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January, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

रोहित के सच को यहां से देखो

हैदराबाद विश्वविद्यालय के दलित छात्र की आत्महत्या की घटना शर्मनाक है,सवाल यह है कि हमारा समाज उसे बचा क्यों नहीं पाया ?सिद्धांततः आत्महत्या प्रतिवाद का पॉजिटिव कदम नहीं है।लेकिन कवि केदारनाथ सिंह ने इसे आत्महत्या न कहकर शहादत कहा है,रोहित को शहीद का दर्जा दिया है।इसलिए रोहित को शहीद के रूप में देखें।मैं निजी तौर पर केदारनाथ सिंह के नजरिए से सहमत हूँ।केदारनाथ सिंह हाल ही में कलकत्ता वि.वि, में बिड़ला व्याख्यानमाला के तहत “तुलसीदास और आधुनिक हिन्दी कविता” विषय पर बोल रहे थे,उन्होंने यह भी कहा कि रोहित को दरकिनार करके कोई साहित्य-चर्चा संभव नहीं है।

जीवन सबसे मूल्यवान है,जीवन की कीमत पर कोई भी नकारात्मक कदम उठाना सही नहीं है। सारे प्रतिवाद और सहानुभूति के बाद भी रोहित को वापस हासिल नहीं कर सकते। कईबार विचारधारा जब विकल्पहीन हो जाती है तो अवसाद घेरता है,अथवा जनांदोलन में सफलता नहीं मिलती तो अवसाद घेरता है।कईबार विचारधारा की विकल्पहीनता अवसाद पैदा करती है।विचारधारा वही टिकती है जो अपने को अपडेट करे,विकल्प पैदा करे।

एक जमाना था जब आंदोलन करने से उदात्तभाव का विकास होता था ,कुर्…

सुभाषचन्द्र बोस के नाम पर संघीखेल

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हाल ही में सुभाषचन्द्र बोस की 100 गोपनीय फाइल मोदी सरकार ने सार्वजनिक की हैं, इसके पहले कुछ फाइल ममता सरकार ने सार्वजनिक की थीं, मोदी सरकार भी कुछ फाइल पहले सार्वजनिक कर चुकी है।लेकिन इन फाइलों से नया कोई तथ्य सामने नहीं आया, सवाल यह है जब नया कुछ नहीं है तो क्या तालियां सुनने –बजाने के लिए रद्दी गोपनीय फाइल सार्वजनिक की गयी हैं? सुभाषचन्द्र बोस और अन्य क्रांतिकारियों के गोपनीय दस्तावेज सार्वजनिक करने से पहले यदि इन क्रांतिकारियों की समस्त रचनाएं हिन्दी और अंग्रेजी में इंटरनेट पर मुफ्त में केन्द्र सरकार मुहैय्या करा देती तो बड़ा उपकार होता।

पीएम नरेन्द्र मोदी ने नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के सपने के साथ कैसे खिलवाड़ किया है,यह समझने के लिए सिर्फ एक ही उदाहरण काफी है। पीएम मोदी ने सरकार बनाते ही योजना आयोग को खत्म कर दिया। यह एक्शन सीधे सुभाषचन्द्र बोस के सपने की हत्या है। उल्लेखनीय है सुभाषचन्द्र बोस ने अगस्त1942 में एक लेख ‘फ्री इण्डिया एण्ड हर प्रॉब्लम्स’ शीर्षक से लिखा जो उनकी रचनावली में संकलित है।इस लेख में उन्होंने विस्तार के साथ आजाद भारत में आने वाली समस्याओं पर प्रकाश डाला है।इस ल…

मोहनमंडली का मोहनराग

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इन दिनों फेसबुक से लेकर मीडिया तक जिस तरह का हंगामा मोहनमंडली मचाए हुए है वह काबिलेगौर है।सारा नाटक सुभाषचन्द्र बोस के गोपनीय दस्तावेजों के सार्वजनिक किए जाने की आड़ में हो रहा है।इस समूचे प्रसंग को मोहनप्रसंग कहें तो अनुचित न होगा।मोहनमंडली जिस भाव और मंशा के साथ इतिहासनिर्माताओं को प्रदूषित करने के काम में लगी है उससे इतिहास में नए तथ्य और सूचनाएं कम जुड़ेंगे, इतिहास का विकृतिकरण ज्यादा होगा।क्योंकि इनकी पूरी मंशा इतिहास को विकृत करने और इतिहास के प्रति नफरत पैदा करने की है।भारत जैसे लोकतंत्र में साम्प्रदायिक ताकतें इतिहास के प्रति नफरत पैदा करके ही जिंदा रह सकती हैं।जबकि तालिबानी इलाके में इस तरह की ताकतें इतिहास का विध्वंस करती हैं।बाबरी मसजिद विध्वंस एक नमूना मात्र है,उनके पास भविष्य में विध्वंस करने वाली ऐतिहासिक इमारतों की लंबी सूची है।वे सिर्फ उचित माहौल की तलाश में हैं ,ज्योंही अनुकूल माहौल देखेंगे फिर से बाबरीयोजना कहीं पर भी लागू कर सकते हैं। इसका प्रधान कारण है उनका इतिहास के प्रति द्वेषभाव।इसलिए मोहनमंडली में इतिहासप्रेम खोजना चील के घोंसले में मांस का टुकड़ा खोजने के…

मुखौटे का सौंदर्य

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अमा यार अपने ही हाथों कोई माला पहनता है ! माला वह शोभा देती है जब कोई और पहनाए ! जूते तब शोभा देते हैं जब अपने आप पहनो।तुम्हारा हाल बड़ा खराब है हर काम उलटा करते हो।जब सद्भाव रखना चाहिए,तब दंगा करते हो, जब बोलना चाहिए,तब चुप रहते हो,जब चुप रहना चाहिए,तब बढ़-चढ़कर बोलते हो।जब लेखक कह रहे थे निंदा करो,तब तुम्हारे भांड संस्था संचालक चुप थे,जब लेखक इनाम लौटा रहे थे,तब हेकड़ी में तुम गरिया रहे थे,अब कह रहे हो इनाम वापस लेने का नियम नहीं है,नियम बनाओ,डरते क्यों हो ?लेखक खा नहीं जाएंगे ! बुद्धिजीवियों का अपमान करना तुम्हारे खून में है,तुम यदि बुद्धिजीवियों का सम्मान करते तो लेखकों को बोलना न होता तुम खुद रीयल टाइम में बोलते।
रहते हो नेट पर बोलते हो पोस्टकार्टयुग की स्पीड से,यह तो पिछड़ेपन की निशानी है,इससे भारत का माथा ऊँचा नहीं होता।कल रोहित पर जब बोल रहे थे तो सच-सच बताओ इतनी देर क्यों लगी बोलने में,तुमको यह महसूस करने में इतनी देर क्यों लगी कि रोहित किसका बेटा है ? रोहित की माँ का दुख क्या है ? क्या किसी के आदेश की जरूरत थी ?
सच-सच बताओ तुम इतने बेखबर कब से रहने लगे,क्या तुमको नहीं मालूम कि…

रोहित की आत्महत्या से उठे सवाल

हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित की आत्महत्या असामान्य – बर्बर घटना है।विश्वविद्यालय प्रशासन ने सामान्य स्थानीय छात्र विवाद को असामान्य बनाकर बुद्धिहीनता और छात्रविरोधी नजरिए का परिचय दिया है। कल जिस तरह केन्द्रीय मानव संसाधनमंत्री ने इस घटना पर विस्तार से प्रेस कॉफ्रेंस की,उससे साफ जाहिर है कि इस घटना में आरएसएस नीचे से ऊपर तक शामिल है।मेरी जानकारी में किसी विश्वविद्यालय की घटना पर कभी किसी केन्द्रीयमंत्री ने स्वतंत्र भारत के इतिहास में इस तरह कभी कोई प्रेस कॉफ्रेंस नहीं की।ईरानी का सबसे घटिया रूप इस कॉफ्रेस में सामने आया।वह निर्लज्जता से विश्वविद्यालय प्रशासन के बर्बर आचरण की हिमायत कर रही थीं।

केन्द्रीय मंत्री का काम हिमायत करना नहीं है। वह पक्षधर नहीं हो सकता,वह सबका होता है,उसका काम है समाधान खोजना ,सबकी मदद करना,न कि पक्षविशेष की हिमायत करना। लेकिन मोदी सरकार जब से आई है उसके मंत्री खुलेआम निचले स्तर पर संघियों की हरकतों की अंधी हिमायत करके मंत्री के तटस्थ आचरण के नियम का उल्लंघन कर रहे हैं। बेहतर तो यही होता कि स्मृति ईरानी की यह प्रेस कॉफ्रेस आज न होकर उसी द…

मालदा,साम्प्रदायिकमीडिया और सच्चाई-

मेरा साफ मानना है फेसबुक आदि सोशलमीडिया में धर्मनिरपेक्ष और लोकतंत्र पसंद ताकतों को खुलकर मुसलमानों के पक्ष में नियमित लिखना चाहिए।साथ ही मुसलमानों में यदि कोई साम्प्रदायिक हरकत नजर आए तो उसकी तीखी आलोचना भी करनी चाहिए। मालदा आदि की घटनाओं के बहाने मुसलमानों के हकों पर नए सिरे से भगवा ब्रिगेड सक्रिय हो उठा है।ये लोग सरेआम टीवी चैनलों पर सफेद झूठ बोल रहे हैं,गलत तथ्य दे रहे हैं। ऐसे में सोशलमीडिया पर हम अपने सीमित साधनों में मुसलमानों और उनके हकों के बारे में फैलाए जा रहे दुष्प्रचार को बेनकाब करें।मुसलमानों के बारे में छोटी से छोटी चीज पर भी रोज लिखें,मुसलमानों की सोशलमीडिया में उपस्थिति हम सबकी पोस्ट में लिखकर नजर आए,मुसलमान को आस्था से नहीं बचा सकते। फासिस्ट लोग जिस तरह का असत्य प्रचार कर रहे हैं वह बेहद खतरनाक है उसकी गंभीरता को आप समझें,एकजुट हों और मुसलमानों के पक्ष में रोज लिखें।

इलैक्ट्रोनिक मीडिया के नव्य-उदारीकरण के साथ जो वायदे टीवीपुरूषों ने किए थे वे सभी वायदे वे एक-एक करके तोड़ रहे हैं। सबसे खतरनाक बात यह है कि टीवी न्यूज चैनलों में से अधिकांश संगठित ढ़ंग से साम्प्रदायिक त…

कला ,भाजपा और साम्प्रदायिकता-

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हाल ही में भाजपा का विरोध करने वाले कलाकारों पर भाजपा ने जिस तरह हमला करना आरंभ किया है वह शर्मनाक और निंदनीय है। आमिर खान के बोलने के बाद तो ये लोग बौखलाएहुए हैं।संघ के नेतागण सरेआम आमिर खान की फिल्म न चलने देने की धमकी दे रहे हैं।हम सब धर्मनिरपेक्ष लोग उनकी हरकतों की निंदा करते हैं। उल्लेखनीय है कि देश में संघियों से प्रेरणा लेकर अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता भी सक्रिय हो उठी है और विभिन्न बहानों के जरिए हमलावर हो उठी है।इसके कारण फेसबुक पर बहुसंख्यक साम्प्रदायिक के पक्षधर मोदीभक्तों को जहरीला प्रचार करने का एक और मौका मिला है। साम्प्रदायिकता के ये दोनों रूप विषाक्त हैं,जो लोग इनमें अमृतरस खोज रहे हैं वे भारत-विभाजन को भूल रहे हैं।ये दोनों ही साम्प्रदायिक ताकतें एक-दूसरे को जागृत-संगठित कर रही हैं, समाज का विभाजन कर रही हैं और धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक ताने-बाने को कमजोर बना रही हैं। सभी धर्मनिरपेक्ष और लोकतंत्रकामी नागरिकों की यह जिम्मेदारी है कि दोनों ही किस्म की साम्प्रदायिकता के खिलाफ आवाज बुलंद करें।

फेसबुक पर आमिर खान और शाहरूख खान के असहिष्णुता संबंधी बयानों को लेकर जिस तरह क…

जन सांस्कृतिक मंच के 40साल-लोकतांत्रिक विचारधाराओं का संगम है जन सांस्कृतिक मंच

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मथुरा में आज जन सांस्कृतिक मंच की स्थापना के 40 साल पूरे होने पर मित्रगण पूरे जोशोखरोश के साथ सांस्कृतिक आयोजन कर रहे हैं।मैं दुखी हूँ कि उनके बीच में नहीं हूँ। एक सांस्कृतिक संगठन के लिए 40साल बहुत छोटा समय है,लेकिन जन सांस्कृतिक मंच ने 40सालों में अपने सीमित संसाधनों के जरिए जिस तरह की सामाजिक भूमिका मथुरा के माहौल में निभायी है वह काबिलेगौर है। इस दौरान मंच को सैंकड़ों युवाओं को जन संस्कृति से जोड़ने में मदद मिली है।लोकतांत्रिक मूल्यों और मान्याताओं के प्रति आदर-सम्मान का भाव पैदा करने,सामंती सोच और सामंती आदतों से लड़ने की भावनाओं को निर्मित करने में उसने बहुत बड़ी भूमिका निभायी है।

मथुरा का सामान्य परिवेश अ-लोकतांत्रिक मान्यताओं और सामंती सांस्कृतिक मूल्यों से भरा हुआ है। जनसांस्कृतिक मंच की जब स्थापना की गयी तो उस समय सामंती मूल्यों के खिलाफ लड़ने के साथ साथ आपातकाल में अधिनायकवादी राजनीतिक माहौल के खिलाफ लड़ने की भी गंभीर चुनौती थी।लोकतंत्रप्रेमी युवाओं और संस्कृतिकर्मियों ने मिलकर आपातकाल में जन सांस्कृतिक मंच की मथुरा में आज से 40साल पहले स्थापना की।संस्थापकों में प्रमुख थ…