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बुधवार, 23 मार्च 2011

भगतसिंह -सुखदेव-राजगुरू की शहादत पर पं. मदनमोहन मालवीय, पटेल, नेहरू,सुभाषचन्द्र बोस की श्रृद्धांजलियां


पंडित मदनमोहन मालवीय

फांसी रुकवाने के लिए सभी तरफ से, सभी तबकों के लोगों की अपीलें आ रहीं थीं, ज्यादातर वायसराय के नाम थीं।
   मदनमोहन मालवीय ने वायसराय को एक तार भेजा, जिसमें लिखा था: ''क्या मैं आप से दरख्वास्त कर सकता हूं  कि आप अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल कर भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फांसी की सजा को आजीवन काला पानी कर दें।... इन नौजवानों का कोई निजी स्वार्थ नहीं था, बल्कि देशभक्त से प्रेरित था। यह देश के लोगों को एक गहरा झटका देगा।... इस समय आपकी तरफ से की गयी दया हिंदुस्तानी जनता की राय में एक फायदेमंद असर पैदा करेगी।''
   कराची सम्मेलन में प्रस्थान करने से पहले मालवीयजी ने प्रेस वार्ता में कहा था : ''इस फांसी से मुझे इतना दु:ख हुआ है कि मेरे मुंह से शब्द नहीं निकलते।''

सरदार वल्लभ भाई पटेल

अंग्रेजी कानून इस बात पर अभिमान से झूमता था कि वह गवाही में जिरह के द्वारा प्रमाणित किए बिना किसी अभियुक्त को सजा नहीं देता, परंतु उसी कानून ने ऐसी गवाही के विश्वास पर, जो घटना के बहुत देर बाद प्राप्त हुई थी और जिसमें जिरह का नाम न था- भारत के एक श्रेष्ठ युवक की हत्या कर डाली। किसी व्यक्ति को ढीठता और उच्छृंखलता के अपराध में सजा दी जा सकती है, परंतु उसे फांसी पर लटका देना कहां का न्याय है।

जवाहरलाल नेहरू

मैंने इन देश भक्तों के अंतिम दिनों में अपनी जबान पर लगाम लगा रखी थी, क्योंकि मुझे संदेह था, कि मेरे जबान खोलते ही कहीं फांसी की सजा रद्द होने में बाधा न पहुंचे। यद्यपि मेरा हृदय बिल्कुल पक गया था और खून अंदर से उबाल खा रहा था, परंतु तिस पर भी मैं मौन था। परंतु अब, फैसला हो गया। इस देश भर के लोग मिलकर भी भारत के ऐसे

युवक की रक्षा न कर सके, जो हमारा प्यारा रत्न था और जिसका अदम्य उत्साह, त्याग और विकट साहस भारत के युवकों को उत्साहित करता था। भारत आज अपने प्यारे बच्चों को फांसी से छुड़ाने में असमर्थ है। इस फांसी के विरोध में देश भर में हडतालें होंगी और जुलूस निकलेंगे। हमारी इस परतंत्राता और असहायता के कारण देश के कोन-कोने में शोक का अंधकार छा जायेगा। परंतु उनके ऊपर हमें अभिमान भी होगा और जब इंग्लैंड हम से     संधि का प्रस्ताव करेगा, उस समय उसके और हमारे बीच में भगत सिंह का मृत शरीर उस समय तक रहेगा, जब तक हम उसे विस्मृत न कर दें।



सुभाषचंद्र बोस

मार्च 1931 का महीना क्रांतिकारियों के नाम रहा। भगत सिंह अपनी लोकप्रियता के चरम पर थे। गांधी की छवि मलिन पड़ गई थी। जब भगत सिंह को फांसी दिए जाने की बात सामने आई तो दो लाख से भी ज्यादा लोगों ने उन्हें फांसी न देने के लिए अंग्रेज सरकार से अपील की।

   इतना ही नहीं सुभाषचंद्र बोस ने तो इसके खिलाफ 20 मार्च, 1931 को दिल्ली के आजाद मैदान में धरना दिया। धरना और आम सभा को रोकने के लिए वायसराय इर्विन ने गांधी के प्रभाव का प्रयोग किया। गांधी ने सुभाषचंद्र बोस से ऐसा न करने का  अनुरोध भी किया। सुभाषचंद्र बोस ने गांधी के सरकार परस्त आदेश को खुले आम ठोकर मारी और आम सभा को संबोधित करते हुए कहा :
   ''आज सारा हिंदुस्तान जानता है कि भगत सिंह और उनके साथियों-राजगुरु और सुखदेव को किसी भी वक्त फांसी दी जा सकती है। मुझे यह जरूर कहना चाहिए कि कल दोपहर जब मैं दिल्ली स्टेशन पर उतरा तो एक भयानक थक्के की शक्ल में यह खबर मुझे मिली।... हम सब एक जुट होकर और एक आवाज में यह कहते हैं कि भगत सिंह और उनके साथियों की यह सजा तुरंत बदल दी जाए। भगत सिंह आज एक आदमी नहीं है बल्कि तरुण भारत की एक पहचान हैं, भारतीय क्रांति के एक संस्थान हैं। वे विद्रोह की भावना के प्रतीक हैं जो कि आज पूरे भारत में फैली हुई है। हम उनके तरीकों से असहमत हो सकते हैं, मगर उनके नि:स्वार्थ देश प्रेम, त्याग और बलिदान की पवित्रा भावना को अनदेखा नहीं कर सकते। वे हमारे गर्व और गौरव के प्रतीक हैं। भारत माता की श्रेष्ठतम संतान हैं।
   ''जिस ढंग से उनके मृत शरीरों को दफनाया गया, उसके विषय में भी तरह-तरह की खबरें सारे पंजाब में फैल गईं। आज इतने दिनों बाद उस गहन शोक की कल्पना करना असंभव है जो सारे देश में एक कोने से दूसरे कोने तक फैल गया। विभिन्नदेश भर के लोग मिलकर भी भारत के ऐसे कारणों से भगत सिंह नौजवानों में नई जागृति का प्रतीक बन गया था। जनता की उत्सुकता यह जानकर ही शांत नहीं हुई कि वास्तव में उन पर लगाए गए कत्ल के इल्जाम के दोषी थे या नहीं, उनके लिए यह जानना काफी था कि वह पंजाब में नौजवान भारत सभा (युवा आंदोलन) का जनक था। उनके एक साथी जतीन दास शहीद की मौत मरे और वह और उनके साथी फांसी के तख्ते पर भी निडर रहे।
   ''सभी ने यह सोचा कि कांग्रेस की बैठक एक शोक की छाया में हो रही है। नव निर्वाचित अध्यक्ष सरदार वल्लभ भाई पटेल ने सम्मेलन के पहले दिन के आमोद-प्रमोद को रद्द करने का आदेश दिया। यहां तक कि जब महात्मा कराची के निकट उतरे तो वहीं क्रुध्द प्रदर्शन किया गया और कई नौजवानों ने काले फूलों और काली मालाओं से उनकी अगवानी की। नौजवानों के एक काफी बड़े हिस्से की भावना यह थी कि महात्मा ने भगत सिंह तथा उनके साथियों के ध्येय के साथ विश्वासघात किया है।
   ''सम्मेलन में पारित किए गए प्रस्तावों में एक प्रस्ताव भगत सिंह और उनके साथियों के साहस तथा आत्मबलिदान की प्रशंसा करते हुए, हालांकि सभी हिंसा की कार्रवाहियों की भर्त्सना करते हुए पारित किया गया। यह प्रस्ताव बंगाल प्रदेश कांग्रेस द्वारा 1924 में पारित किए गए, 'गोपीनाथ साहा प्रस्ताव' से मिलता-जुलता था जिसे महात्मा ने कठोरता से अस्वीकार किया था। कराची में परिस्थितियां इस प्रकार बन गई कि यह प्रस्ताव ऐसे लोगों को रखना पड़ा जो सामान्य परिस्थितियों में इससे मीलों दूर रहते। जहां तक महात्मा का प्रश्न था, उन्हें अपनी आत्मचेतना को लचीला बनाना पड़ा। लेकिन यह काफी नहीं था। स्टेज की व्यवस्था को पूरी तरह व्यवस्थित करने के लिए सरदार भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह को मंच पर बुलाया गया और कांग्रेस नेताओं के समर्थन में उनसे बुलवाया गया।''

23 मार्च शहीद दिवस के मौके पर विशेष- शहीदों की फांसी का यादगार अविस्मरणीय क्षण- कुलदीप नैयर


   23 मार्च का दिन उन आम दिनों की तरह ही शुरू हुआ, जब सुबह के वक्त राजनैतिक बंदियों को उनकी कोठरियों से बाहर निकाला जाता था। आम तौर पर वे सारा दिन बाहर रहते थे और सूरज छुपने के बाद ही वापिस अंदर जाते थे। लेकिन आज, जब वार्डन चरत सिंह शाम को करीब चार बजे सामने आए और उन्हें अंदर जाने के लिए कहा तो वे सभी हैरान हो गए।
      वापिस अपनी कोठरियों में बंद होने के लिए यह बहुत जल्दी था। कभी-कभी तो वार्डन की झिड़कियों के बावजूद भी सूरज छुपने के काफी समय बाद तक वे बाहर रहते थे। लेकिन इस बार वह न सिर्फ कठोर बल्कि दृढ़ भी था। उसने यह नहीं बताया कि क्यों। उसने सिर्फ यही कहा कि ''ऊपर से आर्डर हैं।''
      बंदियों को चरत सिंह की आदत पड़ चुकी थी। वह उन्हें अकेला छोड़ देता था और कभी भी यह नहीं जांचता था कि वे क्या पढ़ते थे। हालांकि चोरी छुपे अंग्रेजों के खिलाफ कुछ किताबें जेल में लाई जाती थीं, उन्हें उसने (चरत सिंह) कभी जब्त नहीं किया था। वह जानता था कि बंदी बच्चे थे। वे सियासत से गहरा ताल्लुक रखते थे किताबें उन्हें जेल में गड़बड़ी फैलाने के लिए उकसांएगी नहीं।
      उसकी माता-पिता जैसी देखभाल उन्हें दिल तक छू गई थी। वे सभी उसकी इज्जत करते थे और उसे 'चरत सिंह' कह कर पुकारते थे उन्होंने अपने से कहा कि अगर वह उनसे अंदर जाने को कह रहा था, तो कोई न कोई वजह जरूर होगी। एक-एक करके वे सभी आम दिनों से चार घंटे पहले ही अपनी-अपनी कोठरियों में चले गए।
      जिस तरह से वे अपनी सलाखों के पीछे से झांक रहे थे, वे अब भी हैरान थे। तभी उन्होंने देखा कि बरकत नाई एक के बाद एक कोठरियों में जा रहा था। उसने फुसफुसाया कि आज भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी चढ़ा दिया जाएगा। उन्होंने (बंदियों), उससे कहा कि क्या वह भगत सिंह का कंघा, पेन, घड़ी या कुछ भी उनके लिए ला सकता था ताकि वे उसे यादगार के तौर पर अपने पास रख सकें।
   हमेशा मुस्कुराने वाला, बरकत आज उदास था। वह भगत सिंह की कोठरी में गया और एक कंघा व पैन लेकर वापिस आया। सभी उस पर कब्जा करना चाहते थे। सब में से दो ही किस्मत वाले थे, जिन्हें भगत सिंह की वह चीजें मिलीं। वे सभी खामोश हो गए, कोई बात करने के बारे में सोच तक नहीं रहा था। सभी अपनी कोठरियों के बाहर से जाते रास्ते पर देख रहे थे, जैसे कि वे यह उम्मीद कर रहे थे कि भगत सिंह उस रास्ते से गुजरेंगे। वे याद कर रहे थे कि एक दिन जब वे (भगत सिंह) जेल में आए तो एक राजनैतिक बंदी ने उनसे पूछा कि क्रांतिकारी अपना बचाव क्यों नहीं करते। भगत सिंह ने जवाब दिया, उन्हें 'शहीद' हो जाना चाहिए, क्योंकि वे एक ऐसे काम की नुमाइंदगी कर रहे थे जो सिर्फ उनके बलिदान के बाद ही मजबूत होगा, अदालत में बचाव के बाद नहीं। आज शाम वे सभी क्रांतिकारियों की एक झलक पाने के लिए बेकरार थे। लेकिन  वे शाम की खामोशी में, अपने कानों में एक आवाज सुनने का इंतजार करते रह गए।
   फांसी से दो घंटे पहले, भगत सिंह के वकील मेहता को उनसे मिलने की इजाजत दे दी गई। उनकी दरखास्त थी कि वे अपने मुवक्किल की आखिरी इच्छा जानना चाहते हैं और इसे मान लिया गया। भगत सिंह अपनी कोठरी में ऐसे आगे-पीछे घूम रहे थे जैसे कि पिंजरे में एक शेर घूम रहा हो। उन्होंने मेहता का एक मुस्कुराहट के साथ स्वागत किया और उनसे पूछा कि क्या वे उनके लिए 'दि रैवोल्यूशनरी लेनिन' नाम की किताब लाए हैं। भगत सिंह ने मेहता को इसकी खबर भेजी थी क्योंकि अखबार में छपे इस किताब के पुनरावलोकन ने उन पर गहरा असर डाला था।
   जब मेहता ने उन्हें किताब दी, वे बहुत खुश हुए और तुरंत पढ़ना शुरू कर दिया जैसे कि उन्हें मालूम था कि उनके पास ज्यादा वक्त नहीं था। मेहता ने उनसे पूछा कि क्या वे देश को कोई संदेश देना चाहेंगे। अपनी निगाहें किताब से बिना हटाए, भगत सिंह ने कहा, ''मेरे दो नारे उन तक पहुंचाएं-'साम्राज्यवाद खत्म हो' (डाऊन विद इम्पीरिलिज्म) और 'इंकलाब जिंदाबाद' (लॉग लिव रैवोल्यूशन)।''
   मेहता    : ''आज तुम कैसे हो?''
   भगत सिंह : ''हमेशा की तरह खुश हूं।''
   मेहता    : ''क्या तुम्हें किसी चीज की इच्छा है?''
   भगत सिंह : ''हां, मैं दुबारा से इस देश में पैदा होना चाहता हूं ताकि इसकी                       सेवा कर सकूं।''   
   भगत सिंह ने उसे कहा कि पंडित नेहरू और बाबू सुभाषचंद्र बोस ने जो रुचि उनके मुकदमे में दिखाई उसके लिए दोनों का धन्यवाद करें। मेहता राजगुरु से मिले, उन्होंने कहा, ''हमें जल्दी ही मिलना चाहिए।'' सुखदेव ने मेहता को याद दिलाया कि वे जेलर से वह कैरमबोर्ड वापिस ले लें, जो कि कुछ महीने पहले मेहता ने उन्हें दिया था।
   मेहता के जाने के तुरंत बाद अधिकारियों ने उन्हें बताया कि उन तीनों की फांसी का वक्त ग्यारह घंटे घटाकर कल सुबह छह बजे की जगह आज शाम सात बजे कर दिया गया है। भगत सिंह ने मुश्किल से किताब के कुछ ही पन्ने पढे थे।
   ''क्या आप मुझे एक अध्याय पढ़ने का वक्त भी नहीं देंगे?'' भगत सिंह ने पूछा। बदले में उन्होंने (अधिकारी), उनसे फांसी के तख्ते की तरफ जाने को कहा।
      तीनों के हाथ बंधे हुए थे, वे संतरियों के पीछे लंबे-लंबे डग भरते हुए सूली की
तरफ बढ़ रहे थे। उन्होंने जाना-पहचाना क्रांतिकारी गीत गाना शुरू कर दिया:               
            कभी वो दिन भी आएगा कि जब आजाद हम होंगे;                 
            ये अपनी ही जमीं होगी ये अपना आसमां होगा।
            शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले;
            वतन पर मिटने वालों का यही नाम-ओ-निशां होगा॥
      एक-एक करके तीनों का वज़न किया गया। उन सबका वजन बढ़ गया था। फिर तीनों नहाए और उन्होंने कपड़े पहने, मगर मुंह नहीं ढके।
      चतर सिंह ने भगत सिंह के कान में फुसफुसाया वाहे गुरु से प्रार्थना कर लें। वे हंसे और कहा, ''मैंने अपनी पूरी जिंदगी में भगवान को कभी याद नहीं किया, बल्कि भगवान को दुखों और गरीबों की वजह से कोसा जरूर है। अगर अब मैं उनसे माफी मांगूगा तो वे कहेंगे कि '' यह डरपोक है जो माफी चाहता है क्योंकि इसका अंत करीब आ गया है।''
      भगत सिंह ने ऊंची आवाज़ में एक भाषण दिया, जिसे कैदी अपनी कोठरियों से भी सुना सकते थे। ''असली क्रांतिकारी फौजें गांवों और कारखानों में हैं, किसान और मजदूर। लेकिन हमारे नेता उन्हें नहीं संभालते और न ही संभालने की हिम्मत कर सकते हैं। एक बार जब सोया हुआ शेर जाग जाता है, तो जो कुछ हमारे नेता चाहते हैं वह उसे पाने के बाद भी नहीं रुकता हैं''
      ''अब मुझे यह बात आसान तरीके से कहने दें। आप चिल्लाते हैं 'इंकलाब जिंदाबाद', मैं यह मानता हूं कि आप इसे दिल से चाहते हैं। हमारी परिभाषा के अनुसार, जैसे कि असेंबली बम कांड के दौरान, हमारे वक्तव्य में कहा गया था, क्रांति का मतलब है वर्तमान सामाजिक व्यवस्था को पूरी तरह से उखाड़ फेंकना और इसकी जगह समाजवाद को लाना... इसी काम के लिए हम सरकारी व्यवस्था से निबटने के लिए लड़ रहे हैं। साथ ही हमें लोगों को यह भी सिखाना है कि सामाजिक कार्यक्रमों के लिए सही माहौल बनाए। संघर्ष से हम उन्हें सबसे बेहतर तरीके से शिक्षित और तैयार कर सकते हैं।
      ''पहले अपने निजीपन को खत्म करें। निजी सुख-चैन के सपनों को छोड़ दें। फिर काम करना शुरू करें। एक-एक इंच करके तुम्हें आगे बढ़ना चाहिए। इसके लिए हिम्मत, लगन और बहुत दृढ़ संकल्प की जरूरत है। कोई भी हार या किसी भी तरह का धोखा आपको हताश नहीं कर सकता। आपको किसी भी दिक्कत या मुश्किल से हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। तकलीफों और बलिदान से आप जीत कर सामने आएंगे और इस तरह की जीतें, क्रांति की बेशकीमती दौलत होती हैं।''
      सूली बहुत पुरानी थी, मगर हट्टे-कट्टे जल्लाद नहीं। जिन तीनों आदमियों को फांसी की सज़ा सुनाई गई थी, वे अलग-अलग लकड़ी के तख्तों पर खडे थे, जिनके नीचे गहरे गङ्ढे थे। भगत सिंह बीच में थे। हर एक के गले पर रस्सी का फंदा कस कर बांध दिया गया। उन्होंने रस्सी को चूमा। उनके हाथ और पैर बंधे हुए थे। जल्लाद ने रस्सी खींच दी और उनके पैरों के नीचे से लकड़ी के तख्ते हटा दिए। यह एक जालिम तरीका था।
      उनके दुर्बल शरीर काफ़ी देर तक सूली पर लटकते रहे फिर उन्हें नीचे उतारा गया और डाक्टर ने उनकी जांच की। उसने तीनों को मरा हुआ घोषित कर दिया। जेल के एक अफसर पर उनकी हिम्मत का इतना असर हुआ कि उसने उन्हें पहचानने से इंकार कर दिया। उसे उसी वक्त नौकरी से निलम्बित कर दिया गया था। उसकी जगह यह काम एक जूनियर अफसर ने किया। दो अंग्रेज अफसरों ने, जिनमें से एक जेल का सुपरिटेंडेंट था फांसी का निरीक्षण किया और उनकी मृत्यु को प्रमाणित किया।
      अपनी कोठरियों में बंद कैदी शाम के धुंधलके में अपनी कोठरियों के सामने गलियारे में किसी आवाज का इंतजार कर रहे थे, पिछले दो घंटों में वहां से कोई नहीं गुजरा था। यहां तक कि तालों को दुबारा जांचने के लिए वार्डन भी नहीं।
      जेल के घड़ियाल ने छह का घंटा बजाया जब उन्होंने थोड़ी दूरी पर, भारी जूतों की आवाज़ और जाने-पहचाने गीत, ''सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है'' की आवाज सुनी। उन्होंने एक और गीत गाना शुरू कर दिया, ''माई रंग दे मेरा बसंती चोला।'' और इसके बाद वहां 'इन्कलाब जिंदाबाद' और 'हिंदुस्तान आजाद हो' के नारे लगने लगे। सभी कैदी भी जोर-जोर से नारे लगाने लगे। उनकी आवाज इतनी जोर से थी कि वे भगत सिंह के भाषण का कुछ हिस्सा सुन नहीं पाए।
      अब, सब कुछ शांत हो चुका था। फांसी के बहुत देर बाद, चरत सिंह आया और फूट-फूट कर रोने लगा। उसने अपनी तीस साल की नौकरी में बहुत सी फांसियां देखी थीं लेकिन किसी को भी हंसते-मुस्कराते सूली पर चढ़ते नहीं देखा था, जैसा कि उन तीनों ने किया था। देश के तीन फूलों को तोड़कर कुचल दिया गया था। मगर कैदियों को इस बात का कुछ अंदाजा हो गया कि उनकी बहादुरी-गाथा ने अंग्रेजी हुकूमत का          समाधि- लेख लिख दिया था।

तीन नौजवान अब फर्श पर पड़े तीन जिस्म थे, जो अपने आखिरी कर्म का इंतजार कर रहे थे। लगातार निगाह गड़ाए, सैंकड़ों लोग जेल की मोटी-मोटी दीवारों के बाहर इंतजार कर रहे थे। अधिकारियों के सामने अब मुसीबत थी इन मृत शरीरों से निजात पाने की। जब अधिकारियों ने यह बात समझ ली कि अगर बाहर जमा लोगों ने धुंआ या आग की चमक देख ली तो वे हमला कर देंगे, तो उन्होंने जेल के अंदर अंतिम संस्कार करने का विचार छोड़ दिया।
      अधिकारियों ने जेल की पिछली दीवार का एक हिस्सा तोड़ दिया। जब एक हम अंधेरा हो गया तो वहां एक ट्रक लाया गया और उनके शवों को उसमें बोरों की तरह फेंक दिया गया। पहले, संस्कार की जगह रावी नदी का किनारा रखा गया था। लेकिन नदी का पानी काफ़ी उथला था। तब सतलुज पर जाने का फैसला लिया गया। जब ट्रक फिरोजपुर सतलुज के पास जा रहा था, तो सफेद पोश सिपाही उसके आगे-पीछे थे। मगर यह योजना भी बेकार हो गई।
      शवों का संस्कार ठीक तरह से नहीं हुआ था। गांधासिंहवाला गांव के लोग चिताओं को जलते देख सकते थे। बहुत से लोग दौड़ते हुए वहां पहुंच गए। शव जैसे थे, वैसे ही छोड़कर सिपाही अपनी गाड़ियों की तरफ भागे और वापिस लाहौर भाग गए। गांववालों ने बड़ी इज्जत के साथ उनके अवशेषों को इकट्ठा कर लिया।
      फांसी की खबर लाहौर और पंजाब के दूसरे शहरों में जंगल की आग की तरह फैल गई नौजवानों ने सारी रात 'इंकलाब जिंदाबाद' और 'भगत सिंह जिंदाबाद' के नारे लगाते हुए जुलूस निकाले। फलों की दुकानें और सब्जी मंडी बंद रही। गवर्नमेंट कॉलेज को छोड़कर सभी स्कूल और कॉलेज बंद रहे। सरकारी बिल्डिंगों और सिविल लाईंस जहां अफसर रहते थे, इनकी रखवाली के लिए पुलिस टुकड़ियां तैनात कर दी गई थीं।
      लगभग दोपहर तक, जिला मजिस्ट्रेट का जारी किया गया नोटिस लाहौर की दीवारों पर चिपका दिया गया था कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु का अंतिम संस्कार हिंदू और सिक्ख धर्मों के मुताबिक सतलुज नदी के किनारे कर दिया गया था। हांलाकि इस बात को कई सभाओं में चुनौती दी गई और कहा गया कि शवों का संस्कार ठीक से नहीं किया गया था। मजिस्ट्रेट ने इकरारनामा जारी किया मगर किसी ने भी इस पर ध्यान नहीं दिया।
      इस वक्त तक तीनों के अवशेष लाहौर पहुंच चुके थे। नीलागुम्बद से उनकी शोक यात्रा शुरू हुई, यह जगह, वहां से ज्यादा दूर नहीं थी जहां सांडर्स को गोली मारी गई थी। तीन मील से भी लंबे जुलूस में हजारों हिंदू, मुसलमानों और सिक्खों ने हिस्सा लिया। बहुत से लोगों ने काली पट्टियां बांधी हुई थीं और औरतों ने काली साड़ियां पहनी हुई थीं।
      इस जुलूस के लोग 'इंकलाब जिंदाबाद' और 'भगत सिंह जिंदाबाद' जैसे नारे लगा रहे थे। सारी जगह काले झण्डों से पटी पड़ी थी। 'दि मॉल' से गुजरते हुए जुलूस अनारकली बाजार के बीच में रुक गया। इस एलान के बाद कि भगत सिंह की बहिन फिरोजपुर से तीनों के अवशेष लेकर लाहौर आ चुकी हैं, सारी भीड़ चुप हो गई थी।
      तीन घंटों बाद फूलों से सजे तीन ताबूत, जिनके आगे भगत सिंह के माता-पिता थे, जुलूस में शामिल हुए। तेज चीखों से आसमान गूंज उठा। लोग फूट-फूट कर रो रहे थे।
      अचरज, जुलूस रावी नदी के किनारे ही पहुंचा, जहां चौबीस घंटे पहले अधिकारी उनका अंतिम संस्कार करना चाहते थे। लाहौर में एक बहुत बड़ी सभा हुई जिसमें फांसी की आलोचना की गई और इसे गैरकानूनी करार दिया गया। जिस तरह से अधिकारियों ने शवों का अंतिम संस्कार किया था, उस पर भी रोष जताया गया। एक मशहूर उर्दू अखबार के संपादक मौलाना जफर अली खान ने एक कविता पढ़ी, जिसमें कहा गया था कि किस तरह जले हुए शवों को खुले आसमान के नीचे छोड़ दिया गया था।
जैसे ही फांसी की खबर फैली सारा देश शोक में डूब गया।अपना दुःख जाहिर करने के लिए लोग जुलूस निकालने लगे और अपना काम काज बंद कर दिया। पूरा देश रो रहा था, नौजवानों के गले ' भगतसिंह जिंदाबाद' के गगन-भेदी नारों से बैठ गए थे। श्रद्धांजलियां दी जा रही थीं।शोकसभाएं हो रही थीं। लेकिन-
     रवि हुआ अस्त,ज्योति के पत्र
      लिखा रहा गया,वीर भगसिंह का,
      वह अपराजेय समर।
वह समर आज भी शेष है, आगे बढ़ो नौजवानो।
      
(लेखक -कुलदीप नैयर, भारत के प्रसिद्ध पत्रकार हैं, अलीगढ़ से प्रकाशित 'गोदारण' पत्रिका के 'क्रांतिकारी महानायक भगतसिंह' विशेषांक से साभार)




           





23 मार्च शहीद दिवस के मौके पर विशेष-2- मेरा साथी ,मित्र और नेता भगतसिंह -शिव वर्मा


                            (शहीद भगत सिंह)



दो-तीन दिन बाद विजय ने आकर जेल में बिस्मिल पर होने वाली सख्ती और अधिकारियों की सतर्कता का समाचार दिया और बतलाया कि फिलहाल उन्हें छुड़ाने के अपने मंसूबे हमें त्यागने पड़ेंगे। इस समाचार ने भगत सिंह की सारी योजनाएं चौपट कर दीं, उसके सारे ख्वाब तोड़ दिए। बहुत कुछ कोशिशों के बाद बिस्मिल की लिखी एक गज़ल ही विजय के हाथ लग पायी थी। वह गज़ल हमारी योजनाओं को कार्यान्वित होने में देरी होते देख उन्होंने शायद उलाहने के तौर पर लिखी थी; जिसे अधिकारियों ने संभवत: प्रेम की एक साधारण कविता समझ कर पास कर दिया था। इस समय गज़ल की कुछ ही पंक्तियां मुझे याद हैं जो इस प्रकार थीं: 

मिट गया जब मिटने वाला फिर सलाम आया तो क्या,
दिल की बरबादी के बाद उनका पयाम आया तो क्या!
 मिट गई जब सब उमीदें मिट गए सारे खयाल,
 उस घड़ी गर नामावार लेकर पयाम आया तो क्या!
 ऐ दिले नादान मिट जा अब तू कूये यार में,

फिर मेरी नाकामियों के बाद काम आया तो क्या!
 काश अपनी जिंदगी में हम वो मंजर देखते,
 बरसरेतुरबत कोई महशरखराम आया तो क्या!
 आखिरी शव दीद के क़ाबिल थी बिस्मिल की तड़प,
 सुबेहदम कोई अगर बालायेबाम आया तो क्या!

भगत सिंह ने विजय के हाथ से लेकर पर्चा पढ़ा। बिस्मिल का इशारा साफ था-कुछ करना है तो जल्दी करो, बाद में रस्से से लटकती मेरी लाश को तुमने अगर छुड़ा भी लिया तो वह तुम्हारे किस काम आएगी। कागज का वह टुकड़ा उसके हाथ से छूट कर जमीन पर गिर पड़ा और वह माथे पर हाथ रख कर पत्थर की निर्जीव मूर्ति की भांति दीवार के सहारे लुढ़क गया। अब और अधिक बातचीत उस दिन किसी के लिए भी संभव न थी। विजय और सुरेंद्र चले गए और भगत सिंह बगैर कुछ बोले चुप-चाप उठ कर गंगा की ओर चला गया। 

काफी रात बीत जाने पर जब मैं और जयदेव उसकी तलाश में गंगा के किनारे पहुंचे तो उस समय भी वह माथे पर हाथ रक्खे ठंडी रेत पर उसी तरह पत्थर की मूर्ति बना बैठा था। हमने पास जाकर उसके कंधे पर हाथ रक्खा और कमरे में चलने के लिए कहा। वह उठा और परछाई की भांति हमारे पीछे हो लिया, बोला फिर भी नहीं। 

कई महीने के परिश्रम से उसने जहां कुछ भी न था वहां संगठन का एक ढांचा खड़ा किया, योजना बनाई, हथियार जमा किए, साथी जुटाए और जब मंजिल नजदीक आने लगी और उसे लगा कि वह कुछ कर सकने में समर्थ हो सकेगा तो अचानक सब कुछ उलट गया-रह गया था केवल बिस्मिल का उलाहना। भगत सिंह को इससे गहरा आघात लगा, लेकिन एक ही दिन में उसने अपने ऊपर काबू पा लिया। 

दूसरे दिन वह स्वयं ही बोला, ''असफलताओं के सामने सर झुका कर बैठ जाने से तो मार्ग ही अवरुध्द हो जाएगा और तब रास्ते के रोड़े हटा कर बढ़ने के बजाय हम स्वयं ही दूसरों के लिए रोड़ा बन जायेंगे।'' उसने सब साथियों को एकत्रा कर संगठन तथा प्रचार की समस्याओं पर बातचीत की, आगे का कार्यक्रम बनाया और जल्द वापस आने का वादा कर पंजाब चला गया। यह 1927 के शुरू के दिनों की बात है। 

1926 में भगत सिंह, सुखदेव, भगवतीचरण, यशपाल आदि ने लाहौर में नौजवान भारत सभा की स्थापना की थी। यह क्रांतिकारी आंदोलन का एक प्रकार का खुला मंच था जिसका काम था आम सभाओं, बयानों, पर्चों आदि के माध्यम से क्रांतिकारियों के और उनके विचारों का प्रचार करना। शोषण, दरिद्रता, असमानता आदि की संसार व्यापी समस्या पर अध्ययन एवं विचार कर वे लोग इस परिणाम पर पहुंचे थे कि भारत की पूर्ण स्वाधीनता के लिए केवल राजनैतिक ही नहीं बल्कि आर्थिक स्वाधीनता भी आवश्यक है। मैजिक लैंटर्न द्वारा क्रांतिकारी शहीदों के चित्रों का प्रदर्शन और उसके साथ-साथ कमेंटरी के रूप में क्रांतिकारी आंदोलन के संक्षिप्त इतिहास से जनता को अवगत कराना भी उसका एक काम था। प्रचार का वह एक सशक्त माध्यम था। 

नौजवान भारत सभा की स्थापना गुप्त संगठन के कार्य का क्षेत्र तैयार करने और जनता में साम्राज्यवाद विरोधी उग्र राष्ट्रीय भावना जगाने के लिए की गयी थी। भगत सिंह और भगवतीचरण वोहरा उसके मुख्य सूत्राधार थे। भगत सिंह उसके प्रथम महामंत्राी (जनरल सेक्रेटरी) और भगवतीचरण वोहरा प्रथम प्रचारमंत्री चुने गए थे। सुखदेव, धन्वन्तरी, यशपाल और एहसान इलाही भी सभा के प्रमुख एवं सक्रिय सदस्यों में से थे। उस समय समाजवाद की ओर रुझान रखने वाले कांग्रेस के प्राय: सभी नौजवान खिंच कर सभा में आ गए थे।

सभा के कार्यकर्ताओं के राजनैतिक एवं सामाजिक ष्दृष्टिकोण को परिमार्जित करने और उन्हें वैज्ञानिक भौतिकवाद से परिचित कराने में 'सर्वेंट्स आफ़ पीपल्स सोसाइटी' के प्रिंसिपल छबीलदास का विशेष हाथ था। उनकी एक छोटी सी पुस्तिका 'क्या पढें' ने उस समय अध्ययन के लिए पुस्तक चुनने में हमारी काफी सहायता की थी। इनके अलावा कुछ कांग्रेसी तथा गैर कांग्रेसी नेताओं का सहयोग भी सभा को मिलता रहता था। इनमें डॉ. सत्यपाल, डॉ. किचलू, केदारनाथ सहगल और सोहन सिंह जोश के नाम उल्लेखनीय हैं। 

भगत सिंह जब भी कानपुर आता तो अन्य पुस्तकों के साथ नौजवान भारत सभा का कुछ न कुछ साहित्य अपने साथ अवश्य लाता था। राधामोहन गोकुलजी और सत्यभक्त के संपर्क ने कानपुर के हम सभी साथियों में समाजवाद की ओर रुझान पैदा कर दिया था। शचींद्रनाथ सान्याल के माध्यम से श्रीराधामोहन गोकुलजी और सत्यभक्त से भगत सिंह का संपर्क काकोरी से पहले ही स्थापित हो चुका था और यह चारों 

समाजवाद तथा कम्युनिज्म पर काफी विचार विनिमय कर चुके थे। स्वर्गीय श्री गणेश शंकर विद्यार्थी के नेतृत्व में हम लोगों ने कानपुर मजदूर सभा में भी दिलचस्पी लेनी आरंभ कर दी थी। आगे चल कर भगत सिंह ने हमारे उस रुझान को बल दिया और समाजवाद का अध्ययन तथा उस पर बहस आदि करने की प्रेरणा प्रदान की।

उसका कहना था कि अंग्रेजी दासता के विरुध्द संघर्ष तो हमारे युध्द का पहला मोर्चा है। अंतिम लड़ाई तो हमें शोषण के विरुध्द ही लड़नी पड़ेगी। चाहे वह शोषण मनुष्य द्वारा मनुष्य का हो या एक राष्ट्र द्वारा दूसरे का हो। यह लड़ाई जनता के सहयोग के बगैर नहीं लड़ी जा सकती। इसलिए हमें हर संभव उपायों से जनता के अधिक से अधिक निकट पहुंचने का प्रयास करते रहना चाहिए। नौजवान भारत सभा की स्थापना, मजदूर सभा में काम, पत्रा-पत्रिकाओं में लेख-मालाएं, मैजिक लैंटर्न का प्रयोग, पर्चे और पैम्फलेट आदि इसी प्रयास के अंग थे। 

भगत सिंह से पहले प्रचार तथा जनसंपर्क की दिशा में इतना बड़ा संगठित कदम क्रांतिकारियों ने नहीं उठाया था। यहां तक कि पकड़े जाने के बाद अदालत तक को उसने मुख्यतया अपने विचारों के प्रचार के साधन के रूप में ही इस्तेमाल किया। वह अच्छा योध्दा ही नहीं अच्छा प्रचारक भी था। 

प्रचार के दो मुख्य साधन हैं, वाणी तथा लेखनी। भगत सिंह का दोनों पर समान अधिकार था। आमने-सामने की बातचीत में होने के साथ ही वह अच्छा वक्ता भी था। नौजवानों तथा विद्यार्थियों के बीच मैजिक लैंटर्न पर उसके भाषण तो विशेष रूप से लोकप्रिय थे। 

और कलम का धनी तो वह था ही। हिंदी, उर्दू, पंजाबी और अंग्रेजी पर उसका समान अधिकार था। उन दिनों कामरेड सोहन सिंह जोश अमृतसर में 'किरती' नाम से गुरुमुखी तथा उर्दू में एक मासिक पत्रिाका निकालते थे। भगत सिंह उन में नियमित रूप से लिखता था। विभिन्न नामों से 'किरती' में क्रांतिकारी शहीदों की जो जीवनियां प्रकाशित हुई थीं उनमें से अधिकांश भगत सिंह की ही कलम की देन थीं। हिंदी में उसने अधिकतर 'प्रताप' तथा 'प्रभा' (कानपुर), 'महारथी'(दिल्ली) और 'चांद' (इलाहाबाद) में ही लिखा। 

अंग्रेजी में लिखे हुए उसके लेख, अदालती वक्तव्य, पत्रा, पर्चें, आदि उसकी सशक्त शैली के प्रमाण हैं। नौजवान भारत सभा के घोषणापत्रा का अंग्रेजी मसविदा भगवतीचरण ने भगत सिंह के साथ मिलकर 1928 में तैयार किया था। भाषा-शैली तथा देश के उस समय के राजनैतिक स्तर को देखते हुए विचारों की परिपक्वता की दृष्टि से उस घोषणापत्रा का आज भी एक ऐतिहासिक महत्व है। असेंबली में बम फेंकने के बाद पकड़े जाने पर अदालत में उसने जो बयान दिया था, वह तो उसी समय एक अंतरराष्ट्रीय ख्याति का दस्तावेज बन गया था। 

उसे पढ़ने-लिखने का भी बेहद शौक था। वह जब भी कानपुर आता तो अपने साथ दो-चार पुस्तकें अवश्य लाता। बाद में फरार जीवन में जब उसके साथ रहने का अवसर मिला तो देखा कि पिस्तौल और पुस्तक का उसका चौबीस घंटे का साथ था। मुझे ऐसा एक भी अवसर याद नहीं पड़ता जब मैंने उसके पास कोई न कोई पुस्तक न देखी हो। 

1923-24 में भगत सिंह के पिता उसका विवाह करने पर तुल गए थे। पिता की जिद से बचने के लिए वह भाग कर कानपुर चला आया। कुछ दिन दिल्ली भी रहा। यहां उसने बड़ी मुसीबतों में दिन बिताए। दिल्ली, कानपुर से जब वह लाहौर वापस गया तो उसकी पगड़ी का स्थान एक छोटे अंगौछे ने ले लिया था। उसकी कमीज उसके शरीर का साथ छोड़ गयी थी और जब उसका बंद गले का खद्दर का कोट कमीज का काम दे रहा था। कोट की आस्तीनें फट जाने पर उसने पायजामे की टांगें आस्तीन की जगह जोड ली थीं और पायजामे का स्थान उसकी चादर ने ले लिया था। जिसे वह लुंगी की तरह इस्तेमाल करने लगा था। लेकिन इस हालत में भी उसके कोट की जेब में कोई न कोई पुस्तक अवश्य रहती थी। 

भगत सिंह को सौंदर्य, संगीत तथा कला से भी बेहद प्यार था। आगरा केंद्र पर जब कभी पंजाब से सुखदेव आ जाता तो वे दोनों एक दूसरे में ऐसे खो जाते मानो और कोई हो ही नहीं। उस समय पंजाब कांग्रेस की गतिविधि, उसके नेताओं की आपसी पैंतरेबाजियां, नौजवान भारत सभा का काम, बुध्दिजीवियों का मानसिक चढ़ाव-उतार, क्रांतिकारी आंदोलन की समस्याएं, मजदूरों के संघर्ष आदि विषयों से लेकर किसने क्या पढ़ा है, पठित पुस्तकों के लेखकों की शैली और उसके विचार, नयी पिक्चर्स, अभिनेताओं की ऐक्टिंग आदि सभी बातों पर बहस होती।

भगत सिंह से पहले क्रांतिकारियों का उद्देश्य था केवल मात्र देश की आजादी। लेकिन इस आजादी से हमारा क्या अभिप्राय है इस पर उससे पहले हमारे दिमाग साफ न थे। क्या अंग्रेज वायसराय को हटा कर उसके स्थान पर किसी भारतीय को रख देने से आजादी की समस्या का समाधान हो जाएगा? क्या समाज में आर्थिक असमानता और उस पर आधारित मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण के बरकरार रहते हम सही मायने में आजादी का उपभोग कर सकेंगे? आजादी के बाद की सरकार किस की होगी और भावी समाज की रूपरेखा क्या होगी आदि प्रश्नों पर क्रांतिकारियों में काफी अस्पष्टता थी। भगत सिंह ने सबसे पहले क्रांतिकारियों के बीच इन प्रश्नों को उठाया और समाजवाद को दल के ध्येय के रूप में सामने लाकर रखा। उसका कहना था कि देश की राजनैतिक आजादी की लड़ाई लक्ष्य की ओर केवल पहला कदम है और अगर हम वहीं पर जाकर रुक गए तो हमारा अभियान अधूरा ही रह जाएगा। सामाजिक एवं आर्थिक आजादी के अभाव में राजनैतिक आजादी दरअसल थोड़े से व्यक्तियों के द्वारा बहुमत को चूसने की ही आजादी होगी। शोषण और असमानता के उन्मूलन के सिध्दांत पर गठित समाजवादी समाज और समाजवादी राजसत्ता ही सही अर्थों में राष्ट्र का चौमुखी विकास कर सकेगी। समाजवाद उस समय युग की आवाज थी। क्रांतिकारियों में भगत सिंह ने सबसे पहले उस आवाज को सुना और पहचाना। यहीं पर वह अपने दूसरे साथियों से बड़ा था।(क्रमशः)

( लेखक शिववर्मा ,भगतसिंह के साथी हैं और भारत कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़े रहे हैं)







मंगलवार, 22 मार्च 2011

23 मार्च शहीद दिवस के मौके पर विशेष- मेरा साथी, मित्र और नेता भगत सिंह-1- शिव वर्मा


                (बाएं से शहीद भगतसिंह,सुखदेव और राजगुरू )
 एक दिन प्रात: जब मैं कमरे में बैठा कालेज का काम पूरा कर रहा था तो सुना बाहर पड़ोसी से कोई मेरा पता पूछ रहा है। अपना नाम सुनकर मैं बाहर निकल आया, देखा मैला शलवार-कमीज पहने कम्बल ओढ़े एक सिख नौजवान सामने खड़ा है- लंबा कद, खूब गोरा रंग, छोटी-छोटी आंखें, चुभती हुई पैंनी निगाह, खूबसूरत चेहरे पर हल्की-हल्की छोटी-सी दाढ़ी, केश और पगड़ी। ''यह रहे शिव वर्मा'' मुझे देखकर पड़ोसी ने कहा।
      आगंतुक दोनों हाथ फैलाकर मेरे ऐसे लिपट गया मानो कोई बहुत पुराना दोस्त हो। फिर मेरा हाथ खींचते हुए उसने कमरे में ऐसे प्रवेश किया जैसे कमरा मेरा नहीं उसी का था। छोटे कमरे में जगह की तंगी के कारण मैंने चारपाई निकाल कर जमीन पर ही बिस्तर लगा रखा था। उसने बगैर किसी तकल्लुफ के निस्संकोच जाकर बिस्तर पर आसन लगा दिया और मेरा हाथ खींच कर पास बिठलाते हुए बोला, ''मेरा नाम रंजीत है। मैं दो-चार दिन यहीं रहूंगा। दिल्ली के तुम्हारे दोस्त से मैं तुम्हारे और जयदेव के बारे में सुन चुका हूं। मैं भी तुम्हारी ही डगर का राहगीर हूं।'' फिर कुछ सोचकर पूछा, ''विजय और सुरेंद्र पांडे को जानते हो?''
      रंजीत के सहज व्यवहार, निष्कपट हंसी और मुस्कुराती हुई आंखों ने पहली ही मुलाकात में मेरे सब हथियार छीन लिए थे और अब मेरे लिए उस पर अविश्वास करना असंभव था। रोक-थाम के मेरे सारे बांध टूट गए और मैंने भी उसी सहज भाव से कह दिया ''हां, जानता हूं''।                                                                   
      ''तो इन दोनों को कहला दो कि आज रात यहीं आकर मुझ से मिल लें,'' उसने कहा। फिर कुछ रुक कर पूछा, ''जयदेव कहां है?''
      इस बार मैं झूठ बोल गया। साहस बटोर कर कह दिया, ''कहीं बाहर गया है, यहां नहीं है।''
मैं बात टाल गया हूं इसे रंजीत ने भांप लिया। इस विचार ने कि मैं अभी तक उस पर विश्वास नहीं कर पाया हूं, कुछ देर के लिए उसे उदास-सा कर दिया। वह अपने साथ विक्टर ह्यूगो का सुप्रसिध्द उपन्यास ला मिजरेबुल लाया था। उसने चुपचाप उसे पढ़ना आरंभ कर दिया-मानो किसी ने उसकी हंसी, उसकी बातचीत, उसके बेतकल्लुफाना व्यवहार आदि पर अचानक ब्रेक लगा दिया हो।
      मैं झूठ बोल तो गया पर दिल में बात खटकती-सी रही। भगत सिंह की उदासी के सामने मेरे लिए कमरे में ठहरना कठिन हो गया और विजय को खबर भेजवाने के बहाने मैं कालेज चला गया। सुरेंद्र जीत का पैगाम दिया तो उन्होंने बतलाया कि वह पार्टी का पुराना आदमी है।
      कालेज से वापस आते-आते दोपहर के खाने का समय हो गया था। जयदेव और मैं प्राय: मेस में खाना खाने एक ही साथ जाते थे। रंजीत के लिए कमरे में खाना मंगवाने के बजाय मैं उसे भी साथ लेता गया। मेस में उस समय हम तीन ही खाने वाले थे। रंजीत बीच में जयदेव के पास ही बैठा था लेकिन मेस का कोई अन्य सदस्य समझ कर उसने उधर ध्यान नहीं दिया। फिर जब जयदेव ने चुपचाप उसकी दाल में कस कर गरम घी छोड़ दिया तो उसने पहले जयदेव की ओर देखा फिर प्रश्न भरी निगाह से मेरी ओर देखने लगा। उसकी उलझन पर हम दोनों को हंसी आ गयी। उसके मुंह से निकल गया ''जयदेव?'' हम लोग और जोर से हंस पड़े। रंजीत ने मेरी पीठ पर जोर का घूंसा जमाते हुए कहा ''चोर कहीं के।'' फिर व्यंग्य कसते हुए बोला ''लगता है अपनों को बहुत सहेज कर रखने की आदत है''।
      ''फिलहाल तो तुम्हारी घूसे की चोट ने अपना-पराया सब बराबर कर दिया है,'' मैंने कहा।
उसने बांया हाथ मेरी पीठ पर फेरते हुए कहा,''लो पीठ सहलाये देता हूं, अब चुप-चाप खा लो।''
      रंजीत मेरे कमरे में जितने दिन रहा प्राय: रोज ही विजय और सुरेंद्र पांडे आते रहे। वह काकोरी के अभियुक्त पंडित रामप्रसाद बिस्मिल को जेल से छुड़ाने की योजना पर विचार विमर्श करने आया था। तीन-चार दिन रहने के बाद बिस्मिल से सम्पर्क स्थापित कर योजना पक्की कर रखने का भार विजय पर छोड़ वह पंजाब वापस चला गया।
      रंजीत के चले जाने के बाद मुझे पता चला कि उसका असली नाम भगत सिंह है और वह पहले भी कानपुर में श्री गणेशशंकर विद्यार्थी के पास 'प्रताप' में काम कर चुका है। कानपुर में 'प्रताप' में काम शुरू करने से पहले कुछ दिन उसने अखबार बेचकर भी निर्वाह किया था। यह भी पता चला कि बिस्मिल को जेल से छुड़ाने का एक प्रयास पहले भी हो चुका था जिसे किन्हीं कारणों वश बीच में ही छोड़ देना पड़ा था। उसमें भाग लेने के लिए भगत सिंह और सुखदेव के साथ पंजाब के कई और साथी भी आए थे। उसी दिशा में अब यह उसका दूसरा प्रयास था।
   लगभग दो महीने बाद भगत सिंह फिर वापस आया। इस बार वह काफी दिन ठहरा। रामप्रसाद बिस्मिल के साथ विजय का संपर्क पहले तो खूब अच्छा रहा। बिस्मिल ने योजना की स्वीकृति भी दे दी थी, लेकिन दिन और समय अभी निश्चित नहीं हो पाया था। उधर केस के फैसले का दिन नजदीक आता जा रहा था। इसी बीच कुछ ऐसा हुआ कि बिल्मिल से पत्र व्यवहार और मुलाकातें आदि एकदम बंद हो गईं और उन पर सख्त पहरा लगा दिया गया।  यह सब क्यों और कैसे हुआ यह तो नहीं जानता लेकिन इससे योजना को गहरा धक्का लगा। फिर भी विजय ने अपना प्रयास जारी रखा।
   भगत सिंह मेरे कमरे में अधिकतर अपना समय पढ़ने में व्यतीत करता था। विक्टर ह्यूगो, हालकेन, टालस्टाय, दॉस्तोयवस्की, गोर्की, बर्नार्ड शॉ, डिकेंस आदि उसके प्रिय लेखक थे। पढ़ने से जब उसकी तबियत ऊबती तो वह छात्रावास के पीछे गंगा के किनारे जाकर बैठ जाता, या जब मुझे और जयदेव को कालेज से फुरसत होती तो हम लोगों से गप्प करता। उसकी बातचीत का विषय अधिकतर उसकी पढी हुई पुस्तकें होतीं। वह उनके बारे में बतलाता और फिर जोर देता कि हम भी उन्हें पढ़ें। कभी-कभी पुराने क्रांतिकारियों की कहानियां भी सुनाता-कूका विद्रोह, गदर पार्टी का इतिहास, कर्तार सिंह, सूफी अम्बाप्रसाद आदि की जीवनियां तथा बबर-अकालियों की बहादुरी की कहानियां बतलाते-बतलाते वह प्राय: ही भावुक हो उठता। उसकी वर्णन शैली में एक अजीब आकर्षण था जिससे खिंच कर प्राय: रोज ही हम दोनों घंटों पहले कालेज से भाग आते थे।
   जयदेव आरंभ से ही मुझ से तगड़ा था। जोखिम से भिड़ने की उसकी आदत थी और मारपीट में उसका हाथ हमेशा से खुला था। उसके इन्हीं सब गुणों से प्रभावित होकर भगत सिंह ने उसे बिस्मिल वाले ऐक्शन में ले जाने का फैसला कर लिया। एक दिन दोपहर के समय जब उसने अपना उक्त निर्णय मुझसे बतलाया तो मुझे अपने दुबले-पतले शरीर पर बड़ी झुंझलाहट महसूस हुई। मैं पार्टी के काम के योग्य नहीं समझा गया इस विचार से मुझे गहरा आघात लगा और कुछ देर बैठे रहने के बाद नींद का बहाना लेकर मैं एक तरफ लेट गया। भगत सिंह जानता था कि मैं सो नहीं रहा हूं। वह कुछ देर तक पास पड़ी एक पुस्तक के पन्ने उलटता रहा, फिर मेरा कंधा हिलाते हुए उसने धीरे से पुकारा ''शिव''।
   ''क्या है?'' उसकी ओर करवट बदलते हुए मैंने कहा।
   ''एक बात पूंछू?''
   ''कहो।''
   ''व्यक्ति का नाम बड़ा है या पार्टी का काम?''
   ''पार्टी का काम,'' मैंने उत्तार दिया।
   ''और पार्टी का काम अविराम गति से चलता रहे, हमारे, 'ऐक्शन्स' सफल होते रहें, हमारी बात देशवासियों तक नियमित रूप से पहुंचती रहे, आज़ादी की अपनी इस लड़ाई में हर मंजिल पर हम कामयाब होते रहें, इसके लिए पहली शर्त क्या है?''
   ''एक मजबूत और व्यापक संगठन,'' मैंने उत्तर दिया।''संगठन और प्रचार'' उसने कहा। ''देश की जनता हमारे साहस और हमारे कामों की सराहना करती है लेकिन हमसे अपना सीधा संपर्क जोड़ पाने में वह असमर्थ है।अभी तक हमने खुले शब्दों में उसे यह भी नहीं बतलाया कि जिस आजादी की हम बात करते हैं उसकी रूप-रेखा क्या होगी, अंग्रेजों के चले जाने के बाद जो सरकार बनेगी वह कैसी होगी और किसकी होगी। अपने आंदोलन को जनाधार देने के लिए हमें अपना ध्येय जनता के बीच ले जाना होगा, क्योंकि जनता का समर्थन प्राप्त किए बगैर हम अब पुराने ढंग से इक्के-दुक्के अंग्रेज अधिकारियों को या सरकारी मुखबिरों को मार कर नहीं चल सकते। हम अभी तक संगठन तथा प्रचार की ओर से उदासीन रह कर प्राय: ऐक्शन पर ही जोर देते आए हैं। काम का यह तरीका हमें छोड़ना पड़ेगा। मैं तुम्हें और विजय को संगठन तथा प्रचार के कामों के लिए पीछे छोड़ना चाहता हूं। कुछ देर चुप रह कर उसने कहा, ''हम सब लोग सिपाही हैं। और सिपाही का सबसे अधिक मोह होता है रणक्षेत्रा से। इसीलिए 'ऐक्शन' पर चलने की बात उठते ही सब लोग उछल पड़ते हैं। फिर भी आंदोलन का ध्यान रखकर किसी न किसी को तो 'ऐक्शन' का यह मोह छोड़ना ही पड़ेगा। यह सही है कि आमतौर पर शहादत का सेहरा 'ऐक्शनन्स' में जूझने वालों या फांसी पर झूल जाने वालों के सर पर ही बंधता है, लेकिन इसके बावजूद उनकी स्थिति इमारत के मुख्य द्वार पर जड़े उस हीरे के समान ही रहती है जिसका मूल्य जहां तक इमारत का सवाल है, नींव के नीचे दबे एक साधारण पत्थर के मुकाबिले कुछ भी नहीं होता।''
      मैं लेटे-लेटे भगत सिंह की बातें सुनता रहा। वह मेरे सर के पास दीवार का सहारा लिए बैठा था और ऐसे बात कर रहा था मानो जोर-जोर से सोचने का प्रयास कर रहा हो। बीच-बीच में उसके दाहिने हाथ की उंगलियां मेरे सर के बालों में घूम जातीं और वह फिर धीरे-धीरे रुक-रुक कर उसी लहजे में बोलना शुरू कर देता:
      ''हीरे इमारत की खूबसूरती बढ़ा सकते हैं, देखने वालों को चकाचौंध कर सकते हैं, लेकिन इमारत की बुनियाद नहीं बन सकते, उसे लंबी उम्र नहीं दे सकते, सदियों तक अपने मजबूत कंधों पर उसके बोझ को उठा कर उसे सीधा खड़ा नहीं रख सकते। अभी तक हमारे आंदोलन ने हीरे कमाए हैं, बुनियाद के पत्थर नहीं बटोरे। इसीलिए इतनी कुर्बानी देने के बाद भी हम अभी तक इमारत क्या उसका ढांचा भी खड़ा नहीं कर पाए। आज हमें बुनियाद के पत्थराें की जरूरत है।'' फिर कुछ रुककर बोला, ''और त्याग तथा कुर्बानी के भी दो रूप हैं। एक है गोली खाकर या फांसी पर लटक कर मरना। इसमें चमक अधिक है लेकिन तकलीफ कम। दूसरा है पीछे रहकर सारी जिंदगी इमारत का बोझ ढोते फिरना। आंदोलन के चढ़ाव उतार के बीच प्रतिकूल वातावरण में कभी ऐसे भी क्षण आते हैं जब एक एक कर सभी हमराही छूट जाते हैं। उस समय मनुष्य सांत्वना के दो शब्दों के लिए भी तरस उठता है। ऐसे क्षणों में भी विचलित न होकर जो लोग अपनी राह नहीं छोड़ते, इमारत के बोझ से जिनके पैर नहीं लड़खड़ाते, कंधे नहीं झुकते, जो तिल-तिलकर अपने आपको इसलिए गलाते रहते हैं, इसलिए जलाते रहते हैं कि दिए की जोत मध्दिम न पड़ जाए, सुनसान डगर पर अंधेरा न छा जाए, ऐसे लोगों की कुर्बानीऔर त्याग पहले वालों के मुकाबिले क्या अधिक नहीं हैं?'' ( क्रमशः)
(लेखक शिव वर्मा ,भगतसिंह के साथी हैं और इनका भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन से गहरा संबंध रहा है।यह संस्मरण हम अलीगढ़ से प्रकाशित गोदारण पत्रिका के क्रांतिकारी महानायक भगतसिंह विशेषांक से साभार)      


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