गुरुवार, 17 दिसंबर 2009

इस्लाम,मध्यपूर्व ,बहुराष्ट्रीय कारपोरेट मीडिया और एडवर्ड सईद -4-




यह सच है इसलामिक आतंकवादी ग्रुप इसलामिक जगत के बाहर रहकर आतंकवादी हरकतें कर रहे हैं और ये अकेले ऐसे ग्रुप हैं जो अपने देश के बाहर सक्रिय हैं।  किंतु इन ग्रुपों की रिपोर्टिंग करते हुए पूरे देश को उनके साथ नत्थी करके पेश किया जाता है, उन ग्रुपों की स्वायत्त रूप से प्रस्तुति नहीं की जाती। इस तरह की प्रस्तुतियों के बहाने ही इजरायल अपने हमलों को वैधता प्रदान करता है। मध्यपूर्व के संप्रभु देशों पर हमले करता रहा है , फिलीस्तीनी जनता के स्वाधीनता संग्राम को बदनाम करता रहा है और फिलीस्तीनी जनता पर बर्बर हमले करता रहा है। आतंकवाद के खिलाफ युध्द के नाम पर इजरायल ने 1982 में बेरूत सहित समूचे लेबनान पर हमला किया और लंबे समय तक लेबनान की जमीन पर कब्जा बनाए रखा,यही स्थिति फिलीस्तीनियों की जमीन की भी है।
         सईद के अनुसार अमरीका का मुख्यधारा का मीडिया आतंकवाद के रेहटोरिक का इस्तेमाल करते हुए असल में यह संदेश देता है कि जिस बात को अमरीका की स्वीकृति हासिल नहीं है वह आतंकवाद है। आतंकवाद संबंधी मीडिया प्रस्तुतियों में अमूमन नस्लवादी स्टीरियोटाईप का संप्रेषण किया जाता है। आतंकवाद के बारे में जितने भी व्याख्याकार आते हैं वे आमतौर पर पश्चिम के होते हैं और उनके संदर्भ में मूलत: अरब और इस्लाम होता है। यहां तक कि सलमान रूशदी तक को गलत ढ़ंग से पेश किया जाता है। भारत और पाकिस्तान की नकारात्मक छवि की प्रस्तुतियों के संदर्भ में रूशदी को ब्रिटिश मीडिया विकृत और नकारात्मक रूप में पेश करता है।
        मीडिया में दोनों ओर की हिंसा की प्रस्तुतियों में असंतुलन नजर आता है। अमरीकी और इजरायली मीडिया सिर्फ एक ही तरफ की हिंसा की रिपोटिंग करता है,वे सिर्फ फिलीस्तीन हिंसा की रिपोर्टिंग करते हैं, इजरायली हिंसा की रिपोर्टिंग नहीं करते। फिलीस्तीन हिंसा और इजरायली हिंसा को एकमेक नहीं किया जा सकता। फिलीस्तीन हिंसा का संबंध उनकी आत्मरक्षा  और अपने देश को पाने के संघर्ष से है। जबकि इजरायली हिंसा राज्य की हिंसा है और इसका लक्ष्य है फिलीस्तीनियों की जमीन पर अवैध कब्जा जमाए रखना और फिलिस्तीनी जनता को उनके मानवाधिकारों से वंचित करना। इजरायली राज्य के द्वारा फिलीस्तीन जनता पर देश के अंदर और बाहर किए जा रहे अत्याचारों को अमरीकी मीडिया पेश करने में असफल रहा है। हिंसा की यदाकदा पेश की गई रिपोर्टिंग के जरिए यह तथ्य सामने नहीं आता कि फिलीस्तीन जनता ने अपने ऊपर किए जा रहे हमलों का प्रतिवाद करते हुए जबावी कार्रवाई की है। इजरायली एक्शन के जबाव में कार्रवाई की है। इजरायल के द्वारा फिलीस्तीन की जनता की जमीन पर अवैध रूप से कब्जा जमाया हुआ है,उसके खिलाफ लोगों के साथ जो भी झगड़ा होता है उसे प्रेस कभी-कभार चुनिंदा रूप में संप्रेषित करता है। जबकि इजरायल के हमलों को पूरी तरह छिपा लिया जाता है। इसे सईद ने पत्रकारिता के इतिहास में तथ्य छिपाने की सबसे बड़ी घटना माना है। इसी क्रम में अमरीकी उदारतावादी विचारकों में से अधिकांश के दुरंगे ,कायर विचारों और पाखण्डी चरित्र की सईद ने जमकर आलोचना की है। इसी संदर्भ में सईद ने लिखा था  बुध्दिजीवियों की मुख्य भूमिका है सत्ताा के सामने सत्य को अभिव्यक्ति करना। 
    अमरीकी मासमीडिया लगातार 'शत्रु' या 'अन्य' या 'तुम' की तलाश में रहता है। 'शत्रु' निर्मित करता रहता है। 'शत्रु' पैदा करने का सिलसिला लगातार यह आभास देता है कि अमरीकी शासन को खतरा है, अमरीकी समाज को खतरा है। इस खतरे से मुक्ति के लिए सैन्य हस्तक्षेप जरूरी है। निरंतर 'शत्रु' को बनाए रखना सैन्य-मीडिया उद्योग की प्रमुख रणनीति है। 'शत्रु' के बने रहने से सैन्य-मीडिया उद्योग को जबर्दस्त मुनाफा मिलता रहा है।
       मीडिया इमेजों में एक तरफ अमरीकी  'साम्राज्य' की इमेज रहती है दूसरी ओर 'आतंकवादी' की इमेज रहती है। आतंकवादी की इमेज सीमा का अतिक्रमण कर जाती है। 'शत्रु' अथवा 'अन्य' की इमेज निर्मित करते समय उसके अर्थ को वर्चस्वशाली विचारधारा के इर्दगिर्द बुना जाता है।  वर्चस्वशाली विचारधारा की रोशनी में ही 'अन्य' को पुनर्परिभाषित किया जाता है। उसके आधार पर कृत्रिम यथार्थ निर्मित किया जाता है। यह निर्मित यथार्थ ही है जो हम तक पहुँचता है। 'शत्रु' की इमेज निर्मित करते समय उसके स्थानीय समर्थकों को भी लपेटे में ले लिया जाता है जिससे उन्हें स्थानीय स्तर पर अलग- थलग डाला जा सके। 'शत्रु' की इमेज को निरंतर बनाए रखने का प्रधान लक्ष्य है सैन्य उद्योग के लक्ष्यों को हासिल करना।
     'शत्रु' की इमेज निरंतर युध्द का वातावरण बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी है। 'शत्रु' की इमेजों के निर्माण और संप्रेषण में भाषा और चित्रों की बड़ी भूमिका होती है। 'शत्रु' की इमेज का प्रचार उस समय और भी ज्यादा दिखाई देता है जब अंतर्राष्ट्रीय स्तर का संकट आता है। ऐसी अवस्था में शत्रु को कभी 'ग्रुप' में और कभी 'ग्रुप' के बाहर पेश किया जाता है। इस संदर्भ में मानक आधार के तौर पर अमरीकी विदेशनीति को आधार बनाया जाता है। विदेशनीति के आधार पर ही 'शत्रु' परिभाषित किया जाता है, उसकी प्रतीकात्मक पहचान तय की जाती है। प्रतीकात्मक पहचान के आधार पर ही शत्रु की इमेजों को मीडिया प्रस्तुतियों में पेश किया जाता है। मीडिया में प्रस्तुत इमेजों को सांस्कृतिक उपभोग का माल बनाया जाता है। यह सारा काम लोकतंत्र के चौथे खंभे के तौर पर मीडिया करता है।
       मीडिया के विचारधारात्मक विश्लेषण का गहरा संबंध अर्थों की व्यवस्था से है।  वही इसको बांधने वाली शक्ति है। यह भी देखना चाहिए किनका वर्चस्व है और जो ग्रुप संघर्ष कर रहे हैं वे किसके हितों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यही वजह है  मीडिया के पाठ को विशेष ऐतिहासिक संदर्भ में ही पढ़ा जाना चाहिए। विचारधारात्मक मूल्यांकन का लक्ष्य है मीडिया इमेजों में आए परिवर्तनों का अध्ययन करना। अंतर्वस्तु का विश्लेषण करते समय सतह पर दिखने वाले अर्थ और अन्तर्निहित अर्थ दोनों का ही मूल्यांकन करना । खबरों को उद्धाटित करके पढ़ना ,डिकोड करके पढ़ना चाहिए। खासकर खबर के साथ अप्रत्यक्षभाव से सक्रिय साम्प्रदायिक अथवा नस्लीवादी अर्थ को भी उद्धाटित करना ।
      हमें यह भी देखना चाहिए कि खबरों, रेहटोरिक और चित्रों की प्रस्तुतियों में कोई संबंध है या नहीं ? इस मामले में प्रतीकशास्त्र हमारी मदद कर सकता है। चिन्हशास्त्र के आधार पर मीडिया इमेजों को ज्यादा व्यवस्थित ढ़ंग से विश्लेषित किया जा सकता है। इस क्रम में जहां इमेजों का अर्थ उद्धाटन होगा, वहीं दूसरी ओर मीडिया ऑडिएंस की मनोदशा और मीडिया व्याख्याकारों के नजरिए को भी विश्लेषित करने में मदद मिलेगी। इसी तरह जब आप स्टील फोटोग्राफ का मूल्यांकन करें तो वह महत्वपूर्ण नहीं है जो दिखाई दे रहा है बल्कि यह देखना चाहिए कि संबंधित फोटोग्राफ किस तरह के सांस्कृतिक संबंधों के साथ जोड़कर पेश किया जा रहा है। इस क्रम में रंग,अवस्थिति,हावभाव,कायिक संचालन,कैमरा की अवस्था आदि सबका अध्ययन किया जाना चाहिए।
    (लेखक- जगदीश्वर चतुर्वेदी,सुधा सिंह) 

1 टिप्पणी:

  1. तो फिर, इस्लामी देश इनकी मज़्ज़म्मत क्यों नहीं कर रहे है, अमेरिका के ‘दुष्प्रचार’ को क्यों नहीं नकार रहे हैं???

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