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October, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ज़िंदादिल इंसान अजय नाथ झा

आज सुबह फेसबुक खोलते ही शेषनारायन सिंह की वॉल से ख़बर मिली कि अजय झा नहीं रहे, बहुत दुख हुआ, वह जेएनयू के साथियों का अज़ीज़ मित्र था। हम दोनों सतलज छात्रावास में कई साल एक साथ रहे, एक साथ खाना और घंटों बतियाना, लंबी बहसें करना रोज़ की आदत थी, अजय की रुचियाँ विलक्षण थी वह जेएनयू में सांगठनिक राजनीति में शामिल नहीं था लेकिन एसएफआई के साथ उसका स्वाभाविक लगाव हुआ करता था वह हम सबका कटु आलोचक भी था, मैं उन दिनों एसएफआई का अध्यक्ष हुआ करता था ,अजय आए दिन अपनी कटु से कटु आलोचनाएँ शेयर करता और गहरे मित्रतापूर्ण भाव को बनाए रखता था।        अजय ने जेएनयू के चुनावआयोग अध्यक्ष के रुप में काम करके ख़ूब शोहरत हासिल की, यह उसका सबसे पसंदीदा काम था ,इसके अलावा तबला बजाना और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के संचालन में उसे ख़ूब मज़ा आता था. विगत ढाई दशक से भी ज़्यादा समय से वह मीडिया में सक्रिय था और अंतराष्ट्रीय विषयों पर उसे महारत हासिल थी, जेएनयू के बहुत कम स्कालर हैं जो अंतरराष्ट्रीय विषयों पर मीडिया में निरंतर लिखते रहे हैं।       लंबे अंतराल के बाद अजय से फेसबुक के जरिए मुलाक़ात हुई और वह संपर्क में निरं…

''हैदर'' यानी कश्मीरियत की त्रासदी

''हैदर'' फिल्म पर बातें करते समय दो चीजें मन में उठ रही हैं। पहली बात यह कि कश्मीर के बारे में मीडिया में नियोजित हिन्दुत्ववादी प्रचार अभियान ने आम जनता में एक खास किस्म का स्टीरियोटाइप या अंधविचार बना दिया है। कश्मीर के बारे में सही जानकारी के अभाव में मीडिया का समूचा परिवेश हिन्दुत्ववादी कु-सूचनाओं और कु-धारणाओं से घिरा हुआ है। ऐसे में कश्मीर की थीम पर रची गयी किसी भी रचना का आस्वाद सामान्य फिल्म की तरह नहीं हो सकता। किसी भी फिल्म को सामान्य दर्शक मिलें तब ही उसके असर का सही फैसला किया जा सकता है। दूसरी बात यह कि हिन्दी में फिल्म समीक्षकों का एक समूह है जो फिल्म के नियमों और ज्ञानशास्त्र से रहित होकर आधिकारिकतौर पर फिल्म समीक्षा लिखता रहता है। ये दोनों ही स्थितियां इस फिल्म को विश्लेषित करने में बड़ी बाधा हैं। फिल्म समीक्षा कहानी या अंतर्वस्तु समीक्षा नहीं है।

''हैदर'' फिल्म का समूचा फॉरमेट त्रासदीकेन्द्रित है। यह कश्मीरियों की अनखुली और अनसुलझी कहानी है। कश्मीर की समस्या के अनेक पक्ष हैं।फिल्ममेकर ने इसमें त्रासदी को चुना है।यहां राजन…

धर्म आनंद और आराम की जुगलबंदी

धर्ममंदिरों और संतों के आश्रमों का धार्मिकता से बुनियादी सम्बन्ध खत्म हो गया है। खासकर आजादी के बाद के वर्षों में धर्मकेन्द्र और संतकेन्द्र अब आनंद –आराम केन्द्र बन गए हैं। धर्मकेन्द्र और संतकेन्द्र आजादी के पहले धार्मिकता के प्रचार के केन्द्र हुआ करते थे लेकिन इन दिनों यह फिनोमिना बदल गया है। देशी पूंजीवाद के विकास और पूंजीसुख के बढ़ते संसार ने जीवनशैली को रुपान्तरित किया है,इसका धर्म पर भी असर पड़ा है। धर्म-संत केन्द्रों का सारे देश में नियोजित उद्योग की तरह विकास हुआ है। अब इन केन्द्रों पर आनंद-आराम –जीवनशैली और स्वास्थ्य का खासतौर पर ख्याल रखा जाता है।
     स्वातंत्र्योत्तर दौर में पैदा हुए धर्म-संत समाज ने मासकल्चर के साथ अपना सम्बन्ध विकसित किया है।इनके यहां धर्म के मासकल्चर रुपों पर खासतौर पर जोर है। पहले धर्म को साधना के रुप में देखा जाता था,लेकिन मासकल्चर के साथ सम्बन्ध बनाने के कारण अब यही धर्म-संतकेन्द्र 'उपभोग' पर जोर देते हैं। इस तरह वे पूंजीवादी बाजार का विस्तार और विकास भी करते हैं। पूजा-पाठ-उपासना आदि इनमें गौण है और आनंद-आराम प्रमुख चीज है। स्वामीनार…

गऊमांस का सवाल और चरक संहिता

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फेसबुक पर सक्रिय ''हिन्दू परंपरा ज्ञानी''मित्रों के लिए हम सुश्रुत रचित चरक संहिता से एक कहानी दे रहे हैं और यह कहानी बहुत कुछ कहती है।कहानी इस प्रकार है-
चरक संहिता में अतिसार यानी दस्त की बीमारी के प्रसंग में यह कहानी आई है- (अतिसार विषयक अग्निवेश की जिज्ञासा का उत्तर देते हुए भगवान पुनर्वसु आत्रेय कहते हैं कि हे अग्निवेश! सुनोः) आदिकाल में यज्ञों में पशु समालभनीय(यज्ञ में पशु आमंत्रित और पूजित करके छोड़ दिए जाते थे) होते थे किंतु यज्ञ में पशुओं का वध नहीं किया जाता था।इसके बाद दक्ष प्रजापति के बाद के समय में मनु के पुत्रों ने यज्ञों में पशुओं की हत्या करने की प्रथा शुरु की तथा पशुओं को आमंत्रित कर वधकिया जाने लगा ।पशुओं के वध की यह क्रिया वेदाज्ञा के अनुसार ही होती थी।इसके बाद के समय में राजा पृषध्र ने एक बहुत दिन चलने वाले यज्ञ का समारंभ किया। यज्ञ में निरंतर अन्य पशुओं का वध होता रहा।जब यज्ञ में बहुत अधिक पशुओं की हत्या हो जाने के कारण पशु नहीं मिलने लगे तो गौओं का वध आरंभ किया। यह देखकर जगत के प्राणी मात्र अत्यंत दुखी हुए।जब इन वध की गई गौओं का मांस खाया गया तो …

आधुनिक गुलाम की हरकतें

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कलात्मक मीडिया पर्सुएशन कला आधुनिक दास समाज की कुंजी है। पहले गुलाम बनाए जाते थे अब गुलाम बने-बनाए मिलते हैं। पहले गुलामों पर मालिक का शारीरिक नियंत्रण होता था,इन दिनों गुलामों पर मालिक शारीरिक और मानसिक नियंत्रण रखते हैं। गुलाम भाव सबसे प्रियभाव है। यह ऐसा भाव है जिसका सामाजिक स्तर पर व्यापक उत्पादन और पुनर्रुत्पादन हो रहा है। नव्य- पूंजीवाद के मौजूदा दौर में मालिक का नौकर के शरीर और मन पर पूरा नियंत्रण रहता है। काम के घंटे अब आठ नहीं होते बल्कि 10,12,या 16 घंटे तक कर्मचारी से काम लिया जाता है। इस कर्मचारीवर्ग में एक बड़ा समूह ऐसे कर्मचारियों का है जिसकी नौकरी अस्थायी है ,जो ठेके पर काम करता है।जो चंचल मजदूर है। लेकिन गुलाम भाव में जीने वाले कर्मचारियों में एक बड़ा समूह उन लोगों का भी है जो पक्की नौकरी करते हैं , मोटी पगार पाते हैं। येन-केन प्रकारेण सत्ताधारी वर्ग से चिपके रहना इनके स्वभाव का अंग है। इस समूचे समुदाय में तानाशाही के प्रति स्वाभाविक रुझान है। यही वह वर्ग है जो जीवन में पोंगापंथ,अंधविश्वास और उपभोक्तावाद का सबसे बड़ा उपभोक्ता भी है। इस वर्ग में परजीविता कूट-कूटकर…

संघ प्रमुख के डीडी प्रसारण और मोदी के ट्वीट से उठे सवाल

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के विजयादशमी सम्बोधन के दूरदर्शन से प्रसारण को लेकर काफी आलोचनाएं सामने आई हैं ,आलोचकों ने जो सवाल उठाए हैं वे सही हैं।लेकिन वे सभी प्रसारण को राजनीतिक पहलू से देख रहे हैं। समस्या प्रसारण की नहीं है समस्या दूरदर्शन की समाचार नीति या संहिता के उल्लंघन की है। समाचार संपादक ने समाचार संहिता का उल्लंघन करके अपराध किया है और उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।सवाल उठता है दूरदर्शन अब तक जो समाचार नीति अमल में लाता रहा है क्या वह बदल गयी ?यदि बदली है तो कब और उसमें क्या संशोधन लाए गए हैं ? दूरदर्शन के द्वारा जो समाचार नीति अमल में लायी जाती है उसमें साम्प्रदायिक-पृथकतावादी-धार्मिक संगठनों के लाइव प्रसारण के लिए कोई स्थान नहीं है। यह निर्विवाद तथ्य है कि संघ का चरित्र साम्प्रदायिक है और इस पर संसद से लेकर सड़कों तक अधिकांश राजनीतिकदल एकमत हैं। संघ के विजयादशमी जलसे का इससेपहले मेरी जानकारी में दूरदर्शन से लाइव प्रसारण कभी नहीं हुआ है। जबकि यह संगठन 90 साल पुराना है। यदि दूरदर्शन ने साम्प्रदायिक-आतंकी-पृथकतावादी-धार्मिक संगठनों के नेताओं के भाषणों के लाइव प्रसा…

टीवी इवेंट के परे स्वच्छ भारत का सपना !

प्रधानमंत्री मोदी के स्वच्छता अभियान से किसी को मतभेद नहीं हो सकता। समस्या नीति और नज़रिए की है। इस अभियान में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सारी सदइच्छाएं टीवी फ़ोटो कवरेज से आगे नहीं जा रही हैं । उनके इस मसले पर सभी भाषण और राजनीतिक आचरण में भी प्रदर्शनप्रियता ही प्रमुख है।     स्वच्छता की समस्या सफ़ाई का नया सिस्टम बनाने, सफ़ाई के सिस्टम में लगे लोगों के हितों और माँगों पर ग़ौर करने से जुड़ी है। भारत में इससे मिलता जुलता अभियान कांग्रेस ने 'निर्मल भारत' के नाम से यूपीए सरकार के शासन में आरंभ किया था लेकिन वह फ़ाइलों में दबा रह गया। मोदी ने उसे इवेंट और स्टंट बना दिया है!    सफ़ाई अभियान को टीवी फोटोशूट तक ले जाने में मोदी सफल रहे लेकिन 'स्वच्छता नीति 'की घोषणा नहीं कर पाए । इससे यह भी पता चलता है कि मोदी इस देश को किस तरह चलाना चाहते हैं ?  मोदी इवेंट और जलसे -मेले-ठेले की राजनीति के जरिए देश को चलाना चाहते हैं ,इनके लिए समय दे रहे हैं लेकिन कोई बनाने के लिए उनके पास कोई समय नहीं है। यदि सरकार के मंत्रियों के काम करने की गति देखें तो वहाँ पर भी कोई पहलकदमी नजर नहीं आत…