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August, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

पीएम मोदी के कश्मीर मिशन का लक्ष्य -

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बुरहान वानी की हत्या के बाद इंटरनेट से लेकर न्यूज टीवी चैनलों तक,फेसबुक से लेकर ट्विटर तक आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों और उनके सदस्यों ने कश्मीर के बारे में जिस तरह का प्रचार किया है वह हम सबके लिए चिन्ता की बात है।कश्मीरी जनता को सीधे इस प्रचार अभियान के जरिए निशाना बनाया गया। जबकि सच यह है कश्मीर की जनता आतंकियों के साथ नहीं है।जो लोग बुरहान वानी के अंतिम कृत्य में आई बेशुमार भीड़ को देखकर कह रहे हैं कि वहां की जनता आतंकी है,वे गलत कह रहे हैं।बुरहान वानी की मुर्दनी में लोग दुख के कारण शामिल हुए थे,वे आतंकियों के समर्थन में शामिल नहीं हुए।आज भी कश्मीर में चुनाव होगा तो आतंकी जीत नहीं सकते।
समस्या यह है आतंकियों के हथकंडों को राज्य और केन्द्र सरकार सही ढ़ंग से समझने में असमर्थ रही है।उसने आतंकियों-पृथकतावादियों के प्रति आरंभ से ही नरम रूख अपनाया।पचास दिन कर्फ्यू लगने के बाद पृथकतावादी नेताओं की गिरफ्तारियां आरंभ हुईं ,जबकि यह काम बुरहान वानी की हत्या के पहले ही करना चाहिए था।

सवाल यह है वे कौन लोग हैं जिन्होंने पृथकतावादी नेताओं की गिरफ्तारियां नहीं होने दीं ॽ केन्द्र या र…

घृणा के सौदागर

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मैं इसी साल जब कश्मीर में घूम रहा था,लोगों से मिल रहा था,बातें कर रहा था,तो एक बात साफ नजर आ रही थी कि कश्मीर तेजी से बदल रहा है.इस बदले हुए कश्मीर से कश्मीरी पृथकतावादी और हिन्दू फंडामेंटलिस्ट बेहद परेशान थे।मैं पुराने श्रीनगर इलाके में कई बार गया,वहां विभिन्न किस्म के लोगों से मिला,उनसे लंबी बातचीत की,खासकर युवाओं का बदलता हुआ रूप करीब से देखने के लिए कश्मीर विश्वविद्यालय में भी गया वहां युवाओं की आपसी बातचीत के मसले देखे,उनके चेहरे पर एक खास किस्म का चैन देखा,युवाओं में पैदा हुए लिबरल भावों और उनकी आपसी संगतों में उठने वाले सवालों और विचार-विमर्श के विषयों को सुनकर लगा कि कश्मीर के युवाओं में पृथकतावाद-आतंकवाद या धार्मिक फंडामेंटलिज्म को लेकर एकसिरे से घृणा का भाव है।
कश्मीर विश्वविद्यालय में एक जगह दीवार पर पृथकतावादी नारा भी लिखा देखा,जिसमें लिखा था ´भारत कश्मीर छोड़ो´,मेरी आंखों के सामने एक घटना घटी जिसने मुझे यह समझने में मदद की कि आखिर युवाओं में क्या चल रहा है। हुआ यह कि मैं जब साढ़े तीन बजे करीब हजरतबल मस्जिद से घूमते हुए कश्मीर विश्वविद्यालय पहुंचा तो देखा दो लड़कि…

पूंजीवादी गुलामी है संतई

संतों और धर्म की पूंजीपति को जरूरत क्यों पड़ती है ? इस सवाल का सही उत्तर समाजशास्त्री बेबर ने दिया है।उसने लिखा " पूंजीपति को ऊर्जा पैदा करने के लिए धर्म की जरूरत पड़ती है।"

पूंजीवादी विकास के लिए ऊर्जा का होना बेहद जरूरी है। यही वजह है हमारे देश में धर्म का उन्माद पैदा करने लिए पूंजीपति-व्यापारी बड़े पैमाने पर पैसा खर्च करते हैं।पूंजीपति और संतों का गठजोड़ परंपरावाद और पूंजीवादी उपभोग के वैचारिक -सामाजिक तानेबाने को बनाने में लगा रहता है।

जो उपभोगवादी है वह परंपरावादी भी है,यही वह बुनियादी प्रस्थान बिंदु है जहां से नया उपभोक्तावाद और उपभोक्ता बन रहा है।यह एक खुला सच है उपभोक्तावाद के विकास के साथ धर्म का भी तेजी से विकास हुआ है,वे एक-दूसरे के पूरक के तौर पर भूमिका अदा करते हैं।यह कैसे संभव है कि पूंजीवादी उपभोग तो सही है और धर्म गलत है।असल में धर्म और पूंजीवादी उपभोग एक पैकेज है। पुरानी आर्थिक परंपरा से मुक्ति का अर्थ, धर्म से मुक्ति नहीं है।बल्कि उलटा देखा गया है।पुराने आर्थिक संबंधों से मुक्त होते ही धर्म भी बड़े पैमाने पर फलने-फूलने लगता है।यही वजह है हमारे यहां पूं…

लोकतंत्र में ´भारतीय अवसरवाद´बनाम ´पाक अवसरवाद´का घिनौना खेल

कश्मीर के राजनेताओं में ´भारतीय अवसरवाद´ और ´पाक अवसरवाद´ये दो फिनोमिना पाए जाते हैं। इन दोनों का समय-समय पर सभी स्थानीय दल और बड़े नेता इस्तेमाल करते रहे हैं।कश्मीर के पूर्व राजा से लेकर शेख अब्दुल्ला तक,फारूख अब्दुल्ला से लेकर महबूबा मुफ्ती तक इन दोनों फिनोमिना को वहां की जनता और इतिहास ने देखा है।पूर्व मुख्यमंत्री मोहम्मद मुफ्ती सईद की मृत्यु के बाद महबूबा मुफ्ती को मुखयमंत्री बनाने में भाजपा ने जो देरी की उसका बड़ा कारण था उनके मन में छिपा ´पाक अवसरवाद´,जिसे भाजपा और स्वयं पीएम नरेन्द्र मोदी नापसंद करते थे।

महबूबा को मुख्यमंत्री बनाने के पहले उनसे भारत के प्रति निष्ठा के राजनीतिक वचन लिए गए उसके बाद उनको मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गयी। ये राजनीतिक वचन क्या थे,मीडिया उनके बारे में अनभिज्ञ है।लेकिन भारत के प्रति निष्ठा की शपथ तो लेनी थी ,लेकिन महबूबा मुफ्ती ने मुख्यमंत्री बनने के बाद अपना वास्तविक रंग दिखाना शुरू कर दिया।

सच यह है कि हुर्रियत के विभिन्न संगठनों और विभिन्न नामों से सक्रिय पृथकतावादी संगठनों की गतिविधियों में विगत दो सालों में तेजी आई है । भारत वि…

श्रीश्री और बुरहान वानी के पिता की मुलाकात के मायने ॽ

दिल्ली में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने और पीडीपी-भाजपा सरकार के जम्मू-कश्मीर में सत्तारूढ़ होने के बाद कश्मीर के परिदृश्य में बुनियादी बदलाव आया है।मोदी के सत्तारूढ़ होने के पहले तक केन्द्र और राज्य सरकार का कश्मीर के आतंकवाद-पृथकतावाद को लेकर यह नजरिया था कि पृथकतावादी मांग करने वालों में कुछ कश्मीरी हैं लेकिन आतंकी तो पाक के भेजे लोग ही हैं।लेकिन बुरहान वानी की हत्या के बाद जुलाई से मीडिया में इस तरह की इमेज बनायी गयी कि कश्मीर की जनता में ही आतंकी तत्व छिपे हैं,पहले कश्मीर की जनता और आतंकी के बीच,आतंकी और पृथकतावादी के बीच में केन्द्र अंतर करके चलता था,स्वयं अटलजी की सरकार ने यह अंतर किया था,लेकिन इसबार बुरहान वानी की सैन्यबलों के हाथों हत्या होने के बाद समूचा परिदृश्य बदल चुका है।अब मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती तक कह रही हैं कि पांच प्रतिशत लोग हैं जो अमन-चैन नहीं चाहते।सवाल यह है इस तरह का बयान देकर अप्रत्यक्ष तौर पर केन्द्र और राज्य सरकार ने यह मान लिया है कि ´पत्थरबाज आतंकी´ हैं और ´उनके साथ की जनता है आतंकी´ है,बतर्ज महबूबा कुल मिलाकर ये लोग कश्मीर की जनसंख्या के पांच फ…

कश्मीरी पंडितों से क्यों नहीं मिले राजनाथ सिंह

हाल ही में केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह कश्मीर की दो दिवसीय यात्रा खत्म करके लौटे हैं।इस यात्रा की शुरूआत के साथ ही उन्होंने यह घोषणा की थी उनसे जो भी मिलना चाहे मिल सकता है,वे निजी तौर पर भी कश्मीर के विभिन्न समुदायों,संगठनों,राजनीतिक दलों आदि से मिलने का मन बनाकर श्रीनगर पहुँचे थे।वे किस तरह के लोगों से मिले और उनकी क्या बातें हुईं इसका कोई विवरण अभी तक अखबारों में नहीं आया है।लेकिन जो खबरें अखबारों में आई हैं उनसे साफ पता चलता है कि मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के साथ तनाव बना हुआ है।महबूबा स्वयं राजनाथ सिंह से मिलने गेस्ट हाउस नहीं गयीं अंत में मजबूरन राजनाथ सिंह उनके घर जाकर उनसे मिले,प्रेस कॉंफ्रेंस के दौरान में भी दोनों नेताओं की भाव-भंगिमा तनावपूर्ण थी,महबूबा मुफ्ती तो एस कदर परेशान थीं कि प्रेस काँफ्रेस बीच में ही अचानक खत्म करके उठ खड़ी हुईं,जबकि राजनाथ सिंह बैठे हुए थे।इससे इन दोनों नेताओं के बीच का तनाव सामने आ गया।

गृहमंत्री राजनाथ सिंह की अब तक दो कश्मीर यात्राएं हुई हैं और दोनों असफल रही हैं।यहां तक कि व्यापारिक संगठनों ने दोनों बार उनसे मुलाकात करने से साफ…

टीवी टॉक शो में संघी

पहले यह सोचा गया समाचार टीवी चैनल आएंगे तो समाचारों की बाढ़ आएगी,विभिन्न रंगत के न्यूज चैनलों के जरिए खबरों को व्यापक स्थान मिलेगा, नए किस्म का टीवी विमर्श जन्म लेगा। शुरू के वर्षों में कुछ उम्मीदें बंधी थीं,लेकिन जब से मोदी सरकार सत्ता में आई है टीवी न्यूज चैनलों का समूचा चरित्र गुणात्मक तौर बदल गया है। खबरों की स्वायत्तता ,व्यापार की स्वायत्तता में बदल गयी है। न्यूज चैनलों में इरेशनल,अप्रासंगिक और बंधुआ विचारों ने स्थायी संप्रेषण की जगह बना ली है।इस तरह की खबरें और विचार ज्यादा प्रसारित हो रहे हैं जो अप्रासंगिक है या सामाजिक विभाजन को तेज करने वाले हैं।इनमें आरएसएस के प्रवक्ता या उसकी विचारधारा के पक्षधर की नियमित मौजूदगी को सहज ही देख सकते हैं।

सवाल उठता है आरएसएस के प्रवक्ता को टीवी टॉक शो में क्यों बुलाया जाता है और किन विषयों पर बुलाया जाता है ॽ मोदी सरकार आने के बाद से इस तरह के कार्यक्रमों में आरएसएस के प्रवक्ता ज्यादा नजर आते हैं जो सवाल हिन्दुत्व या हिन्दूधर्म से जुड़े हैं।भारत में हजारों सामाजिक-धार्मिक संगठन हैं,इनमें अनेक प्रतिष्ठित संगठन हैं जिनके लाखों अनुयायी ह…

राष्ट्रवाद के अन्तर्विरोधों में फंसा अशांत कश्मीर

कश्मीर को देखने के लिए राष्ट्रवाद की नहीं लोकतांत्रिक नजरिए की जरूरत है।भाजपा ऊपर से नाम संविधान का ले रही है लेकिन कश्मीर की समस्या को राष्ट्रवादी नजरिए से हल करना चाहती है। राष्ट्रवाद के पास जातीय समस्या का कोई समाधान नहीं है।दिलचस्प बात यह है कि भाजपा-आरएसएस हिन्दू राष्ट्रवाद के पैमाने से समाधान खोज रहे हैं वहीं आतंकी संगठन कश्मीरी राष्ट्रवाद के जरिए समाधान खोज रहे हैं लेकिन ये दोनों ही नजरिए अंततःहिंसा और अशांति की ओर जाते हैं। सारी दुनिया का अनुभव है कि उत्तर –औपनिवेशिक दौर में राष्ट्रवाद आत्मघाती मार्ग है।

कश्मीर की जनता के इस समय दो शत्रु हैं पहला है कश्मीरी राष्ट्रवाद और दूसरा है हिन्दू राष्ट्रवाद।राष्ट्रवाद बुनियादी तौर पर हिंसा और घृणा की विचारधारा है।इसका चाहे जो इस्तेमाल करे उसे अंततःहिंसा की गोद में उसे शरण लेनी पड़ती है। राष्ट्रवाद को उन्मादी नारे और हथियारों के अलावा और कोई चीज नजर नहीं आती।कश्मीर की आजादी के नाम पर जो लोग लड़ रहे हैं वे आजादी के नाम पर कश्मीर को जहन्नुम के हवाले कर देना चाहते हैं।जमीनी हकीकत यह है कि अधिकतर युवाओं को कश्मीरी की आजादी का स…

मनुष्य के दस गुण और आम्बेडकर -

"(1) पन्न, (2) शील, (3) नेक्खम, (4) दान, (5) वीर्य, (6) खांति (शांति) , (7) सच्च, (8) अधित्थान, (9) मेत्त और (10) उपेक्खा।

पन्न या बुद्धि वह प्रकाश है, जो अविद्या, मोह या अज्ञान के अंधकार को हटाता है। पन्न के लिए यह अपेक्षित है कि व्यक्ति अपने से अधिक बुद्धिमान व्यक्ति से पूछकर अपनी सभी शंकाओं का समाधान कर ले, बुद्धिमान लोगों से संबंध रखे और विभिन्न कलाओं और विज्ञान का अर्जन करे, जो उसकी बुद्धि विकसित होने मे सहायक हों। शील नैतिक मनोवृत्ति अर्थात बुरा न करने और अच्छा करने की मनोवृत्ति, गलत काम करने पर लज्जित होना है। दंड के भय से बुरा काम न करना शील है। शील का अर्थ है, गलत काम करने का भय। नेक्खम संसार के सुखों का परित्याग है।


दान का अर्थ अपनी संपत्ति, रक्त तथा अंग का उसके बदले में किसी चीज की आशा किए बिना, दूसरों के हित व भलाई के लिए अपने जीवन तक को भी उत्सर्ग करना है।

वीर्य का अर्थ है, सम्यक प्रयास। आपने जो कार्य करने का निश्चय कर लिया है, उसे पूरी शक्ति से कभी भी पीछे मुड़कर देखे बिना करना है।

खांति (शांति) का अभिप्राय सहिष्णुता है। इसका सार है कि घृणा का मुकाबला घृणा से नहीं करना …

दस मुख्य कठिनाईयां और आम्बेडकर-

"प्रथम बाधा अहम् का मोह है, जब तक व्यक्ति पूर्णतया अपने अहम् में रहता है, प्रत्येक भड़कीली चीज का पीछा करता है, जिनके विषय में वह व्यर्थ ही यह सोचता है कि वे उसके हृदय की अभिलाषा की तृप्ति व संतुष्टि कर देंगी, तब तक उसको आर्य मार्ग नहीं मिलता। जब उसकी आंखें इस तथ्य को देखकर खुलती हैं कि वह इस असीम व अनंत का एक बहुत छोटा सा अंश है, तब वह यह अनुभूति करने लगता है कि उसका व्यक्तिगत अस्तित्व कितना नश्वर है, तभी वह इस संकीर्ण मार्ग में प्रवेश कर सकता है।


दूसरी बाधा संदेह तथा अनिर्णय की स्थिति है। जब मनुष्य अस्तित्व के महान रहस्य, व्यक्तित्व की नश्वरता को देखता है तो उसके अपने कार्य में भी संदेह तथा अनिर्णय की स्थिति की संभावना होती है, अमुक कार्य किया जाए या न किया जाए, फिर भी मेरा व्यक्तित्व अस्थाई नश्वर है, ऐसी कोई चीज प्रश्न क्यों बन जाती है, जो उसे अनिर्णायक, संदेही या निष्क्रिय बना देती है, परंतु वह चीज जीवन मंर काम नहीं आएगी। उसे अपने शिक्षक का अनुसरण करने, सत्य को स्वीकार करने तथा संघर्ष की शुरुआत करने का निश्चय कर लेना चाहिए अन्यथा उसे और आगे कुछ नहीं मिलेगा।

तीसरी बाधा …

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी और फेसबुक

श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर मंदिरों से मूर्ति औरउत्सव की इमेज वर्षा जिस तरह हो रही है, उसने श्रीकृष्ण को डिजिटल कृष्ण बना दिया है। डिजिटल होने का मतलब आभासी है। आभासी कृष्ण अंतत: जो संदेश देता है - जो डिजिटल है वह अनुपस्थित है। इस तरह की इमेज वर्षा अपील करती है ,जनता को एक्टिव करती है, लेकिन कृष्ण को ज़ीरो बनाती है। कृष्ण का ज़ीरो बन जाना भगवान की डिजिटल त्रासदी है।यह पूँजीवाद की परम विजय की अवस्था है।

श्री कृष्ण को गोपियों में जनप्रिय नायक क्यों बनाया गया ? गोपियों का नायक बनाकर सर्जक असल में किसे चुनौती देता है ?

कृष्ण के साथ गोपियों का संसार सामंतकाल में जुड़ता है। श्रीकृष्ण और गोपियों का प्रेम वस्तुत: सामंती बंदिशें और नियमों का निषेध है।

सवाल यह है इतने ताक़तवर आख्यान को रचने के बाद भी ब्रज के इलाक़े में सामंती मूल्य ध्वस्त क्यों नहीं हुए? आज भी जो जय हो जय हो कर रहे हैं वे सामंती मूल्यों के मोह में क्यों बँधे हैं? यह भक्ति का ग़ैर -यथार्थवादी रूप है।



श्रीकृष्ण कल्पना है ,कल्पना को सत्य बनाने में हमारा समाज महान है।फिर श्रीकृष्ण की कल्पना मनोहर,मनोरंजक और ज्ञान से भरी है।संभवतः खृ…

आरएसएस, बुद्धिजीवी और मीडिया का झूठ

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हाल ही में आरएसएस के लेखकों-बुद्धिजीवियों की एक बैठक संपन्न हुई ,जिसमें आरएसएस के नेताओं ने लेखकों-बुद्धिजीवियों को यह आदेश दिया कि वामपंथी लेखकों की तरह ज्यादा से ज्यादा लेखकों को प्रभावित करो,ऐसा साहित्य लिखो जिससे आम जनता हमारे करीब आए और युवा लेखक पैदा हों जो संघ की विचारधारा का प्रचार करें।

संघी नेता जानते हैं कि संघ की विचारधारा में लेखक-बुद्धिजीवी पैदा करने की क्षमता नहीं है।यह मूलतःबांझ विचारधारा है।संघ सत्ता पा सकता है,लेकिन लेखक तैयार नहीं कर सकता।लेखन के लिए स्वतंत्र दिमाग,स्वतंत्र विचार और लेखक के पास जोखिम उठाने की मनोदशा का होना बेहद जरूरी है।संघ के साथ जुड़कर कोई भी लेखक स्वाभाविक स्वतंत्र लेखन नहीं कर सकता।संघ में रहकर स्वतंत्र चिंतन-मनन,सवाल खड़े करना और रोज नए वैचारिक संघर्षों में शामिल होना संभव नहीं है।

हिन्दुत्व बंद प्रकृति की विचारधारा है,यह स्वतंत्रता के निषेध पर आधारित है।स्वतंत्रता के बिना बेहतरीन लेखन संभव नहीं है।अनेक वाम संगठनों में भी यह समस्या है कि वे लेखक के स्वतंत्र चिंतन से परेशान होते हैं,वे स चिंतन से जरूर परेशान होते हैं जो उनकी …

कार्ल मार्क्स पखवाड़ा - अंधविश्वास और मार्क्सवाद

अंधविश्वास सामाजिक कैंसर है। अंधविश्वास ने सत्ता और संपत्ति के हितों को सामाजिक स्वीकृति दिलाने में अग्रणी भूमिका अदा की है। आधुनिक विमर्श का माहौल बनाने के लिए अंधविश्वासों के खिलाफ जागरूकता बेहद जरूरी है। आमतौर पर साधारण जनता के जीवन में अंधविश्वास घुले-मिले होते हैं।

अंधविश्वासों को संस्कार और एटीटयूट्स का रूप देने में सत्ता और सत्ताधारी वर्गों को सैकड़ों वर्ष लगे हैं। अंधविश्वासों की शुरुआत कब से हुई इसका आरंभ वर्ष तय करना मुश्किल है। फिर भी ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हैं कि सामाजिक विकास के क्रम में जब राजसत्ता का निर्माण कार्य शुरू हुआ था उस समय साधारण लोग किसी से डरते नहीं थे। किसी भी किस्म का अनुशासन मानने के लिए तैयार नहीं थे, राजा की सत्ता को स्वीकार नहीं करते थे। सत्ता के दंड का भय नहीं था। यही वह ऐतिहासिक संदर्भ है जब अंधविश्वासों की सृष्टि की गई।

आरंभिक दौर में अंधविश्वासों को संस्कार और जीवन मूल्य से स्वतंत्र रूप में रखकर देखा जाता था। कालांतर में अंधविश्वासों ने सामाजिक जीवन में अपनी जड़ें इस कदर मजबूत कर लीं कि अंधविश्वासों को हम सच मानने लगे।

अंधविश्वास का दाय…

कार्ल मार्क्स पखवाडा- धर्म धर्मनिरपेक्षता लोकतंत्र

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बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर का प्रसिद्ध निबंध है ´बुद्ध और कार्ल मार्क्स´,इसमें आम्बेडकर ने बुद्ध के विचारों के बहाने धर्म की 25 सूत्रों में व्याख्या पेश की है। ये सूत्र अब तक विचार विमर्श के केन्द्र में नहीं आए हैं,इन सूत्रों पर वाद-विवाद-संवाद होना चाहिए।

ये 25 सूत्र हैं-´´1. मुक्त समाज के लिए धर्म आवश्यक है।2. प्रत्येक धर्म अंगीकार करने योग्य नहीं होता।3. धर्म का संबंध जीवन के तथ्यों व वास्तविकताओं से होना चाहिए, ईश्वर या परमात्मा या स्वर्ग या पृथ्वी के संबंध में सिद्धांतों तथा अनुमान मात्र निराधार कल्पना से नहीं होना चाहिए।4. ईश्वर को धर्म का केंद्र बनाना अनुचित है।5. आत्मा की मुक्ति या मोक्ष को धर्म का केंद्र बनाना अनुचित है।6. पशुबलि को धर्म का केंद्र बनाना अनुचित है।7. वास्तविक धर्म का वास मनुष्य के हृदय में होता है, शास्त्रों में नहीं।8. धर्म के केंद्र मनुष्य तथा नैतिकता होने चाहिए। यदि नहीं, तो धर्म एक क्रूर अंधविश्वास है।9. नैतिकता के लिए जीवन का आदर्श होना ही पर्याप्त नहीं है। चूंकि ईश्वर नहीं है, अतः इसे जीवन का नियम या कानून होना चाहिए।10. धर्म का कार्य विश्व …

कार्ल मार्क्स पखवाडा- नव्य उदार यथार्थ और मार्क्सवादी असफलताएं

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मार्क्सवादी आलोचक फ्रेडरिक जेम्सन ने मौजूदा दौर के संदर्भ में मार्क्सवाद की पांच थीसिस प्रतिपादित की हैं। इनमें दूसरी थीसिस में उन्होंने उन खतरों की ओर ध्यान खींचा है जो मार्क्सवाद के लिए आ सकते हैं या आए हैं और जिनसे मार्क्सवादी आंदोलन को धक्का लगा है। उत्तर आधुनिक परिस्थितियों के आने के साथ मार्क्सवादी चिंतन को नव्य उदार आर्थिक नीतियों और उसके गर्भ से पैदा हुए बाजार ने सबसे बड़ा खतरा पैदा किया है।नव्य उदारतावाद के खिलाफ विचारधारात्मक संघर्ष में मार्क्सवादी आम लोगों का दिल जीतने ,उन्हें इसके परिणामों के बारे में समझाने में असमर्थ रहे। इस समस्या के दो स्तर थे, पहला स्तर स्वयं मार्क्सवादियों के लिए था वे खुद समझ ही नहीं पाए कि नव्य उदार आर्थिक नीतियों का क्या परिणाम निकलेगा। उनका इन नीतियों के प्रति तदर्थ रवैय्या था। जब वे स्वयं दुविधाग्रस्त थे तो वे अन्य को कैसे समझाते ? इससे संकट और भी गहरा हो गया।
दूसरी समस्या यह आयी कि नव्य उदार परिवर्तनों के गर्भ से जो परिवर्तन पैदा हुए उनसे मार्क्सवादी लाभ नहीं उठा पाए। वे उस यथार्थ को पकड़ ही नहीं पाए जो नव्य उदार आर्थिक नीतियों के गर्भ से जन्मा…

कार्ल मार्क्स पखवाडा- सूचना समाज की नयी भाषा को पहचानो

सोवियत संघ के पराभव के बाद सारी दुनिया में मार्क्सवादी चिंतकों को करारे वैचारिक सदमे और अनिश्चितता से गुजरना पड़ा है। सूचना समाज किस तरह वैचारिक विपर्यय पैदा कर सकता है इसके बारे में कभी विचार ही नहीं किया गया। अधिकांश समाजवादी विचारक इसे सामान्य और एक रूटिन परिवर्तन मानकर चल रहे थे। वे यह भी देखने में असमर्थ रहे कि परवर्ती पूंजीवादी मॉडल को लागू किए जाने के बाद मार्क्सवाद का भी रूप बदलेगा। पुराने किस्म का मार्क्सवाद चलने वाला नहीं है। लेकिन अनेक विचारकों के यह बात गले नहीं उतर रही है। एक तरफ मीडिया में समाजवाद विरोधी उन्माद और दूसरी ओर सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ की धड़कनों का हाथ में न आना, यही वह बिडम्वना थी जिसने मार्क्सवादियों को हतप्रभ अवस्था में पहुँचा दिया। सूचना समाज में मार्क्सवाद की प्रकृति और भूमिका एकदम बदल गयी है। राजनीतिक प्रतिवाद की शक्ल बदल गयी है। लोगों को जोड़ने और उनसे संवाद करने और संपर्क करने के तरीके बदल गए। सूचना समाज आने के पहले राजनीतिक मुहावरे,पदबंध आदि संचार के हथकंड़े के रूप में इस्तेमाल किए जाते थे। सूचना समाज के जन्म के साथ ही राजनीतिक पदबंधों और म…

मुस्लिम विद्वेष के खतरे-

मुस्लिम विद्वेष देश के लिए सबसे बड़ी चुनौती है,हमारे देश में मुस्लिम विद्वेष हिन्दुत्ववादियों में रहा है तो मुसलमानों के हितों के पक्षधर मुसलिम लीग-पीडीपी टाइप दलों में भी है।यह विलक्षण संयोग है कि भाजपा-पीडीपी दोनों जम्मू-कश्मीर में संयुक्त सरकार चला रहे हैं,क्योंकि दोनों की विचारधारा है मुस्लिम विद्वेष।भाजपा अपने कारणों से मुसलिम विरोधी आचरण कर रही है, पीडीपी अपने पृथकतावादी-आतंकी प्रेम के कारण मुस्लिम विद्वेष का प्रदर्शन कर रही है।इस मुस्लिम विद्वेष के कारण ही लंबे समय से कश्मीर का मुसलिम समाज तबाह पड़ा हुआ है।
देश के अन्य इलाकों में विभिन्न बहाने बनाकर मुसलमानों पर ही हमले हो रहे हैं और इन हमलों के आयोजक और हमलावर हिन्दुत्व ब्रिगेड है।भारत को एक रखना है तो मुसलिम विद्वेष को खत्म करना जरूरी है।मुसलमानों के प्रति विद्वेष जहां एक ओर हिन्दुत्ववादी नेताओं के जरिए आ रहा है वहीं पर मुसलिम फंडामेंटलिस्ट भी यही काम कर रहे हैं।वे मुसलिमप्रेम की आड़ में मुसलमानों के लोकतांत्रिक हकों पर हमले कर रहे हैं।
देश में अमन-चैन कायम करने लिए मुसलिम विद्वेष को आम जनता के मन में से निकालने की जरूरत है…

कलकत्ते के वे दिन

मैं 1989 में जब कलकत्ता आया तो आने के कुछ ही दिन बाद रोज ´स्वाधीनता´अखबार के दफ्तर जाता था वहां अयोध्या सिंह,महादेव साहा,इजरायल, अरूण माहेश्वरी,सरला माहेश्वरी के साथ घंटों बैठना होता। तरह –तरह की बातें होतीं।हमलोगों का रोज शाम को चार बजे लेकर 8बजे तक का समय बहुत ही मस्ती और आनंद में कटता, इस दौरान देश-दुनिया की तमाम खबरों के साथ –साथ कम्युनिस्ट आंदोलन की समस्याओं,कम्युनिस्ट नेताओं के आचरण और उनमें आ रहे परिवर्तनों पर भी लंबी बातचीत होती थी।लंबे समय तक यही मेरी दिनचर्या थी , मैं कलकत्ता विश्वविद्यालय से कक्षाएं करके ´स्वाधीनता´चला आता,वहां 3-4घंटे रहता और अंत में लौटते समय अरूण माहेश्वरी अपनी गाड़ी से उलटा डांगा छोड़ देते और वहां से बस लेकर मैं अपने घर चला आता,अरूण जब ´स्वाधीनता´नहीं आता तब मैं जोडागिरजा से बस लेकर अकेले घर लौटता।इसी क्रम में धीरे –धीरे ´स्वाधीनता´ अखबार में कई साल मैंने जमकर लिखा। क्या लिखा और किस तरह की समस्याओं का सामना किया इस पर बाद में फिर कभी लिखूँगा। महादेव साहा चलते-फिरते इनसाइक्लोपीडिया थे। वहीं दूसरी ओर अयोध्या सिंह की इतिहास और कम्युनिस्ट आंदोलन को ल…

15अगस्त की आत्मा है लोकतंत्र -

आज 15अगस्त है और इसे हम स्वाधीनता दिवस के रूप में मनाते हैं।यह स्वाधीनता बहुत बड़ी कुर्बानियां देकर मिली है,इतिहास के तमाम दुर्गम पहाडों से गुजरकर मिली है,अनेक बुरे फैसले लेने के बाद मिली है।

अधिकांश नेता भारत-विभाजन से दुखी थे,लेकिन वह मजबूरी थी,देश विभाजन न होता तो देश नष्ट होता , आजादी न मिलती।यह भी सच है देश विभाजन की बहुत बड़ी कीमत अदा की है जनता ने।देश की जनता देश विभाजन के पक्ष में नहीं थी,मुस्लिम लीग और कांग्रेस के बीच उस समय जो स्थिति थी उसमें देश विभाजन से बेहतर फैसला संभव ही नहीं था,इससे भारत को बड़ी क्षति को बचाने में मदद मिली,इसका अर्थ यह नहीं है कि देश विभाजन से भारत की कोई क्षति नहीं हुई,देश विभाजन से भारत को बहुत बड़ी क्षति उठानी पड़ी।विभाजन की पीड़ा को हम आज भी झेल रहे हैं।लेकिन समग्रता में देखें तो विभाजन और सम्पूर्ण देश विनाश में से विभाजन को चुनकर कांग्रेस के तत्कालीन नेतृत्व ने सही फैसला लिय़ा था।

संप्रभु राष्ट्र के रूप में भारत का जन्म हमारे देश की सबसे बड़ी उपलब्धि है।इसके कारण हम लोकतंत्र ,स्वाधीनता और समानता के सपनों के लिए संघर्ष का बुनियादी आधार बनाने …

विभाजन की पीड़ा और कोलकाता

कोलकाता कुछ मामले में असामान्य शहर है।इस शहर ने जितनी राजनीतिक उथल-पुथल झेली है वैसी अन्य किसी शहर ने नहीं झेली।यह अकेला शहर है जिसने दो बार भारत विभाजन की पीड़ा को महसूस किया है।यह असामान्य पीड़ा थी।मैं अभी तक समझ नहीं पाया हूं कि बंगाली समाज के मनोविज्ञान पर इन दोनों विभाजन की घटनाओं के किस तरह के असर रहे हैं।मैं स शहर के विभिन्न इलाकों में कईबार घूमा हूँ,अनेक रंगत के लोगों से मिला हूँ,लेकिन कहीं पर भी हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य की अनुभूति नहीं हुई ।दिलचस्प बात यह है पहले भारत विभाजन के समय कई साल आंदोलन चला । यह बंग-भंग के नाम से चला आंदोलन था।यह पहला सबसे बड़ा आंदोलन था जिसने राष्ट्रवाद की परिकल्पना को सड़कों पर साकार होते देखा।इस दौर के राष्ट्रवाद के हीरो थे सुरेन्द्र नाथ बनर्जी। सांस्कृतिक भिन्नता के बावजूद हम सब एक हैं का नारा,इसकी धुरी था। इस आंदोलन ने संस्कृति के भेदों और अंतरों को बीच में आने ही नहीं दिया।उल्लेखनीय है उस समय बंगाल समूचा राष्ट्रवादी नेतृत्व उच्च जाति के हिन्दुओं के हाथ में था,लेकिन हम सब एक हैं,का नारा प्रमुख रहा।राष्ट्रवाद के साथ धर्म को किसी ने नहीं जोड़…

धर्मनिरपेक्षता के बिना संघ-

मोदीजी जब भाषण देते हैं तो उनके बोलने का ढ़ंग कुछ ऐसा होता है कि उनकी बात न मंजूर हो और न नामंजूर हो।उन्हें केवल छोड़ दिया जाय। हाल ही में कश्मीर पर वे कुछ इसी भाव से बोले हैं।यह क्रियाहीन भाषण का आदर्श नमूना है।भाषण उनके कार्य का वाहक नहीं है,लेकिन कार्य के ढोंग से उन्हें भाषण का बहाना मिल जाता है।

अरस्तू ने कहा था नाटक का निर्णायक नियम क्रिया है।राजनीतिक भाषण-कला का भी यही नियम है।मोदी के भाषण का हम 15अगस्त को इंतजार कर रहे हैं,जरा उनके पहले वाले इसी दिन दिए गए भाषण देख लें।ये सभी भाषण विलक्षण क्रियाहीनता,तटस्थता और झूठ के सहमेल से तैयार किए गए हैं।ये भाषण न तो देश के उपयुक्त हैं,न काल के और न ही अवसर के। मोदी अपने भाषण में शब्दों को पीस-पीसकर बोलते हैं।यह संवेदनाहीन भाषा है।
          मेरी सहानुभूति आरएसएस के उन कार्यकर्ताओं के साथ है जो तिरंगा यात्रा के लिए कमर कसकर निकल चुके हैं ! हे भगवान इनकी रक्षा करना ! तिरंगा उठाने की जब जरूरत थी तब यह संगठन तिरंगा झुकाने वालों,तिरंगा का अपमान करने वालों की चिलम भरता रहा,लेकिन इधर अचानक इसके अंदर तिरंगा "प्रेम " उमड़ पड़ा है !…