गुरुवार, 17 मार्च 2011

केदारनाथ अग्रवाल जन्म शताब्दी के मौके पर उनकी छह कविताएं

छह छोटी कविताएँ

[१]

चली गयी है कोई श्यामा
आँख बचाकर, नदी नहाकर
काँप रहा है अब तक व्याकुल
विकल नील जल।

[
२]
इकला चाँद
असंख्यों तारे,
नील गगन के
खुले किवाड़े.
कोई हमको
कहीं पुकारे
हम आयेंगे
बाँह पसारे।

[
३]
न इश्क
न हुस्न
गये हैं दोनों बाहर
अवमूल्यन में
कर्ज़ चुकाने

[
४]
छूट गयी 'बस'
रह गया मैं
पाँव पर खड़ा,
चाकू-सा
खुला दिन
मेरी देह में गड़ा।

[
५]
हे मेरी तुम !
पेड़
न फूले--
नहीं हँसे
खड़े हुए हैं मौन डसे ।

[
६]
हे मेरी तुम !
कुछ न हुआ, अब
बूढ़ा हुआ सुआ ।
पखने हुए भुआ ।
देखो,
काल ढुका ;
मन सहमा;
तन काँपा, और झुका ।

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3 टिप्‍पणियां:

  1. बूढ़ा हुआ सुआ ।
    पखने हुए भुआ ।
    देखो,
    काल ढुका ;
    मन सहमा;
    तन काँपा, और झुका ।

    ........मोहक और अद्भुद रचनाएँ ... आभार

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  2. एक से बढकर एक पोस्ट है आपका ! बहुत ही अच्छी प्रस्तुती है!हवे अ गुड डे ! मेरे ब्लॉग पर आये !
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  3. Ishk, husn dono bahari hain, awmulyit hain, krjdar ho gye hain...krj chukane ka upkrm jaree hai... Behtreen kwitayen.Dhnyawad.

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