शनिवार, 5 दिसंबर 2009

शीतयुध्द के बाद मीडिया की भूमिका - 1-

          
शीतयुध्द की समाप्ति के बाद तनाव,युध्द और सामाजिक विपत्ति का रूप बुनियादी तौर पर बदला है। साथ ही सन् 1980 से लेकर 2008 तक के दौर में मीडिया के क्षेत्र में भी अनेक मूलगामी परिवर्तन हुए हैं। नए मीडिया ने नयी संचार संभावनाओं के द्वार खोले हैं। आज जितनी संचार संभावनाएं हैं उतनी पहले कभी नहीं थीं। आज युध्द,तनाव,दंगा,जातीय संघर्ष आदि की परिभाषाएं नए सिरे से तय की जा रही हैं। मीडिया की भूमिका के बारे में पुनर्विचार किया जा रहा है। सामाजिक विपत्ति व्यापक अर्थ में ''तनाव प्रबंधन'' है।
   शीतयुध्दोत्तर दौर में बहुराष्ट्रीय शांति सेनाओं की स्थापना, राजनीतिक हस्तक्षेप और झूठे बहाने से हमले बढ़े हैं। इस कार्य में मीडिया ने सक्रिय मदद की है। कोसोवो से लेकर इराक तक इस फिनोमिना को देखा जा सकता है। द्वितीय विश्वयुध्द की समाप्ति के बाद विभिन्न देशों में आंतरिक तनाव थे। किंतु ये तनाव उस देश विशेष की सीमा तक सीमित थे। किंतु शीतयुध्द के बाद इन तनावों का अंतर्राष्ट्रीय असर देखा गया।
      मसलन् आतंकवाद था और उससे लड़ने के प्रयास आंतरिक स्तर तक सीमित थे। किंतु शीतयुध्द के बाद स्थिति ने पलटा खाया और अब प्रत्येक तनाव अंतर्राष्ट्रीय है। शीतयुध्द के पहले गृहयुध्द में आमतौर राज्य का हाथ होता था,और दूसरी ओर  कम से कम एक गुट गैर-राजकीय शक्तियों का भी सक्रिय रहता था। किंतु शीतयुध्द के बाद बाहरी शक्तियों की भूमिका अचानक बढ़ गयी। अब विपत्ति क्षेत्र विशेष तक सीमित नहीं रहती बल्कि उसके नाम पर अंतर्राष्ट्रीय धु्रवीकरण और एक्शन भी होने लगे हैं।
    मसलन् भारत के गुजरात राज्य में दंगे हुए ,किंतु गुजरात के दंगों के बहाने अमरीका ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रति जिस रूख को व्यक्त किया वह किसी भी तर्क के आधार पर स्वीकार्य नहीं है। इराक में सात लाख से ज्यादा निर्दोष लोगों की हत्या में अमरीकी प्रशासन शामिल है किंतु भारत सरकार ने यह नहीं कहा कि हम अमरीका के राष्ट्रपति को भारत नहीं आने देंगे। जबकि नरेन्द्र मोदी को गुजरात के दंगों के आधार पर अमरीका जाने की अनुमति नहीं दी गयी।
    शीतयुध्द के दौर में आंतरिक झगडों का लक्ष्य था स्थानीय प्रशासन पर नियंत्रण स्थापित करना। ऐसे संघर्षों का लक्ष्य लोकतंत्र स्थापित करना नहीं था। (दक्षिण अफ्रीका के स्वाधीनता संग्राम और फिलीस्तीन के मुक्ति संग्राम को छोड़कर) इस तरह के संघर्षों में साधारण जनता को सीधे निशाना बनाया गया और बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ। यह स्थिति सन् 1971 के भारत-पाक युध्द से लेकर निकारागुआ में सेंदनिस्ता के पराभव के दौर में देख सकते हैं। शीतयुध्द के बाद स्थिति में गुणात्मक परिवर्तन आया है।
     शीतयुध्दोत्तर काल में जनता को निरंतर विस्थापन ,उत्पीडन ,अभाव , शारीरिक एवं मानसिक वैचारिक हमलों के बीच रहना होता है। एक ही वाक्य में 'मनोवैज्ञानिक युध्द और हिंसा'' में रहना पड़ता है। इस प्रक्रिया में जनता के एटीट्यूट और नजरिए को प्रभावित करने की कोशिश की जाती है। संकट को बरकरार रखा जाता है। यह जनता के 'हृदय और दिमाग' को सम्मोहित  की कला है। इस कार्य में मीडिया महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।
      शीतयुध्द के दौरान विवादित क्षेत्र में दोनों पक्षों की सेनाओं के बीच युध्द होता था। मालूम था शत्रु कौन है ? युध्द कैसे लड़ा जाना है। मसलन् नागालैंड में लालडेंगा का गुट था, जो हथियारबंद जंग चला रहा था। असम गण संग्राम परिषद नामक संगठन असम में अकेला पृथकतावादी संगठन जंग चला रहा था। यही स्थिति आरंभ में पंजाब में थी।  किंतु कालान्तर में इन सभी इलाकों में अनेक पृथकतावादी संगठन पैदा हो गए। असम और कश्मीर आदर्श उदाहरण हैं वहां एकाधिक संगठन पृथकतावादी और आतंकवादी संघर्ष चला रहे हैं।
       शीतयुध्दोत्तर दौर में राज्य के खिलाफ जंग करने वाले विकेन्द्रित रूप में संघर्ष करते नजर आते हैं, अनेक गुट संघर्ष करते नजर आते हैं। तनाव क्षेत्रों में राज्य और गैर-राज्य की शक्तियों के बीच तनाव में गैर राज्य की शक्तियां ज्यादा ताकतवर नजर आती हैं। सैन्य शक्ति के लिहाज से वे राज्य के सामने बौनी होती हैं। आकस्मिक हिंसाचार के जरिए आतंकी और पृथकतावादी संगठन आम जीवन में वर्चस्व कायम करने में सफल हो जाते हैं और राज्य की संरचनाओं को पंगु बनाती हैं। फलत: तनाव के क्षेत्रों में गैर राज्य की शक्तियों का वर्चस्व स्थापित हो जाता है। कोई भी व्यक्ति सुरक्षा और जानमाल की क्षति के भय के कारण उनके खिलाफ एकशब्द तक नहीं बोलता।
    गैर राज्य की शक्तियां रंग-बिरंगे मुखौटे लगाकर अपने प्रभाव का विस्तार करती हैं। निरंतर आतंकी कार्रवाईयों के जरिए स्थानीय पुलिस और सैन्यबलों में अपने घुसपैठिए तैयार करते हैं। स्थानीय अपराधी गिरोह,भाड़े के सैनिकों और निजी सेनाओं आदि की मदद लेते हैं। इस समूची राजनीतिक प्रक्रिया को कहीं 'अस्मिता राजनीति', 'स्वतंत्र राष्ट्र' , 'जनतंत्र की स्थापना' आदि नाम से चलाया जाता है। इन  विवादों के  अंतर्राष्ट्रीय आयाम हैं।  ये संघर्ष कभी स्थानीय रसद की मदद के आधार पर नहीं लड़े जाते। पहले इन संघर्षों में मीडिया की न्यूनतम भूमिका थी,किंतु शीतयुध्दोत्तार दौर में मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण है।
    पहले राजनीतिक जंग ज्यादा होती थी । कालान्तर में हथियारों,गोलाबारूद,बंदूक आदि का प्रयोग बढ़ा। पहले राजनीतिक कार्यकर्त्त थे, राजनीतिक आंदोलन होते थे किंतु धीरे धीरे राजनीतिक आंदोलन में हथियारों और भाड़े के सैनिकों की भूमिका बढ़ी। इन सबके लिए बड़े पैमाने पर रसद जुटाने का काम अमरीका ने किया, तो कहीं पर फ्रांस ,जर्मनी,ब्रिटेन आदि ने किया।
     आज सारी दुनिया में अमरीका ने विकास और लोकतंत्र के नाम पर हंगामा किया हुआ है। इस हंगामे की ओट में वह सक्रिय तौर पर अरबों डालर पृथक्तावादी ताकतों को संसाधन मुहैयया कराने पर खर्च कर रहा है। अमरीका के द्वारा घोषित और अघोषित तौर पर सैन्य और आर्थिक मदद मुहैयया कराने के लिए सीआईए से लेकर लोकतंत्र स्थापना करने वाली कमेटियां सारी दुनिया में सदल-बल काम कर रही हैं।आधिकारिक तौर पर अमरीकी बजट प्रस्तावों में इस तरह के खर्चे के प्रावधान रहते हैं।
        

1 टिप्पणी:

  1. ‘मसलन् आतंकवाद था और उससे लड़ने के प्रयास आंतरिक स्तर तक सीमित थे। किंतु शीतयुध्द के बाद स्थिति ने पलटा खाया और अब प्रत्येक तनाव अंतर्राष्ट्रीय है।’

    इससे तो अच्छा तो शीतयुद्ध युग था। दोनों देश समझ लेते और अन्य देश दंश से बच जाते:)

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