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कश्मीर पर नल्लागिरी कर रही है मोदी सरकार

´भाबी जी घर पर हैं ´सीरियल में एक पात्र है विभूतिनारायण मिश्रा, उनकी खूबी है वे नल्ले हैं ,यानी बेरोजगार हैं।इसी तरह कश्मीर मामले पर हमारे पीएम नल्ले हैं,बेरोजगार हैं, उनके पास कश्मीर को लेकर कोई काम नहीं है।उनका समूचा मंत्रीमंडल नल्लागिरी का शिकार है,इसके कारण कश्मीर के संदर्भ में नीतिहीनता-दिशाहीनता की स्थिति पैदा हो गयी है।
मोदी की कार्यशैली में अक्लमंदों-नीतिविशारदों की न्यूनतम भूमिका है,वे हर काम कॉमनसेंस और नौकरशाही के बल पर करने के अभ्यस्त हैं,वे भूल गए हैं कि वे अब गुजरात के मुख्यमंत्री नहीं भारत के पीएम हैं।उनको अनेक ऐसे क्षेत्र देखने होते हैं जहां नीति,दूरदृष्टि और विश्वदृष्टि की जरूरत होती है।हर चीज नौकरशाही-कॉमनसेंस और गुजरातदृष्टि या एप बनाने से हल नहीं होती। मोदी का एप बनाने पर जोर मूलतः उनके तकनीकी कॉमनसेंस की देन है इसका किसी नीतिगत विवेकवाद से कोई संबंध नहीं है।
मोदी के सामने मुश्किलें तब आती हैं जब कोई जटिल नीतिगत मसला आकर फंस जाता है और यहीं पर मोदी का व्यक्तित्व एकदम बौना हो जाता है। कल वे जब मंत्रीमंडल के कुछ सहयोगियों,ढोभाल,थल सेनाध्यक्ष आदि को लेकर कश्मी…

नव्य उदार आर्थिकयुगीन युवा की सच्चाईयां-

भूमंडलीकरण की केन्द्रीय विशेषता है आत्ममुग्धता ,आत्महनन और आत्म-व्यस्तता । सन् 1990-91 के बाद से युवाओं में यह प्रवृत्ति तेजी से पैदा हुई है। इसने उसे सामाजिक सरोकारों से काटा है। पहले यह प्रवृति उच्चवर्ग में थी लेकिन भूमंडलीकरण के बाद से इस प्रवृत्ति ने निचले वर्गों में पैर पसारने आरंभ कर दिए।
आत्ममुग्ध भाव की विशेषता है आप स्वयं को जानने की कोशिश नहीं करते। वे तमाम क्षमताएं त्याग देते हैं जिसके जरिए आत्म को जानने में मदद मिले। आत्म या खुद को न जानने के कारण व्यक्ति के अंदर अन्य को जानने की इच्छा भी खत्म हो जाती है।फलतः ये युवा अन्य की मदद नहीं कर पाते। वे निजी जीवन में व्यस्त रहते हैं। निज से परे कोई संसार है जिसे जानना चाहिए उसको ये युवा सम्बोधित ही नहीं करते। यह ऐसा युवा है जो अपने अलावा किसी में दिलचस्पी नहीं ले जाता। ज्योंही अन्य की बातें आरंभ होती हैं यह सुनना बंद कर देता है, रुचि लेना बंद कर देता है।
नए युवा देखने में आकर्षक,नए भाव-भंगिमा वाले हैं वे देखने में सुंदर लगते हैं। आरंभ में ये अन्य को जल्दी प्रभावित भी कर लेते हैं लेकिन ज्योंही अन्य की बातें आरंभ होती हैं ये अपने को…

आम्बेडकर और हिन्दूधर्म

हाल ही में आम्बेडकर के बहाने आरएसएस ने जो प्रचार किया उसमें आम्बेडकर के प्रति आस्था और विश्वास कम और वैचारिक अपहरण का भाव ज्यादा था।आरएसएस और आम्बेडकर के नजरिए में जमीन-आसमान का अंतर ही नहीं बल्कि शत्रुभाव है।दोंनों के लक्ष्य ,विचारधारा और हित अलग हैं। आम्बेडकर का व्यक्तित्व स्वाधीनता संग्राम और परिवर्तनकामी विचारों से बना था,जबकि संघ इस आंदोलन के बाहर था,उसे परिवर्तनकामी विचारों से नफरत है।वह अंग्रेजों की दलाली कर रहा था।    आम्बेडकर धर्मनिरपेक्ष थे,संघ को धर्मनिरपेक्षता से नफरत है।आम्बेडकर हर स्तर पर समानता के हिमायती थे,संघ हर स्तर पर भेदभाव का पक्षधर है। आम्बेडकर दलितों की मुक्ति चाहते थे,संघ दलितों को दलित बनाए रखना चाहता है।आम्बेडकर को भगवान नहीं इंसान से प्रेम था,संघ को इंसान नहीं भगवान से प्रेम है।आम्बेडकर धर्मनिरपेक्ष भारत चाहते थे,संघ हिन्दू भारत चाहता है।इतने व्यापक भेद के बाद भी संघ के लोग आम्बेडकर को माला इसलिए पहनाते हैं जिससे आम्बेडकर प्रेम का ढोंग हना रहे।संघ में ढोंग और नाटक करने की विलक्षण क्षमता है।यह क्षमता इसे हिंदू धर्म से विरासत में मिली है।हिंदू माने नकली…

कश्मीर से आई आवाज छात्र एकता जिंदाबाद

इस साल का नारा होगा-गर्व से कहो हम छात्र हैं ।छात्रों के हकों पर जिस तरह हमले बढ़ रहे हैं,छात्र राजनीति के ऊपर अंकुश लगाने की साजिशें चल रही हैं उनसे छात्र अपने को अपमानित महसूस कर रहे हैं।यूजीसी से लेकर केन्द्र का मानव संसाधन मंत्रालय,राज्य सरकारों से लेकर शिक्षा माफिया तक सब ओर से छात्रों के हकों पर हमले हो रहे हैं।छात्रों के अपने हक हैं जिनकी लंबे समय से अनदेखी होती रही है।कश्मीर में आतंकी समस्या को हल करने में केन्द्र सरकार नाकाम रही है और उसके प्रतिवाद में विगत पांच दिनों से कश्मीर के छात्र हड़ताल पर हैं।कश्मीर में छात्रों का समूचा कैरियर और शिक्षा व्यवस्था लंबे समय से ठप्प पड़ी है।दुख की बात यह है कश्मीरी छात्रों का भविष्य किसी को नजर नहीं आ रहा,उनकी समस्याएं किसी को दिखाई नहीं दे रहीं।
यही स्थिति जेएनयू की है ,जिन छात्रों ने जेएनयू से एमए किया और आगे एमफिल-पीएचडी करना चाहते थे, उनके भविष्य को रोकने के लिए जेएनयू वीसी ने वहां की तयशुदा दाखिला नीति को यूजीसी सर्कुलर की आड़ में खत्म कर दिया और एमफिल्-पीएचडी के दाखिले के लिए तय सीटों में इस तरह कटौती की कि एमफिल्-पीएचडी में तकरीबन …

तुलनात्मक साहित्य के अध्ययन की समस्याएं

काव्य या साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन करने ज्यों ही जाते हैं बड़ी समस्या उठ खड़ी होती है। पहली अनुभूति यह पैदा होती है कि हिन्दी की कविता अन्य विदेशी भाषा की कविता से पीछे है। आलोचना का तुलनात्मक अध्ययन करने जाते हैं तो पाते हैं कि हिन्दी की आलोचना कितनी पीछे है। यही दशा अन्य विधाओं की है।

यानी तुलना करते ही बार-बार यह एहसास पैदा होता है कि हिन्दी का साहित्य अन्य भाषाओं के साहित्य से कितना पीछे है। ऐसा नहीं है कि हम हिन्दी वालों को ही ऐसी अनुभूति होती है। अंग्रेजी के साहित्यकारों को भी ऐसी ही अनुभूति होती है कि फ्रेंच या जर्मन साहित्य से उनका साहित्य कितना पीछे है।

मैथ्यू अर्नाल्ड पहले लेखक हैं जिन्होंने पहलीबार एकपत्र में 1848 में ‘तुलनात्मक साहित्य’ पर सुसंगत ढ़ंग से विचार किया था। सन् 1886 में पहलीबार एच.एम.पॉसनेट ने ,जो अंग्रेजी के प्रोफेसर थे, उन्होंने पहलीबार अपनी किताब का नाम इसी पदबंध से ऱखा था।

मैं निजीतौर पर महसूस करता हूँ कि ‘तुलनात्मक साहित्य’ की बजाय ‘ साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन’ कहना ज्यादा संगत होगा। ‘तुलनात्मक साहित्य’ मूलतः खोखला पदबंध है। इस प्रसंग में कॉरन…

फेसबुक और नार्सिसिज़्म -

मैकलुहान के शब्दों में कहें तो मनुष्य तो मशीनजगत का सेक्स ऑर्गन है। डिजिटल मानवाधिकार इससे आगे जाता है और गहराई में ले जाकर मानवीय शिरकत को बढ़ावा देता है। हिन्दी के जो साहित्यकार फेसबुक पर हंगामा मचाए हुए हैं वे गंभीरता से सोचें कि सैंकड़ों की तादाद में जो लाइक आ रहे हैं वे कम्युनिकेशन को गहरा बना रहे या उथला ?
कम्युनिकेशन गहरा बने इसके लिए जरूरी है डिजिटल रूढ़िवाद से बचें। डिजिटल रूढ़िवाद मशीन प्रेम पैदा करता है,तकनीक की खपत बढ़ाता है । लेकिन कम्युनिकेशन में गहराई नहीं पैदा करता। डिजिटलरूढ़िवाद की मुश्किल है कि उसके कान नहीं हैं। वह इकतरफा बोलता रहता है,वह सिर्फ अपनी कही बातें ही सुनता है अन्य की नहीं सुनता। मसलन्, मैंने यह कहा,मैंने यह किया,मैं ऐसा हूँ,मैं यहां हूँ,मैं यह कर रहा हूँ,वह कर रहा हूँ आदि।
हिन्दी के फेसबुकरूढ़िवादी जब फोटो के जरिए अभिव्यक्ति का जश्न मनाते हैं तो वे भूल जाते हैं कि वे वैचारिक तौर पर क्या कर रहे हैं। फेसबुक या किसी भी डिजिटल मीडियम का गहरा संबंध मानवीय क्रियाकलापों और संचार से है। फेसबुक पर लाइक या फोटो लगाने के बहाने हम अपने भाव-भंगिमाओं और गतिविधियों क…

नामवर सिंह और रसशास्त्र का विखंडन

रस पर इन दिनों तकरीबन बातें नहीं हो रही हैं।जबकि रसशास्त्र ने 18सौ साल तक रचना और आलोचना को प्रभावित किया,हमारे सौंदर्यबोध के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की ।सवाल यह है कि वह अचानक गायब कैसे हो गया ? क्या रस आज भी प्रासंगिक है ? क्या रसशास्त्र के जरिए नाटक, साहित्य और समाज का नया मूल्यांकन संभव है ? बकौल नामवर सिंह “रसःजस का तस या बस ?” हमें इस लक्ष्मणरेखा का मूल्यांकन करना चाहिए।अनेकबार अकादमिक आलस्य के कारण हम परंपरा में जाना बंद कर देते हैं और यही बड़ी वजह है कि रस पर हमने बातें बंद कर दी हैं।

सवाल उठता है रचना लिखने के बाद और रचना लिखने के दौरान लेखक अपनी रचना का आनंद लेता है या नहीं ? कुछ कह रहे हैं रचना लिखने के बाद रचना स्वायत्त हो जाती है। यह भी कहा जा रहा है कि रचना कभी स्वायत्त नहीं होती,वह पाठक से हमेशा जुड़ी रहती है,पाठक के आत्मगतबोध से जुड़ी रहती है। सृजन के बाद लेखक से रचना अपने को स्वायत्त कर लेती है , लेखक अपनी रचना का लिखने के दौरान आस्वाद भी लेता है लेकिन असल आस्वाद तो पाठक लेता है। लेखक को तो लिखकर ही शांति मिलती है,सुख मिलता है। रचना कैसी है यह…

- संस्कृत आलोचना के अनुत्तरित सवाल -

इन दिनों प्रशंसा महान है और आलोचना गुम ! आलोचना के गुम होने की स्थिति में उन पक्षों को देखना जरुरी है जिनके कारणो से आलोचना गुम हुई है। आलोचना गुम तब होती है जब समाज पर साहित्यकार-आलोचक की पकड़ ढ़ीली पड़ जाती है अथवा आलोचना रुपवादी मार्ग पर चल निकले।आधुनिककाल में आलोचना का रुपवादी मार्ग सीधे सर्वसत्तावाद तक ले जाता है। जिन देशों में रुपवादी आलोचना आई वहां पर आगे-पीछे सर्वसत्तावाद या अधिनायकवादी शासन भी आया,रुपवादी आलोचना के राजनीतिक आयामों को हमने कभी खोलकर देखने की कोशिश ही नहीं की।रुपवादी समीक्षा का श्रेष्ठतम रुप देखना हो तो हमें संस्कृत काव्यशास्त्र की यात्रा करनी चाहिए।आलोचना के ह्रास के मर्म को समझने में संस्कृत काव्यशास्त्र का पुनर्मूल्यांकन हमारी बेहतर ढ़ंग से मदद कर सकता है। इससे हमें उन विचार-सरणियों को समझने में भी मदद मिलेगी जिन पर चलकर संस्कृत काव्यशास्त्र का मूल्यांकन विगत दो सौ सालों में विकसित हुआ है।

भरत कृत नाट्यशास्त्र और समाज-

संस्कृत काव्यशास्त्र को देखने के कई दृष्टिकोण मिलते हैं। पहला, विंटरनित्स,मैक्समूलर,कीथ आदि पाश्चात्य भारतविदों का नजरिया है, ज…

संस्कृत काव्यशास्त्र की समस्याएं

काव्यशास्त्र की प्रमुख समस्या है नए अर्थ की खोज।नए अर्थ की खोज के लिए आलोचकों ने रूपतत्वों को मूलाधार बनाया,जबकि वास्तविकता यह है कि नया अर्थ रूप में नहीं समाज में होता है।रूप के जरिए नए अर्थ की खोज के कारण संस्कृतकाव्यशास्त्र भाववादी दर्शन की गिरफ्त में चला गया।इसके लिए रूपकेन्द्रित मॉडल को चुना गया,समाज को अर्थ की खोज में शामिल ही नहीं किया गया। इस अर्थ में काव्यशास्त्र का समूचा कार्य-व्यापार रूपों तक ही सिमटकर रह गया।मसलन् ,संस्कृत के किसी आलोचक ने किसी कृति का विस्तार के साथ मूल्यांकन नहीं किया।इसके कारण संस्कृत काव्यशास्त्र आरंभ से ही एक समस्या रही है वह रूपों के प्रयोगों का शास्त्र है।नए-नए रूपों की खोज और निर्माण की जितनी कोशिशें काव्यशास्त्रियों ने की हैं उतनी कोशिशें उन्होंने नई अंतर्वस्तु को खोजने में नहीं की। काव्यशास्त्र की सबसे सुंदर बात यह है कि इसके सभी स्कूल आवयविक तौर पर एक-दूसरे से जुड़े हैं।      मसलन्,आरंभ रस से हुआ,जो अलंकार,रीति, ध्वनि और वक्रोति सिद्धांत तक पहुँचा ।पूर्ववर्ती आलोचना से नई आलोचना अपने को अलग तो करती है लेकिन पुराने को अंदर समेटे रहती है।…