मंगलवार, 22 मार्च 2011

23 मार्च शहीद दिवस के मौके पर विशेष- मेरा साथी, मित्र और नेता भगत सिंह-1- शिव वर्मा


                (बाएं से शहीद भगतसिंह,सुखदेव और राजगुरू )
 एक दिन प्रात: जब मैं कमरे में बैठा कालेज का काम पूरा कर रहा था तो सुना बाहर पड़ोसी से कोई मेरा पता पूछ रहा है। अपना नाम सुनकर मैं बाहर निकल आया, देखा मैला शलवार-कमीज पहने कम्बल ओढ़े एक सिख नौजवान सामने खड़ा है- लंबा कद, खूब गोरा रंग, छोटी-छोटी आंखें, चुभती हुई पैंनी निगाह, खूबसूरत चेहरे पर हल्की-हल्की छोटी-सी दाढ़ी, केश और पगड़ी। ''यह रहे शिव वर्मा'' मुझे देखकर पड़ोसी ने कहा।
      आगंतुक दोनों हाथ फैलाकर मेरे ऐसे लिपट गया मानो कोई बहुत पुराना दोस्त हो। फिर मेरा हाथ खींचते हुए उसने कमरे में ऐसे प्रवेश किया जैसे कमरा मेरा नहीं उसी का था। छोटे कमरे में जगह की तंगी के कारण मैंने चारपाई निकाल कर जमीन पर ही बिस्तर लगा रखा था। उसने बगैर किसी तकल्लुफ के निस्संकोच जाकर बिस्तर पर आसन लगा दिया और मेरा हाथ खींच कर पास बिठलाते हुए बोला, ''मेरा नाम रंजीत है। मैं दो-चार दिन यहीं रहूंगा। दिल्ली के तुम्हारे दोस्त से मैं तुम्हारे और जयदेव के बारे में सुन चुका हूं। मैं भी तुम्हारी ही डगर का राहगीर हूं।'' फिर कुछ सोचकर पूछा, ''विजय और सुरेंद्र पांडे को जानते हो?''
      रंजीत के सहज व्यवहार, निष्कपट हंसी और मुस्कुराती हुई आंखों ने पहली ही मुलाकात में मेरे सब हथियार छीन लिए थे और अब मेरे लिए उस पर अविश्वास करना असंभव था। रोक-थाम के मेरे सारे बांध टूट गए और मैंने भी उसी सहज भाव से कह दिया ''हां, जानता हूं''।                                                                   
      ''तो इन दोनों को कहला दो कि आज रात यहीं आकर मुझ से मिल लें,'' उसने कहा। फिर कुछ रुक कर पूछा, ''जयदेव कहां है?''
      इस बार मैं झूठ बोल गया। साहस बटोर कर कह दिया, ''कहीं बाहर गया है, यहां नहीं है।''
मैं बात टाल गया हूं इसे रंजीत ने भांप लिया। इस विचार ने कि मैं अभी तक उस पर विश्वास नहीं कर पाया हूं, कुछ देर के लिए उसे उदास-सा कर दिया। वह अपने साथ विक्टर ह्यूगो का सुप्रसिध्द उपन्यास ला मिजरेबुल लाया था। उसने चुपचाप उसे पढ़ना आरंभ कर दिया-मानो किसी ने उसकी हंसी, उसकी बातचीत, उसके बेतकल्लुफाना व्यवहार आदि पर अचानक ब्रेक लगा दिया हो।
      मैं झूठ बोल तो गया पर दिल में बात खटकती-सी रही। भगत सिंह की उदासी के सामने मेरे लिए कमरे में ठहरना कठिन हो गया और विजय को खबर भेजवाने के बहाने मैं कालेज चला गया। सुरेंद्र जीत का पैगाम दिया तो उन्होंने बतलाया कि वह पार्टी का पुराना आदमी है।
      कालेज से वापस आते-आते दोपहर के खाने का समय हो गया था। जयदेव और मैं प्राय: मेस में खाना खाने एक ही साथ जाते थे। रंजीत के लिए कमरे में खाना मंगवाने के बजाय मैं उसे भी साथ लेता गया। मेस में उस समय हम तीन ही खाने वाले थे। रंजीत बीच में जयदेव के पास ही बैठा था लेकिन मेस का कोई अन्य सदस्य समझ कर उसने उधर ध्यान नहीं दिया। फिर जब जयदेव ने चुपचाप उसकी दाल में कस कर गरम घी छोड़ दिया तो उसने पहले जयदेव की ओर देखा फिर प्रश्न भरी निगाह से मेरी ओर देखने लगा। उसकी उलझन पर हम दोनों को हंसी आ गयी। उसके मुंह से निकल गया ''जयदेव?'' हम लोग और जोर से हंस पड़े। रंजीत ने मेरी पीठ पर जोर का घूंसा जमाते हुए कहा ''चोर कहीं के।'' फिर व्यंग्य कसते हुए बोला ''लगता है अपनों को बहुत सहेज कर रखने की आदत है''
      ''फिलहाल तो तुम्हारी घूसे की चोट ने अपना-पराया सब बराबर कर दिया है,'' मैंने कहा।
उसने बांया हाथ मेरी पीठ पर फेरते हुए कहा,''लो पीठ सहलाये देता हूं, अब चुप-चाप खा लो।''
      रंजीत मेरे कमरे में जितने दिन रहा प्राय: रोज ही विजय और सुरेंद्र पांडे आते रहे। वह काकोरी के अभियुक्त पंडित रामप्रसाद बिस्मिल को जेल से छुड़ाने की योजना पर विचार विमर्श करने आया था। तीन-चार दिन रहने के बाद बिस्मिल से सम्पर्क स्थापित कर योजना पक्की कर रखने का भार विजय पर छोड़ वह पंजाब वापस चला गया।
      रंजीत के चले जाने के बाद मुझे पता चला कि उसका असली नाम भगत सिंह है और वह पहले भी कानपुर में श्री गणेशशंकर विद्यार्थी के पास 'प्रताप' में काम कर चुका है। कानपुर में 'प्रताप' में काम शुरू करने से पहले कुछ दिन उसने अखबार बेचकर भी निर्वाह किया था। यह भी पता चला कि बिस्मिल को जेल से छुड़ाने का एक प्रयास पहले भी हो चुका था जिसे किन्हीं कारणों वश बीच में ही छोड़ देना पड़ा था। उसमें भाग लेने के लिए भगत सिंह और सुखदेव के साथ पंजाब के कई और साथी भी आए थे। उसी दिशा में अब यह उसका दूसरा प्रयास था।
   लगभग दो महीने बाद भगत सिंह फिर वापस आया। इस बार वह काफी दिन ठहरा। रामप्रसाद बिस्मिल के साथ विजय का संपर्क पहले तो खूब अच्छा रहा। बिस्मिल ने योजना की स्वीकृति भी दे दी थी, लेकिन दिन और समय अभी निश्चित नहीं हो पाया था। उधर केस के फैसले का दिन नजदीक आता जा रहा था। इसी बीच कुछ ऐसा हुआ कि बिल्मिल से पत्र व्यवहार और मुलाकातें आदि एकदम बंद हो गईं और उन पर सख्त पहरा लगा दिया गया।  यह सब क्यों और कैसे हुआ यह तो नहीं जानता लेकिन इससे योजना को गहरा धक्का लगा। फिर भी विजय ने अपना प्रयास जारी रखा।
   भगत सिंह मेरे कमरे में अधिकतर अपना समय पढ़ने में व्यतीत करता था। विक्टर ह्यूगो, हालकेन, टालस्टाय, दॉस्तोयवस्की, गोर्की, बर्नार्ड शॉ, डिकेंस आदि उसके प्रिय लेखक थे। पढ़ने से जब उसकी तबियत ऊबती तो वह छात्रावास के पीछे गंगा के किनारे जाकर बैठ जाता, या जब मुझे और जयदेव को कालेज से फुरसत होती तो हम लोगों से गप्प करता। उसकी बातचीत का विषय अधिकतर उसकी पढी हुई पुस्तकें होतीं। वह उनके बारे में बतलाता और फिर जोर देता कि हम भी उन्हें पढ़ें। कभी-कभी पुराने क्रांतिकारियों की कहानियां भी सुनाता-कूका विद्रोह, गदर पार्टी का इतिहास, कर्तार सिंह, सूफी अम्बाप्रसाद आदि की जीवनियां तथा बबर-अकालियों की बहादुरी की कहानियां बतलाते-बतलाते वह प्राय: ही भावुक हो उठता। उसकी वर्णन शैली में एक अजीब आकर्षण था जिससे खिंच कर प्राय: रोज ही हम दोनों घंटों पहले कालेज से भाग आते थे।
   जयदेव आरंभ से ही मुझ से तगड़ा था। जोखिम से भिड़ने की उसकी आदत थी और मारपीट में उसका हाथ हमेशा से खुला था। उसके इन्हीं सब गुणों से प्रभावित होकर भगत सिंह ने उसे बिस्मिल वाले ऐक्शन में ले जाने का फैसला कर लिया। एक दिन दोपहर के समय जब उसने अपना उक्त निर्णय मुझसे बतलाया तो मुझे अपने दुबले-पतले शरीर पर बड़ी झुंझलाहट महसूस हुई। मैं पार्टी के काम के योग्य नहीं समझा गया इस विचार से मुझे गहरा आघात लगा और कुछ देर बैठे रहने के बाद नींद का बहाना लेकर मैं एक तरफ लेट गया। भगत सिंह जानता था कि मैं सो नहीं रहा हूं। वह कुछ देर तक पास पड़ी एक पुस्तक के पन्ने उलटता रहा, फिर मेरा कंधा हिलाते हुए उसने धीरे से पुकारा ''शिव''
   ''क्या है?'' उसकी ओर करवट बदलते हुए मैंने कहा।
   ''एक बात पूंछू?''
   ''कहो।''
   ''व्यक्ति का नाम बड़ा है या पार्टी का काम?''
   ''पार्टी का काम,'' मैंने उत्तार दिया।
   ''और पार्टी का काम अविराम गति से चलता रहे, हमारे, 'ऐक्शन्स' सफल होते रहें, हमारी बात देशवासियों तक नियमित रूप से पहुंचती रहे, आज़ादी की अपनी इस लड़ाई में हर मंजिल पर हम कामयाब होते रहें, इसके लिए पहली शर्त क्या है?''
   ''एक मजबूत और व्यापक संगठन,'' मैंने उत्तर दिया।''संगठन और प्रचार'' उसने कहा। ''देश की जनता हमारे साहस और हमारे कामों की सराहना करती है लेकिन हमसे अपना सीधा संपर्क जोड़ पाने में वह असमर्थ है।अभी तक हमने खुले शब्दों में उसे यह भी नहीं बतलाया कि जिस आजादी की हम बात करते हैं उसकी रूप-रेखा क्या होगी, अंग्रेजों के चले जाने के बाद जो सरकार बनेगी वह कैसी होगी और किसकी होगी। अपने आंदोलन को जनाधार देने के लिए हमें अपना ध्येय जनता के बीच ले जाना होगा, क्योंकि जनता का समर्थन प्राप्त किए बगैर हम अब पुराने ढंग से इक्के-दुक्के अंग्रेज अधिकारियों को या सरकारी मुखबिरों को मार कर नहीं चल सकते। हम अभी तक संगठन तथा प्रचार की ओर से उदासीन रह कर प्राय: ऐक्शन पर ही जोर देते आए हैं। काम का यह तरीका हमें छोड़ना पड़ेगा। मैं तुम्हें और विजय को संगठन तथा प्रचार के कामों के लिए पीछे छोड़ना चाहता हूं। कुछ देर चुप रह कर उसने कहा, ''हम सब लोग सिपाही हैं। और सिपाही का सबसे अधिक मोह होता है रणक्षेत्रा से। इसीलिए 'ऐक्शन' पर चलने की बात उठते ही सब लोग उछल पड़ते हैं। फिर भी आंदोलन का ध्यान रखकर किसी न किसी को तो 'ऐक्शन' का यह मोह छोड़ना ही पड़ेगा। यह सही है कि आमतौर पर शहादत का सेहरा 'ऐक्शनन्स' में जूझने वालों या फांसी पर झूल जाने वालों के सर पर ही बंधता है, लेकिन इसके बावजूद उनकी स्थिति इमारत के मुख्य द्वार पर जड़े उस हीरे के समान ही रहती है जिसका मूल्य जहां तक इमारत का सवाल है, नींव के नीचे दबे एक साधारण पत्थर के मुकाबिले कुछ भी नहीं होता।''
      मैं लेटे-लेटे भगत सिंह की बातें सुनता रहा। वह मेरे सर के पास दीवार का सहारा लिए बैठा था और ऐसे बात कर रहा था मानो जोर-जोर से सोचने का प्रयास कर रहा हो। बीच-बीच में उसके दाहिने हाथ की उंगलियां मेरे सर के बालों में घूम जातीं और वह फिर धीरे-धीरे रुक-रुक कर उसी लहजे में बोलना शुरू कर देता:
      ''हीरे इमारत की खूबसूरती बढ़ा सकते हैं, देखने वालों को चकाचौंध कर सकते हैं, लेकिन इमारत की बुनियाद नहीं बन सकते, उसे लंबी उम्र नहीं दे सकते, सदियों तक अपने मजबूत कंधों पर उसके बोझ को उठा कर उसे सीधा खड़ा नहीं रख सकते। अभी तक हमारे आंदोलन ने हीरे कमाए हैं, बुनियाद के पत्थर नहीं बटोरे। इसीलिए इतनी कुर्बानी देने के बाद भी हम अभी तक इमारत क्या उसका ढांचा भी खड़ा नहीं कर पाए। आज हमें बुनियाद के पत्थराें की जरूरत है।'' फिर कुछ रुककर बोला, ''और त्याग तथा कुर्बानी के भी दो रूप हैं। एक है गोली खाकर या फांसी पर लटक कर मरना। इसमें चमक अधिक है लेकिन तकलीफ कम। दूसरा है पीछे रहकर सारी जिंदगी इमारत का बोझ ढोते फिरना। आंदोलन के चढ़ाव उतार के बीच प्रतिकूल वातावरण में कभी ऐसे भी क्षण आते हैं जब एक एक कर सभी हमराही छूट जाते हैं। उस समय मनुष्य सांत्वना के दो शब्दों के लिए भी तरस उठता है। ऐसे क्षणों में भी विचलित न होकर जो लोग अपनी राह नहीं छोड़ते, इमारत के बोझ से जिनके पैर नहीं लड़खड़ाते, कंधे नहीं झुकते, जो तिल-तिलकर अपने आपको इसलिए गलाते रहते हैं, इसलिए जलाते रहते हैं कि दिए की जोत मध्दिम न पड़ जाए, सुनसान डगर पर अंधेरा न छा जाए, ऐसे लोगों की कुर्बानीऔर त्याग पहले वालों के मुकाबिले क्या अधिक नहीं हैं?'' ( क्रमशः)
(लेखक शिव वर्मा ,भगतसिंह के साथी हैं और इनका भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन से गहरा संबंध रहा है।यह संस्मरण हम अलीगढ़ से प्रकाशित गोदारण पत्रिका के क्रांतिकारी महानायक भगतसिंह विशेषांक से साभार)      


4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बहुत धन्यवाद इस लेख के लिए सर .....
    इतनी गहरी बात भगत सिंह जैसा ही क्रातिकारी कर सकता हैं जिसे अपने संगठन और देश को ही सर्वोपरि रखा.

    'हीरे इमारत की खूबसूरती बढ़ा सकते हैं, देखने वालों को चकाचौंध कर सकते हैं,लेकिन इमारत की बुनियाद नहीं बन सकते, उसे लंबी उम्र नहीं दे सकते, सदियों तक अपने मजबूत कंधों पर उसके बोझ को उठा कर उसे सीधा खड़ा नहीं रख सकते। अभी तक हमारे आंदोलन ने हीरे कमाए हैं, बुनियाद के पत्थर नहीं बटोरे। इसीलिए इतनी कुर्बानी देने के बाद भी हम अभी तक इमारत क्या उसका ढांचा भी खड़ा नहीं कर पाए। आज हमें बुनियाद के पत्थराें की जरूरत है।'

    और यही बुनियाद ही हमें मजबूत बनाती हैं न की ये हीरे की चकाचौंध. कुछ समय के लिए अपनी तरफ आकर्षित जरुर कर सकती हैं परंतू एक ठोस और मजबूत अधर देने में अक्षम ही साबित होगी.

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  2. भगत सिंह के प्रति सच्ची श्रधांजलि तब होगी जब हम, ५-६ अक्तूबर १९३० को लिखी उनकी सबसे महत्त्वपूर्ण रचना - "मैं नास्तिक क्यों हूँ?" को अपने जीवन में उतारेंगे। बाकि तो खानापूर्ति या बस हायतौबा मचाना ही होगा। हमें याद रखना चाहिए कि भगत सिंह ने रूढ़ियों, पाखंडों और कर्मकांडों को तोडा था। उन्होंने सिख होकर भी अपने केश कटवा कर आडम्बर को तोडा था। मुझे गर्व है खुद पर कि मैं नास्तिक हूँ।

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  3. भगत सिंह के प्रति सच्ची श्रधांजलि तब होगी जब हम, ५-६ अक्तूबर १९३० को लिखी उनकी सबसे महत्त्वपूर्ण रचना - "मैं नास्तिक क्यों हूँ?" को अपने जीवन में उतारेंगे। बाकि तो खानापूर्ति या बस हायतौबा मचाना ही होगा। हमें याद रखना चाहिए कि भगत सिंह ने रूढ़ियों, पाखंडों और कर्मकांडों को तोडा था। उन्होंने सिख होकर भी अपने केश कटवा कर आडम्बर को तोडा था। मुझे गर्व है खुद पर कि मैं नास्तिक हूँ।

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  4. ऐसे क्षणों में भी विचलित न होकर जो लोग अपनी राह नहीं छोड़ते, इमारत के बोझ से जिनके पैर नहीं लड़खड़ाते, कंधे नहीं झुकते, जो तिल-तिलकर अपने आपको इसलिए गलाते रहते हैं, इसलिए जलाते रहते हैं कि दिए की जोत मध्दिम न पड़ जाए,


    नमन है ऐसे आज़ादी के कर्मवीरों को

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