संदेश

November, 2012 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मैत्रेयी पुष्पा के बहाने स्त्री आत्मकथा के पद्धतिशास्त्र की तलाश

चित्र
आत्मकथा में सब कुछ सत्य नहीं होता बल्कि इसमें कल्पना की भी भूमिका होती है। आत्मकथा या साहित्य में लेखक का 'मैं' बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। यह 'बहुआयामी होता है। उसी तरह लेखिका की आत्मकथा में 'मैं' का एक ही रूप नहीं होता। बल्कि बहुआयामी 'मैं' होता है। 

मैत्रेयी पुष्पा के पास एक लेखिका का 'मैं' है। साथ ही एकयुवा छात्रा,बिंदास युवती, परंपरागत पत्नी और माँ का भी 'मैं' है। आमतौर पर हिन्दी में लेखक के 'मै' पर जब भी बातें हुई हैं तो उसके एकल रूप की चर्चा हुई हैं। खासकर छायावादी लेखकों के संदर्भ में जो बहस चली है वह लेखक के एकल 'मैं' पर केन्द्रित है। रामविलास शर्मा से लेकर नामवर सिंह तक सबके नजरिए में छायावाद के लेखक का एकल 'मैं' है।यह 'मैं' के प्रति असंपूर्ण नजरिया है। इसके कारण एकल 'मैं' की स्टीरियोटाइप समझ बनी है। 'मैं' महज भावों की अभिव्यक्ति नहीं है बल्कि उसकी अस्मिता की भी अभिव्यक्ति है। इसमें व्यक्ति और समाज, समुदाय और व्यक्ति, लिंग और साहित्य घुले-मिले होते हैं। इसी तरह एक ही पा…

ममता के हस्तक्षेप के इंतजार में 35 बंगाली मजदूर

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को कल तक उनको किसी भी बंगाली पर हमला होने,उसकी अवैध गिरफ्तारी पर गुस्सा आता था लेकिन इनदिनों वे बदली हुई सी लग रही हैं। ममता का बंगाली जाति के प्रति प्रेम निर्विवाद है। लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी बंगाली जाति के प्रति बेरुखी बढ़ी है। उनकी बेरुखी की जड़ें हमारी राजनीतिक संस्कृति में हैं। भारत में इनदिनों जिस तरह की वोटबैंक संस्कृति पैदा हुई है उसमें आम जनता के प्रति बेगानापन और जातीय घृणा का बढ़ना स्वाभाविक बात है। 

वोटबैंक संस्कृति दलीय मोह पैदा करती है।भाषायी,धार्मिक और जातिवादी घृणा के जरिए अपना विस्तार करती है। यह राजनीति में नकारात्मक फिनोमिना है। इसके कारण सामाजिक विभाजन तेज होता है। मन में दरारें पैदा होती हैं। प्रशासनिक संरचनाएं इसकी गिरफ्त में जल्दी आती हैं। साथ ही वंचितों और हाशिए के लोगों से प्रशासन की दूरी बढ़ती है। अनुयायियों के प्रति प्रेम में इजाफा होता है। इसके अलावा अविश्वास और संशय में तेजी से वृद्धि होती है। उत्तर- पूर्व के राज्यों में यह बीमारी पहले आई बाद में इसने अन्य राज्यों में पैर पसारने आरंभ कर दिए । हाल ही में महाराष्ट्र में …

ममता का नया आनंदराग जमीन लो और कारखाना खोलो

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सारी राजनीति मूलतःआनंद, महोत्सव, मेले, ठेले आदि के तानेबाने में बुनी है। ममता की धारणा है आनंद है तो विकास है। आनंद का जितना व्यापक राजनीतिक उपभोग ममता सरकार ने पैदा किया है वैसा अन्य किसी मुख्यमंत्री ने नहीं किया। वे राजनीतिक तनावों को आनंद से धोना चाहती हैं।  9 नवम्बर को उद्योगपतियों के साथ बैठक-डिनर का आयोजन था और 10 को कोलकाता फिल्म महोत्सव का आरंभ होने जा रहा है। जिसमें महानायक अमिताभ बच्चन से लेकर हीरो शाहरूख खान आदि के उपस्थित रहने की संभावना है। 

ममता सरकार का बुनियादी लक्ष्य है राज्य के उद्योग और संस्कृति उद्योग को चंगा करना। इस लक्ष्य को पाने के लिए वे अपने नए बदले मिजाज में नजर आ रही हैं। वे तनाव के सवालों से कन्नी काट रही हैं। राज्य की राजनीति के स्वस्थ विकास के लिए यह जरूरी है कि मुख्यमंत्री विकास के सवालों पर केन्द्रित करे। विकास के सवालों पर मुख्यमंत्री की सक्रियता आनंदमय वातावरण के जरिए दिखाई दे रही है। कुछ लोगों को इसमें असुविधा हो सकती है। लेकिन राज्य के राजनीतिक वामस्वर को मद्धिम करने के लिहाज से ममता का आनंदराग मददगार साबित हो सकता है…

मुस्लिम वोटबैंक की घेराबंदी में जुटी माकपा और ममता

चित्र
पश्चिम बंगाल की राजनीति में मुस्लिम मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए माकपा और ममता दोनों ने अपने प्रयास तेज कर दिए हैं। धार्मिकनेताओं को बहला-फुसलाकर मतदाताओं को राजनीतिक समर्थन में तब्दील करने की कोशिशें तेज हो गयी हैं। 

सन् 2014 के लोकसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल के मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका अदा करेंगे। यहां 30 फीसदी मुस्लिम जनसंख्या है। दूसरी ओर ममता ने राज्य सरकार की ओर से मौलवियों को सरकारी भत्ते की घोषणा करके मुस्लिम मतदाताओं को महत्वपूर्ण बना दिया है और साथ ही यह भी संदेश दिया है आगामी चुनावों में मौलवियों की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी। माकपा इस सबसे बेहद परेशान है। असल में ममता ने चंद वर्षों में ही मुस्लिम मतदाताओं में अपनी पुख्ता पकड़ बनाकर माकपा के लिए सिरदर्द पैदा कर दिया है।

उल्लेखनीय है ममता को सत्ता में लाने में मुस्लिम मतदाताओं की निर्णायक भूमिका रही है। जंगीपुर लोकसभा उपचुनाव में वामदलों को मुस्लिमों को अपनी ओर खींचने में सफलता नहीं मिली।जबकि वहां पर तृणमूल कांग्रेस ने चुनाव नहीं लड़ा था। पिछले दिनों माकपा महासचिव प्रकाश कारात ने यह चिन्ता व्यक्त की …

फेसबुक और लंपटगिरी

चित्र
-1- 

कुंठा और छद्म में जीनेवाला व्यक्ति बेहद कमजोर और आत्मपीड़क होता है।इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो फेसबुक लंपट किसी भी स्त्री के साथ दुर्व्यवहार करके या उससे गंदी बातें कहकर स्त्री का तो अपमान करते हैं साथ ही आत्मपीड़ा से भी गुजरते हैं। ऐसे आत्मपीडकों के लिए इंटरनेट विष की तरह है।



-2-

फेसबुक लंपट की विशेषता है कि वह छद्म में जीता है, छद्मभाषा लिखता है,पहचान छिपाता है।

-3-

फेसबुक पर लड़कियों के साथ बदसलूकी और लंपटगिरी करने वाले लोग वस्तुतः बीमार मन के कुण्ठित लोग हैं। स्त्री के साथ अपमान या हेय या उसे कम करके देखने वाली भाषा वस्तुतःकुण्ठा की उपज है। इन लोगों को किसी मनोचिकित्सक के पास जाना चाहिए और फेसबुक -चैटिंग से दूर रहना चाहिए।

-4-

फेसबुक लंपटों में एक लक्षण यह भी देखा गया है कि जो लड़की मित्रता के प्रस्ताव का जबाव नहीं देती तो उसके मैसेज बॉक्स को अश्लील तस्वीरों, गालियों और सेक्सुअल भाषा से भर देते हैं । ऐसे लंपटों के नामों को लड़कियों को फेसबुक पर वॉल पर दे देना चाहिए।

-5-

फेसबुक लंपटों से कहना है कि कामुकता को स्त्री में न खोजें ,कामुकता का श्रेष्ठ कलारूपों में आनंद लें।

-6-

फे…

बाल ठाकरे और फेसबुक पर उठे सवाल

-1- 

बाल ठाकरे! बाल ठाकरे!

कैसे फासिस्टी प्रभुओं की --

गला रहा है दाल ठाकरे!

अबे संभल जा, वो आ पहुंचा बाल ठाकरे !

सबने हां की, कौन ना करे !

छिप जान, मत तू उधर ताक रे!

शिव-सेना की वर्दी डाटे जमा रहा लय-ताल ठाकरे!

सभी डर गए, बजा रहा है गाल ठाकरे !

गूंज रही सह्यद्रि घाटियां, मचा रहा भूचाल ठाकरे!

मन ही मन कहते राजा जी; जिये भला सौ साल ठाकरे!

चुप है कवि, डरता है शायद, खींच नहीं ले खाल ठाकरे !

कौन नहीं फंसता है, देखें, बिछा चुका है जाल ठाकरे !

बाल ठाकरे! बाल ठाकरे! बाल ठाकरे! बाल ठाकरे!

बर्बरता की ढाल ठाकरे !

प्रजातंत्र के काल ठाकरे!

धन-पिशाच के इंगित पाकर ऊंचा करता भाल ठाकरे!

चला पूछने मुसोलिनी से अपने दिल का हाल ठाकरे !

बाल ठाकरे! बाल ठाकरे! बाल ठाकरे! बाल ठाकरे!

-----नागार्जुन (जनयुग, 7 जून 1970)



-2-

उद्धव ठाकरे को टीवी वालों ने जिस तरह हिन्दूरीति से अपने पिता का अंतिम संस्कार करते हुए लाइव प्रसारित किया है उससे टीवी प्रसारण की आचार संहिता के प्रचलित मानकों का सीधे उल्लंघन हुआ है।

उल्लेखनीय है रंगनाथ मिश्रा कमीशन की रिपोर्ट में श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी द्वारा हिन्…

उद्योगपति सम्मेलन को लेकर ममता सरकार तनाव में

चित्र
आगामी 9 नवम्बर को राज्य सरकार की ओर से उद्योगपतियों का एक सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है। इस सम्मेलन में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की देश के प्रसिद्ध उद्योगपतियों से सामूहिक मुलाकात होगी। उद्योगपतियों के सामने पिछले साल उन्होंने जो वायदे किए थे उनमें से एक भी वायदा पूरा नहीं हुआ है। इसके अलावा किसी भी नए प्रकल्प पर राज्य में काम आरंभ नहीं हुआ है। राज्य प्रशासन को पेशेवर ढ़ंग से चलाने की बजाय दलतंत्र के आधार पर चलाया जा रहा है इससे देश के उद्योगपति परेशान हैं। उद्योगपतियों में ममता सरकार के बंद विरोधी नजरिए को लेकर सकारात्मक भाव है लेकिन वे चाहते हैं कि सरकार इससे आगे जाए और स्थानीय अशांति और राजनीतिक दादागिरी को नियंत्रित करे। कई उद्योगपतियों ने यह भी कहा कि ममता सरकार का बंद विरोधी रवैय्या असल में माकपा विरोध की राजनीति से जुड़ा है। इसके पीछे कोई पॉजिटिव सोच नहीं है। जिन उद्योगपतियों से इस बीच में हमारी बातचीत हुई उनमें से अधिकांश राजनीतिक मिलिटेंसी को लेकर बेहद चिन्तित हैं। इस बीच में कई उद्योगपतियों ने निजी तौर पर राज्यप्रशासन को अपनी भावनाओं से भी अवगत कराया है। 
उद्योग जगत को उम्…

फेसबुक और विचार

चित्र
फेसबुक लेखन को कचड़ा लेखन मानने वालों की संख्या काफी है। ऐसे भी सुधीजन हैं जो यह मानते हैं कि केजुअल लेखन के लिए फेसबुक ठीक है गंभीर विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए यह माध्यम उपयुक्त नहीं है। यह धारणा बुनियादी तौर पर गलत है। फेसबुक पर आप चाहें तो विचारों का गंभीरता के साथ प्रचार-प्रसार भी कर देते हैं।


-2- 

फेसबुक पर व्यक्त विचारों का वैसे ही असर होता है जैसा असर किसी के भाषण को सुनते हुए होता है। एक ही शर्त है विचार खुले मन और बिना शर्त के साथ व्यक्त हों। पढ़ने वाला माने तो ठीक न माने तो ठीक। फेसबुक विचारों की कबड्डी का मैदान है। 

-3 - 

फेसबुक में विचार महान होता है बोलने वाला नहीं। यहां पर आप अपने विचारों को अनौपचारिक तौर पर वैसे ही पेश करें जैसे चाची अपने विचार पेश करती है। बातों बातों में विचारों की प्रस्तुति ही फेसबुक की विचार-कला की धुरी है। 

-4 - 

फेसबुक में विचार रखें और चलते बनें,विचारों के शास्त्रार्थ की यह जगह नहीं है। यह कम्युनिकेशन का मंच है और विचार को भी कम्युनिकेशन के ही रूप में आना चाहिए।फलतः विचार को विचारधारा के बंधनों से यहां मुक्ति मिल जाती है। विचार यहां कम्युनिकेशन है …