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सोमवार, 11 अक्टूबर 2010

भूमंडलीकरण और विकास - 2- फिदेल कास्त्रो

               (क्यूबा के महान् क्रांतिकारी फिदेल कास्त्रो)
    जनसंचार पर एकाधिकार के जरिए धरती के हर कोने में उपभोक्तावाद का जहर फैलाकर देश की राष्ट्रीय संस्कृति को कौन नष्ट कर रहा है? प्रति वर्ष वाणिज्यिक विज्ञापनों पर एक खरब डालर के खर्चे के बारे हम क्या कहें जबकि इस रकम का इस्तेमाल शिक्षा, स्वास्थ्य, पेय जल और आवास के अभाव तथा भूख और कुपोषण को दूर करने के लिए किया जा सकता था? क्या यह केवल आर्थिक मुद्दा है? राजनीतिक और नैतिक नहीं?
नव उदार भूमंडलीकरण बिलकुल साफतौर पर तीसरी दुनिया का फिर से उपनिवेशीकरण है। जैसा कि यहां पहले ही दोहराया जा चुका है, एफ.टी.ए.ए. वास्तव में अमरीका का लैटिन अमरीका पर कब्जा है जिसमें बलवान देश पड़ोसी कनाडा, मैक्सिको और ब्राजील सहित सबसे कमजोर देशों को निगल जाएगा। यह अनैतिक करार है जिसके अंतर्गत पूंजी और वस्तुओं की मुक्त आवाजाही होगी लेकिन कत्लघर बन चुकी मैक्सिको और अमरीका की सीमाओं को पार करने वाले 'जंगलियों' को मौत मिलेगी। उनके लिए कोई एडजस्टमेंट एक्ट नहीं है जिससे आवास और रोजगार का स्वत: अधिकार मिल जाए, भले ही उन्होंने कोई भी उल्लंघन या अपराध किया हो। यह एक्ट तो हमारे देश में क्रांतिकारी परिवर्तनों के लिए क्यूबा को दंडित करने के वास्ते बनाया गया था।
बेहतर दुनिया संभव होने में विश्वास करने वाले एक क्रांतिकारी और योध्दा के रूप में मेरा दृढ़तापूर्वक तथा बगैर हिचक के यह कहना है कि विदेशी निवेश के बदले में किसी देश की संपदा और प्राकृतिक संसाधनों का निजीकरण करना बहुत बड़ा अपराध है। यह तीसरी दुनिया के देशों के जीने के संसाधनों को बहुत सस्ते में बल्कि मुफ्त दे देने जैसी बात है। इससे नए तरह का उपनिवेशीकरण होगा जो कि और अधिक सुविधाजनक और अपने आप काम करने वाला होगा। मूल निवासियों को कानून व्यवस्था तथा अन्य अनिवार्य चीजों की लागत चुकानी होगी जैसा कि पहले उपनिवेशवादी ताकतों के मामले में होता था।
विदेशी पूंजी के साथ संबंधों के मामले में क्यूबा सहयोग के परस्पर लाभप्रद और ध्यानपूर्वक विचारे गए रूपों का प्रयोग करता है जिससे देश की प्रभुसत्ता पर आंच नहीं पहुचंती और राष्ट्रीय संपदा तथा देश के राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन का नियंत्रण विदेशी पूंजी या ताकत के हाथों में नहीं रहता।
हमारा एक नियम है कि हम कोई चीज मुफ्त नहीं देते। कीमत संबंधी किसी उलझन की स्थिति में हम जिसका जो बनता है उसे वह दे देते हैं। इस बारे में कोई गलतफहमी न रहे कि हम समाजवादी देश हैं और हम समाजवादी रहेंगे। जबर्दस्त बाधाओं के बावजूद हम और अधिक अनुभव, उत्साह, ऊर्जा और सपने के साथ अधिक मानवीय समाज बना रहे हैं। हमारे यहां अमरीकी डालर चलता है, यूरो चलना शुरू हुआ है। पर्यटन की सुविधा के लिए अन्य मुद्राएं भी चल सकती हैं, लेकिन बुनियादी तौर पर चलने वाली मुद्रा सामान्य क्यूबाई पेसो और परिवर्तनीय क्यूबाई पेसो है। मौद्रिक स्थिति नियंत्रण में है। 2002 में पूरे वर्ष में हमारी मुद्रा का मूल्य स्थिर रहा। दूसरे देशों में ऐसी स्थिति नहीं रही। हमारे यहां से दुर्लभ मुद्रा भी नहीं गई।
जैसा कि सबको मालूम है हमारे गोलार्ध में सबसे विकट समस्या भारी बाह्य कर्जे की है। इस कर्ज के मूलधन और ब्याज चुकाने में कई बार राष्ट्रीय बजट का 50 प्रतिशत हिस्सा चला जाता है जिससे देश की अनिवार्य सेवाओंस्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा पर बहुत बुरा असर पड़ता है।
सट्टा बाजार के हमलों और पूंजी पलायन से अपने आपको बचाने के लिए सरकारें बैंक में धन जमा रखती हैं। इसका भारी ब्याज उन्हें चुकाना पड़ता है। इसी कारण कोई भी देश अपने ही धन के बल पर विकास हासिल नहीं कर पा रहा है।
नई आर्थिक व्यवस्था द्वारा लादा गया मुक्त मुद्रा विनिमय विकास के लिए जूझ रहे देशों की कमजोर अर्थव्यवस्थाओं के लिए घातक सिध्द हुआ है। काफी लंबे समय से मुद्रा किसी काम की चीज नहीं रह गई है जैसे कि वह पहले हुआ करती थी। इसकी बचत की जा सकती थी और सोने या चांदी के टुकड़ों की तरह बर्तन में रखकर जमीन में गाड़ा जा सकता था।
जैसा कि सभी अर्थशास्त्रियों को मालूम है ब्रेटन वुड्स में अमरीका, जिसके पास विश्व के स्वर्ण भंडार का 80 प्रतिशत हिस्सा है, को विश्व भर में आरक्षित मुद्रा जारी करने का विशेषाधिकार दिया गया है। लेकिन उस समय उसने जारी किए गए प्रत्येक बैंक नोट के मूल्य को सोने में बदलने के उत्तरदायित्व का करार किया। यह उत्तरदायित्व पूरा किया गया जिसमें कागज की मुद्रा के मूल्य की गारंटी थी। इसके लिए देश की सरकार बहुत साधारण क्रियाविधि अपनाती थी और वह थी बाजार में बेशी या कमी के अनुसार आवश्यक सोना बेचना या खरीदना। यह फार्मूला 1971 तक चलता रहा जब राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने भारी सैनिक खर्चों और कर रहित युध्द के बाद एकतरफा निर्णय लेते हुए अमरीकी डालर को स्वर्ण मानक से अलग कर दिया।
उस समय किसी ने भी यह कल्पना नहीं की होगी कि इसके बाद मुद्रा की खरीद-बिक्री में जबर्दस्त सट्टेबाजी की जाएगी। आज प्रतिदिन इस तरह के 1 खरब डालर का लेनदेन होता है।
अमरीकी डालर द्वारा विश्वसनीयता संचित कर लिए जाने, सबके द्वारा इसे विनिमय के उपकरण के रूप में इस्तेमाल करने की आदत, इसे जारी करने वाले देश की जबर्दस्त आर्थिक शक्ति तथा किसी अन्य उपकरण के अभाव में यह महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।

यह विशेषाधिकार लैटिन अमरीका तथा शेष तीसरी दुनिया के देशों के पास नहीं था। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में हमारी मुद्राएं कागज के टुकड़े मात्र हैं। उनका मूल्य दुर्लभ मुद्रा, बुनियादी तौर पर अमरीकी डालरों के राष्ट्रीय भंडार पर निर्भर है। लैटिन अमरीका या कैरेबिया के किसी भी देश की मुद्रा न तो स्थिर है न स्थिर रह सकती है। आज यदि किसी
मुद्रा का मूल्य 100 है तो कुछ महीनों, सप्ताहों या दिनों में बाह्य या आंतरिक तत्वों के कारण उसका मूल्य उसके पहले के मूल्य का 50 प्रतिशत, 40 प्रतिशत या यहां तक कि 10 प्रतिशत हो जा सकता है। अर्जेंटीना में पेसो का मूल्य डालर के बराबर रखने के रमणीय, अव्यावहारिक और लोकप्रशंसित प्रयास का क्या हुआ? इसकी परिणति विनाश में ही हुई। रियाल और डालर की टक्कर में भी यही हुआ। इक्वाडोर जैसे देशों ने अपनी मुद्रा कचरे के ढेर में डाल दी तथा अमरीकी डालर को देश में प्रचलन की एक मात्र मुद्रा के रूप में स्वीकार कर लिया।
मैक्सिको में नियमित रूप से हर छह साल बाद सरकार के बदल जाने के कारण भारी अवमूल्यन हुआ जिससे उसकी मुद्रा का मूल्य बहुत कम रह गया। सट्टेबाजी के आखिरी आघात तथा 1998 के संकट के बाद ब्राजील को अपनी 40 अरब डालर की रकम, जो कि उसने अपनी सर्वोत्तम उत्पादन तथा सेवा कंपनियों के निजीकरण द्वारा हासिल की थी, को गंवाने में मुश्किल से आठ सप्ताह लगे।

गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

अमरीकी साम्राज्यवाद की धुरी है मीडिया साम्राज्यवाद



       भूमंडलीकरण एक विश्वव्यापी संवृत्ति है। इसका साम्राज्यवाद से गहरा सम्बन्ध है। यह नव- औपनिवेशिक शोषण और प्रभुत्व का प्रभावी अस्त्र है। इसके प्रचारक-प्रसारक हैं भूमंडलीय जनमाध्यम और बहुराष्ट्रीय शस्त्र निर्माता कम्पनियां एवं बहुराष्ट्रीय वित्तीय कम्पनियां। द्वितीय विश्व युध्द के बाद समूची दुनिया पर साम्राज्यवाद की पकड ढ़ीली पड़ी थी। अधिकांश गुलाम देश आजाद हुए। साम्राज्यवाद के शोषण एवं उत्पीडन का दायरा सिकुड़ा।समाजवादी शिविर का जन्म हुआ। 
        सोवियत संघ के नेतृत्व में उभरे समाजवादी शिविर ने नवोदित राष्ट्रों को आत्मनिर्भर विकास का रास्ता अख्तियार करने, बुनियादी उद्योग-धंधों का निर्माण करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। इस सबका विरोध और समाजवादी सत्ता का विरोध करने के लिए शीतयुध्द की राजनीति शुरु की गयी और शस्त्रास्त्रों की अंधी प्रतिस्पर्धा शुरु की गयी।'समाजवाद के खतरे' और 'मार्क्सवाद के भूत' के जरिये सारी दुनिया में,खासकर तीसरी दुनिया और पूर्वी यूरोप में वैचारिक हमला बोला गया। इसी संदर्भ में माध्यम साम्राज्यवाद का विकास हुआ। 
         साम्राज्यवादी हितों के विस्तार के लिए हथियारों के उत्पादन,सूचना तकनीकी के उत्पादन एवं माध्यम कार्यक्रमों के उत्पादन पर विशेष जोर दिया गया। इन तीन क्षेत्रों के जरिये अमरीकी साम्राज्यवाद ने विश्व भर में अपनी प्रभुता स्थापित की और अपनी शक्ति का विस्तार किया ।विगत पचास वर्षों में इन क्षेत्रों में बहुराष्ट्ीय कम्पनियों की परिसंपत्तियों में बेशुमार वृध्दि हुई ।वहीं दूसरी ओर समाजवादी व्यवस्था को गहरा आघात लगा।तीसरी दुनिया के देशों को नए सिरे से नव औपनिवे शिक शोषण की चक्की में पिसना पड़ रहा है ।गरीबी, भुखमरी, बेकारी, सामाजिक विखण्डन और कर्जों के दबाव से गुजरना पड़ रहा है। द्वितीय विश्वयुध्द के बाद साम्राज्यवादी देशों की समस्या थी कि संपत्ति,सत्ता और ताकत का कैसे विस्तार किया जाय ? जाहिरा तौर पर यह विस्तार शांतिपूर्ण विकास कार्यों से संभव नहीं था। सिर्फ युध्दों का माहौल बनाए रखकर ही साम्राज्यवादी हितों का विकास संभव था। युध्दों के लिए शस्त्रों की जरुरत थी और यही एकमात्र क्षेत्र था जो साम्राज्यवाद के विकास की गारंटी कर सकता था। यही वजह है कि शस्त्र उद्योग का बड़े पैमाने पर विकास किया गया।यही एकमात्र उद्योग था जहां बेशुमार मुनाफा था।
      सन्1978 में संयुक्त राष्ट्रसंघ के विशेषज्ञों की ''हथियारों की होड़ और सैन्य खर्च के आर्थिक - सामाजिक परिणाम,महासचिव की अधुनातन रिपोर्ट '' में बताया गया कि ''लड़ाईयां दूसरे विश्व युध्द के बाद के दौर का एक स्थायी लक्षण रही हैं।हथियारों का प्रयोग काफी बडे पैमाने पर वास्तव में निरन्तर,अक्सर एक ही समय अनेक स्थानों पर किया जा रहा है।हताहतों की संख्या बढ़ती रही है। दूसरे विश्वयुध्द के बाद कई करोड़ तक पहुँच गयी है। बडी हद तक ये लड़ाई-झगड़े दुनिया के मुख्य औद्योगिक क्षेत्रों के बाहर हुए हैं,यद्यपि कुछ स्थितियों में कुछ मुख्य शक्तियाँ इनमें प्रत्यक्ष रुप से शामिल रही हैं,और युध्द का साजो-सामान तो बिना अपवाद इन्हीं शक्तियों ने मुहैया किया है। इन लडाईयों के हिंसात्मक स्वरुप ,उनकी व्यापकता तथा अत्यन्त विनाशकारिता का कारण यह है कि अंतर्राष्ट्रीय शक्तियां दो हिस्सों में बंटी हुई हैं तथा आधुनिक शस्त्रास्त्र तत्काल सुलभ हैं। और ये दोनों बातें अस्त्रों की होड़ का मुख्य लक्षण हैं।
        ''सैन्य-औद्योगिक क्षेत्र में छह प्रमुख देश आते हैं जिनके खाते में संसार भर के सैन्य व्यय,सैनिक शोध एवं विकास व्यय का बहुत बड़ा हिस्सा आता है।ये देश हैं-अमरीका,सोवियत संघ,चीन, फ्रांस,ब्रिटेन, और जर्मनी। विश्व में शस्त्रों का 90 फीसदी निर्यात यही देश करते हैं। अन्य देशों को जाने वाले मुख्य प्रकार के हथियारों की कुल मात्रा का 95 फीसदी इन्हीं देशों से जाता है। आज शस्त्रास्त्र प्रतिस्पर्धा से कोई देश बचा नहीं है। हथियारों के सौदागर अपने माल की बिक्री बढाने के लिए यह प्रचार करते रहते हैं कि यदि इन हथियारों को प्राप्त कर लिया तो उनके देश की प्रतिष्ठा बढ़ेगी , बडी-बडी शक्तियों के दबाव और आदेश का मुकाबला करने की क्षमता बढेग़ी। लेकिन हथियार किसे बेचे जाएं यह एक राजनीतिक फैसला होता है। सैनिक सलाहकारों एवं प्रशिक्षकों को कहां भेजा जाये, किसे गोला -बारुद की सप्लाई की जाये,इत्यादि फैसले राजनीतिक हितों को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं। इस संदर्भ में साम्राज्यवादी मुल्कों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है और छोटे-अविकसित देशों के हितों की अनदेखी की जाती है।

       संयुक्त राष्ट्र संघ के विशेषज्ञों की रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि'' हथियारों की होड़ दिनों दिन विश्वव्यापी परिघटना बनती जा रही है। यद्यपि इसकी तीव्रता विभिन्न क्षेत्रों में घटती बढ़ती रहती है;मगर शायद ही कोई देश और बड़ा क्षेत्र इससे बचा हो।'' विशेषज्ञों ने इसके आर्थिक दुष्परिणामों की ओर ध्यान खींचते हुए लिखा कि ''यह मामला अत्यन्त असमान विनिमय का होता है जिससे गरीब और धनी देशों के बीच दूरी को पाटने के प्रयासों पर विशेष चोट पड़ती है।शस्त्रों के आयार्तकत्ता के लिए यह अपव्यय मात्र है जिसे लाभप्रद ढंग़ से उपयोग में लाया जा सकता है। शस्त्र यदि दान में मिलें तब भी देखरेख,संचालन तथा अवसंरचना का खर्च घाटे के मद में ही जोड़ना पडेगा।स्टाकहोम अंतर्राष्ट्रीय शान्ति शोध संस्थान एक विश्लेषण के आधार पर इस ठोस निष्कर्ष पर पहुॅचा कि ''आखिरकार हथियारों का इस्तेमाल यदि युध्द में नहीं किया जाता तो भी वे संतुलित आहार ,स्वास्थ्य सेवा,आवास, और शिक्षा जैसी बुनियादी विकास आवश्यकताओं से आर्थिक संसाधन दूसरी ओर खींचकर अप्रत्यक्ष रुप से 'हत्या'करते हैं।''वस्तुत:शस्त्रों की दौड में शामिल होकर कोई भी देश ताकतवर नहीं बनता अपितु कमजोर बनता है।
      आन्द्रेई कोजीरेव ने ''शस्त्र व्यापार नये-नये खतरे'' कृति में लिखा है कि''शिकार और खेल को अलग कर दीजिए तो किसी अस्त्र का एकमात्र प्रयोग एवं एकमात्र सामाजिक आवश्यकता उत्पीड़कों की संस्थाबध्द हिंसा है-जो अन्यायपूर्ण इस्तेमाल है। इसके विपरीत उत्पीड़ितों की हिंसा -जो जबावी इस्तेमाल है और न्यायपूर्ण होती है। कुछ पूँजीवादी समाजशास्त्रियों का कहना है कि हिंसा मनुष्य की एक स्वाभाविक, मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति है, उसके अस्तित्व का एक अनिवार्य पक्ष है।यह एक निराशावादी , मानवविरोधी निष्कर्ष है।'' फ्रेडरिक एंगेल्स के शब्दों में ''बल केवल साधन है;उद्देश्य आर्थिक लाभ है।''
       हिंसा की जरुरत उसी समाज को पडती है जहां इसका इस्तेमाल निजी संपत्ति की रक्षा के लिए किया जाता है जो मानव द्वारा मानव के उत्पीड़न का स्रोत है।पूंजीवादी जगत का लगभग सारा अनुसंधान और विकास कार्य औद्योगिक राष्ट्रों में संकेन्द्रित है।इस पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का एकाधिकार है। तकनीकी डिजायनों का 80फीसदी अंश उन्हीं के नियंत्रण में है। ये कम्पनियां संपत्ति का संचय उपभोग बढाने के लिए नहीं करतीं। अपितु संपदा का ज्यादा से ज्यादा संचय ही इनकी मूल प्रकृति है। संचय को विनिवेश में लगाने की कोशिश की जाती है और उससे हुई प्राप्तियों को बचत खातों में डाल दिया जाता है। साम्राज्यवादी भूमंडलीकरण के कारण विषमता,असमानता एवं अलोकतान्त्रिक मानसिकता का तेजी से विकास हुआ है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में घुसपैठ बढ़ी है। 
       विश्व की200 सबसे बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का1960 में विश्व के सकल घरेलू उत्पादन के17प्रतिशत हिस्से पर कब्जा था जो 1982 में बढकर 24 फीसदी हो गया और 1995में32प्रतिशत हो गया। अ. ग्राचोव और नि.येर्मोश्किन ने''नयी सूचना व्यवस्था अथवा मनोवैज्ञानिक युध्द?'' कृति में सैन्य, सूचना, और संचार के अंतस्संबंधों को विश्लेषित करते हुए लिखा कि ''राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन में निरंतर चढ़ाव आने और पूँजीवादी व्यवस्था में गंभीर संकटों के आने के साथ-साथ संघर्ष विचारधारा के क्षेत्र में भी अंतरित होता जा रहा है। आधुनिक साम्राज्यवाद अपनी विचारधारात्मक सेवाओं के संकेन्द्रण की तरफ विशेष ध्यान दे रहा है। ताकि एक ऐसे सशक्त हरावल का निर्माण किया जा सके;जो स्थानीय और विश्व के पैमाने पर सामाजिक परिवर्तनों का प्रतिरोध करने की क्षमता रखता हो। आर्थिक,सैनिक और विचारधारात्मक प्रसार एकाकार हो गया है।''

रविवार, 13 दिसंबर 2009

इस्लाम के प्रति ग्लोबल मीडिया में घृणा कैसे आयी - 1-


एडवर्ड सईद ने ''कवरिंग इस्लाम''(1997) में विस्तार से भूमंडलीय माध्यमों की इस्लाम एवं मुसलमान संबंधी प्रस्तुतियों का विश्लेषण किया है।सईद का मानना है कि भूमंडलीय माध्यम ज्यादातर समय इस्लामिक समाज का विवेचन करते समय सिर्फ इस्लाम धर्म पर केन्द्रित कार्यक्रम ही पेश करते हैं।इनमें धर्म और संस्कृति का फ़र्क नजर नहीं आता। भूमंडलीय माध्यमों की प्रस्तुतियों से लगता है कि इस्लामिक समाज में संस्कृति का कहीं पर भी अस्तित्व ही नहीं है।इस्लाम बर्बर धर्म है।इस तरह का दृष्टिकोण पश्चिमी देशों के बारे में नहीं मिलेगा।ब्रिटेन और अमरीका के बारे में यह नहीं कहा जाता कि ये ईसाई देश हैं।इनके समाज को ईसाई समाज नहीं कहा जाता।जबकि इन दोनों देशों की अधिकांश जनता ईसाई मतानुयायी है।
            भूमंडलीय माध्यम निरंतर यह प्रचार करते रहते हैं कि इस्लाम धर्म ,पश्चिम का विरोधी है।ईसाईयत का विरोधी है।अमरीका का विरोधी है।सभी मुसलमान पश्चिम के विचारों से घृणा करते हैं।सच्चाई इसके विपरीत है।मध्य-पूर्व के देशों का अमरीका विरोध बुनियादी तौर पर अमरीका-इजरायल की विस्तारवादी एवं आतंकवादी मध्य-पूर्व नीति के गर्भ से उपजा है।अमरीका के विरोध के राजनीतिक कारण हैं न कि धार्मिक कारण।
             एडवर्ड सईद का मानना है  'इस्लामिक जगत' जैसी कोटि निर्मित नहीं की जा सकती।मध्य-पूर्व के देशों की सार्वभौम राष्ट्र के रुप में पहचान है।प्रत्येक राष्ट्र की समस्याएं और प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं।यहाँ तक कि जातीय ,सांस्कृतिक और भाषायी परंपराएं अलग-अलग हैं।अत: सिर्फ इस्लाम का मतानुयायी होने के कारण इन्हें 'इस्लामिक जगत' जैसी किसी कोटि में 'पश्चिमी जगत' की तर्ज पर वर्गीकृत नहीं किया जा सकता।
             ऐतिहासिक दृष्टिकोण देखें तो पाएंगे कि भूमंडलीय माध्यमों का मध्य-पूर्व एवं मुस्लिम जगत की खबरों की ओर सन् 1960 के बाद ध्यान गया।इसी दौर में अरब-इजरायल संघर्ष शुरु हुआ।अमरीकी हितों को खतरा पैदा हुआ।तेल उत्पादक देशों के संगठन'ओपेक' ने कवश्व राजनीति में अपनी विशिष्ट पहचान बनानी शुरु की।तेल उत्पादक देश अपनी ताकत का एहसास कराना चाहते थे वहीं पर दूसरी ओर विश्व स्तर पर तेल संकट पैदा हुआ।ऐसी स्थिति में अमरीका का मध्य-पूर्व में हस्तक्षेप शुरु हुआ।अमरीकी हस्तक्षेप की वैधता बनाए रखने और मध्य-पूर्व के संकट को 'सतत संकट' के रुप में यहीबनाए रखने के उद्देश्य से भूमंडलीय माध्यमों का इस्तेमाल किया गया।यही वह दौर है जब भूमंडलीय माध्यमों से इस्लाम धर्म और मुसलमानों के खिलाफ घृणा भरा प्रचार अभियान शुरु किया गया।माध्यमों से यह स्थापित करने की कोशिश की गई कि मध्य-पूर्व के संकट के जनक मुसलमान हैं।जबकि सच्चाई यह है कि मध्य-पूर्व का संकट इजरायल की विस्तारवादी-आतंकवादी गतिविधियों एवं अमरीका की मध्य-पूर्व नीति का परिणाम है।इसे भूमंडलीय माध्यमों द्वारा इस्लाम एवं मुसलमान विरोधी प्रचार अभियान का प्रथम चरण कहा जा सकता है।इसी दौर में अमरीकी एवं इजरायली इस्लामवेत्ताओं के इस्लाम संबंधी दर्जनों महत्वपूर्ण ग्रंथ प्रकाशित हुए।जिनमें इस्लाम एव मुसलमानों के बारे में बेसिर-पैर की बातें लिखी हैं। कालान्तर में ये ही पुस्तकें इस्लाम विरोधी प्रचार अभियान का हिस्सा बन गयी।इन पुस्तकों के अधिकांश लेखक अरबी भाषा नहीं जानते थे और न कभी अरब देशों को उन्हें करीब से जानने का मौका मिला।ऐसी तमाम पुस्तकों की एडवर्ड सईद ने अपनी पुस्तक में विस्तृत आलोचना की है।
      भूमंडलीय माध्यमों के इस्लाम धर्म विरोधी अभियान का दूसरा चरण 1975से शुरु होता है। इस दौर में 'ईरान क्रांति' और अफगानिस्तान की घटनाओं ने इस मुहिम को और भी तेज कर दिया।सन् 1975 से भूमंडलीय माध्यमों के एजेण्डे पर ईरान आ गया। बाद में 1979 में अफगानिस्तान में कम्युनिस्टों के सत्तारुढ़ होने के बाद सोवियत सैन्य हस्तक्षेप हुआ और भूमंडलीय माध्यमों ने इस्लाम विरोधी मुहिम में एक नया तत्व जोड़ा वह था तत्ववाद और आतंकवाद।अब तेजी से विभिन्न किस्म के सोवियत विरोधी आतंकवादी एवं तत्ववादी गुटों को अमरीकी साम्राज्यवाद की तरफ से खुली आर्थिक,सामरिक,राजनीतिक एवं मीडिया मदद मुहैया करायी गयी।अमरीकी साम्राज्यवाद ने पाकिस्तान के साथ मिलकर मुजाहिदीन सेना का गठन किया। इसके लिए अमरीकी सीनेट ने तीन विलियन डॉलर की आर्थिक मदद भी की। ध्यान देने वाली बात यह है कि सन् 1970 के बाद से अनेक मुस्लिम बहुल देशों में संकट आए किन्तु किसी में भी भूमंडलीय माध्यमों ने रुचि नहीं ली। मसलन इसी दौर में इथोपिया और सोमालिया में गृहयुध्द चल रहा था।अल्जीरिया और मोरक्को में दक्षिणी सहारा को लेकर झगड़ा हो गया।पाकिस्तान में राष्ट्रपति को हटा दिया गया,मुकदमा चलाया गया,फौजी तानाशाही स्थापित हुई।ईरान-ईराक में युध्द छिड़ गया।हम्मास और हिजबुल्ला जैसे संगठनों का उदय हुआ।अल्जीरिया में इस्लामपंथियों एवं प्रतिष्ठाहीन सरकार के बीच गृहयुध्द शुरु हो गया। इन सब घटनाओं का पूर्वानुमान लगाने और इनकी नियमित रिपोर्टिंग करने में भूमंडलीय माध्यम असमर्थ रहे।
          एडवर्ड सईद ने लिखा कि इस दौर में पश्चिम के माध्यम ऐसी सामग्री परोस रहे थे जिसका संकटग्रस्त क्षेत्र की वास्तविकता से कोई संबंध नहीं था।इसके विपरीत यह सामग्री ज्यादा से ज्यादा भ्रम की सृष्टि करती थी। असल में भूमंडलीय माध्यम 'क्लासिकल इस्लाम' की धारणाओं के आधार पर आधुनिकयुगीन घटनाओं और इस्लाम का विश्लेषण करते रहे हैं।इसका अर्थ यह भी है कि पश्चिमी विशेषज्ञों की नजर में इस्लामिक जगत में कोई बदलाव नहीं आया है।सईद ने लिखा कि पश्चिमी जगत की अज्ञानता का आदर्श नमूना था 'ईरान क्रांति' का पूर्वानुमान न कर पाना।
           सईद ने लिखा कि पश्चिमी जगत में इस्लाम के बारे में सही ढ़ंग़ से बताने वाले नहीं मिलेंगे।अकादमिक एवं माध्यम जगत में इस्लामिक समाज के बारे में बताने वालों का अभाव है।यही वजह थी कि ईरानी समाज में हो रहे परिवर्तनों को पश्चिमी जगत सही ढ़ंग से देख नहीं पाया।ईरान देशों में ऐसी ताकतें भी हैं जो अमरीकीकरण या आधुनिकीकरण की विरोधी हैं।इनमें कई तरह के ग्रुप हैं।
          सत्तर के दशक में ईरान में जो परिवर्तन हुए उससे आधुनिकीकरण की अमरीकी सैध्दान्तिकी धराशायी हो गयी।ईरान की क्रांति न तो कम्युनिस्ट समर्थक थी और न अमरीकी शैली के आधुनिकीकरण की समर्थक थी।ईरान की क्रांति से यह निष्कर्ष निकला कि अमरीकी तर्ज के आधुनिकीकरण से ईरान के शाह को कोई लाभ नहीं पहँचा।अमरीकी विशेषज्ञों की राय थी कि सैन्य-सुरक्षा के आधुनिक तंत्र के जरिए आधुनिक शासन व्यवस्था का निर्माण हो सकता है,इस धारणा का खंडन हुआ।इसके विपरीत हुआ यह कि ईरान क्रांति ने सभी किस्म के पश्चिमी विचारों के प्रति घृणा पैदा कर दी।यहाँ तक कि विवेकवाद को भी खोमैनी समर्थक स्वीकार करने को तैयार नहीं थे।एडवर्ड सईद ने लिखा कि इस तरह की भावना सुचिंतित एवं सुनियोजित ढ़ंग से पैदा नहीं हुई अपितु स्वत:स्फूर्त्त ढ़ंग से पैदा हुई।इसका प्रधान कारण यह था कि ईरानी लोग इस्लाम से जुड़े थे और इस्लाम ईरान से जुड़ा था।इस संबंध को पागलपन और मूर्खता की हद तक निभाया गया।यह सत्ता का प्रतिगामी ताकतों के सामने आत्मसमर्पण था।किन्तु यह स्थिति सिर्फ ईरान की ही नहीं थी अपितु इजरायल की भी थी।वहाँ पर शासकों ने धार्मिक सत्ता के सामने पूरी तरह आत्मसमर्पण कर दिया।किन्तु इजरायल के घटनाक्रम को माध्यमों ने छिपा लिया और ईरान के खोमैनी समर्थकों पर हल्ला बोल दिया।
        ईरान क्रांति के बाद भूमंडलीय माध्यमों ने इस्लामिक जगत की प्रत्येक घटना को इस्लाम से जोड़ा।यही वह संदर्भ है जब आतंकवाद और इस्लाम के अन्त:सम्बन्ध पर जोर दिया गया।इस संबंध के बड़े पैमाने पर स्टारियोटाइप विभिन्न माध्यमों के जरिए प्रचारित किए गए।इसके विपरीत पश्चिमी देशों में होने वाली घटनाओं को कभी भी ईसाइयत से नहीं जोड़ा गया और न 'पश्चिमी सभ्यता' या 'अमरीकी जीवन शैली' से जोड़ा गया।इसी तरह शीतयुध्दीय राजनीति से प्रेरित होकर इस्लाम और भ्रष्टाचार के अन्त:संबंध को खूब उछाला गया।
         भूमंडलीय माध्यमों के इस्लाम विरोध की यह पराकाष्ठा है कि जो मुस्लिम राष्ट्र अमरीका समर्थक हैं उन्हें भी ये माध्यम पश्चिमी देशों की जमात में शामिल नहीं करते।यहाँ तक कि ईरान के शाह रजा पहलवी को जो घनघोर कम्युनिस्ट विरोधी था और अमरीकापरस्त था,बुर्जुआ संस्कार एवं जीवन शैली का प्रतीक था,उसे भी पश्चिम ने अपनी जमात में शामिल नहीं किया।इसके विपरीत अरब-इजरायल विवाद में इजरायल को हमेशा पश्चिमी जमात का अंग माना गया और अमरीकी दृष्टिकोण व्यक्त करने वाले राष्ट्र के रुप में प्रस्तुत किया गया।आमतौर पर इजरायल के धार्मिक चरित्र को छिपाया गया।जबकि इजरायल में धार्मिक तत्ववाद की जड़ें अरब देशों से ज्यादा गहरी हैं।इजरायल का धार्मिक तत्ववाद ज्यादा कट्टर और हिंसक है।आमतौर पर लोग यह भूल जाते हैं कि गाजापट्टी के कब्जा किए गए इलाकों में उन्हीं लोगों को बसाया गया जो धार्मिक तौर पर यहूदी कट्टरपंथी हैं।इन कट्टरपंथियों को अरबों की जमीन पर बसाने का काम इजरायल की लेबर सरकार ने किया, जिसका 'धर्मनिरपेक्ष' चरित्र था।इतने बड़े घटनाक्रम के बाद भी भूमंडलीय प्रेस यह प्रचार करता रहा कि मध्य-पूर्व में किसी भी देश में जनतंत्र कहीं है तो सिर्फ इजरायल में है।मध्य-पूर्व में पश्चिमी देश इजरायल की सुरक्षा को लेकर सबसे ज्यादा चिंतित हैं।अन्य किसी राष्ट्र की सुरक्षा को लेकर वे चिंतित नहीं हैं।अरब देशों की सुरक्षा या फिलिस्तीनियों की सुरक्षा को लेकर उनमें चिंता का अभाव है।इसके विपरीत फिलिस्तीनियों के लिए स्वतंत्र राष्ट्र की स्थापना के लिए संघर्षरत फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन को अमरीका ने आतंकवादी घोषित किया हुआ है।
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