सोमवार, 7 दिसंबर 2009

मीडिया का नया सच




         मीडिया के बारे में हम आज भी तथ्यों के आधार पर कम और कल्पना के आधार पर ज्यादा बोलते हैं। मीडिया का पहला सुख है कि उसने सच को छीन लिया है। कल्पना और अतिरंजना में खूब सोचने लगे हैं। मीडिया में आना सुख और दुख देता है। मीडिया में आने के बाद जैसे थे वैसे नहीं रहते। इस अर्थ में मीडिया अस्मिता को बदलता है। हिन्दी का मीडिया बाजार के लिहाज से बड़ा है,रचनात्मकता और गुणवत्ता के लिहाज से अभी भी अविकसित है। मीडिया का मुनाफा बढ़ा है सामाजिक जिम्मेदारी घटी है। बड़ा मीडिया छोई खबर,छोटे को बड़ा और बड़े को छोटा बना रहा है। 

 आजादी के पहले और आजादी के बाद ,प्रिंट और फिल्म का स्वामित्व भूमंडलीकरण के बाद । भूमंडलीकरण के पहले मध्यवर्ग,व्यापारी और माफिया-तस्कर पूंजी का स्वामित्व। गैर-पूंजीपतिवर्ग की पूंजी का स्वामित्व था। भूमंडलीकरण्ा के बाद स्वामित्व के चरित्र में बदलाव आया । देशी और विदेशी पूंजीपतिवर्ग की पूंजी का निवेश बढ़ा है। खासकर विदेशी पूंजी निवेश बढ़ा है। हिन्दी की प्रतिष्ठा बढ़ी है किंतु पठन-पाठन का स्तर गिरा है।


 विगत साठ सालों में देशी भाषाओं का आधार घटा है। आज जिस हिन्दी को हम जानते हैं यह मीडिया की हिन्दी है, यह साहित्य की हिन्दी नहीं है। मीडिया की हिन्दी मूलत: बम्बईया हिन्दी है। अथवा दैनन्दिन प्रयोग की हिन्दी है। हिन्दी का संदर्भ आज साहित्य नहीं है बल्कि मीडिया है,फिल्म,टीवी और विज्ञापन हैं।


 विगत साठ सालों में देशी भाषाएं मरी हैं। मीडिया बढ़ा है। मीडिया का बढना भाषा की समृध्दि का प्रतीक नहीं हो सकता। रूस इसका आदर्श उदाहरण है। पैरोस्त्रोइका के पहले और बाद में रूस में भाषा स्थिति के परिवर्तन को देखें ।


  विश्व में विगत दो सौ सालों में तकरीबन चार हजार भाषाओं की मौत हुई है। अब मात्र छह हजार भाषाएं रह गयी हैं। इनमें से भी अनेक भाषाएं जल्द ही गायब हो जाएंगी। ये आंकड़े मानवविकास रिपोर्ट 2004 के हैं। भारत में हिन्दी के विकास पर जोर देने के कारण हिन्दीभाषी क्षेत्र की भाषा और बोलियों के अस्तित्व के लिए खतरा पैदा हुआ है। देशज भाषाओं की संरचनाओं के विकास पर ध्यान ही नहीं दिया गया। विज्ञापन और रेडियो ने मिश्रितभाषा का नया संसार बनाया है। इससे भाषायी द्वेष घटा है। हिन्दी का मीडिया की वर्चस्वशाली भाषा के रूप में विकास करने में फिल्म,टीवी और विज्ञापनों की बड़ी भूमिका है।



    फिक्की के अनुसार मीडिया बाजार आगामी 2015 तक 200 विलियन डालर का होगा। यानी 18.1 फीसद की विकास दर रहेगी। फिक्की के अनुसार सन् 2007 में मनोरंजन और मीडिया उद्योग 513 बिलियन डालर का था, जबकि सन् 2006 में 438 बिलियन डालर था। फिक्की का अनुमान है कि सन् 2012 तक मीडिया उद्योग 1,157 ट्रिलियन डालर हो जाएगा।  दूसरी ओर मीडिया का डिजिटलाईजेशन हो रहा है। इससे मीडिया की लागत और वितरण में कमी आएगी। फिक्की के अनुसार मीडिया में 8.5 बिलियन डालर का निवेश होगा।


    आज हम इलैक्ट्रोनिक मीडिया के युग में हैं। इलैक्ट्रोनिक मीडिया और बहुजातीयता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। प्रेस और इलैक्ट्रोनिक मीडिया के संदर्भ में अंतर है। दोनों सामाजिक तौर पर अव्यवस्था पैदा करते हैं।  नए युग का नारा है '' मेरा जूता है जापानी ,ये पतलून इंग्लिस्तानी,सर पर लाल टोपी रूसी फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी।'' यानी सर्जनात्मकता और सम्मिश्रण का युग है। यह बहुजातीय रचनात्मकता का युग है। इसका पहले वाली सर्जनात्मकता से अंतर है। यही नए मीडिया का मंत्र है।


किताब के आगमन का अर्थ है कानों के युग का जाना और आंखों के युग में आगमन,अब सुना हुआ नहीं देखा हुआ प्रमाण है। किताब ने हमें शब्दों में कैद रखा,समग्रता में देखने से वंचित किया। क्रमबध्द और तार्किक ढंग से सोचने पर जोर दिया। अब अनुभूति का स्रोत चाक्षुष है अनेक संवेदनाएं हैं। पहले प्रेस था अब मल्टीमीडिया का संदर्भ है। पहले प्रेस का संदर्भ था आज कम्प्यूटर और उपग्रह का संदर्भ है।  

    इराक युध्द का कवरेज हठात् तेजी से कम ह® गया है। Pew Project for Excellence in Journalism study, के अनुसार  अगस्त 2007 से लेकर फरवरी 2008 के बीच में इराक युध्द के समाचारों का आउटपुट 15 फीसद से घटकर 3 फीसद ह® गया है। विगत अगस्त में पाठक® से पूछा गया था कि अमरीका के कितने सैनिक मारे गए त® 50 फीसद ने सही जबाव दिया जबकि अब यह संख्या घटकर 28 फीसद रह गयी है। सन् 2007 के आरंभ में डेमोक्रेटिक पार्टी ने कांग्रेस के लिए जिस तरह चुनाव प्रचार किया था उसके कारण इराक युध्द का कवरेज चरम पर था। किंतु ज्योंही वे चुनाव जीते और राष्ट्रपति बुश ने सैन्य फंड की जंग जीती सारा कवरेज नीचे चला गया। इसके अलावा इराक में सैनिकों का संख्या में इजाफा किया गया और कवरेज नीचे आ गया।

1 टिप्पणी:

  1. किताब ने हमें शब्दों में कैद रखा,समग्रता में देखने से वंचित किया।

    पर किताब के पक्ष में तो यही तर्क दिया जाता है की यह आपको प्रमाणिक और परिदृश्य दिखाती है. एक इंसान का सच उतना ही होता है
    जितना उसने जिया होता है या आसपास घटित होते देखा होता है. पुस्तकें पढने से आप अलग दृष्टिकोण से अपने अनुभवों के अर्थ तलाश पाते हैं.

    किताबें अगर समग्रता से वंचित करती हैं तो कौन सा माध्यम हमें समग्रता दिलाता है?

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