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गुरुवार, 11 अगस्त 2011

माओवाद-ममता -महाश्वेता की दोगली राजनीति


    माओवाद और कारपोरेट मीडिया का रोमैंटिक संबंध है। भारतीय बुर्जुआजी और माओवाद में सतह पर वर्गयुद्ध दिखाई देता है लेकिन व्यवहार में माओवादी संगठन और उनकी विचारधारा बुर्जुआजी की सेवा करते हैं। जो लोग यह सोचते हैं कि माओवादी क्रांतिकारी हैं और क्रांति के बिना नहीं रह सकते , वेमुगालते में हैं। माओवादियों का क्रांति, समाजसुधार और सामाजिक परिवर्तन जैसे कामों से कोई संबंध नहीं है।
    इन दिनों कारपोरेट मीडिया के लिए माओवादी खबर नहीं हैं। माओवादी कहां चले गए ? वे इन दिनों क्या कर रहे हैं ? उनकी गतिविधियों के बारे में विगत विधानसभा चुनावों के पहले खासकर पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले इतना फोकस क्यों था ? ममता बनर्जी के मुख्यमंत्री बनने के बाद अचानक माओवाद प्रभावित लालगढ़ की खबरें आनी बंद क्यों हो गयीं? क्या पश्चिम बंगाल के माओवाद प्रभावित इलाकों में अमन-चैन लौट आया है ? ये कुछ सवाल हैं जिन पर गंभीरता के साथ विचार करने की जरूरत है।
        ममता सरकार आने के बाद माओवादियों ने लालगढ़ इलाके में अपना वर्चस्व पुनःस्थापित कर लिया है।  लालगढ़ इलाके में माओवादियों के खिलाफ सशस्त्रबलों का ऑपरेशन मूलतः ठंडा कर दिया गया है। ममता सरकार ने 100 के करीब राजनीतिक बंदियों को रिहा किया है उसमें कई माओवादी नेता भी हैं। 13 जुलाई को लालगढ़ इलाके में ममता बनर्जी ने मुख्यमंत्री बनने के बाद सभा की है और अनेक लोकलुभावन योजनाओं की घोषणा की है। लेकिन इन योजनाओं के कार्यान्वयन के लिए जमीनी स्तर पर कोई काम राज्य सरकार ने आरंभ नहीं किया है।
  दूसरी ओर नए सिरे माओवादियों के संरक्षण में चलने वाली 'पुलिस संत्रास विरोधी कमेटी' ने लालगढ़ और आसपास के इलाकों में अपना दखल कायम कर लिया है। सभी दलों के काम करने पर अघोषित पाबंदी है। यहां तक तृणमूल काग्रेस का विधायक अपने इलाके में घुस नहीं सकता। माकपा के सैंकड़ों लोग इलाका छोड़ने के लिए मजबूर हुए हैं। लालगढ़ के 12 पुलिसथानों के तहत आने वाले इलाकों और पड़ोसी राज्यों से लगने वाले कोरीडोर पर माओवादियों ने फिर से कब्जा जमा लिया है।
मुख्यमंत्री बनने के बाद ममता बनर्जी ने 13जुलाई 2011 को लालगढ़ में जो रैली की थी उसमें उसने एक गलत मिसाल कायम की। 3नवम्बर 2008 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के जिंदल के कारखाने के उद्घाटन के बाद लौटते समय माओवादियों ने जो लैण्डमाइन धमाका किया था उसके बाद पुलिस ने अपराधियों की धरपकड़ के लिए जो छापे मारे थे उनमें पुलिस से कुछ ज्यादतियां भी हुई थीं  । ममता बनर्जी ने अपनी रैली में उस पुलिस छापे में परेशान किए गए लोगों के लिए आर्थिक सहायता राशि की घोषणा की। सवाल यह है कि मुख्यमंत्री और केन्द्रीय मंत्री के कार काफिले पर लैण्डमाइन से हमला करने वालों की पुलिस छानबीन करेगी या नहीं ? छानबीन के दौरान जिन लोगों से कसकर पूछताछ की गई है या पुलिस ने परेशान किया है तो क्या उसके लिए राज्य सरकार कम्पसेशन देगी ? क्या मुख्यमंत्री के काफिले पर किया गया हमला माओवादी साजिश नहीं थी ? क्या माओवादियों ने लैण्डमाइन विस्फोट के लिए माफी मांगी ? मुख्यमंत्री के काफिले पर लैण्डमाइन बिछाकर किया गया हमला एक निंदनीय अपराध है और उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
   मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उस मीटिंग में एक और महत्वपूर्ण बात कही कि लालगढ़ के लोगों को पुलिस से डरने की जरूरत नहीं है। पुलिस तो उनकी मदद के लिए है। ममता का कम्पशेसन पैकेज और यह घोषणा अपने आपमें माओवादियों के खिलाफ पुलिस और अन्य प्रशासनिक ईकाइयों को संदेश है कि माओवादियों के खिलाफ ऑपरेशन ठंडा करो।
  उल्लेखनीय है जिंदल ग्रुप ने लालगढ़ के सालबनी इलाके में इस्पात का कारखाना लगाने के लिए राज्य वाम मोर्चा सरकार से पांच हजार एकड़ जमीन ली थी। इसमें ज्यादातर बंजर जमीन है। माओवादियों ने इसका विरोध किया था और एक जमाने में ममता बनर्जी ने उनके आंदोलन का समर्थन भी किया था। जिंदल ग्रुप को आदिवासियों की  जमीन दिए जाने पर पश्चिम बंगाल के तमाम रेडीकल कहलाने वाले बुद्धिजीवियों महाश्वेता देवी आदि को भी गंभीर आपत्ति थी। लालगढ़ की समूची समस्या इस प्रकल्प को जमीन दिए जाने के बाद आरंभ हुई और ममता ने विपक्ष में रहते हुए इसे बढ़ावा दिया जिसके कारण अंततः केन्द्र सरकार की मदद से लालगढ़ में राज्य सरकार को 25 हजार से ज्यादा सशस्त्रबल लगाने पड़े।
    मजेदार बात यह है कि ममता बनर्जी सरकार बनने के साथ ही जिंदल के कारखाने के खिलाफ माओवादियों और रेडीकल लेखकों का आंदोलन गायब हो गया है । उलटे ममता सरकार में उद्योगमंत्री पार्थ चटर्जी ने जिंदल ग्रुप के लोगों को बुलाकर बात की है और यह इच्छा व्यक्त की है कि जल्दी ही इस कारखाने के अधूरे कामों को पूरा किया जाए। सवाल यह है  सालबनी इस्पात कारखाने को लेकर ममता सरकार का आज जो नरम रूख है वह विपक्ष में रहते हुए क्यों नहीं था ?
    आज माओवादी चुप हैं ,उनकी चुप्पी संकेत है कि वे चाहते हैं कि कारखाना लगे। इसका अर्थ यह भी है कि वाममोर्चा सरकार का जिंदल के इस्पात कारखाने को लेकर लिया गया फैसला सही था। उस कारखाने को लेकर ममता बनर्जी ,माओवादियों और महाश्वेता देवी लेखकों की आपत्तियां पूर्वाग्रह से प्रेरित थीं। पहले जो अशांति और आतंक के वातावरण की सृष्टि की गई थी वो भी गलत था ।
   सालबनी के जिंदल इस्पात कारखाने को लेकर महश्वेता देवी और अन्य रेडीकल लेखकों का दोगला चरित्र भी सामने आ गया है। वे पहले लालगढ़ में आम लोगों को जिंदल ग्रुप के बारे में भड़का रहे थे,जो बुनियादी रूप से गलत था। अब ये ही लेखक-बुद्धिजीवी ममता सरकार के प्रत्येक कदम का समर्थन कर रहे हैं। चूंकि ममता सरकार जिंदल कारखाने के पक्ष में है तो महाश्वेता देवी और माओवादी भी इसके पक्ष में हैं। सवाल यह है ये ही लोग बुद्धदेव सरकार और वाममोर्चे का लालगढ़-सालबनी में फिर किस बात के लिए विरोध कर रहे थे ?

































सोमवार, 10 जनवरी 2011

स्वजनहाराओं का क्रंदन और गूंगा मुख्यमंत्री

    लालगढ़ में स्वजनहाराओं का क्रंदन और बर्बरता चरम पर पहुँच गए हैं। राज्य में स्वजनहाराओं की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। लगता है इसबार का चुनाव स्वजनहाराओं के क्रंदन के प्रतिवाद में लड़ा जाएगा। खबरों के अनुसार लालगढ़ में 7 मार्च को बड़े पैमाने पर हिंसा हुई है। इसमें अब तक 7 लोग मारे गए हैं और 18 घायल हुए हैं। यह सर्वहारा संरक्षकों की पराजय का संकेत है। लज्जा की बात है कि मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य को लालगढ़ की 7 मार्च की हिंसा ने उद्वेलित नहीं किया है। वे 24 घंटे बाद बोले ‘ निंदा’ करता हूँ। उनकी ‘निंदा’ में वह जोर और आक्रोश नहीं था जो एक मुख्यमत्री की भाषा में होना चाहिए। लगता है उन्हें हिंसा में मारे गए लोगों की खबरें बेचैन नहीं करतीं ? यदि बैचैनी होती और स्वजनहाराओं की पीड़ा का उन्हें एहसास होता तो वे खबर सुनकर दौड़कर लालगढ़ क्यों नहीं गए ? लालगढ़ की हिंसा की खबर सुनकर ममता जा सकती है, कांग्रेस के नेता जा सकते हैं,मुख्यमंत्री क्यों नहीं गए ? मुख्यमंत्री घायलों से मिलने कोलकाता में अस्पताल भी नहीं गए ? मुख्यमंत्री अच्छी तरह जानते हैं जिन पर गोली चलाई गई और जो मारे गए हैं वे माकपा के हमदर्द हैं जबकि मारने वाले माकपा के हथियारबंद कॉमरेड हैं। कम से कम माकपा के स्वजनों के नाते तो मुख्यमंत्री को कठोर भाषा बोलना चाहिए। माकपा को यह सोचना चाहिए कि यह कैसी पार्टी तैयार हुई है जो अपने ही कॉमरेडों और हमदर्दों को गोलियों से भून रही है। यह कैसा माओवाद के खिलाफ राजनीतिक प्रतिवाद है जिसमें गांव वालों को प्रति परिवार एक बच्चा हथियारबंद प्रशिक्षण के लिए देने के लिए कहा जा रहा है। क्या यह वही माकपा है जो एक जमाने में हथियारबंद जंग का रास्ता छोड़ चुकी थी। लालगढ़ में 7 मार्च को हुआ हत्याकांड भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन की महान त्रासद और अपमानजनक घटना है। माकपा को जान लेना चाहिए सशस्त्र जंग का मार्ग उन्हें संसद की गलियों से निकालकर जंगली बीहड़ों में ले जाएगा। माकपा को पहल करके उन अपराधियों को पुलिस को सौंपना चाहिए जो इस हत्याकांड में शामिल हैं। साथ ही उन्हें पार्टी से भी निकाला जाना चाहिए। माकपा ने अपनी इमेज रक्षा के लिए पीसीपीए के एक नेता दिलीप हांसदा का बयान माकपा नियंत्रित चैनलों '24 घंटा ’और ‘आकाश' पर शनिवार को दिखाया जिसमें पीसीपीए ने 7 मार्च की हिंसा की जिम्मेदारी ली है। यह नकली बयान है। 
    मुख्यमंत्री जानते हैं इस तरह की हिंसा होने पर पीडितों को आर्थिक और मेडीकल मदद देना राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है। उल्लेखनीय है नंदीग्राम की घटना के बाद राज्य सरकार को राष्ट्रीय मानवाधिकार कमीशन ने पीडितों को सहायता राशि देने का आदेश दिया था। लालगढ़ की ताजा घटना के प्रसंग में भी यही किया जाना चाहिए।
   सवाल उठता है मुख्यमंत्री इतने हृदयहीन कैसे हो गए ? हिंसा की वे दो टूक ढ़ंग से निंदा क्यों नहीं कर पाते ? असल में,मन में विभाजन रखकर ,विचारधाराओं में बांटकर , तेरे-मेरे में बांटकर वाममोर्चे ने पश्चिम बंगाल में जो राजनीति की है उसका दुष्परिणाम है कि मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य हिंसा में मारे गए लोगों के प्रति समानभाव से अपनी सामान्य भाषा में निंदा का भावबोध भी खो चुके हैं।
   असल में मुख्यमंत्री की हृदयहीनता का स्रोत है ‘इलाकादखल’ की राजनीति। ‘इलाका दखल’ की राजनीति का मार्क्सवाद से कोई संबंध नहीं है,लोकतंत्र से कोई संबंध नहीं है, यह विशुद्ध रूप से फासिस्ट राजनीति है। लालगढ़ के जितने भी एपीसोड अभी तक टीवी पर आए हैं वे एक ही संदेश देते हैं कि लालगढ़ में इलाका दखल का पागलपन थमा नहीं है। इसके आतंक ने लालगढ़ की समूची जनता को घेर लिया है। माओवादी बर्बरता से बचाने के नाम पर जनता माकपा की बर्बरता में घिर चुकी है। लालगढ़ के समूचे मसले का संबंध न तो जमीन से है और न सुरक्षा से है और न औद्योगिकीकरण से है बल्कि इसका संबंध इलाकादखल से है। यह स्वजनों के खिलाफ अपराधियों की खुली जंग है। यह माकपा के अंदर पैदा हुए कुलीन अहंकारी मार्क्सवाद की पराजय और बर्बरता की अभिव्यक्ति हैं। माकपा के कुलीन अहंकारी जानते हैं कि मार्क्सवाद शॉर्टकट नहीं है। इसे बयानों ,आदेशों,जनतांत्रिक संरचनाओं और आम जनता के दिल को तोड़कर लागू नहीं किया जा सकता। मार्क्सवाद दखल करने का शास्त्र नहीं है। यह दिल जीतने और सामाजिक परिवर्तन का विज्ञान है। माकपा वाले जितना दखल करेंगे उतने बर्बर बनेंगे। अमानवीय बनेंगे। दखलतंत्र का लोकतंत्र ,मार्क्सवाद,उदारतावाद से कोई संबंध नहीं है। दखल करना बर्बरता है। इसे चाहे जो भी करे। 
शक्ति प्रदर्शन और जनतंत्र के नाम पर ''इलाका दखल'' का रास्ता अहर्निश वाचिक-कायिक हिंसा का रास्ता है। ''इलाका दखल'' के लिए हिंसाचार और दादागिरी जरूरी है। इसके विरोधी और समर्थक दोनों एक ही साथ नायक -खलनायक हैं।
     ‘इलाका दखल’ असल में भय की राजनीति है। भय की राजनीति जनतांत्रिक नहीं होती। भय में स्वाधीनताबोध संभव नहीं है। भय को समर्पण और पलायन की जरूरत होती है। भय में रहना चाहते हैं तो समर्पण कीजिए और भय से मुक्त रहना चाहते हैं तो पलायन कीजिए अथवा भय का सामना कीजिए, अपने को गोलबंद कीजिए। लालगढ़ में आज जो एकता सतह पर दिखाई दे रही है वह भयजनित एकता है। भयजनित एकता टिकाऊ नहीं होती। गरीबों के बीच में राजनीति करने के लिए सिर्फ हंगामे से काम चलने वाला नहीं है। गरीब आरंभ में यदि हंगामे को पहचान नहीं पाया है तो इसका यह निष्कर्ष नहीं निकालना चहिए कि वह आगे भी नहीं पहचानेगा। गरीब को अपने दोस्त और दुश्मन की मध्यवर्गीय नेताओं से ज्यादा गहरी पहचान होती है। 

बुधवार, 29 दिसंबर 2010

गृहमंत्री पी. चिदम्बरम् का माओवादी प्रेम

          पश्चिम बंगाल में केन्द्रीय गृहमंत्री पी.चिदम्बरम का असली खेल सामने आ गया है। खासकर माओवादियों के संदर्भ में हम पहले भी कईबार लिख चुके हैं कि कांग्रेस का माओवादियों के प्रति याराना है। इसबार कुछ बात ही अलग है। असल में माओवादी हिंसाचार और आतंक देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। लेकिन कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृत्व चुनावी गणित को ध्यान में रखकर माओवाद से लड़ना चाहता है। जैसा कि सभी जानते हैं कि पश्चिम बंगाल के लालगढ़ इलाके में केन्द्र और राज्य के सशस्त्रबलों का संयुक्त अभियान चल रहा है और उसमें अब तक काफी हद तक सफलता भी मिली है। अनेक नामी-गिरामी माओवादी नेता और हिंसाचार में शामिल अपराधियों को सशस्त्रबलों ने पकड़ा भी है। माओवादियों के जितने बड़े नेता पश्चिम बंगाल में पकड़े गए हैं उतने बड़े नेता अन्यत्र किसी राज्य में गिरफ्तार नहीं हुए हैं। लालगढ़ इलाके में अभी भी सैंकड़ों शरणार्थी अपने घरों से दूर पनाह लिए कष्ट में दिन काट रहे हैं। 30 हजार से ज्यादा सशस्त्रबलों के संयुक्त अभियान के बाबजूद माकपा के सदस्यों और हमदर्दों को उनके घर वापस नहीं पहुँचा पाए हैं। इन शरणार्थी शिविरों के रखरखाब,देखभाल और समस्त खर्चे को माकपा की स्थानीय इकाईयां उठा रही हैं। माओवाद के खिलाफ लालगढ़ में जो आपरेशन चल रहा है उसके बारे में दो सप्ताह पहले तक केन्द्र और राज्य सरकार के बीच में कोई मतभेद नहीं था।
      दूसरी ओर ममता बनर्जी और उनके दल तृणमूल कांग्रेस का माओवादियों के साथ खुला गठबंधन है और वे चाहते हैं कि लालगढ़ इलाके से सशस्त्रबलों को हटा लिया जाए। इसके लिए वे लगातार प्रदर्शन,धरना,रैली आदि कर रही हैं। लेकिन 21 दिसम्बर 2010 को एक नया मोड़ आया है । केन्द्रीय गृहमंत्री पी.चिदम्बरम ने राज्य के मुख्यमंत्री को एकपत्र लिखकर कहा है कि लालगढ़ इलाके से ‘हरमदवाहिनी’ के लोगों को हथियार समर्पण के लिए राज्य सरकार प्रयास करे। इस प्रसंग में सबसे पहली बात यह कि पश्चिम बंगाल में ‘हरमदवाहिनी’ नामक कोई संगठन नहीं है। माओवादी और तृणमूल कांग्रेस के लोग भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) को कलंकित करने और उसका नाम विकृत करने के लिए ‘हरमदवाहिनी’ पदबंध का प्रयोग कर रहे हैं। ‘हरमद’ यानी ‘गुंडा’वाहिनी। आश्चर्य की बात यह है कि गृहमंत्री ने ‘हरमदवाहिनी’ पदबंध का अपने पत्र में इस्तेमाल किया है। सवाल उठता है क्या गृहमंत्री का किसी राष्ट्रीय राजनीतिक दल को उसके असली नाम से पुकारने की बजाय विकृत नाम से पुकारना सही है ? यह राजनीतिक शिष्टाचार और सरकारी मर्यादा का उल्लंघन है । केन्द्रीय गृहमंत्री को किसी भी दल को विकृत नाम से पुकारने का कोई हक नहीं है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि जब ऑपरेशन चल रहा हो और सशस्त्रबलों के जवान अपनी जान की बाजी लगाकर माओवादियों का मुकाबला कर रहे हों तो ऐसी स्थिति में चिदम्बरम् का पत्र उनके मनोबल को तोड़ने का काम करेगा। तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कानून-व्यवस्था का मसला राज्य के अधीन आता है केन्द्रीय गृहमंत्री ने पत्र लिखकर अपनी मर्यादा का अतिक्रमण किया है। सब जानते हैं माओवादियों से कांग्रेसियों का आंतरिक याराना है और वे जहां पर भी गए हैं वहां उन्होंने क्रांति की सेवा कम की है असंवैधानिक सत्ताकेन्द्रों और स्थानीय बड़े बुर्जुआदल के दलालों का काम ज्यादा किया है। बिहार,छत्तीसगढ़,आंध्र,पश्चिम बंगाल आदि का अनुभव इस बात की पुष्टि करता है।
    कायदे से लालगढ़ ऑपरेशन को लेकर केन्द्र सरकार को अपने मंत्रियों की लगाम कसनी चाहिए। केन्द्र के मंत्री बेलगाम होकर माओवादियों के घर आ जा रहे हैं और उन्हें खुलेआम समर्थन दे रहे हैं। कम से चिदम्बरम बाबू ने एकबार ममता बनर्जी को भी पत्र लिखा होता कि आप और आपका दल माओवादियों और उनके डमी संगठन पुलिस संत्रास विरोधी कमेटी से अपने को दूर रखे। चिदम्बरम बाबू का यह माओ-ममता अंधप्रेम किसी तर्क से समझ में नहीं आता। हम यह समझने में असमर्थ हैं कि माओवादियों का समर्थन करने वाले कैबीनेट में कैसे रह सकते हैं। चिदम्बरम बाबू को पूरा हक है कि वे केन्द्रीयबलों को वापस बुला लें। लेकिन माकपा को अपना कार्यकर्ताओं और आदिवासियों के जानोमाल की माओवादियों से हिफाजत के लिए संघर्ष करने का लोकतांत्रिक हक है। ममता बनर्जी और माओवादी मिलकर माकपा और वाममोर्चे का विरोध करें यह बात समझ में आती है लेकिन वे माकपा सदस्यों का कत्लेआम कर रहे हैं। कम्युनिस्टों की खुलेआम हत्याएं कर रहे हैं और ममता एड कंपनी कम्युनिस्ट हत्यारों को राजनीतिक, कानूनी और आर्थिक मदद दे रहे हैं। इससे भी आश्चर्य की बात यह है कि चिदम्बरम बाबू ने अपने पत्र में माओवादियों के आंकड़े इस्तेमाल किए हैं। राज्य सरकार ने जो आंकड़े दिए हैं और चिदम्बरम् ने जो आंकड़े दिए हैं उनमें अंतर है। कायदे से राज्य के आंकड़े प्रामाणिक हैं क्योंकि कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्य की है। कायदे से होना यह चाहिए कि केन्द्र सरकार माओवाद की समस्या को संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ के नजरिए से न देखे। अभी आधिकारिक तौर पर माओवाद की समस्या तीन जिलों में हैं लेकिन राज्य ने इस समस्या से प्रभावित 3 और जिलों को इसमें शामिल करने का कुछ रोज पहले अनुरोध है किया था लेकिन केन्द्र ने उस पर अभी तक सकारात्मक कार्रवाई नहीं की। उलटे माओवादियों के प्रति नरम रूख को व्यक्त करते हुए माओवादियों की मांगों को ही अपने पत्र में लिख डाला। इससे कांग्रेस का माओवादियों के प्रति नरम रूख सामने आया है और यह देश के लिए घातक है।             


ममता के पांच काल्पनिक मिथ और यथार्थ

          ममता बनर्जी को मिथ बनाने की आदत है वह उनमें जीती हैं। ममता बनर्जी निर्मित पहला मिथ है माकपा शैतान है। दूसरा मिथ है मैं तारणहार हूँ। तीसरा मिथ है माओवादी हमारे बंधु हैं। चौथा मिथ है हिंसा का जवाब प्रतिहिंसा है और पांचवां मिथ है ‘हरमदवाहिनी’। इन पांचों मिथों का वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है। छद्म मिथों को बनाना फिर उन्हें सच मानने लगना यही ममता की आयरनी है। यहीं पर उसके पराभव के बीज भी छिपे हैं। ममता बनर्जी अधिनायकवादी भाषा का प्रयोग करती हैं उनकी आदर्श भाषा का नमूना है ‘हरमदवाहिनी’ के नाम से गढ़ा गया मिथ। ‘हरमदवाहिनी’ काल्पनिक सृष्टि है। यह मिथ लालगढ़ में पिट गया है। वहां के साधारण किसान और आदिवासी समझ गए हैं कि इस नाम से पश्चिम बंगाल में कोई संगठन नहीं है। यह थोथा प्रचार है। लालगढ़ में ‘हरमदवाहिनी’ के कैंपों की एक सूची तृणमूल कांग्रेस और माओवादी बांट रहे हैं। इस सूची में 86 कैंपों के नाम हैं और इनमें कितने लोग हैं उनकी संख्या भी बतायी गयी है। उनके अनुसार ये माकपा के गुण्डाशिविर हैं और माकपा के अनुसार ये माओवादी हिंसाचार से पीड़ितों के शरणार्थी शिविर हैं। सच क्या है इसके बारे में सिर्फ अनुमान ही लगा सकते हैं। किस कैंप में कितने गुण्डे या शरणार्थी हैं यह आधिकारिक तौर पर कोई नहीं जानता।
    विगत दो साल में माओवादियों ने लालगढ़ में आतंक की सृष्टि की है । 200 से ज्यादा माकपा के निर्दोष सदस्यों और हमदर्दों की हत्याएं की हैं। सैंकड़ों को बेदखल किया है। इनमें से अनेक लोग बड़ी मुश्किल से पुलिसबलों की मदद से अपने घर लौटे हैं। लालगढ़ के विभिन्न इलाके स्वाभाविक छंद में लौट रहे हैं। यह बात ममता एंड कंपनी के गले नहीं उतर रही है। ममता एंड कंपनी ने माकपा के ऊपर लालगढ़ में हमले, लूटपाट, हत्या, औरतों के साथ बलात्कार आदि के जितने भी आरोप लगाए गए हैं वे सब बेबुनियाद हैं। लालगढ़ में एक साल में एक भी ऐसी घटना नहीं घटी है जिसमें माकपा के लोगों ने किसी पर हमला किया हो ,इसके विपरीत माओवादी हिंसाचार ,हत्याकांड,जबरिया चौथ वसूली और स्त्री उत्पीडन की असंख्य घटनाएं मीडिया में सामने आई हैं।
          असल में ममता बनर्जी और माओवादी ‘हरमदवाहिनी’ के मिथ के प्रचार की ओट में लालगढ़ के सच को छिपाना चाहते हैं। उनके पास माकपा या अर्द्ध सैन्यबलों के लालगढ़ ऑपरेशन के दौरान किसी भी किस्म के अत्याचार,उत्पीड़न आदि की जानकारी है तो उसे मीडिया ,केन्द्रीय गृहमंत्री और राज्यपाल को बताना चाहिए। उन्हें उत्पीडि़तों के ठोस प्रमाण देने चाहिए।  उल्लेखनीय है माकपा ने यह कभी नहीं कहा कि उनके लालगढ़ में शिविर नहीं हैं। वे कह रहे हैं उनके शिविर हैं और इनमें माओवादी हिंसा से पीडित शरणार्थी रह रहे हैं। ममता बनर्जी जिन्हें गुण्डाशिविर कह रही हैं वे असल में शरणार्थी शिविर हैं । सवाल उठता है माकपा और वामदलों को लालगढ़ में राजनीति करने हक है या नहीं ? ममता और माओवादी चाहते हैं कि उन्हें लालगढ़ से निकाल बाहर किया जाए। इसके लिए ममता बनर्जी ने माओवादी और पुलिस संत्रास विरोधी कमेटी के हिंसाचार तक का खुला समर्थन किया है।
माकपा के लोग लालगढ़ में हमले कर रहे होते,बलात्कार कर रहे होते.उत्पीड़न कर रहे होते तो कहीं से तो खबर बाहर आती। लालगढ़ से साधारण लोग बाहर के इलाकों की यात्रा कर रहे हैं। प्रतिदिन सैंकड़ों-हजारों लोग इस इलाके से बाहर आ जा रहे हैं। इसके बाबजूद माकपा के द्वारा लालगढ़ में अत्याचार किए जाने की कोई खबर बाहर प्रकाशित नहीं हुई है। कुछ अर्सा पहले ममता बनर्जी की लालगढ़ रैली में लाखों लोग आए थे। माओवादी भी आए थे। ममता बनर्जी ने माकपा के द्वारा  लालगढ़ में सताए गए एक भी व्यक्ति को उस रैली के मंच पर पेश नहीं किया । माओवादियों के दोस्त मेधा पाटकर और अग्निवेश भी मंच पर थे वे भी किसी उत्पीडि़त को पेश नहीं कर पाए। नंदीग्राम में जिस तरह तृणमूल कांग्रेस ने माकपा के अत्याचार के शिकार लोगों को मीडिया के सामने पेश किया था वैसा अभी तक लालगढ़ में वे नहीं कर पाए हैं। मेरे कहने का यह अर्थ नहीं है कि माकपा साधुओं का दल है। वह संतों का दल नहीं है। वह संगठित कम्युनिस्ट पार्टी है। उसके पास विचाराधारा से लैस कैडरतंत्र है जो उसकी रक्षा के लिए जान निछाबर तक कर सकता है। विचारधारा से लैस कैडर को पछाड़ना बेहद मुश्किल काम है। माकपा के पास गुण्डावाहिनी नहीं है विचारों के हथियारों से लैस पैने-धारदार कैडर हैं। उनके पास पश्चिम बंगाल में हथियारबंद गिरोहों से आत्मरक्षा करने और लड़ने का गाढ़ा अनुभव है। उनके साथ अपराधियों का एकवर्ग भी है। जिनसे वे सहयोग भी लेते हैं। लेकिन लालगढ़ जैसे राजनीतिक ऑपरेशन को सफल बनाने में गुण्डे मदद नहीं कर रहे वहां विचारधारा से लैस कैडर जान जोखिम में डालकर जनता को एकजुट करने और माओवादी हिंसाचार का प्रतिवाद करने का काम कर रहे हैं। माओवादी हिंसा का प्रतिवाद देशभक्ति है ,लोकतंत्र की सबसे बड़ी सेवा है।
   लोकतंत्र में माकपा को अपने जनाधार को बचाने का पूरा हक है। केन्द्र और राज्य सरकार के द्वारा माओवाद के खिलाफ अभियान में माकपा के कैडर लालगढ़ में जनता और पुलिसबलों के बीच में सेतु का काम कर रहे है। वे लालगढ़ में लोकतंत्र को बचाने की कोशिश कर रहे हैं । लोकतंत्र की खातिर मारे जा रहे हैं। वे न गुण्डे हैं और न महज पार्टी मेम्बर हैं। वे लोकतंत्र के रक्षक हैं । लालगढ़ में माकपा की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है और उसका उसे राजनीतिक लाभ भी मिलेगा। ममता जानती हैं कि माओवाद प्रभावित इलाकों में विधानसभा की 46 सीटें हैं और ये सीटें तृणमूल कांग्रेस के प्रभावक्षेत्र के बाहर हैं और इन सीटों पर वे किसी न किसी बहाने सेंधमारी करना चाहती हैं जो फिलहाल संभव नहीं लगती और यही लालगढ़ की दुखती रग है।

शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

नागार्जुन जन्मशती पर विशेष- बारूदी छर्रे की खुशबू

   इन दिनों लालगढ़ से लेकर छत्तीसगढ़ तक माओवादियों का भूत मंडरा रहा है। केन्द्र से लेकर राज्य सरकारों तक सभी परेशान हैं कि हम क्या करें ? प्रशासन में बैठे अधिकारियों से लेकर नेताओं तक किसी को समझ में नहीं आ रहा कि आखिर माओवादी भूत को कैसे वश में करें ?
       माओवादी भूत हमारे समाज के अलगाव के गर्भ से पैदा हुआ है। विगत 60 सालों में आदिवासी जीवन से मुख्यधारा के महानगरों और शहरों में रहने वालों का अलगाव बढ़ा है.अपरिचय बढ़ा है। अपरिचय और अलगाव ही है जो हमें आज इस अवस्था तक ले आया है कि जिन पुलिस वालों को इलाके का ज्ञान होना चाहिए वे आदिवासी इलाकों,उनकी संस्कृति,खान-पान,जीवनशैली आदि के बारे में एकदम अनभिज्ञ हैं। यहां तक कि जिले के कलेक्टर को नहीं पता है कि आदिवासी कैसे रहते हैं। उनके जेहन में स्टीरियोटाइप समझ रही है आदिवास्यों की। आप सर्वे करके देख लें कि शहर के पढ़े-लिखे कितने बुद्धिजीवी हैं जो विरसा मुण्डा के बारे में जानते हैं। हम उन किस्सों और किंवदंतियों से वाकिफ नहीं हैं जो आदिवासी जीवन में प्रचलित हैं। मुझे संदेह है कि नया आदिवासी युवा अपनी संस्कृति और परंपरा को भी ठीक ढ़ंग से जानता होगा ! बाबा ने आदिवासियों पर कई कविताएं लिखी हैं और अनेक आदिवासी नेताओं पर भी लिखा है। ऐसी ही उनकी एक कविता है ‘हवन-काष्ठ...’,इसमें आदिवासी जीवन के साथ अपरिचय की स्थिति का रूपायन किया गया है। लिखा है-‘‘ क्या उससे भी कभी मिलोगे ? / मुण्डा -जन-जाति के उस पुरूषोत्तम से ? / सौ-सौ किवदंतियों का नायक था वो /गिरिजन उसे कहते हैं ‘विरसा भगवान!’’
माओवादी आज जिस तरह की हिंसा कर रहे हैं। इस तरह की परिस्थितियों और हिंसा के पुजारियों पर व्यंग्य कसते हुए बाबा ने लिखा- ‘‘ यही धुँआ मैं खोज रहा था/ यही आग में खोज रहा था/यही गन्ध थी मुझे चाहिए/बारूदी छर्रे की खुशबू!.../ठहरो-ठहरो इन नथनों में इसको भर लूँ.../बारूदी छर्रे की खुशबू !’’ आगे लिखा ‘‘ यहाँ अहिंसा की समाधि है/ यहाँ कब्र है पार्लमेंट की।’’
    माओवादी जिस तरह का हिंसाचार रहे हैं ,वैसी ही अवस्था को ध्यान में रखकर ‘‘प्रतिहिंसा का महारूद्र’’ शीर्षक कविता लिखी। लिखा-‘‘फिलहाल,/तुम्हारा यह मारक खेल/ अभी कुछ और चलेगा/लेकिन याद रखो -हम तुम्हारी बिरादरी के एक-एक सदस्य का वध करेंगे।’’   







शनिवार, 11 सितंबर 2010

यौनशोषक माओवादियों के प्रतिवाद में

              अंजनी बाबू का गुस्सा और विरोध नाजायज है,वे माओवाद के समर्थक हैं यह तो तय है। हम मान भी लें कि माओवादियों पर शीलहरण का आरोप पुलिसिया बयान है और कई पत्रकार पुलिस के हवाले से ऐसा लिख रहे हैं। समस्या बलात्कार है तो इसका फैसला कौन करेगा ? जब तक बलात्कार की शिकार महिला कह रही है हमें उसकी बात को ही मानना होगा। इसके लिए अन्य कोई व्यक्ति प्रामाणिक नहीं हो सकता। यदि पुलिस झूठी कहानी गढ़ रही है तो संबंधित महिला आने वाले समय में अपना बयान बदल सकती है। वह जब तक बयान नहीं बदलती तब तक उस महिला का बयान ही प्रमाण है।
    आश्चर्य की बात है एक माओवादी महिला ने अपने साथियों पर यौन शोषण का गंभीर आरोप लगाया है। आज जब वह महिला आरोप लगा रही है तो उसकी आस्थाओं पर ही सवाल उठाए जा रहे हैं और वकील की भाषा में तर्कशास्त्र गढ़ा जा रहा है और माओवादियों के समर्थक महिला संगठनों के नाम से बयान पर बयान दिए जा रहे हैं। यह मूलतःस्त्रीविरोधी मानसिकता है। स्त्री के साथ जंगल में माओवादी क्या करते थे इसके बारे में एकमात्र प्रमाण वह महिला है जिसने यौनशोषण के गंभीर आरोप लगाए हैं। कायदे से उसके आरोपों पर माओवादियों की जन अदालत से लेकर बुर्जुआ अदालतों तक मुकदमा चलना चाहिए। माओवादी यौनशोषकों को दण्डित किया जाना चाहिए।
     दूसरी बात यह कि जिस औरत के साथ बलात्कार हुआ है उसे बताने का भी अधिकार अब माओवादी देना नहीं चाहते और उसने जब से बताया है तब से उस महिला का वे चरित्र हनन कर रहे हैं। क्या पीडित महिला के प्रति यही क्रांतिकारी नजरिया है या माफिया नजरिया है ?
    अंजनीकुमार के लेख में मृणाल वल्लरी के जनसत्ता में प्रकाशित लेख पर जो गुस्सा निकाला गया है उसे किसी भी सभ्य विमर्श का हिस्सा नहीं बनाया जाना चाहिए। अंजनीकुमार के लेख में यौनशोषण की शिकार स्त्री के प्रति सहानुभूति का एक शब्द तक नहीं है वे उन्हें संदेह का लाभ भी नहीं देना चाहते। अपनी माओवादी बेव की बंदूकों से बलात्कारी माओवादियों को पुण्यात्मा बना देना चाहते हैं।
    अंजनीकुमार नहीं जानते कि उनके या किसी और के कहने से सत्य को अभी बदल नहीं सकते। यह सत्य क्या है इसे बताकर पीड़िता ने अपना दायित्व निभाया है अब नागरिक समाज और मानवाधिकार संगठनों की जिम्मेदारी है कि वे इसके बारे में तय करें कि वे किसके साथ हैं यौनशोषण की शिकार महिला के या माओवादी यौनशोषकों के। हम सिर्फ इतना कहना चाहते हैं कि पीड़िता की मंशा के सवाल उठाकर माओवादी संगठनों के हिंसाचार और उत्पीड़न पर वेबवर्षा करके सत्य नहीं बदल सकते। माओवादी यौनशोषण की शिकार औरत के पास कम्प्यूटर नहीं है,इंटरनेट नहीं है। वह अभी अपनी बात कह नहीं सकती कम से कम उसने अभी तक जो बताया है उसे सुनो,मानो या न मानो,लेकिन उस पर कीचड़ तो मत उछालो। यहां हम उस खबर को ‘टाइम्स ऑफ इण्डिया’ से साभार दे रहे हैं जिसमें माओवादियों पर उनकी ही एक साथी महिला ने यौनशोषण के गंभीर आरोप लगाए हैं। पूरी खबर देखें और माओवाद बेववीरों को लानत भेजें-


Raped repeatedly, Naxal leader quits Red ranks
Rakhi Chakrabarty, TNN, Aug 24, 2010, 01.02am IST


There's a wide gulf between what Naxals practise and preach, says Uma. (TOI Photo)

Somewhere On The Bengal-Jharkhand Border: The eerie calm in the dense sal forest is deafening. Walking along a snaking dirt track, a clear patch appears. Sitting on a rock, hidden by thick, emerald green foliage, is the diminutive figure of a woman, a gamchha (thin towel) covering her head. Her blue salwar-kameez meld with the surroundings. Her eyes dart around at the slightest hint of sound. Shobha Mandi, alias Uma, alias Shikha, gives a searching look and then smiles. The 23-year-old CPI-Maoist Jhargram area commander says she was expecting us.

From commanding 25-30 armed Maoist squad members, Uma turned a fugitive four months ago. She fled her command post on the plea of seeing a doctor. She hid with her aunt for a short while; and now she says she wants the world to know her story. She wants to surrender and is likely to give up Naxalism on August 26.

Why did she decide to shed her battle fatigues seven years after she joined the Naxals? "They committed injustices against which they claimed they were fighting," said Uma. "As a recruit, I protested against the habits of some leaders in the presence of Kishanji. Nobody liked it. The leaders instructed the squad members not to speak to me. I was isolated and warned of dire consequences if I protested," she said.

What didn't she like about the leaders? "They rape," she shot back, eyes flashing with rage. "After about a year of joining Naxals, I was put on night-long sentry duty at a forest camp in Jharkhand. Suddenly, out of the dark, Bikash (now, head of the state military commission) came up and asked me for water. As I turned to fetch it, he grabbed me and tried to do 'kharap kaaj' (indecent acts)." When she objected, Bikash threatened to strangle her. After forcing her into submission, Bikash raped her, she said. She was 17 then.

"He warned me against telling anyone about this. But, I told Akash (Kishanji's confidant and a state committee member). He said he would look into it but did nothing. In fact, Akash's wife, Anu, lives with Kishanji," Uma said.

Most women recruits are exploited by senior Maoists. Senior women leaders, too, have multiple sexual partners, Uma said. "If a member gets pregnant, she has no choice but to abort: A child is seen as a burden that hampers the agility of guerrillas."

Uma has heard tales of brutalization of other women Naxals, too. "Seema (then a recruit) told me that Akash raped her as well. Rahul (alias Ranjit Pal) raped Belpahari squad commander Madan Mahato's wife, Jaba. In this case, the party punished Rahul, who is a key weapons trainer at Maoist camps. He was removed from the regional committee for three months," said Uma.

State committee secretary Sudip Chongdar, alias Goutam, was also punished for similar acts, she said, and transferred to Jharkhand's West Singbhum district. Maoists divide time between forest camps and hideouts in villages. Villagers can't refuse shelter to gun-toting Maoists. Also, they must keep all night vigil to alert them against police raids. "When Sudip took shelter in villages, he raped women in their homes. They were too scared to protest," said Uma.

Many of her senior leaders exploited her sexually. One day, says Uma, Kamal Maity, who is a Bengal-Jharkhand-Orissa regional committee member, came to her rescue. At a meeting attended by Kishanji and other top Maoists, Kamal proposed a relationship with Uma. The leaders agreed. "After Jaba's incident, I learnt that a woman cadre is protected against sexual exploitation only if she is with a senior leader," she said. That was a turning point and she rose steadily in Naxal ranks.

Uma is on the police's most wanted list. She is suspected to have planned and executed a series of attacks, including the massacre of 24 EFR jawans in Silda (February 2010); a raid on Sankrail police station in which two policemen were killed and an officer abducted (October 2009). She is also one of the suspects in Jharkhand MP Sunil Mahato's murder in 2007.

She mentored PCPA members, including Bapi Mahato who is in jail for the Jnaneswari train sabotage. Last year, when the joint central and state forces advanced into Lalgarh to break an eight-month siege, she along with other Maoists fired at the police. In Jhargram, she is known as didi. According to a source, Uma single-handedly built up the PCPA at Jhargram.

Uma joined the rebels in 2003. CPI-Maoist hadn't been formed then. "I joined the People's War ( PW) which later merged with MCC in 2004 to form CPI-Maoist," she said. She was given a new name, Uma. "I was plump. Anu (Akash's wife; Kishanji's companion) said I looked like Uma Bharti. So, she named me Uma."

Maoist leaders spotted her organizational skills. She was asked to mobilize tribals women at Jamboni and Dahijuri in West Midnapore. She also underwent three-month arms training at Jharkhand's Gorabandha forest. "First, we are taught with dummy weapons using tree branches. All recruits have to fire three bullets in their first session. Those who hit the target are picked for armed squads," she said.

In spite of guns and guerrilla warfare, the woman in her sometimes longs for simple pleasures like painting her nails or wearing earrings. But, she says, "We were not permitted to use even fragrant soaps, lest we get detected. Only Lifebuoy is used by cadres."

Did she join the rebels of her own free will? Circumstances, she said. Uma is second of four siblings. Along with their parents, they worked as wage earners on farms or collected sal leaves, mahua and red ants (kurkut) to sell. "I was good in studies but weak in math. I worked all day and studied at night," the girl from Khayerpahari village in West Bengal's Bankura district recounted. "I couldn't pass the Class X board."

This was in 2002. Younger brother Sanjay, who was in Class VIII, was already taken away by the extremists. He became a Lalgarh squad member and is in jail now. "My father, Jamadar Mandi, was an alcoholic suffering from tuberculosis. There was no money to buy him medicines. We sold our land and also borrowed money," Uma said.

While the family struggled, some "party" members offered help. "They gave my father some money and told me to join them. They said I could leave if I didn't like working with them," said Uma. The prospect of a job spurred her.

But only after she signed up did she realize she could never go home. "Whoever comes here, never returns," a senior leader told her. She wanted freedom from poverty but found herself chained to an ideology she couldn't understand.

After seven years of witnessing bloodletting, she has no fear of death. She now hopes the state she has fought against will rehabilitate her. "There are many in the Maoist ranks who would flee given half a chance," she said.


Read more: Raped repeatedly, Naxal leader quits Red ranks - The Times of India http://timesofindia.indiatimes.com/india/Raped-repeatedly-Naxal-leader-quits-Red-ranks/articleshow/6423200.cms#ixzz0zErK1Kjf
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एक अन्य खबर भी देखें- यह भी ‘टाइम्स ऑफ इण्डिया’ से है-
KOLKATA: Maoist woman leader Shobha Mandi alias Uma, who had narrated a sordid saga of rape and sexual abuse in an exclusive interview to TOI published on August 24, surrendered to the police in West Midnapore on Friday. After four months on the run, the CPI-Maoist Jhargram area commander walked into West Midnapore SP Manoj Verma's office around 7pm. Clad in a green salwar-kameez with a cream dupatta covering her head, she handed over a bag containing Rs 55,500 and her personal belongings to the cops. She wasn't carrying any weapons.

Mandi said she belonged to People's Committee Against Police Atrocities (PCPA), the Maoist-led group responsible for the mass upsurge against police and CPM cadres in Lalgarh. She had mentored PCPA members involved in the Jnaneswari train blast that killed 148 people.

"She will be kept in a secure transit camp. Her parents have been informed. They can come and meet her. We will write to the Screening and Rehabilitation officer who will decide what benefits she will be entitled to as per the surrender policy," Verma told TOI. Uma had got in touch with the district police 7-8 days ago through her own network expressing her intention to surrender, said Verma. Wanted in five cases in Belpahari and Jhargram, she has not been arrested though.

After her case is scrutinized by the government and police, she will be entitled to a host of benefits that the government gives to encourage former Naxals to join the mainstream. These include a fixed deposit of Rs 1.5 lakh which can be withdrawn after three years subject to good behaviour; monthly stipend of Rs 2,000 for maximum 36 months and vocational training for skill development.

The 23-year-old woman who commanded 25-30 armed Maoist squad members deftly fielded questions by reporters. She said she ran away from her commanding post in April this year but denied reports that she had been in police custody all this while. She said she hadn't been home for two years and was living in hideouts in forests and other places since she deserted the red ranks. She refused to divulge the locations for fear of exposing those who shielded her from the wrath of Naxals.

Why did she surrender? "I want to lead an ordinary life, a life that all normal people life," she told reporters. Earlier, she had told TOI she had been wanting to run away from day 1. She had alleged that she had been raped by senior Maoist leaders, including key Maoist leader Bikash. When she complained, she was isolated and threatened with dire consequences if she protested again. "They commit injustices against which they claimed they are fighting," Uma had told TOI.

Her father Jamadar Mandi told TOI he was happy that his daughter was back. "We have seen her twice in the last seven years. Last time we saw her, she was in fatigues and went back the same day."

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(यह प्रतिक्रिया मैंने मोहल्ला लाइव डॉट कॉम पर आज अंजनीकुमार के लेख की प्रतिक्रिया में लिखी थी।) 

बुधवार, 30 सितंबर 2009

लालगढ का हिंसाचार और प्रमोद मल्‍लि‍क का हिंसा प्रेम

प्रमोद मल्‍लि‍क साहब,वाममोर्चा जब सन्77 में सत्‍ता में आया था तो मानवाधि‍कारों के हनन के खि‍लाफ आवाज बुलंद करके ही आया था और उस नीति‍ का लंबे समय उसने पालन भी कि‍या। आज उन इलाकों में जाएं जहां पर तृणमूल कांग्रेस के लोग पंचायतों से लेकर संसद तक जीते हैं तो आपको उनकी कार्यप्रणाली देखकर हैरानी होगी। माओवादी लालगढ इलाके में हफता वसूली से लेकर तथाकथि‍त जनअदालतों के जरि‍ए आम लोगों को बि‍ना कि‍सी कारण के दण्‍डि‍त कर रहे हैं। वि‍श्‍वास न हो तो एकबार नंदीग्राम की यात्रा जरूर कर लें। कि‍स तरह का वि‍कल्‍प माओवादी,कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस ने जमीनी स्‍तर पर तैयार कि‍या है उसकी श्‍ाक्‍ल देखकर बि‍हार का माफि‍या राज भी बौना नजर आएगा। बंदूक की नोंक पर माकपा के सदस्‍यों और हमदर्दों को माकपा का साथ छोडने के लि‍ए दबाव डाला जा रहा है, आतंकि‍त कि‍या जा रहा है, ऐसा नहीं करने पर गले में जूतों की माला पहनाकर जुलूस नि‍काले जा रहे हैं,जुर्माना ठोका जा रहा है। जहां पर ऐसा नहीं कर पा रहे हैं वहॉं सरेआम कत्‍ल कि‍या जा रहा है। वि‍गत चार महीनों से हिंसा का ताण्‍डव चल रहा है। गरीब कि‍सानों और आदि‍वासि‍यों की रक्षा करने में माकपा भी असमर्थ है,माओवादी हिंसा में मारे गए ज्‍यादातर लोग गरीब हैं। माओवादि‍यों का यदि‍ जनता में व्‍यापक समर्थन है तो उन्‍होंने हिंसाचार और असंवैधानि‍क सत्‍ताकेन्‍द्रों की स्‍थापना के जरि‍ए लालगढ में आतंक का राज क्‍यों कायम कि‍या हुआ है ? आतंक और हिंसा के हथि‍यार की माओवादि‍यों को जन समर्थन के अभाव में ही जरूरत पडी है। इससे भी बड़ा सवाल यह है कि‍ क्‍या माकपा के आतंक का वि‍कल्‍प माओवादी आतंक है?
प्रमोद मल्‍ि‍ल्‍ाक साहब,नक्‍सल अथवा माओवादि‍यों की आलोचना करना घृणा अभि‍यान में शामि‍ल होना नहीं है। समस्‍या यह भी नहीं है कि‍ नक्‍सलवादि‍यों का वर्चस्‍व क्‍यों है,समस्‍या क्रांति‍ होने में भी नहीं है। समस्‍या है नि‍र्दोष लोगों की हत्‍या वे क्‍यों कर रहे हैं। नक्‍सल चुनाव जीतें या हारें,इलाके में जनता उनका साथ दे या न दे,माकपा को खदेड दे,इन सबमें कि‍सी भी नागरि‍क को आपत्‍ति‍ नहीं हो सकती। लेकि‍न यदि‍ हिंसाचार के कंधे पर सवार होकर यदि‍ क्रांति‍ और माओवादी आएंगे तो इस पर सभी शांति‍ पसंद नागरि‍कों को वि‍रोध करना चाहि‍ए। कल क्रांति‍ होगी या नहीं होगी,यह तो क्रांति‍कारी संगठनों को भी पता नहीं है। लेकि‍न क्रांति‍ के नाम पर ,पुलि‍स और माकपा एजेण्‍ट के नाम पर माओवादी हिंसा जरूर हो रही है इसमें प्रति‍दि‍न नि‍र्दोष ग्रामीण मारे जा रहे हैं। माओवादि‍यों को यदि‍ जनता का समर्थन होता तो वे हिंसा नहीं करते। जि‍न्‍हें जनसमर्थन हासि‍ल होता है वे कम से कम हिंसा करते हैं। जि‍न्‍हें कम जनसमर्थन हासि‍ल होता है वे ज्‍यादा हिंसा करते हैं। गुजरात का अनुभव सामने है वहां साम्‍प्रदायि‍क ताकतों ने इतनी व्‍यापक हिंसा की थी अब मोदी के खि‍लाफ आवाज तक नहीं नि‍कलती। आप अच्‍छी तरह जानते हैं उग्रवादी हिंसा जि‍न इलाकों में रही है वहॉं जनता की आवाज सुनाई नहीं देती,सि‍र्फ आतंकी संगठनों की ही आवाज सुनाई देती है। पंजाब से लेकर असम,कश्‍मीर से लेकर नागालैण्‍ड तक का यही तजुर्बा है। आप जि‍स जनसमर्थन की बातें कर रहे हैं वैसा जनसमर्थन तो तालि‍बान को भी मि‍ला हुआ है,क्‍या आतंक के कारण सतह पर जनता की चुप्‍पी को माओवादि‍यों के लि‍ए जनसमर्थन कहना सही होगा। आप जानते हैं कि‍ अफगानि‍स्‍तान में लाखों नाटो सैनि‍कों के बावजूद तालि‍बान आज भी खत्‍म नहीं हुआ है। माओवादी संगठन क्रांति‍कारी संगठन नहीं है। बल्‍कि‍ अपराधी कर्मों में लगे हिंसक गि‍रोह हैं। आपको पूरा हक है उनकी हि‍मायत करें। लेकि‍न यह सोचकर करें कि‍ भारत में लोकतंत्र है और लोकतंत्र माओवादि‍यों की देन नहीं है। माओवादी लोकतंत्र से नफरत करते हैं। यह खुला सच है यह घृणा का प्रचार नहीं है बल्‍कि‍ इस तथ्‍य और सत्‍य को माओवादी स्‍वयं स्‍वीकार करते हैं। जि‍स चीज को वे स्‍वीकार करते हैं,मैं तो उसी को दोहरा रहा हूँ,इसमें कि‍सी दल वि‍शेष की हि‍मायत करना कहाँ से आ गया। आपकी माकपा के प्रति‍ जि‍तनी आलोचनाएं हो सकती हैं उससे ज्‍यादा हमारी भी हैं। लेकि‍न ये आलोचनाएं भक्‍ति‍ और घृणा के भाव से परे होकर सत्‍य के आधार पर नि‍र्मि‍त हुई हैं। आपकी क्रांति‍ की भक्‍ति‍ स्‍वागतयोग्‍य है, अपराधि‍यों की भक्‍ति‍ आलोचना के लायक है।
( मोहल्‍ला लाइव पर छत्रधर महतो की गि‍रफतारी पर चली बहस में प्रमोद मल्‍लि‍क के वि‍चारों पर व्‍यक्‍त टि‍प्‍पणी)

सोमवार, 31 अगस्त 2009

लालगढ़ कत्‍लेआम पर महाश्‍वेता- राजेन्‍द्र यादव की चुप्‍पी तकलीफ देती है

भारतीय बुद्धि‍जीवी ज्‍यादातर समय सत्‍ता के एजेण्‍डे पर काम करता है। उस एजेण्‍डे के बाहर जाकर सोचता नहीं है। वैकल्‍पि‍क एजेण्‍डे पर सोचता नहीं है।आम जनता के हि‍त के एजेण्‍डे पर वहां तक जाता है जहां तक सत्‍ता जाती है। वह सत्‍ता के हि‍तों के नजरि‍ए से जनता के हि‍तों को परि‍भाषि‍त करता है। बुद्धि‍जीवीवर्ग में दूसरी कोटि‍ में ऐसे लोग आते हैं जो दलीय प्रति‍बद्धता में बंधे हैं। तीसरी कोटि‍ ऐसे बुद्धि‍जीवि‍यों की है जो मृत वि‍षयों पर नि‍रंतर बोलते और लि‍खते हैं। हमेशा परंपरा की गोद में ही बैठे रहते हैं। बुद्धि‍जीवि‍यों की इन तीनों कोटि‍यों से भि‍न्‍न ऐसे भी बुद्धि‍जीवी हैं जो हमेशा वि‍कल्‍प की तलाश में रहते हैं,जनता के हि‍तों पर सत्‍ता,दल और जड़ मानसि‍कता की कैद से परे जाकर सर्जनात्‍मक हस्‍तक्षेप करते हैं। ले‍कि‍न इन चारों ही कोटि‍ के बुद्धि‍जीवि‍यों में एक वि‍लक्षण साम्‍य नजर आ रहा है ,ये पश्‍चि‍म बंगाल के गांवों में चल रहे हिंसाचार के बारे में अपने -अपने कारणों से चुप हैं। अथवा इस हिंसा को एकहरे रंग में देख रहे हैं। एकहरे रंग में हिंसा को देखने के कारण सबसे ज्‍यादा क्षति‍ग्रस्‍त आम आदमी हो रहा है, गांव के गरीब हो रहे हैं, आदि‍वासी हो रहे हैं। गांव के गरीब का सत्‍य बुद्धि‍जीवी के नजरि‍ए,आस्‍था,प्रति‍बद्धता और दलीय वि‍चारधारा से कहीं बड़ा होता है। बुद्धि‍जीवी के नाते हम सि‍र्फ अपने ही रंग में रंगे रहेंगे और एक ही रंगत और एक ही वि‍चारधारा के चश्‍मे से गांव के यथार्थ को देखेंगे तो हमें गांव का गरीब नजर नहीं आएगा। लोकसभा चुनाव के बाद पश्‍चि‍म बंगाल में जो हिंसाचार चल रहा है उसके कारण सैंकड़ों नि‍र्दोष लोग मारे गए हैं। हजारों बेघर हुए हैं, सैंकड़ों शरणार्थी की तरह इधर उधर पडे हैं। आखि‍रकार हमारे बुद्धि‍जीवी चुप क्‍यों हैं? अपराधी राजनीति‍क गि‍रोहों ,खासकर तथाकथि‍त माओवादी अपराधी गि‍रोहों के हमलों से प्रति‍दि‍न साधारण गरीब मारा जा रहा है। लोकसभा चुनाव के बाद अकेले लालगढ इलाके में अब तक 100 से ज्‍यादा गरीब लोगों को सरेआम माओवादि‍यों ने कत्‍ल कि‍या है और यह सब देखने के बावजूद भी यदि‍ हमारे बुद्धि‍जीवी चुप हैं,खासकर पश्‍चि‍म बंगाल के बुद्धि‍जीवी चुप हैं तो हमें सोचना होगा आखि‍रकार बुद्धि‍जीवी की ऐसी नपुंसक कौम कैसे तैयार हुई ? आज इंटरनेट के दौर में भारत के प्रत्‍येक कोने में खबरें सहज रूप में उपलब्‍ध हैं,इसके बावजूद कि‍सी भी कोने से पश्‍चि‍म बंगाल में हो रहे गरीबों के कत्‍लेआम का कहीं से भी बडा प्रति‍वाद बुद्धि‍जीवि‍यों की ओर से नहीं हुआ है। कलकत्‍ते की सडकें भी शांत पडी हैं।
सवाल उठता है हमारा बुद्धि‍जीवी गांव के सत्‍य से डरता क्‍यों है ? वह नि‍र्भय होकर सत्‍य पर अपने भावों को व्‍यक्‍त क्‍यों नहीं करता। गांव के गरीबों के मानवाधि‍कार हनन और नृशंस हत्‍याकांडों पर हमारी सत्‍ता और कलमघि‍स्‍सु हि‍न्‍दी के तथाकथि‍त वीर पत्रकार चुप क्‍यों हैं ? हि‍न्‍दी क्षेत्र में सक्रि‍य जनवादी लेखक संघ,प्रगति‍शील लेखक संघ,जनवादी सांस्‍कृति‍क मंच आदि‍ संगठनों को पश्‍चि‍म बंगाल में माओवादी अपराधी गि‍रोहों द्वारा कि‍या जा रहा गरीबों का कत्‍लेआम वि‍चलि‍त क्‍यों नहीं कर रहा ? एक जमाना था जब बेलछी में हरि‍जन हत्‍याकांड होने पर नागार्जुन ने प्रति‍वाद में शानदार रचना लि‍खी थी आज कहीं से भी पश्‍चि‍म बंगाल के आदि‍वासि‍यो,गरीबों,दलि‍तों की हत्‍या के खि‍लाफ कोई गुस्‍सा नजर नहीं आरहा,बेलछी हत्‍याकांड से श्रीमती इंदि‍रागांधी वि‍चलि‍त हुई थीं और बेलछी भी गयी थीं किंतु लालगढ में न तो मुख्‍यमंत्री बुद्धदेव पहुंचे हैं और न देश का प्रधानमंत्री ही इन गरीबों के आंसू पोंछने के लि‍ए समय नि‍काल पाया है, दूसरी ओर हि‍न्‍दी के बुद्धजीवी हाथ पर हाथ धरे कि‍सी आपातकाल का इंतजार कर रहे हैं और फि‍र शायद वे महान रचना करें ? पश्‍चि‍म बंगाल में हिंसा के लि‍ए कौन जि‍म्‍मेदार है इसके वि‍वाद में जाए बि‍ना हमें पश्‍चि‍म बंगाल में नि‍र्दोष ग्रामीणों ,दलि‍तोंऔर आदि‍वासि‍यों की नृशंस हत्‍या के खि‍लाफ आवाज बुलंद करनी चाहि‍ए। लेखक और बुद्धि‍जीवी शांति‍ और सत्‍य की रक्षा के लि‍ए प्रति‍बद्ध होते हैं। आज शांति‍ और सत्‍य दोनों ही दांव पर लगे हैं। कुछ अपराधी गि‍रोह हिंसा का ताण्‍डव चलाकर गरीबों के कत्‍ल में व्‍यस्‍त हैं, प्रति‍दि‍न गरीबों का वेवजह कत्‍ल कर रहे हैं। आश्‍चर्य की बात है जो लोग नंदीग्राम में राज्‍य पुलि‍स के द्वारा की गई गोलीबारी पर चीख पुकार कर रहे थे आज वे महाश्‍वेता देवी और उनके समानधर्मा लालगढ में अब तक माओवादि‍यों के हाथों कत्‍ल कि‍ए गए 100 गरीबों की हत्‍या पर एकदम चुप हैं। महाश्‍वेता देवी की चुप्‍पी खतरनाक है, यह चुप्‍पी टूटनी चाहि‍ए।उन्‍हें लालगढ के हत्‍यारों के खि‍लाफ भी शांति‍ और सत्‍य की रक्षा का बि‍गुल बजाना चाहि‍ए। महाश्‍वेता की चुप्‍पी हमें तकनीफ देती है। वे जब बोलती हैं तो गरीबों को बल मि‍लता है। आज पश्‍चि‍म बंगाल खासकर लालगढ के गरीब परि‍वार महाश्‍वेता देवी की ओर आशाभरी नजरों से देख रहे हैं। वे अपने समानधर्माओं के साथ लालगढ में चल रहे कत्‍लेआम की निंदा करें। प्रति‍वाद संगठि‍त करें। सडकों पर उतरें।महाश्‍वेता कि‍सी एक की नहीं हैं वे गरीबों और आदि‍वासि‍यों की हैं। उनकी आवाज हैं। उन्‍हें बोलना चाहि‍ए। उन्‍हें शांति‍ के लि‍ए,गरीबों का कत्‍लेआम रोकने के लि‍ए सडकों पर आना चाहि‍ए। उनकी चुप्‍पी हमें तकलीफ दे रही है। हमें हि‍न्‍दी के प्रग‍ति‍शील दि‍ग्‍गजों की भी चुप्‍पी तकलीफ दे रही है। हम चाहते हैं नामवर सिंह,प्रभाष जोशी,राजेन्‍द्र यादव,अशोक बाजपेयी ,मैनेजर पांडेय,नि‍त्‍यानंद ति‍वारी,मुरलीमनोहर प्रसाद सिंह जैसे प्रगति‍शील लेखक आगे आएं और लालगढ में मच रहे कत्‍लेआम का सामूहि‍क प्रति‍वाद संगठि‍त करें। अगर ये लोग आज नहीं बोलेंगे तो कब बोलेंगे ? हमारा सभी नेट लेखकों से अनुरोध है अपने अपने ब्‍लाग पर लालगढ में चल रहे कत्‍लेआम पर लि‍खें, लेखकों और बुद्धि‍जीवि‍यों की ज्‍यादा से राय एकत्रि‍त करके प्रकाशि‍त करें। आज लालगढ के गरीब हमें शांति‍ के पक्ष में और कत्‍लेआम की राजनीति‍ के वि‍रोध में खडे होने के लि‍ए पुकार रहे हैं,हम चुप न बैठें,बोलें और लोगों को बोलने के लि‍ए उदबुद्ध करें।

शुक्रवार, 7 अगस्त 2009

माकपा - लालगढ़ से लौटो भयावह भवि‍ष्‍य से बचो

पश्‍चि‍म बंगाल माकपा के लि‍ए लालगढ़ गले की हड्डी बन गया है। इससे नि‍कलने का रास्‍ता नजर नहीं आ रहा। राज्‍य के गृहसचि‍व ने कल जि‍स तरह लालगढ़ अभि‍यान के दूसरे चरण की असफलता को स्‍वीकार कि‍या वह पश्‍चि‍म बंगाल के इति‍हास की वि‍रल घटना है, लालगढ़ की असफलता माओवादी संगठनों के खि‍लाफ केन्‍द्र सरकार की नीति‍ की भी पराजय है। लालगढ़ में केन्‍द्र और राज्‍य दोनों ही असफल साबि‍त हुए हैं। लालगढ़ का सबक है कि‍ सामाजि‍क- राजनीति‍क समस्‍याओं के राजनीति‍क समाधान खोजने चाहि‍ए सैन्‍य अथवा अर्द्ध सैन्‍यबलों की ताकत के बल पर समाधान नहीं कि‍ए जा सकते।
लालगढ़ में अर्द्ध सैन्‍यबलों को भेजने का फैसला केन्‍द्र सरकार और पश्‍चि‍म बंगाल राज्‍य सरकार दोनों का था, इसमेंमनमोहन सिंह- बुद्धदेव भट्टाचार्य की महत्‍वपूर्ण भूमि‍का थी।माओवादि‍यों के खि‍लाफ यह हाल के वर्षों का सबसे बड़ा अभि‍यान था जो असफल रहा है।
लालगढ़ में माकपा और राज्‍य सरकार क्‍या करें जि‍ससे राजनीति‍क क्षति‍ को कम कि‍या जा सके। अभी लालगढ़ में सबसे ज्‍यादा माकपा को कीमत अदा करनी पड़ रही है। उसके 24 से ज्‍यादा कार्यकर्त्‍ता मारे गए हैं। अनेक सदस्‍य इलाका छोड़कर भागने को मजबूर हुए हैं। लालगढ़ की असफलता माकपा के जि‍द्दी रूख की पराजय है, यह उस नजरि‍ए की पराजय है जो अपने को हमेशा सही मानकर चलता है। माकपा का राज्‍य नेतृत्‍व अभी भी यह मानने को तैयार नहीं है कि‍ लालगढ़ में कोई राजनीति‍क गलती हुई है। माकपा की बुनि‍यादी समझ है कि‍ 'हम हमेशा सही सोचते हैं, सही करते हैं' यानी 'हम सही और बाकी सब गलत' का रास्‍ता मूलत: राजनीति‍क कूपमंढूकता का रास्‍ता है।
लोकतंत्र में ' मैं सही' का रास्‍ता अंतत: मनमानी राजनीति‍ को जन्‍म देता है, लालगढ़ में यही मनमानपन साफ झलक रहाहै। क्‍या लोकतंत्र में 'अन्‍य' को पूरी तरह अस्‍वीकार करके काम कि‍या जा सकता है, जी नहीं, 'अन्‍य' को साथ लेकर ही काम करने से सफलता मि‍लती है और राजनीति‍क साख बनती है, माकपा की राजनीति‍क साख का स्‍तर आज जि‍तना नीचे है उतना नीचे पहले कभी नहीं रहा। समस्‍या यह है कि‍ लालगढ़ से कैसे वापस लौटें।
पहले संक्षेप में उस दृश्‍य की कल्‍पना करें कि‍ माकपा के नेताओं पर मनोवैज्ञानि‍क तौर पर वापसी के साथ क्‍या गुजरेगी, यदि‍ माकपा का राज्‍य नेतृत्‍व राजनीति‍क है और नाक का बाल बनाकर राजनीति‍ नहीं कर रहा तो लालगढ़ से तत्‍काल अर्द्धसैनि‍क बलों को वापस बुला लेना चाहि‍ए और इलाके में सामान्‍य प्रशासनि‍क मशीनरी के हवाले सारे कामकाज को सौंप दि‍या जाना चाहि‍ए।
लालगढ़ की सफलता को वि‍पक्ष या माओवादि‍यों की जीत और माकपा या राज्‍य सरकार की हार के रूप में नहीं देखा जाना चाहि‍ए।लालगढ़ का सवाल हार-जीत का सवाल नहीं है। माकपा को गोरखालैण्‍ड आंदोलन के राजनीति‍क सबक का यहां इस्‍तेमाल करना चाहि‍ए। लालगढ़ से अर्द्धसैनि‍क बलों की वापसी के साथ साथ लालगढ़ में सक्रि‍य पुलि‍स दमन वि‍रोधी कमेटी के नेताओं को बातचीत के लि‍ए बुलाकर उनकी मांगों पर तुरंत कार्रवाई करनी चाहि‍ए। राज्‍य सरकार यदि‍ उनकी मांगों पर सकारात्‍मक रवैयया नहीं अपनाएगी तो स्‍थि‍ति‍ और भी पेचीदा होती चली जाएगी।
इसके अलावा लालगढ़ का आन्‍दोलन सुनि‍योजि‍त आन्‍दोलन है,वह स्‍वत:स्‍फूर्त्‍त आंदोलन नहीं है, उसके पीछे वि‍पक्ष की शक्‍ति‍ काम कर रही है ऐसी स्‍थि‍ति‍ में समस्‍या को ज्‍यादा समय तक उलझाना नहीं चाहि‍ए। सिंगूर-नंदीग्राम को लंबा खींचने से इतनी व्‍यापक क्षति‍ हुई है कि‍ समूचे राज्‍य में वाममोर्चे के जनसमर्थन में तेजी से गि‍रावट दर्ज की गयी है,लालगढ़ को यदि‍ लंबा खींचा गया तो भवि‍ष्‍य में माकपा को लोकसभा चुनाव से भी ज्‍यादा बड़ी कीमत अदा करनी पड़ सकती है।
माकपा राज्‍य नेतृत्व की यह धारणा रही है कि‍ नंदीग्राम हो या सिंगूर सब लोकल समस्‍या है, इनका स्‍थानीय वि‍धानसभा या लोकसभा क्षेत्र तक ही प्रभाव रहेगा, यही गलत समझ लालगढ़ को लेकर है कि‍ यह आदि‍वासि‍यों, माओवादि‍यों या वि‍पक्ष की स्‍थानीय समस्‍या है इसका व्‍यापक स्‍तर पर कोई असर नहीं होगा। यह समझ बुनि‍यादी तौर पर गलत है। आज पश्‍चि‍म बंगाल ग्‍लोबलाईजेशन के पैराडाइम में है उसका कोई भी आंदोलन लोकल नहीं है बल्‍ि‍क राष्‍ट्रीय प्रभाव छोड़ता है। नंदीग्राम-सिंगूर के राष्‍ट्रीय प्रभाव को हम देख चुके हैं, लालगढ़ का भी राष्‍ट्रीय असर होगा, पहला असर यह होगा कि‍ माओवादि‍यों के दमन के नाम पर बहुत जल्‍दी कोई भी राज्‍य अथवा केन्‍द्र सरकार अर्द्ध सैन्‍यबलों को हजारों की तादाद में माओवादि‍यों के खि‍लाफ झोंकने के पहले छत्‍तीसबार सोचेगी।
लालगढ़ के प्रसंग में यह तथ्‍य भी वि‍चारणीय है कि‍ क्‍या इस समस्‍या को पकाए रखने में पक्ष और वि‍पक्ष की कोई सुचिंति‍त समझ तो नहीं थी। लालगढ़ में मंशा कुछ भी रही हो आज वहां से अर्द्ध सैनि‍क बलों को तुरंत हटाकर शांति‍ स्‍थापना की अपील राज्‍य सरकार करे और पुलि‍स संत्रास वि‍रोधी कमेटी के लोगों को सुरक्षा का वायदा करते हुए बातचीत के लि‍ए बुलाया जाना चाहि‍ए। लालगढ़ के प्रसंग में जो लोग पकड़े गए हैं उन्‍हें तुरंत रि‍हा कि‍या जाए, माओवादि‍यों के साथ बैठकर बातें करके शांति‍पूर्ण समाधान का रास्‍ता नि‍काला जाए। इस पूरी प्रक्रि‍या में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस को बुनि‍यादी तौर पर राजनीति‍क साझीदार बनाया जाना चाहि‍ए। लालगढ़ समस्‍या का समाधान बातचीत से यदि‍ नहीं होता है तो कालान्‍तर में स्‍थि‍ति‍ और भी भयावह हो सकती है,इसबार की स्‍थि‍ति‍ नंदीग्राम से भी ज्‍यादा भयानक और डरावनी होगी।

गुरुवार, 6 अगस्त 2009

लालगढ़ में पुलि‍स मुहि‍म की टांय-टांय फि‍स्‍स

पश्‍चि‍म बंगाल के लालगढ़ इलाके में सैन्‍यबलों के आपरेशन को जो सफलता मि‍लनी चाहि‍ए थी वह नहीं मि‍ली। यह बात मैं नहीं कह रहा,बल्‍कि‍ पश्‍चि‍म बंगाल के गृहसचि‍व ने आज एक प्रेस सम्‍मेलन में सीधे स्‍वीकार की है।लोकसभा पराजय से नि‍कलकर लालगढ़ में अपनी प्रशासनि‍क दक्षता का जो प्रदर्शन माकपा और बुद्धदेव प्रशासन करना चाहता था वह तथाकथि‍त बंदूक का जादू चल नहीं पाया। इसके वि‍परीत लालगढ़ इलाके में माकपा और उसके समर्थकों के जानोमाल पर माओवादी हत्‍यारे गि‍रोहों के हमले और बढ गएहैं।
लालगढ़ में माओवादि‍यों के हिंसाचार की कि‍सी भी तर्क से हि‍मायत नहीं की जा सकती,किंतु राज्‍य प्रशासन ने इस इलाके की जनता का दि‍ल जीतने के लि‍ए कुछ भी नहीं कि‍या उलटे सभी शि‍क्षा संस्‍थानों को बंद कराके पुलि‍स कैम्‍पों में बदल दि‍या,इसके कारण इलाके की जनता और भी भ्‍ाड़क गयी और आए दि‍न प्रति‍वाद होने लगा। यह अभी तर्क के परे है कि‍ पुलि‍सबलों को स्‍कूलों की इमारतों में क्‍यों टि‍काया गया। क्‍या यह साधारण सी बात समझ में नहीं आयी कि‍ अनंत काल तक स्‍कूलों को बंद नहीं रखा जा सकता और मात्र पुलि‍सबलों के सहारे इलाके में शांति‍ स्‍थापि‍त करना संभव नहीं है।
अब लालगढ़ से कैसे लौटें ,यही मूल समस्‍या है। लालगढ़ में पुलि‍स कैंप स्‍थापि‍त होने के बाद से 24 से ज्‍यादा माकपा कार्यकर्त्‍ताओं की हत्‍या हो चुकी है। माओवादि‍यों के नि‍रंतर हमले बढ़ रहे हैं। क्‍या राज्‍य सरकार के पास कोई राजनीति‍क समाधान है जो इस इलाके के माकपा कार्यकर्त्‍ताओं के जानो-माल की हि‍फाजत कर सके। अपने राजनीति‍क जीवन में माकपा इतनी असहाय कभी नहीं रही जि‍तनी लालगढ़ में दि‍ख रही है। अपने कार्यकर्त्‍ताओं को इस तरह मौत के हवाले करके उसने जघन्‍य अपराध कि‍या है।

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