शनिवार, 23 जनवरी 2016

मुखौटे का सौंदर्य


अमा यार अपने ही हाथों कोई माला पहनता है ! माला वह शोभा देती है जब कोई और पहनाए ! जूते तब शोभा देते हैं जब अपने आप पहनो।तुम्हारा हाल बड़ा खराब है हर काम उलटा करते हो।जब सद्भाव रखना चाहिए,तब दंगा करते हो, जब बोलना चाहिए,तब चुप रहते हो,जब चुप रहना चाहिए,तब बढ़-चढ़कर बोलते हो।जब लेखक कह रहे थे निंदा करो,तब तुम्हारे भांड संस्था संचालक चुप थे,जब लेखक इनाम लौटा रहे थे,तब हेकड़ी में तुम गरिया रहे थे,अब कह रहे हो इनाम वापस लेने का नियम नहीं है,नियम बनाओ,डरते क्यों हो ?लेखक खा नहीं जाएंगे ! बुद्धिजीवियों का अपमान करना तुम्हारे खून में है,तुम यदि बुद्धिजीवियों का सम्मान करते तो लेखकों को बोलना न होता तुम खुद रीयल टाइम में बोलते।
रहते हो नेट पर बोलते हो पोस्टकार्टयुग की स्पीड से,यह तो पिछड़ेपन की निशानी है,इससे भारत का माथा ऊँचा नहीं होता।कल रोहित पर जब बोल रहे थे तो सच-सच बताओ इतनी देर क्यों लगी बोलने में,तुमको यह महसूस करने में इतनी देर क्यों लगी कि रोहित किसका बेटा है ? रोहित की माँ का दुख क्या है ? क्या किसी के आदेश की जरूरत थी ?
सच-सच बताओ तुम इतने बेखबर कब से रहने लगे,क्या तुमको नहीं मालूम कि देश निरंतर गैर जरूरी मसलों पर उलझता जा रहा है,समस्त कामकाज ठप्प है,समूचा मीडिया तुम्हारी मरी हुई धुन पर नाच रहा है।तुम्हारे मुखोटे लगातार बर्बर आचरण कर रहे हैं, नायक का मुखौटे इस कदर अपमान करें यह तो हमने कहीं नहीं देखा, मुखौटे तुमको रीयल रूप में और रीयल टाइम में जानते हैं,इसलिए वे तुम्हारे आंसुओं या गम पर दुखी नहीं होते,वे तो तुम्हारी रीयल अनुभूति में रहते हैं।तुम्हारा सच तो मुखौटे में व्यक्त होता है।तुम्हारी आत्मा तो मुखौटे में रहती है।तुम क्या सोच रहे हो यह तो तुम नहीं मुखौटे बताते हैं।क्योंकि तुम तो तुम नहीं हो मुखौटा हो। 
सच कहूँ,तुमसे ज्यादा ईमानदार तुम्हारे मुखौटे हैं।कम से कम वे निरंतर घृणा के भाव में रहते हैं,घृणा को खुशबू समझते हैं,गंदगी को उसूल समझते हैं।संविधान को कागज का टुकड़ा समझते हैं,दूसरों की भावनाओं-इच्छाओं और अनुभूतियों को पैरों तले कुचलने में विश्वास करते हैं।वे ही असली वंशधर हैं तुम्हारे।तुमको गलतफहमी है कि तुम रोहित के प्रति दुख व्यक्त करके जनता का दिल जीत लोगे,अरे यार, तुम पहले मुखौटों का दिल जीतकर दिखाओ,मुखौटे तो सरेआम तुम्हारे बयान पर पेशाब कर रहे हैं। यह सिर्फ हिन्दुत्व परंपरा में ही संभव है जहां मुखौटे असली से ज्यादा सुंदर होते हैं।


4 टिप्‍पणियां:

  1. अत्यंत सुंदर एवं यथार्थपूर्ण अभियक्ति l

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  2. अत्यंत ही सुंदर एवं यथार्थपूर्ण अभियक्ति l

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  3. सोलह आने सच्ची व्याख्या है ।
    seetamni.blogspot. in

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  4. मुखौटों का सत्य उघड़ने लगा है।

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