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गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

राससुन्दरी दासी की यह आत्मकथा 'आमार जीबोन'


राससुन्दरी  दासी  की यह आत्मकथा 'आमार जीबोन' नाम से सन्1876 में पहली बार छपकर आई। जब वे साठ बरस की थीं तो इसका पहला भाग लिखा था। 88 वर्ष की उम्र में राससुन्दरी देवी ने इसका दूसरा भाग लिखा। जिस समय राससुन्दरी देवी यह कथा लिख रही थी, वह समय 88 वर्ष की बूढ़ी विधवा और नाती-पोतों वाली स्त्री के लिए भगवत् भजन का बतलाया गया है। इससे भी बड़ी चीज कि परंपरित समाजों में स्त्री जैसा जीवन व्यतीत करती है, उसमें केवल दूसरों द्वारा चुनी हुई परिस्थितियों में जीवन का चुनाव होता है। उस पर टिप्पणी करना या उसका मूल्यांकन करना स्त्री के लिए लगभग प्रतिबंधित होता है। स्त्री अभिव्यक्ति के लिए ऐसे दमनात्मक माहौल में राससुन्दरी देवी का अपनी आत्मकथा लिखना कम महत्त्वपूर्ण बात नहीं है। यह आत्मकथा कई दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है। सबसे बड़ा आकर्षण तो यही है कि यह एक स्त्री द्वारा लिखी गई आत्मकथा है। स्त्री का लेखन पुरुषों के लिए न सिर्फ़ जिज्ञासा और कौतूहल का विषय होता है वरन् भय और चुनौती का भी। इसी भाव के साथ वे स्त्री के आत्मकथात्मक लेखन की तरफ प्रवृत्त होते हैं। प्रशंसा और स्वीकार के साथ नहीं; क्योंकि स्त्री का अपने बारे में बोलना केवल अपने बारे में नहीं होता बल्कि वह पूरे समाजिक परिवेश पर भी टिप्पणी होता है। समाज को बदलने की इच्छा स्त्री-लेखन का अण्डरटोन होती है। इस कारण स्त्री की आत्मकथा वह चाहे जितना ही परंपरित कलेवर में परंपरित भाव को अभिव्यक्त करनेवाल क्यों न हो, वह परिस्थितियों का स्वीकार नहीं हो सकता; वह परिस्थितियों की आलोचना ही होगा।

  राससुन्दरी देवी की आत्मकथा में कई ऐसी चीजें हैं जो अत्यंत साधारण लगते हुए भी विशिष्ट हैं। पहले पाठ में यह आत्मकथा एक ऐसी संतुष्ट स्त्री की कहानी लगती है जो अपने घर-परिवार, घर में मिले लाड़-दुलार, सामाजिक हैसियत, बेटे-बेटियों और पोते-पोतियों, नाती-नातिनों के साथ, भरे-पूरे परिवार के बीच एक गृहस्थ स्त्री की साध भरी दुनिया में संतुष्ट है। विश्लेषण-वर्णन का अद्भुत तरीका अपनाया है राससुंदरी देवी ने! स्त्री भाषा का एकदम आदर्श नमूना ठण्डी, निरुद्वेग और किसी भी तरह की चापलूसी से रहित! न शिकायत है न आरोप -प्रत्यारोप! फिर भी स्त्री के पक्ष से सारी बातें कह जाती हैं।

  सबसे पहले मैं स्त्री आत्मकथा लेखन की दिक्कतों के बारे में कुछ कहना चाहती हूँ। यह पहली बार हुआ कि 19वीं सदी के आरंभ में बड़े पैमाने पर स्त्री लेखन और स्त्री आत्मकथात्मक लेखन दोनों सामने आते हैं। चूंकि स्त्री लेखन का संसार उसके अनुभव के संसार से ही शुरु होता है, इसलिए स्त्री के आरंभिक लेखन में स्त्री के अनुभव का संसार अति परिचय की हद तक शामिल है। घर -परिवार, पति-बच्चे, घरुआ वातावरण और इसके भीतर के शक्ति संबंधों की दुनिया सब इतनी ज्यादा पहचानी हुई लगती है कि वह महत्तवहीन हो जाती है। ध्यान रखना चाहिए कि महत्वहीन या महत्वपूर्ण साबित करने का काम स्त्री लेखिका नहीं बल्कि पुंसवादी लेखकीय मानदण्डों के आधार पर पुरुष आलोचक लेखक करता है। ऐसे में स्त्री के अस्तित्व को लेकर उसकी के प्रति जो उपेक्षाभाव घर और समाज में होता है, उसी की झलक विचारों और लेखन की दुनिया में भी दिखाई देती है। हिन्दी आत्मकथात्मक साहित्य का आलम यह है कि साहित्येतिहास की पुस्तकों में पहले भारतेन्दु की रचना 'कुछ आपबीती कुछ जगबीती' को हिन्दी की पहली आत्मकथा लेखन का प्रयास कहा गया और फिर जब तक बनारसीदास के 'अर्ध्दकथानक' को नहीं खोज लिया गया, आत्मकथा लेखन की शुरुआत नहीं मानी गई। जबकि स्त्रियों द्वारा लिखे गए आत्मकथात्मक गद्य के नमूने पहले भी मिलते हैं, लेकिन उन पर आत्मकथा की कोटि के तहत विचार नहीं किया गया।

  मैं विधा के रूप में आत्मकथा के जेनर पर पहले बात करना चाहती हँ। आत्मकथा के विधा की जिस रूप में संरचना तय की गई है, वह अपने आप में बहिष्कारमूलक और समस्यामूलक है। यह महाकाव्य की तरह है जिसके लिए एक महान् नरैटिव और आदि-अंत का बखान जरुरी है। साथ ही विषय से दूरत्व का बोध भी जरुरी है। जितनी दूर का विषय होगा, उतनी शानदार प्रस्तुति होगी,पर मुश्किल यह है कि स्त्री लिखते समय अपने से दूरी नहीं बनाए रख सकती। स्त्री वर्तमान से गहरे संपृक्त होती है। अतीत उसका नहीं है। अतीत पर उसका नियंत्रण भी नहीं है। इस कारण लिखते समय वह वर्तमान की समस्याओं और जटिलताओं का विश्लेषण प्रस्तुत करती है। बिना ऐसा किए वह रह नहीं सकती। कारण कि जिन सामाजिक-राजनीतिक असंगतियों को वह झेलती है लिखते समय उसका विश्लेषण न करे, यह संभव नहीं है। स्त्री के सामने आत्मकथा लिखते समय अजीब द्वन्द्व की स्थिति होती है। जिसके बारे में लिख रही होती है, वह वो स्वयं होती है; जिस औजार के जरिए लिख रही होती है यानि भाषा उसमें उसके अपने अनुभव के शब्द नहीं होते। संसार को नामित करने की प्रक्रिया से वह बाहर होती है। इन सबसे मुश्किल स्थिति यह है कि वह जब तक आत्मकथा लेखन में 'सब्जेक्ट' की भूमिका में नहीं होगी, तब तक वह नहीं लिख सकती। स्त्री को'सब्जेक्ट' की भूमिका में कभी देखा ही नहीं गया है; वह रचना में, भाषा में, समाज में ऑब्जेक्ट ही रही है।

  आत्मकथा 'सेल्फ' के उद्धाटन का क्षेत्र है। स्त्री के स्व को समाज और भाषा में इतनी पाबंदियों के बीच रखा गया है कि उसका ठीक ठीक बाहर आना संभव नहीं है। विखण्डन, बिखराव, टूट-फूट, असंगतियाँ इसकी विशेषता है। तो आत्मकथा का जो महाख्यानमूलक रूप है, स्त्री की आत्मकथा उसके आस-पास भी नहीं ठहरती। पुरुष आत्मकथाओं में परिवेश का चित्रण उसकी महानता और गरिमा के साथ एक महान् कहानी को निर्मित करने के लिए होता है। साधारण परिवेश का गरिमापूर्ण चित्रण पुरुष 'सब्जेक्ट' के साथ द्वन्द्वात्मक और संघर्षपूर्ण रूप में दिखाया जाता है और आत्मकथा के अंत तक जाते-जाते साबित कर दिया जाता है कि पुरुष का अपने परिवेश पर नियंत्रण है। वह परिस्थितियों का दास नहीं, उनका मालिक हैं। वहाँ गरीबी जैसी डरानेवाली चीज भी पुरुष को उसकी महानता और लक्ष्य से भटका नहीं सकती। गरीबी में स्त्रियाँ बिक सकती हैं, उनकी देह और आत्मा सीधे इसका शिकार बनती है, पर पुरुष के लिए वह चुनौतियों का सृजन करती है जिसके पार उसकी महानता का संसार उसकी प्रतीक्षा में है। इसलिए गरीबी वहाँ'गर्बीली' होती है। 'पुरुष क्या श्रृंखला को तोड़ करके,चले आगे नहीं जो जोर करके' ! (दिनकर,रश्मिरथी)

 (लेखिका- सुधा सिंह) 

बुधवार, 16 दिसंबर 2009

इस्लाम,मध्यपूर्व ,बहुराष्ट्रीय कारपोरेट मीडिया और एडवर्ड सईद -3-


एडवर्ड सईद का सबसे सुंदर और महत्वपूर्ण आख्यान वह है जिसमें उन्होंने '' जन के बिना जमीन और जमीन के बिना जन'' का आख्यान तैयार किया। इस अवधारणा के आधार पर सईद ने इजरायल के विस्तारवादी विचारकों के उन तमाम तर्कों को खंडित किया है जिनके द्वारा बार-बार फिलीस्तीन की मौजूदगी को ही अस्वीकार किया गया, इजरायली विस्तारवादियों का तर्क है कि 1948 में फिलीस्तीनी लोग स्वयं ही अपने नेताओं के कहने पर अपनी जमीन छोड़कर चले गए थे। इसके अलावा इजरायली विस्तारवादी वे सारे तर्क देते हैं जो एक ओरिएण्टलिस्ट देता है। फिलीस्तीन के अस्तित्व और एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में उनके राष्ट्र के अस्तित्व को आज सारी दुनिया मानती है, संयुक्तराष्ट्र संघ भी मानता है सिर्फ अमरीका और इजरायल ही हैं जो फिलीस्तीन के स्वतंत्र-संप्रभु राष्ट्र के अस्तित्व को अस्वीकार करते  हैं। फिलीस्तीनियों की जमीन पर इजरायल लंबे समय से अवैध कब्जा जमाए बैठा है। फिलीस्तीनियों की जमीन और जनता पर इजरायली कब्जे को सईद ने औपनिवेशिक गुलामी और वर्चस्व कहा है। 
सईद का समूचा विमर्श इजरायल को यूरोपीय उपनिवेशवाद के संदर्भ में पेश करता है। इसके जरिए सईद ने यह दरशाने की कोशिश की है कि द्वितीय विश्वयुध्द की जनसंहारक विभीषिका के गर्भ से जिस इजरायल का गठन किया गया वह इजरायल स्वयं ही अवैधानिक और हिंसक आक्रामकता का फिलीस्तीनियों और अरब जनता के खिलाफ इस्तेमाल कर रहा है। इजरायली आक्रामकता को विभिन्ना तर्कों के जरिए वैध और स्वीकृत बनाने का प्रयास होता रहा है। इसके कारण फिलीस्तीन की बृहत्तार जनता अदृश्य हो गयी है। यह एक तरह से 'अन्य' के लोप का प्रयास होने के साथ विकृत प्रस्तुति भी है। यह ओरिएण्टलिस्टों के द्वारा पूर्व का 'अन्य' के रूप में किया गया विकृतिकरण है।
सईद ने ''क्वेश्चन ऑफ पैलेस्टाइन'' में लिखा है यूरोपीय उपनिवेशवाद की सैध्दान्तिकी यहूदीवाद के लिए तार्किक विचारधारात्मक आधार प्रदान करती है। सईद ने इजरायल के एक राष्ट्र के तौर पर निर्माण को ब्रिटिश साम्राज्यवाद के संदर्भ में विश्लेषित किया है। सईद ने लिखा है फिलीस्तीनियों की इच्छा आकांक्षाओं की अवहेलना करके इजरायल राज्य को थोपा गया था। इस क्षेत्र के मूल वाशिंदे फिलीस्तीनियों को उनकी जमीन से बेदखल करके इजरायल का निर्माण किया गया। ब्रिटिश जमाने के बर्बर नस्लवादी कानूनों को इजरायल ने लागू किया हुआ है। इस संदर्भ में सबसे आदर्श और सटीक उदाहरण है 'आपात्कालीन रक्षा अधिनियम', इस कानून का 1922 से 1948 के बीच ब्रिटिश शासक इस्तेमाल करते रहे हैं। उस जमाने में यहूदियों के प्रतिवाद के खिलाफ इस कानून का इस्तेमाल किया जाता था, 1948 के बाद इस कानून का इजरायल के द्वारा अरब और फिलीस्तीनियों के खिलाफ जमकर दुरूपयोग किया गया। इस कानून के तहत अरब नागरिकों को जमीन खरीदने ,बेचने,आने-जाने, अपने घर और बस्तियां बसाने आदि के बुनियादी अधिकारों से वंचित किया गया।
    सईद ने यूरोपीय उपनिवेशवाद और यहूदीवाद के बीच में अनेक अंतर भी दरशाए हैं। पहला, यहूदीवादी जिस समाज को बनाना चाहते हैं खासकर फिलीस्तीनियों को समेटते हुए ,जो समाज बनाना चाहते हैं उसमें फिलीस्तनियों को और कुछ नहीं सिर्फ''नेटिव'' यानी पैदाइशी गुलाम के रूप में रखा गया है। दूसरा, इजरायल को पश्चिम के ज्यादा करीब रखा है। साथ ही बताया है कि किस तरह यहूदी इतिहास यूरोप में यंत्रणा का इतिहास रहा है। इस यंत्रण्ाा के इतिहास की भरपायी के तौर पर फिलीस्तीनियों को यंत्रणा दी जा रही है। तीसरा ,इजरायल वस्तुत: ''सेटलर कोलोनियलिज्म'' का प्रतीक है। इसका जन्म गलत आधार पर हुआ है। सईद ने लिखा है इजरायल और दक्षिण अफ्रीका में भिन्ना किस्म की ''सेटलर कोलोनियां'' हैं। किंतु इनमें प्रभावित और उत्पीड़ित लोग घायल और भयाक्रांत होकर रह रहे हैं। इस अर्थ में वे एक जैसी हैं।
   सईद ने ''कवरिंग इस्लाम'' (1981) में इजरायली उपनिवेशवाद की प्रकृति की व्यापक ब्यौरों के साथ समीक्षा पेश की है। साथ ही '' आफ्टर दि लास्ट स्काई''(1986) में बताया है कि इजरायली उपनिवेशवाद एक सर्वस्वीकृत तथ्य है। इसी बात को विस्तार के साथ '' ब्लेमिंग दि विक्टिमस'',''दि पेन एंड दि स्वोर्ड एण्ड दि पॉलिटिक्स ऑफ डिसपोजीसन'' में विस्तार से विश्लेषित किया है। '' दि क्वेशचन ऑफ पैलेस्टाइन'' में सईद ने इजरायल,दक्षिण अफ्रीका और अल्जीरिया के बीच तुलना की है और बताया है कि कैसे अन्यायपूर्ण गुलामी और शोषण में इन देशों में अल्यसंख्यक जी रहे हैं।
    सईद ने आतंकवाद के रेहटोरिक को भी अपने लेखन में चुनौती दी है। इस संदर्भ में मीडिया की भूमिका की विस्तार से आलोचना लिखी है। आतंकवाद के रेहटोरिक की आलोचना करते हुए सईद सिर्फ अमरीका की ही आलोचना के साथ मीडिया की भूमिका की भी आलोचना की है। मध्यपूर्व के संदर्भ में अमरीकी नीतियों को प्रभावित करने में अमरीकी मीडिया की बहुत बड़ी भूमिका रही है। सईद ने अपनी आलोचना के जरिए फिलीस्तीनियों की मीडिया द्वारा निर्मित अमानवीय इमेज का खंडन किया है। साथ ही इसमें निहित अतिसरलीकरण की आलोचना की है। सईद ने लिखा है  फिलीस्तीन आतंकवाद को प्रस्तुत करते समय मीडिया अतिवाद का शिकार हो गया, उसने फिलीस्तीन आतंकवाद पर इसलिए जोर दिया जिससे इजरायल की एक राष्ट्र के तौर पर फिलीस्तीनियों के खिलाफ की गई बर्बर गतिविधियों को छिपाया जा सके। इजरायल ने एक राष्ट्र के तौर पर फिलीस्तीनियों,अरब मुस्लिमों और लेबनानी नागरिकों पर ज्यादा हमले किए हैं।
सईद ने अपनी अनेक किताबों में फिलीस्तीन और आतंकवाद के बीच में साम्य बिठाने को अस्वीकार किया है और फिलीस्तीनियों को आतंकवाद से भिन्ना परिप्रेक्ष्य में पेश किया है।  आतंकवाद के साथ फिलीस्तीन के अंतरों को दरशाते हुए सईद ने लिखा है कि अनेक किस्म के आधार पर इन दोनों में अंतर किया जा सकता है। पहला , अधिकांश फिलीस्तीनियों के पास सामान्य नागरिक और राजनीतिक अधिकार नहीं हैं। दूसरा, उन्हें अपनी जमीन दुबारा हासिल करने के अधिकार से वंचित रखा गया है क्योंकि उनके ऊपर आतंकवादी का लेबिल लगा है। सच यह है ये दोनों ही बातें उनके अपदस्थीकरण के कारण जन्मी हैं। उन्हें अपने खोए देश और सम्मान को पाने का संघर्ष करने का अधिकार नहीं है। सईद ने ''ब्लेमिंग दि विक्टिम' में विस्तार के साथ रोशनी डाली है। इसी किताब के '' एसेंशियल टेरटिस्ट'' नामक अध्याय में लिखा सईद ने लिखा है अमरीका में आतंकवाद सम-सामयिक फिनोमिना है।
     इजरायली विचारक आए दिन आतंकवाद, कम्युनिज्म और यहूदीवाद विरोधी के बीच में घालमेल करते हैं , उसे एकमेक करते हैं। ऐसा करते समय फिलीस्तीन को महज नारे में ,शक्लविहीन पहचान में ,अपमानजनक पहचान में तब्दील कर देते हैं। सईद ने '' दि पॉलिटिक्स ऑफ डिसपोजीशन''  में '' वन आइडियोलॉजी ऑफ डिफरेंस'' नामक निबंध में सईद विस्तार के साथ फिलीस्तीनियों की आतंकवाद के साथ इमेज को जोड़ने वाले तर्कों का खंडन किया है। सईद ने लिखा है नस्लभेद के दर्शन को आधार बनाकर अरब जनता के प्रति इजरायल के अन्यायपूर्ण व्यवहार को वैधता प्रदान की जा रही है। जबकि ''परमीशन टु नरेट'' (1884) निबंध में उन्होंने अमरीकी मीडिया में आतंकवाद की अवधारणा के तर्कों की वैधतापूर्ण प्रस्तुतियों की मीमांसा पेश की है। उन्होंने लिखा आतंकवाद का विमर्श हमेशा दो प्रतिस्पर्धी ग्रुपों में ध्रुवीकरण कर देता है जिसमें 'हम' और 'वे' के आधार पर वर्गीकृत करके पेश किया जाता है। ''आइडेंटिटी ,नेगेशन एण्ड वायलेंस''(1988) में लिखा  इस्लाम,अरब और खासकर फिलीस्तीनियों को आतंकवाद के साथ जोड़कर पेश जाता है। कायदे से आतंकवाद के संदर्भ को खोला जाना चाहिए। इस्लामिक जगत के खिलाफ आतंकवाद का संक्रामक बीमारी की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। 
(लेखक- जगदीश्वर चतुर्वेदी, सुधा सिंह)
   

मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

इस्लाम,मध्यपूर्व ,बहुराष्ट्रीय कारपोरेट मीडिया और एडवर्ड सईद -2-

अमरीकी नीतिनिर्धारकों को तीसरी दुनिया के देश 'अविकसित' नजर आते हैं।इन देशों में परंपरागत जीवनशैली की पकड़ है जिसके कारण इन देशों में साम्यवाद का खतरा अथवा आंतरिक ठहराव है। यही वह फ्रेमवर्क है जिसमें फिलीस्तीनियों को फिट कर दिया गया है। अमरीका का मानना है तीसरी दुनिया के देशों के लिए ''आधुनिकीकरण'' आज की सबसे बड़ी जरूरत है।  जेम्स पैक के अनुसार ''आज दुनिया में जितनी भी क्रांतिकारी उथल-पुथल है,जिसके प्रति परंपरागत राजनीतिक अभिजन प्रतिक्रिया व्यक्त करता रहता है, उसका विचारधारात्मक प्रत्युत्तर है आधुनिकतावादी सैध्दान्तिकी।''
    
     सईद ने लिखा है कि अफ्रीका और एशियाई देशों में साम्यवाद की बढ़त रोकने के लिए बड़े पैमाने पर पैसा खर्च किया गया। अमरीका के व्यापार विस्तार और इस सबसे बढ़कर इन देशों में अपने सहयोगी कैडर तैयार करने के प्रयास किए जा रहे हैं जिससे इन देशों को लघु अमरीका बनाया जा सके। इसके लिए आरंभिक समर्थन के तौर पर सैन्य मदद मुहैयया करायी जा रही है। जिससे समूचे एशिया और लैटिन अमेरिका में हस्तक्षेप किया जा सके।
   
अमरीका के द्वारा एशिया के बारे में किस तरह के नीतिगत विचार हैं और वे एशिया की किस तरह की आदतें देखना पसंद करते हैं, उन्हें समझे बगैर आप अमरीकाजनित आधुनिकीकरण को समझ ही नहीं सकते। इसी के आधार पर अमरीका अपना आधुनिकीकरण में राजनीतिक,भावनात्मक और रणनीतिक निवेश करता है।


  परंपरागत समाजों के आधुनिकीकरण पर बड़े पैमाने पर अमरीकी विचारों और राजनीतिज्ञों का लेखन मिलता है जिसमें 'आधुनिकीकरण' को 'जनप्रिय मन' (पापुलर माइण्ड) से जोड़ा गया है। इस जनप्रिय मन के अंदर अमरीका की मूर्खताएं भर दी गयी हैं,जैसे अमरीका की खर्च करने की आदत,अवांछित वस्तुओं और गहने,भ्रष्ट शासकवर्ग और छोटे और कमजोर देशों में अमरीकी हस्तक्षेप को भर दिया गया है। 


    आधुनिकतावाद के अनेक भ्रमों में से एक है इस्लामिक जगत के बारे में समझ। अमरीका का मानना है इस्लामिक देशों की सभ्यता अभी बेहद पिछड़ी है,इतनी पिछड़ी है कि वह समय से काफी पीछे चल रही है। इस्लामिक समाजों में किसी भी किस्म का विकास नहीं हुआ है और कुसंस्कार जड़ें जमाए हुए हैं। पश्चिमी विचारों को इन समाजों में प्रवेश से रोकने का काम पूरी परह मौलवी लोग कर रहे हैं। वे इन समाजों को मध्यकाल से आधुनिकाल में आने नहीं देना चाहते। भय की बात यह है कि ये लोग किसी किस्म की राजनीति स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। उनका इस्लाम से बंधे रहना एकतरह की बगावत है।
    
     कहा जाता है इस्लाम में अतिधार्मिकता है। वे यह भी बताते हैं  पश्चिमी दिमाग से इस्लामिक जगत कैसे भिन्नाता प्रदर्शित करता रहा है। खासकर शीतयुध्द के समय किस तरह पश्चिमी जगत से इस्लामिक दुनिया अपनी भिन्नाता प्रदर्शित करती रही है। यही वह परिप्रेक्ष्य है जिसके आधार पर अमरीकी जनता को शिक्षित किया जाता है और उन्हें मध्यपूर्व में सैन्य हस्तक्षेप के लिए तैयार किया जाता है। 


     अमरीकी प्रतिष्ठानी मीडिया का तर्क है इस्लाम के उभार का अर्थ है इजरायल के लिए खतरा। पश्चिमी वर्चस्व और आधुनिकीकरण के लिए खतरा। अमरीकी स्कॉलरों की नजर में आधुनिकीकरण का एक ही उदाहरण रहा है और वह है ईरान। बाकी इसलामिक जगत को अमरीकी आधुनिकतावादी नजरअंदाज करते रहे हैं। मसलन् अरब राष्ट्रवाद,जिसके तहत मिस्र के राष्ट्रपति नासिर, इण्डोनेशिया के सुकर्णो, फिलीस्तीनी राष्ट्रवाद,ईरान के विपक्षी ग्रुप,हजारों इस्लामिक स्कॉलर,बुध्दिजीवी,शिक्षक आदि को आधुनिकतावाद के सिध्दान्तकार नजरअंदाज करते रहे हैं। इन सबका विरोध किया गया अथवा उपेक्षा की गई और इसके लिए बेशुमार धन बहाया गया।
   
आधुनिकीकरण की हवा द्वितीय विश्वयुध्द के बाद के दो दशकों में देश-देशान्तर में बहती रही। आधुनिकीकरण के सफल आख्यान के रूप में ईरान के राजा शाह पहलवी को आदर्श रूप में प्रचारित किया । किंतु कालान्तर में ईरान का आधुनिकीकरण और आधुनिकतावाद अमरीका के गले नहीं उतरा और आज तो अमरीका ईरान को पूरी तरह ध्वस्त करने पर आमादा है। 


    ईरान में लोकतंत्र है,आधुनिक शिक्षा -दीक्षा का माहौल है। ईरान संप्रभु राष्ट्र है किंतु अमरीका नहीं चाहता कि ईरान संप्रभु राष्ट्र रहे। ईरान के ऊपर प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं। उस पर हमले की तैयारी हो रही है। इसके पहले जब इराक का शासक सद्दाम हुसैन अमरीका का पिट्ठू था, उससे ईरान पर हमला कराया गया,ईरान को वर्षों युध्द की आग में झोंक दिया गया। 


    तकरीबन आठ साल इराक-ईरान युध्द चला और उसमें इराक ने रासायनिक हथियारों तक का प्रयोग किया, इसके बावजूद ईरान ने जनतंत्र के रास्ते से अपने कदम वापस नहीं लिए,ईरान में आज सबसे ज्यादा आधुनिक नजरिए के नागरिक पाए जाते हैं,लोकतांत्रिक सरकार है,ईरान में कहीं पर भी आतंकवादी नहीं हैं। ये सारी चीजें अमरीका को हरगिज पसंद नहीं हैं। अब ईरान के खिलाफ अपनी सेनाओं को सन्नाध्द करने में लगा है और ईरान के अंदर भाड़े के सैनिक और आंदोलनकारी जुटाए जा रहे हैं जिससे लोकतांत्रिक ढ़ंग से चुनी गई सरकार को गिराया जा सके। 


      ईरान के बारे में एक बात सच है कि ईरान की जनता में अमरीकी साम्राज्यवाद के खिलाफ जबर्दस्त घृणा है। ईरान के शासक अमरीकी विदेशनीति की जमकर मुखालफत करते रहे हैं। मजेदार बात यह है कि ईरान में विगत पचास वर्षों में जो कुछ घटा है उसे अमरीकी आधुनिकतावादियों की सैध्दान्तिकियों के जरिए शायद ही कोई समझ पाए।


      ईरान में आधुनिक परिवर्तन की आंधी अमरीकी आधुनिकतावाद की सबसे बड़ी असफलता रही है। मसलन् जब ईरान में राजा शाह पहलवी का शासन स्थापित हो गया, शाह स्वभाव से धर्मनिरपेक्ष,सूट-बूट वाले शासक थे। ईरान कभी भी कम्युनिस्ट समर्थक नहीं रहा। ईरान की जनता को आधुनिकतावाद के प्रतीक कार,गहने,सैन्यास्त्र,स्थायी सरकार, सुरक्षा का तंत्र आदि कभी भी आकर्षित नहीं करते रहे हैं।


     सईद ने लिखा है आधुनिकतावाद और कुछ नहीं यहूदीवाद को पुनर्स्थापित करने की कोशिश है। ये सारी चीजें इस्लाम के प्रति नजरिए के नाम पर पेश की जाती रही हैं। अमरीका का सारा सूचना और संस्कृति तंत्र इन्हीं आधुनिकतावादी सपनों और नजरिए पर टिका  है। उसका 'हम' का नजरिया और नीतियां इसी पर आधारित है।
     वे बार-बार अपने बेशकीमती विचारों को इस्लाम,तेल, पश्चिमी सभ्यता का भविष्य और लोकतंत्र के लिए संघर्ष के नाम पर पेश करते रहे हैं। इस्लाम के खिलाफ घृणा के प्रचार में जिन दो तत्वों को प्रधान रूप से इस्तेमाल किया जाता है वे हैं, पहला, इस्लाम की तयशुदा इमेज,जिनमें केरीकेचर दिखाया जाता है। उन्मादी और बकबादी भीड़ को दिखाया जाता है। दूसरा ,इस्लाम के नाम पर दिए गए दण्डों को दिखाया जाता है। साथ ही यह भी बताया जाता है कि इन सबके ऊपर तेल की सत्ता काबिज है।  तेल कंपनियों का राज है।
         

     फिलीस्तीन के सवाल पर विचार करते हुए सईद ने हमेशा इस बात पर जोर दिया है कि फिलीस्तीन को एक राष्ट्र के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्हें एक समूह अथवा अरब शरणार्थी के रूप में नहीं देखा जाए। फिलीस्तीन की एक राष्ट्र के रूप में स्वीकृति का अर्थ है फिलीस्तीन को उनकी राजनीतिक अस्मिता के साथ जोड़ना। अपने देश की ऐतिहासिक जमीन पर वापस लौटना प्रत्येक फिलीस्तीन का अधिकार है। यह सच है अधिकांश फिलीस्तीन अपने देश के बाहर शरणार्थी की तरह इधर-उघर बिखरे पड़े हैं। इसके बावजूद उनके बारे में सामूहिक नजरिए से बोला जा सकता है। उनके आत्मनिर्णय के अधिकार की आकांक्षाओं को व्यक्त किया जा सकता है। उनकी स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र की मांग की हिमायत में खडा हुआ जा सकता है।
    सईद ने ''ईमानदार और एकीकृत फिलीस्तीन राजनीतिक आत्मचेतना'' और ''राष्ट्रीय आत्मचेतना'' की बात कही है। सन् 1948 और खासकर 1967 के बाद से फिलीस्तीनियों में एकता बनी और उनमें फिलीस्तीन राष्ट्र के निर्माण की मांग जोर पकड़ने लगी। फिलीस्तीनियों के साझा मंच के तौर पर फिलीस्तीनी मुक्ति संगठन का नाम उभरकर सामने आया। इसी फिलीस्तीनी राष्ट्रवाद की मुखर अभिव्यक्ति के रूप में एडवर्ड सईद का नाम बौध्दिक जगत में उभरकर सामने आया। सईद का समूचा पालन-पोषण पश्चिमी वातावरण में हुआ और इसके कारण उनके पास दो तरह की पहचान थी, पश्चिमी और फिलीस्तीन की पहचान। सईद को सिर्फ फिलीस्तीन कहना ठीक नहीं होगा। उनके विचारों और नजरिए पर जितना फिलीस्तीनी जनता के स्वतंत्र राष्ट्र की मांग का गहरा असर था उससे भी ज्यादा असर पश्चिमी विचारधारा के मुक्तिकामी विचारों का था। सईद के द्वारा फिलीस्तीन आख्यान को बार-बार पेश करने का मूल मकसद था फिलीस्तीन को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में पेश करना। इस आख्यान में इजरायल समर्थित आख्यान का खंडन किया गया है। उल्लेखनीय है कि पश्चिम में फिलीस्तीनी जनता का इजरायल समर्थित आख्यान ही सबसे ज्यादा प्रचलन में है। उसी को पश्चिमी जगत ज्यादा जानता है। सईद ने इजरायल की स्वतंत्र राष्ट्र की बजाय एक विस्तारवादी राष्ट्र की परिकल्पना पेश की है। इजरायल के द्वारा कैसे विस्तारवादी- साम्राज्यवादी नीतियों का पालन किया गया और किस तरह मध्यपूर्व में उसने अन्य राष्ट्रों पर हमले किए और उनकी जमीन को अपने अधिकार में ले लिया, किस तरह फिलीस्तीनियों को गुलामों से भी बदतर अवस्था में रखा ,किस तरह स्वयं इजरायल में यहूदी जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन करके समूचे इजरायल को एक कट्टरपंथी धार्मिक यहूदीवाद के रास्ते पर ठेल दिया गया है। ये सारी चीजें एक महाख्यान के रूप में सईद के लेखन में बार-बार आती हैं।
(लेखक -जगदीश्वर चतुर्वेदी,सुधा सिंह )

सोमवार, 14 दिसंबर 2009

ग्लोबल विलेज का तानाबाना







मार्शल मैकलुहान  ने ग्लोबल विलेज की जब पहले  सबसे धारणा पेश की तो ज्यादातर विचारकों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया । आज सारी दुनिया में ग्लोबल विलेज की धारणा का धडल्ले से प्रयोग हो रहा है। ग्लोबल विलेज अथवा भूमंडलीय गांव रुपक है। इसके जरिए परवर्ती पूंजीवादी विकास और तद्जनित मीडिया वातावरण और सामाजिक संरचनाओं  के अध्ययन में मदद मिलती है। ग्लोबल विलेज में टीवी को आधार बनाकर धारणा पेश की गई थी, इसके अलावा मासकल्चर के विकास को भी इस धारणा को जोड़कर देखना चाहिए। ग्लोबल विलेज का निर्माण ग्लोबल मीडिया प्रसारण और ग्लोबल मासकल्चर के प्रसार के साथ जुड़ा हुआ है।


मैकलुहान ने लिखा '' आज,इलैक्ट्रिक तकनीक के आने के एक शताब्दी से भी ज्यादा समय गुजर जाने के बाद हमने अपने केन्द्रीय नरवस सिस्टम को ग्लोबल के हवाले किया है, भूमंडल के संदर्भ में स्पेस और टाइम दोनों का लोप हो गया है।'' इस नजरिए से यदि बीसवीं शताब्दी को देखें तो एकदम भिन्ना नजारा दिखाई देगा। यही वह शताब्दी है जिसमें दो विश्वयुध्द हुए, संयुक्त राष्ट्र संघ,विश्व बैंक,अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष,यूरोपीय यूनियन,नाटो जैसी संस्थाओं का जन्म हुआ। यूरोपीय देशों की साझा मुद्रा का जन्म हुआ। उपग्रह तकनीकी का विकास हुआ और उपग्रह के जरिए सारी दुनिया में टीवी प्रसारण संभव हुआ। आधुनिकता और फिर उत्तार आधुनिकता का पथ ग्रहण किया।
       


     सारी दुनिया को ग्लोबल विलेज के रुपक में बांधने का काम किया टीवी और उपग्रह ने। टीवी ने विश्व समुदाय को जन्म दिया,आज हमारे बीच में ज्यादा से ज्यादा बहुराष्ट्रीय चैनल आ रहे हैं। इंटरनेट ने इस प्रक्रिया को नई ऊचाईयां दीं। पहले हमारे पास परंपरागत टीवी था,जिसमें स्थानीय स्तर पर एक साथ कार्यक्रम का आनंद ले सकते थे,राष्ट्रीय अनुभूति में बंध सकते थे, किंतु सैटेलाइट के इस्तेमाल ने टीवी और सामाजिक संरचनाओं का स्वभाव ही बदल दिया। इसका मानवीय व्यवहार पर गहरा असर हुआ। आज संसार पहले की तुलना में एक-दूसरे से ज्यादा जुड़ा है। ग्लोबल विलेज का आधार है ग्लोबल संपर्क, ग्लोबल संवाद,ग्लोबल संस्कृति। ग्लोबल होने का यह अर्थ नहीं है कि स्थानीय वैशिष्ट्य खत्म हो जाएंगे,बल्कि इसका अर्थ यह है कि स्थानीय वैशिष्टय के लिए भी ग्लोबल आधार उपलब्ध रहेगा। स्थानीय भी ग्लोबल हो सकता है। ग्लोबल का अर्थ लोकल का लोप नहीं है,बल्कि ग्लोबल लोकल के बिना आधार ही नहीं बनाता, ग्लोबल का लोकल से बैर नहीं है, बल्कि लोकल के लिए नयी संभावनाएं पैदा करता है। इस अर्थ में ग्लोबल एक प्रगतिशील कदम है,प्रतिगामी कदम नहीं है।
      


         ग्लोबल मीडिया के कारण लोकल लोगों में संवाद और संपर्क और भी मजबूत बनता है। ग्लोबल का दूसरा वैशिष्ट्य यह है कि लोकल ग्लोबल आर्थिक गतिविधि का हिस्सा बनता है, ग्लोबल आर्थिक संरचनाओं के साथ अन्तर्ग्रथित करता है, इसका अर्थ यह नहीं है कि लोकल आर्थिक गतिविधियों को खत्म कर देता है, बल्कि लोकल को भी ग्लोबल आधार देता है। इस क्रम में आर्थिक गतिविधि की राष्ट्रीय सीमाओं को खत्म कर देता है,सीमाहीन विकास, राष्ट्र की सीमा के परे जाकर विकास की नयी संभावनाओं के द्वार खोलता है। कोई देश ग्लोबल विलेज बनता है या नहीं यह सब कुछ स्थानीय राजनीतिक -आर्थिक संरचनाओं के ग्लोबल संरचनाओं के साथ अन्तर्ग्रथन पर निर्भर करता है। 


लोकल के ग्लोबल होने की पहली शर्त है सभी किस्म राष्ट्रीय बंधनों,सीमाओं और कानून में ग्लोबल आर्थिक या वित्तीय संस्थानों के अनुकूल बुनियादी परिवर्तन। ग्लोबल विलेज के रुपक का मूलाधार है ग्लोबल संपर्क की संरचनाएं,ग्लोबल वित्तीय संरचनाएं,ग्लोबल संचार प्रणाली। इसका आधार है सैटेलाइट, टीवी,इंटरनेट आदि के जरिए संपर्क,संबंध और संवाद।  ग्लोबल का लक्ष्य है वर्चुअल समाज,वर्चुअल संस्कृति ,वर्चुअल आनंद,वर्चुअल इतिहास के जरिए सारी दुनिया के बीच नये संबंध ,संपर्क और संवाद का निर्माण।
      
  ग्लोबल विलेज में आने या रहने अथवा इस रुपक को महसूस करने का अर्थ यह नहीं है कि भौतिक जगत में वैषम्य का लोप हो गया है,बल्कि ग्लोबल विलेज वैषम्य,सामाजिक वैषम्य,राष्ट्रों के वैषम्य,संस्कृतियों के वैषम्य,जीवन की आधारभूत परिस्थितियों के बीच वैषम्य की प्रकृति को बदलता है, वैषम्य को बढ़ाता है, वैषम्य को छिपाता है। 


   ग्लोबल विलेज का अर्थ यह नहीं है कि सारी दुनिया एक जैसी हो गयी है,एक ही गांव में रहती है, बल्कि ग्लोबल विलेज वैषम्य के सवाल को सम्बोधित ही नहीं करता। ग्लोबल विलेज एक सुंदर रुपक है ,यह सच को छिपाता है,सच को उद्धाटित भी करता है,काल और देश के भेद के बिना यह काम करता है। पहले वैषम्य स्थानीय था,अब वैषम्य ग्लोबल है। स्थानीय वैषम्य को ग्लोबल वैषम्य के परिप्रेक्ष्य में देखने का सिलसिला शुरू हो जाता है। ग्लोबल विलेज में यदि ग्लोबल उपभोग,ग्लोबल संवाद, ग्लोबल संचार के सवाल प्रमुख हैं तो ग्लोबल हिंसाचार,ग्लोबल वैषम्य,ग्लोबल लूट और उत्पीड़न के सवाल प्रमुख हैं।
   
    ग्लोबल में कोई भी सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक तत्व छिपा नहीं रहता,ग्लोबल विलेज में सबको सबकी खबर लेने,जानने का हक है,संभावनाएं हैं और हस्तक्षेप करने का अधिकार भी है। ग्लोबल हमें सीमाबध्दता,स्थानीयता,स्थानीयबोध और कूपमंडूकता से मुक्त करता है। इस अर्थ में यह सकारात्मक धारणा है। इसका यह अर्थ नहीं है कि जो ग्लोबल नहीं है वह कूपमंडूक है, और जो ग्लोबल है वह अक्लमंद है। यह भी संभव है कि खान-पान में ग्लोबल हों,ज्ञान में लोकल हों। ज्ञान में ग्लोबल हों,जीवनशैली में लोकल हों।


 ग्लोबल में सब कुछ खुला है तो बहुत कुछ अनखुला भी है,उदार वातावरण है तो अनुदार वातावरण भी है , लोचदार समझ का समाज है तो कट्टरपंथी समाज भी है। कहने का अर्थ यह है ग्लोबल अन्तर्विरोधी है। मूलत: वर्चस्ववादी है, इसमें मुक्ति की क्षमता नहीं है। किंतु संपर्क की क्षमता,संवाद की अपार क्षमता जरूर है।


     मैकलुहान ने जब ग्लोबल विलेज की धारणा दी थी तब वह दृश्य ,व्यक्तिवादी प्रिंट संस्कृति की समाप्ति को देख रहे थे, यही वजह है उन्होने '' इलैक्ट्रोनिक इंटरडिपेंडेंस'' की बात कही थी। यही वह दौर था जब इलैक्ट्रोनिक मीडिया ने दृश्य संस्कृति के जरिए युगीन और वाचिक संस्कृति को अपदस्थ किया था। 


    इलैक्ट्रोनिक युग में मनुष्य व्यक्तिवाद से निकलकर फ्रेगमेंटेशन या विखंडन के युग में दाखिल होता है।  सामुदायिक अस्मिता के युग में दाखिल होता है। इसका आदिवासी चरित्र था। मैकलुहान ने ऐसी अवस्था में नए किस्म के सामाजिक संगठनों की बात कही। नया सामाजिक संगठन ग्लोबल विलेज के रूप में सामने आया। हम अलैक्जेंडरियन लाइब्रेरी की ओर जाने की बजाय कम्प्यूटर की ओर चले गए, इलैक्ट्रोनिक दिमाग की ओर चले गए,एक तरह से साइंस फिक्शन के प्रति पागल हो उठे। इस समूचे परिवर्तन को सही ढ़ंग से समझे बिना हम आतंककारी दर्द के शिकार हो गए। हम ऐसे जगत में आ गए जिसमें समग्रता में अन्तर्निर्भरता बनी रही। इसके ऊपर सह-अस्तित्व को आरोपित कर दिया गया।
      
    वाचिक समाज में आतंक एक अनिवार्य और नार्मल तत्व है। इसमें प्रत्येक चीज प्रत्येक चीज को प्रभावित करती है। हमारी पश्चिमी मानसिकता यह मानने को तैयार ही नहीं थी कि हम जनजातीय चेतना से घिर चुके हैं। मैकलुहान ने जब ग्लोबल विलेज की बात कही थी तो उसका इशारा मीडियम के ज्ञानात्मक प्रभाव की ओर था। मैकलुहान का मानना था कि मीडिया के प्रभाव को लेकर हम यदि सतर्क नहीं होते तो ग्लोबल विलेज सर्वसत्तावाद और आतंक के राज में तब्दील होने की क्षमता रखता है। मैकलुहान की यह बात अब तक के ग्लोबल यथार्थ में सच साबित हुई है। सन् 1980 के बाद से सारी दुनिया में आतंक,सर्वसत्तावाद का एक नया उभार देख रहे हैं। खास किस्म की आदिमचेतना और आदिम मानसिकता का प्रसार देख रहे हैं।
 (लेखक-जगदीश्वर चतुर्वेदी,सुधा सिंह )

इस्लाम,मध्यपूर्व ,बहुराष्ट्रीय कारपोरेट मीडिया और एडवर्ड सईद -1-


एडवर्ड सईद के लेखन की धुरी है आख्यान। फिलीस्तीनियों के इतिहास लेखन का अर्थ है 'आख्यान की अनुमति',जिससे ऐतिहासिक रिकॉर्ड को सीधे पेश किया जा सके। इस क्रम में उन्होंने यहूदीवाद और इजरायल समर्थक यहूदीवाद के इतिहासकारों का आलोचनात्मक मूल्यांकन पेश किया। इन इतिहासकारों का लेखन फिलीस्तीनियों के अस्तित्व और उनकी वतन वापसी के अधिकार को ही अस्वीकार करता है। 


सईद ने लिखा  '' तथ्य अपने आप नहीं बोलते।  उनके लिए सामाजिक तौर पर स्वीकृत आख्यान की जरूरत होती है जिससे उन्हें स्वीकार किया जाए,टिकाऊ बन सकें और प्रसारित किया जा सके। यह ऐसा आख्यान है जिसका आरंभ और अंत होगा। '' आगे लिखा '' यह सच है  राजनीतिक संदर्भ में विचारधारात्मक आयाम महत्वपूर्ण होता है। कायिक तौर पर क्षेत्र से दूरी होने के कारण प्रेरणा मिलती है दूर होने के कारण क्षेत्र का महत्व भी समझ में आता है और यही वजह है कि पूर्ववर्ती वैचारिक प्रस्तुतियों को पश्चिम को आख्यान के रूप में बताया जाना चाहिए। ईसाईयत और यहूदीवाद के उदय का फिलीस्तीन एक वरीयता प्राप्त क्षेत्र है । यह और भी महत्वपूर्ण है कि तीस लाख से ज्यादा फिलीस्तीनी गैर यहूदी और गैर ईसाई यहां रह रहे हैं।'' 
     


    अमरीकी अधिकारी बताते रहते हैं आतंकवाद उनका सबसे बड़ा शत्रु है।  किंतु इस अवधारणा का सटीक अर्थ और तर्क भी हैं। यह नहीं कह सकते कि आतंकवाद का अस्तित्व नहीं है।  बल्कि यह कहना सही होगा कि इसका अस्तित्व  विशेष मौके पर ही दिखाई देता है वह एक पूरी व्यवस्था के रूप में नजर आता है। आतंकवाद का पहला अर्थ ' हम' को व्यक्त करता है जो पराया है। शत्रुता को व्यक्त करता है। वह विध्वंसक ,नियोजित और नियंत्रित है। वह तरंग है,नेटवर्क है। इसकी साजिशें मास्को से शुरू होती हैं और बुल्गारिया,बेरूत,लीबिया,तेहरान और क्यूबा होते हुए आता है। वह कुछ भी करने की क्षमता रखता है।  


   आतंकवाद पर जितनी किताबें लिखी गयी हैं वे सब ' हम' के परिप्रेक्ष्य में लिखी गयी हैं। इसमें 'हम' ही सर्वस्व है। बाकी किसी के नजरिए का कोई महत्व नहीं है। 'हम' के परिप्रेक्ष्य के आधार पर 'तुम' की सभी चीजों को गैरकानूनी और अमानवीय ठहराया जाता है। आतंकवाद की इस तरह की व्याख्या समानार्थी और पुनरूक्तिपूर्ण चरित्र को व्यक्त करती है। यह मूलत: आख्यान विरोधी है। इसमें क्रम, कारण के तर्क और 

उनका उत्पीड़क और उत्पीड़ित पर प्रभाव, प्रभाव का विरोध आदि सब चीजें ''आतंकवाद'' के बहाने गायब हो 

जाती हैं। ऐसी अवस्था में तथ्यों और सत्य के ऐतिहासिक अनुभवों की व्यापक स्वीकृति की बहुत कम भूमिका रह जाती है।



इजरायल ने 1982 में जब लेबनान पर हमला किया तो उस हमले की जांच के लिए छह सदस्यीय न्यायायोग सीन मैकब्राइट की अध्यक्षता में गठित किया गया। मैकब्राइट कमीशन ने रेखांकित किया  इजरायल ने सभी अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन करते हुए लेबनान पर हमला किया है। 


इस कमीशन में एक इजरायली जी. स्पीरो ने एक बयान दिया है, यह बयान उस सच्चाई की ओर ध्यान खींचता है जो अमरीकी-इजरायली दिमाग में सक्रिय है। स्पीरो ने कहा हम जो कुछ भी करते हैं उसकी हमें कोई कीमत अदा नहीं करनी पड़ती,यहां तक जिस जमीन पर कब्जा करते हैं वहां पर भी अदा नहीं करनी पड़ती। क्योंकि इजरायल के पास एक विलक्षण जादू है। विश्व में ऐसा कोई देश नहीं है जहां पर सौ फीसदी मंहगाई न हो, जिसका वेस्टबैंक पर कब्जा हो,जिसका अन्य की जमीन पर कब्जा हो, जो वहां पर अरबों डालर की पुनर्वास बस्तियां बसा रहा हो,जो अपने सकल घरेलू उत्पाद का तीस फीसदी रक्षा पर खर्च करता हो। इसके बावजूद हम वहां रह सकते हैं। मेरे कहने का अर्थ है कि अन्य कोई है जो हमारी सब चीजों के लिए भुगतान कर रहा है। यदि सब अच्छे से रहें,विदेश में घूमें,कार खरीदें, तब हम अन्य की जमीन पर कब्जा करने का समर्थन क्यों न करें ? यह लग्ज़री युध्द है, और लोगों पर हम पर नाज है जिस तरह हम युध्द करते हैं। तुरंत जीत जाते हैं। इजरायलियों की बहादुराना स्वनिर्मित छवि है जो हमें लुभाती है।
    


सईद ने लिखा मैकब्राइट कमीशन की राय थी ''तथ्य स्वयं बोलते हैं।'' किंतु यहूदीवाद और फिलीस्तीनियों के खिलाफ युध्द के बारे में यह बात सच नहीं है। तथ्य स्वयं नहीं बोलते। खासकर अमरीका में ,जहां इजरायली प्रचार अभियान का बोलवाला है। ब्रिटिश प्रेस में किस तरह की सेंसरशिप है इसके बारे में मिशेल एडम और क्रिटोफर मेयो ने विस्तार से अध्ययन करने के बाद लिखा  अनधिकारिक तौर पर ब्रिटिश प्रेस नीति सेंसरशिप की नीति लागू करता रहा है। जिसके अनुसार यहूदीवाद के बारे में अप्रिय सत्य को सुनियोजित तरीके से दबा दिया जाता है। ब्रिटिश प्रेस की यह स्वाभाविक प्रकृति का हिस्सा नहीं है बल्कि इस चीज को उसने अमरीका से लिया है।
     
मजेदार बात यह है कि ब्रिटिश और अमरीकी मीडिया में फिलीस्तीनियों को देख सकते हैं, उनकी मौजूदगी को देख सकते हैं किंतु उनका आख्यान कहीं पर भी नजर नहीं आएगा। मीडिया को फिलीस्तीनी इलाकों की खबरें देते हुए भी देख सकते हैं किंतू उनके जीवन से जुड़ी तमाम बुनियादी बातों के बारे में  आपको मीडिया कवरेज से कोई जानकारी नहीं मिलेगी। फिलीस्तीनियों की बुनियादी चीजों पर रोशनी डालने का अर्थ है इजरायल की बुरी इमेज पेश करना और यही चीज मीडिया करना नहीं चाहता। बल्कि इसके उलटे वे उन लोगों को दण्डित करते हैं जो सत्य बताते हैं। आज मीडिया में स्थिति इतनी खराब है कि बमुश्किल आपको फिलीस्तीनी आख्यान दिखाई देगा।
     
सईद ने लिखा फिलीस्तीनी राष्ट्रवाद विलक्षण है,सन् 1948 के बाद फिलीस्तीनियों को उनके देश की जमीन मिलती इसके पहले ही उसे राष्ट्रवाद के रूप में वैचारिक महत्व मिल गया। यह ऐसा राष्ट्रवाद है जिसे जमीन नहीं मिली किंतु राष्ट्रवाद का नाम मिल गया। यह ऐसा राष्ट्रवाद है जो विदेश और अलगाव से परिचालित है। अनेक वर्षों से सक्रिय है। बहुत मजबूत है और इसके मानने वाले भी शिद्दत के साथ इसे महसूस करते हैं। यहूदी राष्ट्रवाद का यूरोपीय राष्ट्रवाद ,यहूदीवाद और उपनिवेशवाद विरोध की खुशबू लेकर विकास हुआ है,इसके विपरीत फिलीस्तीनी राष्ट्रवाद का अरब और इस्लामिक देशों में चले उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष की परंपरा से संबंध है। उस संघर्ष के गर्भ से इसका जन्म हुआ है।
   
अमरीका में किस तरह आम जनता ,अभिजन और  कारपोरेट घरानों की राय बनायी जाती है और अमरीका किस तरह का देश है। उसके बारे में सईद ने लिखा अमरीका की सैन्य क्षमता का सचेतनता के निर्माण में किस हद तक इस्तेमाल किया जाता है उस पर शायद ही विश्वास हो। आम लोगों में यह विचार प्रचारित किया हुआ है कि एक शक्ति के रूप में अमरीका की सारी दुनिया के लिए अच्छी भूमिका है सामान्य और रूटिन भूमिका है। 


इसी तरह अमरीकी लोग यही महसूस करते हैं कि  विदेशी समाजों और संस्कृतियों के लिए ऊर्जस्वित करने वाली भूमिका है। अमरीका सारी दुनिया का प्रेरक है। इसी तरह दूसरी ओर अमरीकी लोगों में परंपरागत संस्कृति के प्रति कोई आस्था नहीं है। यहां तक कि परंपरागत क्रांतिकारी संस्कृति के प्रति भी कोई आस्था नहीं है। अमरीकी लोग भी कम्युनिस्ट प्रचार अभियान की तरह ही सांस्कृतिक और राजनीतिक सीमाओं को महसूस करते हैं।  किंतु अमरीका में एक और भी विशेष बात है कि वहां पर मीडिया के द्वारा सीमाएं तय की जाती हैं और वह लगातार दबाव बनाए रखता है। इसको सचेत तौर पर अथवा खुल्लमखुल्ला लोग स्वीकार नहीं करते।
 (लेखक -जगदीश्वर चतुर्वेदी, सुधा सिंह )




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