गुरुवार, 3 मार्च 2011

साहित्य का शार्टकट और बौनी राजनीति


               (पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य)        
     तेरह फरवरी को वाम मोर्चे की पहली विशाल चुनावी सभा थी और उसी दिन सन् 1911 में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का जन्म भी हुआ था। वाम मोर्चे की रैली में मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के हाथों फै़ज़ के ऊपर बनी एक पेंटिंग का लोकार्पण किया। यह मेरी नजर में फ़ैज़ के जरिए सस्ती वोट राजनीति का सबसे घटिया उदाहरण है। उल्लेखनीय है वाम मोर्च ने पश्चिम बंगाल में पूरे एक साल फ़ैज़ पर कुछ नहीं किया। यहां तक कि नवगठित पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी के द्वारा फ़ैज़ पर प्रस्तावित कार्यक्रम के लिए सामान्य सा धन भी आवंटित नहीं किया। वे कार्यक्रम नहीं कर पाए। सारे देश में माकपा ने कोई कार्यक्रम नहीं किया। सिर्फ माकपा संचालित जनवादी लेखक संघ ने 'नयापथ' का एक शानदार अंक निकाला है। कम से कम माकपा के पश्चिम बंगाल के नेताओं को फ़ैज़ की विरासत का अपने को वारिस कहने का कोई हक नहीं है।
     अगर फ़ैज़ पश्चिम बंगाल में रहे होते तो सुभाष मुखोपाध्याय और महाश्वेता देवी की तरह माकपा के खिलाफ जनता के साथ खड़े होते। फ़ैज़ उन वामपंथी लेखकों में हैं जिन्होंने कम्युनिस्ट विचारधारा के कठमुल्लेपन और बौद्धिकता और बुद्धिजीवी विरोधी रूझानों के खिलाफ सारी दुनिया में बिगुल बजाया था। इसके लिए उन्होंने अलग से विश्व संगठन भी बनाया था। यह संगठन बुनियादी तौर पर वामदलों में बुद्धिजीवी विरोधी मानसिकता के खिलाफ प्रतिवादस्वरूप बनाया गया था। माकपा ने अपने अब तक के व्यवहार से यह साबित नहीं किया है कि उस दल के अंदर बुद्धिजीवियों को सम्मान का दर्जा हासिल है। माकपा आज तक पोलिट ब्यूरो-केन्द्रीय समिति में बुद्धिजीवियों को एक भी पद नहीं दे पायी है।
      पश्चिम बंगाल में पार्टीनेता आए दिन बुद्धिजीवियों का सरेआम उपहास उड़ाते हैं और उन्हें स्वतंत्र रूप से लिखने और बोलने नहीं देते। जो बुद्धिजीवी नौकरीपेशा हैं और माकपा से असहमत हैं उन्हें विभिन्न तरीकों से परेशान किया जाता है। जबकि फ़ैज़ ने अपनी सारी जिंदगी लेखक की अभिव्यक्ति की आजादी और राजनीतिक गरिमा के लिए कम्युनिस्ट पार्टी के अंदर,बाहर और विश्व कम्युनिस्ट आंदोलन में संघर्ष किया था।
     पश्चिम बंगाल के माकपा नेताओं को चुनाव सभा में फ़ैज़ इसलिए याद आए क्योंकि वे मुसलमान थे और माकपा के नेताओं को लगा होगा कि फ़ैज़ की पेंटिंग का विमोचन शायद मुसलमानों में पार्टी की साख दुरूस्त कर दे। लेकिन इस शार्टकट से मुसलमानों का दिल जीतना संभव नहीं है।
फ़ैज उन तमाम लेखकों के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं जो समाज को बदलना चाहते हैं, अमेरिकी साम्राज्यवाद की सांस्कृतिक-आर्थिक गुलामी और विश्व में वर्चस्व स्थापित करने की मुहिम का विरोध करना चाहते हैं, सत्ता और राजनीतिक गुलामी से मुक्त होकर जनता की मुक्ति के प्रयासों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना चाहते हैं। फ़ैज़ इन दिनों पश्चिम बंगाल के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।   
    आज भारत में अनेक प्रगतिशील कवियों और लेखकों  ने भारत में सत्ता के सामने पूरी तरह समर्पण कर दिया है। मजदूरों के पक्ष में बोलना बरसों से बंद कर दिया है। देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों की मलाई खाने और प्रतिष्ठानी कर्मकांड का अपने को हिस्सा बना लिया है। खासकर उर्दू की प्रगतिशील कविता का तो और भी बुरा हाल है। उसमें मजदूरों-किसानें की हिमायत करके रहना तो एकदम असंभव हो गया है। उर्दू के अधिकांश कवियों-साहित्यकारों ने मजलूमों के हकों के लिए जंग की बजाय सिनेमा उद्योग की जंग में सारी शक्ति लगानी बेहतर समझी है या आधुनिकतावादी चोगा पहन लिया है या फिर अमेरिकी साम्राज्यवाद के सामने पूरी तरह समर्पण कर दिया है और खुल्लम-खुल्ला अमेरिकी नजरिए से उर्दू और मुसलमानों के मसलों को देख रहे हैं। हमें थोड़ा ईमानदारी के साथ एक बार हिन्दी-उर्दू के साहित्यकारों और लेखकों के साहित्यिक कर्मकांड के बाहर जाकर फ़ैज़ की जिन्दगी के तजुर्बों की रोशनी में ,उन मानकों की रोशनी में हिन्दी-उर्दू की प्रगतिशील साहित्य परंपरा और लेखकीय कर्म पर आलोचनात्मक नजरिए से विचार करना चाहिए कि आखिरकार ऐसा क्या हुआ जिसके कारण फ़ैज़ ने सारी जिन्दगी सत्ता के जुल्मो-सितम के सामने समर्पण नहीं किया लेकिन उर्दू-हिन्दी के अधिकांश कवियों और लेखकों ने समर्पण कर दिया।
        फ़ैज़ की कविता में जिन्दगी का यथार्थ ही व्यक्त नहीं हुआ है बल्कि उन्होंने अपने कर्म और कुर्बानी से पहले अविभाजित भारत और बाद में पाकिस्तान में एक आदर्श मिसाल कायम की है। सर्वहारा के लिए सोचना,उसके लिए जीना और उसके लिए किसी भी कुर्बानी के लिए तैयार रहना यही सबसे बड़ी विशेषता थी जिसके कारण फ़ैज़ सिर्फ फ़ैज़ थे। मजदूरों की जीवनदशा पर उनसे बेहतर पंक्तियां और कोई लिख ही नहीं पाया । उन्होंने लिखा-
‘‘जब कभी बिकता है बाज़ार में मज़दूर का गोश्त
शाहराहों पे ग़रीबों का लहू बहता है
आग सी सीने में रह रह के उबलती है न पूछ
अपने दिल पर मुझे क़ाबू ही नहीं रहता है.’’
मजदूरों के अधिकारों का हनन,उनका उत्पीड़न और उन पर बढ़ रहे जुल्म ही थे जिनके कारण उनकी कविता महान कविता में तब्दील हो गयी। मजदूर की पीड़ा उन्हें बार-बार आंदोलित करती थी,बेचैन करती थी। मजदूरों के हकों का इतना बड़ा कवि भारतीय उपमहाद्वीप में दूसरा नहीं हुआ।
  फ़ैज़ की कविता में जाति,धर्म,साम्प्रदायिकता,राष्ट्र,राष्ट्रवाद,पार्टीलाइन आदि का अतिक्रमण दिखाई देता है । उन्होंने सचेत रूप में समूची मानवता और मानव जाति के सबसे ज्यादा वंचित वर्गों पर हो रहे जुल्मों के प्रतिवाद में अपना सारा जीवन लगा दिया।  वे मात्र उर्दू कवि नहीं थे। बल्कि मजदूरवर्ग के महाकवि थे। वे सारी जिंदगी सर्वहारावर्ग के बने रहे। वे अविभाजित भारत और बाद में पाकिस्तान सर्वहारा की जंग के महायोद्धा बने रहे। फ़ैज़ उन बड़े कवियों में हैं जिनकी चेतना ने राष्ट्र और राष्ट्रवाद का सही अर्थों में अतिक्रमण किया था और समूचे भारतीय उपमहाद्वीप के मजदूरों-किसानों और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए कविता लिखने से लेकर जमीनी स्तर तक की वास्तव लड़ाईयों का नेतृत्व किया था।  महाकवि  फ़ैज़ का सियालकोट (पंजाब,पाकिस्तान) में 13 फरवरी 1911 को जन्म हुआ था। फ़ैज़ ने उर्दू कविता को नई बुलंदियों तक पहुँचाया। फ़ैज़ एक ही साथ इस्लाम और मार्क्सवाद के धुरंधर विद्वान थे। उनके घर वालों ने बचपन में उनको कुरान की शिक्षा दी। उर्दू-फारसी-अरबी की प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने अंग्रेजी और अरबी में एम.ए. किया था लेकिन वे कविताएं उर्दू में करते थे। फ़ैज़ ने 1942 से 1947 तक सेना में काम किया।बाद में लियाकत अली खाँ की सरकार के तख्ता पलट करने की साजिश की जुर्म में 1951-1955 तक जेल की हवा खानी पड़ी।
  फ़ैज़ के व्यक्तित्व में जो बागीपन है उसका आधार है दुनिया की गुलामी, गरीबी, लोकतंत्र का अभाव और साम्राज्यवाद का वर्चस्वशाली चरित्र। आज हमें 1983 के एफ्रो-एशियाई लेखक संघ की रजत जयंती के मौके पर उनके द्वारा दिए गए  भाषण की याद आ रही है ,यह भाषण बहुत ही महत्वपूर्ण है। फ़ैज़ ने कहा था इस युग की दो प्रधान समस्याएं हैं उपनिवेशवाद और नस्लवाद। फ़ैज़ ने कहा , "हमारा इस बात में दृढ़ विश्वास है कि साहित्य बहुत गहराई से मानवीय नियति के साथ जुड़ा है,कि स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सार्वभौमिकता के बिना साहित्य का विकास संभव नहीं है,कि उपनिवेशवाद और नस्लवाद का समूल नाश साहित्य को सृजनात्मकता के संपूर्ण विकास के लिए बेहद ज़रूरी है।"
    फ़ैज़ ने इन समस्याओं पर ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में रोशनी डालते हुए लिखा '' तमाम युद्धों के अंत की तरह,लड़े गए पहले महायुद्ध के बाद सामाजिक,नैतिक और साहित्यिक बूर्जुआ मान्यताओं और वर्जनाओं के टूटने और समृद्धि के एक संक्षिप्त दौर में विजेताओं के दिमाग़ में अहं का उन्माद उफनने लगा था। ख़ुदा आसमान पर था और धरती पर सब कुछ मज़े में चल रहा था। नतीजतन ज्यादातर पश्चिमी और कुछ उपनिवेशों के साहित्य ने उसे आदर्श के रूप में अपना लिया। बड़े पैमाने पर शुद्ध रूपवाद के आनंद का सम्मोहन,अहं केन्द्रित चेतना की रहस्यात्मकता से लगाव,रूमानी मिथकों और कल्पित आख्यानों के बहकावों के साथ 'कला के लिए कला' के उद्धबोधक सौंदर्यशास्त्रियों द्वारा अभिकल्पित गजदंती मीनारों का निर्माण होने लगा।"आज भी अनेक बुद्धिजीवी हैं जो परमाणु हथियारों की दौड़ के घातक परिणामों से अनभिज्ञ हैं। इस दौड़ ने सोवियत संघ के समाजवादी ढ़ांचे को तबाह किया और शांति के बारे में जो खयाल थे उन्हें नुकसान पहुँचाया । फ़ैज़ इस फिनोमिना की परिणतियों पर नजर टिकाए हुए थे।
    द्वितीय विश्वयुद्धोत्तर दौर के बारे में उन्होंने लिखा , " युद्ध के बाद का हमारा समय, विराट अंतर्विरोधों से ग्रस्त हमारा युग,विजयोल्लास और त्रासदियों से भरा युग,उत्सवों से भरा और हृदयविदारक युग,बड़े सपनों और उनसे बड़ी कुण्ठाओं का ज़माना। तीसरी दुनिया की जनता के लिए ,एशियाई ,अफ्रीकी और लातीनी अमेरिकी लोगों के लिए ,कम से कम इनकी एक बड़ी आबादी के लिए,किसी को तत्काल डिकेंस के शब्द याद आ जायेंगे-' वह बेहतरीन वक़्त था,वह बदतरीन वक़्त था।' परमाणु हथियारों की दौड़ पर लिखा- "आणविक हथियारों के जिन्न को बंद बोतल से आज़ाद करते हुए अमेरिका ने समाजवादी खेमे को भी ऐसा ही करने का आमंत्रण दे दिया। उस दिन से आज तक हमारी दुनिया की समूची सतह पर विनाश के डरावने साये की एक मोमी परत चढ़ी है और आज जितने खतरनाक तरीके से हमारे सामने झूल रही हैं .उतनी पहले कभी न थी।" राजनीति में इस जमाने को शीतयुद्ध के नाम से जानते हैं। इस जमाने में मुक्त विश्व का नारा दिया गया। मुक्त विश्व के साथ मुक्त बाजार और मुक्त सूचना प्रवाह को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया। इसी के अगले चरण के रूप में नव्य उदारतावाद आया। मुक्त विश्व की धारणाओं का मीडिया से जमकर प्रचार किया गया। इसके पक्षधर हमारे बीच में अभी भी हैं और अहर्निश मुक्त विश्व और मुक्त बाजार की हिमायत करते रहते हैं। इसके बारे में फ़ैज़ ने लिखा- "स्वतंत्र विश्व के नाम पर संभवतः हमारे इतिहास के घोर अयथार्थ ढ़ोल नगाड़ों के शोर के साथ अमेरिकन शासन तंत्र ने यहां वहां ढ़ेर सारे निरंकुश राजाओं-सुल्तानों,ख़ून के प्यासे अधिनायक-तानाशाहों,बेदिमाग़ दुस्साहसी सेनापतियों और हवा-हवाई किस्म के राजनीतिज्ञों,जिस पर भी हाथ रख सकें,को सत्ता के सिंहासन पर बैठाने की कोशिशें की हैं और बैठाया भी है । यह कार्रवाई वियतनाम से बड़ी बदनामी के बाद हुई अमेरिकन विदाई के साथ कुछ वक़्त के लिए रुक सी गयी थी। फिर रोनाल्ड रीगन के ज़माने से हम अमेरिकनों और उनके नस्लवादी साथियों को यहां-वहां भौंकते शिकारी कुत्तों की तरह इन तीन महाद्वीपों में जैसे बिखरे बारूद के ढ़ेरों के आसपास देख रहे हैं।" अमेरिका द्वारा संचालित शीतयुद्ध ने संस्कृतिकर्मियों को बड़े पैमाने पर प्रभावित किया है। इस पर फ़ैज़ ने लिखा है, "नये शोषक वर्ग और निरंकुश तानाशाही के उदय और वैयक्तिक और सामाजिक मुक्ति के सपनों के ढ़ह जाने से युवापीढ़ी मोहभंग ,सनकीपन और अविश्वास की विषाक्त चपेट में आ गयी है। नतीजतन बहुत से युवा लेखक पश्चिमी विचारकों द्वारा प्रतिपादित किए जा रहे जीवित यथार्थ से रिश्ता तोड़ने,उसके मानवीय और शैक्षणिक पक्ष को अस्वीकार करने और लेखक को तमाम सामाजिक ज़िम्मेदारियों से मुक़्त होने जैसे प्रतिक्रियावादी विचारों और सिद्धान्तों के प्रति आकर्षित हो रहे हैं। इन वैचारिक मठों और गढ़ों से रूपवाद,संरचनावाद,  अभिव्यक्तिवाद और अब 'लेखक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता' जैसे ऊपर से अत्यंत आकर्षक लगने वाले नारे की लगातार वकालत की जा रही है। इसका जाहिर उद्देश्य लेखक को अपनी सामाजिक, राजनीतिक,विचारधारात्मक प्रतिबद्धता से दूर करना है। इस सारे विभ्रम को विचारपूर्ण तरीक़ों से हटाने की जरूरत है।"

2 टिप्‍पणियां:

  1. साहित्‍य और संस्‍कृति हाशिये में ही अधिक सुरक्षित रहती है, उन्‍हें रोटी-पानी की मुख्‍य धारा में लाने का औचित्‍य नहीं, वरना घाल-मेल.

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  2. इसे पसंद करने के लिये कोलकाता में रहना होगा,जीना होगा ,मरने की या मारे जाने की हिम्मत और जिद के साथ्। दूसरी जगहों खास कर लेखक संगठन और विश्वविद्यालय के बागीचेनुमा अहातो में रहवास करने वाले अध्यापक,लेखक,कर्मचारी और छात्र इसे क्या समझेंगे?यह बोध का नहीं साहस का मामला है। कभी नाज करोगे कि कोई ऐसा भी था जो खुल के बोलता था। यही तो वो बात है जो मार्क्सवाद से सीखी और उसके मुरीद हुये। बाकी सब तो जात -धरम,प्रांत-भाषा,पेशा-पगार के कमान से खिंची हुई 'पॉलिटिकल करेक्टनेश' है। रिजर्वेशन की परिधि तक पहुंचने को बेजार ,बुझा हुआ तीर्। पंचांग -कलेंडर देख कर लिखा व्रत -उपवास महात्म्य और जन्म दिन देख कर लिखी महापुरुषों की जीवनी।***विजय शर्मा

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