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मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

बंदूक सबके पास है-

               राज्य और केन्द्र में सत्ता भाजपा के पास पूर्ण बहुमत है।छत्तीसगढ़ में सालों से पुलिस कार्रवाई हो रही है।नोट स्ट्राइक से सर्जीकल स्ट्राइक तक सब कुछ कर चुके हो,यह भी कह चुके हो,छत्तीसगढ़ और दूसरे इलाकों में नक्सलवाद की कमर तोड़ दी,नक्सल बर्बाद कर दिए,फिर यह अचानक 300 नक्सलों ने सीआरपीएफ पर हमला कैसे कर दिया मोदीजी ?
सीआरपीएफ के अनेक जवान नक्सली हमले में मारे गए हैं,हम सब दुखी हैं ,इस हमले की निंदा करते हैं,लेकिन जब सीआरपीएफ के हमले से नक्सली मारे जाते हैं या फिर उन पर बेइंतिहा पुलिस जुल्म होते हैं,झूठे केस लगाकर उनको फंसाया जाता है तब भी हमें तकलीफ होती है।
देश के लिए पुलिस-सेना के जवान जितने महत्वपूर्ण हैं आदिवासी नक्सली भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं,आदिवासियों की हजारों एकड़ जमीन बंदूक की नोंक पर छीनी जाएगी तो वे बंदूक का जवाब फूलों की माला पहनाकर नहीं देंगे।बंदूकें सबके पास हैं।
आदिवासियों की बंदूक की नोक पर बेदखली बंद करो,आदिवासियों को न्याय और सुरक्षा दो,हम भी देखते हैं नक्सल कैसे हमले करते हैं !
नक्सलों को आदिवासियों में हीरो तो भाजपा की गलत नीतियों ने बनाया है,पहले यही काम कांग्रेस कर रही थी।
आदिवासी हों या नक्सल हों या माओवादी हों ,वे सब वैसे ही भारत के नागरिक हैं जैसे सेना-सीआरपीएफ -कारपोरेट घराने आदि।लेकिन भाजपा सरकार के नजरिए में सेना-कारपोरेट घराने-सीआरपीएफ आदि तो प्रिय हैं लेकिन अन्य अप्रिय हैं,शत्रु हैं,उनको न्याय पाने का हक नहीं है।इस तरह एक आंख से यदि सरकार देखेगी और अन्याय करेगी तो आदिवासियों और नक्सलों का प्रतिवाद थमने वाला नहीं है।
नक्सली प्रतिवाद को टीवी पर विजय का डंका बजाकर,फेसबुक पर बटुकसंघ के साइबरसैनिकों से हमला कराके परास्त नहीं किया जा सकता।कम से कम मोदीजी इतना तो जान लो आपसे या रमनजी की सरकार से छत्तीसगढ़ के आदिवासी खुश नहीं हैं,आदिवासियों की संकट की घड़ी में राज्य सरकार को मदद करनी चाहिए लेकिन हो उलटा रहा है,फलतःआदिवासियों की मदद करने का नक्सलों को मौका मिला है।आदिवासियों में नक्सलों का सांगठनिक विस्तार हुआ है,मोदीजी आपकी और रमन सरकार की नक्सलवादियों के बारे में की गयी सभी घोषणाएं झूठी साबित हुई हैं।आपके और रमन सरकार का आदिवासियों पर कोई असर नहीं है,कोई आदिवासी आप पर विश्वास नहीं करता।आदिवासियों का घर उजाड़कर भाजपा-आरएसएस-कारपोर्ट घरानों का घर बसाया नहीं जा सकता।

बुधवार, 2 नवंबर 2011

माओवाद,आधुनिकतावाद और हिंसाचार





आधुनिकतावाद के दो प्रमुख बाईप्रोडक्ट है सामाजिकहिंसा और माओवाद। आधुनिकतावाद की खूबी है कि उसने हिंसा को सहज ,स्वाभाविक और अपरिहार्य बनाया है फलतः हिंसा के प्रति घृणा की बजाय उपेक्षा का भाव पैदा हुआ है। हिंसा के हम अभ्यस्त होते चले गए हैं। घरेलू हिसा से लेकर वर्गीय हिंसा तक के व्यापक फलक को देखें तो पाएंगे कि आधुनिकतावाद की आंधी में विकास कम और हिंसा का विस्तार ज्यादा हुआ है। इसमें मीडिया हिंसाचार से लेकर माओवादी हिंसाचार तक का बड़ा दायरा आता है।

आधुनिकतावाद महज कला की समस्या नहीं है बल्कि यह सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक हिंसा से भी जुड़ा फिनोमिना है। यह संयोग की बात है कि भारत में जिस समय आधुनिकतावाद संकटग्रस्त था ठीक उसी समय नक्सलबाड़ी आंदोलन पैदा हुआ।भारत में जिन दिनों दंगे,किसानों की कर्जों के कारण आत्महत्या,औरतों की दहेज-हत्या ,घरेलू हिंसा आदि की सबसे ज्यादा खबरें आई हैं ठीक उसी दौर में माओवादी संगठनों की हिंसाचार की खबरें भी आई हैं।

विचारधारात्मक सच यह है कि माओवादी विचारधारा बुर्जुआजी के अधूरे सपनों को दिखती है और उनको ही पूरा करने पर जोर देती है। बुर्जुआ समाज में जिस तरह अन्य प्रतिवादी विचारधाराएं सक्रिय हैं वैसे ही माओवाद भी सक्रिय है। मसलन् अविकसित आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में वे काम करते हैं और वहीं पर विकास के सवालों को बार-बार विभिन्न रूपों में उठाते हैं। कभी विस्फोट करके,कभी हथियारबंद जंग करके,कभी मुक्तांचलों का निर्माण करके और कभी हडताल करके।



माओवादियों की मांगें व्यवहार में बुर्जुआ विकास से जुड़ी हैं। क्रांति की बातें करते हुए वे अधूरे विकास के सवालों पर रोशनी डालते हैं। सामान्यतौर पर अपने को मार्क्सवाद का असली बारिस कहते हैं। उल्लेखनीय है कि आधुनिककाल में दो विचारधाराओं मार्क्सवाद और उदारतावाद का जन्म हुआ। और दोनों ही मुक्तिकामी विचारधारा का दावा करती हैं। दोनों का लक्ष्य है आधुनिक समाज और आधुनिक मनुष्य का निर्माण करना। जिन समाजों में बुर्जुआ सभ्यता,संस्कृति,आचार-व्यवहार,जीवनशैली और सामाजिक विकास नहीं हुआ है उनमें मार्क्सवाद के मानने वाले विभिन्न राजनीतिक गुटों का पहला लक्ष्य होता है असमानताओं को कम करना। अविकसित क्षेत्रों में विकास और समानता की मांग मूलतः बुर्जुआ मांग है। भूमिसुधार,शिक्षा,स्थानीय जनजातियों के हितों का संरक्षण ,सड़क,पानी,बिजली आदि मांगें मूलतः बुर्जुआ मांगें हैं।

आमतौर पर माओवादी वर्चस्व और विकास के सवालों को उठाते हैं ,खासकर गांवों में सामन्तों,जमींदारों और सूदखोरों के वर्चस्व के सवालों को उठाते हैं और उनसे मुक्ति की मांग करते हैं। वे किसानों-आदिवासियों के हितों के सवालों को उठाते हैं और शहरों में मध्यवर्ग-उच्चमध्यवर्ग से जुड़े रहते हैं। यह सच है आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में विकास नहीं हुआ है। अधूरे विकास की जगह पूर्ण विकास की मांग, अधूरी आजादी की जगह पूरी आजादी की मांग,पूंजीवादी उत्पादन संबंधों में व्याप्त असमानता की समाप्ति की मांग मूलतः बुर्जुआ फ्रेमवर्क से आगे निकलने नहीं देती।

माओवादियों की भाषा क्रांति,प्रतिवाद,समाजवाद,वर्गसंघर्ष,वर्गीय अन्तर्विरोध,आदिवासी इलाकों लोकतंत्र के हनन,पुलिस उत्पीड़न,हत्या बलात्कार आदि घटनाओं से भरी होती हैं। इस तरह की भाषा और इन घटनाओं से जुड़ी विचारधारा के प्रचार से बुर्जुआ व्यवस्था के विकास में मदद मिलती है। खासकर उन इलाकों में जहां पूंजीपति वर्ग पहुंचा ही नहीं है वहां पर मार्क्सवाद से प्रभावित विभिन्न राजनीतिक दल ,जिनमें माओवादी भी शामिल हैं, लोकतंत्र के विकास के बुनियादी कामों में दिलचस्पी लेते हैं।

जिस तरह का माओवादी संगठनों के जनाधार का विकास नव्य -उदारतावाद के दौर में हुआ है वैसा विकास पहले नहीं हुआ । सन् 1990 के बाद वे जितने आक्रामक बने हैं इतने आक्रामक वे पहले कभी नहीं थे। माओवादी हों या वामदल हों, इन सबकी शक्ति में इजाफा इस बात पर निर्भर करता है कि बुर्जुआ समाज का किस गति से विकास होता है।

कुछ लोग यह सोचते हैं कि क्रांतिकारी आंदोलन का विकास क्रांति के भावों और विचारों के कारण होता है,लेकिन वस्तुस्थिति यह नहीं है। क्रांति की विचारधारा मूलतः लोकतंत्र का बायनरी अपोजीशन है। यानी बुर्जुआजी का बायनरी अपोजीशन है। मजदूरवर्ग,बुर्जुआजी अपना विकास करेगा तो उसके अपोजीशन का भी विकास होगा। उस अपोजीशन को संगठित करने वाली ताकतों का भी विकास होगा। यही वजह है कि अभी तक मजदूरवर्ग की मांगे मूलतः बुर्जुआ मांगें ही रही हैं। वे अपनी मांगों के संघर्ष के जरिए बुर्जुआ वातावरण का विकास करते हैं।

मसलन् माओवादियों के आदिवासी और पिछड़े हुए इलाकों में सांगठनिक विस्तार को ही गंभीरता से देखें तो पाएंगे कि इनमें से अधिकांश इलाकों में वे तब ही गए हैं जब वहां किसी न किसी प्रकल्प के लिए जमीन ली गयी,बाँध बनाया गया,कारखाना लगाया गया या अन्य किसी काम के लिए आदिवासियों को बेदखल किया गया। आदिवासियों की बेदखली के पहले माओवादी इन इलाकों में नजर नहीं आते। आदिवासी इलाकों में बेदखली के खिलाफ उनकी मांगें क्या हैं ? वे सारी मांगें आदिवासी इलाकों के विकास से जुड़ी हैं। इनमें भी वे आदिवासियों को उनकी जमीन पर अधिकार दिलाने या उनका मालिकाना हक बरकरार रखने पर ज्यादा जोर देते हैं।

यानी वे "सचेतनता" की बजाय "संरचना" (जमीन)को बचाने पर ज्यादा जोर देते हैं। फलतः "सचेतनता" की बजाय "संरचना" पर ज्यादा वजन पड़ रहा है। बुर्जुआजी का जोर भी "संरचना" को हासिल करने पर है और माओवादियों का भी जमीन को बचाने पर मूल जोर है। वे आदिवासी और ग्रामीण समाज में पूर्व सामंती ,सामंती मूल्यों और सामाजिक शक्तियों के खिलाफ इसके आधार पर कोई विकल्प पैदा नहीं कर सकते। आदिवासियों और किसानों को नए मूल्यों और नई सामाजिक संरचनाओं में रूपान्तरित करने का उनके पास कोई विकल्प नहीं है। पुराने वर्गों या शोषक वर्गों से मुक्ति का उनके पास एक ही रास्ता है हत्या और हिंसा। यह शत्रु को खत्म करने का प्राचीनमार्ग है। वर्गशत्रु को जमीनी और मूल्यों की जंग में परास्त करने की बजाय हिंसा के जरिए खत्म करने की पद्धति अंततः उन्हें सामंती और पूर्व-सामंती वर्गों के खिलाफ संघर्ष से विमुख करती है। इस तरह की हिंसा से माओवादियों को तत्काल मदद तो मिलती है लेकिन दीर्घकालिक तौर पर यह पद्धति उनके लिए मददगार साबित नहीं हुई है।

जिन इलाकों में माओवादी वर्चस्व है वहां वे सभी काम माओवादी करने लगते हैं जो जमींदार-सूदखोर और लठैत किया करते थे।यानी वे अपने विरोधी वर्ग के अवगुणों को स्वयं अपना लेते हैं। सूदखोरों-जमींदारों को जान से मारना एक जमाने में उनके लिए गुरिल्ला संघर्ष का महत्वपूर्ण अस्त्र था।वे मानते थे इससे गांवों में जमींदारों-सूदखोरों का वर्चस्व खत्म होगा और आम किसान की सत्ता स्थापित होगी। माओवादियों की इस रणनीति के कारण अनेक जमींदार-सूदखोर इलाका छोड़कर चले गए,जो गांवों में रह गए वे मार दिए गए या उन्होंने माओवादियों के सामने समर्पण कर दिया।

माओवादियों की आरंभ में नक्सलवादी के रूप में पहचान थी ।वे गुरिल्ला पद्धति से संघर्ष में विश्वास करते थे,इसी आधार मुक्तांचलों का निर्माण और वर्गशत्रु की हत्या के काम को अंजाम दिया गया। उस समय किसानों और मजदूरों को संगठनबद्ध करने के काम को गौण माना गया। व्यापक शिरकत वाले जनांदोलन की पद्धति को अनुपयुक्त कहा गया। लेकिन कालान्तर में इस पद्धति में सुधार करते हुए माओवादियों ने विभिन्न इलाकों में अलग-अलग नामों से संगठन बनाए या बनवाए और उनके बहाने आदिवासियों-ग्रामीणों आदि को एकजुट करने,मीटिंग करने,रैली करने ,वर्गशत्रु की हत्या करने या बेदखल करने की पद्धति पर जोर दिया गया। गुरिल्ला युद्ध की पद्धति के नाम पर हत्याएं करने के काम को संघर्ष का सर्वोच्च रास्ता माना गया। वे मानते हैं कि इससे सामंती और सत्ता के दलालों के वर्चस्व को खत्म करने में मदद मिलती है।गांवों में किसानों को राजनीतिक शक्ति मिलती है। असल में यह अतिवामपंथ है जो वस्तुगत परिस्थितियों को आत्मगत अधीरभाव से देखता है। कुछ समाजविज्ञानी इसे 'अराजक-आतंकी सिद्धांत' और 'पेटी बुर्जुआ अराजकता' के नाम से भी पुकारते हैं। माओवादियों का मानना है कि उनके द्वारा वर्गशत्रु का सफाया करने की प्रक्रिया के गर्भ से समाज में एक नए मनुष्य का जन्म होगा। यह ऐसा मनुष्य होगा जो मौत से नहीं डरेगा और सभी किस्म के निजी स्वार्थ के विचारों से मुक्त होगा।

माओवादी राजनीति के उभार के कारण नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह के शासनकाल तक के दौरान हुए विकास की सीमाएं बड़ी तेजी से आम लोगों के सामने उजागर हुई हैं। माओवादियों ने बुर्जुआ विकास की तमाम बातों की महानरीय-मध्यवर्गीय सीमाओं को उजागर किया है। आज 136 जिलों में माओवादी सक्रिय हैं और इस सक्रियता का बड़ा कारण है सामाजिक-आर्थिक असमानता का 63 सालों के विकास के बावजूद बने रहना।

माओवादियों ने अंधाधुंध विकास की नव्य-उदारतावादी नीतियों का देश के विभिन्न इलाकों में जनांदोलन खड़ा करके प्रतिवाद किया है ।अनेक स्थानों पर उन्होंने सरकार को पीछे हटने के लिए मजबूर किया है। इस क्रम में कारपोरेट मीडिया में मीडिया उनका महिमामंडन भी हुआ है और माओवादियों ने गरीबी-असमानता और विस्थापन के सवालों पर सरलीकृत फार्मूलों का जमकर दुरूपयोग किया है। इसमें गरीबी को उन्होंने अपनी हिंसा के लिए वैध अस्त्र ठहराया है।



माओवाद के खिलाफ कुछ लोग यह तर्क दे रहे हैं कि हमें उनके खिलाफ राजनीतिक जंग लड़नी चाहिए। उन्हें जनता में अलग-थलग करना चाहिए। उनके खिलाफ जनता को गोलबंद करना चाहिए। सवाल यह है कि क्या माओवादी हिंसा के समय जनता में राजनीतिक प्रचार किया जा सकता है ? क्या माओवाद का विकल्प जनता को समझाया जा सकता है ? राजनीतिक प्रचार के लिए शांति का माहौल प्राथमिक शर्त है और माओवादी अपने एक्शन से शांति के वातावरण को ही निशाना बनाते हैं,सामान्य वातावरण को ही निशाना बनाते हैं, वे जिस वातावरण की सृष्टि करते हैं उसमें राज्य मशीनरी के सख्त हस्तक्षेप के बिना कोई और विकल्प संभव नहीं है। राज्य की मशीनरी ही माओवादी अथवा आतंकी हिंसा का दमन कर सकती है।

दूसरी बात यह है कि जब एक बार शांति का वातावरण नष्ट हो जाता है तो उसे दुरूस्त करने में बड़ा समय लगता है। माओवादी और उनके समर्थक बुद्धिजीवी माओवादियों की शांति का वातावरण नष्ट कर देने वाली हरकतों से ध्यान हटाने के लिए पुलिस दमन,आदिवासी उत्पीड़न, आदिवासियों का आर्थिक-सामाजिक पिछड़ापन,बहुराष्ट्रीय निगमों के हाथों आदिवासियों की प्राकृतिक भौतिक संपदा को राज्य के द्वारा बेचे जाने,आदिवासियों के विस्थापन आदि को बहाने के तौर पर इस्तेमाल करते हैं।

माओवादी राजनीति या आतंकी राजनीति का सबसे बड़ा योगदान है सामान्य राजनीतिक वातावरण का विनाश। वे जहां पर भी जाते हैं सामान्य वातावरण को बुनियादी तौर पर नष्ट कर देते हैं। ऐसा करके वे भय और निष्क्रियता की सृष्टि करते हैं। इसके आधार पर वे यह दावा पेश करते हैं कि उनके साथ जनता है। सच यह है कि आदिवासी बहुल इलाकों से कांग्रेस, माकपा, भाजपा आदि दलों के लोग चुनाव के जरिए विशाल बहुमत के आधार पर चुनकर आते रहे हैं। माओवादियों के प्रभाव वाले इलाकों में उनकी चुनाव बहिष्कार की अपील का कोई असर नहीं पड़ता।

मीडिया के प्रचार ने कारपोरेट पूंजी निवेश का जिस तरह पारायण किया है और इसके विध्वंसात्मक आयाम पर पर्दादारी की है, उसे गायब किया है, उससे दर्शकीय नजरिया बनाने में मदद मिली है। प्रचार के जरिए हर चीज का जबाब बाजार में खोजा जा रहा है,हमसे सिर्फ देखने और भोग करने की अपील की जा रही है। बाजार,पूंजी निवेश, परवर्ती पूंजीवाद को वस्तुगत बनाने के चक्कर में मीडिया यह भूल ही गया कि वह जनता को सूचना संपन्न नहीं सूचना विपन्न बना रहा है। हमसे यह छिपाया गया है कि पूंजीवाद आखिरकार किन परिस्थितियों में काम करता है।

माओवादी संगठनों के संदर्भ में बुनियादी सवाल यह है कि क्या मौजूदा हिंसाचार जायज, तार्किक,वैध,और न्यायपूर्ण है ? क्या इस हिंसाचार से भारत के किसानों के जानो-माल की रक्षा हो रही है ? क्या माओवादी संगठनों के प्रभाव वाले इलाकों में किसान और आम आदमी चैन की नींद सो रहा है ? माओवादी संगठन अपने प्रभाव वाले इलाकों में जबरिया धन वसूली कर रहे हैं ।

दूसरा सवाल यह है कि माओवादियों के पास कई हजार सशस्त्र गुरिल्ला हैं और उनकी पचासों टुकडियां हैं, इन सबके लिए पैसा कहां से आता है ? गोला-बारूद से लेकर पार्टी होलटाइमरों और सशस्त्र गुरिल्लाओं के वेतन का भुगतान किन स्रोतों से होता है ? कौन हैं वे देशी-विदेशी संगठन और लोग जो इतने बड़े पैमाने पर माओवादी गुरिल्लाओं को पैसा भेज रहे हैं ?

माओवादियों की बात मानें तो आदिवासी अतिदरिद्र हैं। और वे कम से कम माओवादियों के लिए नियमित चंदा नहीं दे सकते। माओवादियों को कभी किसी ने शहरों में भी चंदा की रसीद काटकर या कूपन देकर चंदा वसूलते नहीं देखा। ऐसी स्थिति में वे धन कहां से प्राप्त करते हैं ? हिन्दुस्तान की गरीब जनता और खासकर आदिवासियों को यह जानने का हक है कि माओवादियों के पास धन कहां से आता है ?और किन मदों में खर्च होता है ?

माओवादियों के संदर्भ में तीसरा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या भारत की बहुलता को माओवादियों के राज्य में कोई जगह मिलेगी ? आज तक राजनीतिक,वैचारिक ,सामाजिक और धार्मिक बहुलतावाद के प्रति माओवादियों का घृणास्पद और बर्बर व्यवहार रहा है ऐसा ही व्यवहार साम्प्रदायिक,फंड़ामेंटलिस्ट और आतंकवादी संगठन भी करते हैं।

आज भारत में ऐसे दल हैं जो क्रांति लाना चाहते हैं। सर्वहारा के अधिनायकवाद के पक्षधर हैं। लेकिन वे भारत के बहुलतावादी समाज और राजनीतिक तानेबाने को मानते हैं और उसकी रक्षा के लिए समय-समय पर अपने दलीय स्वार्थ का भी उन्होंने त्याग किया है। उनकी लोकतंत्र और भारत के संविधान में आस्था है। भारत के दोनों कम्युनिस्ट दल इसके प्रमाण हैं।

समस्या यह है कि माओवादी बहुलतावाद के प्रति सहिष्णु क्यों नहीं हैं ? यदि सहिष्णु हैं तो वह सहिष्णुता व्यवहार में नजर क्यों नहीं आती ? ‘ऊपर से छह इंट छोटा कर देने से लेकर दनादन मौत के घाट उतारने तक’ का माओवादियों का राजनीतिक सफर इस बात की ओर संकेत कर रहता है कि उनके यहां बहुलतावाद के लिए कोई जगह नहीं है।

क्या हम यह कल्पना कर सकते हैं कि माओवादी शासन होगा और उसमें सभी धर्मों की आजादी बरकरार रहेगी ? सभी दलों की राजनीतिक स्वाधीनता बची रहेगी ? सभी वर्गों में भाईचारा रहेगा ? औरतों ,आदिवासियों और अल्पसंख्यकों की राजनीतिक-धार्मिक और भाषायी स्वाधीनता बरकरार रहेगी ? उनके राज्य में विभिन्न रंगत के मार्क्सवादी,राष्ट्रवादी,उदारवादी सुरक्षित और स्वतंत्रभाव से रहेंगे ? और उन्हें अभी जितनी आजादी बुर्जुआ संविधान के तहत मिली हुई है उससे भी ज्यादा स्वाधीनता और अधिकार प्राप्त होंगे ?

माओवाद के संदर्भ में चौथा सवाल यह है कि क्या माओवाद प्रभावित 136 जिलों में सामाजिक-राजनीतिक शक्ति संतुलन माओवादियों के पक्ष में है ? जी नहीं ,माओवादी संगठन ही नहीं सभी रंगत के क्रांतिकारी संगठन मिल जाएं तो भी सामाजिक और राजनीतिक शक्ति संतुलन उनके पक्ष में नहीं है।माकपा और वाममोर्चा लंबे समय से पश्चिम बंगाल,त्रिपुरा और केरल में प्रमुख राजनीतिक शक्ति हैं लेकिन सामाजिक वर्गीय शक्ति संतुलन आज भी उनके पक्ष में नहीं हैं जबकि उन्हें जनता में बड़ी मात्रा में जनसमर्थन प्राप्त है। इसकी तुलना में माओवादियों का किसी भी राज्य में राजनीतिक वर्चस्व नहीं है,सामाजिक वर्गीय शक्ति संतुलन उनके पक्ष में होना तो दिवा-स्वप्न है। माओवादी संगठन किसान,आदिवासी और क्रांति की कितनी ही बातें करें भारत के वैचारिक, राजनीतिक, भाषायी,धार्मिक और सांस्कृतिक बहुलतावाद को नतमस्क होकर स्वीकार करना होगा। बहुलतावाद के इन रूपों को अस्वीकार करने के कारण सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के सभी देशों में समाजवाद गिर गया और कम्युनिस्ट पार्टियों के अंदर से विभिन्न रंगत के पृथकतावादी,फासिस्ट,अंधराष्ट्रवादी,अपराधी, राज्य की संपत्ति के लुटेरे पूंजीपतियों का समूह रातों-रात पैदा हो गया था। समाजवादी व्यवस्था के पराभव के साथ ही हठात् कम्युनिस्टों के अंदर से ऐसे तत्व बाहर आए हैं जिनकी कोई कल्पना तक नहीं कर सकता। आज पूर्व समाजवादी देशों की जनता का कम्युनिस्टों पर विश्वास नहीं है। कहने का अर्थ यह है कि वैचारिक ,सामाजिक और सांस्कृतिक बहुलतावाद और लोकतंत्र वास्तविकता हैं। इनको हर कीमत पर बचाया जाना चाहिए।

माओवादी राजनीति का राजनीतिक बहुलतावाद से बैर है।राजनीतिक बहुलतावाद और लोकतंत्र एक सिक्के के ही दो पहलू हैं। माओवादियों की भारत के लोकतंत्र में आस्था नहीं है ऐसे में बहुलतावाद का क्या होगा ? क्या माओवाद के नाम पर भारत के लोग बहुआयामी बहुलतावाद की बलि देने को तैयार हैं ?

एक अन्य सवाल उठता है कि माओवादी अंधाधुंध कत्लेआम क्यों कर रहे हैं ? इस कत्लेआम का उनके प्रतिवादी संघर्षों और किसान-आदिवासियों में नव्य-उदारतावादजनित विस्थापन और भूमि अधिग्रहण के खिलाफ संघर्ष के एजेण्डे गहरा संबंध है।

आज भारत में नव्य उदारतावाद का एजेण्डा पिट चुका है। दूसरा कारण है माओवादी आंदोलन का चंद क्षेत्रों तक सीमित हो जाना। हिन्दुस्तान के अन्य वर्गों की समस्याएं उनके आंदोलन के केन्द्र में नहीं हैं। वे राजनेताओं और विभिन्न राजनीतिक दलों की नीतियों को खारिज करते हैं। कल तक माओवादियों के अंदर एक हिस्सा था जो लोकतंत्र को नहीं मानता था लेकिन अब वे चुनावों में भाग लेते हैं।

आज माओवादियों के सामने संकट यह है कि नव्य-उदारतावाद के खिलाफ उनका संघर्ष किसानों से लेकर मध्यवर्ग तक अपील खो चुका है। दूसरी ओर बुर्जुआ उदार लोकतंत्र की साख में भी बट्टा लग चुका है। समाजवाद के अधिकांश मॉडल पिट चुके हैं ऐसी अवस्था में माओवादी समझ नहीं पा रहे हैं कि क्या करें ?

माओवादियों ने हाल वर्षों में नव्य-उदारतावाद के खिलाफ संघर्ष करके जो जमीन बनायी थी वह ग्लोबल एजेण्डा पूरी तरह पिट गया है। यह अमरीकी ग्लोबल एजेण्डा था आज जब अमेरिका में इस एजेण्डे का अंत हुआ है तो स्वाभाविक तौर पर सारी दुनिया में इसकी विदाई की घोषणा हो गयी है।

नव्य-उदारतावाद की विदाई की बेला में माओवादियों के पास सही एजेण्डे का अभाव है यही बुनियादी वजह है जिसके कारण वे अंधाधुंध हत्याएं कर रहे हैं। यह उनके दिशाहीन होने का संकेत है। माओवादियों का हिंसाचार 2001 के बाद से क्रमशः बढ़ा है और यह उनके एजेण्डे के पिटने का संकेत है।

माकपा और वामदलों ने नव्यउदारतावाद के बरक्स अपनी राजनीति में संतुलन पैदा किया और विकल्प का मार्ग चुना और इस दौर में नव्य उदारतावाद के संदर्भ में नए नीतिगत उपाय लागू कराने में सफलता हासिल की। नव्य-उदारतावाद के पिटते ही सोनिया-राहुल गांधी भी किसानों के हितों का ख्याल रखने की बातें करने लगे हैं। आज सोनिया और माओवादियों में किसानों की जमीन के मामले में एक ही स्वर दिखाई दे रहा है। अब वे जमीन अधिग्रहण के मामले में नया सख्त कानून लाना चाहते हैं। लेकिन अधिकांश राज्यों में किसानों की लाखों एकड़ जमीन तो कारपोरेट घराने खरीद चुके हैं। कानून ही लाना था तो 10 साल पहले क्यों नहीं लाए ?

माओवादी संगठनों के हिंसाचार का एक अन्य कारण है भारत में खासकर आदिवासी इलाकों में लोकतंत्र में जनता की व्यापक शिरकत। लोकतंत्र में व्यापक शिरकत के कारण ही वे लाख प्रचार करके भी साधारण लोगों को वोट ड़ालने से रोक नहीं पाए हैं। यही वजह है कि वे गरीबों की अंधाधुंध हत्याएं कर रहे हैं। उल्लेखनीय है नव्य-उदारतावाद के लाख दोष हों लेकिन आम आदमी की चेतना और शिरकत में कई गुना वृद्धि हुई है। संचार क्रांति ने क्रांति के सभी रूपों को फीका बना दिया है। बुर्जुआ लोकतंत्र के प्रति आकर्षण बढ़ा है।

गुरुवार, 11 अगस्त 2011

माओवाद-ममता -महाश्वेता की दोगली राजनीति


    माओवाद और कारपोरेट मीडिया का रोमैंटिक संबंध है। भारतीय बुर्जुआजी और माओवाद में सतह पर वर्गयुद्ध दिखाई देता है लेकिन व्यवहार में माओवादी संगठन और उनकी विचारधारा बुर्जुआजी की सेवा करते हैं। जो लोग यह सोचते हैं कि माओवादी क्रांतिकारी हैं और क्रांति के बिना नहीं रह सकते , वेमुगालते में हैं। माओवादियों का क्रांति, समाजसुधार और सामाजिक परिवर्तन जैसे कामों से कोई संबंध नहीं है।
    इन दिनों कारपोरेट मीडिया के लिए माओवादी खबर नहीं हैं। माओवादी कहां चले गए ? वे इन दिनों क्या कर रहे हैं ? उनकी गतिविधियों के बारे में विगत विधानसभा चुनावों के पहले खासकर पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले इतना फोकस क्यों था ? ममता बनर्जी के मुख्यमंत्री बनने के बाद अचानक माओवाद प्रभावित लालगढ़ की खबरें आनी बंद क्यों हो गयीं? क्या पश्चिम बंगाल के माओवाद प्रभावित इलाकों में अमन-चैन लौट आया है ? ये कुछ सवाल हैं जिन पर गंभीरता के साथ विचार करने की जरूरत है।
        ममता सरकार आने के बाद माओवादियों ने लालगढ़ इलाके में अपना वर्चस्व पुनःस्थापित कर लिया है।  लालगढ़ इलाके में माओवादियों के खिलाफ सशस्त्रबलों का ऑपरेशन मूलतः ठंडा कर दिया गया है। ममता सरकार ने 100 के करीब राजनीतिक बंदियों को रिहा किया है उसमें कई माओवादी नेता भी हैं। 13 जुलाई को लालगढ़ इलाके में ममता बनर्जी ने मुख्यमंत्री बनने के बाद सभा की है और अनेक लोकलुभावन योजनाओं की घोषणा की है। लेकिन इन योजनाओं के कार्यान्वयन के लिए जमीनी स्तर पर कोई काम राज्य सरकार ने आरंभ नहीं किया है।
  दूसरी ओर नए सिरे माओवादियों के संरक्षण में चलने वाली 'पुलिस संत्रास विरोधी कमेटी' ने लालगढ़ और आसपास के इलाकों में अपना दखल कायम कर लिया है। सभी दलों के काम करने पर अघोषित पाबंदी है। यहां तक तृणमूल काग्रेस का विधायक अपने इलाके में घुस नहीं सकता। माकपा के सैंकड़ों लोग इलाका छोड़ने के लिए मजबूर हुए हैं। लालगढ़ के 12 पुलिसथानों के तहत आने वाले इलाकों और पड़ोसी राज्यों से लगने वाले कोरीडोर पर माओवादियों ने फिर से कब्जा जमा लिया है।
मुख्यमंत्री बनने के बाद ममता बनर्जी ने 13जुलाई 2011 को लालगढ़ में जो रैली की थी उसमें उसने एक गलत मिसाल कायम की। 3नवम्बर 2008 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के जिंदल के कारखाने के उद्घाटन के बाद लौटते समय माओवादियों ने जो लैण्डमाइन धमाका किया था उसके बाद पुलिस ने अपराधियों की धरपकड़ के लिए जो छापे मारे थे उनमें पुलिस से कुछ ज्यादतियां भी हुई थीं  । ममता बनर्जी ने अपनी रैली में उस पुलिस छापे में परेशान किए गए लोगों के लिए आर्थिक सहायता राशि की घोषणा की। सवाल यह है कि मुख्यमंत्री और केन्द्रीय मंत्री के कार काफिले पर लैण्डमाइन से हमला करने वालों की पुलिस छानबीन करेगी या नहीं ? छानबीन के दौरान जिन लोगों से कसकर पूछताछ की गई है या पुलिस ने परेशान किया है तो क्या उसके लिए राज्य सरकार कम्पसेशन देगी ? क्या मुख्यमंत्री के काफिले पर किया गया हमला माओवादी साजिश नहीं थी ? क्या माओवादियों ने लैण्डमाइन विस्फोट के लिए माफी मांगी ? मुख्यमंत्री के काफिले पर लैण्डमाइन बिछाकर किया गया हमला एक निंदनीय अपराध है और उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
   मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उस मीटिंग में एक और महत्वपूर्ण बात कही कि लालगढ़ के लोगों को पुलिस से डरने की जरूरत नहीं है। पुलिस तो उनकी मदद के लिए है। ममता का कम्पशेसन पैकेज और यह घोषणा अपने आपमें माओवादियों के खिलाफ पुलिस और अन्य प्रशासनिक ईकाइयों को संदेश है कि माओवादियों के खिलाफ ऑपरेशन ठंडा करो।
  उल्लेखनीय है जिंदल ग्रुप ने लालगढ़ के सालबनी इलाके में इस्पात का कारखाना लगाने के लिए राज्य वाम मोर्चा सरकार से पांच हजार एकड़ जमीन ली थी। इसमें ज्यादातर बंजर जमीन है। माओवादियों ने इसका विरोध किया था और एक जमाने में ममता बनर्जी ने उनके आंदोलन का समर्थन भी किया था। जिंदल ग्रुप को आदिवासियों की  जमीन दिए जाने पर पश्चिम बंगाल के तमाम रेडीकल कहलाने वाले बुद्धिजीवियों महाश्वेता देवी आदि को भी गंभीर आपत्ति थी। लालगढ़ की समूची समस्या इस प्रकल्प को जमीन दिए जाने के बाद आरंभ हुई और ममता ने विपक्ष में रहते हुए इसे बढ़ावा दिया जिसके कारण अंततः केन्द्र सरकार की मदद से लालगढ़ में राज्य सरकार को 25 हजार से ज्यादा सशस्त्रबल लगाने पड़े।
    मजेदार बात यह है कि ममता बनर्जी सरकार बनने के साथ ही जिंदल के कारखाने के खिलाफ माओवादियों और रेडीकल लेखकों का आंदोलन गायब हो गया है । उलटे ममता सरकार में उद्योगमंत्री पार्थ चटर्जी ने जिंदल ग्रुप के लोगों को बुलाकर बात की है और यह इच्छा व्यक्त की है कि जल्दी ही इस कारखाने के अधूरे कामों को पूरा किया जाए। सवाल यह है  सालबनी इस्पात कारखाने को लेकर ममता सरकार का आज जो नरम रूख है वह विपक्ष में रहते हुए क्यों नहीं था ?
    आज माओवादी चुप हैं ,उनकी चुप्पी संकेत है कि वे चाहते हैं कि कारखाना लगे। इसका अर्थ यह भी है कि वाममोर्चा सरकार का जिंदल के इस्पात कारखाने को लेकर लिया गया फैसला सही था। उस कारखाने को लेकर ममता बनर्जी ,माओवादियों और महाश्वेता देवी लेखकों की आपत्तियां पूर्वाग्रह से प्रेरित थीं। पहले जो अशांति और आतंक के वातावरण की सृष्टि की गई थी वो भी गलत था ।
   सालबनी के जिंदल इस्पात कारखाने को लेकर महश्वेता देवी और अन्य रेडीकल लेखकों का दोगला चरित्र भी सामने आ गया है। वे पहले लालगढ़ में आम लोगों को जिंदल ग्रुप के बारे में भड़का रहे थे,जो बुनियादी रूप से गलत था। अब ये ही लेखक-बुद्धिजीवी ममता सरकार के प्रत्येक कदम का समर्थन कर रहे हैं। चूंकि ममता सरकार जिंदल कारखाने के पक्ष में है तो महाश्वेता देवी और माओवादी भी इसके पक्ष में हैं। सवाल यह है ये ही लोग बुद्धदेव सरकार और वाममोर्चे का लालगढ़-सालबनी में फिर किस बात के लिए विरोध कर रहे थे ?

































बुधवार, 19 जनवरी 2011

ममता बनर्जी खबर नहीं प्रौपेगैण्डा है

     बांग्ला चैनलों में इन दिनों माओवादियों के नृशंस कर्मों का प्रतिदिन महिमामंडन चल रहा है। बांग्ला चैनलों में ममता बनर्जी और राजनीतिक हिंसा के अलावा सभी खबरें तकरीबन हाशिए पर डाल दी गयी हैं या नदारत हैं। बांग्ला चैनलों में टॉकशो से लेकर खबरों तक सभी कार्यक्रमों में ममता,माओवाद और हिंसा का महिमामंडन सुनियोजित रणनीति के तहत किया जा रहा है। यह ममता बनर्जी का सुनियोजित प्रौपेगैण्डा है। यह बांग्ला समाचार चैनलों के प्रौपेगैण्डा चैनलों में रूपान्तरण की सूचना है। यह पश्चिम बंगाल की जनता को सूचना दरिद्र बनाने की गंभीर साजिश है। बांग्ला चैनलों को देखकर यही लगता है कि ममता बनर्जी ही खबर है। इस अवधारणा के आधार पर तैयार प्रस्तुतियों में खबरों के अकाल का एहसास होता है। ममता बनर्जी के भाषण खबर नहीं प्रौपेगैण्डा हैं। ममता बनर्जी की मुश्किल है कि उनके पास मुद्दा नहीं है वे अपने भाषण और हिंसक घटनाओं को मुद्दा बनाने की असफल कोशिस कर रही हैं। वे यह भूल गयी हैं कि हिंसा को आज के दौर में मुद्दा नहीं बनाया जा सकता। यदि ऐसा हो पाता तो नरेन्द्र मोदी गुजरात का चुनाव कभी का हार गए होते।
   टीवी कवरेज में माओवादी हिंसा अपील नहीं करती ,बल्कि वितृष्णा पैदा करती है। यह वर्चुअल हिंसा है। टीवी पर हिंसा का कवरेज निष्प्रभावी होता है। टीवी वाले माओवादी हिंसा से जुड़े बुनियादी सवालों पर चर्चा नहीं कर रहे हैं।  सवाल उठता है माओवादी संगठनों का मौजूदा हिंसाचार जायज है ? इस हिंसाचार से पश्चिम बंगाल के किसानों के जानो-माल की रक्षा हो रही है ? माओवादी संगठनों के प्रभाव वाले इलाकों में किसान और आम आदमी चैन की नींद सो रहे हैं ? प्रभावित इलाकों में माओवादी नेता साधारण लोगों से जबरिया धनवसूली क्यों कर रहे हैं ? माओवादियों के पास कई हजार सशस्त्र गुरिल्ला हैं और उनकी पचासों टुकडियां हैं, इन सबके लिए पैसा कहां से आता है ? गोला-बारूद से लेकर पार्टी होलटाइमरों और सशस्त्र गुरिल्लाओं के मासिक वेतन का भुगतान किन स्रोतों से होता है ? इसका जबाब बांग्ला चैनलों,तृणमूल कांग्रेस,माकपा और माओवादियों को देना चाहिए।  
   माओवादियों और ममता बनर्जी के अनुसार आदिवासी अतिदरिद्र हैं। ऐसीस्थिति में वे कम से कम माओवादियों के लिए नियमित चंदा नहीं दे सकते। माओवादियों को कभी किसी ने शहरों में भी चंदा की रसीद काटकर या कूपन देकर चंदा वसूलते नहीं देखा। ऐसी स्थिति में वे धन कहां से प्राप्त करते हैं ?   
       आज तक राजनीतिक,वैचारिक ,सामाजिक और धार्मिक बहुलतावाद के प्रति माओवादियों का घृणास्पद और बर्बर व्यवहार रहा है । वे भारत के बहुलतावादी सामाजिक और राजनीतिक तानेबाने को नहीं मानते। वर्गशत्रु और उसके एजेण्ट को ‘ऊपर से छह इंट छोटा कर देने’ या मौत के घाट उतारदेने या इलाका दखल की राजनीति करने के कारण माओवादियों से भारत के बहुलतावादी तानेबाने के लिए गंभीर खतरा पैदा हो गया है। माओवादी जिन इलाकों में वर्चस्व बनाए हुए हैं वहां पर आज भी राजनीतिक स्वाधीनता नहीं है।  उन इलाकों में विभिन्न रंगत के मार्क्सवादी,राष्ट्रवादी,उदारवादी और अनुदारवादी पूंजीवादी दल अपने को सुरक्षित महसूस नहीं करते। आज बुर्जुआ संविधान के तहत जितनी न्यूनतम आजादी मिली हुई है माओवादी इलाकों में वह भी नहीं हैं।  
    यह भ्रम है कि माओवाद प्रभावित 136 जिलों में सामाजिक-राजनीतिक शक्ति संतुलन माओवादियों के पक्ष में है। असल में वे आतंक की राजनीति करके इन इलाकों में लोकतंत्र को पंगु बनाए हुए हैं। साथ ही पृथकतावादी,फासिस्ट,अंधराष्ट्रवादी और अपराधी गिरोहों के साथ मिलकर समानान्तर व्यवस्था चला रहे हैं ।       
      राजनीतिक बहुलतावाद और लोकतंत्र एक सिक्के के ही दो पहलू हैं। माओवादियों की भारत के लोकतंत्र और बहुलतावाद में कोई आस्था नहीं है। ममता बनर्जी की इन दोनों में आस्था है। ऐसे में ममता बनर्जी का माओवादियों से समर्थन मांगना नाजायज है। एक अन्य सवाल उठता है कि माओवादी अंधाधुंध कत्लेआम क्यों कर रहे हैं ? आज भारत में नव्य उदारतावाद विरोधी एजेण्डा पिट चुका है। दूसरा कारण है माओवादी आंदोलन का चंद क्षेत्रों तक सीमित हो जाना। हिन्दुस्तान के अन्य वर्गों की समस्याएं उनके आंदोलन के केन्द्र में नहीं हैं। नव्य-उदारतावाद के खिलाफ उनका संघर्ष किसानों से लेकर मध्यवर्ग तक अपील खो चुका है। समाजवाद के अधिकांश मॉडल पिट चुके हैं ऐसी अवस्था में माओवादी समझ नहीं पा रहे हैं कि क्या करें ?
      माओवादियों ने हाल के वर्षों में नव्य-उदारतावाद के खिलाफ संघर्ष करके जो थोड़ी -बहुत जमीन बनायी थी वह खतरे में है।नव्य-उदारतावाद विरोध की आर्थिकमंदी के साथ ही विदाई हो चुकी है। नव्य-उदारतावाद की विदाई की बेला में माओवादियों के पास सही एजेण्डे का अभाव है यही बुनियादी वजह है जिसके कारण वे हताशा में अंधाधुंध हत्याएं कर रहे हैं। आदिवासियों में वे अपना जनाधार विचारधारा और संघर्ष के आधार पर सुरक्षित नहीं रख पा रहे हैं। जिन इलाकों में माओवादी सक्रिय हैं उन इलाकों में लोकतांत्रिक राजनीति की बजाय इलाका दखल की राजनीति हो रही है। फलतः उनकी विचारधारात्मक अपील घटी है। यही वजह है लालगढ़ में माकपा को अपने खोए हुए जनाधार को पाने में सफलता मिली है। दूसरी ओर माओवादियों के अंदर एक गुट अब पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के सहयोग से विधानसभा चुनावों में भाग लेने का मन बना चुका है। वे लालगढ़ में पुलिस संत्रास विरोधी कमेटी के बैनरतले आगामी विधानसभा का चुनाव लड़ना चाहते हैं और इस दिशा में तैयारियां चल रही हैं। यह हिंसा की राजनीति को वैध बनाने की कोशिश है। आगामी दिनों में वाममोर्चे की यह कोशिश होगी कि लालगढ़ की हिंसा को मीडिया उन्माद के जरिए किसी तरह वैधता न मिले।साथ ही लालगढ़ में किसी भी तरह माओवादी और ममता बनर्जी को चुनावी सफलता न मिले।
   
    
   


बुधवार, 29 दिसंबर 2010

गृहमंत्री पी. चिदम्बरम् का माओवादी प्रेम

          पश्चिम बंगाल में केन्द्रीय गृहमंत्री पी.चिदम्बरम का असली खेल सामने आ गया है। खासकर माओवादियों के संदर्भ में हम पहले भी कईबार लिख चुके हैं कि कांग्रेस का माओवादियों के प्रति याराना है। इसबार कुछ बात ही अलग है। असल में माओवादी हिंसाचार और आतंक देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। लेकिन कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृत्व चुनावी गणित को ध्यान में रखकर माओवाद से लड़ना चाहता है। जैसा कि सभी जानते हैं कि पश्चिम बंगाल के लालगढ़ इलाके में केन्द्र और राज्य के सशस्त्रबलों का संयुक्त अभियान चल रहा है और उसमें अब तक काफी हद तक सफलता भी मिली है। अनेक नामी-गिरामी माओवादी नेता और हिंसाचार में शामिल अपराधियों को सशस्त्रबलों ने पकड़ा भी है। माओवादियों के जितने बड़े नेता पश्चिम बंगाल में पकड़े गए हैं उतने बड़े नेता अन्यत्र किसी राज्य में गिरफ्तार नहीं हुए हैं। लालगढ़ इलाके में अभी भी सैंकड़ों शरणार्थी अपने घरों से दूर पनाह लिए कष्ट में दिन काट रहे हैं। 30 हजार से ज्यादा सशस्त्रबलों के संयुक्त अभियान के बाबजूद माकपा के सदस्यों और हमदर्दों को उनके घर वापस नहीं पहुँचा पाए हैं। इन शरणार्थी शिविरों के रखरखाब,देखभाल और समस्त खर्चे को माकपा की स्थानीय इकाईयां उठा रही हैं। माओवाद के खिलाफ लालगढ़ में जो आपरेशन चल रहा है उसके बारे में दो सप्ताह पहले तक केन्द्र और राज्य सरकार के बीच में कोई मतभेद नहीं था।
      दूसरी ओर ममता बनर्जी और उनके दल तृणमूल कांग्रेस का माओवादियों के साथ खुला गठबंधन है और वे चाहते हैं कि लालगढ़ इलाके से सशस्त्रबलों को हटा लिया जाए। इसके लिए वे लगातार प्रदर्शन,धरना,रैली आदि कर रही हैं। लेकिन 21 दिसम्बर 2010 को एक नया मोड़ आया है । केन्द्रीय गृहमंत्री पी.चिदम्बरम ने राज्य के मुख्यमंत्री को एकपत्र लिखकर कहा है कि लालगढ़ इलाके से ‘हरमदवाहिनी’ के लोगों को हथियार समर्पण के लिए राज्य सरकार प्रयास करे। इस प्रसंग में सबसे पहली बात यह कि पश्चिम बंगाल में ‘हरमदवाहिनी’ नामक कोई संगठन नहीं है। माओवादी और तृणमूल कांग्रेस के लोग भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) को कलंकित करने और उसका नाम विकृत करने के लिए ‘हरमदवाहिनी’ पदबंध का प्रयोग कर रहे हैं। ‘हरमद’ यानी ‘गुंडा’वाहिनी। आश्चर्य की बात यह है कि गृहमंत्री ने ‘हरमदवाहिनी’ पदबंध का अपने पत्र में इस्तेमाल किया है। सवाल उठता है क्या गृहमंत्री का किसी राष्ट्रीय राजनीतिक दल को उसके असली नाम से पुकारने की बजाय विकृत नाम से पुकारना सही है ? यह राजनीतिक शिष्टाचार और सरकारी मर्यादा का उल्लंघन है । केन्द्रीय गृहमंत्री को किसी भी दल को विकृत नाम से पुकारने का कोई हक नहीं है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि जब ऑपरेशन चल रहा हो और सशस्त्रबलों के जवान अपनी जान की बाजी लगाकर माओवादियों का मुकाबला कर रहे हों तो ऐसी स्थिति में चिदम्बरम् का पत्र उनके मनोबल को तोड़ने का काम करेगा। तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कानून-व्यवस्था का मसला राज्य के अधीन आता है केन्द्रीय गृहमंत्री ने पत्र लिखकर अपनी मर्यादा का अतिक्रमण किया है। सब जानते हैं माओवादियों से कांग्रेसियों का आंतरिक याराना है और वे जहां पर भी गए हैं वहां उन्होंने क्रांति की सेवा कम की है असंवैधानिक सत्ताकेन्द्रों और स्थानीय बड़े बुर्जुआदल के दलालों का काम ज्यादा किया है। बिहार,छत्तीसगढ़,आंध्र,पश्चिम बंगाल आदि का अनुभव इस बात की पुष्टि करता है।
    कायदे से लालगढ़ ऑपरेशन को लेकर केन्द्र सरकार को अपने मंत्रियों की लगाम कसनी चाहिए। केन्द्र के मंत्री बेलगाम होकर माओवादियों के घर आ जा रहे हैं और उन्हें खुलेआम समर्थन दे रहे हैं। कम से चिदम्बरम बाबू ने एकबार ममता बनर्जी को भी पत्र लिखा होता कि आप और आपका दल माओवादियों और उनके डमी संगठन पुलिस संत्रास विरोधी कमेटी से अपने को दूर रखे। चिदम्बरम बाबू का यह माओ-ममता अंधप्रेम किसी तर्क से समझ में नहीं आता। हम यह समझने में असमर्थ हैं कि माओवादियों का समर्थन करने वाले कैबीनेट में कैसे रह सकते हैं। चिदम्बरम बाबू को पूरा हक है कि वे केन्द्रीयबलों को वापस बुला लें। लेकिन माकपा को अपना कार्यकर्ताओं और आदिवासियों के जानोमाल की माओवादियों से हिफाजत के लिए संघर्ष करने का लोकतांत्रिक हक है। ममता बनर्जी और माओवादी मिलकर माकपा और वाममोर्चे का विरोध करें यह बात समझ में आती है लेकिन वे माकपा सदस्यों का कत्लेआम कर रहे हैं। कम्युनिस्टों की खुलेआम हत्याएं कर रहे हैं और ममता एड कंपनी कम्युनिस्ट हत्यारों को राजनीतिक, कानूनी और आर्थिक मदद दे रहे हैं। इससे भी आश्चर्य की बात यह है कि चिदम्बरम बाबू ने अपने पत्र में माओवादियों के आंकड़े इस्तेमाल किए हैं। राज्य सरकार ने जो आंकड़े दिए हैं और चिदम्बरम् ने जो आंकड़े दिए हैं उनमें अंतर है। कायदे से राज्य के आंकड़े प्रामाणिक हैं क्योंकि कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्य की है। कायदे से होना यह चाहिए कि केन्द्र सरकार माओवाद की समस्या को संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ के नजरिए से न देखे। अभी आधिकारिक तौर पर माओवाद की समस्या तीन जिलों में हैं लेकिन राज्य ने इस समस्या से प्रभावित 3 और जिलों को इसमें शामिल करने का कुछ रोज पहले अनुरोध है किया था लेकिन केन्द्र ने उस पर अभी तक सकारात्मक कार्रवाई नहीं की। उलटे माओवादियों के प्रति नरम रूख को व्यक्त करते हुए माओवादियों की मांगों को ही अपने पत्र में लिख डाला। इससे कांग्रेस का माओवादियों के प्रति नरम रूख सामने आया है और यह देश के लिए घातक है।             


विनायकसेन की मुक्ति के लिए फेसबुक वाले एकजुट



जगदीश्वर चतुर्वेदी-  विनायक सेन को आजन्म कैद की सजा सुनाकर जज महोदय ने क्या आधुनिक न्याय विवेक का परिचय दिया है ? मानवाधिकार की न्याय ने एक नयी परिभाषा गढ़ी है और भविष्य में आने वाले खतरों की चेतावनी भी दी है । आपकी क्या राय है
10 hours ago ·  · 
    • Abinash 'Kafir' Mishra मानवाधिकार की ताक पर कानून-व्यस्था को लचीला बनाना क्या भविष्य के खतरोँ को रोकने का सही तरीका है? दंड का आकलन अपराध पर होना चाहिये न कि मानवाधिकार पर, अन्यथा सुव्यस्थित समाज का निर्माण करना कठिन हो जायेगा।
      10 hours ago via Facebook Mobile · 
    • Jagadishwar Chaturvedi जी नहीं,न्याय को मानवाधिकारों के नजरिए से ही देखा जाना चाहिए।
      न्याय का दायरा मानवाधिकारों के तहत है।
      10 hours ago ·  ·  1 person
    • Jagadishwar Chaturvedi अभी जो अव्यवस्था है समाज से लेकर न्याय तक,उसकी धुरी है मानवाधिकारों की चेतना का अभाव।
      10 hours ago · 
    • Abinash 'Kafir' Mishra शायद यही वजह है कि आज अपराध अपना साम्राज्य निडरता से फैला रहा है।
      10 hours ago via Facebook Mobile · 
    • Abinash 'Kafir' Mishra मानवाधिकार के आड में अपराधिक जगत फल फूल रहा है। इस पर नकेल कसने का एक ही जरिया है, कठोर दंड विधान।
      10 hours ago via Facebook Mobile · 
    • Jagadishwar Chaturvedi ऐसा नहीं है। गरीबों के लिए भोजन,काम,पानी आदि की मांग करना अपराध नहीं है। लेकिन यदि कोई इन्हें लेकर संघर्ष करता है तो न्यायाधीश सामने आ जाते है। 144 लेकर।यह नहीं होना चाहिए।
      10 hours ago ·  ·  1 person
    • Deepti Singh दंड का नजरिया सुधारात्मक प्रक्रिया से जुड़ा होना चाहिए दंड मे प्रतिकार कि भावना औए सच को कुचलने की ज़बर्दुस्त कोशिश उसे न्याय और विकास से तो दूर ले ही जाती है लोगो कि आस्था और विश्वास को भी डगमगा देती है
      10 hours ago · 
    • Abinash 'Kafir' Mishra ‎'कागजी बकवास' करना आसान होता है। इतिहास गवाह है कि कोई प्रणाली बिना सहयोग के सफल नहीं हो सकती। भारत जैसे देश में 'स्वंय हिताय, स्वंय बचाव' के अलावा मानवाधिकार और कुछ नहीं है। इसका सफल प्रयोग सामंत और नेता बखुबी कर रहे हैं।
      10 hours ago via Facebook Mobile · 
    • Jagadishwar Chaturvedi समाज की रक्षा के सामूहिकबोध को केन्द्र में लाना होगा। निजता के परे जाकर ही यह काम संभव है।मानवाधिकार निजी रक्षा की चीज नहीं है यह सामाजिक रक्षा की चीज है।
      10 hours ago ·  ·  1 person
    • Abinash 'Kafir' Mishra इसे आमलोगोँ से दूर रखना अधिक सही होगा नहीं तो इसका दोहन वहाँ भी होगा।
      10 hours ago via Facebook Mobile · 
    • Jagadishwar Chaturvedi बंधुवर, मानवाधिकार आम लोगों की चीज है। अमीरों की नहीं,उनके पास तो हक हैं।
      10 hours ago · 
    • Abinash 'Kafir' Mishra जी, लेकिन राम-राज्य संभव नहीं है
      10 hours ago via Facebook Mobile · 
    • मैं दहशत गर्द था मरने पे बेटा बोल सकता है
      हुकूमत के इशारे पे तो मुर्दा बोल सकता है
      बहुत से कुर्सियां इस मुल्क मै लाशो पे रखी है
      ये वो सच है जिसे झूठे से झूठा बोल सकता है
      सियासत कि कसौटी पे परखिये मत वफादारी
      किसी दिन इन्त्कामन कोई गूंगा बोल सकता है

      10 hours ago ·  ·  1 person
    • Jagadishwar Chaturvedi राम राज्य नहीं विवेकपूर्ण राज्य की बात हो रही है।रामराज्य किसी को नहीं चाहिए।
      10 hours ago · 
    • K Lal Hindustani NO COMMENT ON JUDICIARY,HE CAN APPEAL TO A HIGHER COURT
      10 hours ago · 
    • Abinash 'Kafir' Mishra अगर मानवाधिकार को कानुन से उपर रख देंगे तो उससे पैदा होने वाले संकट पर नकेल कोन कसेगा?
      9 hours ago via Facebook Mobile · 
    • Jagadishwar Chaturvedi बंधुवर,न्याय की समीक्षा तो होनी ही चाहिए। वह ऊपर का न्याय हो या निचली अदालत का।
      9 hours ago · 
    • Deepti Singh isse neechli adalto ki jammedaariyan kam nahi hoti....justice delayed is justice denied
      9 hours ago · 
    • Abinash 'Kafir' Mishra तो क्या अपराधी को वरियता प्रदान करना सही है?
      9 hours ago via Facebook Mobile · 
    • Jagadishwar Chaturvedi एक और बात है कि न्याय मिले,समय पर मिले, देर से भी मिले कम से कम न्याय तो मिले।देर से भी अधिकांश मामलों में न्याय नहीं मिलता।
      9 hours ago · 
    • Jagadishwar Chaturvedi बंधु, मानवाधिकार की मांग अपराध नहीं है। सेन साहब के मामले की यही तो मुश्किल है।
      9 hours ago · 
    • K Lal Hindustani What we can do except to wait for final justice having full faith in it and democracy
      9 hours ago · 
    • Abinash 'Kafir' Mishra क्या दंड के बिना एक विबेकपूर्ण राज्य कायम हो सकता है?
      9 hours ago via Facebook Mobile · 
    • Jagadishwar Chaturvedi आस्था रहे ,साथ में लोकतंत्र और मानवाधिकारों के लिए सामाजिक दबाब भी पैदा करें।जिससे जजों के दिमाग की भी धुलाई हो। हम क्यों मान रहे हैं कि जज दूध के धुले हैं। उनमें भी पिछड़े मूल्यों के जज हैं।
      9 hours ago · 
    • Shyam Ji Pathak bahut galat faisla kiya hai, hum sub ko milker iske khilaf apni awaz buland karni chaiye
      9 hours ago · 
    • सुना है हाकिम सारे दीवाने अब ज़िंदां के हवाले होगे

      सारे जिनकी आँख ख़ुली है
      सारे जिनके लब ख़ुलते हैं
      सारे जिनको सच से प्यार
      सारे जिनको मुल्क़ से प्यार
      और वे सारे जिनके हाथों में सपनों के हथियार
      सब ज़िंदां के हवाले होंगे!

      ज़ुर्म को अब जो ज़ुर्म कहेंगे
      देख के सब जो चुप न रहेगें
      जो इस अंधी दौड़ से बाहर
      बिन पैसों के काम करेंगे
      और दिखायेंगे जो पूंजी के चेहरे के पीछे का चेहरा
      सब ज़िंदां के हवाले होंगे

      जिनके सीनों में आग बची है
      जिन होठों में फरियाद बची है
      इन काले घने अंधेरों में भी
      इक उजियारे की आस बची है
      और सभी जिनके ख़्वाबों में इंक़लाब की बात बची है
      सब ज़िंदां के हवाले होंगे

      आओ हाकिम आगे आओ
      पुलिस, फौज, हथियार लिये
      पूंजी की ताक़त ख़ूंखार
      और धर्म की धार लिये
      हम दीवाने तैयार यहां है हर ज़ुर्म तुम्हारा सहने को
      इस ज़िंदां में कितनी जगह है!

      कितने जिंदां हम दीवानों के
      ख़ौफ़ से डरकर बिखर गये
      कितने मुसोलिनी, कितने हिटलर
      देखो तो सारे किधर गये
      और तुम्हें भी जाना वहीं हैं वक़्त भले ही लग जाये
      फिर तुम ही ज़िंदां में होगे

      9 hours ago ·  ·  2 people
    • Abinash 'Kafir' Mishra सही न्याय से ज्यादा गलत न्याय दिलाने में इसकी ज्यादा भूमिका है। यह मात्र सामंतों की हितैसी है।
      9 hours ago via Facebook Mobile · 
    • Jagadishwar Chaturvedi असल समस्या यह है कि हमारा मध्यवर्ग विवेकपूर्ण और मानवाधिकारपूर्ण चेतना से लैस नहीं है,वरना कोई जज मानवाधिकारों के खिलाफ लिखने का साहस ही नहीं करता।
      9 hours ago ·  ·  1 person
    • विनायक सेन साहब को सजा देना बिलकुल गलत है.........आज विनायक सेन साहब जैसे देश और समाज के खम्भे की जरूरत है जिससे सभी खम्भों के सड़ जाने के बाद भी ये गणतंत्र जिन्दा रहे ..इन साले भ्रष्ट कुकर्मी मंत्री और उद्योगपतियों को विनायक सेन साहब जैसे लोग ही ठीक कर सकते हैं.........इस देश में भ्रष्ट मंत्रियों और कुकर्मी उद्योगपतियों को सरे आम गोली मारने वाले के लिए इनाम और सम्मान की व्यवस्था किये जाने की जरूरत है...क्योकि इन कुकर्मियों के वजह से न सिर्फ मानवाधिकार बल्कि समूची मानव जाती खतरे में है.....सामाजिक कार्यकर्ताओं को सजा तय करते वक्त जाँच अधिकारी तथा सजा सुनाने वाले जजों की संपत्ति और चरित्र की भी सूक्ष्म जाँच की भी आवश्यकता है....आज न्याय पालिका अच्छे,सच्चे,देशभक्त और इमानदार लोगों के फायदे के लिए कम बल्कि अपराधियों और भ्रष्ट कुकर्मियों के फायदे के लिए ज्यादा काम कर रही है....

      9 hours ago · 
    • Abinash 'Kafir' Mishra भ्रष्टता को रोकने के लिये भ्रष्टता का सहारा क्योँ? खिलवाड संविधान के साथ भी हो रहा है उसका क्या
      9 hours ago via Facebook Mobile · 
    • Jagadishwar Chaturvedi यह ठीक कहा आपने
      9 hours ago · 
    • Abinash 'Kafir' Mishra सही गलत का फैसला किस आधार पर?
      9 hours ago via Facebook Mobile · 
    • Jagadishwar Chaturvedi न्याय बुद्धिऔर समानता के आधार पर।
      9 hours ago · 
    • Hitendra Patel यह दुर्भाग्यपूर्ण है. अगर कानूनी हिसाब से सजा देना मुनासिब भी होता हो तो भी इस प्रकार का दण्ड दिया जाना अंग्रेजी राज की तरह का "न्याय" है.
      9 hours ago ·  ·  1 person
    • Abinash 'Kafir' Mishra हम अपने अधिकारों द्वारा किसी का चुनाव करते हैं लेकिन क्या मैंने अपने अधिकारों का सही प्रयोग किया है? अगर नहीं तो उसके दुष्परिणामों से कौंन बचायेगा? निश्चय ही कानुन।
      9 hours ago via Facebook Mobile · 
    • Abinash 'Kafir' Mishra तो फिर क्यों जेलों में व्यस्था समानता के आधार पर नहीं होता? उसका जिम्मेदार अधिकार ही है जो पैसे और ताकत पर बिक जाता है।
      9 hours ago via Facebook Mobile · 
    • Jagadishwar Chaturvedi सही कहा।
      9 hours ago · 
    • Madan Agrawal डॉ.विनायक सेन जेसे व्यक्ति को राजद्रोह के आरोप में उम्र केद देकर भ्रष्ट राजनेताओ एवम न्यायपालिका ने वही किया /जो अब तक करते आ रहे एवम हमेशा सफल भी हे /तभी तो असली देश गद्दार मंचो पर विराजमान मिलते /आम आदमी की हिम्मत नही होती आवाज उठाने की
      9 hours ago · 
    • Why DR ABC or D should made FREE from the jail….....Our we a free nation?? Yes I can say with proud that we live in a free and democratic nation…no doubt foa any one.. A session court in trial held Dr Vinayak guilty for sedition and announced LIFE IMPRISONMENT…..what wrong... Maoist, naxalism sympathiser and so called progressive news channels starts campaign to criticise court judgment, I feel shame for all of them on name of democracy and independence.....Best way to them is that in places of making hue and cry over pronounced court judgment, in a salient manner they appeal in country's higher court for further relief…But reality is that for smooth function for corporate or government office, an state headed by the Congress, BJP or a left.... or own home requires foa a unique Dandaman…. shouting slogan to make free XYZ…an waste exercise…

      8 hours ago ·  ·  1 person
    • कल कोलकाता में एक प्रोटेस्ट सभा हूई। जिसे अपर्णा सेन ,मेधा पाटकर सहित कई लोगों ने सम्बोधित किया। फिर एक मौन जूलुस निकला जो मेट्रो चैनल तक गया। कुछ तथ्य: 1. ये आजीवन कैद 14या 20 साल की नहीं है,सचमुच आजीवन है।2. जिस जज ने ये फैसला सुनाया वे रेगुलर जज नहीं हैं,किसी के छुट्टी पर चले जाने की वजह से यहां थे।3. जिस चिरकुट पर दस्तखत करके आप किसी विचारधीन कैदी से मिलने की इजाजत पाते हैं-उस पर दो प्रावधान होते है,या तो कहिये कि आप उसके मित्र हैं या रिश्तेदार्। नारायण सान्याल से मिलने वाले विनायक 'मित्र' लिखते थे। इस आधार पर उन्हें अदालत ने जुर्म में शरीक पाया।4.उन्हें ठीक कहां से किन परिसिथतियों में गिरफतार किया गया,यह पुलिस नहीं बता पा रही। केवल संदेह पर यह हुआ।5.उनकी जेब में एक चिरकुट मिला,बगैर दस्तखत के ,इसे पुलिस साक्ष्य रुप में पेश कर रही है,जो कि गैरकानूनी है। 6.एक राहगीर ,अनिल सिंह से विटनेस करवाया गया,उसकी 'ओवरहियरिंग' के ब्यान के आधार पर यह सब हुआ। इस तरह की तमाम असंगतियों पर 'न्याय' हुआ।
      मुझे लगता है यह फैसला तो उच्च अदालत में टिक नहीं पायेगा लेकिन सरकार एक मेसेज देना चाह रही है,चेतावनी। हमारे लिये मौका है कि हम अगले हमले के पहले तैय्यारी में जुट जायें।

      8 hours ago · 
    • Jagadishwar Chaturvedi सही लिखा है आपने।
      8 hours ago · 

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