शनिवार, 19 दिसंबर 2009

इस्लाम,मध्यपूर्व ,बहुराष्ट्रीय कारपोरेट मीडिया और एडवर्ड सईद -7-




मीडिया की स्टीरियोटाईप प्रस्तुतियों के संदर्भ में रिचर्डस दियेर का जिक्र करना समीचीन होगा। दियेर ने लिखा विविध, स्मरणयोग्य और सहज स्वीकार्य और स्वीकृत बनाने में  स्टीरियोटाईप मदद मदद करते हैं।  स्टीरियोटाईप का पहला लक्षण है भेदों को संकुचित रूप में पेश करना,जिससे भेद स्वाभाविक और सारवान लगें। इस आधार पर टीवी में मध्यपूर्व की सरलीकृत इमेजों में पेश किया जाता है।


      अरबों की नकारात्मक इमेज पेश की जाती है। उन्हें गुस्सैल,हिंसक,असभ्य आदि रूपों में पेश किया जाता है। स्टीरियोटाईप प्रस्तुति का दूसरा प्रधान लक्षण 'बंटा हुआ' या 'टुकड़ा टुकड़ा' यथार्थ है। इसके आधार पर अरबों को सांस्कृतिक अंतरों के आधार पर व्याख्यायित किया जाता है। उन्हें धार्मिक तत्ववादी,आत्मघाती बमबाज,नाच गाने में मगन रहने वाला,ऐययाश,अरबपति-करोड़पति कामुक शेख, जो अमरीका आता ही है ज्यादा से ज्यादा औरतों के साथ संभोग करने के लिए। इस तरह की सांस्कृतिक प्रस्तुतियां स्वयं में सांस्कृतिक भेदों को संप्रेषित करती हैं। पश्चिम के साथ सांस्कृतिक सीमाओं को उजागर करती हैं। 


असल में मीडिया के द्वारा 'अन्य' का विभाजन के उपकरण के तौर पर व्यापक रूप में इस्तेमाल किया जाता है। उसे सामाजिक और प्रतीकात्मक व्यवस्था में भेद स्थापित करने के उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। ऐतिहासिक नजरिए से इस तरह का 'अन्यत्व' अस्वस्थ,असामान्य और अस्वीकार्य होता है। इसे सुधारने,बुनियादी परिवर्तन करने अथवा बदलने की जरूरत होती है।
        
   स्टीरियोटाईप प्रस्तुतियों में जातीयकेन्द्रित प्रस्तुतियों के बहाने सांस्कृतिक और राजनीतिक एजेण्डे को आगे बढ़ाया जाता है। इसे सत्ता के गतिशील संबंधों और सांस्कृतिक अन्तर्क्रियाओं के जरिए ही समझा जा सकता है। 'भिन्नता' के नजरिए से जब जातीयकेन्द्रित समझ को पेश किया जाएगा तो पहला काम तो यह होगा कि भिन्नता को वैधता मिलेगी दूसरा परिणाम निकलेगा कि अन्य के ऊपर वह अपना एजेण्डा थोपने में सफल हो जाएगा। इराक पर सन् 2003 में हमला करने के पहले अमरीकी मीडिया के द्वारा ऐसी इमेजों की वर्षा की गई जिससे इराक को बर्बर,भ्रष्ट और असहिष्णु शासक से मुक्त कराने की भावना पैदा हो,इराक पर हमले को आम जनता स्वाभाविक और अनिवार्य कार्रवाई के रूप में ग्रहण करे।
     
    मध्यपूर्व की मीडिया प्रस्तुतियों के संदर्भ में सबसे बड़ा संदर्भ सूत्र हॉलीवुड हो सकता है। हॉलीवुड सिनेमा अपने आरंभ से ही मध्यपूर्व की औरतों के बारे में घटिया प्रस्तुतियों के लिए प्रसिध्द रहा है। अरब औरतों को अमानवीय और कामुक माल के रूप में पेश किया गया। यह नजरिया उन्हें 18वीं और 19वीं शताब्दी के यूरोपीय लेखकों से मिला है। 


     हॉलीवुड सिनेमा में अरब औरत समर्पित और कामुक नजर आती है। औरत के प्रति इस तरह का स्टीरियोटाईप यूरोपीय संस्कृति का उत्पादन है जिसे सीधे हॉलीवुड ने आत्मसात कर लिया है। हॉलीवुड की फिल्मों में अरब औरतों की प्रस्तुतियों के बारे में अनुसंधान का कार्य 1960 से आरंभ होता है। इस क्रम में जिस तरह के निष्कर्ष निकले हैं उन पर गौर करने की जरूरत है। 


    हॉलीवुड फिल्मों में आमतौर पर अरब औरत हमेशा हिंसा,सेक्स और दमन करती नजर आती है। इसमें तयशुदा चरित्र होते हैं,जैसे तलवार और चंदन की साबुन के साथ अरब औरत,संगीतात्मक कॉमेडी में अरब औरत, जादुई कल्पनाओं के रूप में अरब औरत, ऐतिहासिक कहानियों में अरब औरत, आतंकवादियों के साथ अरब औरत, ज्यादातर फिल्मों में मूर्खतापूर्ण कार्यों में उसे सक्रिय दिखाया जाता है। अरब औरत को लगातार घटिया और पूर्णत: पुनरावृत्तिमूलक रूपों में संकुचित इमेजों में पेश किया जाता है।
          
   भूमंडलीकरण के कारण तीसरी दुनिया और खासकर मध्यपूर्व का एजेण्डा भी बदला है। मध्यपूर्व में राष्ट्र-राज्य कमजोर हुआ है। राष्ट्रीय संभुता को क्षति पहुँची है। ग्लोबल संस्कृति के अबाध प्रक्षेपण ने स्थानीय संस्कृति को गंभीर चुनौतियां दी हैं। राष्ट्रीय अस्मिता को निशाना बनाया  है और इसके लिए ग्लोबल मिथों का तेजी से मीडिया के जरिए सांस्कृतिक प्रक्षेपण चल रहा है। नए सिरे से विचारधारात्मक वर्चस्व स्थापित करने के लिए उपनिवेशवाद के पक्ष में दलीलें दी जा रही हैं। पश्चिमी सभ्यता और इस्लाम के बीच में टकराहट को सभ्यताओं के संघर्ष के रूप में चित्रित किया जा रहा है। इस तरह की प्रस्तुतियों के तार कहीं न कहीं 'नाइन इलेवन' की घटनाओं से भी जुड़ते हैं।
    
    'नाइन इलेवन' का सारा प्रचार अभियान विश्व सुरक्षा और आतंकवाद के दमन के नाम पर शुरू किया गया। 'नाइन इलेवन' की आतंकी घटना को अलकायदा जैसे इस्लामिक आतंकी संगठन से जोड़कर पेश किया गया, इसके कारण इस्लाम और मुसलमानों को आतंकवाद के स्रोत के रूप में चित्रित करने में सुविधा हुई। अफगानिस्तान और इराक का युध्द उसका प्रत्यक्ष परिणाम है।


       मध्यपूर्व में किए जा रहे संघर्ष का उसकी मीडिया इमेजों के साथ संबंध है। रणनीतिक तौर पर मध्यपूर्व को महत्वपूर्ण क्षेत्र घोषित कर दिया गया है। रणनीतिक महत्व का होने के कारण इस क्षेत्र में अमरीका का वर्चस्व बनाकर रखना बेहद जरूरी है। वर्चस्व बनाए रखने का प्रधान कारण है मध्यपूर्व में कच्चे तेल का अगाध भंडार का होना। यही वो बुनियादी संदर्भ था जिसमें 1948 में इजरायल अस्तित्व में आया और यही इजरायल है जो बार-बार मध्यपूर्व में सभी समस्याओं के केन्द्र में है और विस्फोट करता रहता है।


   इजरायल के साथ अरब मुल्कों के अनेक युध्द हुए हैं और उन्हें व्यापक जन,धन और संपत्ति की हानि उठाने के साथ अपने संप्रभु राष्ट्र के रूप में अस्तित्व बनाए रखने के लिए भी खतरा पैदा हो गया है। आज स्थिति यह है कि अरब-इजरायल का झगड़ा जब तक बना रहता है इस क्षेत्र में कभी शांति नहीं लौट पाएगी।
  
पश्चिमी मीडिया का मध्यपूर्व के प्रति किस तरह का रूख है उसे समझने के लिए उनकी समाचार प्रस्तुतियों पर गौर करना समीचीन होगा। पश्चिमी मीडिया समाचारों में आमतौर पर मध्यपूर्व की खबरों को अन्य विषयों की तुलना में बहुत कम जगह मिलती है। यह स्थिति तब होती है जब वे मध्यपूर्व की खबरों को ही कवरेज दे रहे होते हैं।


    वे आमतौर पर संक्षेप में बताते हैं कि क्या हुआ। कहां हुआ और कैसे हुआ। तदर्थवादी अथवा कामचलाऊ व्याख्या करके अपने काम की इतिश्री समझ लेते हैं। वे कभी उसकी पृष्ठभूमि,प्रभाव और परिणतियों के बारे में नहीं बताते। 
   
     मीडिया में जब मध्यपूर्व की खबर दाखिल होती है तो बार-बार यही बताया जाता है कि मध्यपूर्व की जटिल परिस्थितियां हैं और उन्हें सहज ही बनाना संभव नहीं है। जटिल परिस्थिति होने के कारण आप भी नहीं समझ सकते। असल में मध्यपूर्व के बारे में अज्ञानता को बढ़ावा दिया जाता है। उसे इस्लाम और मुसलमान या ईसाई के साथ पेश किया जाता है। जबकि यह सच है मध्यपूर्व में जैसे इस्लाम का उदय हुआ वैसे ही ईसाईयत का भी जन्म हुआ। किंतु मध्यपूर्व को इस्लाम से जोड़ा गया ,ईसाईयत से नहीं जोड़ा गया। मध्यपूर्व के बारे में इस तरह की अज्ञानता को सिर्फ अशिक्षितों में ही नहीं बल्कि शिक्षितों में भी मीडिया ने प्रसारित किया है।
( लेखक- जगदीश्वर चतुर्वेदी,सुधा सिंह )



2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी मीडिया सम्बन्धी पोस्ट पत्रकारिता के छात्रों के लिए क्लास लेक्चर से भी बढ़िया है. नया और व्यावहारिक ज्ञान देने के लिए शुक्रिया !

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