छि‍पा नहीं है। वे हिंदी के शि‍खरपुरूष स्‍व.रामवि‍लास शर्मा से लेकर जीवि‍त शि‍खर पुरूष नामवर सिंह के ज्ञानगुरू हैं। हिंदी की वैज्ञानि‍क आलोचना के नि‍र्माण में उनका बहुमूल्‍य योगदान रहा है। उनकी‍ मेधा के सामने रामवि‍लास शर्मा से लेकर नामवर सिंह तक सभी नतमस्‍तक होते रहे हैं। चन्‍द्रबली जी हिंदी के ज्ञानगुरू हैं। हिंदी के लेखक जब भी गंभीर संकट में फंसे हैं उनके पास गए हैं और उनके द्वारा दि‍शा नि‍र्देश पाते रहे हैं। चन्‍द्रबली सिंह प्रगतिशील लेखक संघ से लेकर जनवादी लेखक संघ तक सभी में शि‍खर नेतृत्‍व का हि‍स्‍सा रहे हैं। पि‍छले पैंसठ साल से भी ज्‍यादा समय से प्रगति‍शील आलोचना को दि‍शा देते रहे हैं। इन दि‍नों चन्‍द्रबली सिंह अस्‍वस्‍थ हैं और बनारस में अपने घर पर ही बि‍स्‍तर पर पडे आराम कर रहे हैं। 'अभि‍व्‍यक्‍ति‍' के संपादक 'शि‍वराम' न…

साइबरयुग में 'ई' नि‍रक्षरता शर्मिंदगी है

बुद्धि‍जीवी स्‍वभाव से ठलुआ होता है। भारतीय भाषाओं के बुद्धि‍जीवी का ठलुआपन अब और भी परेशानी पैदा कर रहा है। यह पढा लि‍खा अनपढ है। उसने अपनी अपडेटिंग बंद कर दी है। संचार क्रांति‍ के लि‍ए जरूरी है इस ठलुआ बुद्धि‍जीवी की चौतरफा धुनाई। जि‍स तरह शि‍क्षि‍त न होना अपमान की बात मानी जाती थी उसी तरह साइबर शि‍क्षि‍त न होना भी अपमान की बात है। हमारे पि‍छडेपन का संकेत है। साइबर पि‍छडेपन पर वैसे ही हमला बोलना चाहि‍ए जैसे नि‍रक्षरता पर हमला बोलते हैं। नि‍रक्षरता सामाजि‍क वि‍कास की सबसे बडी बाधा थी तो साइबर नि‍रक्षरता महाबाधा है। साइबर बेगानेपन को कि‍सी भी तर्क से वैधता प्रदान करना देशद्रोह है,सामाजि‍क परि‍वर्तन के प्रति‍ बगावत है। इसे कि‍सी भी तर्क से गौरवान्‍वि‍त नहीं कि‍या जाना चाहि‍ए। अखबार और पत्रि‍का का संपादक है वह गर्व से कहता है हम कम्‍प्‍यूटर पर नहीं लि‍खते,हम इंटरनेट पर नहीं लि‍खते। सवाल कि‍या जाना चाहि‍ए क्‍यों नहीं लि‍खते ? कम्‍प्‍यूटर पर नहीं लि‍खना,इंटरनेट पर नहीं पढना और नहीं लि‍खना नि‍रक्षरता है। नि‍रक्षरता पर हमारे बुद्धि‍जीवी को गर्व नहीं करना चाहि‍ए। बल्‍कि‍ उसे शर्म आनी चाहि‍ए।