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June, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कोलकाता की बंद गलियां और वोट का खेल

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मुझे याद आ रहा है टॉलीगंज का वह चुनाव जब मैं आशीष दा के लिए चुनाव प्रचार के लिए नुक्कड़ सभाएं कर रहा था। रोज शाम होते ही इस विधानसभा क्षेत्र में नुक्कड़ सभाएं करने निकल पड़ता था। सभाओं को कहां करना है इसका पूरा कार्यक्रम माकपा के राज्य ऑफिस से तैयार होकर मिलता था और पार्टी की स्थानीय शाखाओं को पता रहता था। उस चुनाव से कुछ समय पूर्व तृणमूल कांग्रेस का जन्म हुआ था। आशीष दा के खिलाफ टीएमसी का राज्य अध्यक्ष चुनाव लड़ रहा था। आशीष दा माकपा के श्रेष्ठतम शिक्षकनेता थे, कलकत्ता वि वि में कॉमर्स विभाग में प्रोफेसर थे,वे हमारी पार्टी ब्रांच के सचिव भी थे। इसलिए उनके लिए ज्यादा काम करने पर जोर था। खैर, एक वाकया बेहद पीड़ादायक घटा।

एकदिन मैं टालीगंज इलाके में एक गली में चुनाव सभा के लिए गया। मेरे साथ एक लोकल कॉमरेड था और रिक्शे पर लाउडस्पीकर कसा हुआ था। स्थानीय कॉमरेड मुझे घुमाते हुए एक बंद गली में ले गया और एक ऐसी जगह खड़ा कर दिया जहां गली बंद हो जाती थी, मैंने कहा यहां तो कोई नहीं है और गली बंद है, कोई सुननेवाला नहीं है, वह बोला यहीं मीटिंग करनी है, शाम के सात-साढ़े सात बजे होंगे। मैंने उस क…

कोलकाता और मिथ भंजन

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मैं पहलीबार कोलकाता एसएफआई कॉफ्रेंस में शामिल होने आया था। संभवतः1981-82 की बात है।अनेक मित्र थे जो जेएनयू से इस कॉफ्रेस में डेलीगेट के रुप में आए थे । मुझे याद है कॉफ्रेंस को बीच में आधा दिन का अवकाश करके डेलीगेट को फुटबाल का मैच दिखाने की व्यवस्था की गयी। मैं और अजय ब्रह्मात्मज दोनों मैच देखने की बजाय धर्मतल्ला घूमने चले आए,हमने मैच नहीं देखा। एक मजेदार हादसा हुआ और उसने कोलकाता और वाम राजनीति का पहलीबार एक मिथ तोड़ा। मिथ यह था कि वामदल जहां होते हैं वहां समाज बहुत ही सुंदर और नैतिक दृष्टि से अव्वल होता है।

हम दोनों धर्मतल्ला में मद्रास होटल के आसपास नीचे घूम रहे थे अचानक एक दलाल आया और मेरे कान में धीरे कहने लगा 'छोरी चाहिए छोरी चाहिए'-'चोरी का माल चाहिए ,चोरी का माल चाहिए' , वह लड़कियों का सप्लायर था। अजय मुझसे थोड़ा दूर मूडी बनवा रहा था, मैं घबड़ाकर उसके पास गया और कहा कि सामने जो आदमी देख रहे हो वो यह सब कह रहा है, अजय ने कहा वो मुझसे क्यों नहीं कहता,कुछ देर बाद वो आदमी फिर पास से गुजरा और वही पंक्तियां दोहरा गया। इस घटना ने पहलीबार वाम का मिथ तोड़ा।

ता…

अस्मिता,आम्बेडकर और रामविलास शर्मा

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रामविलास शर्मा के लेखन में अस्मिता विमर्श को मार्क्सवादी नजरिए से देखा गया है। वे वर्गीय नजरिए से जातिप्रथा पर विचार करते हैं। आमतौर पर अस्मिता साहित्य पर जब भी बात होती है तो उस पर हमें बार-बार बाबासाहेब भीमराव आम्बेडकर के विचारों का स्मरण आता है। दलित लेखक अपने तरीके से दलित अस्मिता की रक्षा के नाम पर बाबा साहेब के विचारों का प्रयोग करते हैं। दलित लेखकों ने जिन सवालों को उठाया है उन पर बड़ी ही शिद्दत के साथ विचार करने की आवश्यकता है। आम्बेडकर-ज्योतिबा फुले का महान योगदान है कि उन्होंने दलित को सामाजिक विमर्श और सामाजिक मुक्ति का प्रधान विषय बनाया।
अस्मिता विमर्श का एक छोर महाराष्ट्र के दलित आंदोलन और उसकी सांस्कृतिक प्रक्रियाओं से जुड़ा है ,दूसरा छोर यू.पी-बिहार की दलित राजनीति और सांस्कृतिक प्रक्रिया से जुड़ा है। अस्मिता विमर्श का तीसरा आयाम मासमीडिया और मासकल्चर के राष्ट्रव्यापी उभार से जुड़ा है। इन तीनों आयामों को मद्देनजर रखते हुए अस्मिता की राजनीति और अस्मिता साहित्य पर बहस करने की जरूरत है।
अस्मिता के सवाल आधुनिकयुग की देन हैं। आधुनिक युग के पहले अस्मिता की धारणा का जन…

कोलकाताचेतना नया फिनोमिना

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मैंने 1989 में कलकत्ता विश्वविद्यालय में नौकरी ली और वहां पढ़ाने गया तो दो-तीन दिन बाद स्टाफरुम में जेएनयू के दो पुराने मित्रों से मुलाकात हुई,एक राजनीतिविज्ञान में प्रवक्ता थे और दूसरे विज्ञान में। वे दोनों मिलकर बड़े खुश हुए ,लेकिन तत्काल बोले तुम दिल्ली छोड़कर यहां क्यों आए नौकरी करने ? कोलकाता कोई अच्छी जगह नहीं है। मेरे लिए उनका कथन चौंकाने वाला था।

दूसरी घटना यह घटी कि कोलकाता के दो स्वनाम धन्य हिन्दी शिक्षकों ने मेरे खिलाफ परिचय हुए बिना मोर्चा खोल दिया और रोज अखबारों में मेरे खिलाफ लिखाना आरंभ कर दिया । मेरे खिलाफ रोज एक नयी गॉसिप वे तैयार करके सप्लाई करते। उनके गॉसिप अभियान ने रंग दिखाया और आनंद बाजार पत्रिका से लेकर संडे मेल तक,यहां तक कि स्थानीय हिन्दी अखबारों में भी मेरा इन दो स्वनाम धन्य हिन्दी शिक्षकों ने यश फैला दिया। मजेदार बात थी कि ये दोनों शिक्षक मुझसे नियमित मिलते भी थे और सामने प्रशंसा करते पीछे से चुगली और निंदा करते। इस समूचे प्रकरण ने मुझे पश्चिम बंगाल के हिन्दीभाषी और बंगलाभाषी बुद्धिजीवियों को समझने के अनेक सूत्र दिए।

इस राज्य में हिन्दीभाषीचे…

भाषा की गुलेल

बेहद संवेदनशील और गंभीर शहर है। इसमें महानगर ,गांव और छोटे शहर की मनोदशाएं एक ही साथ तैरती रहती हैं। इन तीनों मनोदशाओं को बाजार से लेकर ऑफिस तक,कॉलेज से लेकर विश्वविद्यालय तक अंतर्क्रियाएं करते देख सकते हैं। यहां इन तीनों मनोदशाओं के साक्षात चित्र भी मिल जाएंगे। इच्छाओं का ऐसा संगम अन्यत्र कम ही देखने को मिलता है। यह तय करना मुश्किल है कि इस शहर का ड्राइवर कौन है ? महानगरीय भावबोध या ग्रामीण भावबोध ?

यह ऐसा शहर है जिसके सामान्य बहस मुबाहिसे में गरीब-मेहनतकश के स्वर-दुख,भाषा,भाषिक मुहावरे और जरुरतों को आप चलते फिरते सुन सकते हैं,महसूस कर सकते हैं। विभिन्न समस्याओं पर लोग बातें करते,भाषण देते मिल जाएंगे,और एक ही नारा सब जगह मिलेगा,'गरीब की कौरे वांचबे',या गरीब कैसे जिंदा रहेगा ?

महंगाई पर बात करो यही टेक सुनने को मिलेगी, वाम और दक्षिण राजनीति पर बात करो तो यह टेक सुनने को मिलेगी। मेहनतकशों और ग्रामीणों की भाषा और उससे जुड़े मुहावरे ,टेक और संस्कृति को आप यहांके बाजारों में तैरते हुए महसूस कर सकते हैं। जिंदादिली और व्यंग्य में वाद-विवाद का तो खैर कोलकाता में जो आनंद है…

कमाऊ चेतना के हिन्दीभाषी

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सन् 1989 से पहले कोलकाता दो बार आया था।एकबार एसएफआई के राष्ट्रीय अधिवेशन के समय और दूसरीबार अपनी शादी के समय।लेकिन कोलकता को समझने का मौका तब ही मिला जब 1989 में कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रवक्ता पद पर नौकरी मिली। उसके बाद ही कोलकाता के हिन्दीभाषी बुद्धिजीवियों और बंगाली बुद्धिजीवियों को करीब से देखने और जानने का मौका मिला।

पहले दो अनुभव बड़े ही शानदार रहे। मैंने एकदिन एक कार्यक्रम के सिलसिले में अभिनेता उत्पल दत्त को फोन किया, मैंने फोन पर उनसे लंबी बातचीत की।मैं बेहद खुश हुआ कि फोन उन्होंने ही उठाया था। मैं चाहता था कि कोलकाता के 300साल होने पर वे बोलें। मेरा प्रस्ताव सुनकर वे बेहद खुश हुए काफी बातें भी कीं,बोले, मैं इनदिनों अस्वस्थ चल रहा हूँ वरना मैं जरुर जाता। उसके बाद मैंने रंगमंच के बड़े अभिनेता अरुण मुखर्जी को फोन किया उनसे मिलने घर गया,लंबी बातचीत हुई,वे कार्यक्रम में आए भी। उनसे बातचीत में पता चला कि उत्पल दत्त और सत्यजित राय दोनों अपना फोन स्वयं उठाते हैं और घर पर आने वाले को दरवाजे तक छोड़ने भी जाते हैं। यह शिष्टाचार बहुत ही अच्छा लगा।

मजा तब आया जब …

थानेदार यूजीसी का बेसुरापन

डीयू में बीए में दाखिले को लेकर यूजीसी रोज सर्कुलर इस तरह जारी कर रहा है गोया वो छात्रों का सबसे बड़ा रखवाला हो ! सच यह है यूजीसी केन्द्र सरकार का पिछलग्गू संस्थान है। दिविवि और यूजीसी की टकराहट में विवि प्रशासन के जिद्दीभाव ने काफी मुश्किलें खड़ी की हैं। मुझे एक वाकया याद आ रहा है सन् 1983 में जेएनयू में किसी समस्या पर आंदोलन हुआ जेएनयू प्रशासन और छात्रों के बीच टकराव हुआ।समूचा छात्र आंदोलन कुचल दिया गया। नरसिंहा राव शिक्षामंत्री थे। मैं उन दिनों जेएनयू में एसएफआई का अध्यक्ष था।छात्रसंघ पर समाजवादी युवजनसभा का कब्जा था। समूचा छात्र समुदाय एकजुट होकर संघर्ष कर रहा था।

छात्र आंदोलन का दमन करते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन ने विश्वविद्यालय को अनिश्चितकाल के लिए बंद कर दिया। छात्रावास खाली करा दिए गए। यह आंदोलन मई1983 में हुआ था। विश्वविद्यालय प्रशासन ने सभी नियम कायदे तोड़कर सारी नीतियां बदल दीं। किसी से राय नहीं ली,किसी की राय नहीं सुनी। छात्र,शिक्षक,कर्मचारी संगठनों की राय नहीं मानी और नहीं विभागों में बैठक हुई,नहीं बोर्ड आफ स्टैडीज की मीटिंग हुई।

जेएनयू की सारी नी…

डीयू शिक्षक आंदोलन के अछूते प्रश्न

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डीयू के शिक्षक आंदोलन कर रहे हैं, वे बड़े आंदोलन कर चुके हैं और अनेक आंदोलन जीत भी चुके हैं,यह भी सच है उनके अंदर अपने शिक्षकों के हितों की रक्षा का भाव बड़ा प्रबल है। शिक्षकों में इस तरह का जागरुक संगठन सभी कॉलेज-विश्वविद्यालयों में होता तो बहुत अच्छा होता। मैंने निजी तौर पर उनके अनेक संघर्षों में समर्थक के नाते हिस्सा भी लिया है। वहां संगठन करने वाले नेताओं में एक अच्छा-खासा अंश बेहद संवेदनशील और जागरुक है। लंबे संघर्षों को लड़ने का जो तजुर्बा डीयू के शिक्षकसंघ के पास है वैसा अनुभव अन्यत्र किसी भी विश्वविद्यालय के शिक्षक संगठन को नहीं है।

शिक्षकों के अनेक मूल्यवान हकों को दिलाने में डीयू शिक्षकसंघ की महत्वपूर्ण और नेतृत्वकारी भूमिका रही है। लेकिन इसके साथ ही यह भी सच है कि डीयू के शिक्षकसंघ का इस विश्वविद्यालय के अकादमिक स्तर को ऊँचा उठाने में बहुत कम योगदान है। मसलन् शिक्षकों के द्वारा अकादमिक जिम्मेदारियों का ठीक से पालन हो इस ओर शिक्षकसंघ ने ध्यान ही नहीं दिया। इस विश्वविद्यालय के शिक्षकों के पास भारत में सबसे अधिक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुविधाएं हैं, संसाधन हैं,प…

अंतहीन आंदोलन,हिंसाचार और डीयू

विश्वविद्यालय स्वायत्त नहीं होते। स्वायत्तता धोखा है।स्वायत्तता कभी नहीं रही।वीसी चमचा होता है।हमेशा अपने चमचों से एसी भर लेता है। एसी का वो मनमानी के लिए दुरुपयोग करता है। सरकार के एजेंट की तरह काम करता है। हठात ये सारे तर्क उनसे सुनने को मिल रहे हैं जो कल तक विश्वविद्यालयों के बारे में हर आंदोलन में यह कहते थे कि हमें हर हालत में विश्वविद्यालय की स्वायत्तता की रक्षा करनी चाहिए। ये सारी बातें दिल्ली विश्वविद्यालय के चारसाला पाठ्यक्रम (FYUA) को यूजीसी द्वारा वैध घोषित किए जाने के कारण नए सिरे से उठी हैं।

मेरी दि वि वि के प्रशासन या उसके चार साला पाठ्यक्रम के साथ कोई निजी सहानुभूति या विरोध नहीं है। मैं वस्तुगत तौर पर एक राजनीतिक नजरिए से देख रहा हूँ। चीजें साफ ढ़ंग से नजर आएं इसके लिए एक अनुभव बताता हूँ।

मैंने कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर पद पर पदोन्नति हेतु सन्2000 में आवेदन किया और सारी प्रक्रिया पूरी होने के बाद 2001 में मैं प्रोफेसर हो गया।यह मेरा समूचे अकादमिक जीवन में एकमात्र प्रमोशन था। मैं मात्र 11 साल के शैक्षणिक अनुभव के बाद ही प्रोफेसर बन गया…

" अपनी अपनी आधुनिकता " के बहाने

हरबंस मुखिया ने तद्भव पत्रिका ( अप्रैल २०१३)में " अपनी अपनी आधुनिकता "शीर्षक से एक लेख लिखा है ।
आधुनिकता के जिन कारकों का उन्होंने ज़िक्र किया है उनमें अधिकांश कारक इतिहास विमर्श में पुंसवाद की कोटि में आते हैं फलत:इससे जो विमर्श बनता है वह पुंसवाद की सीमाओं का अतिक्रमण नहीं कर पाता ।

इस लेख में आधुनिकता के जिन कारकों का ज़िक्र किया गया है वे सभी प्रचलन में हैं और उनके विभिन्न देशों में अनुयायी भी हैं। आधुनिकता का कोई भी विमर्श स्त्री और वर्णव्यवस्था या जातिप्रथा के प्रति परिवर्तनकामी नजरिए के बिना नहीं बनता। मुखिया ने इन दोनों ही पहलुओं की अनदेखी की है। वे अपने लेख में स्थल और समय को ही आधार बनाते हैं। दिलचस्प बात है कि वे आधुनिकता के सभी किस्म के आधारों की चर्चा करते हैं लेकिन स्त्री और वर्णव्यवस्था को उसमें शामिल नहीं करते।

सवाल यह है कि आधुनिक या आधुनिकता की कोई परिभाषा स्त्री के बिना संभव है ? आधुनिकता की कोटियाँ स्त्री को नजरअंदाज क्यों करती हैं ?


आधुनिकता के सभी विमर्श इसीलिए अधूरे साबित हुए हैं क्योंकि वे स्त्री की मुक्ति के सवालों को सम्बोधित नहीं करते ।हरिवंश म…

दिल्ली विश्वविद्यालय का खेल - मोदी सरकार की पहली पराजय

विश्वविद्यालय स्वायत्तता अपहरण का एक खेल दिल्ली में चल रहा है। इस खेल में संयोग से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ,माकपा और भाजपा एक ही मंच पर आकर मिल गए हैं। इस खेल की खूबी है कि ये तीनों खिलाडी संविधान,अकादमिक स्वायत्तता और बौद्धिक स्वतंत्रता इन तीनों का मखौल उडाने में लगे हैं।

विगत सप्ताह मोदी सरकार आने के बाद यूजीसी ने दिल्ली विश्वविद्यालय को सर्कुलर भेजकर चार साला बीए कोर्स बंद करने का निर्देश दिया ,वह पूरी तरह असंवैधानिक है। यूजीसी इस तरह का आदेश किसी भी विश्वविद्यालय को नहीं दे सकता। सवाल यह है कि यूजीसी ने जब यह कोर्स लागू किया गया उस समय यह राय क्यों नहीं दी ?

यूजीसी सुझाव दे सकती है.आदेश नहीं। यूजीसी के आदेशों की हकीकत यह है कि गुजरात में अभी तक कॉलेज-विश्वविद्यालयों में छठे वेतन आयोग के आधार पर बने वेतनमान लागू नहीं हुए हैं। पश्चिम बंगाल में शिक्षकों का छठे वेतनमान के आधार पर वेतन मिला लेकिन बकाया धन अभी तक नहीं मिल पाया है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जो दिए जा सकते हैं। मूल बात यह है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता में हस्तक्षेप करने का को…

हिन्दीभक्तों का भाषायी बेगानापन

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मोदी सरकार ने आते ही राजभाषा के तौर पर प्राथमिकता के साथ हिन्दी में काम करना आरंभ कर दिया है। इसके परिणामों के बारे में हम कुछ साल बाद चर्चा करेंगे। इस पर भी बाद में ही चर्चा करेंगे कि हिन्दी इस तरह मजबूत होती है या दुबली-पतली ही रहती है। इस समूचे प्रसंग में बुनियादी बात यह है कि कोई भी भाषा सरकारी मदद से ताकतवर नहीं बनती। यदि ऐसा ही था तो अंग्रेजी को तो घर घर की भाषा होना चाहिए था।

भाषा की जमीन शिक्षा और निजी दैनंदिन व्यवहार पर निर्भर करती है। हमसब हिन्दीभाषी मध्यवर्गीय लोगों की मुश्किल यह है कि हमारा अपनी भाषा से खोखला लगाव है। यह स्थिति अन्य भारतीय भाषाओं की भी है। आजादी के बाद जो मध्यवर्ग पैदा हुआ है वह स्वभाव और विचार से अपनी भाषा से कोसों दूर है। हिन्दी भाषी में अपनी भाषा को लेकर जिस तरह का बेगानापन है वैसा ही बेगानापन मराठी-मलयाली या बंगाली में भी अपनी भाषा को लेकर मिलेगा।

विचारणीय सवाल यह है कि हमारे देश की जनता का शिक्षितवर्ग अपनी भाषाओं से दूर कैसे चला गया ? वे कौन से कारण हैं जिनकी वजह से वह अपनी भाषा से प्यार तो करता है लेकिन लिखने-पढ़ने के लिए उसे गैर जरुरी म…

चटपटे गोलगप्पों की हिमायत में

कोलकाता आएं और फुचका न खाएं यह हो नहीं सकता। कोलकाता में रहें और फुचका न खाएं यह भी हो नहीं सकता। फुचका के खोमचे पर जाएं और औरतें नजर न आएं यह भी हो नहीं सकता। फुचका वाला किसी कच्ची बस्ती में न रहता हो यह भी हो नहीं सकता। दिल्ली में इसे गोलगप्पे कहते हैं और मैं जब मथुरा रहता था तो वहां टिकिया कहते थे। शाम को अमूमन टिकिया खाने की आदत सी पड़ गयी थी। मैं आज भी गोलगप्पे को टिकिया कहता हूँ।      कोलकाता की पहचान में जहां एक ओर लालझंडा है,छाना की मिठाई और रसगुल्ला है। वहीं दूसरी ओर फुचका भी है। फुचका बनाने और बेचने वाले अधिकांश लोग हिन्दीभाषी हैं। जिह्वा सुख के लिए,स्वाद को चटपटा बनाने या मोनोटोनस स्वाद से छुट्टी पाने के लिए जब भी कुछ चटपटा-खट्टा खाने की इच्छा होती है फुचका मददगार साबित होता है।      फुचका औरतों का प्रिय खाद्य है,इसलिए इसके साथ जेण्डर पहचान भी है। फुचका शौकीनों में औरतों की संख्या ज्यादा है। मैं नहीं जानता कि बाजार में बिकने वाले अन्य किसी खाद्य के साथ जेण्डर पहचान इस तरह जुडी हो। औरतों के साथ फुचका का जुड़ना कई मजेदार पहलुओं की ओर ध्यान खींचता है , आमतौर पर औरतें घरेलू का…

जनता के स्वाद का बादशाह हलवाई

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हलवाई के बिना बाजार और जीवन में मजा नहीं है। हलवाई हमारे बाजार की शोभा हुआ करते थे उनसे ही बाजार या इलाके पहचान थी। छोटे शहरों में हलवाई लोकल पहचान का संकेत था। हलवाई को मैं समानान्तर बाजार मानता हूँ। एक तरफ विभिन्न किस्म के दुकानदार और दूसरी ओर हलवाई की दुकान। हलवाई लंबे समय से बाजार के परंपरागत खाद्य उद्योग की धुरी रहा है। हलवाई कब दुकान पर आया ? कब घर तक चला आया और कब हलवाई का सामाजिक कायाकल्प हो गया हमने कभी ध्यान ही नहीं दिया।

भारत में हलवाई परिवार की रसोई और मेहमाननबाजी का भागीदार होकर आया,जब भी पहला हलवाई आया होगा वह निश्चित तौर पर प्रगतिशील रहा होगा। घर के बाहर हलवाई की बनी चीजें खाना या उन चीजों को घर में लाकर खाने की परंपरा तब ही आई होगी जब हमारे समाज के कुछ अतिरिक्त धन बचता होगा। हलवाई की बनी चीजें पुराने वर्णसमाज के तंत्र,मूल्यबोध और तयशुदा आदतों को तोड़ने में मदद करती रही हैं।

हलवाई ने भोजन की निजता में एक नयी कोटि भोजन की सामाजिकता को शामिल किया। हमारे यहां भोजन निजी होता था और निजी व्यक्ति के विस्तारित संबंधों को ही हम दावतों में बुलाकर सामाजिकता निभाते थे। लेक…

जनतापूजा और उसके भक्तलेखक!

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इस बार के लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी और भाजपा की जीत हुई है।उसे भारत की जनता ने वोट देकर सत्ता सौंपी है। भाजपा कई राज्यों में पहले भी चुनाव जीतती रही है। इसके पहले एनडीए के नेतृत्व में भाजपा को पहले भी केन्द्र में शासन करने का मौका मिला है। समस्या भाजपा की जीत की नहीं है ,फिलहाल मूल समस्या यह है जनता को कैसे देखें ?

जनता कोई बुद्धिहीन और विचारधाराहीन आधारों पर न तो जीती है और नहीं वोट देती है। जनता की भी अपनी विचारधारा है। यह कहना सही नहीं है कि जनता की कोई विचारधारा नहीं होती। जनता मात्र वोटबैंक नहीं है कि परेशान हुई और वोट दे आयी। जनता को अमूर्त और विचारधाराहीन मानना सही नहीं है। जो लोग जनता की चेतना में व्याप्त विचारधाराओं को नहीं देखते वे यथार्थ देखने का विभ्रम खड़ा करते हैं।

सच यह है कि जनता में आधुनिक वैज्ञानिक विचारधाराओं के प्रचार-प्रसार की हमने कोशिश ही नहीं की। हमने यह मान लिया कि जनता महान है और उसके वोट से जीतने वाले नेता उससे भी महान हैं। जनता और चुने हुए प्रतिनिधियों की विचारधारा को देखने का यह तरीका सबसे खतरनाक और सब्जेक्टिव है।

लंबे समय …

नए मतवाले

एक जमाना था नारा लगता था 'जीना है तो मरना सीखो ,कदम-कदम पर लडना सीखो। 'लेकिन अब यह नारा कहीं गुम हो गया है। अब तो एक ही नारा है 'जीना है तो तिकड़म सीखो।'

तिकड़म की कला में जो लोग पलकर बड़े हुए हैं वे इन दिनों मतवालों की तरह घूम रहे हैं। वे सारी दुनिया से बेखबर हैं। उनकी चिंता में फेसबुक है ,चैटिंग है,फिल्मों की गॉसिप है,लुभावने रसीले किस्से हैं। वे मोदी के दीवाने हैं,कारपोरेट कल्चर के फेन हैं।उनको अन्ना अच्छा लगता है क्योंकि वो हर आंदोलन को टीवी इवेंट बनाता है।

वे संघर्ष को टीवी इवेंट के रुप में देखना पसंद करते हैं। लेकिन आश्चर्यजनक बात है कि इन दीवानों को अफगानिस्तान,श्रीलंका,इराक आदि के कत्लेआम प्रभावित नहीं करते। वह तो यही मानकर चल रहे हैं कि इस्लामिक देशों में तो हिंसाचार आम बात है। मुसलमानों को तो लड़ लड़कर मर जाना चाहिए। उसे इससे भी कोई लेना देना नहीं है कि आर्थिकमंदी से कौन कितना प्रभावित हो रहा है। वह तो अपने कैरियर और कम्पटीशन की तैयारी के अंग के रुप में मंदी और अन्य सामयिक खबरों पर नजर रखे हुए है। क्योंकि उसे अपडेट रखना है, कहीं पेपर खराब न हो…

कातिलों के बाराती

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वे नशे की दुनिया में ले जा रहे हैं। वे हमें मनोरंजन-ज्ञान-राजनीति आदि कुछ इस तरह खिला-पिला रहे हैं कि हम चटखोर हो गए हैं ,उनके दिए को पाने को तरसते हैं। वे हमें जालिम बना रहे हैं, और हमें समझा रहे हैं कि वे आदमी बना रहे हैं। जबकि वे हमें निठल्ला बना रहे हैं, उपभोक्ता बना रहे हैं।कह रहे हैं हुनरमंद ,कौशलपूर्ण,तकनीकी गुरों में मास्टर बना रहे हैं।

हम खुश हैं कि हम हुनरमंद बन रहे हैं,कंज्यूमर बन रहे हैं, हम खुश हैं कि हम किसी संगठन में नहीं हैं, हम खुश हैं कि हमने मार्क्सवाद से पल्ला झाड़ लिया है, मजदूरों के संगठनों और नेताओं से दूरी बना लीहै, हम खुश हैं कि हमारे देश में कम्युनिस्ट खत्म होते जा रहे हैं, हम खुश हैं कि परिवर्तन की लडाई अब बेमानी और बेअसर हो गयी है। हम खुश हैं कि हमने विकासदर के लक्ष्य हासिल करने शुरु कर दिए हैं, हम खुश हैं सेंसेक्स उछल रहा है लुढ़क रहा है।हम खुश हैं कि हमारा पीएम लिखा भाषण नहीं पढ़ता, हिन्दी में बोलता है,दहाड़ता है, हम खुश हैं कि उसका सीना 56 इंच का है।

लेकिन हम भूलते जा रहे हैं कि वे हमें कातिलों का बाराती बना रहे हैं। वे हमें कातिल बनने की कला सिखा रहे …

औरत को थाने नहीं महिला संगठन चाहिए

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औरतों के साथ बलात्कार और हिंसाचार थमने का नाम नहीं ले रहा। पहले कहा गया सख्त कानून बनाओ,निर्भया कांड के बाद कानून सख्त बन गया। अब बदायूं कांड के बाद के कह रहे हैं सख्त सरकार बनाओ,वह भी बन जाएगी, धैर्य रखो, लेकिन पहले यह तो सोचो भाजपा की सख्त-ताकतवर सरकार मध्यप्रदेश में है और दिल्ली में भी है, लेकिन बलात्कार और हिंसाचार थम नहीं रहे हैं।बलात्कारी न तो कानून से डर रहे हैं और न सख्त सरकारों से। वे इतने निडर क्यों हैं ?

औरतों के साथ हिंसाचार कानून और सरकार बदलने मात्र से नहीं थमेगा। औरतों को संगठित होकर लंबे संघर्ष के लिए कमर कसनी होगी। औरत की सुरक्षा का मामला मात्र जेण्डर प्रश्न नहीं है, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का सवाल है।पितृसत्ता के वर्चस्व के सभी रुपों के खिलाफ संघर्ष का मामला है। यह औरत के स्वभाव को बदलने का मामला भी है।

औरतों की लड़ाई कानूनी लडाई नहीं है और नहीं यह सरकार पाने की लडाई है ,वह सामाजिक परिवर्तन की लडाई है ,इसमें जब तक औरतें सड़कों पर नहीं निकलेंगी और निरंतर जागरुकता का प्रदर्शन नहीं करेंगी, तब तक स्थितियां बदलने से रहीं । इन दिनों पुंस हिंसाचार का ज…

मार्क्सवाद की दुखती रग

कल पुराने मित्र कैसर शमीम साहब से लंबी बातचीत हो रही थी। वे मोदी के चुनाव में जीतकर आने के बाद से बेहद कष्ट में थे और कह रहे थे कि मैं तो सोच ही नहीं पा रहा हूँ कि क्या करुँ ? वे राजनीतिक अवसाद में थे। हमदोनों जेएनयू के दिनों से भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) से जुड़े थे। वे जेएनयू में पार्टी में आए थे,मैं मथुरा से ही माकपा से जुडा हुआ था। कैसर साहब ने एक सवाल किया कि आखिरकार माकपा के सदस्य या हमदर्द भाजपा में क्यों जा रहे हैं ? माकपा का आपको पश्चिम बंगाल में क्या भविष्य नजर आता है ?  मैंने उनसे जो बातें कही वे आप सबके लिए भी काम आ सकती हैं इसलिए फेसबुक पर साझा कर रहा हूँ ।
     मैंने कैसर शमीम से कहा कि माकपा को पश्चिम बंगाल में दोबारा पैरों पर खड़ा होना बहुत ही मुश्किल  है। माकपा इस राज्य में समापन की ओर है। इसके कई कारण हैं जिनमें प्रधान कारण है माकपा का लोकतंत्र में हार-जीत के मर्म को न समझ पाना या समझकर अनदेखा करना।      लोकतंत्र में चुनावी हार-जीत को हमें गंभीरता से लेना चाहिए। जो नेता हार गए हैं या जिन नेताओं के नेतृत्व में पार्टी हारी है वे आम जनता में घृणा के पात्र ब…