सोमवार, 14 दिसंबर 2009

इस्लाम,मध्यपूर्व ,बहुराष्ट्रीय कारपोरेट मीडिया और एडवर्ड सईद -1-


एडवर्ड सईद के लेखन की धुरी है आख्यान। फिलीस्तीनियों के इतिहास लेखन का अर्थ है 'आख्यान की अनुमति',जिससे ऐतिहासिक रिकॉर्ड को सीधे पेश किया जा सके। इस क्रम में उन्होंने यहूदीवाद और इजरायल समर्थक यहूदीवाद के इतिहासकारों का आलोचनात्मक मूल्यांकन पेश किया। इन इतिहासकारों का लेखन फिलीस्तीनियों के अस्तित्व और उनकी वतन वापसी के अधिकार को ही अस्वीकार करता है। 


सईद ने लिखा  '' तथ्य अपने आप नहीं बोलते।  उनके लिए सामाजिक तौर पर स्वीकृत आख्यान की जरूरत होती है जिससे उन्हें स्वीकार किया जाए,टिकाऊ बन सकें और प्रसारित किया जा सके। यह ऐसा आख्यान है जिसका आरंभ और अंत होगा। '' आगे लिखा '' यह सच है  राजनीतिक संदर्भ में विचारधारात्मक आयाम महत्वपूर्ण होता है। कायिक तौर पर क्षेत्र से दूरी होने के कारण प्रेरणा मिलती है दूर होने के कारण क्षेत्र का महत्व भी समझ में आता है और यही वजह है कि पूर्ववर्ती वैचारिक प्रस्तुतियों को पश्चिम को आख्यान के रूप में बताया जाना चाहिए। ईसाईयत और यहूदीवाद के उदय का फिलीस्तीन एक वरीयता प्राप्त क्षेत्र है । यह और भी महत्वपूर्ण है कि तीस लाख से ज्यादा फिलीस्तीनी गैर यहूदी और गैर ईसाई यहां रह रहे हैं।'' 
     


    अमरीकी अधिकारी बताते रहते हैं आतंकवाद उनका सबसे बड़ा शत्रु है।  किंतु इस अवधारणा का सटीक अर्थ और तर्क भी हैं। यह नहीं कह सकते कि आतंकवाद का अस्तित्व नहीं है।  बल्कि यह कहना सही होगा कि इसका अस्तित्व  विशेष मौके पर ही दिखाई देता है वह एक पूरी व्यवस्था के रूप में नजर आता है। आतंकवाद का पहला अर्थ ' हम' को व्यक्त करता है जो पराया है। शत्रुता को व्यक्त करता है। वह विध्वंसक ,नियोजित और नियंत्रित है। वह तरंग है,नेटवर्क है। इसकी साजिशें मास्को से शुरू होती हैं और बुल्गारिया,बेरूत,लीबिया,तेहरान और क्यूबा होते हुए आता है। वह कुछ भी करने की क्षमता रखता है।  


   आतंकवाद पर जितनी किताबें लिखी गयी हैं वे सब ' हम' के परिप्रेक्ष्य में लिखी गयी हैं। इसमें 'हम' ही सर्वस्व है। बाकी किसी के नजरिए का कोई महत्व नहीं है। 'हम' के परिप्रेक्ष्य के आधार पर 'तुम' की सभी चीजों को गैरकानूनी और अमानवीय ठहराया जाता है। आतंकवाद की इस तरह की व्याख्या समानार्थी और पुनरूक्तिपूर्ण चरित्र को व्यक्त करती है। यह मूलत: आख्यान विरोधी है। इसमें क्रम, कारण के तर्क और 

उनका उत्पीड़क और उत्पीड़ित पर प्रभाव, प्रभाव का विरोध आदि सब चीजें ''आतंकवाद'' के बहाने गायब हो 

जाती हैं। ऐसी अवस्था में तथ्यों और सत्य के ऐतिहासिक अनुभवों की व्यापक स्वीकृति की बहुत कम भूमिका रह जाती है।



इजरायल ने 1982 में जब लेबनान पर हमला किया तो उस हमले की जांच के लिए छह सदस्यीय न्यायायोग सीन मैकब्राइट की अध्यक्षता में गठित किया गया। मैकब्राइट कमीशन ने रेखांकित किया  इजरायल ने सभी अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन करते हुए लेबनान पर हमला किया है। 


इस कमीशन में एक इजरायली जी. स्पीरो ने एक बयान दिया है, यह बयान उस सच्चाई की ओर ध्यान खींचता है जो अमरीकी-इजरायली दिमाग में सक्रिय है। स्पीरो ने कहा हम जो कुछ भी करते हैं उसकी हमें कोई कीमत अदा नहीं करनी पड़ती,यहां तक जिस जमीन पर कब्जा करते हैं वहां पर भी अदा नहीं करनी पड़ती। क्योंकि इजरायल के पास एक विलक्षण जादू है। विश्व में ऐसा कोई देश नहीं है जहां पर सौ फीसदी मंहगाई न हो, जिसका वेस्टबैंक पर कब्जा हो,जिसका अन्य की जमीन पर कब्जा हो, जो वहां पर अरबों डालर की पुनर्वास बस्तियां बसा रहा हो,जो अपने सकल घरेलू उत्पाद का तीस फीसदी रक्षा पर खर्च करता हो। इसके बावजूद हम वहां रह सकते हैं। मेरे कहने का अर्थ है कि अन्य कोई है जो हमारी सब चीजों के लिए भुगतान कर रहा है। यदि सब अच्छे से रहें,विदेश में घूमें,कार खरीदें, तब हम अन्य की जमीन पर कब्जा करने का समर्थन क्यों न करें ? यह लग्ज़री युध्द है, और लोगों पर हम पर नाज है जिस तरह हम युध्द करते हैं। तुरंत जीत जाते हैं। इजरायलियों की बहादुराना स्वनिर्मित छवि है जो हमें लुभाती है।
    


सईद ने लिखा मैकब्राइट कमीशन की राय थी ''तथ्य स्वयं बोलते हैं।'' किंतु यहूदीवाद और फिलीस्तीनियों के खिलाफ युध्द के बारे में यह बात सच नहीं है। तथ्य स्वयं नहीं बोलते। खासकर अमरीका में ,जहां इजरायली प्रचार अभियान का बोलवाला है। ब्रिटिश प्रेस में किस तरह की सेंसरशिप है इसके बारे में मिशेल एडम और क्रिटोफर मेयो ने विस्तार से अध्ययन करने के बाद लिखा  अनधिकारिक तौर पर ब्रिटिश प्रेस नीति सेंसरशिप की नीति लागू करता रहा है। जिसके अनुसार यहूदीवाद के बारे में अप्रिय सत्य को सुनियोजित तरीके से दबा दिया जाता है। ब्रिटिश प्रेस की यह स्वाभाविक प्रकृति का हिस्सा नहीं है बल्कि इस चीज को उसने अमरीका से लिया है।
     
मजेदार बात यह है कि ब्रिटिश और अमरीकी मीडिया में फिलीस्तीनियों को देख सकते हैं, उनकी मौजूदगी को देख सकते हैं किंतु उनका आख्यान कहीं पर भी नजर नहीं आएगा। मीडिया को फिलीस्तीनी इलाकों की खबरें देते हुए भी देख सकते हैं किंतू उनके जीवन से जुड़ी तमाम बुनियादी बातों के बारे में  आपको मीडिया कवरेज से कोई जानकारी नहीं मिलेगी। फिलीस्तीनियों की बुनियादी चीजों पर रोशनी डालने का अर्थ है इजरायल की बुरी इमेज पेश करना और यही चीज मीडिया करना नहीं चाहता। बल्कि इसके उलटे वे उन लोगों को दण्डित करते हैं जो सत्य बताते हैं। आज मीडिया में स्थिति इतनी खराब है कि बमुश्किल आपको फिलीस्तीनी आख्यान दिखाई देगा।
     
सईद ने लिखा फिलीस्तीनी राष्ट्रवाद विलक्षण है,सन् 1948 के बाद फिलीस्तीनियों को उनके देश की जमीन मिलती इसके पहले ही उसे राष्ट्रवाद के रूप में वैचारिक महत्व मिल गया। यह ऐसा राष्ट्रवाद है जिसे जमीन नहीं मिली किंतु राष्ट्रवाद का नाम मिल गया। यह ऐसा राष्ट्रवाद है जो विदेश और अलगाव से परिचालित है। अनेक वर्षों से सक्रिय है। बहुत मजबूत है और इसके मानने वाले भी शिद्दत के साथ इसे महसूस करते हैं। यहूदी राष्ट्रवाद का यूरोपीय राष्ट्रवाद ,यहूदीवाद और उपनिवेशवाद विरोध की खुशबू लेकर विकास हुआ है,इसके विपरीत फिलीस्तीनी राष्ट्रवाद का अरब और इस्लामिक देशों में चले उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष की परंपरा से संबंध है। उस संघर्ष के गर्भ से इसका जन्म हुआ है।
   
अमरीका में किस तरह आम जनता ,अभिजन और  कारपोरेट घरानों की राय बनायी जाती है और अमरीका किस तरह का देश है। उसके बारे में सईद ने लिखा अमरीका की सैन्य क्षमता का सचेतनता के निर्माण में किस हद तक इस्तेमाल किया जाता है उस पर शायद ही विश्वास हो। आम लोगों में यह विचार प्रचारित किया हुआ है कि एक शक्ति के रूप में अमरीका की सारी दुनिया के लिए अच्छी भूमिका है सामान्य और रूटिन भूमिका है। 


इसी तरह अमरीकी लोग यही महसूस करते हैं कि  विदेशी समाजों और संस्कृतियों के लिए ऊर्जस्वित करने वाली भूमिका है। अमरीका सारी दुनिया का प्रेरक है। इसी तरह दूसरी ओर अमरीकी लोगों में परंपरागत संस्कृति के प्रति कोई आस्था नहीं है। यहां तक कि परंपरागत क्रांतिकारी संस्कृति के प्रति भी कोई आस्था नहीं है। अमरीकी लोग भी कम्युनिस्ट प्रचार अभियान की तरह ही सांस्कृतिक और राजनीतिक सीमाओं को महसूस करते हैं।  किंतु अमरीका में एक और भी विशेष बात है कि वहां पर मीडिया के द्वारा सीमाएं तय की जाती हैं और वह लगातार दबाव बनाए रखता है। इसको सचेत तौर पर अथवा खुल्लमखुल्ला लोग स्वीकार नहीं करते।
 (लेखक -जगदीश्वर चतुर्वेदी, सुधा सिंह )




1 टिप्पणी:

  1. मैं आपके ब्लॉग पर छात्र बनकर आने लगा हूं। बहुत कुछ सीखने के लिए।

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