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मंगलवार, 9 अगस्त 2016

कार्ल मार्क्स पखवाडा- इतिहास निर्माता कौन ॽ

        इन दिनों हमारे राजनेता और उनके भोंपू और टीवी चैनल आए दिन यह प्रचार कर रहे हैं कि पीएम नरेन्द्र मोदीजी देश का नया इतिहास बना रहे हैं! उनके पहले कांग्रेस के नेतागण यह कहते रहे हैं नेहरू ने इतिहास रचा !सवाल यह है क्या इतिहास का निर्माण नेता करते हैं ॽ क्या इतिहास की सृष्टि किसी विचारधारा विशेष के जरिए होती है ॽइस तरह के तर्क बुर्जुआनेता और विचारक लंबे समय से देते रहे हैं।

इस तरह के तर्कों का उत्तर देते हुए कार्ल मार्क्स ने ´लूई बोनापार्ट की अठारहवीं ब्रूमेर´ में लिखा ´मानव-जन अपना इतिहास स्वयं बनाते हैं,पर अपने मनचाहे ढ़ंग से नहीं।वे उसे अपन मनचाही परिस्थितियों में नहीं,अपितु ऐसी परिस्थितियों में बनाते हैं जो उन्हें अतीत से प्राप्त और अतीत द्वारा सम्प्रेषित होती हैं और जिनका उन्हें सीधे-सीधे सामना करना पड़ता है।सभी मृत पीढ़ियों की परम्परा जीवित मानव के मस्तिष्क पर एक दुःस्वप्न के समान सवार रहती है।और ठीक ऐसे समय,जब ऐसा लगता है कि वे अपने को तथा अपने इर्द-गिर्द की सभी चाजों को क्रान्तिकारी रूप से बदल रहे हैं,और ऐसी किसी ऐसीवस्तु का सृजनकर रहे हैं जिसका आज अस्तित्व न था,क्रांतिकारी संकट के ठीक ऐसे अवसरों पर वे अतीत के प्रेतों को अपनी सेवा के लिए उत्कण्ठापूर्वक बुलावा दे बैठते हैं और उनसे अतीत के नाम,अतीत के रणनाद और अतीत के परिधान मांगते हैं ताकि विश्व इतिहास की नवीन रंगभूमि को इस चिरप्रतिष्ठापित वेश में और इस मंगनी की भाषा में सजाकर पेश करें।´

मार्क्स का यह कथन इस अर्थ में मूल्यवान है कि हमेशा संकट की अवस्था में हमने समाज में अतीत को ताण्डव करते हुए देखा है। खासकर बुर्जुआवर्ग ,जिसमें मध्यवर्ग भी शामिल है, उसकी यह सामान्य विशेषता है कि वह संकट की घड़ी में हमेशा ´अतीत के प्रेतों को अपनी सेवा के लिए उत्कण्ठापूर्वक बुलावा´ दे बैठता है। संकट की निर्णायक घड़ी में ही अतीत के नाम,अतीत के रणनाद,और अतीत के परिधान सामने आते हैं। हमें कोशिश करनी चाहिए कि संकट की घड़ी में अतीत के प्रेतों की शरण में न जाएं।अतीत के प्रेतों की वापसी का अर्थ है वर्तमान के संकटों से ध्यान हटाना असफलताओं से ध्यान हटाना। समाज में जब भी संकट की घड़ी आई है या कोई निर्णायक फैसले की घड़ी आती है तो हठात् बुर्जुआजी और मध्यवर्ग अतीत के प्रेत याद आने लगते हैं।हम सब जानते हैं पूंजीवादी व्यवस्था में संकट कभी पीछा नहीं छोड़ते,फलतःबुर्जुआजी अतीत के प्रेतों का भी कभी साथ नहीं छोड़ता,अतीत के प्रेत वस्तुतःउसके लिए वैचारिक रक्षा कवच का काम करते हैं।



कार्ल मार्क्स ने लिखा है ´पूंजीवादी समाज यद्यपि वीरत्व शून्य है´,यह कथन बेहद मारक है,यह उस प्रचार की पोल खोल देता है जिसके जरिए आए दिन बुर्जुआ नेताओं और नायकों की वीरता गुणगान किया जाता है।मार्क्स ने लिखा ´पूंजीवादी समाज यद्यपि वीरत्व शून्य है,फिर भी उसे अस्तित्व में लाने के लिए वीरत्व,त्याग,आतंक,गृहयुद्ध और जनसंघर्षों की आवश्यकता पड़ी थी।´

मंगलवार, 3 मई 2016

अनपढ़ ईरानी की शैतानियों के प्रतिवाद में


             मोदी सरकार में मंत्री स्मृति ईरानी ने भगतसिंह आदि क्रांतिकारियों को ´आतंकवादी´कहने के लिए विपन चन्द्रा आदि की किताब पर पाबंदी लगा दी,कमाल है,ईरानीजी आप शिक्षामंत्री हैं लेकिन आपको नहीं मालूम कि चन्द्रशेखर आजाद अपने को क्या कहते थे! पंडित जवाहरलाल नेहरू ने जब पहलीबार चन्द्रशेखर आजाद से मुलाकात की थी तो उसका वर्णन उन्होंने अपनी आत्मकथा में किया है,कम से कम उसी को आपने पढ़ लिया होता तो भगतसिंह संबंधी आतंकवादी-क्रांतिकारी ´गुत्थी सुलझ गयी होती,लेकिन अब तो ईरानीजी ने भगतसिंह को आतंकवादी लिखने के कारण विपन चन्द्रा आदि इतिहासकारों की किताब पर ही पाबंदी लगा दी है,तो अगला कदम उन किताबों की ओर बढ़ना चाहिए,जिनमें इन क्रांतिकारियों को आतंकवादी लिखा गया है ! ताकत है तो उन सभी किताबों पर पाबंदी जारी करके दिखाओ जिनमें आतंकवादी के रूप में क्रांतिकारियों का जिक्र है !

पंडित जवाहरलाल नेहरू की आत्मकथा ´मेरी कहानी´ को ही लेते हैं। याद कीजिए जब लाला लाजपतराय पर अंग्रेजों की लाठियां पड़ी थीं और उसके कुछ दिन बाद उनकी मृत्यु हो गयी ।ईरानीजी जानती हैं किसी हिन्दुत्ववादी का इस घटना पर खून नहीं खोला,दिलचस्प बात यह है कि लालाजी पर पड़ी लाठियों से भगतसिंह आदि क्रांतिकारियों का खून खोला ।जबकि उनके लालाजी से विचार नहीं मिलते थे।ईरानीजी आप कल्पना कीजिए कि किसी हिन्दुत्ववादी का उस समय खून क्यों नहीं खौला ॽभगतसिंह औप उनके साथियो ने लालाजी पर हमला करने वाले अंग्रेज शासन से बदला लेने का फैसला किया और उसके कारण भगतसिंह और उनके साथियों को सारे देश में बड़ी प्रसिद्धि मिली।इस वाकया का पंडित नेहरू ने बहुत सुंदर ढ़ंग से वर्णन किया है।

नेहरू ने लिखा है ´साइमन-कमीशन हिन्दुस्तान में दौरा कर रहा था और काले झंडे लिए ´गो बैक´के नारे लगानेवाली विरोधी भीड़ हर जगह उसका स्वागत कर रही थी।कभी-कभी भीड़ और पुलिस में मामूली झगड़ा भी हो जाता था।लाहौर में बात बहुत बढ़ गई और यकायक देश-भर में गुस्से की लहर दौड़ गई। लाहौर में जो साइमन-विरोधी प्रदर्शन हुआ वह लालालाजपत राय के नेतृत्व में हुआ।जब वह सड़क के किनारे हजारों प्रदर्शनकारियों के आगे खड़े हुए थे तब एक नौजवान अंग्रेज पुलिस अफसर ने उनपर हमला किया और उनकी छाती पर डंडे बरसाए.लालाजी का तो कहना ही क्या ,भीड़ की तरफ से किसी किस्म का झगड़ा खड़ा करने की कोई कोशिश नहीं हुई थी।.....लेकिन फिरभी जिस ढ़ंग से उन पर हमला किया गया,उससे और उस हमले के बहशियाने ढ़ंग से हिन्दुस्तान के करोड़ों लोगों को धक्का लगा।उन दिनों हम पुलिस द्वारा लाठियों के मार खाने के आदी न थे।´ लालाजी की कुछ दिन बाद इस लाठीचार्ज से लगी चोटों के कारण मौत हो गई और सारे देश में गुस्से की लहर दौड़ गई।

पंडित नेहरू ने भगतसिंह आदि द्वारा इस घटना के प्रतिवाद में की गई कार्रवाई की प्रशंसा की और जो लिखा उसका तो महत्व है ही,साथ ही उनको ´आतंकवादी´कहकर सम्बोधित किया है। ईरानीजी हिम्मत है तो नेहरू की आत्मकथा पर पाबंदी लगाकर दिखाओ,हम भी देखते हैं संसद कितने दिन चलती है और आप कितने दिन ऑफिस जाती हैं !

नेहरू ने जो लिखा उसे ईरानीजी आप पढ़ें,संदर्भ है लालाजी पर पड़ी लाठियां और उसका भगतसिंह आदि के द्वारा किया गया प्रतिवाद,इस प्रतिवाद ने भगतसिंह को जनप्रिय बनाया, नेहरू ने लिखा ´इससे पहले भगतसिंह को जो लोकप्रियता मिली वह कोई हिंसात्मक या आतंकवाद का काम करने की वजह से नहीं मिली , आतंकवादी तो हिन्दुस्तान में करीब- करीब तीस बरस से रह-रहकर अपना काम कर रहे हैं, और बंगाल में आतंकवाद के शुरू के दिनों को छोड़कर और कभी किसी भी आतंकवादी को,भगतसिंह को जो लोकप्रियता हासिल हुई,उसका सौवां हिस्सा भी नहीं मिली।यह एक ऐसी जाहिर बात है,जिससे इन्कार नहीं कर सकता।इसे तो मानना पड़ेगा।´

ईरानीजी इसी क्रम में पंडित नेहरू ने बड़े मार्के की बात कही है जो आपको समझनी चाहिए। लिखा है ´मामूली तौर पर आतंकवाद से किसी देश में होने वाली क्रान्तिकारी प्रेरणा का बचपन जाहिर होता है।वह अवस्था गुजर जाती है और उसके साथ-साथ महत्वपूर्ण घटना के रूप में आतंकवाद भी गुजर जाता है; स्थानिक कारणों या व्यक्तिगत दमन के कारण कभी-कभी कुछ आतंकवादी कार्य भले ही होते रहें। बिलाशक हिन्दुस्तान की क्रान्ति का बचपन बीत चुका और इसमें कुछ शक नहीं कि उसके फलस्वरूप यहां कभी-कभी हो जानेवाली आतंकवादी घटनाएं भी धीरे-धीरे बन्द हो जाएंगी। ´

नेहरू ने साफ लिखा आतंकवाद आज तो ´महज एक तात्विक विवाद का सवाल है।´ ईरानीजी आप यह भी जान लें ,नेहरू ने लिखा है ´भगतसिंह ने अपने हिंसात्मक कार्य से लोकप्रियता प्राप्त नहीं की, बल्कि इससे प्राप्त की कि कम-से-कम उस समय लोगों को ऐसा मालूम हुआ कि उसने लालाजी की और लालाजी के रूप में राष्ट्र की इज्जत रखी है।भगतसिंह एक प्रतीक बन गया।उसके काम को लोग भूल गए,केवल प्रतीक उनके मन में रह गया।´

ईरानीजी आप बहुत ही ड्रामेबाज मंत्री हैं।आपने अपने जीवन में कभी कोई राजनीतिक आंदोलन नहीं किया,कभी गंभीर किताबें नहीं पढ़ी,इसलिए किताब और जनसंघर्ष का मतलब आपको नहीं आता। क्रांतिकारियों में ये दोनों गुण होते हैं ,वे पढ़ते भी हैं और जनता के हितों के लिए लड़ते भी हैं।आपने कभी गौर किया कि भारत में कभी किसी शिक्षा मंत्री ने क्रांतिकारियों को सम्बोधित किसी भी किताब पर कभी कोई पाबंदी नहीं लगायी ,ऐसा क्यों हुआ ॽक्या आप सबसे बड़ी अक्लमंद हैं ॽया फिर आपके आरएसएस के सलाहकार सबसे बड़े अक्लमंद हैं ॽ कभी गंभीरता से सोचना आपसे पहले कभी किसी आरएसएस-जनसंघ के नेता ने क्रांतिकारियों को ´आतंकवादी क्रांतिकारी´ लिखने पर पाबंदी लगाने की न तो मांग की और न मंत्री होते हुए इस तरह की किताबों पर पाबंदी लगायी।सोचकर देखें ईरानीजी आप क्या श्यामाप्रसाद मुखर्जी,दीनदयाल उपाध्याय,अटलबिहारी बाजपेयी,मुरली मनोहर जोशी आदि से ज्यादा अक्लमंद हैं ॽ सवाल यह है इन नेताओं को, क्रांतिकारियों को ´आतंकवादी क्रांतिकारी´कहने वाली किताबों से कभी कोई परेशानी नहीं हुई,लेकिन आपको परेशानी हुई और आपने ताबड़तोड़ ढ़ंगसे तुरंत पाबंदी का आदेश जारी कर दिया।

ईरानी जी आप नहीं जानतीं कि आपने अपने जीवन का सबसे घटिया काम किया है। एक सही किताब पर पाबंदी लगाना सबसे घटिया काम है,मैं इसे देशद्रोह से भी खराब हरकत मानता हूँ। दुख इस बात का है आपने भारत के सभी कानूनों को ताक पर रखकर यह काम किया है।किसी भी किताब पर पाबंदी लगाने से पहले उसके लेखक-प्रकाशक से नोटिस देकर पूछा जाता है कि आपने ऐसा क्यों लिखा ॽयदि आप उनके उत्तर से संतुष्ट नहीं होतीं तो फिर देखतीं कि जो वैध किताब है,उस पर पाबंदी लगाने का आपको हक है या नहीं।विपन चन्द्रा की किताब वैध किताब है।आप उस पर दिल्ली विश्वविद्यालय में पाबंदी नहीं लगा सकतीं।यदि वह किताब अवैध है तो सारे देश में पाबंदी लगाकर दिखाएं और फिर देखें कि आपको कानून का कितना करारा तमाचा खाना पडेगा।आपने कानून के तमाचे से बचने के लिए मंत्री पद का दुरूपयोग किया है और दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों को एक बेहतरीन किताब को वैध रूप में पढ़ने से वंचित किया है।

ईरानीजी आप पढ़ती नहीं हैं और आपके अनुयायी आरएसएस के लोग भी नहीं पढ़ते, आपका प्रचार करने वाले टीवी चैनलवाले भी पढ़ते नहीं हैं।इतने अनपढ़ यदि एक साथ मिल जाएं तो हमारे जैसे लोगों के लिए मुसीबतें तो आएंगी।लेकिन बुद्धिजीवी का काम तो यही है कि वह अनपढों के द्वारा पैदा की गयी मुसीबतों से देश को छुटकारा दिलाए,देश को पढ़ाए,सत्य,तथ्य और ज्ञान का अनुभव कराए।



सोमवार, 2 मई 2016

अक्ल का अजीर्ण है स्मृति ईरानी को

      मोदी सरकार में मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी के यहां अक्ल का अजीर्ण हो गया है।इसके कारण वे आए दिन अनाप-शनाप बोलती और एक्शन लेती रहती हैं।उनके अक्ल के अजीर्ण का ताजा नमूना है विपन चन्द्रा की किताब ´India’s Struggle for Independence´(1988) प्रतिबंध लगाने का सुझाव देना और दिल्ली वि.वि.के द्वारा उनके आदेश का तुरंत पालन करते हुए इस किताब की बिक्री पर रोक लगाना,पाठ्यक्रम में पाबंदी लगाना।

इस पुस्तक में विपनचन्द्रा के अलावा मृदुला मुखर्जी,आदित्य मुखर्जी ,सुचेता महाजन और के.एन पन्निकर के लिखे अध्याय भी हैं।विपन चन्द्रा ने भूमिका के अलावा इस किताब के कुल39 अध्यायों में से 22अध्याय स्वयं लिखे हैं।बाकी अन्य के लिखे हैं।मूल समस्या है भगतसिंह को ´क्रांतिकारी आतंकवादी´के रूप में सम्बोधित करने को लेकर ।यह किताब1988 में आई।तब से लेकर आज तक सारे देश में यह किताब बेहद जनप्रिय है।लाखों छात्रों ने इसका लाभ उठाया है।इसके पहले इस पदबंध को लेकर कभी किसी ने कोई आपत्ति प्रकट नहीं की।हाल ही में अचानक एक टीवी कार्यक्रम में इस पदबंध का जिक्र आया और मंत्री महोदया ने राजाज्ञा जारी करके किताब को पढ़ाए जाने पर पाबंदी लगादी।इससे एक बात तो साफ है कि मोदी सरकार और आरएसएस उन तमाम धर्मनिरपेक्ष इतिहासकारों को सहन करने की स्थिति में नहीं हैं जो साम्प्रदायिक नजरिए का विरोध करते हैं।स्मृति ईरानी का विपनचन्द्रा आदि की किताब पर जो रूख सामने आया है वह इस बात का भी प्रमाण है कि सत्ता के अंदर किस तरह असहिष्णुता भरी पड़ी है।इससे यह भी पता चलता है कि मोदी सरकार किसी भी तरह के वैज्ञानिक अनुसंधान को पसंद नहीं करती और ज्योंही कहीं पर कोई मौका मिलता है तुरंत हमलावर कार्रवाई करने पर उतारू हो जाती है।मंत्री महोदया के आदेस पर दिल्ली वि.वि. प्रशासन ने विभागीय स्वायत्तता का उल्लंघन किया है, बिना इतिहास विभाग से पूछे सीधे कार्रवाई करके नई घटिया मिसाल कायम की है। सामान्यतौर पर विभाग को अकादमिक मामलों में फैसले लेने का हक है,मंत्री या वीसी को भी यह हक नहीं है। खासतौर पर जिस तरह से इस किताब पर पाबंदी लगायी गयी है वह निंदनीय है और सरकार की फासिस्ट मनोदशा की अभिव्यंजना है।

सवाल यह है भगतसिंह आदि को ´क्रांतिकारी आतंकवादी´कहने का सिलसिला कहां से शुरू हुआ ॽ क्या क्रांतिकारियों को विपनचन्द्रा ने सम्बोधित करके इस पदबंध की शुरूआत की या फिर पहले से इसका कहीं आरंभ होता है।इससे भी बड़ा सवाल यह है कि आतंकवादी किसे कहें ॽआतंकवादी की परिभाषा क्या है ॽस्वयं पीएम नरेन्द्र मोदी विश्व के नेताओं और संयुक्त राष्ट्र संघ का भी आतंकवाद की परिभाषा बनाने के लिए आह्वान कर चुके हैं। सवाल यह है आरएसएस की नजर में आतंकवाद की परिभाषा क्या है ॽभारत सरकार की नजर में आतंकवाद की परिभाषा क्या है ॽ क्रांतिकारी और क्रांति की परिभाषा क्या है ॽ इससे भी बड़ा सवाल यह है क्या किसी राजनीतिक संगठन या आरएसएस जैसे संगठन के नजरिए से भारत का इतिहास लिखा जा सकता है ॽ



इतिहास लेखन एक स्वतंत्र अनुशासन है,उसके नियम,परंपराएं और दृष्टियां हैं।सामग्री संकलन की शोध पद्धतियां हैं।इनको लंबे अकादमिक विचार-विमर्श के आधार पर निर्मित किया गया है,इनके बारे में किसी नेता के मूड़ और विचारों के आधार पर फैसला नहीं हो सकता।इतिहास का क्षेत्र इतिहासकारों का है ,वह राजनेताओं के जंग की जगह नहीं है।आरएसएस इतिहासलेखन को इतिहासकारों के दायरे से बाहर लाकर राजनेताओ की,संघ के काल्पनिक इतिहासकारों की कर्मशाला बनाना चाहता है।काल्पनिक इतिहास की अशिक्षित समाज में उपजाऊ जमीन होती है,वे किंवदन्तियों और पुराकथाओं को ही इतिहास के रूप में पेश करते हैं।वे इतिहासलेखन के किसी भी वैज्ञानिक पद्धतिशास्त्र को नहीं मानते।लेकिन अकादमिक जगत कल्पनाशास्त्र और किंवदन्तियों से नहीं चलता उसके लिए अकादमिक अनुशासन में प्रवेश करने, बुद्धि,विवेक और अकादमिकश्रम की जरूरत पड़ती है,जाहिरातौर पर आरएसएस के लोग इन सब पर विश्वास नहीं करते,वे अकादमिक अनुशासन को संघ के अनुशासन के जरिए अपदस्थ करने पर उतारू हैं,इससे भी शर्मनाक बात है कि दिल्ली वि. वि. के उपकुलपति महोदय संघ के अनुशासन को मानकर एक्शन ले रहे हैं।

बुधवार, 18 मार्च 2015

मुसलमानों की देन है इतिहास रचना


 
 इतिहास के  बिना मनुष्य बोगस नजर आता है। भारत में मुग़लों के आने के पहले इतिहास लेखन की परंपरा नहीं थी । आरएसएस के लोग मुसलमानों को बर्बर और हिन्दू विरोधी प्रचारित करने के चक्कर में यह भूल ही गए कि मुसलमानों के आने के बाद ही भारत में इतिहास लिखने की परंपरा का श्रीगणेश हुआ है। मुग़लों के आने के पहले हिन्दुओं में सांसारिक घटनाओं और दैनंदिन ज़िंदगी की घटनाओं का इतिहास लिखने की प्रवृत्ति नहीं थी। हिन्दुओं के लिए तो संसार माया था और माया का ब्यौरा कौन रखे ! मुसलमानों को इसका श्रेय जाता है कि हमने उनसे इतिहास लिखना सीखा। मुग़लों के आने के पहले हिन्दूसमाज में दैनंदिन जीवन में क्या घटा और कैसे घटा इसका हिसाब रखना समय का अपव्यय माना जाता था । यही वजह है कि मुग़लों के आने के पहले कभी किसी व्यक्ति ने इतिहास नहीं लिखा। कुछ राज प्रशस्तियाँ या अतिरंजित वर्णन जरुर मिलते हैं। उनमें तिथियों का कोई कालक्रम नहीं है। इतिहासकार यदुनाथ सरकार के अनुसार उस दौर में काल -निरुपण ग्रंथ तो एकदम नहीं मिलते। 
    यदुनाथ सरकार ने लिखा है" अरब लोग पक्के व्यवहारवादी थे और प्रकृत-वस्तुओं पर सर्वदा सजग दृष्टि रखा करते थे। इसीलिए उन्होंने इस्लाम  के आदि युग से लेकर घटनाओं का इतिहास , राजाओं की तिथि-संवत और राजाओं की जीवनियां लिख छोड़ी हैं। उनके इस इतिहास में तिथि संवतों का पूर्ण समावेश पाया जाता है । " यही वह प्रस्थान बिंदु है जहाँ से भारत में इतिहास रचना आरंभ होती है। बाद में हिन्दू लेखकों ने इस पद्धति का प्रयोग किया । मुसलमान इतिहासकारों की रचनाओं के जरिए ही हमें उस दौर के हिन्दू समाज और हिन्दू राजाओं के बारे में जानकारियाँ प्राप्त होती हैं। 
   कहने का तात्पर्य है कि भारत के निर्माण में मुसलमानों की देन को भूलना नहीं चाहिए। इतिहास रचना हमें मुसलमानों से ही प्राप्त हुई ।
    

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