रविवार, 13 दिसंबर 2009

तेलंगाना -आंध्रः ग्लोबल चैनलों की गुलामगिरी के खिलाफ बगावत

                
      ग्लोबल टेलीविजन ने विभाजनकारी भूमिका आरंभ कर दी है। तेलंगाना के सवाल पर जिस तरह का कवरेज आया है वह चिंता की बात है।उससे  तीन सवाल पैदा हुए हैं। पहला ,क्या तेलंगाना  आंदोलन पर जिम्मेदार टीवी कवरेज आया , दूसरा ,कांग्रेस और भाजपा , टीवी के दबाव में आकर राजनीतिक फैसला क्यों लेते हैं, और तीसरा सवाल यह उठता है कि राजनीतिक फैसले ,खासकर विभाजनकारी मसलों को प्रभावित करने में ग्बोबल मीडिया किस तरह की भूमिका निभाता है।
      टीवी कवरेज ने विभाजनकारी तेलंगाना विवाद को वैध बनाया,तेलंगाना के आंदोलन में निहित अतार्किक समझ को वैध बनाया। यह भ्रम पैदा किया तुरंत फैसला करो,बगैर सोचे फैसला करो।  केन्द्र सरकार ने अपनी राजनीतिक समझ को चैनलों के कवरेज के आधार वैध बनाया। सच यह है कि तेलंगाना राज्य बन नहीं सकता। यह मसला वर्चुअल मीडिया ने बनाया और इसके ही आधार पर कांग्रेस और भाजपा ने इसके पक्ष में फैसला लिया। ग्लोबल मीडिया आमतौर पर इस तरह के मसलों पर सारी दुनिया में विभाजनकारी भूमिका अदा करता रहा है। भारत में भी वह यही कर रहा है।
    मीडिया कवरेज की गर्मी से प्रभावित दलों ने सोचा ही नहीं कि राजनीतिक फैसले मीडिया के द्वारा नहीं बल्कि राजनीतिक यथार्थ के आधार पर लिए जाते हैं। राजनीतिक यथार्थ मीडिया मे नहीं उसके बाहर सामाजिक जीवन में होता है। इस प्रसंग में चैनलों की राजनीतिक प्रस्तुतियां फेक रही हैं। उन्होंने तेलंगाना बनने के दुष्परिणामों को छिपाया।   

      उल्लेखनीय टीवी इमेज की जानलेवा क्षमता होती है। इमेज स्वयं की हत्या करती है। मॉडल की हत्या करती है। पहचान की भी हत्या करती है।  चैनलों ने जो दिखाया है उसने तेलंगाना की हत्या कर दी है। तेलुगू अस्मिता की हत्या कर दी है। जो दिखाया जा रहा है उसके बारे में हमें मध्यस्थों के द्वारा जानकारियां मिलती रही हैं । अब सही और गलत क्या है ,इसके बीच अंतर करना मुश्किल हो गया हैं। तेलंगाना-आंध्र  की इमेजों में विभाजनकारी अनुकरण का प्रबल भाव है। इनमें सुनिश्चित पहचान नहीं ह इन इमेजों के अर्थ ऑडिएंस के संदर्भ पर निर्भर करते हैं। टीवी इमेजों और संकेतों के जरिए हम जो भी ग्रहण करते हैं वह यूटोपिया है।
    तेलंगाना का संकेत सभी किस्म के संदर्भों की मौत की सूचना है। वादी और प्रतिवादी का टीवी रिप्रिजेंटेशन सभी किस्म के अनुकरण को निगल गया है। तेलंगाना की इमेज बुनियादी यथार्थ का प्रतिबिम्वन है। लेकिन टीवी में वह बुनियादी यथार्थ अपने को पलटता है।उसे मुखौटे प्रदान करता है।ह बुनियादी यथार्थ की अनुपस्थिति का मुखौटा है। उसका किसी भी किस्म के यथार्थ से कोई संबंध नहीं है। यह फेक का शुध्द अनुकरण है।
आज के युग की सबसे बड़ी चुनौती वस्तुगत यथार्थ नहीं है। बल्कि वस्तुगत भ्रम सबसे बड़ी चुनौती हैं।हम रहते हैं 'रीयल टाइम' में और गूंज हमेशा 'बीते हुए समय' की रहती है।आज हम वस्तुगत भ्रमों को स्वीकार करते है,वस्तुगत यथार्थ को नहीं। कॉमनसेंस क समझदारी को हम वास्तव समझ मानने लगे हैं। यह सबसे बड़ी कमजोरी है। तेलंगाना पर कामनसेंस के आधार पर फैसला लिया गया। यह फैसला राज्य बनाने के सभी वैध तरीकों को दरकिनार करके लिया गया। यह भारत नपुंसक राजनीति की सबसे घिनौनी अभिव्यक्ति है।
अब तक कांग्रेस और भाजपा  तेलंगाना के पक्ष में नहीं थे उनका मन अचानक चन्द्रशेखर राव के 11 दिन के आमरण अनशन ने बदल दिया। इन दोनों दलों ने अभी तक अपने नीतिगत बदलाव के कारण नहीं बताए हैं।  खासकर कांग्रेस और भाजपा का बदला हुआ रुख बुनियादी रुप से गलत है। ये दोनों दल  अब जो कह रहे हैं से व्यवहार में मानते नहीं हैं। ये लोग वास्तव जिंदगी के प्रमाणों पर विश्वास नहीं करते।वे जिस यथार्थ की बात करते हैं।उसमें जीते नहीं हैं।
     हमें याद रखना चाहिए कि आम लोगों की आशाएं सिर्फ यथार्थ में ही होती हैं। यथार्थ का चैरीटेबिल मंशाओं के तहत चित्रण संभव नहीं है। यथार्थ फैशन नहीं है। यह आम आदमी की जिन्दगी की जरूरत है। उसकी जिन्दगी की प्राणवायु है। जो लोग आम आदमी से उसका आंध्र यथार्थ छीनने में लगे हैं उनसे सवाल किया जाना चाहिए कि आंध्र यथार्थ यदि अप्रासंगिक हो गया है। इसका अंत हो गया है तो यह बात विगत लोकसभा चुनाव के समय क्यों नहीं सोची गयी। आज चन्द्रशेखर राव के आमरण अनशन के चोर दरवाजे से तेलंगाना पाने का षडयंत्र किया जा रहा है। आम आदमी से आंध्र यथार्थ को छीनने की कोशिश क्यों की जा रही है ? तेलंगाना की फेक टीवी इमेजों से आम आदमी के जीवन यथार्थ को घेर दिया गया है यह असल में आंध्र यथार्थ के प्रति तिरस्कारभाव है।
आंध्र विभाजित न हो यह हाल में सम्पन्न लोकसभा-विधानसभा चुनाव का फैसला है उसे टीवी प्रसारणों और आमरण अनसन से  बदला नहीं जा सकता। भारत का लोकतंत्र चैनलों और नपुंसक राजनीति का गुलाम नहीं है।  लोकतंत्र  को टीवी चैनलों के यहां बंधक नहीं रखा जा सकता,नेता चैनलों के बंधुआ हैं आंध्र की जनता नहीं। आंध्र की जनता का मौजूदा आक्रोश ग्लोबल चैनलों की गुलामगिरी के खिलाफ  लोकतंत्र के हित में की गयी बगावत है।
      
   

2 टिप्‍पणियां:

  1. इस आंदोलन को जितना टीवी चैनलों ने उछाला है, उससे लगता है कि यदि साठ के दशक में टीवी चैनल होते तो हैदराबाद में सिविल वार निश्चित था। शुक्र है हम बच गए:)

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  2. Media ki nakaratmak bhumika ko rekhankit karta upayukta lekh likha hai aapne.Kripya Telangana aur anya rajyo ki maango ko lekar ho rhe dangal par vistar se likhen- tathyo aur satyo ko janne ki utsukta hai.

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