रविवार, 20 दिसंबर 2009

इस्लाम,मध्यपूर्व ,बहुराष्ट्रीय कारपोरेट मीडिया और एडवर्ड सईद -8-


 मध्यपूर्व को मीडिया में हम तब ही देखते हैं जब कोई संकट हो, युध्द हो,विध्वंस हो अथवा गरीबी हो। इस तरह की नकारात्मक प्रस्तुतियों में मीडिया इस कदर व्यस्त रहता है कि मध्यपूर्व की सकारात्मक चीजें मीडिया में आ ही नहीं पातीं। इससे यही लगता है कि मध्यपूर्व में राजनीति,संस्कृति,विकास आदि के क्षेत्र में कुछ भी सकारात्मक नहीं बचा है। 'नाइन इलेवन' की घटना के बाद मीडिया का मुख्य लक्ष्य आतंकवाद के साथ मध्यपूर्व को जोड़ना हो गया है।
   
     प्रचार किया गया मध्यपूर्व के लोग आतंकवादी होते हैं और आतंकवाद के बहाने किसी भी चीज में कटौती की जा सकती है। किसी के भी खिलाफ पाबंदी लगायी जा सकती है। आतंकवाद के खिलाफ छेड़ी गयी अमरीकी मुहिम  वैध ,स्वाभाविक और अपरिहार्य है। आतंकवाद की जंग को ''सुरक्षा बनाम सेना'' के स्तर पर सीमित रखा गया।


    दूसरी बड़ी बात यह है कि आतंकवाद को समझने के किसी भी प्रयास को अमरीकी मीडिया तबज्जह नहीं देना चाहता। उनका मानना है  इस समस्या पर जो कुछ जानना है मीडिया से जानो। मध्यपूर्व की मीडिया प्रस्तुतियों की सबसे बड़ी असफलता है कि वे यह बताने में असमर्थ साबित हुए हैं कि कुछ राष्ट्र अपने निहित स्वार्थ के लिए आतंकवाद का इस्तेमाल कर रहे हैं। कुछ नीतियां  हैं जिनका आतंकवादी  ग्रुपों के द्वारा लाभ उठाया जा रहा है। इन नीतियों को मीडिया उद्धाटित करने में असफल रहा है। 


   दूसरी बड़ी असफलता है मीडिया ने आतंकवाद के साथ मुसलमान और इस्लाम को नत्थी कर दिया। मीडिया प्रस्तुतियों में इस्लामिक आतंकवाद के द्वारा मुसलमानों और इस्लामिक देशों में किए जा रहे हमलों और अत्याचारों का कवरेज एकसिरे से गायब है। मीडिया के द्वारा इस्लामिक आतंकवाद और प्रतिरोध आंदोलन और मुक्ति आंदोलनों के बीच कोई अंतर नहीं दिखाया जाता।


    आखिर में सबसे बड़ी बात यह कि पश्चिमी मीडिया जब भी फंडामेंटलिज्म का कवरेज पेश करता है तो उसे पूरी तरह इस्लामिक फंडामेंटलिज्म के साथ सीमित करके रखता है। फंडामेंटलिज्म के अनेक रूप हैं ,स्वयं अमरीका में ईसाई फंडामेंटलिज्म का वर्चस्व है किंतु पश्चिमी मीडिया के द्वारा सिर्फ इस्लामिक फंडामेंटलिज्म का स्टीरियोटाईप कवरेज ही पेश किया जाता है।
      
    मध्यपूर्व का असल विवाद इजरायल-अरब के बीच में है। इसमें इजरायल के द्वारा अरबों और फिलीस्तीनियों की जमीन पर वर्षों से अवैध कब्जा किया हुआ है। बाहर से लाकर फिलीस्तीनियों के इलाके में लाखों यहूदियों की बस्तियां बसा दी गयी हैं। इस बुनियादी मुद्दे पर से ध्यान हटाने के लिए मीडिया अहर्निश प्रचार कर रहा है। 


     अरब-इजरायल विवाद में मीडिया एकतरफा ढ़ंग से इजरायल का प्रचार कर रहा है। मध्यपूर्व की प्रस्तुतियों अरब हमेशा हमलावर होता है और इजरायल आत्मरक्षा में लगा होता है। पहले हमला अरब करते हैं और बाद में इजरायल अपनी रक्षा करता है। फिलीस्तीनियों और लेबनानियों को इजरायली नागरिकों को मारने का कोई अधिकार नहीं है। यदि वे अपनी सीमा के पार इजरायलियों पर हमले करते हैं तो यह आतंकवाद कहलाएगा। 


    इसके विपरीत यदि इजरायल अरब और फिलीस्तीन जनता पर हमले करे तो उसे मीडिया के द्वारा आतंकवाद की संज्ञा नहीं दी जाती। इजरायल को अपनी सीमा के परे अरब नागरिकों की हत्या करने का अधिकार है। यह उसका वैध और आत्म रक्षा में उठाया कदम है। इजरायली बेहतर फ्रेंच बोलते हैं अरबों की तुलना में। यही वजह है कि इजरायल के लोगों को मीडिया में बोलने का व्यापक मौका मिलता है। इसी को पश्चिमी मीडिया तटस्थता कहता है। यदि आप इन नियमों से असहमत हैं और आप यह समझते हैं इनके पीछे एक पक्ष के प्रति पूर्वाग्रह निहित हैं,पक्षधरता निहित है तो यह तय है कि आपको यहूदी विरोधी करार दे दिया जाएगा। यही मूलत: मासमीडिया इमेज है मध्यपूर्व की।
     
    पश्चिमी जनमाध्यमों का इस्लाम धर्म,  मध्यपूर्व और मुसलमानों को लेकर खास किस्म का नजरिया है। इसमें कई स्तरों पर स्टीरियोटाईप का प्रचार होता रहता है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण स्टीरियोटाईप है ''इस्लाम से खतरा', 'इस्लाम आतंकवादी' है। 'मुसलमान' आतंकवादी है। 'इस्लाम पश्चिम के लिए खतरा' है। इस तरह की रूढिबध्द धारणाओं के आधार पर मीडिया प्रस्तुतियों को पेश किया जाता है। ये सारी धारणाएं सोवियत संघ के विघटन के बाद पैदा हुई हैं।


       सोवियत संघ के पतन के पहले तक पश्चिम के लिए साम्यवाद का खतरा था किंतु सोवियत संघ के पतन के बाद इस्लाम और मुसलमान को खतरा घोषित कर दिया गया है। इस तरह के प्रचार अभियान की आलोचना करते हुए सईद ने ' ए डेविल थ्योरी ऑफ इस्लाम' (1996) में लिखा कि ज्यादातर इस्लामिक देश भयानक गरीबी की अवस्था में हैं। ये देश विज्ञान और सैन्यदृष्टि से किसी के लिए भी खतरा नहीं हो सकते अगर उनसे खतरा है तो सिर्फ इन देशों के नागरिकों को है।
        
     इस्लामिक देशों में जो ताकतवर देश हैं जैसे मिस्र,जोर्डन,सऊदीअरब और पाकिस्तान वे अमरीका की पॉकेट में हैं। ऐसी अवस्था में जुडिथ मिलर,सेमुअल हटिंगटन, मार्टिन क्रेमर ,बर्नार्ड लीविस,डेनियल पीप्स, स्टीवन इमर्सन, बेरी रूबिन और इजरायली अकादमिक जगत के लोग जिस खतरे का हमारी आंखों के सामने अहर्निश जाप करते रहते हैं,ये लोग वस्तुत: इस्लाम को आतंक,दमन और हिंसा का प्रतीक बताकर सलाह-मशविरा देकर अपना धंधा करते रहते हैं। लगातार टीवी प्रस्तुतियों में दिखते हैं और किताब लिखने के सौदे हासिल करते रहते हैं। इन लोगों को कहीं पर भी विस्फोट हो तुरंत षडयंत्र की बू आने लगती है। 


    सईद ने लिखा है राजनीतिक इस्लाम ने जहां पर भी सत्ता हथियाने की कोशिश की है उसे वहां असफलता हाथ लगी है। संभवत: ईरान अपवाद है। इस तरह के प्रचार अभियान में एक सच्चाई है कि इस्लाम का प्रचार प्रतिरोध की आग में घी का काम करता है। इसे ही हॉब्सवाम ने पूर्व-औद्योगिक प्रतिरोध की संज्ञा दी है। यह सच है कुछ इलाकों में इस्लामिक आत्मघाती हमले हुए हैं। किंतु इस तरह के आत्मघाती हमलों से अमरीका-इजरायल के ही हाथ मजबूत हुए हैं।


    जब आप इस समझ को स्वीकार कर लेते हैं कि इस्लाम खतरा है, आतंकवाद है तो वैसी स्थिति में यह धारणा पैदा होती है  कि अरब देशों को परास्त किया जाना चाहिए,गुलाम बनाया जाना चाहिए और उनका उत्पीड़न किया जाना चाहिए। मुसलमानों के प्रतिरोध को कुचला जाना चाहिए। सईद ने लिखा है इस्लाम विरोधी प्रचार अभियान अरब देशों और इजरायल,पश्चिम और इजरायल के बीच समानता के आधार पर किसी भी किस्म के संवाद की संभावनाएं खत्म कर देता है। वर्चस्व और अमानवीय व्यवहार को वैधता प्रदान करता है। जमीनी स्तर पर समूची संस्कृति को मातहत और अमानवीय बना देता है। ऐसी अवस्था में आधुनिकता का मुसलमानों में एक ही रूप बचता है कि उनकी मनोचिकित्सा की जाए, दण्डित किया जाए।
     
     सईद का मानना है धर्म का किसी भी रूप में दुरूपयोग खासकर प्रतिगामी मंशाओं के लिए किए गए दुरूपयोग का जमकर विरोध किया जाना चाहिए। धर्म के दुरूपयोग का प्रतिवाद सिर्फ इस्लामिक देशों में ही नहीं बल्कि इजरायल में भी इसका प्रतिवाद किया जाना चाहिए। पश्चिमी मीडिया के प्रचार के कारण अरब देशों को कट्टरपंथी और इजरायल को धर्मनिरपेक्ष मान लिया गया है। जबकि सच यह नहीं है।


     सईद ने जुडिथ मिलर की किताब के बहाने आलोचना करते हुए लिखा कि मिलर को मध्य-पूर्व का पच्चीस सालों से तजुर्बा है किंतु समस्या यह है कि वह न तो अरबी जानती हैं और न परशियन ही जानती हैं। ऐसी अवस्था में ऐसे किसी भी पत्रकार के लिखे को गंभीरता से नहीं लिया जा सकता जो रूस,फ्रांस,जर्मनी अथवा लैटिन अमेरिका यहां तक कि चीन और जापान के बारे में लिखे और संबंधित देश की भाषा तक को न जानता हो । किंतु इस्लाम के संदर्भ में भाषा संबंधी सरोकार एकदम बेमानी हैं क्योंकि इस्लाम को मनोवैज्ञानिक तौर पर विकृत कर दिया गया है। उसकी ''असली'' संस्कृति और धर्म को नहीं।
 

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