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मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

नवजागरण और शूद्रों की मुक्ति के सवाल


          भारतीय नवजागरण पर जब भी बहस होती है तो दलितों या शूद्रों की मुक्ति के सवालों पर बहस नहीं होती,यह मान लिया गया कि दलितों की मुक्ति का आरंभ बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर के आने के बाद होता है। ज्योतिबा फुले दलित मुक्ति के मिशन की नींव रखते हैं,लेकिन इस पर पूरा शास्त्र बाबासाहेब ने ही बनाया।
     दलित मुक्ति का सवाल जहां एक ओर दलितों की मुक्ति से जुड़ा है वहीं दूसरी ओर यह सवाल फुले-आम्बेडकर के सत्ता विमर्श से जुड़ा है। इन दोनों को अंग्रेजों के शासन से कोई गंभीर शिकायत नहीं है। ये दोनों ही तत्कालीन सत्ता से हमदर्दी रखते हैं। सवाल यह है क्या दलितों की मुक्ति पूंजीवाद में संभव हैॽ क्या पूंजीवादी सत्ता विमर्श में वैकल्पिक नजरिए से शामिल हुए बगैर दलित के लिए संघर्ष करना संभव हैॽ क्या पूंजीवादी सत्ता विमर्श दलितों को मुक्ति देता है ॽ
    नवजागरण बुर्जुआ संवृत्ति है।यह आधुनिकता के प्रकल्प का अंग है,इसे क्रांतिकारी प्रकल्प नहीं समझना चाहिए।यदि नवजागरण के परिप्रेक्ष्य में ज्योतिबा फुले और आम्बेडकर के नजरिए को देखेंगे तो यह मूलतःआधुनिकतावादी आंदोलन है।इसी तरह बाबासाहेब भीमराव आम्बेडकर का समग्र नजरिया बुर्जुआ है और उसकी धुरी है आधुनिकता।पुराने किस्म के दलित की बजाय आधुनिक दलित की खोज और निर्माण उसका केन्द्रीय लक्ष्य है।यह नजरिया दलित को पुराने सामंती शोषण से मुक्त तो करता है लेकिन दलितों में शोषणमुक्त समाज का नजरिया नहीं बनाता।पूंजीवाद से मुक्ति का सपना पैदा नहीं करता।
यही वजह है 20वीं शताब्दी में बाबासाहेब भीमराव आम्बेडकर ही दलित मुक्ति के केन्द्र में है।इस धारणा ने कई स्टीरियोटाइप सरलीकरणों को जन्म दिया है।पहला,दलित मुक्ति का एकमात्र रास्ता वही है जिसको आम्बेडकर व्यक्त करते हैं।दूसरा,शिक्षा से जातिप्रथा नष्ट हो जाती है,तीसरा,दलितमुक्ति के लिए आरक्षण जरूरी है,चौथा,पूंजीवाद के विकास के साथ जातिप्रथा स्वतः नष्ट हो जाएगी,जाति शोषण नष्ट हो जाएगा।पांचवां,महानगरीय जीवन जातिप्रथा खत्म कर देता है। ये पांचों चीजें आधुनिकता के प्रकल्प का हिस्सा है। इन सरलीकरणों के पीछे आस्थाएं ही प्रमुख रूप से काम करती रही हैं।आस्था केन्द्रित होने के कारण नवजागरण और दलित पर बहुत कुछ ऐसा लिखा गया है जिसका यथार्थ से कम संबंध है,इसमें इच्छित लक्ष्यों और इच्छित तर्कों के आधार पर इच्छित सामाजिक यथार्थ की सृष्टि करने में भारत के बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग सफल रहा है।
     नवजागरण और शूद्र के अन्तस्संबंध के प्रसंग में सबसे पहली बात यह कि नवजागरण वस्तुतःदलितमुक्ति का प्रकल्प नहीं है।बल्कि यों कहें तो सही होगा कि नवजागरण के दलित मुक्ति के बुनियादी लक्ष्यों से  गहरे अंतर्विरोध हैं।
   जाति कहां है -
        जाति के समान कोई चीज नहीं है जिसके साथ जाति का विनिमय नहीं हो सके। जाति का किसी भी चीज से विनिमय संभव नहीं है,यह व्यवस्था या सिस्टम है,इसको आप पूरा छोड़ें तब ही जाति से मुक्ति संभव है,जाति में से किसी अंश को रख लो,अथवा उस जाति का वह गुण ले लो या निचली जाति से ऊँची जाति में या अ-सवर्ण से सवर्ण जाति में चले जाने से जाति खत्म होने वाली नहीं है।अंशों में विनिमय के जरिए जाति खत्म नहीं होगी।जाति तो जाति है उसका विनिमय नहीं कर सकते।वह बेहद ठोस भौतिक शक्ति है, उसके साथ भेदभावभरी व्यवस्था के साथ विनिमय संभव नहीं है।जाति ठोस है,उसके विचार चंचल हैं,इसलिए जब भी जाति बदलती दिखती है तो असल में जाति नहीं बदलती उसके विचार बदलते हैं,जाति तो जस की तस बनी रहती है।विचारों के विनिमय से जाति नहीं बदलती।विचार बदलते हैं,जाति असल में शोषण का एक रूप है,जो बड़ी बारीकी से हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक-आर्थिक जीवन में व्याप्त हो गयी है।हम जब जाति सुधार की बातें करते हैं तो अधिक से अधिक जाति के बुरे विचार को निकाल फेंकने की बातें करते हैं।इससे जाति नष्ट नहीं होती।

    जाति कोई सामाजिक समूह नहीं है,सामाजिक समूह के रूप में जाति को देखेंगे तो सही निष्कर्ष नहीं निकलेंगे।जाति को सामाजिक समूह के रूप में देखेंगे तो हमें अधिक से अधिक उसके ऊपरी ढाँचे को बदलने की इच्छा पैदा होगी,हम ऊपरी ढाँचे को बदल देंगे,लेकिन इससे जाति की आत्मा नहीं बदलेगी।छूआछूत,ऊँच-नीच,निचली जाति,ऊँची जाति, मनु व्यवस्था या अन्य व्यवस्थाएं या संवैधानिक व्यवस्थाएं अपने आपमें जाति को खत्म नहीं कर सकतीं,क्योंकि सभी किस्म के संवैधानिक उपाय जाति के ऊपरी कलेवर को बदलते हैं,उसकी आत्मा को स्पर्श नहीं करते।असल में जाति की आत्मा विनिमयरहित है।जाति के एक विचार को खत्म करेंगे,तो तुरंत दूसरा विचार उसकी हिमायत में उठ खड़ा होगा।हम करीब से उन जातियों को देखें जहां पर जाति का ऊपरी तौर पर खात्मा हो गया है लेकिन उससे समस्या खत्म नहीं हुई है। मसलन्,पश्चिम बंगाल में जातिप्रथा खत्म हो गयी है लेकिन उसकी जगह शोषित-शोषक के नए संबंधों ने जन्म ले लिया है,उन संबंधों को सहज ही घर-घर जाकर देख सकते हैं। कहने का आशय यह कि जाति तो शोषण का पुराना आदिम रूप है,वह हम सबकी आदतों,संस्कारों,चाल-चलन,रीति-रिवाज आदि में घुस आया है,वह सिर्फ समुदाय के रूप में ही मौजूद नहीं है बल्कि उसने दृष्टिकोण में जगह बना ली है।यही वजह है जाति के समान और कोई जगत नहीं है।
      जाति में रहने और जाति के मार्ग पर चलने का अर्थ है कि इसमें पैर जमाकर चल ही नहीं सकते, यह बेहद रपटन भरा मार्ग है।पुराने समाज में जाति के समान कोई चीज मौजूद नहीं है, आज भी जाति के समान कोई चीज नहीं है,जाति से किसी चीज की तुलना नहीं कर सकते,यह अतुलनीय है।इसने जीवन के हर क्षेत्र को अपने दायरे में शामिल कर लिया है।जाति के लिए समाज का हर आईना छोटा है,जाति हमारे विजन में इस कदर घर किए हुए है कि हम उसके बिना कोई चीज देख ही नहीं सकते।जाने-अनजाने जाति हमारे नजरिए  को प्रभावित करती है,वहां से हमारे ज़ेहन में शोषण के लक्षण व्यंजित होते रहते हैं।
    जाति को हमें सिस्टम की तरह देखना चाहिए।सिस्टम की तरह देखेंगे तो इसके आर्थिक आधार को भी देख पाएंगे।जाति कोई मानसिक अवस्था या विचार मात्र नहीं है।कहने के लिए जाति के ही आधार पर हर तरह का कार्य-व्यापार चलता रहा है।लेकिन जाति को आज इसके जरिए किसी चीज का विनिमय नहीं कर सकते।जाति के इस दौर में तीन और क्षेत्र सामने आए हैं वह है राजनीति,न्याय और साहित्य।इन तीनों क्षेत्रों में जाति के आधार पर देखने,विनिमय करने की बड़े पैमाने पर कोशिशें हो रही हैं लेकिन मुश्किल यह है जाति को आधार बनाकर ज्योंही संप्रेषण करेंगे,संप्रेषण खत्म हो जाएगा।इसका प्रधान कारण यही है कि जाति को आधार बनाकर कोई बात नहीं की जा सकती, जाति की किसी से तुलना संभव नहीं है, किसी से विनिमय संभव नहीं है। क्योंकि जाति का जाति के बाहर कोई अर्थ नहीं है,जाति तब तक ही अर्थवान या प्रासंगिक है जब तक जाति के दायरे में रहकर विचार करते हैं। जाति की राजनीति तब तक चमकदार नजर आती है जब तक वह जाति केन्द्रित रहे,उसी तरह दलित साहित्य की केटेगरी तब तक प्रासंगिक है जब तक दलित के लेखन को जाति के आधार पर देखा जाय,उसके बाहर इनकी प्रासंगिकता नहीं है।जाति की इस सीमा को हमेशा ध्यान में रखें।
    जाति की दूसरी बड़ी विशेषता है कि वह अपने में हर चीज को समाहित करने की क्षमता रखती है।जो लोग जाति के आधार पर सोचते हैं वे हर चीज को जाति के आधार पर ही देखते हैं,चाहे राजनीति हो या न्याय हो या साहित्य या कला रूप हों,इन सब पर बातें करते समय हमेशा हर चीज को खींचकर जाति में समाहित कर लेते हैं।जब वे किसी चीज को जाति के आधार पर देखते हैं तो फिर उसमें से इच्छित अंतर्वस्तु भी निकाल लेते हैं। वे इस इच्छित अंतर्वस्तु को यथार्थ में रूपान्तरित नहीं कर पाते। उसके भिन्न अर्थ को देख नहीं पाते।
      जाति की तीसरी सबसे बड़ी विशेषता है उसके अंदर केटेगरी या कोटियों की अनिश्चितता है।मसलन्,जो जाति यूपी में आरक्षित केटेगरी में आती है,जरूरी नहीं है वह बंगाल या अन्य जगह आरक्षित केटेगरी में हो। यही वजह है जाति का भिन्न –भिन्न इलाकों या समुदायों में अलग ढ़ंग का विकास और चरित्र नजर आता है।इससे जाति की काल्पनिकता या विभ्रम सामने आते हैं।
     जाति को केन्द्र में रखकर जितना भी विमर्श निर्मित हुआ है उसके केन्द्र में प्रतीकों की भाषा है। इस भाषा ने जाति को वस्तुओं के संसार में एक वस्तु बना दिया है।फलतःवह अनुमान और अनुकरण पर चलती रही है,और आज भी चल रही है।उसके काल्पनिक और वास्तविक रूप में भेद करना असंभव है। मसलन्, एक ओर शूद्र अतिगरीब मिलेंगे तो दूसरी ओर आईएएस भी मिलेंगे,आप तय नहीं कर सकते कि यथार्थ में शूद्र क्या है ॽ सच यह है जाति पर अधिकांश बहस अनुमानाधारित है,जबकि दावे किए जाते हैं कि वह यथार्थ पर आधारित है।दिक्कत तब आती है  जब आप एक ही साथ अतिगरीब शूद्र और आईएएस शूद्र को सामने रखकर देखते हैं।इससे हमारे अनुमान में निहित अ-व्यवस्था का उद्घाटन होता है।
   ज्योंही यथार्थ और विवेकवाद इन दो तत्वों का जाति के मूल्यांकन के प्रसंग में इस्तेमाल करते हैं तो जाति हमें ठोस रूप में स्थिर नजर आने लगती है, इस तरह दिखने लगती है कि उसका किसी भी चीज से विनिमय संभव नहीं है। जाति के सिद्धांत के दायरे में तो जाति प्रासंगिक लगती है लेकिन ज्योंही जाति के सिद्धांतों के बाहर निकलोगे तो जाति अ-प्रासंगिक नजर आने लगेगी।
   सवाल यह है जाति पुराना सिस्टम है,नया आधुनिक सिस्टम पूंजीवाद है।क्या जाति का पूंजीवाद के साथ विनिमय संभव है ॽक्या पूंजीवाद में जातियों का लोप हो जाएगा ॽ जी नहीं,पूंजीवाद में जातियों का लोप नहीं हो सकता।उल्टे जातियों के विकास की अनंत संभावनाओं के द्वार पूंजीवाद ने खोले हैं। नवजागरण आने के बाद जातियों की संख्या बढ़ी है, घटी नहीं है।जातियों के नाम पर सुख,सुविधा,कानून आदि सबमें इजाफा हुआ है,जातियों का विभिन्न नई जातियों में नाम परिवर्तन हुआ है लेकिन जाति का लोप नहीं हुआ है। जातियों के लिए नई परिधियां तय कर ली गयी हैं,नए आधार तय कर लिए गए हैं।इससे जाति के सिस्टम में अनिश्चितता और बढ़ी है।मसलन्, आज से सौ साल पहले व्यक्ति को जिस जाति के सदस्य के रूप में जानते थे वह आज उस जाति से निकलकर भिन्न जाति में शामिल हो चुका है।ऐतिहासिक तौर पर जाति के नाम का बदलना बताता है जाति में नाम बदलने,नियम बदलने,स्वयं ही अपने को नष्ट करके नए रूप में पेश करने की विलक्षण क्षमता है।इसके कारण जाति अपने को बार-बार प्रासंगिक और नए मूल्यबोध से जोड़ने में सफल हो जाती है।फलतः वह अपने को नष्ट करने में असफल रहती है।इस नजरिए से देखें तो पाएंगे कि जाति हर बार नया विभ्रम और अनिश्चितता  निर्मित करती है।इसका अर्थ यह भी है जाति खत्म होती नजर नहीं आती बल्कि आर्थिक तौर पर और भी ज्यादा ताकतवर नजर आती है। समग्रता में देखें तो जाति के लिए मूल्य और कानून अपवाद हैं ,विभ्रम यानी इल्युजन बुनियादी नियम है,फलतः जाति हमेशा समाज में बनी रहती है।मसलन्, आप जाति के नाम पर सब कुछ पा सकते हैं ,सब कुछ पाने के बाद भी जाति से आप मुक्त नहीं होते तो हम यही कहेंगे कि जाति के साथ किसी भी चीज का विनिमय संभव नहीं है। मसलन्, जाति के नाम पर शिक्षा,रोजगार,सामाजिक हैसियत आदि सब मिल जाता है,इसके बाद भी जाति नहीं छूटती।इसका अर्थ यह भी है कि जाति सबसे ज्यादा सुव्यवस्थित सिस्टम है जिसे आप नियम, कानून, रोजगार,शिक्षा आदि प्रदान करके भी खत्म नहीं कर सकते।बल्कि उलटे इनसे जाति के और भी पुख्ता हो जाने की संभावनाएं पैदा हो जाती हैं।
   जाति पर बहस के दौरान असमानता,कर्ज और उत्पीड़न इन तीन कोटियों में जाति विमर्श सामने आया है।इन तीनों तत्वों या कोटियों को यदि जाति के परिप्रेक्ष्य में पेश किया जाएगा तो यह तय है ये तीनों तत्व लौट-फिरकर वापस केन्द्र में आ जाएंगे।क्योंकि इन तीनों में अनुकरण पैदा करने की विलक्षण क्षमता है।ये अंतहीन चक्राकार रूप में घूमते रहते हैं।कुछ साल पहले केन्द्र सरकार ने किसानों के कर्ज माफ कर दिए,लग रहा था अब किसान कर्ज मुक्त हो गया है,लेकिन कुछ ही सालों में किसान फिर कर्जगीर हो गया।इन किसानों में दलित जातियों का बहुत बड़ा हिस्सा शामिल है।इसी तरह दलित के उत्पीड़न को लेकर जितने भी सख्त कानून बना लो,उत्पीड़न पुनःलौटकर आ जाता है। तमाम कानून बनाने के बावजूद दलितों का उत्पीडन खत्म नहीं हुआ है,यही हाल औरतों के उत्पीड़न का है।असल में असमानता,कर्ज और उत्पीड़न ये तीन कोटियां ऐसी हैं जो तमाम कानून बनाए जाने के बाद भी बनी रहती हैं, इनके जरिए यथार्थ के साथ विनिमय नहीं कर सकते। इनके जरिए यथार्थ नहीं बदल सकते,इनके जरिए कोई नई चीज पैदा नहीं कर सकते।

     असमानता,कर्ज और उत्पीड़न इन तीनों के आधार पर जब भी कोई परिप्रेक्ष्य खड़ा किया जाएगा वह अंततःअसफल होगा।मसलन्, यह माना गया कि भूमिहीनों को जमीन बांट देने से गांवों में असमानता घटेगी,भूमिहीन किसान ताकतवर बनेगा,पश्चिम बंगाल में बड़े पैमाने पर भूमि सुधार कार्यक्रम को लागू किया गया,लेकिन दो दशक के बाद पता चला कि भूमिहीन किसान जमीन के पाने के बावजूद असमानता,अभाव,कर्ज के जंजाल से मुक्त नहीं हो पाया,उसकी पामाली घटने की बजाय बढ़ गयी।उसे जिन चीजों से बचाने के लिए जमीन दी गयी थी उन चीजों से जमीन उसकी रक्षा नहीं कर पायी।

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

फेसबुक और भीमराव आंबेडकर


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'मैंने जाति-व्यवस्था समाप्त करने के उपाय और साधनों से संबंधित प्रश्न पर जोर इसलिए दिया है ,क्योंकि मेरे लिए आदर्श से अवगत होने के अपेक्षाकृत उचित उपायों और साधनों की जानकारी प्राप्त कर लेना अधिक महत्वपूर्ण है। यदि आपको वास्तविक उपाय और साधनों की जानकारी नहीं है तो आपके सभी प्रयास निष्फल रहेंगे।'

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13 अक्टूबर 1929 को पुणे के प्रसिद्ध पार्वती मंदिर में अस्पृश्यों के प्रवेश के लिए दलितनेताओं और सवर्णनेताओं ने मिलकर आंदोलन किया। मिलकर आंदोलन करने वाले नेता थे- शिवराम जानबा कांबले, पा.ना.राजभोज, श्री.स. थोरात. लांडगे,विनायकराव भुस्कुटे, (सभी दलितनेता) और वा.वि.साठे, देशदास रानाडे,ग.ना.कानिटकर,केशवराव जेधे,न.वि.गाडगिल (सभी सवर्ण) । इस आंदोलन में कुछ आर्यसमाजी भी शामिल हुए थे। इस आंदोलन में आंबेडकर किसी व्यस्ततावश पहुंच नहीं पाए।

फिर भी उन्होंने बम्बई की एक सभा में इस आंदोलन का समर्थन करते हुए कहा था- ''पुणे के दलितवर्ग द्वारा अपने अधिकार प्राप्त करने के लिए चलाए संघर्ष को केवल हार्दिक समर्थन देना ही बम्बई के दलितवर्ग का कर्तव्य नहीं , उन्हें आर्थिक सहायता देनी चाहिए।आवश्यकता पड़ने पर सत्याग्रह का समर्थन करने के लिए पुणे जाने के लिए तैयार रहना चाहिए। "

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आंबेडकर ने दलितों के लिए मूल्यवान सलाह दी कि - ''अस्पृश्य समाज को अपनी यथास्थिति में बने रहने की वृत्ति छोड़ देनी चाहिए।''

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बाबासाहब आंबेडकर ने सबसे महान कार्य यह किया कि उन्होंने अस्पृश्यों के दुख और जातिप्रथा की बुराईयों से सारी दुनिया को अवगत कराया। उनको सामाजिक परिवर्तन का प्रधान राजनीतिक विषय बनाया।

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बाबासाहब आंबेडकर की अपने जमाने के दिग्गज ब्राह्मण विद्वानों के साथ मित्रता थी। एक ही नमूना काफी है। यह नमूना इसलिए दे रहे हैं कि नए विचारक आंबेडकर के जमाने के बारे में और खासकर ब्राह्मणों के साथ उनके संबंधों के बारे में मिथ्याप्रचार करते रहे हैं। वाकया है आचार्य प्रह्लाद केशव अत्रे के विवाह का। अत्रे साहब पक्के ब्राह्मण थे और उन्होंने वैश्य कन्या से शादी की थी। आंबेडकर ने अत्रे का बहिष्कृत भारत में लेख लिखकर अभिनंदन किया था। लिखा था-

''अत्रे,देशस्थ ब्राह्मण और उनकी पत्नी गोंदूताई शामराव मुंगी, वैश्य! कवि केशवकुमार नाम से वे साहित्यभक्तों को परिचित हैं।उनका लेखन ऐसा मौलिक है कि उपहासात्मक काव्य लिखने में उनका सानी अन्य मराठी कवि नहीं है। वर-वधू के स्वतंत्र और स्वावलंबी होने के कारण यह मिश्र विवाह हर दृष्टि से उचित और आदर्श माना जाना चाहिए।''

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आंबेडकर ने कई महत्वपूर्ण बातें कही हैं,उनमें से एक है, 'हमारे हिन्दुस्तान देश के हीनत्व का अगर कोई कारण होगा तो वह देवतापन है। '

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आंबेडकर के अछूतोद्धार के काम में ब्राह्मणों की सक्रिय भूमिका थी। स्वयं आंबेडकर भी चाहते थे कि अस्पृश्यता को खत्म करने के काम में ब्राह्मणों की सक्रिय भूमिका हो। उस समय जेधे-जवलकर जैसे नेताओं ने आंबेडकर को कहा कि महाड़ सत्याग्रह (1927)में ब्राह्मणों को शामिल न किया जाय। आंबेडकर ने उनकी राय नहीं मानी और कहा , 'हमें यह शर्त मंजूर नहीं कि अस्पृश्योद्धार के आंदोलन से ब्राह्मण कार्यकर्ताओं को बाहर निकाला जाए। ' उन्होंने आगे कहा, 'हम यह मानते हैं कि ब्राह्मण लोग हमारे दुश्मन न होकर ब्राह्मण्यग्रस्त लोग हमारे दुश्मन हैं। ब्राह्मण्यरहित ब्राह्मण हमें नजदीक का लगता है। ब्राह्मण्यग्रस्त ब्राह्मणेतर हमें दूर का लगता है। '



कृपया इन शब्दों को पढ़ें नए तथाकथित दलित चिंतक .

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मित्रों से एक अन्य बात कहनी है कि फेसबुक स्टेटस को एक सहज सामान्य कम्युनिकेशन विधा के रूप में लें उसे वैचारिक और किसी को ओछा बनाने या मूल्य निर्णय के आधार पर कम से कम न देखें। यहां एक सामान्य कम्युनिकेशन है जो हम लोग करते रहते हैं। सामान्य कम्युनिकेशन को गंभीर मूल्य निर्णय की ओर जो भी ले जाता है वह सही नहीं करता। किसी के भी बारे में कोई भी राय कम से कम फेसबुक स्टेटस के आधार पर नहीं बनायी जा सकती। कोई रचना हो तो उसके आधार पर गंभीर बात हो सकती है।

अंत में, फेसबुक कम्युनिकेशन को समझें तो बेहतर होगा। यह मूल्य-निर्णय का मीडियम नहीं है।

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भीमराव आंबेडकर के मित्र थे श्रीधरपंत तिलक (लोकमान्य तिलक के बेटे) ,वे आंबेडकर के चहेते थे। वे प्रगतिशील विचार रखते थे। उनका मानना था कि हिन्दू संगठन का लक्ष्य है चारों वर्णों का विनाश हो। ब्रिटिश नौकरशाही और भिक्षुकशाही ओछीवृत्ति है। उन्होंने 1927 के गणपति महोत्सव के समय केसरी के समर्थकों के विरोध को न मानकर,अस्पृश्य कार्यकर्ता राजभोज के श्रीकृष्णमेले का कार्यक्रम गायकवाड़ बाड़े में आयोजित किया। बाद में पुणे के अस्पृश्यों ने एक सभा बुलाकर श्रीधरपंत तिलक का सार्वजनिक अभिनंदन किया था।



यह घटना इसलिए लिखनी पड़ी कि इनदिनों इंटरनेट पर अजीब माहौल बनाया जा रहा है ,आंबेड़कर के साथ कोई ब्राह्मण नहीं था। आंबेडकर के साथ अनेक यशस्वी सवर्ण थे जो उनके विचारों को मानते थे।

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सन् 1983 में मई के दिनों में मैंने माकपा के पोलिट ब्यूरो मेम्बर माकपा के बड़े नेता और तेलंगाना के महान आंदोलन के समय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव रहे बीटी रणदिवे से सवाल किया था कि आप अपनी आत्मकथा क्यों नहीं लिखते, उसके जबाव में उन्होंने कहा कि हमने ऐसा क्या किया है जो आत्मकथा लिखें। मुझे यह बात आज भी प्रासंगिक लगती है।कम्युनिस्टनेताओं ने बेशुमार कुर्बानियां दीं,बड़ी लडाईयां लड़ीं। लेकिन आत्मकथा नहीं लिखी।

इधर हिन्दीलेखकों में यह फैशन चल निकला है कि वे वोल्यूम दर वोल्यूम आत्मकथा लिख रहे हैं जबकि उनकी आत्मकथाओं में स्कूल के दाखिले, कॉलेज का जीवन, गांव या मुहल्ले के वर्णन और ब्यौरों के अलावा कुछ नहीं होता। काश ,ब्यौरे के बाहर आकर वे जीवन में कुछ कर पाते ? जीवन के ब्यौरे महान नहीं बनाते महान कर्म महान बनाते हैं,बेहतरीन लेखन महान बनाता है। आत्मकथा महान नहीं बनाती।

11-

ब्राह्मणों या सवर्णों पर प्रामाणिक लेखन के लिए जब ब्राह्मण या सवर्ण के गर्भ से जन्म लेना जरूरी नहीं है तो दलित पर प्रामाणिकलेखन के लिए दलित के गर्भ से जन्मलेना क्यों जरूरी है ? मजेदार बात यह है कि दलितलेखक अपने को ब्राह्मणों (सवर्ण) पर लिखने का अधिकारी विद्वान मानते हैं। लेकिन ज्योंही कोई ब्राह्मण लेखक दलितों पर लिखता है तो सीधे कहते हैं आप दलित हुए बिना दलित पर नहीं लिख सकते। यह लेखन के संदर्भ में क्या जरूरी सवाल है कि लेखक किसके घर पैदा हुआ है ?

मंगलवार, 13 मार्च 2012

दलितसाहित्य का नया पैराडाइम और नये सवाल


  ( साहित्य का इतिहासदर्शन विषय पर कोलकाता स्थित प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय में "दलित साहित्य का इतिहास दर्शन" विषय पर दिए गए व्याख्यान का एक अंश।यह अंश वागर्थ पत्रिका ने  जनवरी 2012 के अंक में प्रकाशित किया है)         
             दलित साहित्य पर विचार करते समय हमें दलित विमर्श के रूढ़िबद्ध दायरों को तोड़ने की जरूरत है। जाति के दायरे में चलने वाला विमर्श अनेक किस्म की समस्याओं को पैदा करता है। जातिप्रथा के दायरे के बाहर रखकर यदि दलित लेखक सोचता है तो मुक्तलेखन और नई खोजों की ओर जा सकता है। जातिप्रथा से जोड़कर देखता है तो घूम-फिरकर पुराने जातिदंश और उसकी सर्जना में ऊर्जा खपाएगा और इससे दलित साहित्य में रूढ़िबद्धता का खतरा पैदा हो सकता है।
   सवाल उठता है दलित लेखक किस चीज को आधार बनाकर लिखता है। वे जातिप्रथा से जब जोड़कर लिखते हैं तो जाति की विचारधारा के दायरे में अपनी चेतना को बांध लेते हैं लेकिन ज्योंही जीवन के आख्यान को आगे बढ़ाते हैं तो जाति के बाहर चले जाते हैं। मसलन् एक अनपढ़ दलित का शिक्षित बनना स्वयं में रूपान्तरण है। गांव से शहर आना,नौकरी मिलते ही मध्यवर्ग में दाखिल होना,सरकारी पद पर आसीन होना रूपान्तरण है। कायदे से आधुनिक रूपान्तरण की प्रक्रियाओं को मूल्यांकन के केन्द्र में लाना चाहिए। इसमें दलित अपने अतीत की यात्रा कर सकता है और यह भी संभव है कि वह अपने मौजूदा जाति संकटों से भी फौरी तौर पर मुक्त हो जाए।
     जातिप्रथा को आधार बनाकर लिखी गई रचनाएं अंततः जाति प्रथा के शॉर्टकट की तलाश करती हैं और अंत में स्टीरियोटाइप समाधान की शरण में चली जाती हैं।कायदे से दलित लेखन को आत्माभिव्यंजना और अस्मिता की अभिव्यक्ति के लिए जातिप्रथा से भिन्न रास्ते की तलाश करनी चाहिए। जातिप्रथा के दायरे में ऱखकर देखने के कारण भेदभाव, ऊँच-नीच और जातिभेद बने रहते हैं। इनके दायरे के बाहर का सामाजिक संसार सामने नहीं आ पाता।
     इस तरह के सोच के आधार पर लिखने में एक और दिक्कत है कि लेखक के निशाने पर वर्तमान नहीं अतीत होता है। दलित साहित्य लेखक के वर्तमान या सामयिक परिवेश से जुड़े ,सामयिक परिवेश की जटिलताओं का उदघाटन करे और सामयिक परिवेश की लोकतांत्रिक संरचनाओं और पूंजीवादी एथिक्स किस तरह उसके व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं ,यह उसका कंसर्न बने तब नए सवालों पर उसका ध्यान जाएगा। आज दलित की पहचान दलित के रूप में न करके नागरिक के रूप में की जानी चाहिए। विमर्श का आधार नागरिक की अस्मिता को बनाया जाना चाहिए। नागरिक की पहचान संविधान प्रदत्त आधुनिक पहचान है। इसके आधार पर ही हम नागरिकचेतना और नागरिक समाज बना सकते हैं।
     हिन्दी में अनेक दलित लेखक हैं जिनकी आत्मकथाएं आ चुकी हैं। दलित आत्मकथाओं की संरचनाएं जातिप्रथा से जुडी हैं लेकिन जातिप्रथा को पुष्ट करना इनका लक्ष्य नहीं है, बल्कि इनसे लेखक के निजी जीवन के वृतान्तों के द्वारा सामाजिकचेतना और सामाजिक ध्रुवीकरण का उदघाटन हुआ है।
   दलित आत्मकथाओं का लक्ष्य है दलितपीड़ा के बहाने सामाजिक प्रतिवाद की चेतना पैदा करना। दलित लेखक जातिचेतना पैदा करने के लिए नहीं लिखते बल्कि प्रतिवादी चेतना पैदा करने के लिए लिखते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में दलित आत्मकथा मूलतः प्रतिवादी आख्यान का नया विधा रूप है। यह परंपरागत आख्यान से बुनियादी तौर पर भिन्न है। परंपरागत आख्यान का बुनियादी लक्ष्य था आनंद। नए दलित आख्यान का लक्ष्य है बेचैनी और असहमति। दलित आख्यान मूलत प्रतिवादी आख्यान है और इस तरह के आख्यान को वे पाठक हजम नहीं कर सकते जो मनोरंजन या समय काटने के लिए कहानी-उपन्यास पढ़ते हैं। परंपरागत आख्यान निजी मन को सम्बोधित है वहीं दलित आख्यान निजी मन को नहीं समाज को सम्बोधित है। सामाजिक विवाद और बहसों को जन्म देता है। मानवाधिकारों और नागरिक के अधिकारों की ओर ध्यान खींचता है।
    दलित आत्मकथाओं के आगमन के बाद गांवों में फैले जातिभेद की ओर आम लोगों का ध्यान गया है। दलित अस्मिता के बहुस्तरीय रूपों का उदघाटन हुआ है। आमतौर पर दलित आलोचक दलित के आत्म और दलित के सामुदायिक इन दो किस्म की अस्मिताओं को खोजते हैं और इन दो को ही आधार बनाकर समीक्षाएं भी लिखी जा रही हैं। मुश्किल यह है कि दलित में इन दोनों अस्मिताओं के अलावा और भी कई अस्मिताएं हैं।
    मसलन ओमप्रकाश बाल्मीकि की दलित और दलित समुदाय की अस्मिता के अलावा जेण्डर की अस्मिता है, पिता,भाई,पुरूष की अस्मिता है। भाषायी अस्मिता है ,पेशेवर अस्मिता है। एक ही आत्मकथा में एकाधिक अस्मिताएं गुथी होती हैं और ये परिवर्तनीय हैं। आरंभ हुआ था दलित से और अंत में रूपान्तरण हुआ है दलित लेखक की अस्मिता में। कहने का अर्थ यह है कि दलितलेखक की अस्मिता परिवर्तनीय है ,स्थिर या जड़ नहीं है। अस्मिताओं में मात्र दलित अस्मिता को देखना और अन्य अस्मिताओं की अनदेखी करने से साहित्यिक असंतुलन पैदा होता है।
   आत्मकथा का आरंभ जरूर दलित अस्मिता और दलित समुदाय से होता है लेकिन इसे लिखते समय लेखक का संदर्भ क्या है ? अस्मिता हमेशा संदर्भ से परिभाषित होती है। संदर्भ का वर्तमान से संबंध होता है। ओमप्रकाश बाल्मीकि की आत्मकथा जब लिखी गयी तो उसका संदर्भ किससे तय होगा ? अतीत के संदर्भ से या वर्तमान के संदर्भ से ? अस्मिता का सामाजिक नियम वर्तमान से जुड़ा है अतीत से नहीं।
   दलित समीक्षकों की मुश्किल यह है कि वे दलित आत्मकथा के सामाजिक रूपान्तरण के पहलुओं पर कम ध्यान दे रहे हैं। अतीत के शोषणकारी रूपों के चित्रण पर ज्यादा जोर दे रहे हैं। सवाल उठता है क्या दलित साहित्य की सामाजिक रूपान्तरणकारी भूमिका है? दलित साहित्य की सामाजिक रूपान्तरणकारी भूमिका है तो फिर प्रतिवाद की प्रक्रिया के साथ सामाजिक रूपान्तरण पर ध्यान क्यों नहीं जाता ?
     समाज में संस्थानों की जातिबंधन में बांधे रखने और जातिबंधनों से मुक्त करने की द्विस्तरीय भूमिका होती है। उसी तरह पावर स्ट्रगल में भी सामाजिक शक्ति संतुलन बदल सकता है। शहर में जाति संतुलन और गांव में जाति संतुलन एक जैसा नहीं होता। शहर में रहकर जातिभेद ढ़ीले पड़ते हैं। शहरीकरण से जातिप्रथा की पुरानी दीवारें गिरती हैं। ऐसी स्थिति में लेखक का शहर में रहकर आत्मकथा के जातिबंधन और जाति उत्पीड़न की ओर जाना और फिर वहीं जाकर थम जाना एक निर्मित साहित्य संरचना और एक खास किस्म के रीतिवादी रूझान की ओर ध्यान खींचता है। अनेक आत्मकथाओं में दलित की स्थिति पर जोर ज्यादा है दलित के रूपान्तरण की प्रक्रिया के उदघाटन पर जोर कम है।
    वस्तुतः दलित आत्मकथाओं को समीक्षकों ने सामयिक दौर में एक दलित की सामाजिक स्थितियों के राजनीतिक बयान के रूप में विश्लेषित किया है। इस तरह के लेखन ने दलित साहित्य को प्रतिष्ठित करने और स्वीकृति दिलाने में बहुत बड़ी भूमिका अदा की है। साहित्य विमर्श के सवालों को बदला है।
    दलित आत्मकथाओं के उभार का गहरा संबंध दलित राजनीतिक उभार के साथ है। ये दोनों अपने तरीके से दलित को प्रधान एजेण्डा बनाते हैं। उसके साथ हो रहे भेदभाव, अन्याय,अपमान और पीड़ा को अभिव्यक्ति देते हैं।
   दलित लेखक का निजी मूलतः सामाजिक और राजनीतिक होता है। दलित लेखक का आख्यान निज से आरंभ जरूर होता है लेकिन निजी के दायरे में रहता नहीं है।वह हमेशा सामाजिक-राजनीतिक दायरे में विचरण करता है।  उसमें निजता का वैसा कोई तत्व नहीं होता जो आमतौर पर सवर्ण आत्मकथाओं में होता है। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो वह व्यक्ति के बहाने समुदाय के प्रतिवाद का साहित्य है। यह साहित्य में व्यक्ति की प्रतिष्ठा की बजाय समुदाय की प्रतिष्ठा का द्योतक है।
    समुदाय के आने के साथ मध्ययुगीनता की वापसी का भी खतरा है। समुदाय के बहाने जाति-वर्ण के रूप अपने साथ मध्ययुगीनता को वापस ला सकते हैं। आधुनिक समाज में आधुनिक किस्म के समुदाय हों जैसे राजनीतिक दल, विचारधारात्मक गुट,क्लब,सभा-सोसायटी आदि। नए सामुदायिक मोर्चे ही सामाजिक रूपान्तरण को सामने लाते हैं। दलित लेखकों की आत्मकथाओं में इन आधुनिक समुदायों के दर्शन भी होते हैं। इस अर्थ में ये लेखक समुदाय के साथ जुड़ी मध्ययुगीनता के दायरे का अतिक्रमण कर  जाते हैं।  
       आधुनिककाल के आगमन के साथ साहित्य में ईश्वर की जगह मनुष्य आया,कालांतर में क्रमशः राष्ट्र,राष्ट्रीयता ,वर्ग  और लिंग आया और अब दलित साहित्य के साथ समुदाय की प्रतिष्ठा हुई है। अब व्यक्ति पर नहीं समुदाय और लिंग के सवालों पर बहसें हो रही हैं।  हम यह मानकर चल रहे थे कि समुदाय चला गया और साहित्य में व्यक्ति और उसकी निजता का दौर आ गया लेकिन दलित साहित्य के साथ समुदाय की वापसी हुई है। साहित्य और समुदाय के नए अन्तस्संबंधों पर हमने अभी विचार नहीं किया है। अभी तक साहित्य और समाज के अन्तस्संबंधों पर विचार किया है। लेकिन नई परिस्थितियां समुदाय और साहित्य के अन्तस्संबंधों पर टिकी हैं। अब हमें साहित्य और समाज के अन्तस्संबंध पर नहीं समुदाय और साहित्य के अन्तस्संबंध पर विचार करना चाहिए।
      मध्यकाल में धर्म और साहित्य,भारतेन्दु युग में मनुष्य और समाज,राष्ट्र और साहित्य,जातीयता और साहित्य,महावीरप्रसाद द्विवेदी युग में साहित्य और समाज,प्रगतिशील आंदोलन के युग (1936-1953) में वर्ग और साहित्य के अन्तस्संबंध पर खूब बहसें हुई हैं। 1960 के बाद लोकतंत्र और साहित्य के अन्तस्संबंध के सवाल केन्द्र में हैं।
     सन् 1977 से समुदाय और साहित्य का अन्तस्संबंध केन्द्र में आया है। इस संबंध पर विचार करते हुए यह तथ्य रेखांकित किया गया है कि औरतें और दलित पेशिव नहीं हैं। बल्कि वे सामाजिक संरचनाओं के परिवर्तन के साथ बदलते रहे हैं। इस विमर्श में दलित और स्त्री का एक अर्थ नहीं है। बल्कि वे अनेकार्थी होकर सामने आते हैं। समुदाय के रूप में चरित्रों की भूमिका पर विचार करते समय यह ध्यान रहे कि समुदाय के चरित्र बहुस्तरीय भावों और संवेदनाओं को प्रभावित करते हैं। समाज की एकाधिक संरचनाओं पर सीधे असर छोड़ते हैं। विभिन्न संदर्भ में उनका अर्थ बदल जाता है।
      दलित पात्रों पर केन्द्रित रचनाओं में कहानी सवर्ण वर्चस्व और दलित मातहत के अन्तर्विरोध के साथ आरंभ होती है।लेकिन समाहार हमेशा मातहत अवस्था के अंत में होता है। इस तरह की प्रस्तुतियों की सारी बहस पाठ की व्याख्या पर टिकी है। इसमें सवर्णों और दलितों के संपर्क और व्यवहार की जटिलताओं को लेखकगण पेश करते हैं। इस तरह की रचनाओं में दलितों-सवर्णों के सामाजिक रीति-रिवाज ,नियमों और व्यवहारों को खासतौर पर उभारा गया है। यह भी दर्शाया गया है कि दलित समुदाय किस तरह सवर्णों से भिन्न ढ़ंग से जी रहा है। इसमें दो चीजें साफ उभर कर आई हैं दलित सत्य और चिर-परिचित दलित यथार्थ। यह काम दलित लेखकों ने पूर्वाग्रहरहित होकर किया है। इस तरह की प्रस्तुतियों में दलितों और सवर्णों की स्टीरियोटाइप इमेज और स्टीरियोटाइप सोच सामने आया है।
      यह भी एक सच है कि दलित जब भी लिख रहे हैं तो वे सवर्ण के वातावरण का चित्रण करते हुए सवर्ण परिवेश में ही लिख रहे हैं। उसी वातावरण में वे दलित जीवन में आ रहे परिवर्तनों को पेश कर रहे हैं। सवर्ण वातावरण में दलित कैसे सोचता है.उसकी मंशाएं क्या है,वह अपने भावों,विचारों और इमेज का प्रचार-प्रसार कैसे करता है और किसतरह सुचिंतित ढ़ंग से पाठक को सम्बोधित करता है। इन चीजों को देखना चाहिए। वे ऐसी भाषा का भी इस्तेमाल करते हैं जिसमें छूत-अछूत,छोटे-बड़े,शूद्र और सवर्ण आदि का बोध होता है। वे जब दलित को शूद्र के फ्रेमवर्क में रखकर पेश करते हैं तो फिर शूद्र के अधिकारों के सवाल उठ खड़े होते हैं। इस क्रम में दलित की जाति संरचना,परिवार का रूप, आंतरिक द्वंद्व,इतिहास ,शहर-गांव ,परिवार आदि के अन्तर्विरोध चले आते हैं। दलित लेखकों का तर्क है कि वे इस फॉरमेट में इसलिए लिख रहे हैं जिससे लोग दलित यथार्थ को जानें। दलित पीड़ा के अनुभवों को जानें। लेकिन उनके लेखन का यह तरीका प्राच्यवादी है।
      दलितलेखक यह भी कहते हैं कि सवर्णों ने हमारे समाज और उसके यथार्थ पर कभी नहीं लिखा। वे खाली नाममात्र को प्रतीकात्मक रूप में दलित का उल्लेख करते रहे हैं। इसके विपरीत दलित आत्मकथाओं में दलित जीवन के बारें में अनेक सूचनाएं होती हैं। भूगोल रहता है।सामाजिक संरचनाओं के रूप रहते हैं। आचार-व्यवहार के रूप आदतें, आचरण और मनोदशाओं का चित्रण रहता है। इस समूचे आख्यान रूप को दलित लेखकों ने दलित सूचना संसार के रूप में पेश किया है। वे इसे दलित यथार्थ की वस्तुगत प्रस्तुति भी कहते हैं।
     दलित लेखकों ने जिन तथ्यों को पेश किया है उसके खिलाफ बहस की बहुत कम गुंजाइश है। लेखन की प्रक्रिया में सूचनाओं को देने की प्रक्रिया जब आरंभ हो जाती है या यों कहें कि आत्मकथा में यथार्थ सृजन की प्रक्रिया जब आरंभ हो जाती है तो कौन सी सूचना सच है और कौन सी काल्पनिक यह कहना कठिन है। दलित चूंकि अमानवीय परिवेश में रहता है अतः उसकी चेतना पर सवर्ण संरचनाओं का गहरा दबाव होता है वह जो पाठ लिखता है उस पर सवर्ण वातावरण का दबाव हावी रहता है।   
     दलित लेखक आत्मकथा में व्यक्ति रूप में अपनी बातें रखते हुए सामने आता है। दलितसमूह के रूप में नहीं। यह ऐसा व्यक्ति है जिसका दलितसमूह से भेद करना मुश्किल है। लेकिन यह अंततः व्यक्ति है ,साथ ही समुदाय का प्रतिनिधि भी है। दलित व्यक्ति के विवरण, कष्ट ,पीड़ा और परिवर्तन को हम ओमप्रकाश बाल्मीकि की कृति 'जूठन' (1997) में देख सकते हैं। यह किताब 1994 के आसपास लिखनी आरंभ हुई। यह हिन्दी की सबसे चर्चित आत्मकथा है। इस किताब को देखकर यह भी लगता है कि लेखक आत्मकथा के बहाने अपने जीवन और दलित समाज की अनेक सूचनाओं को दलित यथार्थ के साथ मिलाकर शामिल करता चला जा रहा है। वह उन सूचनाओं को क्रमशःपेश करता है।
      ओमप्रकाश बाल्मीकि ने दलित जीवन के दमघोंटू अमानवीय वातावरण का चित्रण किया है। अपने निजी जीवन के चित्रण के जरिए उन्होंने दलित समाज के सामाजिक यथार्थ और सांस्कृतिक अवस्था को पेश किया है। इसमें अनेक जगह सरलीकरण भी चले आए हैं। दलित व्यक्ति से आरंभ हुई आत्मकथा दलित समूह को एक सुसंगत इकाई के रूप में देखती है। इस प्रक्रिया में दलितों के जीवन में व्याप्त उत्पीड़न,भेदभाव,उपेक्षा आदि का व्यापक चित्रण हुआ है। दलितों के जीवन में व्याप्त मानवीय सकारात्मक पहलुओं की चर्चा कम हुई है।
      दलितों की आत्मकथाएं एक तथ्य की ओर संकेत करती हैं कि सामाजिक परिवर्तन के साथ दलितों का जीवन भी बदलता रहा है। यह बदला हुआ जीवन सामान्य और आशानुरूप है । पूंजीवादी परिवर्तनों से दलित समाज भी बदल रहा है।
    दलितों के नारकीय जीवन के दृश्यों की आत्मकथाओं में भरमार है। लेकिन हमें यह भी देखना चाहिए कि पूंजीवादी संस्कृति के आचार-व्यवहार,मूल्य,खान-पान,सभा-सोसायटी आदि किस तरह दलितों को प्रभावित कर रहे हैं? यह ठीक है कि इन आत्मकथाओं में नारकीय यथार्थ पहलीबार सामने आता है लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है जिसे नोटिस लिया जाना चाहिए। नए किस्म के पूंजीवादी संपर्क,संबंध और संचार रूपों के कारण क्या बदलाव आ रहे हैं उनके बारे में मूल्यांकन कर्ताओं का ध्यान जाना चाहिए। 
   दलित समाज सामंती,पूंजीवादी और पितृसत्तात्मक इन तीन व्यवस्थाओं के दबाव में घिरा हुआ है। इसके कारण इस समाज के सामने इन तीनों से ही लड़ने की समस्या है। सवाल यह है कि दमघोंटू अमानवीय जीवन स्थितियों का चित्रण करने के बाद क्या दलित लेखक इन स्थितियों से मुक्त हो रहे हैं ? आधुनिक दलित परिवार कैसे थे और आज कैसी अवस्था में हैं ? आधुनिक दलित परिवार में आधुनिकता के रूपों के प्रवेश के बाद किस तरह के मूल्य,संस्कार,आदतें आदि पैदा हो रहे हैं ? क्या नए आधुनिक परिवर्तनों के प्रति दलितों में उतनी गहरी समझ है जितनी गहरी समझ उनमें पुराने दलित समाज को लेकर है।
     दलित समाज में आज दो तरह के समाज हैं। आधुनिक शिक्षित दलित और पुराना दमघोंटू अमानवीय माहौल में रहने वाला दलित । हमें इन दोनों के नए सवालों की दलित नजरिए से पड़ताल करनी चाहिए।
    आज दलित लेखक के नए सवाल सामने है ,मसलन् ,नए उभरते पूंजीवादी दलित परिवार की संरचनाएं किस तरह की हैं ?इसके प्रधान अंतर्विरोध क्या हैं ? दलित परिवारों का आंतरिक चित्रण दलित लेखन में अभिव्यंजित क्यों नहीं हो रहा ?   महानगरीय और नगरीय जिंदगी के पूंजीवादी वातावरण,नौकरी,शिक्षा,आधुनिक बस्तियों आदि में रहने वाले दलितों के जीवन को कैसे देखें ? क्या आधुनिक पूंजीवादी दलित परिवार और पुराने दमघोंटू वातावरण वाले दलित परिवारों में बुनियादी बदलाव आया है ? आधुनिक दलित की चेतना और विचारधारा और पुराने दलित की चेतना और विचारधारा में क्या अंतर है? पूंजीवादी मूल्यों और समानतावादी आम्बेडकर के विचारों में से किस तरह के विचारों को दलित लेखक ज्यादा जी रहे हैं ? दलित लेखकों का पूंजीवाद,अमेरिकी साम्राज्यवाद,बहुराष्ट्रीय निगमों, उपभोक्तावाद, नव्य-आर्थिक उदारीकरण के प्रति क्या नजरिया है ?
    दलित साहित्य में और खासकर आत्मकथाओं में जो चीज सबसे महत्पूर्ण है वह है दलित लेखकों का सामाजिक रूपान्तरण। साहित्य में 'रूपान्तरण' वाले पहलू पर कम ध्यान दिया गया है। जिस तरह दलित लेखकों के दलित समाज के सामाजिक यथार्थ का महत्व है ,वैसे ही इस रूपान्तरित दलित लेखक की अवस्था का भी महत्व है और यह इस बात का संकेत है कि दलितों में तेजी से मध्यवर्ग पैदा हो रहा है।
    दलित मध्यवर्ग की चिंताएं ,समस्याएं और अभिरूचियां एकदम वही हैं जो आम मध्यवर्ग की हैं। आम मध्यवर्ग के पास अपनी पहचान के अनेक मुखौटे हैं , क्या दलित मध्यवर्ग के पास में भी कई मुखौटे हैं ? पूंजीवादी आचार-व्यवहार और शहरीकरण के कारण किस तरह के बदलाव दलित लेखक की जिंदगी में आ रहे हैं? क्या उन बदलावों के आधार पर कोई सामान्यीकरण दलित मध्यवर्ग के बारे में बनाया जा सकता है ? क्या दलित मध्यवर्ग में जातिभेद की समस्या है ? क्या विभिन्न दलित जाति के मध्यवर्गीय और निम्नवर्गीय परिवारों में जातिभेद हैं ? जिन दलित परिवारों का आधुनिकीकरण नहीं हुआ है वे मध्यवर्ग में आने के बाबजूद,महानगरों में रहने के बावजूद विभिन्न दलित जातियों के साथ भेदभाव से पेश आते हैं। इसका अर्थ यह है कि पूंजीवाद ने दलितों को मध्यवर्ग में तो पहुँचा दिया है लेकिन दलित जातियों में प्रचलित आंतरिक जाति-भेदभाव अभी भी बना हुआ है। इस काम में आधुनिक शिक्षा व्यवस्था कोई मदद नहीं करती। लिबरल शिक्षा व्यवस्था में पुरानी जातिगत अस्मिता को खत्म करने की क्षमता ही नहीं है।वह उसे नौकरी लायक बना देती है, लेकिन आधुनिक नहीं बनाती।नागरिक नहीं बनाती।पुरानी अस्मिता से मुक्त नहीं करती।   
     दलित अनुभूति बेहद जटिल और संश्लिष्ट होती है। इसमें मानवीय अनुभूति के सामान्य और जाति के विशिष्ट परिवेशगत लक्षण होते हैं। इसमें जातीय और लोकल जाति अनुभूति के सम्मिक्षण लक्षण भी हैं।
     एक जमाना था दलित अनुभूति सत्ता के प्रतिवाद का हिस्सा थी,कालान्तर में सत्ता और प्रतिष्ठानों का प्रतिवाद करते हुए स्वयं सांस्थानिक अनुभूति बन गयी। दलितों में पुराने संस्थानों के प्रति प्रतिवाद और उनको अस्वीकार करने का प्रबल भाव था। आज उसे पाने का प्रबल भाव है। इसके कारण दलित विमर्श जाने-अनजाने सत्ता विमर्श के पैकेज का हिस्सा बन गया है। आरक्षण वस्तुतः सत्ता विमर्श और सामंजस्य,सहयोग और समानता की सत्तापंथी समझ की अभिव्यक्ति है।
     आरंभ में दलितों के पास अपनी धारणाएं नहीं थीं ,इसके कारण वे अवधारणाओं का यह कहकर निषेध करते थे कि अवधारणाएं सवर्ण व्यवस्था की देन हैं। लेकिन आज दलित साहित्य है,अनुभूति है,अवधारणाएं हैं। अकादमिक जगत में दलित विमर्श,दलित साहित्य,दलित अध्ययन आदि पर केन्द्रित कोर्स हैं,विभाग हैं,अध्ययन केन्द्र हैं। कलतक दलित संस्थानविहीन था आज संस्थान है। इससे दलित की संस्थानों में शिरकत बढ़ी है।
    अवधारणाओं में अनुभूति को बांधने का पहले दलित निषेध करते थे, लेकिन बाद में अवधारणाएं बनाने का काम करने लगे, पहले साहित्य सिद्धांतों का निषेध करते थे और कहते थे कि साहित्यशास्त्र तो वर्णवादी है,पुंसवादी है। सिद्धांत ,आलोचना, अकादमिक जगत आदि के बारे में वे घृणा से बातें करते थे। आज वे दलित सौन्दर्यशास्त्र, सिद्धांत, अवधारणाएं आदि बना रहे हैं। पहले आत्मवैधता को बड़ा मानते थे अब सामूहिक अकादमिक वैधता को सुंदर मान रहे हैं।
     दलित साहित्य स्वयं में एक राजनीतिक अर्थ से भरी केटेगरी है। दलित को लेकर होने वाला कोई भी विमर्श,विवाद,आलोचना राजनीति की उपेक्षा करके संभव नहीं है। खासकर दलित राजनीति के 1977 के बाद आए उभार की अनदेखी किए बिना संभव नहीं है। जिस तरह प्रगतिशील साहित्य का विमर्श कम्युनिस्ट राजनीति और मार्क्सवाद के बिना तैयार नहीं होता वैसे ही दलित विमर्श सामयिक दलित राजनीतिक एजेण्डे ,ज्योबा फुले-आम्बेडकर के बिना नहीं बनता। असल में इन दोनों ने यह चीज रोमैंटिक आंदोलन से ली है। जिस तरह रोमैंटिक आंदोलन का फ्रांस की राज्य क्रांति की राजनीति से संबंध जुड़ा है, वैसे ही प्रगतिशील आंदोलन और दलित साहित्य भी सामयिक राजनीति से जुड़ा है।
       रोमैंटिक साहित्य में लेखक केन्द्रित लेखन है वैसे ही दलित साहित्य में भी है। साहित्य में सामाजिक शक्ति संतुलन के पहलू को सबसे पहले रोमैंटिक कवियों ने महत्व दिया वहीं से दलित लेखकों ने सामाजिक शक्ति संतुलन अपने पक्ष में करने की कला सीखी। वे जो कुछ लिखते हैं उसमें सामाजिक शक्ति संतुलन का चित्रण जरूर रहता है। आत्मकथा से लेकर कहानियों तक सब में दलित अपनी सामाजिक अवस्था का वर्णन करने के लिए सबसे ज्यादा स्पेस खर्च कर रहे हैं। सत्ता,दलित समाज,व्यक्ति और दलित समाज,दलित समुदाय और सवर्ण समुदाय,सवर्ण और सत्ता आदि के अन्तस्संबंधों पर खूब लिखा जा रहा है।
      दलित लेखक अपनी रचनाओं में दलित के शोषण मात्र का चित्रण नहीं कर रहे बल्कि दैनंदिन शोषण में सत्ता किस तरह भूमिका निभाती है उसकी ओर भी ध्यान खींच रहे हैं।
दलित लेखन के माध्यम से सहज ही विमर्श के नए ग्लोबल पैटर्न को भी समझ सकते हैं। जिस तरह अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर दलित और नस्ल के सवाल एकसाथ उठाए जा रहे हैं और अमेरिकी सीनेट से लेकर यूएनओ के मंचों तक भारत के दलितों की समस्याओं पर बहस हो रही है उससे दलित विमर्श और दलित सृजन के ग्लोबल फलक और लिंक को समझने में मदद मिल सकती है। दलित लोकल है लेकिन विचारों और अभिव्यक्ति की शैली में ग्लोबल है।
   दलित का व्यक्तिगत और सामाजिक भिन्न होता है। दलित का जो व्यक्तिगत है वही उसका सामाजिक भी है। मसलन् साहित्य में दलित जीवन के अनेक पहलू कभी किसी भी बड़े लेखक ने चित्रित नहीं किए। प्रेमचंद ने कृषिशोषण का पहलू उजागर किया लेकिन दलितों के जीवन की व्यक्तिगत बातें अज्ञानता के कारण लिखने में असमर्थ रहे। मसलन् दलित क्या खाते हैं,कैसे रहते हैं, कैसे मरे हुए पशुओं के चमड़े का प्रयोग करते हैं,मरे पशुओं के बीच किस तरह रहते हैं, किस तरह स्कूल में परेशानियां झेलते हैं,जाति सूचक नाम किस तरह परेशानी पैदा करते हैं,शारीरिक शोषण,यौन शोषण,जीने का हक,पैदा करने का हक,घरेलू हिंसा आदि के रूप क्या हैं। इन सबके बारे में दलित लेखकों ने सबसे पहले रोशनी डाली। अपने निजी को सार्वजनिक किया। यहां तक कि मध्यकालीन दलित लेखक भी इस निज को सार्वजनिक नहीं कर पाए थे, लेकिन आधुनिक दलित लेखक ने यह काम किया है। दलित लेखकों ने जितने निजी प्रसंग उठाए हैं वे सबके सब व्यवस्था से जुड़े हैं और व्यवस्था से जुड़े होने के कारण ये राजनीतिक हैं। इसी अर्थ में दलित लेखन राजनीतिक है।
    दलित लेखन में जिन सामाजिक कष्टों का वर्णन मिलता है उनमें लेखकों ने कष्टों के लिए वर्णव्यवस्था और उसके साथ जुड़ी सामाजिक-राजनीतिक संरचनाओं को दोषी ठहराया है। इस क्रम में जहां एक ओर लेखक ने अपने निजी भावों और कष्टों को अभिव्यक्ति दी है वहीं दूसरी ओर अपनी दुरवस्था के लिए मानव निर्मित परिस्थितियों और सामाजिक समूहों के व्यवहार को दोषी ठहराया है।
   दलित लेखन या विमर्श कुछ भी नाम दें इसमें लेखक का रचा पाठ जहां एक ओर उसके निज की अभिव्यक्ति है वहीं दूसरी ओर वह प्रत्यक्षतःअन्य सामाजिक-राजनीतिक विमर्शों से भी जुड़ा है। अतः उनके लेखन में उठी किसी समस्या का समाधान व्यक्तिगत नहीं हो सकता। जो भी समाधान होगा वो सामाजिक-राजनीतिक और सामुदायिक संरचनाओं से जुड़ा होगा।
     विभिन्न दलित लेखकों की रचनाएं ऊपर से एक-दूसरे से अलग हैं लेकिन वे एक समग्र विमर्श तैयार करती हैं। सतह पर देखने पर लगेगा कि यह तो ओमप्रकाश बाल्मीकि की रचना है,यह शरणकुमार लिम्बाले की रचना है और यह किसी अन्य दलित लेखक की रचना है लेकिन ये सभी रचनाएं मिलकर दलित विमर्श निर्मित कर रही हैं और एक-दूसरे के साथ संवाद भी कर रही हैं। ये रचनाएं अलग-अलग लेखक की लिखी होने के बाबजूद ऐसा लगता है कि इनमें एक यूनिटी है, एकता है। इन रचनाओं को पढ़कर तत्काल ही व्याख्या की जरूरत महसूस होती है। असल में ये रचनाएं दलित जीवन के उस पहलू को सामने लाती हैं जिसे साहित्यकार नहीं जानता था।आलोचना ने कभी जिन पर विचार नहीं किया था।पाठक ने कभी जिसके बारे में विस्तार से पढ़ा और जाना ही नहीं था। यह मूलतः दलित का अदृश्य यथार्थ है।  
     दलित लेखन में निहित विभिन्न किस्म के विमर्शों के बीच जटिल संबंध है। मसलन दलित परिवार,दलित संस्कृति,दलितों में स्त्री-पुरूष संबंध,अभिभावक-संतान के संबंध,मातृसत्ता और दलित,पितृसत्ता और दलित आदि के सवालों पर दलित और गैर दलित समाज में विचारों का किस तरह आदान-प्रदान होता रहा है और किस तरह दलितों ने अपने लोकल और सार्वभौम चरित्रों को रचा है। कहने का तात्पर्य यह है कि दलित पात्र ,संस्थान और दलित यथार्थ के बीच में किस तरह की अंतर्क्रियाएं हो रही हैं,इत्यादि सवालों पर विचार करने की जरूरत है।
    दलित लेखन की विशेषता है कि वह दो स्तरों पर सक्रिय होता है पहला, वह दलित जीवन के उस यथार्थ को सामने लाता है जिसे आम लोग नहीं जानते,दूसरा वह पहले से प्रचलित जाति और वर्ण के संस्कारों,मान्यताओं और मूल्यों को चुनौती देता है। जाति और वर्ण के बारे में जो पहले कहा गया है उसे निशाना बनाता है। इन दो कार्यों के जरिए दलित लेखक एक नए किस्म के साहित्य और विचारधारा को जन्म देता है। वह विमर्श और चित्रण में उन चीजों को लेआता है जिन्हें पहले कभी नहीं कहा और रचा गया था।
      कुछ लोग हैं जो प्रेमचंद की रचनाओं में व्यक्त दलित चित्रण को पेश करते हुए कहते हैं कि देखो प्रेमचंद ने दलित यथार्थ रचा है। इसके आधार पर वे चाहते हैं कि यह मान लिया जाय कि गैर दलित लेखकों ने बेहतर दलित यथार्थ की सृष्टि की है। यह सच है कि प्रेमचंद के यहां दलित यथार्थ के चित्र हैं लेकिन  इससे दलित लेखन की महत्ता कम नहीं होती।
     दलित लेखक बड़े कौशल से दो काम करते हैं वे दलितयथार्थ के साथ दलित विचारों से पाठक का परिचय कराते हैं। प्रेमचन्द के यहां दलित यथार्थ है लेकिन दलित विचारधारा नहीं है। दलित साहित्य के लिए दलित यथार्थ और विचारधारा दोनों ही महत्वपूर्ण हैं। इनके बिना दलित साहित्य का समग्र ढ़ांचा नहीं बनता।  
    दलित लेखक जब दलित सवालों को उठाते हैं तो वे उस बिंदु से नहीं बोलते जो पहले ही कहा जा चुका है बल्कि उस बिंदु से आरंभ करते हैं जो नहीं बोला गया है। साहित्य में दलित तो है लेकिन दलित की आवाज कहीं सुनाई नहीं देती। दलित के चित्र तो हैं लेकिन आवाज नहीं है।
    आमतौर पर विमर्श में जो पहले कहा गया है उसे लिपिबद्ध कर दिया जाता है लेकिन दलित विमर्श में ज्यादातर वे चीजें सामने आई हैं जो पहले नहीं उठायी गयीं। इनमें दलित की चुप्पियों को सुना जा सकता है।
     अनेकबार दलित विमर्श पढ़ते हुए दमनात्मक अनुभूतियों का भी सामना करना पड़ता है। यह लगता है दलित लेखक चाहता है कि उसकी बात को ध्यान से सुना जाए औऱ उस पर विचार किया जाए। दलित रचनाओं की एक और खूबी है कि उनमें हठात यथार्थ का ऐसा अंश सामने आता है जिसके बारे में पहले से कोई अनुमान नहीं था। कभी किसी ने ऐसी बात लिखी नहीं थी। यह हठात् पैदा हुआ यथार्थ वस्तुतः ऐसा सच है जिसकी पुनरावृत्ति संभव नहीं है। इसे आप जान नहीं सकते थे।भूल नहीं सकते हैं। रूपान्तरित नहीं कर सकते। सीधे खारिज नहीं कर सकते। इसे छिपा भी नहीं सकते। इस तरह की यथार्थ प्रस्तुति के सामने आते ही आपको स्टैंड लेना होगा, अपने स्टैंड को आप स्थगित नहीं कर सकते। यह ऐसा यथार्थ है जो परेशान करता है,पक्ष लेने के लिए मजबूर करता है।
दलित लेखकों ने आत्मकथा के बहाने जिस नारकीय जीवन का चित्रण किया है उसकी विशेषता है कि किस तरह एक दलित अपनी जीजिविषा और संघर्ष क्षमता के बल पर अपनी जिदगी बदलता है और पशुवत जीवन से कैसे मानवीय जीवन की ओर रूपान्तरित करता है। किस तरह मानवीय जीवन और नारकीय जीवन में अंतर होता है। दया पवार की कृति 'अछूत' में चित्रित  एक यथार्थ चित्र देखें,लिखा है-
  " ढोर मरने के बाद महारबाड़ा में एक चेतना दौड़ जाती। उसमें भी बैल यदि कगार से फिसलकर मर गया तो आनंद दुगुना। ऐसा बैल अधिक ताजा समझा जाता। जंगल में कहाँ ढोर मरा है,इसकी ख़बर महारबाड़ा पहुँचने में देर न लगती। आज के टेलेक्स से भी तेज गति से ख़बरें पहुँचतीं। आकाश में चील-गिद्ध विमान -जैसे एक ही दिशा में मँडराने लगते तो महारों को मालूम हो जाता कि खाना कहाँ पड़ा  है। गिद्धों द्वारा खाने की बरबादी न हो,इसके लिए भाग-दौड़ मचती।गिद्ध भी कितने ! आसानी सेपाँच-पचास का झुण्ड षपंख फड़फड़ाते। मुँह से मचाक्-मचाक् की आवाजें निकालते।अण्णाभाऊ साठे ने एक कथा में इन गिद्धों से मखमली जैकेट पहने साहूकार-पुत्र की उपमा दी है। पत्थर मारने पर थोड़ी दूर उड़ जाते परन्तु बेशर्मों-से फिर खाने की दिशा में सरकते। शायद उन्हें महार लोगों पर बड़ा क्रोध भी आता होगा। उनके मुँह से महार लोग कौर छीन लेते थे ! गिद्धों की हिंस्र आँखें,उनकी धारदार चोंच ! मुझे लगता है,वे सब मेरा ही पीछा कर रहे हैं।"
" कई दिनों से महारबाड़ा में इस तरह का खाना ही नहीं मिला। मुँह का स्वाद ही चला गया" -ऐसा कहते हुए बूढ़े लोग काफ़ी खुश दिखायी देते। घर में जो भी बर्तन होता- घमेला,परातें- वह लेकर लोग भागते। चमड़ी छिलने तक भी सब्र न करते। उसमें महिलाओं की धूम अलग। हमारी उम्र के लड़के दूसरे कारणों से ही खुश हो जाते।मोटी चमड़ी के साथ ही पतली चमड़ी की एक परत होती। उससे डफली,ढोल बना सकते थे। पतीली का ऊपरी घेरा या खाली डिब्बा इसके लिए पर्याप्त था। खाली डिब्बे को तानकर बैठाया जाता और धूप में सुखा देते। एक-दो दिन के बाद चर्वाद्य-सी आवाज निकलने लगती।" ( अछूत, पृ.64-65)
     उपरोक्त विवरण बताता है कि अछूतों का जीवन किस तरह पशुओं के जीवन से घुला-मिला रहा है।इसमें अभिव्यक्त अमानवीय स्थितियों का चित्रण दलितों को समाज के बाकी लोगों से अलग करता है। यह पूरा वर्णन नजारे की तरह लगता है। इससे यह भी लगता है दलित अर्द्ध मनुष्य के समूहों में जीते रहे हैं। यह पूरा वर्णन पढ़ने वाले को वाणीरहित कर देता है। इस तरह के वर्णन से यह भी पता चलता है हम दलितों के बारे में कितना कम जानते हैं।
  चूंकि हमें दलितों की वास्तविक जिंदगी की समझ नहीं है इसलिए उसे लेकर समाज और साहित्य में कोई संवाद भी नहीं है। यह वर्णन हमारे समाज में सक्रिय संस्थानों की भी स्थिति की ओर ध्यान खींचता है। किस तरह सामाजिक संस्थानों ने दलितों को अमानवीय,हीन और घृणित अवस्था में कैद किया हुआ है। यह मूलतःगुलाम अवस्था है।
     दलितों को गुलामप्रथा के अलावा और किसी परिप्रेक्ष्य में नहीं देखा जा सकता। अनेक गैर दलित लेखकों के यहाँ दलितों के शोषण ,कृषिदासता, भूमिहीन कृषक आदि के चित्र मिलते हैं लेकिन दलितों की अमानवीय और अर्द्ध -मनुष्य जीवन स्थितियों का जो वर्णन दलित लेखकों के यहां मिलता है वह गैर दलित लेखकों यहां नहीं मिलता। इसका कारण क्या है ? असल में गैर दलित लेखकों ने दलित को कभी अंदर से जानने की कोशिश ही नहीं की। वे हमेशा उसे दर्शक की नजर से देखते रहे हैं। दलित के जीवन का उनके लिए नजारे या एक सीन से ज्यादा महत्व नहीं है। जब चीजों को दर्शक की नजर से देखकर लिखते हैं तो यह देखने वाले पर निर्भर करता है कि वह क्या देखे और क्या लिखे। वह सीन में शामिल नहीं होता।
दया पवार और अन्य दलित लेखकों ने जिस अमानवीय दलित जीवन को चित्रित किया है वह यथार्थवाद के पैमानों से समझ में नहीं आएगा। हमारे अनेक प्रगतिशील आलोचक प्रेमचंद आदि गैर दलित लेखकों के बारे में यथार्थवाद के मानकों और साहित्य सिद्धांतों के आधार पर लिखते रहे हैं। दलित का यथार्थ बुनियादी तौर पर भिन्न है और यह भिन्न समय में अवस्थित है। इसे समझने के लिए दलित दृष्टिकोण और मानविज्ञानी (एथनोग्राफिक) परिप्रेक्ष्य की सही समझ का होना जरूरी है।
    यथार्थवाद के मानकों का आधार है 'मनुष्य' और 'वर्ग' ,जबकि दलित इन दोनों के बाहर एथनोग्राफिक वर्तमान में निवास करता है। दलित के लेखन में 'वर्तमान समय' महत्वपूर्ण है, यथार्थवाद में ' समय' महत्वपूर्ण है। यथार्थवाद का विमर्श ऐतिहासिक काल में चलता है।
    दलितसाहित्य विमर्श वर्तमानकाल में चलता है। दलित लेखकों ने जिस अमानवीय अवस्था का वर्णन किया है वह उनका भोगा हुआ यथार्थ है जबकि गैरदलित लेखक का यह दूर से देखा-सुना यथार्थ है। दलितलेखक यथार्थ का हिस्सा है,गैर -दलितलेखक दलितयथार्थ के बाहर है। दलितलेखक दलितयथार्थ का सर्जक है,कर्ता है। गैर दलित लेखक दर्शक है,गवाह है,साक्षी है।
     दलित लेखकों ने दलित पर विचार करते हुए भारतीय संस्कृति,सभ्यता, जातिप्रथा, धर्म आदि के समस्त सुंदर तानेबाने को उधेड़ा है। वे बार बार यह बताना चाहते हैं कि उन्हें अधिकारों से वंचित करके रखा गया। अमानवीय परिस्थितियों में रखा गया। दलितलेखक ज्योंही दलितयथार्थ को वर्तमानकाल में ले आता है तो समाज को नजारे की कैद से मुक्त कर देता है। नजारे की कैद के कारण दलित के बारे में गैर दलित लेखकों में दलित यथार्थ की खूब पुनरावृत्ति हुई है। पुरानी समाज व्यवस्था की संकीर्णताओं,शोषण आदि की स्टीरियोटाइप प्रस्तुतियां खूब हुई हैं। इस तरह की प्रस्तुतियों को प्रेमचंद,निराला,जगदीश चन्द्र आदि का रचनाओं में साफतौर पर देखा जा सकता है।
        दलित लेखक जब दलित जीवन पर लिखते हैं तो वे अपने को औपनिवेशिकता के फ्रेम के बाहर ले जाते हैं। वे दलितों के नकारात्मक लक्षणों पर खूब जोर देते हैं। दलितों के जीवन की नकारात्मक स्थितियों का बार बार आना ,अमानवीय स्थितियों का बार बार आना उनकी दोयमदर्जे के नागरिक की अवस्था को बनाए रखने की साजिशों और सोच को नंगा करता है। इससे दलित के खिलाफ बने हुए वर्चस्व चक्र को चुनौती मिलती है।  जातिप्रथा कमजोर होती है। दलितों के प्रति गुलाम मानसिकता नष्ट होती है। मूल बात यह कि दलित लेखन में वर्चस्व और अमानवीय जीवन स्थितियों  का संदर्भ प्रमुख है।
   दलित के बारे में स्वाधीनता संग्राम में महात्मा गांधी,भीमराव आम्बेडकर आदि के जितने भी प्रयास,संघर्ष और विचारधारात्मक बहसें हुई हैं उन सबके केन्द्र में स्वाधीनता संग्राम है। स्वाधीनता संग्राम के प्रभाव के कारण ही दलितों की मुक्ति के सवाल सामने आते हैं। स्वाधीनता संग्राम के कारण ही दलितयथार्थ केन्द्र में आता है। वर्चस्व से मुक्त होने की दलित आकांक्षा अभिव्यक्त होती है। औपनिवेशिकता विरोधी संघर्ष दलित को वर्चस्व से मुक्ति का स्वप्न पैदा करता है। दलित जितना अंदर से औपनिवेशिक विचारधारा के प्रभाव से मुक्त होता गया उतना ही ज्यादा दलितयथार्थ सामने लाता गया। दलितयथार्थ के सामयिक विस्फोट का प्रधान कारण है दलित लेखकों का औपनिवेशिक और साम्राज्यवादी विचारधारा से मुक्त होना।
    दलित विमर्श पर विचार करते समय यह तथ्य भी ध्यान में रहे कि विभिन्न भारतीय भाषाओं में दलित साहित्य के उदय और लेखन की परिस्थितियां भिन्न होने के बावजूद अनेक साझा समस्याएं हैं ,इनमें जाति उत्पीड़न साझा समस्या है।
    दलित लेखन की साझा विरासत है इसका प्रतिवादी स्वर। दलित लेखन ने उन तमाम संस्कारों,आदतों और मूल्यों को अपने लेखन में निशाना बनाया है जो वे सैंकड़ों सालों से झेल रहे हैं। फलतःइन रचनाओं में दमन का इतिहास चला आया है। दलित लेखकों की प्रस्तुतियों में सामयिक दबाबों से मुक्त टिकाऊ प्रस्तुतियां सामने आई हैं। लेखक के नजरिए में सामयिक दबाव हैं लेकिन प्रस्तुतियों या चित्रण में सामयिक चंचलता गायब है। सामयिक टेंशन गायब है।
     दलित पाठ मूलतः वर्चस्व विरोधी और सामाजिक शक्ति संबंधों की अभिव्यक्ति है। इस पाठ में अनेक उप-पाठ हैं और उप-तनाव हैं। मसलन् जाति उत्पीड़न प्रधान पाठ है, लेकिन दलित परिवार,दलित कामुकता,दलित शरीर ,शिक्षा,दलित की नौकरी,कार्यस्थल पर दलित,मेला,महानगर और मध्यवर्ग में दलित आदि को लेकर अनेक उप-पाठ भी मिलते हैं।
मसलन्, कामुकता का प्रसंग देखें, 'अछूत' का एक दृश्य पढ़ें- " चौथी कक्षा की बात है। मराठे की एक हट्टी-कट्टी लड़की मेरी कक्षा में पढ़ती थी। उसे पहला मासिक-धर्म आया और उसका पहला लहँगा खून से सन गया। तब मैंने खोज की -यह लड़की अब औरत बन गयी है।" ( पृ.45) यह दृश्य किताब में अचानक आ टपकता है। इसके बाद कामुकता का एक और उप-पाठ दाखिल होता है- " बंबई में कावाखाने में रहते समय लड़कों के बहलाने में आकर दरवाजों की दरारों से कई बार छिप-छिपकर छोटी आयु में ही संभोग के कई दृश्य मैंने देखे हैं।" इसके बाद एक घटना का लेखक जिक्र करता है।
'' एक घटना तो अच्छी तरह याद है। मेरे मौसेरे चाचा थे। उनका नाम था शिवा। शादी हुई और बीबी मर गयी। विधुरता के दिन काट रहे थे। सड़कों पर कसरत के खेल दिखाने वाली एक काली हुड़दंगी औरत उन्होंने घर में रख रखी थी ।वैसे यह औरत बड़ी अजीब थी। पुरूषों की तरह पैंट-शर्ट पहनती थी। लंबे बालों को जूड़े में बाँधती थी चाचा को कावाखाने में मिलने आती,वह भी साइकिल पर बैठकर।...  जब कावाखाने के स्त्री-पुरूष काम पर चले जाते ,तब शिवा चाचा उसे कमरे में ले आता। ... यह औरत चाचा के सामने गाय के समान कैसे शांत-लीन हो जाती है !वे नंगे हो जाते।पसीने से लथपथ। दीवाल का आईना ज़मीन पर कोण बनाकर रखते। औरतों की जांघ के बीच बाल होते हैं, इस बात का मुझे कई दिनों तक आश्चर्य होता रहा...! "(पृ.45)
   दया पवार ने एक अन्य प्रसंग का जिक्र किया है ,एक बिठाभाई नामक महिला के बारे में लिखा है," मुझ पर जान देती थी।अच्छी-अच्छी चीजें खाने को देती।सिनेमा-नाटक दिखाती।मुझे बहुत मजा आता।मैंने उसके साथ रॉक्सी में 'खजांची' पिक्चर देखी थी,आज भी मुझे यह याद है। घर में कोई न रहने वह मुझे अपने ऊपर बैठाती। पलंग पर चित सोती। मुझे जाँघे दबाने को कहती। ऐसे समय वह साड़ी ऊपर सरका लेती। उसके केले के पेड़ के गूदे सी जाघें दबाते समय मेरे मन में एक अजीब-सी बैचैनी उठती।वैसे मेकी उम्र बहुत छोटी थी।परन्तु यह सब देखकर भीतर बड़ी उथल-पुथल मचती।" ( 47)
एक अन्य जगह समलैंगिक कामुकता का प्रसंग आता है,लिखा है ,"तालुके के स्कूल में सोते वक्त एक घटना घटी। आज भी ऐसा लगता है,ज्यों मेरे शरीर पर छिपकली रेंग रही है। गाँव का गोरा-चिट्टा मराठे का लड़का मेरे पास ही सोता था। एक रात अचानक मैं नींद से जागा। वह लड़का मेरे लिंग से कुछ हरकत कर रहा था। अलबत्ता उस दिन मेरी चड्डी गीली हो गयी।मुझे भी मजा आया। पर बाद में मुझे झिझक होती। कुछ गलत,गन्दा काम मेरे हाथों हो रहा है-यह सोचकर बैचैन हो उठता। इसके बाद मैंने अपने सोने की जगह बदल दी।"(76)
इस तरह के प्रसंगों को कैसे पढ़ा जाए ? इसे अवचेतन के रूप में पढ़ा जाना चाहिए। असल में दलित और स्त्री रचनाओं में कामुकता और जातिभेद के बीच में साझा संदर्भ तत्व है शरीर। शरीर के बहाने कामुकता और शरीर के बहाने ही दलित दाखिल होता है। दलित का शरीर विमर्श मूलतः दलित के सामाजिक इतिहास को खोलने में मदद करता है। शरीर मर्द का हो या स्त्री का उसका बार-बार आना और नए विमर्श की ओर लेजाना,अपने आपमें नयी बात है।
    दलित के सभी विमर्श शरीर की विभिन्न प्रस्तुतियों और विभिन्न सामाजिक अवस्थाओं की प्रस्तुतियों को सामने लाते हैं। दलित शरीर के बिना उसकी सामाजिक हकीकत सामने नहीं आती। उपरोक्त प्रसंग कामुकता के हैं लेकिन इन सभी प्रसंगों में कामुकता के बारे में औरतें कम और मर्द ज्यादा बोल रहा है। यही स्थिति शरणकुमार लिंबाले की कृति ' देवता आदमी' (1994)कहानी संकलन में शामिल कहानियों में भी देखी जा सकती है। इस संकलन में एक कहानी है 'भीतर-बाहर बलात्कार' ,इसमें पीड़िता का नाम है बायडी,उसके साथ बलात्कार की घटना होती और पूरी कहानी में अन्य लोग उस घटना के बारे में बताते हैं,बायडी ने काफी मुश्किल से अपनी बात रखते हुए कहा, '' जी,हाँ, मेंबर ने मुझपर बलात्कार किया। मैं बहुत रोई ,पैंरों पड़ी,लेकिन उसने मुझे नहीं छोड़ा। ' मैंने तुम्हें काम पर लगाया है।मुंसिपैलिटी की जगह पर झोपड़ी बनाने की इजाजत दी है। इसका कुछ अहसान मानती है कि नहीं ?'  कहते हुए उसने मुझे डाँटा ,तब मंचुप बैठ गई।" (137)
    इस तरह के विवरण और ब्यौरे इस बात की सूचना देते हैं कि भारतीय समाज में जातिभेद और उत्पीड़न को छिपाने की चतुर कोशिशें होती रही हैं। इन संदर्भों से यह बात भी निकलती है कि दलित उत्पीड़न के मामलों में ,खासकर शारीरिक शोषण के मामलों में औरतें कम और मर्द ज्यादा बोलते रहे हैं। मध्यकाल और कालांतर में आधुनिककाल में भी दलित औरतों के शारीरिक शोषण को छिपाने की तमाम कोशिशें हुई हैं। इधर की रचनाओं में शारीरिक शोषण का खुलासा होने से दलित और कामुकता का अन्तर्ग्रथित संबंध सामने आया है। इस तरह की प्रस्तुतियों में अवचेतन में स्थित हीनताबोध उभरकर सामने आया है। यह दलित मूल्यांकन के लिए सबसे कठिन चुनौती भी है।    

















गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

बाबासाहेब भीमराव आम्बेडकर के जन्मदिन पर विशेष- भीमराव आम्बेडकर,अन्ना हजारे और लोकतंत्र

                    (जन्म -14 अप्रैल 1891, मृत्यु - 6 दिसम्बर 1956 )
बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर को हमें आधुनिक मिथभंजक के रूप में देखना चाहिए। भारत और लोकतंत्र के बारे में परंपरावादियों,सनातनियों, डेमोक्रेट, ब्रिटिश बुद्धिजीवियों और शासकों आदि ने अनेक मिथों का प्रचार किया है। ये मिथ आज भी आम जनता में अपनी जड़ें जमाए हुए हैं। बाबासाहेब ने भारतीय समाज का अध्ययन करते हुए उसके बारे में एक नया सोच पैदा किया है। भारतीय समाज के अनेक विवादास्पद पहलुओं का आलोचनात्मक और मौलिक विवेचन किया है।
   भारत में भक्त होना आसान है समझदार होना मुश्किल है। बाबासाहेब ऐसे विचारक हैं जो शूद्रों के सामाजिक तानेबाने को पूरी जटिलता के साथ उदघाटित करते हैं। बाबासाहेब के भक्तों में एक बड़ा तबका है जो दलितचेतना और दलित विचारधारा से लैस है।
        हाल ही में अन्ना हजारे और उनके अंधभक्तों और कारपोरेट मीडिया ने जिस तरह का उन्माद पैदा किया है उससे एक संदेश संप्रेषित हुआ है भारत में लोकतंत्र जनता की सेवा के लिए है और बस सिर्फ जनता का दबाब पैदा करने की जरूरत है और लोकतंत्र पटरी पर आ जाएगा। अन्ना हजारे और उनकी भक्तमंडली यह भी कह रही है यदि कुछ पुख्ता कानूनी नियम और संरचनाएं बना दी जाएं तो फिर लोकतंत्र को हम अमीरों की सेवा में से निकालकर गरीबों की सेवा में लगा देंगे।
     इस संदर्भ में मुझे बाबासाहेब भीमराव आम्बेडकर का सहज ही स्मरण हो रहा है। आम्बेडकर की साफ धारणा थी कि संसदीय जनतंत्र जनता की मूल समस्याओं का समाधान नहीं कर सकता। सन् 1943 में इंडियन फेडरेशन के कार्यकर्ताओं के एक शिविर में भाषण करते हुए आम्बेडकर ने कहा "हर देश में संसदीय लोकतंत्र के प्रति बहुत असंतोष है। भारत में इस प्रश्न पर विचार करना अत्यंत आवश्यक है। भारत संसदीय लोकतंत्र प्राप्त करने के लिए बातचीत कर रहा है। इस बात की बहुत जरूरत है कि कोई यथेष्ठ साहस के साथ भारतवासियों से कहे-संसदीय लोकतंत्र से सावधान। यह उतना बढ़िया उत्पाद नहीं है जितना दिखाई देता था।" इसी भाषण में आगे कहा  'संसदीय लोकतंत्र कभी जनता की सरकार नहीं रहा,न जनता के द्वारा चलाई जाने वाली सरकार रहा। कभी ऐसी भी सरकार नहीं रहा जो जनता के लिए हो।'
     भीमराब आम्बेडकर ने 1942 के रेडियो भाषण में स्वाधीनता,समानता और भाईचारा, इन तीन सूत्रों का उद्भव फ्रांसीसी क्रांति में देखा। उन्होंने कहा "मजदूर के लिए स्वाधीनता का अर्थ है जनता के द्वारा शासन । संसदीय लोकतंत्र का अर्थ जनता के द्वारा शासन नहीं है।"
      आम्बेडकर ने संसदीय लोकतंत्र की व्याख्या करते हुए लिखा " संसदीय लोकतंत्र शासन का ऐसा रूप है जिसमें जनता का काम अपने मालिकों के लिए वोट देना और उन्हें हुकूमत करने के लिए छोड़ देना होता है।" आम्बेडकर ने लोकतंत्र को मजदूरवर्ग के नजरिए से देखा और उस पर अमल करने पर भी जोर दिया।
     अन्ना हजारे जिस लोकतंत्र की बात कर रहे हैं वो मालिकों का जनतंत्र है। वे जिस तथाकथित लोकशाही की बार बार दुहाई दे रहे हैं वो मालिकों की लोकशाही है। इसके विपरीत भीमराव आम्बेडकर का मानना था जब तक पूँजीवाद कायम है तब तक सही मायनों में न स्वतंत्रता संभव है और न समानता। वास्तव अर्थ में समानता हासिल करने के लिए पूंजीवादी व्यवस्था को बदलना होगा उसके बाद ही वास्तविक अर्थ में समानता प्राप्त की जा सकती है।
    इसके विपरीत अन्ना हजारे पूंजीवाद को बनाए रखकर ही नियमों में सुधार की बात कर रहे हैं। आम्बेडकर की नजर में वास्तविक स्वतंत्रता का अर्थ है सभी किस्म के विशेषाधिकारों का खात्मा। नागरिक सेवाओं से लेकर फौज तक,व्यापार से लेकर उद्योग धंधों तक सभी किस्म के विशेषाधिकारों को खत्म किया जाए। वे सारी चीजें खत्म की जाएं जिनसे असमानता पैदा होती है।
     आम्बेडकर की धारणा थी कि 'लोकप्रिय हुकूमत के तामझाम के बावजूद संसदीय लोकतंत्र वास्तव में आनुवंशिक शासकवर्ग द्वारा आनुवंशिक प्रजा वर्ग पर हुकूमत है। यह स्थिति वर्णव्यवस्था से बहुत कुछ मिलती जुलती है।  ऊपर से लगता है कोई भी आदमी चुना जा सकता है,मंत्री हो सकता है,शासन कर सकता है।वास्तव में शासक वर्ग एक तरह वर्ण बन जाता है। उसी में से,थोड़े से उलटफेर के साथ,शासक चुने जाते हैं।जो प्रजा वर्ग है, वह सदा शासित बना रहता है।'
        
             








सोमवार, 6 दिसंबर 2010

भीमराव आंबेडकर के परिनिर्वाण दिवस पर विशेष- अस्मिता की राजनीति का मसीहा







आखिरकार आधुनिक युग में अछूत कैसे जीएंगे ?  गैर अछूत कैसे जीएंगे इसके बारे में कोई विवाद ही नहीं था क्योंकि हम सब जानते थे कि वे कैसे हैं और उन्हें क्या चाहिए ?किंतु अछूत को हम नहीं जानते थे। हम कबीर को जानते थे,रैदास को जानते थे। ये हमारे लिए कवि थे। साहित्यकार थे। संत थे। किंतु ये अछूत थे और इसके कारण इनका संसार भिन्न किस्म का था यह सब हम नहीं जानते थे। अछूत की खोज आधुनिकयुग की महानतम सामाजिक उपलब्धि है।

अछूत के उद्धाटन के बाद पहलीबार देश के विचारकों को पता चला वे भारत को कितना कम जानते हैं। भारत एक खोज को अछूत की खोज ने ढंक दिया। आज भारत एक खोज सिर्फ किताब है, सीरियल है,एक प्रधानमंत्री के द्वारा लिखी मूल्यवान किताब है। इस किताब में भी अछूत गायब है। उसका इतिहास और अस्तित्व गायब है। आंबेडकर ने भारत को सभ्यता की मीनारों पर चढ़कर नहीं देखा बल्कि शूद्र के आधार पर देखा। शूद्र के नजरिए से भारत के इतिहास को देखा, शूद्र की संस्कृतिहीन अवस्था के आधार पर खड़े होकर देखा। इसी अर्थ में आंबेडकर की अछूत की खोज आधुनिक भारत की सबसे मूल्यवान खोज है।
भारत एक खोज सभ्यता विमर्श को सामने लाती है,अछूत खोज परंपरा और इतिहास की असभ्य और बर्बरता की परतों को खोलती है। आंबेडकर इस अर्थ में सचमुच में बाबासाहेब हैं कि उन्होंने भारत के आधुनिक एजेण्डे के रूप में अछूत को प्रतिष्ठित किया। आधुनिक युग की सबसे जटिल समस्या के रूप में अछूत समस्या को पेश किया।
आधुनिकाल में किसी के लिए स्वाधीनता,किसी के लिए समाजसुधार, किसी के लिए औद्योगिक विकास , किसी के लिए क्रांति और साम्यवादी समाज से जुड़ी समस्याएं प्रधान समस्या थीं किंतु आंबेडकर ने इन सबसे अलग अछूत समस्या को प्रधान समस्या बनाया। अछूत समस्या पर बातें करने ,पोजीशन लेने का अर्थ था अपने बंद विचारधारात्मक कैदघरों से बाहर आना। जो कुछ सोचा और समझा था उसे त्यागना। अछूत और उसकी समस्याओं पर संघर्ष का अर्थ है पहले के तयशुदा विचारधारात्मक आधार को त्यागना और अपने को नए रूप में तैयार करना। अछूत समस्या से संघर्ष किसी क्रांति के लिए किए गए संघर्ष से भी ज्यादा दुष्कर है। आधुनिककाल में क्रांति संभव है,आधुनिकता संभव है,औद्योगिक क्रांति संभव है किंतु आधुनिक काल में अछूत समस्या का समाधान तब ही संभव है जब मानवाधिकार के प्रकल्प को आधार बनाया जाए।
क्रांति,आधुनिकता,औद्योगिक क्रांति इन सबका आधार मानवाधिकार नहीं हैं। बल्कि किसी न किसी रूप में इनमें मानवाधिकारों का हनन होता है। अछूत समस्या मानवीय समस्या है इसके खिलाफ संघर्ष करने का अर्थ है स्वयं के खिलाफ संघर्ष करना और इससे हमारा बौध्दिकवर्ग,राजनीतिज्ञ और मध्यवर्ग भागता रहा है। ये वर्ग किसी भी चीज के लिए संघर्ष कर सकते हैं किंतु अछूत समस्या के लिए संघर्ष नहीं कर सकते। अछूत समस्या अभी भी मध्यवर्ग और पूंजीपतिवर्ग के चिन्तन को स्पर्श नहीं करती। अछूत सम्सया को वे महज घटना के रूप में दर्शकीय भाव से देखते हैं। अछूत समस्या न तो घटना है और न परिघटना और न संवृत्तिा ही है। बल्कि मानवीय समस्या है मानवाधिकार की समस्या है। मानवाधिकारों के विकास की समस्या है। हमारे समाज में मानवाधिकारों के विकास को लेकर जितनी जागृति पैदा होगी अछूत समस्या उतनी ही कम होती जाएगी। जिस समाज में मानवाधिकारों का अभाव होगा वहां पर अछूत समस्या,बहिष्कार की समस्या उतनी प्रबल रूप में नजर आएगी।
अछूत समस्या के पेचोखम- भारतीय समाज में शूद्र सिर्फ अछूत नहीं है। बल्कि गुमशुदा भी है। हम उसे कम से कम जानते हैं। हम उसे देखकर भी अनदेखा करते हैं। उसका कम से कम वर्णन करते हैं। अछूतों के जीवन के व्यापक ब्यौरे तब ही आए जब हमें आधुनिककाल में ज्योतिबा फुले और आंबेडकर जैसे प्रतिभाशाली विचारक मिले। यह सोचने वाली चीज है कि आंबेडकर ने जाति व्यवस्था के मर्म का उद्धाटन करते हुए जितने विस्तार के साथ अछूतों की पीड़ा को सामने रखा और उससे मुक्त होने के लिए सामाजिक-राजनीतिक प्रयास आरंभ किए वैसे प्रयास पहले कभी नहीं हुए।
आधुनिककाल के पहले शूद्र हैं किंतु अनुपस्थित और अदृश्य हैं। जातिव्यवस्था है किंतु जातिव्यवस्था के अनुभव गायब हैं। जाति कभी मनोवैज्ञानिक चीज नहीं थी। बल्कि जाति का ठोस आर्थिक आधार था। जाति के ठोस आर्थिक आधार को बदले बगैर जाति की संरचनाओं को बदलना संभव नहीं था। संत और भक्त कवियों के यहां जाति एक मनोदशा के रूप में दाखिल होती है। मनोदशा के धरातल पर ही ईश्वर सबका था और सब ईश्वर के थे। भक्ति में भेदभाव नहीं था। भक्ति का सर्वोच्च रूप वह था जो मनसा भक्ति से जुड़ा था। वास्तविकता इसके एकदम विपरीत थी। ईश्वर और धर्म की सत्ताा के वर्चस्व के कारण भेद और वैषम्य के सभी समाधान मनोदशा के धरातल पर ही तलाशे गए। मन में ही सामाजिक समस्याओं के समाधान तलाशे गए। सामाजिक यथार्थ से भक्त कवियों का लगाव एकदम नहीं था। यही वजह है कि वे जातिभेद के सामाजिक रूपों को देखने में असमर्थ रहे। इस कमजोरी के बावजूद भक्तकवियों ने जातिभेद के खिलाफ मनोदशा के स्तर पर संघर्ष करके कम से कम सामंजस्य का वातावरण तो बनाया। यह दीगर बात है कि सामंजस्य के पीछे वर्चस्वशाली वर्गों की हजम कर जाने की मंशा काम कर रही थी। उल्लेखनीय है सामंजस्य की बात तब उठती है जब अन्तर्विरोध हों, टकराव हो,तनाव हो। वरना सामंजस्य पर इतना जोर क्यों ?
   आधुनिकाल आने के बाद पहलीबार ईश्वर की विदाई होती है। धर्म के वैचारिक आवरण के बाहर पहलीबार मनुष्य झांकता है। उसे सारी दुनिया और अपनी परंपराएं, सामाजिक यथार्थ वास्तव रूप में दिखाई देता है और उसकी वास्तव रूप में ही अभिव्यक्ति भी करता है। आधुनिककाल में दुख पहले गद्य में अभिव्यक्त होता है। मध्यकाल में दुख पद्य में अभिव्यक्त होता है। दुख और अन्तर्विरोध की अभिव्यक्ति गद्य में हुई या पद्य में इससे भी दुख के संप्रेषण की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। मध्यकाल में मनुष्य अपने दुख और पिछडेपन के लिए भाग्य को दोष देता था,पुनर्जन्म के कर्मों को दोष देता था,ईश्वर की कृपा को दोषी ठहराता था। किंतु आधुनिक युग में मनुष्य को पहलीबार अपने दुख और कष्ट के कारण के तौर पर शिक्षा का अभाव सबसे बड़ी चीज नजर आती है। यही वजह है कि शूद्रों में सामाजिक समानता,उन्नति के मंत्र के तौर पर शिक्षा को प्राथमिक महत्व पहलीबार ज्योतिबा फुले ने दिया। सन् 1948 में पुणे में फुले ने एक पाठशाला खोली, यह शूद्रों की पहली पाठशाला थी। भारत के ढाई हजार साल के इतिहास में शूद्रों की यह पहली पाठशाला थी। असल में पाठशाला तो प्रतीकमात्र है उस आने वाले तूफान का जो ज्योतिबा फुले महसूस कर रहे थे।
सन् 1848 में शूद्रों की शिक्षा का आरंभ करके कितना बड़ा क्रांतिकारी कार्य किया था यह बात आज कोई नहीं समझ सकता। उस समय शूद्रों को पढ़ाने के लिए शिक्षक नहीं मिलते थे अत: ज्योतिबा फुले ने अपनी अशिक्षित पत्नी को सुशिक्षित कर अध्यापिका बना दिया। इस उदाहरण में अनेक अर्थ छिपे हैं। पहला अर्थ यह कि शूद्रों के साथ अतीत में सबकुछ अच्छा नहीं होता रहा है। भारत का अतीत जाति सामंजस्य की बजाय जातीय घृणा के आधार पर टिका हुआ था। जातीय घृणा के कारण शूद्रों के लिए स्वतंत्र शिक्षा की व्यवस्था करनी पड़ी। दूसरा अर्थ यह संप्रेषित होता है कि शूद्र सामाजिक तौर पर अति पिछडे थे। तीसरा अर्थ यह कि भारत में शूद्रों के पठन-पाठन की परंपरा ही नहीं थी। सामंजस्य और भक्ति के नाम पर सामाजिकभेदों से जुड़ी सभी चीजों को छिपाया हुआ था। यही वजह है कि शूद्रों के लिए शिक्षा की व्यवस्था की शुरूआत की गई तो चारों ओर जबर्दस्त हंगामा हुआ।
आधुनिककाल में पहलीबार शूद्रों को यह बात समझाने में ज्योतिबा फुले को सफलता मिली कि मनुष्य के अस्तित्व की पहचान शिक्षा से होती है। शिक्षा के अभाव में मनुष्य पशु समान होता है। शूद्रों के लिए शिक्षा का अर्थ वही नहीं था जो सवर्णों के लिए था। शूद्रों के लिए शिक्षा अस्तित्वरक्षा, स्वाभिमान, आत्मनिर्भरता और आत्मोध्दार के साथ अस्मिता की स्थापना का उपकरण भी थी। यही वजह है कि शिक्षा का शूद्रों में जितना प्रसार हुआ है अस्मिता की राजनीति का भी उतना ही प्रसार हुआ है।
ज्योतिबाफुले -आंबेडकर के द्वारा शुरू की गई अस्मिता की राजनीति विदेश से लायी गई चीज नहीं है। साम्राज्यवादी साजिश का अंग नहीं है। बल्कि यह तो भारत के संतुलित विकास के परिप्रेक्ष्य के गर्भ से उपजी राजनीति है। इसका आयातित अस्मिता की मौजूदा राजनीति के साथ तुलना करना सही नहीं होगा। शूद्रों की शिक्षा का लक्ष्य था, सामाजिक भेदभाव को खत्म करना, मानवाधिकारों के प्रति सचेतनता पैदा करना और समानता को व्यापक मूल्य के रूप में स्थापित करना।
अछूत समस्या हमारे देश में कई हजार सालों से है। किंतु इसके खिलाफ कभी सामाजिक आंदोलन नहीं हुए। आखिरकार क्या कारण है कि भारत में विगत ढाई हजार सालों में कभी क्रांति नहीं हुई ? क्या अछूत समस्या को खत्म किए बगैर क्रांति संभव है ? क्या वजह है कि आधुनिककाल में ही अछूत समस्या के खिलाफ सामाजिक आंदोलन संभव हो पाया ? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत में जातिभेद खत्म हो सकता है ? इन सभी सवालों का एक-दूसरे के साथ गहरा संबंध है।
भारत में जातिव्यवस्था के खिलाफ क्रांति अथवा सामाजिक क्रांति न हो पाने के तीन प्रधान कारण हैं , पहला ,अंधविश्वासों में आस्था,दूसरा ,पुनर्जन्म की धारणा में विश्वास और तीसरा,कर्मफल के सिध्दान्त के प्रति विश्वास। इन तीन विचारधारात्मक बाधाओं के कारण भारत में सामाजिक क्रांति नहीं हो पायी। अंधविश्वासों में आस्था के कारण हमने कभी जातिभेद क्यों है? गरीब गरीब क्यों है और अमीर अमीर क्यों है ? क्या पीपल के पेड़ को पूजने से मनोकामना पूरी होती है ? क्या साहित्य में जो रूढ़ियां चलन में हैं वे वास्तव में भी हैं ? इत्यादि चीजों को यथार्थ में कभी परखा नहीं। हम यही मानकर चलते रहे हैं कि मनुष्य गरीब इसलिए है क्योंकि पहले जन्म में कभी बुरे कर्म किए थे। उसका ही फल है कि इस जन्म में गरीब है। अमीर इसलिए अमीर है क्योंकि वह पहले जन्म में पुण्य करके आया है।
अच्छे कर्म करोगे अच्छे घर में जन्म लोगे। बुरे कर्म करोगे नीच कुल में जन्म होगा। निचली जाति में उन्हीं लोगों का जन्म होता है जिन्होंने पहले बुरे कर्म किए थे। निचली जातियों को नरक के प्रतीक के रूप में चित्रित किया गया और एक नए किस्म के प्रचार अभियान की शुरूआत हुई। इससे जातिभेद को वैधता मिली। कर्मफल के सिध्दान्त की सबसे बड़ी किताब है श्रीमद्भगवतगीता इसके आधार पर कर्मफल के सिध्दान्त को खूब प्रचारित किया गया। कर्म किए जा फल की चिन्ता मत कर। उल्लेखनीय है गीता को आदर्श दार्शनिक किताब के रूप में तिलक से लेकर गांधी तक सभी ने प्रधानदर्जा दिया था। गीता आज भी मध्यवर्ग की आदर्श किताब है।
उल्लेखनीय है कि बाबासाहेब आंबेडकर ने जातिप्रथा को इन तीनों विचारधारात्मक बाधाओं के दायरे बाहर निकालकर पेश किया। संभवत: बाबासाहेब अकेले बड़े स्वाधीनतासेनानी थे जिनकी कर्मफल के सिध्दान्त,पुनर्जन्म और अंधविश्वासों में आस्था नहीं थी। यदि इन तीनों चीजों में आस्था रही होती तो अछूत समस्या को राष्ट्रीय समस्या बनाना संभव ही न होता। कहने का तात्पर्य यह है अछूत समस्या से मुक्ति के लिए, जातिप्रथा से मुक्ति के लिए चार प्रमुख कार्य किए जाने चाहिए।
पहला- अंधविश्वासों के खिलाफ जंग।
दूसरा- पुनर्जन्म की धारणा के खिलाफ जनजागरण।
तीसरा- कर्मफल के सिध्दान्त के खिलाफ सचेतनता।
चौथा- अछूत जातियों के साथ रोटी-बेटी के संबंध और पक्की दोस्ती।
ये चारों कार्यभार एक-दूसरे से अविच्छिन्न रूप से जुड़े हैं। इनमें से किसी एक को भी त्यागना संभव नहीं है। कहने का तात्पर्य यह है शिक्षा ,नौकरी अथवा आरक्षण मात्र से अछूत समस्या का समाधान संभव नहीं है। अछूत समस्या को खत्म करने के लिए आमलोगों में खासकर दलितों में विज्ञानसम्मत चेतना का प्रसार करना बेहद जरूरी है। विज्ञानसम्मतचेतना के अभाव में दलित हमेशा दलित रहेगा। उसकी दलितचेतना से मुक्ति नहीं होगी। जातिभेद कभी खत्म नहीं होगा। हमें इस तथ्य पर ध्यान देना चाहिए कि हमारी शिक्षा हमें कितना विज्ञानसम्मत विवेक देती है ? सच यही है कि हमारी शिक्षा में कूपमंडूकता कूटकूटकर भरी पड़ी है। पैंतीस साल के शासन के वाबजूद पश्चिम बंगाल की शिक्षा व्यवस्था में से कूपमंडूकता को पूरी तरह विदा नहीं कर पाए हैं।
दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि जातिप्रथा एक तरह का पुराने किस्म का सामाजिक अलगाव है। जातिप्रथा को आज नष्ट करने के लिए सामाजिक अलगाव को नष्ट करना बेहद जरूरी है। सामाजिक अलगाव आज के दौर में व्यापक शक्ल में सामने आया है। हम एक-दूसरे के दुख-सुख में साझीदार नहीं बनते। कभी एक-दूसरे के बारे में खबर-सुध नहीं लेते। यही सामाजिक अलगाव पहले जातियों में भी था। खासकर निचली कही जाने वाली जातियों के प्रति सामाजिक अलगाव यकायक पैदा नहीं हुआ। बल्कि इसे पैदा होने में सैंकड़ों साल लगे। सामाजिक अलगाव को अब हमने वैधता प्रदान कर दी है। सामाजिक अलगाव को हम स्वाभाविक मानने लगे हैं। नए युग की विशेषता मानने लगे हैं। नए आधुनिक जीवन संबंधों की अनिवार्य परिणति मानने लगे हैं। सामाजिक अलगाव की अवस्था में जातिभेद और जातिघृणा बढ़ेगी। क्योंकि सामाजिक अलगाव से जातिघृणा को ऊर्जा मिलती है। यह अचानक नहीं है कि सन् 1970 के बाद के वर्षों में पूंजीवादी विकास जितना तेज गति से हुआ है। सामाजिक अलगाव में भी इजाफा हुआ है। जाति संगठनों में भी इजाफा हुआ है। जातिघृणा और जाति संघर्ष बढ़े हैं। जातिघृणा,जातिसंघर्ष और जातिगत तनाव तब ही पैदा होते हैं जब हम अलगाव की अवस्था में होते हैं।
    सामाजिक अलगाव पूंजीवादी विकास की स्वाभाविक परिणति है ,इसका सचेत रूप से प्रतिवाद किया जाना चाहिए। अचेत रूप से सामाजिक अलगाव को स्वीकार लेने का अर्थ है आपसी अलगाव में इजाफा। अलगाव खत्म होगा तो संगठन की महत्ताा भी समझ में आती है। सामाजिक शिरकत,सामाजिक साझेदारी, व्यक्तिगत और सामाजिक भावनात्मक विनिमय और आर्थिक सहयोग ये चीजें जितनी बढ़ेंगी उतनी ही भेद की दीवार गिरेगी।

हमें सोचना चाहिए आरक्षण किया,संविधान में संरक्षण दिया, तमाम किस्म के कानून बनाए,सभी दल इन कानूनों के प्रति वचनबध्द हैं,इसके बावजूद जाति उत्पीड़न थमने का नाम नहीं लेरहा। एससी,एसटी का अलगाव कम नहीं हो रहा। उनकी असुरक्षा की भावना कम नहीं हो रही। इस प्रसंग में पश्चिम बंगाल के उदाहरण से समझाना चाहूँगा।यहां पर जातियाँ हैं। जातिभेद भी है। किंतु निचले स्तर पर कम्युनिस्ट पार्टियों के संगठनों का तंत्र इस कदर फैला हुआ है कि आप उसकी परिधि के बाहर जा नहीं सकते। यह तंत्र सामाजिक संपर्क,सामाजिक संबंध और आपसी भाईचारा बनाए रखने और विनिमय का काम करता है। इसका सुफल यह निकला है कि आमलोगों में अभी शिरकत और सहयोग का भाव बचा हुआ है। वे एक-दूसरे के सुख-दुख में सहयोग करते हैं। यही वजह है पश्चिम बंगाल में जातिगत तनाव और जाति संघर्ष नहीं हैं।
जबकि सच यह है आरक्षण यहां कम लागू हुआ है। राजनीति में दलितों का नहीं सवर्णों का बोलवाला है। इसके बावजूद जातिसंघर्ष नहीं हैं। यथासंभव निचली जातियों को जमीन का हिस्सा भी मिला है। संगठन के कारण उनकी आवाज सुनी भी जाती है। इसके कारण उत्पीडन करने की हिम्मत नहीं होती। आंबेडकर ने स्वयं संगठन को महत्ताा दी थी, संगठन के तौर पर आदर्श सांगठनिक संरचना कम्युनिस्टों के पास है। मुश्किल यहां से शुरू होती है। कम्युनिस्ट कतारें अभी भी उपरोक्त तीन विचारधारात्मक बाधाओं को नष्ट नहीं कर पायी हैं। अभी भी कम्युनिस्ट कतारों में अंधविश्वासों में आस्था रखने वाले, पुनर्जन्म में विश्वास करने वाले,कर्मफल के सिध्दान्त में विश्वास करने वाले बचे हुए हैं। किंतु इनकी संख्या में तुलनात्मक तौर पर गिरावट आयी है।
किंतु एक चीज जरूर हुई है कि जातिभेद का जितना प्रत्यक्ष तांडव देश के अन्य इलाकों में नजर आता है वैसा यहां नजर नहीं आता। इसका प्रधान कारण है सामाजिक रूप से कम्युनिस्ट संगठनों का सामाजिक संरचनाओं में घुलामिला रहना। आंबेडकर के इस विचार को कि जातिप्रथा को नष्ट करने के लिए जरूरी है कि शूद्रों और गैर शूद्रों में रोटी-बेटी के संबंध हों। यही चीज कमोबेश पश्चिम बंगाल में लागू करने में वामपंथियों को सफलता मिली है। इस अर्थ में वे इस राज्य में सामाजिक क्रांति में एककदम आगे जा पाए हैं। दूसरी बात यह है कि दलितों पर उत्पीडन की घटनाएं इस राज्य में कम से कम होती हैं। यदि कभी दलित उत्पीड़न की कोई घटना प्रकाश में आती है तो प्रशासन से लेकर राजनीतिक स्तर तक ,यहां तक कि मध्यवर्गीय कतारों में भी उसके खिलाफ तीव्र प्रतिक्रिया होती है। यह इस बात का संकेत है कि सामाजिक संवेदनशीलता अभी बची हुई है। अन्य राज्यों में स्थिति बेहद खराब है।

जिस राज्य में दलित मुख्यमंत्री हो,दलित पार्टी का शासन हो,वहां दलित उत्पीडन की घटनाएं रोजमर्रा की बात हो गयी हैं। इन घटनाओं के प्रति आम जनता में संवेदनशीलता कहीं पर भी नजर नहीं आती। क्योंकि उन राज्यों में सामाजिक अलगाव को कम करने का कोई भी प्रयास राजनीतिक दल नहीं करते। बल्कि राजनीतिक लाभ और क्षुद्र सांगठनिक लाभ हेतु सामाजिक अलगाव का इस्तेमाल करते हैं।
एक वाक्य में कहें तो उत्तारप्रदेश,बिहार आदि राज्यों में जातिदलों ने सामाजिक अलगाव को अपनी राजनीतिक पूंजी में तब्दील कर दिया है। वे सामाजिक अलगाव का निहितस्वार्थी लक्ष्यों को अर्जित करने के लिए दुरूपयोग कर रहे हैं। इससे जातिसंघर्ष बढ़े हैं। सामाजिक असुरक्षा बढ़ी है। सामाजिक अस्थिरता बढ़ी है। अछूत समस्या बढ़ी है। अछूत समस्या को खत्म करने के लिए सामाजिक अलगाव को खत्म करना बेहद जरूरी है। सामाजिक अलगाव का राजनीतिक दुरूपयोग बंद करना जरूरी है।
दलित का राजनीतिक दुरूपयोग सामाजिक टकराव और तनावों को बनाए रखता है और विगत साठ सालों में हमारे विभिन्न राजनीतिक दलों ने दलित समस्या के समाधान के नाम पर यही किया है। उनके लिए दलित मनुष्य नहीं है बल्कि वोट है। एक अमूर्त पहचान है। बेजान चीज है। सत्ताा का स्रोत है। यही दलित की आयरनी भी है। अब हम दलित को मनुष्य के तौर पर नहीं वोटबैंक के तौर पर जानते हैं। आरक्षण के नाम से जानते हैं। वोटबैंक और आरक्षण में दलित की पहचान का रूपान्तरण दलित को वर्चुअल बना देता है। दलित का वर्चुअल बनना मूलत: मध्यकाल में लौटना है। वर्चुअल बनने के बाद दलित और भी दुर्लभ हो गया है। हमें दलित को वर्चुअल होने से बचाना होगा। दलित के वर्चुअल बनने का अर्थ है वह है भी और नहीं भी। वर्चुअल दलित मायावती जैसे नेताओं की पूंजी है। ये दोनों एक-दूसरे के चौखटे में फिट बैठते हैं। मायावती के यहां दलित वर्चुअल है। ठोस हाड़मांस का इन्सान नहीं है। यही वजह है दलित की किसी भी समस्या को ठोस रूप में मायावती अपने चुनावी घोषणापत्र में व्यक्त नहीं करती। बल्कि यह कहना सही होगा कि मायावती स्वयं वर्चुअल है। उसने कोई भी ठोस चुनावी घोषणापत्र भी जारी नहीं किया। यही हाल दलितों के मसीहा लालू-मुलायम का है। ये दलितों के हैं और दलितों के नहीं भी हैं। दलित इनके यहां वर्चुअल है और दलित के लिए ये वर्चुअल हैं। कहने का तात्पर्य यह है दलित को वर्चुअल होने से बचाना होगा। दलित के वर्चुल होने का अर्थ दलित का लोप और यह एक तरह से मध्यकाल की वापसी होगी किंतु बेहद त्रासद और भयावह वापसी होगी ।








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